घातक होगी चुनावों में उभरी बगावत
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Created on Wednesday, 31 March 2021 08:37
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। प्रदेश की चार नगर निगमों के चुनाव होने जा रहे हैं। सात अप्रैल को मतदान होगा। चुनाव लड़ रहे प्रत्याशीयों की नामांकन वापसी के बाद अन्तिम सूचियां जारी हो गयी हैं। यह चुनाव पार्टीयों के अधिकृत चुनाव चिन्हों पर करवाये जा रहे हैं। नगर निगमों के इन चुनावों के बाद कांगड़ा के फत्तेहपुर की विधानसभा सीट और मण्डी की लोकसभा सीट के लिये उपचुनाव होने हैं। अगले वर्ष के अन्त में विधानसभा के लिये चुनाव होंगे। इस नाते नगर निगमों के इन चुनावों को प्रदेश के राजनीतिक भविष्य की दशा-दिशा के संकेतक के रूप में देखा जा रहा है। इस गणित के आईने में अगर आकलन किया जाये तो सबसे बड़ा खुलासा यह सामने आता है कि अब भाजपा में भी बगावत खुलकर सामने आने लग गयी है। भाजपा को एक समय अनुशासित पार्टी माना जाता था। यह कहा जाता था कि इसका चाल चरित्र और चेहरा देश की अन्य पार्टीयों से भिन्न है लेकिन नगर निगमों के इन चुनावों में यह भ्रम टूट गया है क्योंकि पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ बगावत करते हुए वह कार्यकर्ता और स्थानीय नेता निर्दलीयों के रूप में चुनाव लड़ने जा रहे हैं जो लम्बे अरसे से पूरे समर्पण के साथ पार्टी के लिये काम कर रहे थे। पार्टी अध्यक्ष सुरेश कश्यप और मुख्यमन्त्री जयराम के निर्देश भी इन लोगों को चुनाव मैदान से नहीं हटा पाये हैं।
सारे प्रयासों के बाद भी जब यह लोग चुनाव से नहीं हटे हैं तब ऐसे 24 लोगों को तुरन्त प्रभाव से पार्टी की सदस्यता और दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है। निष्कासित किये गये लोगों में मण्डल, जिला और प्रदेश स्तर तक की जिम्मेदारीयां कुछ लोगों के पास थी। निष्कासित 24 लोगों में से 14 कांगड़ा, 6 मण्डी और चार पालमपुर से हैं। कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और इस जिले में ही ढ़ेड दर्जन लोगों का निकाला जाना कोई शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है। कांगड़ा में पार्टी के अन्दर सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा है इसके संकेत सबसे पहले इन्दु गोस्वामी के पत्र, फिर रेमश धवाला -पवन राणा द्वन्द, शान्ता के नाम खुले पत्र प्रकरण का अन्त रविन्द्र रवि के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने और उसके बाद मन्त्री सरवीण चौधरी के खिलाफ लगे आरोपों के रूप में अरसे से सामने आते रहे हैं। यहां तक की पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की धर्मशाला में हुई दो दिवसीय बैठक में खुलकर सामने आ गये थे। लेकिन इस सबका संज्ञान लेकर इसे सुलझाने के प्रयास नहीं किये गये। क्योंकि पार्टी से ज्यादा व्यक्ति को अहमियत दी जाने लगी। कार्यकर्ताओं में यह संदेश चला गया कि नेता के प्रति वफादारी निभाने से ज्यादा लाभ मिल सकता है।
