Thursday, 04 June 2026
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क्या भाजपा की यह ज्वाला किसी बलि के बिना ही शान्त हो पायेगी

शिमला/शैल।  प्रदेश भाजपा में जो असन्तोष एक अरसे से अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था वह अब सार्वजनिक रूप से बाहर आकर जन चर्चा का मुद्दा बन गया है। जब भी किसी राजनीतिक दल के भीतर उभरे मतभेद सार्वजनिक होने के कगार पर पहुंच जाते हैं तो वह घातक हो जाते हैं यह एक स्थापित सत्य है। फिर जब इन मतभेदों की जमीन सर्वहित के मुद्दों पर भी आधारित हो जाती है तब इसका सारा कलेवर ही बदल जाता है। वैसे तो पार्टी के भीतर मतभेद उसी दिन से चले आ रहे हैं जब जयराम मुख्यमन्त्री बने थे क्योंकि विधानसभा चुनावों में जयराम मुख्यमन्त्री के लिये घोषित चेहरा नही थे। यही  कारण था कि धूमल के चुनाव हारने के बाद भी विधायकों का एक बड़ा वर्ग उनको ही मुख्यमन्त्री बनाना चाहता था। बल्कि दो विधायकों ने उनके लिये सीट खाली करने की पेशकश कर दी थी। लेकिन जयराम उस समय धूमल और नड्डा को पछाड़ कर बाजी मार गये। क्योंकि इसकी बिसात चुनावों के दौरान ही पालमपुर की उस बैठक में बिछा दी गयी थी जिसमें कुछ पत्रकारों के साथ अमितशाह की एक वार्ता आयोजित हुई थी। बल्कि जयराम ने जब शिमला के प्रैस क्लब में आयोजित एक वार्ता में यह कहा था कि ‘‘अब तो उन्हे मुख्यमन्त्री मान लो क्योंकि वह बन गये हैं। भाजपा के आज के सियासी हालात का आकलन करने के लिये इस पृष्ठभूमि को नजरअन्दाज नही किया जा सकता है।
प्रदेश का जातिय और राजनीतिक गणित समझना भी सही आकलन के लिये आवश्यक है। इस गणित में यह महत्वपूर्ण है कि प्रदेश में ब्राहमण और राजपूत दो ही महत्वपूर्ण समुदाय है। लेकिन कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर, सोलन और सिरमौर के कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां ओबीसी के सहयोग के बिना किसी दल को चुनाव जीतना कठिन हो जाता है। कांगड़ा में इसका प्रभाव क्षेत्र थोड़ा ज्यादा है। फिर कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और सरकार उसी दल की बनती है जो यहां से कम से कम नौ-दस सीटें जीत पाता है। कांगड़ा में इतनी सीटें जीतने के लिये ओबीसी का सक्रिय सहयोग आवश्यक है। ओबीसी को अपनी इस राजनीतिक ताकत का पता है। इस समय ओबीसी से मन्त्री मण्डल में केवल एक ही मन्त्री है सरवीन चौधरी। लेकिन शहरी विकास मन्त्री होते हुए भी सरवीण समार्ट सिटी बोर्ड की सदस्य नही है। राष्ट्रीय स्तर पर भी ओबीसी भाजपा से पूरी तरह खुश नही है। क्योंकि इस वर्ग का सबसे बड़ा नुकसान करीमी लेयर की परिभाषा बदलने से हुआ है। यह परिभाषा बदलने से ओबीसी के उम्मीदवारों को संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर लेने के बावजूद नियुक्ति पत्र जारी नही हुए थे। इसको लेकर पूरे वर्ग में अन्दर ही अन्दर बड़ा रोष चल रहा है। यही रोष है जिसके कारण धवाला के खेद व्यक्त करने के बाद ओबीसी संगठन ने रणधीर शर्मा, राजीव बिन्दल और विशाल नेहरिया पर हमला बोलने में देर नही लगाई है।
