Thursday, 04 June 2026
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घातक होगा भ्रष्टाचार के मामलों में दोहरे मापदण्ड अपनाना तीनों अधिकारियों के मामलों में बेचने वाले भूमि हीन हो गये हैं भूमिहीन होने के कारण ही अनुराग- अरूण मामले में विजिलैन्स की कैन्सेलेशन रिपोर्ट अस्वीकार हो चुकी हैं

शिमला/शैल। जयराम मन्त्रीमण्डल के दो मन्त्रीयों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप इन दिनों जन चर्चा का विषय बन गये हैं। कांगड़ा से आने वाली मन्त्री सरवीण चौधरी के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधी पूर्व मन्त्री विजय सिंह मनकोटिया ने प्रधानमन्त्री से लेकर मुख्यमन्त्री तक को एक पत्र लिखकर आरोप लगाये हैं। लेकिन उन्होंने पत्र में और उसके बाद आयोजित की गयी पत्रकार वार्ता में सीधे मन्त्री का नाम नही लिया। परन्तु इसके बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आयीं उनसे सरवीण चौधरी इंगित में आ गयीं। सरवीण ने स्वयं एक वार्ता में यह कहा कि उनकी ज़मीनें तो सबको दिख गयीं लेकिन जिसने मकान को एक मंजिल से चार मंजिला कर लिया वह नहीं दिखा। इसके बाद सरवीण दिल्ली चली गयीं और फिर वहां जो कुछ घटा उसमें मन्त्री महेन्द्र सिंह को दिल्ली तलब कर लिया गया। महेन्द्र सिंह की दिल्ली तल्लबी इसलिये चर्चा में आ गयी क्योंकि उन्हें शिमला के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम रद्द करके जाना पड़ा। इस जाने से महेन्द्र सिंह भी इसी कड़ी की चर्चा में आ गये क्योंकि उनके होटल का मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है।
जब यह सब चर्चा में चल रहा था तभी सरवीण के मामले में विजिलैन्स की सक्रियता भी सामने आ गयी। शायद मुख्यमन्त्री ने विजिलैन्स से इस बारे में रिपोर्ट मांगी थी। अब विजिलैन्स की यह कथित रिपोर्ट भी चर्चा में आ गयी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक साढ़े पांच करोड़ की ज़मीन 95 लाख में खरीदी गयी है और इसमें सरकार को भी स्टांप शुल्क के रूप में राजस्व का नुकसान हुआ है। इसी के साथ यह भी चर्चा है कि इस सौदे में बहुत सारा भुगतान नकद हुआ है। यदि इस कथित रिपोर्ट के यह तथ्य सही हैं तो सबसे पहले यह सामने आता है कि कांगड़ा का सारा राजस्व प्रशासन पटवारी से लेकर जिलाधीश तक इस मन्त्री के साथ मिला हुआ था और उनकी मदद कर रहा था। क्योंकि जमीन की कोई भी रजिस्ट्री सर्कल रेट से कम के स्टांप शुल्क पर नहीं होती है। सर्किल रेट जिलाधीश नोटिफाई करता है। रजिस्ट्री पंजीकरण की सारी प्रक्रिया कंम्प्यूटर के माध्यम से होती है और इसमें यदि कोई कमी हो तो वह तुरन्त सामने आ जाती है। फिर तहसीलदार पैसों के नकद लेन-देन को सामान्यतः स्वीकार ही नही करता है। इस तरह पंजीकरण की प्रक्रिया में ही हर कमी उजागर हो जाती है। ऐसे में विजिलैन्स की रिपोर्ट के मुताबिक यदि स्टांप शुल्क के राजस्व का सरकार को नुकसान पहुंचाया गया है तो उसमें क्रेता -विक्रेता से पहले संबंधित राजस्व अधिकारियों के खिलाफ मामला बनता है क्योंकि उनकी मिली भगत के बिना यह संभव हो ही नही सकता।
अब यह मामला सार्वजनिक होकर सबके संज्ञान में आ चुका है। विजिलैन्स की कथित रिपोर्ट आ चुकी है। विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का प्रयास अवश्य करेगा। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि क्या मुख्यमन्त्री सत्र से पहले ही इस दिशा में कोई कारवाई करते हैं या नहीं और क्या मन्त्री को हटाने के अतिरिक्त कोई दूसरी कारवाई संभव है।
दूसरी ओर 118 की जिन अनुमतियों में कमीयों के मामले विधानसभा पटल तक चर्चित हो चुके हैं उनमें आज तक कोई कारवाई न होना भ्रष्टाचार को लेकर दोहरे मापदण्ड अपनाना होगा। फिर 118 के यह मामले तो जस्टिस डीपी सूद जांच आयोग द्वारा सामने लाये गये हैं। सरकार के अपने तीन बड़े अधिकारियों के मामले इनमें शामिल हैं। तीनों अधिकारियों प्रबोध सक्सेना, देवेश कुमार और सुतनु बेहुरिया के मामलों में जमीन बेचने वाले यह जमीन बेचने के बाद भूमिहीन हो जाते हैं। अनुराग ठाकुर और अरूण धूमल के खिलाफ धर्मशाला में विजिलैन्स ने प्रेमु की जमीन खरीदने पर यही मामला बनाया है। प्रेमु यह जमीन बेचकर भूमिहीन हो गया है। अब जब विजिलैन्स ने इस मामलें में कैन्सेलेशन रिपोर्ट अदालत में दायर की थी तो अदालत ने इसे अस्वीकार कर दिया है। अनुराग और अरूण के खिलाफ यह मामला बनता है तो फिर इन अधिकारियों के खिलाफ क्यों नहीं बनता।
इसी तरह राजकुमार राजेन्द्र सिंह, बनाम एसजेवीएनएल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे फ्राड कहा है। 12% ब्याज सहित सारे धन की तीन माह में रिकवरी करने के आदेश है। जयराम सरकार के कार्यकाल में 2018 सितम्बर में यह फैसला आया है लेकिन आज तक इस फैसले पर पूरा अमल नही हो पाया है। फ्राड के खिलाफ कोई मामला दर्ज नही किया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोहरे मापदण्ड अपनाये जा रहे हैं। लेकिन इस बार इन दोहरे मापदण्डों के कारण भाजपा के अपने ही बड़े नेता शिकार हो रहे हैं। जिस मुद्दे पर डा. बिन्दल की छुट्टी की गयी थी। उसमें अब उन्हें क्लीनचिट मिल गयी है। सरवीण चौधरी के मामले में विजिलैन्स ने जो कमीयां उजागर की हैं उससे ज्यादा गंभीर कमीयां अधिकारियों के मामलें में रिकार्ड पर हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार के मामले में दोहरे मापदण्ड अपनाना सरकार के लिये अन्ततः घातक सिद्ध होगा यह तय है।