मण्डी तो मुख्यमन्त्री का अपना गृह जिला है और मुख्यमन्त्री ने यहां बागियों को मनाने का प्रयास भी किया है लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। अन्ततः आधा दर्जन बागियों को निष्कासित कर दिया गया है। यहां पर यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर मुख्यमन्त्री की भी यहां क्यों नहीं सुनी गयी। मण्डी में यह आम चर्चा है कि मुख्यमन्त्री अपने कुछ पुराने साथियों के दायरे से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। मण्डी में दवाईयों की खरीद में बड़े स्तर पर घपला हुआ है यह कैग रिपोर्ट में दर्ज है। लेकिन इस घपले को लेकर कोई कारवाई नहीं की गयी है। इससे यह संदेश गया है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई करने की बजाये उसे संरक्षण दे रही है। मण्डी में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों मुख्यमन्त्री के क्षेत्र से वाम दलों के उम्मीदवार का जीतना और महेन्द्र सिंह के क्षेत्र में उन्हीं के खिलाफ ‘‘गो बैक’’ के नारे लगना भी मण्डी के नये राजनीतिक समीकरणों की ओर एक बड़ा संकेत रहा है। क्योंकि विधानसभा चुनावों में पंडित सुख राम के परिवार का पूरा सक्रिय सहयोग भाजपा और जयराम के साथ था। अनिल शर्मा बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर मन्त्री बने थे। लेकिन आज केवल रिकार्ड में अनिल शर्मा भाजपा में है व्यवहार में नहीं। भाजपा चाह कर भी अनिल शर्मा को अभी तक पार्टी से निकाल नहीं पायी है क्योंकि ऐसी कारवाई से अनिल की सदस्यता पर कोई आंच नहीं आती है। ऐसे में व्यवहारिक दृष्टि से अनिल शर्मा का सहयोग नहीं वरन उनका विरोध ही भाजपा को मिल रहा है। मण्डी में सुखराम परिवार के राजनीतिक प्रभाव को कम आकना सही नहीं होगा। इस तरह कुल मिलाकर जो तस्वीर उभर रही है उसमें यह बगावत भाजपा के लिये घातक हो सकती है। फिर निगम चुनावों में पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल भी सक्रिय भूमिका में नजर नहीं आ रहे हैं।
2018 के शिकायत पत्र पर केन्द्रिय ऐजैन्सीयों की अब सक्रियता चर्चाओं में
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Created on Wednesday, 31 March 2021 07:31
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। सेवानिवृत अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक सानन ने मई 2018 में प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर यह शिकायत की थी कि वीरभद्र सरकार के कार्यकाल में 2013 से 2017 के बीच राजस्व के कई मामलों में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। इन मामलों में तत्कालीन मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह, मुख्य सचिव बी एस फारखा और अतिरिक्त मुख्य सचिव तरूण श्रीधर के खिलाफ कारवाई करने की मांग की गयी थी। पत्र में यह भी कहा गया था कि यदि सरकार कारवाई नहीं करती है तो वह विवश होकर अदालत जाने को मजबूर हो जायेंगे। लेकिन पत्र आने के बाद तीन वर्ष बीत गये हैं और इस दौरान न तो जयराम सरकार की ओर से इसमें कोई कारवाई की गयी है न सामने आयी है तो न ही दीपक सानन अदालत गये हैं। जबकि सानन ने यह पत्र लिखने के बाद इस पर एक प्रैस वार्ता भी करी थी। सानन ने अपने पत्र में तीन मामलों का विशेष उल्लेख किया है। यह तीन मामलें हैं कोरिन होटल बडा़ेग, तेनजिन अस्पताल शिमला और डलहौजी़ के कुछ लीज़ मामले। यह सारे मामले अपने में बहुत गंभीर हैं पूरी सरकार के चरित्र पर सवाल खड़े करते हैं। जयराम सरकार ने इन मामलों पर कोई कारवाई नहीं की है। लेकिन इसी दौरान दीपक सानन और अभय शुक्ला के खिलाफ आये टीडी लेने के मामलें में भी जयराम सरकार ने कोई कारवाई अभी तक नहीं की है। जबकि वन विभाग और वन मन्त्री तक इसमें आपराधिक मामला दर्ज करने की अनुशंसा कर चुके हैं। यह फाईल शायद अभी तक मुख्यमन्त्री कार्यालय के ही किसी कोने में दबी पड़ी है।
