Friday, 05 June 2026
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क्या अनुराग ठाकुर सरकार की असफलताओं पर आर्शीवाद मांगेंगे

शिमला/शैल। केन्द्रिय सूचना एवम् प्रसारण मन्त्री अनुराग ठाकुर पांच दिन की जन आशीर्वाद यात्रा पर प्रदेश में आ रहे हैं। यह यात्रा 19 अगस्त को हिमाचल भवन चण्डीगढ़ से शुरू होकर 23 अगस्त को शाम को ऊना के मैहतपुर में समाप्त होगी। इस यात्रा में प्रदेश के सभी जिलों के मुख्य स्थानों को कवर किया जायेगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक जब यह यात्रा तय की गयी थी तब इसके रूट में मण्डी संसदीय क्षेत्र शामिल नहीं था। लेकिन बाद में इसमे मण्डी संसदीय क्षेत्र को भी जोड़ दिया गया। सूचना एवम् प्रसारण मन्त्री बनने के बाद अनुराग ठाकुर की यह पहली यात्रा है प्रदेश की ओर वह भी आशीर्वाद यात्रा के रूप में। इस समय देश में लोकसभा के लिये चुनाव नहीं होने जा रहे हैं और न ही प्रदेश की विधानसभा के लिये आम चुनाव हो रहे हैं। प्रदेश में केवल चार उपचुनाव होने हैं जिनमें तीन विधानसभा और एक लोकसभा क्षेत्र शामिल है। यह चुनाव भी कब होंगे यह भी अभी अनिश्चित है क्योंकि चुनाव आयोग ने 30 अगस्त तक कोरोना की नयी एसओपी के तहत राज्य से रिपोर्ट तलब की है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि भाजपा इस यात्रा में किन उपलब्धियों के लिये प्रदेश की जनता से आशीर्वाद मांगेगी। मण्डी संसदीय क्षेत्र के सांसद स्व. रामस्वरूप शर्मा की आत्महत्या के बाद मण्डी सीट खाली हुई है। इस आत्महत्या पर दिल्ली पुलिस में मामला दर्ज है। स्व.रामस्वरूप शर्मा का बेटा दिल्ली पुलिस की जांच पर सवाल उठा चुका है। विधानसभा के अभी हुए सत्र में विपक्ष इसकी सीबीआई से जांच करवाने की मांग कर चुका है। क्या अनुराग ठाकुर इस यात्रा में रामस्वरूप के परिजनों को कोई ठोस आश्वासन दे पायेंगे।
अभी विधानसभा के सत्र में बेरोज़गारों और आऊटसोर्स के माध्यम से पिछले दरवाज़े से मैरिट को नज़रअन्दाज करके भर्तियां करने के आरोप सरकार पर लगे हैं। विपक्ष ने यह आरोप लगाया है कि आऊटसोर्स के माध्यम से प्रदेश में आठ हज़ार लोगों की भर्ती की गयी है और उसमें से पांच हज़ार लोग मुख्यमन्त्री और जल शक्ति मन्त्री के चुनाव क्षेत्रों से ही भर्ती कर लिये गये हैं। क्या अनुराग इस आरोप की जांच का आश्वासन दे पायेंगे या इस मुद्दे को प्रधानमन्त्री तक भी पहुंचाने का वायदा कर पायेंगे। प्रचार प्रसार पर हुए खर्च की जानकारी विधानसभा से ही छुपायी जा रही है। सरकारी धन को ऐच्छिकता से खर्च किया जा रहा है। क्या अनुराग ठाकुर इसका भी जवाब दे पायेंगे। भ्रष्टाचार के आरोपों से ध्यान हटाने के लिये आईपीसी की धारा 505(2) के तहत मामला दर्ज किया जाना कैसे उचित है क्या इसका जवाब यात्रा में आ पायेगा।
आज प्रदेश कर्ज में इतना डूब चुका है कि सारा भविष्य दाव पर लग गया है। बजट सत्र में कांग्रेस विधायिका आशा कुमारी ने तीन वर्षो में प्रतिवर्ष सरकार की कुल आय और खर्च का ब्यौरा मांगा था। इसमें जो जवाब सदन के पटल पर रखा गया है उसके मुताबिक आय और व्यय में करीब 28000 करोड़ का अन्तर है। स्वभाविक है इस अन्तर को पाटने के लिये या तो कर्ज का सहारा लिया गया या फिर इतने कार्यों को अंजाम ही नहीं दिया गया। शिक्षा विभाग में शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं। जितने प्रतिवर्ष सेवानिवृत होते हैं उतने भी नहीं भरे जाते हैं। मंहगाई चरम पर है और यही स्थिति बेरोज़गारी की है। इस परिदृश्य में जब पार्टी उपचुनावों का सामना करेगी तो जनता का सहयोग क्या मिलेगा इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। 2014 से 2019 तक हर चुनाव में स्व. वीरभद्र सिंह पर लगे आरोपों को भुनाया गया था। परन्तु आज उनकी मौत के बाद सारा परिदृश्य बदल गया है। आज जन सहानुभूति उनके साथ है। यह धारणा बन चुकी है कि उनके खिलाफ आधार हीन मामले बनाये गये और लटका कर रखने की नीति पर चलते रहे हैं। ऐसे में क्या अनुराग सरकार की असफलताओं पर जनता से आशीर्वाद मांग पायेंगे।

