Thursday, 04 June 2026
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वित्त विभाग ने सरकार के खर्चों पर चलाई कैंची बजट का 20% से अधिक नही खर्च कर पायेंगे विभाग

 स्थिति न सुधरी तो वेतन, पैन्शन के भुगतान में भी हो सकता है संकट

शिमला/शैल। कोरोना के चलते केन्द्र सरकार ने वित्तिय वर्ष 2020-21 के लिये पारित बजट में योजनाएं/ कार्यक्रम इस वर्ष के लिये घोषित किये थे उन्हे अब 31 मार्च  2020 तक के लिये स्थगित कर दिया गया है। केन्द्र सरकार की ही तर्ज पर हिमाचल सहित कई अन्य राज्यों ने भी ऐसा ही फैसला लेते हुए इस वित्तिय वर्ष के लिये घोषित सारे नये कार्यक्रमों को स्थगित करने के प्रस्ताव अपने- अपने मन्त्रिमण्डलों की बैठक में लिये हैं। ऐसा इसलिये किया गया है क्योंकि देशभर में सारी आर्थिक गतिविधियों पर कोरोना के कारण विराम लगा हुआ है। अब अनलाॅक शुरू होने के बाद आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू हो गयी हैं। लेकिन अभी इन गतिविधियों को फिर से शुरू हो जाने के बाद इनमें व्यवहारिक रूप से पहले के मुकाबले 20% भी काम नही हो पाया है। यह पूरा काम शुरू न हो पाने के कारण  सरकार के राजस्व ग्रहण में भी भारी कमी आयी है। बल्कि इस कमी के कारण यह आशंका खड़ी हो गयी है कि क्या सरकार आने वाले दिनों में अपने कर्मचारियों को वेतन और पैन्शन का भी भुगतान कर पायेगी। प्रदेश की इस वित्तिय स्थिति को लेकर प्रदेश का वित्त विभाग मन्त्रीमण्डल की बैठक में सरकार को अवगत भी करवा चुका है। सचिवों और विभागाध्यक्षों को पत्र भी लिख दिया है इस पत्र के मुताबिक वेतन, पैंशन, मजदूरी आदि को छोड़कर अन्य मद्दों पर 20% से अधिक खर्च न किया जाये।
इस स्थिति को समझने के लिये वित्तिय वर्ष 2020-21 के लिये विधानसभा द्वारा पारित किये गये बजट के आंकड़ो पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। जयराम सरकार ने वर्ष 2020-21 के लिये कुल 49130.84 करोड़ का बजट पारित कर रखा है। इसके मुताबिक सरकार इस वर्ष इतना खर्च  करेगी जो कि करीब 4095 करोड़ प्रति माह बैठता है। इतने खर्च के लिये इसी वित्तिय वर्ष में 48446.86 करोड़ की आय का अनुमान भी पारित है। इसके अनुसार प्रति माह 4037 करोड़ की आय होगी। बजट आंकड़ो के मुताबिक इस वर्ष वेतन पर 13099.47 करोड़ खर्च होगा जो कि कुल बजट का 26.66% होता है। पैन्शन पर 7266 करोड़ खर्च हांेगे जो कि बजट का 14.79% होता है। ब्याज पर 4931.92 करोड़ खर्च होंगे और कुल का 10.4% है। इस तरह वेतन, पैन्शन और ब्याज पर ही कुल बजट का 51.49% खर्च होगा। यह खर्चे तब थे जब कोरोना को लेकर सरकार यह आकलन ही नही कर पायी थी कि आने वाले दिनों में सारी गतिविधियों पर विराम लग जायेगा और इसके कारण आय के सारे अनुमान धराशायी हो जायेंगे।