इस परिदृश्य में दीपक सानन द्वारा की गयी शिकायत पर इन दिनों केन्द्र सरकार की ऐजेन्सीयों द्वारा सक्रिय हो जाना प्रशासनिक और राजनीतिक हल्कों में चर्चा का केन्द्र बन गया है। क्योंकि सूत्रों के मुताबिक इन ऐजैन्सीयों ने इस शिकायत पत्र को खोजने में कई अखबारों के दफ्तरों में भी दस्तक दी है। सानन ने यह पत्र केन्द्र की किसी ऐजैन्सी को नहीं भेजा है केन्द्र की ऐजैन्सीयों के अधिकार क्षेत्र में भी यह मामला नहीं आता है। प्रदेश सरकार ने इस पर अब तक कोई कारवाई की नहीं है इस नाते स्वभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या किसी ने केन्द्र में यह शिकायत की है कि जयराम सरकार बहुत सारे गंभीर मामलों को दबाने का काम कर रही है। या केन्द्र हिमाचल की राजनीति के परिदृश्य में कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे को फिर से घेरने का प्रयास कर रहा है। क्योंकि पिछले सभी चुनावों में हिमाचल में वीरभद्र के मामलों को कांग्रेस के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। जबकि इन मामलों की गंभीरता का इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इनमें अभी तक कोई फैसला नहीं आ पाया है। भाजपा का ऐसे मामलों को लेकर आज तक यही चलन रहा है कि मामलों की तलवार आदमी पर लटकाये रखे। इस दृष्टि से केन्द्रिय ऐजैन्सी द्वारा सानन के पत्र पर अब सक्रियता दिखाने को हल्के से नहीं लिया जा सकता। सानन द्वारा उठाये गये मामलों पर शायद मन्त्री परिषद की मोहर लगी हुई है। लेकिन इनमें बहुत सारे बिन्दु ऐसे भी हैं जहां मन्त्रीपरिषद भी सीमाओं में बन्ध जाती है।
जो मामले सानन ने उठाये हैं उनमें सबसे पहला बड़ोग के होटल कोरिन का है। इसके लिये कोरिन ने 1979 /81 में बडोग 1-13 बिघा ज़मीन खरीदने के लिये धारा 118 के तहत अनुमति मांगी थी। अनुमति का यह मामला 1990 तक पत्राचार में रहा। इसी दौरान इस ज़मीन पर कोरिन ने होटल का निर्माण कर लिया। निर्माण धारा 118 की अनुमति के बिना था। इस कारण डीसी सोलन ने इसके खिलाफ कारवाई शुरू कर दी। यह मामला सब जज की अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा है और सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। लेकिन राज्य सरकार ने इस सबको नज़रअन्दाज करते हुए 10-8-2007 को मन्त्रीपरिषद ने दो लाख का जुर्माना लगाकर मामला निपटा दिया। 10-8-2007 के इस फैसलें को 2-12-2011 को मन्त्री परिषद ने फिर बदल दिया। इस मामले में अधिकारियों और मन्त्री परिषद सभी के खिलाफ कावारई करने की मांग की है।
इसी तरह दूसरा मामला तेनजिन अस्पताल का उठाया गया है इसमें कंपनी कार्यालय और आवासीय कालोनी बनाने के लिये धारा 118 की अनुमति लेकर इस पर प्राइवेट अस्पताल का निर्माण कर लिया गया है। इस पर जिलाधीश ने इस संपति को सरकार में विलीन करने के आदेश 16-1-2012 को पारित कर दिये थे। लेकिन इन आदेशों को बाद में बदल दिया गया। तीसरा मामला डलहौज़ी में 17-7-2017 को स्टांप डयूटी 3% करके नियमित करने का उठाया गया है। यह मामले अगर आज भी अदालत तक पहुंच जाते हैं तो इसमें कड़े फैसल आने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। इस दृष्टि से इन पर केन्द्रित ऐजैन्सीयों की सक्रियता को लेकर चर्चाओं का दौर चल निकला है।
जोशीमठ त्रासदीः प्रकृति की मार, कौन है जिम्मेदार?