संघ -भाजपा की आरक्षण को लेकर क्या धारणा है यह मण्डल आन्दोलन के दौरान जग जाहिर हो ही चुकी है। आज भी इसको लेकर संघ के शीर्ष नेतृत्व के ब्यान प्रायः आते ही रहते हैं। इस पृष्ठभूमि में ओबीसी का युवा पढ़ा लिखा वर्ग संघ भाजपा से वैचारिक दूरी बनाये रखने पर चल पड़ा है यह तय है। यदि इस पक्ष को थोड़ी देर के लिये साईड भी कर दिया जाये तो इस समय कांगड़ा से दो मन्त्री पद खाली हैं। कपूर और अनिल शर्मा के पद तो पिछले एक वर्ष से खाली चले आ रहे हैं। मुख्यमन्त्री अब तक इन पदों को भर नही पाये हैं। दूसरी ओर यह भी जग जाहिर है कि राजीव बिन्दल मन्त्री बनना चाहते थे लेकिन उन्हे विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया। फिर जब स्वास्थ्य विभाग को लेकर शान्ता कुमार के नाम एक खुला पत्र सामने आया तब अन्ततः स्वास्थ्य मन्त्री को मन्त्री पद छोड़कर स्पीकर बनना पड़ा। स्पीकर राजीव बिन्दल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। यह सार्वजनिक है कि जयराम विपिन परमार को मन्त्री पद से नही हटाना चाहते थे और न ही बिन्दल को पार्टी अध्यक्ष देखना चाहते थे। यह दोनों काम मुख्यमन्त्री की सहमति के बिना हुए हैं। हाईकमान ने अपने फीड बैक पर यह फैसलें लिये हैं। इसमें सबसे अहम फैसला था बिन्दल का प्रदेश अध्यक्ष बनना। प्रदेश अध्यक्ष बनकर वह मुख्यमन्त्री के लिये चुनौती माने जाने लगे। इस चुनौती की पहली झलक तब सामने आयी जब भाजपा के ही आठ विधायकों ने नेता प्रतिपक्ष के साथ मिलकर विधानसभा सत्र बुलाये जाने के लिये स्पीकर को लिखित पत्र सौंप दिया। इस पत्र की घटना के साथ ही निदेशक स्वास्थ्य और एक पृथ्वी सिंह का आडियो सामने आ गया। यह आडियो सामने आते ही बिनदल ने आठ विधायकों के सत्र बुलाने की मांग को वाकायदा प्रैस नोट जारी करके अनुचित करार दे दिया। अब यह आठ विधायकों का पत्र और आडियो एक ही समय में सामने आना एक सहज संयोग था या प्रायोजित संयोग इस पर अभी तक रहस्य बना हुआ है। लेकिन इसमें यह आवश्य जुड़ गया कि पृथ्वी सिंह बिन्दल का खास आदमी है। यह जुड़ते ही शान्ता कुमार ने इस सब पर हाईकमान को पत्र लिख दिया। शान्ता के पत्र का संज्ञान लेते ही बिन्दल को अध्यक्ष पद छोड़ने के निर्देश हो गये और उन्होने त्यागपत्र भी दे दिया जिसे तुरन्त प्रभाव से स्वीकार भी कर लिया गया। बिन्दल के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद फिर एक चर्चा चली कि पूर्व अध्यक्ष सतपाल सत्ती, रणधीर और धर्माणी को निगमों/बोर्डों में अध्यक्ष बनाया जा रहा है। अध्यक्षों की इस चर्चा के साथ ही उत्साही पत्रकारों ने मन्त्रीमण्डल के विस्तार होने की चर्चा भी छेड़ दी। इन सारी चर्चाओं के बीच कांगड़ा में सांसद किश्न कपूर और पूर्व मन्त्री रविन्द्र रवि के साथ कांगड़ा के कुछ नेताओं की बैठक होना एक नया मुद्दा जुड़ गया। कपूर-रवि की इस बैठक को कांगड़ा-चम्बा के ही विधायकों ने पार्टी विरोधी गतिविधि करार देकर इनके खिलाफ कारवाई करने की गुहार हाईकमान से लगायी। इस पृष्ठभूमि में जब निदेशक-पृथ्वी के आडियो