समग्र शिक्षा अभियान परियोजना में पुस्तक खरीद पर लगे करोड़ों का घपला होने के आरोप

शिमला/शैल। अभी चार अगस्त को उत्तर मध्य भारत के हिन्दी प्रकाशक संघ ने प्रदेश विधानसभा का घेराव करके एक शिकायत पत्र मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर को सौंपकर इसकी विजिलैन्स से जांच करवाने की मांग की है। प्रकाशक संघ में उत्तरी भारत के राज्यों के कई प्रकाशकों ने छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ प्रकाशक सत्य प्रकाश सिंह के नेतृत्व में विधानसभा का घेराव किया। शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि विभिन्न राज्यों के प्रकाशकों ने शिमला में इक्कट्ठे होकर विधानसभा का घेराव किया हो और सरकार के शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार होने के आरोप लगाये हों। इस घेराव से अन्य राज्यों में भी यह सन्देश गया है कि जब शिक्षा विभाग में ही करोड़ो का घपला हो रहा है तो अन्य विभागों की स्थिति क्या होगी। शिक्षा विभाग पर यह आरोप समग्र शिक्षा अभियान परियोजना द्वारा की जा रही पुस्तक खरीद पर लगे हैं। आरोप है कि परियोजना निदेशालय द्वारा पुस्तकों की खरीद के लिये तय प्रक्रिया की अनदेखी करके इस खरीद को अंजाम देने का प्रयास किया जा रहा है। आरोप है कि शैक्षणिक सत्र 2020 -21 के लिये पुस्तकों की खरीद हेतु 10 मार्च 2021 को विज्ञापन जारी किया गया और पुस्तकें जमा करवाने के लिये दस दिन का समय दिया जबकि भण्डार क्रय नियमों के अनुसार बीस लाख से अधिक की खरीद के लिये कम से कम 21 से 30 दिन का समय दिया जाता है। समग्र शिक्षा अभियान के तहत इस विज्ञापन में पहले प्रकाशकों से टेक्निकल बिड के तहत दस्तावेज मांगे जाते हैं इनकी जांच परीक्षण के बाद ही प्रकाशकों की संस्थाओं की किताबों को चयन समिति के समक्ष रखा जाता है। समग्र शिक्षा अभियान के तहत पुस्तकों की खरीद ;डिस्ट्रीब्यूटरद्ध वितरक के माध्यम से नहीं की जा सकती। इस आशय के निर्देश मानव संसाधन मन्त्रालय द्वारा जारी किये गये हैं। इसमें एनसीई आरटीएनवीटी पब्लिकेशन डिविजन आदि से सीधे खरीद का प्रावधान है न कि डिस्ट्रब्यूटर के माध्यम से, क्योंकि सरकारी प्रकाशन अपना अधिकतम डिस्काउंट विभाग को देते हैं। प्रकाशक संघ के मुताबिक 2019-20 में सरकारी प्रकाशनों की किताबें डिस्ट्रीब्यूटरों के माध्यम से लेने पर हिमाचल को करीब एक करोड़ का नुकसान हुआ है। अब 2020-21 के लिये भी 2019-20 को ही आधार बनाकर खरीद करने का प्रयास किया जा रहा है और 10% का डिस्काउंट मांगा गया है। जबकि राजा राम मोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान द्वारा तय डिस्काउंट ही पूरे देश में लिया जाता है जो इस तरह है- 1 से 10 प्रतियों पर 10%, 11 से 25 प्रतियों पर 15%, 25 से अधिक 100 प्रतियों तक 20%, 100 से अधिक 300 प्रतियों तक 30% और 300 से अधिक प्रतियों का क्रय करने पर 35% छूट निधार्रित है। हिमाचल प्रदेश सरकार का उच्च शिक्षा विभाग भी पुस्तकों को क्रय इसी प्रक्रिया के अनुसार करता है।