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Created on Thursday, 11 February 2021 09:47
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Written by Shail Samachar
-डा. राकेश कपूर-
शिमला/शैल। ऋषिगंगा अपेक्षाकृत छोटी नदी है जो रैणी में धौलीगंगा में मिल जाती है। धौलीगंगा विष्णुप्रयाग में अलकनंदा में मिल जाती है। लेकिन इस छोटी ऋषिगंगा में उठे जलजले के निशान रैली से लेकर तपोवन तक घटना के एक दिन बाद भी देखे जा सकते हैं। पूरी अलकनंदा की धारा में जो कलुषिता दिखाई दे रही है, वह भी घटना की भयावहता को बयान कर रही है।
घटना के दूसरे दिन ऋषिगंगा और धौलीगंगा में पानी बेहद कम है। इतना कम कि यदि सिर्फ नदी में पानी की धार को देखें, उसमें मलबे के कालेपन को दिमाग से उतार दें तो अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि यही पानी है, जिसने एक जलविद्युत परियोजना का नामोनिशान मिटा दिया, एक निर्माणाधीन परियोजना को उजड़ी हुई अवस्था में तब्दील कर दिया, पुलों को बहा दिया, एक बड़े इलाके के लोगों का शेष भारत से संपर्क ही काट दिया और इन सबसे भी अधिक त्रासद, सरकारी आंकड़े में बहुत रोक कर भी जो संख्या 200 हो गयी है, इतने लोगों के प्राण हर लिए। तपोवन में निर्माणाधीन 530 मेगावाट की तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना की सुरंग में भरा हुए मलबा भी, अब मामूली धार में बह रहे पानी की घटना के वक्त के रौद्र रूप की हृदयविदारक गवाही दे रहा है। यह सुरंग नदी तल से काफी ऊपर है। नदी के पानी के साथ आया मलबा लगभग पूरा मोड़ काट कर इस सुरंग के अंदर घुसा है और लगभग 500 मीटर लंबी इस सुरंग को पूरी तरह मलबे ने पाट दिया। इस सुरंग के भीतर लगभग 50 मजदूर काम कर रहे थे, जब मलबे ने सुरंग को पूरी तरह भर दिया। 500 मीटर लंबी सुरंग में दूसरे दिन तक केवल 100 मीटर ही मलबा साफ किया जा सका। 24 घंटे से अधिक समय तक (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वह अवधि 48 घंटे होने को है) उस मलबे के लंबे-चौड़े ढेर के बीच फंसे हुए मजदूरों की क्या हालत हुई होगी या हो रही होगी, यह सोचना ही आपको सिहरन या अवसाद से भर देता है। सुरंग की सफाई में लगे एनडीआरएफ, आईटीबीपी आदि के सुरक्षा कर्मियों को टकटकी लगा कर लोग देख रहे हैं। जिनको अपने के साथ अनहोनी की सूचना मिल चुकी, उनमें से एक को सड़क पर ही बिलखते हुए देखना दुख और असहाय होने का भाव पैदा करता है। एक छोटी नदी के मामूली दिखने वाली पानी की धार ने ऐसा भयावह मंजर कैसे पैदा किया? नदी है तो उसमें पानी घटेगा-बढ़ेगा, लेकिन उसका वेग इतना मारक कैसे हुआ? क्या नदी तटों से कई फीट ऊपर तक बिखरे हुए मलबे के लिए सिर्फ नदी के पानी और उसके उफान को जिम्मेदार ठहरा कर इतिश्री कर ली जानी चाहिए? तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना की बैराज साइट पर जहां मजदूर सुरंग मलबे के ढेर में दबे हैं, वहां जगह-जगह सुरक्षा को लेकर बोर्ड लगे हुए हैं। लेकिन सुरक्षा का कोई इंतजाम या पूर्व चेतावनी का कोई तंत्र (अर्लि वार्निंग सिस्टम) अस्तित्व में रहा हो, ऐसे कोई चिन्ह नजर नहीं आते। सुरक्षा संबंधी बोर्डों की इफरात है पर बोर्ड न सुरक्षा कर सकते हैं और न खतरे की चेतावनी दे सकते हैं! उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का ट्वीट है, जिसमें उन्होंने कल अपने जोशीमठ प्रवास की बात के साथ ‘हादसे को विकास के खिलाफ प्रोपेगैंडा का कारण’ न बनाने की अपील की है। तबाही का मंजर देखने की बाद और मलबे में दफन मजदूरों की सुरंग के मुहाने पर खड़े हो कर भी अगर चिंता परियोजना की ही हो रही है तो समझा जा सकता है कि पक्षधरता किस ओर है!