पर कांग्रेस हमलावर हो गयी तब मुख्यमन्त्री ने भाजपा विधायक दल की बैठक बुला ली । बैठक बुलाने की बात सामने आते ही इसमें प्रैस ने यह जोड़ दिया की इसमें मन्त्रीमण्डल विस्तार निगमों/बोर्डो की ताजपोशीयां और पार्टी अध्यक्ष पर चर्चा होगी लेकिन जब विधायक दल की बैठक हुई तो उसमें ऐसे किसी भी विषय पर कोई चर्चा तक नही हुई। बैठक कांग्रेस के हमले का जबाव कैसे देना है इस पर ही केन्द्रित रही यह कहा गया। लेकिन इसी बैठक से बाहर आकर रमेश धवाला ने संगठन मन्त्री पवन राणा पर सीधा हमला बोल दिया।
रमेश धवाला के इस हमले पर पार्टी ने उनके खिलाफ कारवाई करने की बात कर दी। यह प्रकरण इतना बढ़ा कि धवाला को खेद का पत्र संगठन को सौंपना पड़ा। धवाला के इस खेद पत्र के बाद ओबीसी समुदाय धवाला के साथ खड़ा हो गया है। कांगड़ा में धवाला बनाम पवन राणा धु्रवीकरण अब खुलकर खड़ा होता जा रहा है। इसी बीच मन्त्रीमण्डल विस्तार और निगमों/बोर्डो में ताजपोशीयों पर विराम लग गया है। नये अध्यक्ष पर भी अभी तक फैसला नही हो पाया है। ऐसे में जो विधायक मन्त्री बनने की आस लगाये बैठे थे अब उनका धैर्य कब जवाब दे जाये यह कहना कठिन नही है क्योंकि इन्ही लोगों ने कपूर- रवि के खिलाफ मोर्चा खोला था। अब अगर इनको लगा कि मुख्यमन्त्री के सहारे मन्त्री पद पाना आसान नही है तो यह लोग कब पासा बदलकर मुख्यमन्त्री के लिये ही कठिनाईयां पैदा कर दें इससे इन्कार नही किया जा सकता। क्योंकि आडियो के सहारे बिन्दल के खिलाफ प्रचार के अतिरिक्त कुछ नहीं मिल पाया है और यही नये समीकरणों का आधार कब बन जाये इसे नजर अन्दाज नही किया जा सकता है। क्योंकि जो ज्वाला भड़क उठी है शायद वह कोई बलि लिये बिना शान्त न हो।

दूरगामी होंगे वेन्टिलेटर खरीद की जांच के आदेश

शिमला/शैल।जयराम सरकार ने वैंटिलेटरज़ की खरीद को लेकर आये एक बेनामी पत्र में लगे आरोपों की जांच के लिये निदेशक उद्योग की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी का गठन कर दिया। विपक्ष ने स्वास्थ्य विभाग में हुई अब तक की सारी खरीद पर श्वेत पत्र जारी करने और इस सबकी उच्च न्यायालय की देख-रेख में जांच करवाने की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि जब स्वास्थ्य विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के पास है और नीतिगत सारे फैसले मन्त्री के स्तर पर ही लिये जाते हैं तो वह इस जिम्मेदारी से बच नही सकते हैं। इसी आधार पर विपक्ष ने यह मांग की है कि जब तक इस संबंध में जांच का परिणाम नही आ जाता है तब तक मुख्यमन्त्री को नैतिकता के आधार पर अपने पद से त्यागपत्र देना चाहिये। विपक्ष ने नेता प्रतिपक्ष और पार्टी अध्यक्ष के नेतृत्व में इस आश्य का एक ज्ञापन भी राज्यपाल को सौंपा है।