इस तरह समग्र शिक्षा अभियान के तहत खरीदी जा रही पुस्तकों पर न तो भारत सरकार द्वारा जारी गाईडलाईन एवम् नियमों पालन किया जा रहा है और न ही राजा राम मोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान द्वारा तय डिस्काउंट लिया जा रहा है यह आरोप है प्रकाशक संघ का। प्रकाशक संघ ने 4-8-2021 को मुख्यमन्त्री को सौंपे पत्र में कहा है कि वह 23-5-21, 5-6-21 और 22-6-21 को पत्र लिखकर परियोजना निदेशक से लेकर मुख्यमन्त्री कार्यालय तक सभी संवद्ध अधिकारियों के संज्ञान में इस मामले को ला चुके हैं परन्तु किसी ने भी न तो उनके पत्रों का कोई उत्तर दिया और न ही उन्हें मिलने का समय दिया। आरोप यह भी है कि जिन 49 प्रकाशक फर्मों को पहले चरण में शार्टलिस्ट किया गया है उनमें से 33 फर्मे केवल 8 पतो पर ही दर्ज है। इससे इनके अलग- अलग होने पर सन्देह खड़ा हो जाता है। इससे यह लगता है कि आठ लोगों ने ही नाम बदल कर 33 फर्में खड़ी कर ली हैं।
यह भी आरोप है कि पुस्तकों का चयन करने के लिये एक बारह सदस्यों की कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी ने 22 मार्च 21 से लेकर 3 अप्रैल 21 तक 400 प्रकाशक फर्मो की विभिन्न कैटेगरी की पुस्तकों का चयन करके इसकी वाकायदा हस्ताक्षरित सूची परियोजना निदेशक को सौंपी थी। लेकिन बाद में इस चयन कमेटी की सूची को नजरअन्दाज करके 49 फर्मो का चयन कर लिया गया। इस चयन का आधार क्या रहा यह कहीं भी स्पष्ट नहीं किया गया है। इस तरह खरीद की हर प्रक्रिया पर तय नियमों को नज़रअन्दज करने का आरोप लगा है। इन आरोपों पर जब समग्र शिक्षा अभियान परियोजना निदेशक के कार्यालय में उनका पक्ष जानने के लिये संपर्क किया गया तो निदेशक नहीं मिले और अन्य कर्मचारियों ने सिर्फ इतना कहा कि जो कुछ भी हुआ है सब नियमानुसार हुआ है और इसकी कोई भी अन्य जानकारी देने से इन्कार कर दिया। सचिव शिक्षा भी अपने कार्यालय में उपलब्ध नही थे। प्रकाशक संघ ने मई से इस संबंध में विभाग से पत्राचार आरम्भ कर दिया था। मुख्यमन्त्री और सचिव कार्यालय को पत्र भेज कर यह आरोप लगाये हैं। उसके बाद अब विधानसभा सत्र के दौरान शिमला में एक पत्रकार वार्ता आयोजित करके यह आरोप लगाये हैं और उसके बाद विधानसभा का घेराव करके मुख्यमन्त्री को पत्र सौंपा है। रोचक है कि अब तक न तो प्रकाशक संघ के आरोपों पर ही कोई कारवाई की गयी है और न ही संघ के खिलाफ।

ममता ने जांच आयोग गठित करके चला मास्टर स्ट्रोक-मोदी के विकल्प हुए सीमित

यदि मोदी सरकार की नीयत साफ है तो फिर जांच क्यों नही करवा रही
जब फोन हैक हो जायेगा तो क्या हैकर उसका आपराधिक उपयोग नहीं करेगा
जब आपकी निजता ही नही बचेगी तो आप सुरक्षित कैसे रह पाओगे
क्या ऐसी संभावनाओं से समाज को बचाना सरकार की जिम्मेदारी नही है
यदि किसी आतंकी संगठन के हाथ यह स्वाईवयेर लग जाये तो कौन सुरक्षित बचेगा
क्या ऐसे परमाणु हथियार सुरक्षित रह पायेंगे
शिमला/शैल। जिस पैगासस जासूसी प्रकरण पर विप़क्ष की मांग के बावजूद सरकार जांच करवाने को तैयार नहीं हो रही है और हर रोज़ संसद में यह मामला उठ रहा है उसी प्रकरण पर ममता बैनर्जी ने जांच आयोग अधिनियम 1952 के प्रावधानों के तहत सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधीश मदन बी लोकूर की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन करके मोदी सरकार के हाथ से सारा मामला छीन लिया है। जांच अधिनियम की धारा तीन के तहत गठित इस आयोग को केन्द्र सरकार तभी निष्प्रभावी कर सकती है यदि वह इससे बड़ा आयोग गठित करती है। अधिनियम की धारा चार के इस आयोग को सिविल कोर्ट के अधिकार हालिस रहेंगे। आयोग किसी भी अधिकारी को बुलाने और कोई भी दस्तावेज तलब करने का हक रखता है। इस प्रकरण की जांच की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिकाएं आ चुकी हैं और शीर्ष अदालत ने इन्हे सुनवाई के लिये स्वीकार भी कर लिया है। माना जा रहा है कि जब सरकार संसद में विपक्ष की बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं तब इससे बेहत्तर