विकास की कैसी मार है, वह जोशीमठ क्षेत्र में प्रस्तावित और बन रही परियोजना की एक संक्षिप्त सूची से समझिए। मलारी-जेलम, जेलम- तमक, मरकुड़ा-लाता, लाता-तपोवन, तपोवन-विष्णुगाड़, विष्णुगाड़- पीपलकोटी आदि। यानि जिस विकास के खिलाफ प्रोपेगैंडा न करने की बात मुख्यमंत्री कह रहे हैं, वह विकास हो जाये तो यहां हर कदम पर जलविद्युत परियोजना होगी। एक परियोजना का पावर हाउस जहां है, वहां दूसरी परियोजना की बैराज साइट शुरू हो रही है। जिस परियोजना की साइट में मजदूरों के फंसे होने के चलते मुख्यमंत्री ने जोशीमठ में रात्रि प्रवास किया, उस तपोवन विष्णुगाड़ परियोजना का एक किस्सा सुनिए और विकास की इस मार को समझिए। 2003-04 से इस परियोजना के खिलाफ जोशीमठ में भाकपा (माले) के राज्य कमेटी सदस्य काॅमरेड अतुल सती के साथ आंदोलन में काफी अरसे तक शामिल रहने के चलते, इस परियोजना के संदर्भ में बहुत सारी जानकारी है, जिसे मैं क्रमबद्ध तरीके से साझा करूंगा। लेकिन फिलहाल यह शुरुआती किस्से देखिये। एनटीपीसी द्वारा बनाई जा रही तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना की डीपीआर में उल्लेख था कि भूगर्भ वैज्ञानिकों ने सलाह दी कि जिस स्थल पर बैराज प्रस्तावित है (जिसके अब ध्वंसावशेष खड़े हैं), उसे वहाँ नहीं बनाया जाना चाहिए क्यूंकि वहां (जहां सुरंग बनेगी) गर्म पानी के सोते (हाट वाटर स्प्रिंग्स) होने की संभावना है। फिर डीपीआर में पूरी गणित के साथ समझाया गया था कि उस स्थान पर बैराज न बनाने से कितना आर्थिक नुकसान होगा, लिहाजा कंपनी बैराज वहीं बनाएगी। इससे आप समझ सकते हैं कि वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग करते हुए भी इन परियोजनाओं में वैज्ञानिक राय को मुनाफे के लिए किनारे धकेलने की प्रबल प्रवृत्ति है। विकास सबको चाहिए, बिजली भी चाहिए पर सवाल है-किस कीमत पर? विज्ञान से हासिल क्षमताओं का अवैज्ञानिक उपयोग करके आक्रांता की तरह प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाएगा तो प्रकृति की मार तो झेलनी ही पड़ेगी। उस मार से गाफिल ‘विकास’ का जाप करना उन्हीं के लिए आसान है, जो जानते हैं कि प्रकृति जब पलटवार कर रही है तो उस घातक प्रहार से वे कोसों दूर अपनी सुरक्षित खोहों में हैं।