मुख्यमन्त्री ने विपक्ष के ज्ञापन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पत्रकार सम्मेलन में यह कहा है कि नेता प्रतिपक्ष को लेकर उनके पास आये दिन कई बेनामी पत्र आते हैं और यदि इस पर वह जांच करवाने की बात करें तो बात बहुत दूर तक जायेगी। इसी के साथ मुख्यमन्त्री ने यह भी कहा कि वह इस बेनामी पत्र के लेखक की तलाश कर रहे हैं और उसे किसी भी सूरत में छोड़ेंगे नही। बेनामी पत्रों के माध्यम से आरोप लगाने की संस्कृति कोई प्रशंसनीय कार्य नही है और उसकी यथा संभव निन्दा की जानी चाहिये। लेकिन जब ऐसे पत्रों पर ‘पिक एण्ड चूज’’ के आधार पर संज्ञान लिया जायेगा तब तो अंगुली उठना स्वभाविक हो जाता है। जिस बेनामी पत्र के लेखक की तलाश सरकार कर रही है और बेनामी होने के नाते उसका संज्ञान न लेने की राय दी जा रही हो उसी पत्र के आधार पर जब जांच केमटी गठित कर दी जाये तब क्या सरकार का स्टैण्ड स्वतः ही अन्तः विरोधी नही हो जाता है। तब क्या ऐसी जांच कमेटी की रिपोर्ट पर कोई भी विश्वास करने की बात कर पायेगा।
मुख्यमन्त्री ने पत्रकार सम्मेलन में कांग्रेस पार्टी द्वारा कोरोना के संद्धर्भ में किये गये जन कार्यो पर भी कटाक्ष करते हुए सवाल उठाया कि यह कार्य कहां है। इसी में उन्होने आगे कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष ने इसके लिये कांग्रेस हाईकमान को 12 करोड़ का बिल भेजा है। मुख्यमन्त्री ने इस कथित बिल का स्त्रोत सोशल मीडिया को बताया कि उसमें यह बिल सुर्खियां बटोर रहा है। कांग्रेस अपनी राजनीतिक सुविधा के लिहाज़ से इस बेनामी पत्र को लेकर सोशल मीडिया में चर्चित हुआ यह बिल भी एक बेनामी पत्र है मुख्यमन्त्री ने अपनी राजनीतिक सुविधा के लिहाज से इस बेनामी पत्र को कांग्रेस अध्यक्ष पर हमला करने का साधन बनाया। मुख्यमन्त्री के आरोप का संज्ञान लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने भी मुख्यमन्त्री के खिलाफ मानहानि का मामला दायर करने के लिये कानूनी विकल्प तलाशने शुरू कर दिये हैं। वैसे सोशल मीडिया में चर्चित यह कथित बिल एक जानकारी का प्रपत्र है। इस प्रपत्र में हाईकमान ने सारी प्रदेश कांग्रेस कमेटीयों से उनके द्वारा कोरोना को लेकर किये गये कार्यों की जानकारी मांगी है। प्रदेश कांग्रेस जो काम करने का दावा कर रही है उस दावे पर मुख्यमन्त्री का मतभेद और असहमति हो सकती है। लेकिन इस सूचना के प्रपत्र को ही बिल के रूप में प्रचारित करना यह प्रमाणित करता है कि मुख्यमन्त्री का तन्त्र उन्हे किस तरह की कितनी विश्वनीय जानकारियां उपलब्ध करवा रहा है।
लेकिन यहीं पर यह सवाल भी आ जाता है कि जब एक बेनामी पत्र पर जांच बैठायी जा सकती है तो अन्य पत्रों पर भी ऐसी ही जांच क्यों नही होनी चाहिये। जब सीधे हाईड्रोकालिज के निर्माण में न्यूनतम निविदा 92 करोड़ को नजरअन्दाज करके 100 करोड़ की निविदा देने वाले को काम दिया गया तो क्या यह 8 करोड़ के सरकारी धन की लूट नही है। इस कालिज को लेकर दो बार विधानसभा में प्रश्न भी आये जो संयोग से चर्चा में नही आ सके। विधायक रामलाल ठाकुर ने एक पत्रकार वार्ता में यह सवाल भी उठाया लेकिन कोई कारवाई नही हुई। क्या इस आठ करोड़ के भ्रष्टाचार की जांच नही होनी चाहिये। ऐसे ही सीमेन्ट के रेट बढ़ाने को लेकर एक गंभीर पत्र आया। गंभीर आरोप लगे थे उस पत्र पर लेकिन कोई जांच के आदेश नही हुए। ऐसे में आज जब