और कोई उपाय रह नहीं जाता था। सरकार इस मुद्दे को कोई गंभीर मुद्दा ही नहीं मान रही है जबकि इस जासूसी स्पाईवेयर से न केवल आम आदमी की निजता पर डाका डाला गया है बल्कि इससे देश की सुरक्षा को भी गंभीर खतरा हो जाता है। क्योंकि यह स्पाईवेयर एक विदेशी कंपनी द्वारा बनाया गया है और उसने स्पष्ट कहा है कि स्पाईवयेर वह केवल सरकारों को ही बचेती है। भारत में इसके माध्मय से कई लोगों की जासूसी हुई है। इसका शिकर कई पत्रकार बुद्धिजीवी, उद्योगपति, ज्ज और राजनेता हुए हैं। मोदी सरकार के अपने ही दो मन्त्रीयों की जासूसी हुई है। इस सब पर सरकार केवल इतना कह रही है कि जासूसी में वह शामिल नहीं है। लेकिन जासूसी होने से इन्कार नही कर रही है। विप़क्ष इस परिदृश्य में सरकार से सीधा सवाल पूछ रहा है कि क्या उसने यह स्पाईवेयर खरीदा है या नही। सरकार इसका हां या न में जबाव देने से भाग रही है और इसी से सरकार की नीयत और नीति दोनो ही सन्देह के घेरे मे आ जाते हैं।
क्यों जरूरी है यह जांच
सरकार इसे गंभीर विषय न मानकर विपक्ष पर संसद न चलने देने का आरोप लगा रही है। सरकार जनता को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि इस जासूसी प्रकरण से भी ज्यादा गंभीर कई मुद्दे हैं जिन पर संसद में बहस होनी चाहिये। सरकार के कई अन्ध भक्त भी इसे गंभीर विषय नही मान रहे हैं तो आपको ऐसी जासूसी होने से डरने की आवश्यकता क्यों होनी चाहिये। इसलिये यह समझना आवश्यक हो जाता है कि इस प्रकरण की जांच होना जरूरी है और आम आदमी इससे कहां प्रभावित होता है। सबसे पहले तो बड़ा खतरा यह है कि इससे व्यक्ति की निजता प्रभावित होती है। यह निजता कितनी महत्वपूर्ण है इसका इसी सूत्रा से चल जाता है कि जिसमें कहा गया है कि ‘‘ भोजन, भजन, वस्त्र और नारी यह सब परदे के अधिकारी’’ इस निजता की रक्षा के लिये घरों के दरवाजे खिड़कीयों को बन्द रखने के लिये ‘‘कुण्डी’’ लगाई जाती है परदे लगाये जाते है ताकि दूसरा कोई गैर तांक झांक कर सके। दूसरा खतरा है कि इस जासूसी में आपका फोन हैक कर लिया जाता है और हैकर उसे अपने मकसद के साथ आप्रेट करता है। हर रोज़ फोन हैक होने और आपके परिचितों से आपके नाम पर पैसे मांगने के किससे सामने आ रहे है। हैकर बैंक खातों में सेन्ध लगा रहे हैं इस आशय की साईबर क्राईम में हर रोज़ दर्जनों शिकायतें आ रही हैं। इस हैंकिग से बैंको में हजारों करोड़ के फ्रा्रड हो चुका है।
मोदी सरकार में वैचारिक असहमति हो देशद्रोह करार देने का चलन शुरू हो चुका है। सैंकड़ों मामले देशद्रोह के बनाये जा चुके हैं। सजा केवल छः मामलों में ही हुई है। भाजपा शासित हर राज्य में ऐसे मामले बने हैं। भीमा कोरे गांव प्रकरण में तो यहां तक सामने आ चुका है कि रोमा विलसन आदि के कम्यूटरों को हैक करके उनमें आपति जनक सामग्री डाली गयी। इस स्पाईवेयर के माध्यम से किसी के भी फोन में कभी भी कुछ भी आपतिजनक डालकर किसी को भी फ्रेम किया जा सकता है। क्योंकि फोन तो हैकर आप्रेट कर रहा है। इसी प्रकरण में यह सामने आ चुका है कि जब राफेल मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय मे चल रही थी तब मुख्य न्यायधीश गागोई के खिलाफ आरोप लगाने वाली महिला और उसके परिजनों के फोन हैक हो चुके थे। आज इसी कारण से राफेल फैसले को जनता सन्देह से देख रही है। आज यह स्पाईवेयर अपने राजनीतिक विरोधीयों के खिलाफ सरकार का बड़ा हथियार माना जा रहा है। आज यदि मोदी सरकार ऐसा कर रही है तो कल सरकार बदलने पर दूसरी सरकार भी ऐसा ही करेगी। आज यदि केन्द्र सरकार इसे खरीद रही है तो क्या कल राज्य सरकारें ऐसी ही खरीद का प्रयास नहीं करेंगी। क्या आतंकी संगठन इसे लेने का प्रयास नहीं करेंगे। जब ईज़रायल और फ्रांस यह जांच करवा रहे हैं तब भारत सरकार का इस जांच से इन्कार करना कई कड़े सवालों को जन्म देता है। ऐसे में ममता द्वारा यह जांच बैठाने के निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिये। क्योंकि जब यह जांच आगे बढ़ेगी तो मोदी सरकार के पास और बड़ी जांच बैठाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहेगा।

