शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा में जो असन्तोष एक अरसे से अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था वह अब सार्वजनिक रूप से बाहर आकर जन चर्चा का मुद्दा बन गया है। जब भी किसी राजनीतिक दल के भीतर उभरे मतभेद सार्वजनिक होने के कगार पर पहुंच जाते हैं तो वह घातक हो जाते हैं यह एक स्थापित सत्य है। फिर जब इन मतभेदों की जमीन सर्वहित के मुद्दों पर भी आधारित हो जाती है तब इसका सारा कलेवर ही बदल जाता है। वैसे तो पार्टी के भीतर मतभेद उसी दिन से चले आ रहे हैं जब जयराम मुख्यमन्त्री बने थे क्योंकि विधानसभा चुनावों में जयराम मुख्यमन्त्री के लिये घोषित चेहरा नही थे। यही कारण था कि धूमल के चुनाव हारने के बाद भी विधायकों का एक बड़ा वर्ग उनको ही मुख्यमन्त्री बनाना चाहता था। बल्कि दो विधायकों ने उनके लिये सीट खाली करने की पेशकश कर दी थी। लेकिन जयराम उस समय धूमल और नड्डा को पछाड़ कर बाजी मार गये। क्योंकि इसकी बिसात चुनावों के दौरान ही पालमपुर की उस बैठक में बिछा दी गयी थी जिसमें कुछ पत्रकारों के साथ अमितशाह की एक वार्ता आयोजित हुई थी। बल्कि जयराम ने जब शिमला के प्रैस क्लब में आयोजित एक वार्ता में यह कहा था कि ‘‘अब तो उन्हे मुख्यमन्त्री मान लो क्योंकि वह बन गये हैं। भाजपा के आज के सियासी हालात का आकलन करने के लिये इस पृष्ठभूमि को नजरअन्दाज नही किया जा सकता है।
प्रदेश का जातिय और राजनीतिक गणित समझना भी सही आकलन के लिये आवश्यक है। इस गणित में यह महत्वपूर्ण है कि प्रदेश में ब्राहमण और राजपूत दो ही महत्वपूर्ण समुदाय है। लेकिन कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर, सोलन और सिरमौर के कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां ओबीसी के सहयोग के बिना किसी दल को चुनाव जीतना कठिन हो जाता है। कांगड़ा में इसका प्रभाव क्षेत्र थोड़ा ज्यादा है। फिर कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और सरकार उसी दल की बनती है जो यहां से कम से कम नौ-दस सीटें जीत पाता है। कांगड़ा में इतनी सीटें जीतने के लिये ओबीसी का सक्रिय सहयोग आवश्यक है। ओबीसी को अपनी इस राजनीतिक ताकत का पता है। इस समय ओबीसी से मन्त्री मण्डल में केवल एक ही मन्त्री है सरवीन चौधरी। लेकिन शहरी विकास मन्त्री होते हुए भी सरवीण समार्ट सिटी बोर्ड की सदस्य नही है। राष्ट्रीय स्तर पर भी ओबीसी भाजपा से पूरी तरह खुश नही है। क्योंकि इस वर्ग का सबसे बड़ा नुकसान करीमी लेयर की परिभाषा बदलने से हुआ है। यह परिभाषा बदलने से ओबीसी के उम्मीदवारों को संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर लेने के बावजूद नियुक्ति पत्र जारी नही हुए थे। इसको लेकर पूरे वर्ग में अन्दर ही अन्दर बड़ा रोष चल रहा है। यही रोष है जिसके कारण धवाला के खेद व्यक्त करने के बाद ओबीसी संगठन ने रणधीर शर्मा, राजीव बिन्दल और विशाल नेहरिया पर हमला बोलने में देर नही लगाई है।
संघ -भाजपा की आरक्षण को लेकर क्या धारणा है यह मण्डल आन्दोलन के दौरान जग जाहिर हो ही चुकी है। आज भी इसको लेकर संघ के शीर्ष नेतृत्व के ब्यान प्रायः आते ही रहते हैं। इस पृष्ठभूमि में ओबीसी का युवा पढ़ा लिखा वर्ग संघ भाजपा से वैचारिक दूरी बनाये रखने पर चल पड़ा है यह तय है। यदि इस पक्ष को थोड़ी देर के लिये साईड भी कर दिया जाये तो इस समय कांगड़ा से दो मन्त्री पद खाली हैं। कपूर और अनिल शर्मा के पद तो पिछले एक वर्ष से खाली चले आ रहे हैं। मुख्यमन्त्री अब तक इन पदों को भर नही पाये हैं। दूसरी ओर यह भी जग जाहिर है कि राजीव बिन्दल मन्त्री बनना चाहते थे लेकिन उन्हे विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया। फिर जब स्वास्थ्य विभाग को लेकर शान्ता कुमार के नाम एक खुला पत्र सामने आया तब अन्ततः स्वास्थ्य मन्त्री को मन्त्री पद छोड़कर स्पीकर बनना पड़ा। स्पीकर राजीव