वैन्टिलेटर खरीद को लेकर आये बेनामी पत्र पर जांच हो सकती है तो फिर उसी तर्क से बाकी पत्रों पर जांच क्यों नही। क्या मुख्यमन्त्री के गिर्द बैठा सलाहकारों का टोला सिर्फ मुख्यमन्त्री को दबाव में रखने के लिये उन्ही से जुड़े विभागों पर लगे आरोपों की जांच की बिसात बिछाकर एक बड़ा राजनीतिक खेल खेलने की तैयारी कर रहा है। क्योंकि यदि पृथ्वी सिंह की गिरफतारी के बाद भी रिश्वत के आरोपों की जांच की आंच राजीव बिन्दल तक नही पहुंच पाती है तब जांच की सुलगी आग में कई औरो के जलने की नौबत आ जायेगी यह तय है। क्योंकि स्वयं ही जांच आदेशित करके सरकार ने विपक्ष को एक ऐसा हथियार थमा दिया है जो लगातार चलता ही रहेगा।

अढ़ाई साल के कार्यकाल में हुई खरीद पर ‘श्वेत पत्र’ जारी किया जाये
 
कांग्रेस का राज्यपाल को ज्ञापन

कांग्रेस विधायक दल की एक आपात बैठक प्रतिपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में हिमाचल प्रदेश विधान सभा के विपक्ष लाँज में हुई। कांग्रेस के सभी विधायकों ने एक सुर में हिमाचल प्रदेश की जय राम सरकार को घोटालों की सरकार करार देते हुए व मुख्यमंत्री को प्रबंधन में नाकाम मानते हुए पद से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की। बैठक में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री  वीरभद्र सिंह सहित सभी विधायक मौजूद रहे। बैठक में दलील दी गई कि जय राम सरकार सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुकी है। सदी के सबसे बड़े मानवता पर आए संकट के दौरान स्वास्थ्य विभाग में लगातार हो रहे घोटाले और खास तौर पर घटिया दवाइयां, पी.पी.ई. किट्स, वैंटिलेटर, सैनिटाइजर और अन्य खरीद में घोटाले सार्वजनिक हुए तथा जिस प्रकरण के चलते पार्टी अध्यक्ष, राजीव बिन्दल को हटाया गया उससे प्रदेश पूरी तरह शर्मसार हुआ है। इस मसले में देशद्रोह की धाराओं के तहत मामला दर्ज करके उच्च स्तरीय जांच को अंजाम दिया जाना चाहिए। यही नहीं भाजपा के अढ़ाई साल के कार्यकाल के दौरान जितनी भी खरीद हुई हैं उसका ‘श्वेत पत्र’ जारी किया जाए। कोरोना काल की तमाम खरीद का विशेष आडिट करवाकर जनता के समक्ष रखा जाए। विधायक दल का मानना है कि राज्य की जय राम सरकार ने इस दौरान बहुत ही लापरवाही से काम किया है और आम-आदमी की सेवा करने के राजधर्म को निभाने में यह सरकार पूरी तरह विफल हुई है। मौजूदा सरकार की विश्वसनीयता समाप्त हो चुकी  है इसलिए कांग्रेस विधायक दल ने प्रदेश कांग्रेस से भी आग्रह किया है कि वे भी इसके विरुद्ध आंदोलन चलाकर इस सरकार को बेनकाब  करे। बैठक करीब दो घंटे तक चली इसमें वीरभद्र सिंह सहित आशा कुमारी, राम लाल ठाकुर, सुक्खविन्द्र सिंह सुक्खु, हर्षवर्धन चैहान, जगत सिंह नेगी के अलावा कई वरिष्ठ विधायकों ने अपनी राय रखी। कोरोना काल में इस बैठक में सरकार को घेरने का पूरा रोडमैप तैयार करते हुए कांग्रेस विधायक दल ने अपनी मांग दोहराई कि हिमाचल प्रदेश में विधान सभा के विशेष सत्र की तत्काल जरूरत है ताकि प्रदेश में जो काले कारनामे कोरोना काल में हुए हैं और खासतौर पर जिस तरीके से इंदिरा गांधी मैडिकल काॅलेज के प्रिंसिपल को बदला गया, एस.