 इन आंकड़ो के मुताबिक पैन्शन और वेतन का खर्च ही 1700 करोड़ प्रतिमाह रहता है। लेकिन इस समय सरकार को केवल 400 करोड़ का राजस्व ही प्रतिमाह मिल रहा है। इसके अतिरिक्त केन्द्र से सरकार को आरडीजी मिलता है। इस राजस्व घाटे की प्रति पूर्ति के नाम पर अभी तक 952 करोड़ ही केन्द्र से मिल पाया है। यह किश्त अप्रैल और मई के लिये थी और एडवांस में आ गयी थी। लेकिन जून, जुलाई की किश्त अभी तक नहीं आयी है। केन्द्र से यह ग्रांट नियमित भी मिलती रहे तो यह करीब 450 करोड़ होती है और इस तरह कुल 900 करोड़ के करीब प्रतिमाह आय होगी। जबकि वेतन और पैन्शन का खर्च ही प्रतिमाह 1700 करोड़ है। यह 1700 करोड़ पूरा करने के लिये ही 800 करोड़ का प्रतिमाह कर्ज लेना पड़ेगा। इस कठिन वित्तिय स्थिति के परिदृश्य में वित्त विभाग ने 20% तक ही खर्च को सिमित रखने के निर्देश विभागों को जारी कर दिये हैं।
दूसरी ओर मन्त्रीगण अधिकारियों पर बजट घोषणाओं को पूरा करने के लिये दवाब डाल रहे हैं। मन्त्रीमण्डल की हर बैठक में किसी न किसी विभाग में भर्तीयां किये जाने के फैसले आ रहे हैं। जनता को यही संदेश दिया जा रहा है कि पैसे की कमी नही है।  कोरोना के कारण कफ्र्यू लगने के बाद भी सेवानिवृत अधिकारियों/कर्मचारियों को पुनः नियुक्ति के तोहफे दिये गये हैं। बहुत सारे मुद्दों पर वित्त विभाग की जानकारी के बिना ही मन्त्रीमण्डल में फैसले करवाये जा रहे हैं। ऐसे में अब जब वित्त विभाग ने 20% तक ही खर्च करने के निर्देश जारी कर दिये हैं तो उससे स्पष्ट हो जाता है कि उनके आकलन में निकट भविष्य में स्थिति में सुधार होने की संभावना नहीं है। शराब से जो आय का अनुमान लगाया गया था वह भी अब हवाई सिद्ध होने लगा है क्योंकि शराब की बिक्री पर सरकार के बड़े अधिकारियों की खरीदारी से फर्क नही पड़ता है। यह बाकि मजदूर वर्ग के कारण बढ़ती थी  और मजदूर अब एक चैथाई भी नही रह गया है। वेतन और पैन्शन के खर्च ही 41.45% बनता है। अब जब वेतन आदि को छोड़कर अन्य खर्चों पर 20% की सीमा लगा दी गई है तो तय है कि इस स्थिति में विकास से जुड़ा कोई भी काम नही किया जा सकेगा। क्योंकि वेतन और पैन्शन ही कुल मिलाकर 41.45% हो जाता है। फिर इसके बाद स्थापना, मजदूरी और सहायता अनुदान 18.41% हो जाते हैं यदि इनमें 10.4% ब्याज भी जोड़ दिया जाये तो यह खर्च 28.45% हो जाता है। इस स्थिति में यदि कोविड के लिये कुछ खर्च करना पड़ जाता है तो इन खर्चों में भी कटौती करनी पडे़गी। ऐसे में इस समय जो विभिन्न विभागों में आयेे दिन भर्तियां किये जाने की घोषणायें की जा रही है वह सब हवा हवाई हो जायेंगी और यह सरकार के लिये घातक होगा।