बिन्दल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। यह सार्वजनिक है कि जयराम विपिन परमार को मन्त्री पद से नही हटाना चाहते थे और न ही बिन्दल को पार्टी अध्यक्ष देखना चाहते थे। यह दोनों काम मुख्यमन्त्री की सहमति के बिना हुए हैं। हाईकमान ने अपने फीड बैक पर यह फैसलें लिये हैं। इसमें सबसे अहम फैसला था बिन्दल का प्रदेश अध्यक्ष बनना। प्रदेश अध्यक्ष बनकर वह मुख्यमन्त्री के लिये चुनौती माने जाने लगे। इस चुनौती की पहली झलक तब सामने आयी जब भाजपा के ही आठ विधायकों ने नेता प्रतिपक्ष के साथ मिलकर विधानसभा सत्र बुलाये जाने के लिये स्पीकर को लिखित पत्र सौंप दिया। इस पत्र की घटना के साथ ही निदेशक स्वास्थ्य और एक पृथ्वी सिंह का आडियो सामने आ गया। यह आडियो सामने आते ही बिनदल ने आठ विधायकों के सत्र बुलाने की मांग को वाकायदा प्रैस नोट जारी करके अनुचित करार दे दिया। अब यह आठ विधायकों का पत्र और आडियो एक ही समय में सामने आना एक सहज संयोग था या प्रायोजित संयोग इस पर अभी तक रहस्य बना हुआ है। लेकिन इसमें यह आवश्य जुड़ गया कि पृथ्वी सिंह बिन्दल का खास आदमी है। यह जुड़ते ही शान्ता कुमार ने इस सब पर हाईकमान को पत्र लिख दिया। शान्ता के पत्र का संज्ञान लेते ही बिन्दल को अध्यक्ष पद छोड़ने के निर्देश हो गये और उन्होने त्यागपत्र भी दे दिया जिसे तुरन्त प्रभाव से स्वीकार भी कर लिया गया। बिन्दल के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद फिर एक चर्चा चली कि पूर्व अध्यक्ष सतपाल सत्ती, रणधीर और धर्माणी को निगमों/बोर्डों में अध्यक्ष बनाया जा रहा है। अध्यक्षों की इस चर्चा के साथ ही उत्साही पत्रकारों ने मन्त्रीमण्डल के विस्तार होने की चर्चा भी छेड़ दी। इन सारी चर्चाओं के बीच कांगड़ा में सांसद किश्न कपूर और पूर्व मन्त्री रविन्द्र रवि के साथ कांगड़ा के कुछ नेताओं की बैठक होना एक नया मुद्दा जुड़ गया। कपूर-रवि की इस बैठक को कांगड़ा-चम्बा के ही विधायकों ने पार्टी विरोधी गतिविधि करार देकर इनके खिलाफ कारवाई करने की गुहार हाईकमान से लगायी। इस पृष्ठभूमि में जब निदेशक-पृथ्वी के आडियो पर कांग्रेस हमलावर हो गयी तब मुख्यमन्त्री ने भाजपा विधायक दल की बैठक बुला ली । बैठक बुलाने की बात सामने आते ही इसमें प्रैस ने यह जोड़ दिया की इसमें मन्त्रीमण्डल विस्तार निगमों/बोर्डो की ताजपोशीयां और पार्टी अध्यक्ष पर चर्चा होगी लेकिन जब विधायक दल की बैठक हुई तो उसमें ऐसे किसी भी विषय पर कोई चर्चा तक नही हुई। बैठक कांग्रेस के हमले का जबाव कैसे देना है इस पर ही केन्द्रित रही यह कहा गया। लेकिन इसी बैठक से बाहर आकर रमेश धवाला ने संगठन मन्त्री पवन राणा पर सीधा हमला बोल दिया।
रमेश धवाला के इस हमले पर पार्टी ने उनके खिलाफ कारवाई करने की बात कर दी। यह प्रकरण इतना बढ़ा कि धवाला को खेद का पत्र संगठन को सौंपना पड़ा। धवाला के इस खेद पत्र के बाद ओबीसी समुदाय धवाला के साथ खड़ा हो गया है। कांगड़ा में धवाला बनाम पवन राणा धु्रवीकरण अब खुलकर खड़ा होता जा रहा है। इसी बीच मन्त्रीमण्डल विस्तार और निगमों/बोर्डो में ताजपोशीयों पर विराम लग गया है। नये अध्यक्ष पर भी अभी तक फैसला नही हो पाया है। ऐसे में जो विधायक मन्त्री बनने की आस लगाये बैठे थे अब उनका धैर्य कब जवाब दे जाये यह कहना कठिन नही है क्योंकि इन्ही लोगों ने कपूर- रवि के खिलाफ मोर्चा खोला था। अब अगर इनको लगा कि मुख्यमन्त्री के सहारे मन्त्री पद पाना आसान नही है तो यह लोग कब पासा बदलकर मुख्यमन्त्री के लिये ही कठिनाईयां पैदा कर दें इससे इन्कार नही किया जा सकता। क्योंकि आडियो के सहारे बिन्दल के खिलाफ प्रचार के अतिरिक्त कुछ नहीं मिल पाया है और यही नये समीकरणों का आधार कब बन जाये इसे नजर अन्दाज नही किया जा सकता है। क्योंकि जो ज्वाला भड़क उठी है शायद वह कोई बलि लिये बिना शान्त न हो।

शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा में पिछले अरसे से चल रही इन साईड स्टोरी अब पब्लिक स्टोरी होने लग पड़ी है। इस स्टोरी का ताजा अध्याय कांगड़ा में कुछ दिन पहले ही लिखा गया है। 30 मई को कांगड़ा के लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह में भाजपा के आठ-दस नेता इकट्ठे हुए। इनमें कांगड़ा के सांसद किश्न कपूर और पूर्व मन्त्री रविन्द्र रवि प्रमुख नाम थे। रविन्द्र रवि के खिलाफ जब शान्ता के नाम खुले पत्र के प्रकरण में एफआईआर दर्ज हुई थी तब से रवि को मुख्यमन्त्री का विरोधी माना जाता है। रवि की गिनती धूमल समर्थकों में होती है। धूमल और जयराम के रिश्तों की मधुरता जंजैहली प्रकरण में सरकार के गठन के तुरन्त बाद ही जग जाहिर हो चुकी है। किश्न कपूर जब जयराम मन्त्रीमण्डल में मंत्री बने थे तब उनका मन्त्री बनना भी धूमल के नाम लगा था। इस परिदृश्य में जब कांगड़ा के धूमल खेमे से जुड़े नेताओं की कोई बैठक होगी तो उसे सरकारी तन्त्र से लेकर मीडिया तक मुख्यमन्त्री विरोधी बैठक ही करार देगा हुआ भी यही। लेकिन इसमें राजनीतिक समझ का खुला प्रदर्शन तब सामने आया जब कांगड़ा-चम्बा के आठ विधायकों ने इस बैठक को पार्टी विरोधी गतिविधि करार देते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को इस संबंध में पत्र लिखकर बैठक करने वाले नेताओं के खिलाफ कारवाई करने का आग्रह तक कर दिया। इन विधायकों का यह पत्र जब समाचार बनकर सामने आया तब संासद किश्न कपूर की इस प्रतिक्रिया ने की बैठक करना पार्टी विरोधी गतिविधि नही है बल्कि पत्र लिखकर उसे सार्वजनिक करना अनुशासहीनता है।
अब किश्न कपूर और रविन्द्र रवि तथा अन्यों की इस बैठक के प्रकरण में एक और नया अध्याय जुड गया है। इसमें एसडीएम कांगड़ा ने लोक निर्माण विभाग कांगड़ा के अधिशासी अभियन्ता को पत्र लिखकर यह पूछा है कि उसने कोविड के दौरान इन नेताओं के लिये रैस्ट हाऊस कैसे खोल दिया। स्वभाविक है कि एसडीएम अपने स्तर पर या डीसी भी अपने स्तर पर एसडीएम को ऐसे निर्देश नही देगा कि वह अधिशासी अभियन्ता की ऐसी जवाब तलवी करे। क्योंकि अपरोक्ष में यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला है। निश्चित रूप से ऐसा फैसला पहले मुख्यमंत्री कार्यलय में लिया गया होगा और फिर इस पर अमल करने के लिये डीसी को निर्देश दिये गये होंगे। कांगड़ा की इस बैठक का प्रकरण जिस तरह से आठ विधायकों के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र से लेकर अधिशासी अभियन्ता की जवाब तलबी तक पहुंच गया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा में सब कुछ अच्छा नही चल रहा है।
इस बैठक प्रकरण के साथ आने वाले दिनों में और क्या-क्या जुड़ता है वह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग का जांच प्रकरण भी शान्ता कुमार के पत्र के कारण ही राजीव बिन्दल के त्यागपत्र तक पहुंचा है। लेकिन जब कांगड़ा सैन्ट्रल कोआरपेटिव बैंक का लोन प्रकरण सामने आया और यह खुलासा हुआ कि ऋण लेने वाले ने शान्ता कुमार के विवेकानन्द ट्रस्ट के नाम पर उन्हे लाखों का चैक दान के नाम से देने का प्रयास किया था तब सरकार से लेकर संगठन तक सब इस मामले में चुप हो गये थे। लेकिन सबकी चुप्पी के वाबजूद इस मामले की वैधता का सवाल आज भी यथास्थिति खड़ा है। क्योंकि शान्ता कुमार भी इस चैक को लौटाने से आगे नही बढ़े थे। वैसे तो पालमपुर के उमेश सूद द्वारा विवेकानन्द ट्रस्ट के खिलाफ प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर हुई याचिका को लेकर भी कई सवाल अब तक खड़े हैं। बहुत संभव है कि आज रविन्द्र रवि के खिलाफ खुले पत्र को लेकर हुई एफआईआर और अब बैठक को लेकर अधिशासी अभियन्ता की जवाब तलबी कई पुराने गड़े मुर्दो को भी खोदने का कारण न बन जाये। यह माना जा रहा है कि जैसे ही मन्त्री मण्डल के खाली पद भरे जायेंगे उसके बाद अन्दर की ज्वाला लपकें बनकर सामने आयेगी।
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