डी.एम. नादौन को बदला गया और स्वास्थ्य निदेशक की गिरफतारी हुई, कोरोना काल में यह देशद्रोह के साथ जुड़े मसले हैं इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए इस सरकार को घोर विफल सरकार करार देते हुए पार्टी ने यह कहा कि यह सरकार जनमानस के लिए खतरा बनी हुई है और इसके कारण लोकतंत्र पूरी तरह समाप्त हो चुका है। अब इस सरकार से कोई उम्मीद करना बाकी नहीं बची है। इस वैश्विक महामारी के समय में भी इस सरकार द्वारा न तो किसी के बिजली का बिल माफ किया गया, न पानी का बिल और न ही किसी बच्चे की फीस माफ की गई। सारा ध्यान घोटालों को अंजाम देने में बीत गया और अब मंहगाई अपनी चरम पर है। जहां पैट्रोल-डीजल, गैस, राशन की कीमतें बढ़ाई गई वहीं पर राशन की स्कीम से जनमानस को मिल रहे फायदों को भी छिनने की कोशिश की गई। राशन स्कीम में सब्सिडी कम करना या लोगों की संख्या कम करना, जैसे घिनौने काम इस दौरान किए गए। कहां तो सरकार को चाहिए था कि वह इस काल में लोगों के घर-आंगन तक सुविधाएं पहुंचाती ऐसे सभी लोगों के खातों में पैसे डालती जो आयकर नहीं देते लेकिन सरकार लगातार अधिसूचनाएं जारी करती रही और जनता से फरेब का क्रम जारी रखा जाएगा।
इस सरकार द्वारा किसान-बागवान की कोई मदद नहीं की गई वहीं पर्यटन उद्योग नाकाम किया गया। उद्योगधंधों को पूरी तरह से चैपट कर दिया गया और छोटे व्यापारी कहराते रहे। लेकिन इस सरकार को किसी भी तबके पर तर्स नहीं आया। टैक्सी वाले, वेटर्ज, सुरक्षा कर्मचारी, नाई, धोबी, पुजारी, श्रमिक, दुकानदार इत्यादि लोगों की कोई मदद नहीं की गई बल्कि हजारों लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए और कई लोगों की गिरफतारियां की गई। पत्रकारों पर मामले दर्ज करने की कोशिश की गई ताकि सरकार की नाकामियां जनता तक न पहुंच जाए।  पार्टी ने कहा यह सरकार केंद्र से कोई मदद हासिल नहीं कर पाई, न ही किसी रोडमैप पर काम किया, न ही खर्चों में कटौती की बात की  और सिर्फ एक राजनीतिक हथियार के तौर पर विधायकों की विधायक निधि काटने का काम किया गया। जबकि सरकार को तमाम चेयरमैन, वाइस चेयरमैन हटाने चाहिए थे। विभागीय खर्चों में कटौती करनी चाहिए थी। जिस ढंग से इस दौरान प्रदेश में कारनामे हुए पार्टी ने उसका पूरा कच्चा चिट्ट्ठा राज्यपाल के दरबार में भी रखने का फैसला लिया और दलील दी कि कोविड प्रबंधन में घोटालों के चलते कांग्रेस विधायक दल को अपना विरोध दर्ज करवाना जरूरी है। विधायक दल ने यह भी जानना चाहा कि मुख्यमंत्री यह स्पष्ट करें कि अगर स्वास्थ्य घोटाले में पार्टी अध्यक्ष जिम्मेवार है तो मुख्यमंत्री कैसे जिम्मेवार नहीं है? विभाग का प्रबंधन सीधा उनके हाथ में है। विभाग को पार्टी चला रही थी या सरकार चला रही थी? यह बात साफ होनी चाहिए इसलिए कांग्रेस विधायक दल ने कहा कि मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल विस्तार, नये चेयरमैन बनाने के लारे-लप्पे की योजना को त्याग कर अपना इस्तीफा दें