 

  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रधानमन्त्री चीन की कम्पनीयों से पैसा ले रहे हैं और चीन की सेना भारत में घुसपैठ कर रही हैः सिंघवी

 

शिमला/शैल। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गलवां घाटी में चीन सेना द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे को लेकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने जारी एक बयान में कहा है कि इससे पहले कभी भी चीन ने भारतीय सीमा में प्रवेश नही किया था। यह देश के लिए कोई शुभ संकेत नही है।
सिंघवी ने कहा है कि वर्ष 2013 में जब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार थी, उस समय याई जेक्शन पर से उन्हें पीछे खदेड़ा गया था। 2017 में डोकलाम पर चीन के साथ विवाद के चलते प्रधानमंत्री चीन के प्रधानमंत्री के साथ झूला झूल रहे थे।
उन्होंने कहा है कि हर बार मोदी सरकार से चीन के गलवां घाटी, पांगोंग त्सो लेख, हाॅट स्प्रिंग और देपसांग प्लेन्स बारे पूछा गया पर इसकी कोई भी जानकारी देश को नही दी गई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय हित मे इसकी पूरी जानकारी चाहती है, जबकि उन्हें पता है कि चीन के प्रति प्रधानमंत्री का बहुत ही नरम रुख रहा है। उन्होंने कहा है कि यही वह नेता है जो गुजरात के मुख्यमंत्री के समय पांच बार चीन की यात्रा पर गए थे।
सिंघवी ने प्रधानमंत्री से पूछा है कि उन्हें देश को बताना चाहिए कि पीएम केअर फंड में कितना पैसा चीन से आया। उन्होंने कहा है कि कोई नही जानता कि इस फंड में अब तक कितना पैसा आया, किसने कितना दिया और यह कहां खर्च किया जा रहा है, क्योंकि यह आरटीआई के दायरे से बाहर रखा गया है। उन्होंने कहा है कि उनकी सूचना के अनुसार 20 मई तक इसमें 9678 करोड़ इकट्ठा हो गया है। हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री चीन की कंपनियों से पैसा ले रहे हैं और चीन की सेना भारत की सीमा में घुसपैठ कर रही है।
कांग्रेस ने सात बिंदुओं पर प्रधानमंत्री से सवाल किए है कि वह बताए कि उन्होंने चीन के साथ विवाद के चलते फंड क्यों लिया। क्या उन्होंने हावेल से सात करोड़ का फंड नही लिया, जबकि यह कंपनी विवादो में रहते हुए इसका संबंध चीन की लिबरेशन आर्मी से नही रहा है। क्या चीन की टिक टाक कंपनी ने 30 करोड़ का फंड नही दिया है। पेटिम जो 38 प्रतिशत चीन की हिस्सेदारी की है 100 करोड़ का फंड नही दिया है। क्सिओमी चीन की कंपनी ने क्या 15 करोड़ नही दिए है। ओप्पो ने 1 करोड़ नही दिए है। क्या पीएमएनआरएफ का फंड पीएम केअर फंड में ट्रांसफर किया गया और अगर किया गया है तो कितना।
सिंघवी ने कहा है कि जब चीन से प्रधानमंत्री इतना फंड ले रहे हो तो जाहिर है कि वह उनकी सेना का भी विरोध नही कर सकते। उन्होंने कहा है वह देश को अपनी पूरी स्थिति स्पष्ट करें।

 

जब सरकार 12000 करोड़ खर्च ही नहीं कर पायी है तो उसे कर्ज लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी

हर महीने कर्मचारियों से एक-एक दिन का वेतन क्यों लिया
जी पी एफ पर ब्याज दर क्यों घटाई
 विधायक क्षेत्र विकास निधि स्थगित क्यों की
शिमला/शैल। जयराम सरकार ने दावा किया है कि उसके पास बारह हज़ार करोड़ रूपया ऐसा है जिसे सरकार खर्च ही नही कर पायी है। बल्कि जलशक्ति मन्त्री महेन्द्र सिंह ने तो मण्डी में एक पत्रकार वार्ता में यहां तक कहा है कि यह राशी बारह हजार करोड़ से भी ज्यादा हो सकती है। उन्होनें यह भी खुलासा किया है कि ऐसा पैसा जो खर्च ही नही किया गया है वह सबसे ज्यादा लोक निर्माण विभाग और ग्रामीण विकास विभागों के पास है। सरकार का यह स्वीकार एक बहुत बड़ा ब्यान है। इस ब्यान की प्रासंगिकता उस समय और भी बढ़ जाती है जब प्रदेश सरकार को एक मीडिया हाऊस से बेस्ट परफारमर का अवार्ड भी मिल चुका है। इस सरकार को सत्ता में आये अढ़ाई वर्ष हो चुके हैं और तीन बजट पेश कर चुकी है। सरकार ने हर वर्ष कर्ज उठाया है। आज कर्ज के चक्रव्यूह की स्थिति यह है कि इस कर्ज का ब्याज अदा करने के लिये भी कर्ज लेना पड़ रहा है। अब जब कोरोना के कारण प्रदेश में कफ्रर्यू लगाना पड़ा और सारी आर्थिक गतिविधियों पर विराम लग गया तब सरकार को संसाधन जुटाने के लिये हर माह कर्मचारियों से एक-एक दिन का वेतन दान में लेना पड़ा है। विधायकों, मन्त्रीयों के वेतन भत्तों में 30% की कटौती करनी पड़ी है। विधायक क्षेत्र विकास निधि स्थगित करनी पड़ी है। यही नही अब कर्मचारियों के जीपीएफ पर करीब 1% ब्याज दर घटानी पड़ी है।
जयराम सरकार को दो वर्षों में केन्द्र से कुल मिलाकर 38018 करोड़ रूपया मिला है। यह जानकारी इस वर्ष के बजट सत्र में विधायक विक्रमादित्य के एक सवाल के जवाब में आयी है। इस परिप्रेक्ष में सरकार के वित्तिय प्रबन्धन की प्रक्रिया को समझना बहुत आवश्यक हो जाता है। क्योंकि यदि कोई सरकार अपने धन को खर्च ही न कर पाये और उसके बाद भी कर्ज लेती रही तथा कर्मचारियों से भी एक-एक दिन का वेतन ले ले और जीपीएफ पर ब्याज दर घटा दे तो यह सरकार की असफलता और उसमें फैली अराजकता का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है। क्योंकि उसको यह पता भी तीसरा बजट पेश करने के भी तीन माह बाद चल रहा है। सरकार ने यह खुलासा नही किया है कि यह बिना खर्च किया पड़ा पैसा किस काल का है। क्या यह वीरभद्र सरकार के समय से पड़ा हुआ पैसा है या फिर इसी सरकार के समय का है। यह पैसा किसी भी काल का रहा हो अपने में एक बड़ा अपराध है क्योंकि आप पैसा होते हुए भी प्रदेश की जनता पर कर्ज का बोझ डाल रहे थे। फिर इस अपराध के लिये अभी तक किसी को भी दण्डित न किया जाना और भी गंभीर हो जाता है।
सरकार के वित्तिय प्रबन्धन की जिम्मेदारी सरकार के वित्त और योजना विभाग की होती है। इसी जिम्मेदारी के कारण सरकार के हर विभाग को हर कार्य के लिये जहां प्रशासनिक अनुमति की आवश्यकता होती है वहीं पर वित्त विभाग से वित्तिय स्वीकृति लेना भी अनिवार्य होती है। सारे सार्वजनिक उपक्रमों के बोर्डो की बैठकों में भी वित्त विभाग का प्रतिनिधि इसी कारण से उपस्थित रहता है।
इतनी प्रबन्धकीय प्रक्रिया के बाद एजी आफिस की जिम्मेदारी आती है और इसके तहत विभागों में आन्तरिक आडिट और सार्वजनिक उपक्रमों में सीए की तैनाती की व्यवस्था रहती है। अन्त में आडिटर जनरल हर वर्ष सरकार के वित्तिय प्रबन्धन का आडिट करता है। इस आडिट के बाद इसकी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी जाती है और राज्यपाल सुनिश्चित करते हैं कि यह रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर भी चर्चा के लिये रखी जाये। फिर इसके बाद सदन की लोक लेखा समीति कैग रिपोर्ट पर अगली कारवाई सुनिश्चित करती है। यदि कोई