यह हैं जांच अधिनियम के प्रावधान

3. Appointment of Commission.—(1) The appropriate Government may, if it is of opinion that it is necessary so to do, and shall, if a resolution in this behalf is passed by 2 [each House of Parliament or, as the case may be, the Legislature of the State], by notification in the Official Gazette, appoint a Commission of Inquiry for the purpose of making an inquiry into any definite matter of public importance and performing such functions and within such time as may be specified in the notification, and the Commission so appointed shall make the inquiry and perform the functions accordingly. Provided that where any such Commission has been appointed to inquire into any matter—
(a) by the Central Government, no State Government shall, except with the approval of the Central Government, appoint another Commission to inquire into the same matter for so long as the Commission appointed by the Central Government is functioning;
(b) by a State Government, the Central Government shall not appoint another Commission to inquire into the same matter for so long as the Commission appointed by the State Government is functioning, unless the Central Government is of opinion that the scope of the inquiry should be extended to two or more States.
(2) The Commission may consist of one or more members appointed by the appropriate Government, and where the Commission consists of more than one member, one of them may be appointed as the Chairman thereof.
[(3) The appropriate Government may, at any stage of an inquiry by the Commission fill any vacancy which may have arisen in the office of a member of the Commission (whether consisting of one or more than one member).
(4) The appropriate Government shall cause to be laid before 2 [each House of Parliament or, as the case may be, the Legislature of the State], the report, if any, of the Commission on the inquiry made by the Commission under sub-section (1) together with a memorandum of the action taken thereon, within a period of six months of the submission of the report by the Commission to the appropriate Government.]
4. Powers of Commission.—The Commission shall have the powers of a civil court, while trying a suit under the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908), in respect of the following matters,\ namely:—
(a)5 [summoning and enforcing the attendance of any person from any part of India] and examining him on oath;
(b) requiring the discovery and production of any document;
(c) receiving evidence on affidavits;
(d) requisitioning any public record or copy thereof from any court or office;
(e) issuing commissions for the examination of witnesses or documents;
(f) any other matter which may be prescribed.


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