और यह भी स्पष्ट करें कि इस दौरान केंद्र ने राज्य को कुल कितने पैसे दिए हैं। उन्होंने कहा कि अब सरकार विभिन्न विभागों के खातों में पड़े 12 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रही है। हजारों करोड़ रुपये कर्ज लेने की योजना बनाने से पहले सरकार यह बताए कि 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज में हिमाचल प्रदेश को क्या हासिल हुआ? इस बैठक में कोरोना के समय में अफसरशाही का बड़े पैमाने पर तबादला करना और मुख्यमंत्री के निजी सचिव को हटाने की भी चर्चा हुई। यह भी दलील दी गई कि मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने ‘क्वारंटीन डैस्टिनेशन’ जैसी बातें राष्ट्रीय चैनलों पर कर हिमाचल प्रदेश की छवि को बेहद बड़ा आघात लगाया है। कहा गया कि इस दौरान जबकि प्रदेश में लाॅकडाउन था, नशा माफिया, रेत माफिया, वन माफिया और हर तरह के माफिया हिमाचल प्रदेश सरकार की शह पर दनदना रहे थे और सबसे बड़ा स्वास्थ्य माफिया हिमाचल प्रदेश में अब पनप कर सामने आया है। स्वास्थ्य विभाग में खरीद के दलाल हर तरफ दनदना रहे हैं। पार्टी ने कहा कि जहां पहले पत्र बम्ब ने बवाल मचाया था वहीं बाद में सी.एम.ओ. के माध्यम से दवाइयों की सवा सौ करोड़ रुपये की खरीद हिमाचल प्रदेश विधान सभा में सुनने को मिली। खरीद में हेरा-फेरी और उसके बाद आयुर्वेद विभाग में घोटाले से यह प्रदेश कहराता रहा और अब तो पी.पी.ई. किट्स, सैनिटाइजर, वैंटिलेटर खरीद ने हिमाचल प्रदेश की राजनीति को शर्मसार किया है। क्वारंटीन सैंटर्ज में कुप्रबंधन, अनियमित्तताएं और लोगों की मौतें इस दौरान मुद्दा बनी रही। कोविड फंड का दुरुपयोग कर उससे मोबाइल खरीदे जाते रहे। कोरोना योद्धाओं के वेतन काटे जाते रहे। इसके अतिरिक्त दर्जनों ऐसे मसले सामने आए जिनमें  अमानवीय तरीके से लोगों से बर्ताव किया गया। इस दौरान अफसरशाही दनदनाती रही और लोकतंत्र को हाशिये पर धकेल दिया गया। ऐसे में जय राम ठाकुर को तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि यह कारनामे माफी के काबिल नहीं है।

क्या भाजपा की इन साईड स्टोरी अब बिखरने लगी है

शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा में पिछले अरसे से चल रही इन साईड स्टोरी अब पब्लिक स्टोरी होने लग पड़ी है। इस स्टोरी का ताजा अध्याय कांगड़ा में कुछ दिन पहले ही लिखा गया है। 30 मई को कांगड़ा के लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह में भाजपा के आठ-दस नेता इकट्ठे हुए। इनमें कांगड़ा के सांसद किश्न कपूर और पूर्व मन्त्री रविन्द्र रवि प्रमुख नाम थे। रविन्द्र रवि के खिलाफ जब शान्ता के नाम खुले पत्र के प्रकरण  में एफआईआर दर्ज हुई थी तब से रवि को मुख्यमन्त्री का विरोधी माना जाता है। रवि की गिनती धूमल समर्थकों में होती है। धूमल और जयराम के रिश्तों की मधुरता जंजैहली प्रकरण में सरकार के गठन के तुरन्त बाद ही जग जाहिर हो चुकी है। किश्न कपूर जब जयराम मन्त्रीमण्डल में मंत्री बने थे तब उनका मन्त्री बनना भी धूमल के नाम लगा था। इस परिदृश्य में