पैसा इतनी विस्तृत जांच पड़ताल के बाद भी नज़रअन्दाज रह जाये तो यह एक बड़ा सवाल बन जाता है। क्योंकि जिस तरह से सरकार ने इस पैसे का रहस्य उद्घाटन किया है उससे यही संदेश उभरता है कि इस पैसे की किसी को जानकारी ही नही थी और अचानक सरकार के सामने यह सच प्रकट हुआ है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि जब कैग की रिपोर्ट तैयार होती है तो उसमें यह विभाग दर्ज रहता है कि उसे कितने पैसे का आवंटन हुआ था और क्या उसी आवंटन में उसका काम निपट या उसे और पैसा लेना पड़ा या उसके पास पैसा बच गया जो उसने सरण्डर कर दिया। फिर हर खर्च किये हुए पैसे का उपयोगिता प्रमाणपत्र सौंपना होता है। कैग रिपोर्ट में यह दर्ज रहता है कितने उपयोगिता प्रमाणपत्र विभागों को सौंपना होता है। कैग रिपोर्ट में यह दर्ज रहता है कितने उपयोगिता प्रमाणपत्र विभागों से आ चुके हैं। कितने लंबित है और कितने ऐसे हैं जो ओवरडयू हो चुके हैं। इस तरह कैग में दर्ज सरण्डर रिपोर्ट और उपयोगिता प्रमाणपत्रों की रिपोर्ट से सरकार के वित्तिय प्रबन्धन की सारी तस्वीर सामने आ जाती है। अभी तक कैग की रिपोर्ट 31 मार्च 2018 तक के वित्तिय वर्ष की ही आयी है। जयराम सरकार के कार्यकाल की अभी तक कोई रिपोर्ट नही आयी है। 31 मार्च 2018 तक की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017-18 में 1,92,603.26 लाख के कुल प्रावधान में से 1,53,909.11 लाख सरण्डर किया गया था। इसी तरह कुछ विभागों में वर्ष 2010-11 के उपयोगिता प्रमाणपत्र अभी तक नही आये। वर्ष 2017-18 तक 531740.33 लाख के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित हैं और 27,99,73.86 लाख के आऊटस्टैण्डिंग हो चुके हैं। लेकिन सारे उपयोगिता प्रमाणपत्र और सरण्डर का सारा पैसा जोड़ दिया जाये तो यह बारह हज़ार करोड़ नही होता है।  इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि फिर यह बारह करोड़ रूपया कौन सा है जो आज तक खर्च ही नही हो पाया है। 31 मार्च 2018 तक की कैग रिपोर्ट आ चुकी है और उसके मुताबिक इतना पैसा सरण्डर तथा लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों का नही बनता है। ऐसे में या तो इतने पैसे के फर्जी उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी कर दिये गये हैं और वास्तव में पैसा खर्च ही नही हुआ है। इस स्थिति में यह एक गंभीर अपराध बन जाता है जिसकी जांच होना  आवश्यक हैं या फिर यह पैसा इसी  सरकार के कार्यकाल का है जिसे सरकार खर्च नहीं पायी है। इस सरकार के कार्यकाल की कैग रिपोर्ट अभी तक आयी नहीं है और जब तक ये रिपोर्ट न आ जाये तब तक यह कहना आसान नहीं होगा कि वास्तविक स्थिति क्या है
 वैसे चर्चा है कि सरकार ने सभी विभागों से यह पूछा था कि उन्हे पिछले बीस वर्षों में कितना-कितना पैसा मिला है और उसमें से वह कितना खर्च कर चुके हैं। इसी के साथ यह भी पूछा गया था कि उनका एकाऊंट किस किस बैंक में है और उनमें कितना पैसा है। यह सूचना तैयार करते हुए यह सामने आया कि जिन विभागों के पास दूसरे विभाग का डिपाॅजिट वर्क आता है तब उस काम के लिये आवंटित धन भी साथ ही दे दिया जाता है। लेकिन जब व्यहारिक रूप से काम शुरू किया जाता है तब यह सामने आता है कि उसमें आवश्यक कुछ अनुमतियां अभी तक नही मिल पायी हैं और इस कारण से संबंधित कार्य वहीं पर रूक जाता है और उसके लिये आवंटित धन खर्च नही हो पाता है। संभव है कि यह बारह हजार करोड़ वैसा ही पैसा हो। लेकिन इसमें अब यह सवाल आयेगा कि क्या इस पैसे को कहीं और खर्चा जा सकता है। जिन कार्यो के लिये मूलतःयह पैसा आया था क्या सरकार उन कार्यों का अब बन्द कर पायेगी।

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