जब कांगड़ा के धूमल खेमे से जुड़े नेताओं की कोई बैठक होगी तो उसे सरकारी तन्त्र से लेकर मीडिया तक मुख्यमन्त्री विरोधी बैठक ही करार देगा हुआ भी यही। लेकिन इसमें राजनीतिक समझ का खुला प्रदर्शन तब सामने आया जब कांगड़ा-चम्बा के आठ विधायकों ने इस बैठक को पार्टी विरोधी गतिविधि करार देते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को इस संबंध में पत्र लिखकर बैठक करने वाले नेताओं के खिलाफ कारवाई करने का आग्रह तक कर दिया। इन विधायकों का यह पत्र जब समाचार बनकर सामने आया तब संासद किश्न कपूर की इस प्रतिक्रिया ने की बैठक करना पार्टी  विरोधी गतिविधि नही है बल्कि पत्र लिखकर उसे सार्वजनिक करना अनुशासहीनता है।
अब किश्न कपूर और रविन्द्र रवि तथा अन्यों की इस बैठक के प्रकरण में एक और नया अध्याय जुड गया है। इसमें एसडीएम कांगड़ा ने लोक निर्माण विभाग कांगड़ा के अधिशासी अभियन्ता को पत्र लिखकर यह पूछा है कि उसने कोविड के दौरान इन नेताओं के लिये रैस्ट हाऊस कैसे खोल दिया। स्वभाविक है कि एसडीएम अपने स्तर पर या डीसी भी अपने स्तर पर एसडीएम को ऐसे निर्देश नही देगा कि वह अधिशासी अभियन्ता की ऐसी जवाब तलवी करे। क्योंकि अपरोक्ष में यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला है। निश्चित रूप से ऐसा फैसला पहले मुख्यमंत्री कार्यलय में लिया गया होगा और फिर इस पर अमल करने के लिये डीसी को निर्देश दिये गये होंगे। कांगड़ा की इस बैठक का प्रकरण जिस तरह से आठ विधायकों के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र से लेकर अधिशासी अभियन्ता की जवाब तलबी तक पहुंच गया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा में सब कुछ अच्छा नही चल रहा है।
 इस बैठक प्रकरण के साथ आने वाले दिनों में और क्या-क्या जुड़ता है वह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग का जांच प्रकरण भी शान्ता कुमार के पत्र के कारण ही राजीव बिन्दल के त्यागपत्र तक पहुंचा है। लेकिन जब कांगड़ा सैन्ट्रल कोआरपेटिव बैंक का लोन प्रकरण सामने आया और यह खुलासा हुआ कि ऋण लेने वाले ने शान्ता कुमार के विवेकानन्द ट्रस्ट के नाम पर उन्हे लाखों का चैक दान के नाम से देने का प्रयास किया था तब सरकार से लेकर संगठन तक सब इस मामले में चुप हो गये थे। लेकिन सबकी चुप्पी के वाबजूद इस मामले की वैधता का सवाल आज भी यथास्थिति खड़ा है। क्योंकि शान्ता कुमार भी इस चैक को लौटाने से आगे नही बढ़े थे। वैसे तो पालमपुर के उमेश सूद द्वारा विवेकानन्द ट्रस्ट के खिलाफ प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर हुई याचिका को लेकर भी कई सवाल अब तक खड़े हैं। बहुत संभव है कि आज रविन्द्र रवि के खिलाफ खुले पत्र को लेकर हुई एफआईआर और अब बैठक को लेकर अधिशासी अभियन्ता की जवाब तलबी कई पुराने गड़े मुर्दो को भी खोदने का कारण न बन जाये। यह माना जा रहा है कि जैसे ही मन्त्री मण्डल के खाली पद भरे जायेंगे उसके बाद अन्दर की ज्वाला लपकें बनकर सामने आयेगी।

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