क्या केन्द्र के निर्देशों की उल्लंघना पर राज्य सरकारों को दंडित किया जायेगा

शिमला/शैल। क्या राज्य सरकार ने कोरोना को लेकर केन्द्र द्वारा 29 जुलाई को जारी दिशा निर्देशों की उल्लघंना की है। यह सवाल केन्द्र सरकार के गृह सचिव अजय भल्ला द्वारा जारी 22 अगस्त के पत्र से उठा है। इस पत्र में कहा गया है कि कहीं भी आने जाने पर कोई प्रतिबन्ध नही है और इसके लिये ई पास आदि की कोई आवश्यकता नही है। पत्र में  कहा गया है कि केन्द्र ने 29 जुलाई को ही आवाजाही को लेकर सारे प्रतिबन्ध हटा दिये थे और कुछ राज्य से बाहर दूसरे राज्यों मे जाने के लिये 48 घन्टे के अन्दर ही वापिस आने की शर्त पर ही अुनमति मिलती थी। 48 घन्टे से अधिक का समय लगने पर संगरोध में जाने का नियम था। इन प्रतिबन्धों के कारण बहुत लोगों को परेशानी और नुकसान उठाना पड़ा है।
केन्द्र के पत्र से स्पष्ट हो जाता है कि इस संबंध में उसका या तो राज्य सरकार के साथ तालमेल का अभाव रहा है या फिर असुविधाओं की जिम्मेदारी राज्यों पर डालने का प्रयास किया जा रहा है। क्योंकि पहले राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन को यह कहा गया कि वह केन्द्र के निर्देशों को  अपने स्तर पर लचीला नहीं कर सकते बल्कि अपनी आवश्यकता के अनुसार और कढ़ा कर सकते हैं। राज्य सरकारों ने इसी कारण से इन प्रतिबन्धों को जारी रखा था जिन्हेें अब हटाने की बात की गयी है। वैसे केन्द्र के इस पत्र के बाद ऐसे कई संशोधित निर्देश राज्य सरकार की ओर से जारी किये गये हैं और न ही केन्द्र के इस पत्र का कोई खण्डन किया गया है।
कोरोना को लेकर स्थिति पहले से बहुत गंभीर है और हर दिन केस बढ़ रहे हैं। आज हिमाचल में ही मामलों का आंकड़ा पांच हजार से पार जा चुका है जबकि अप्रैल में प्रदेश कोरोना मुक्त होने के कगार पर पहुंच गया था। कोरोना का कोई भी ईलाज अभी तक सामने नही आ पाया है यह एक कड़वा सच है। सरकार इसकी गंभीरता का कोई सही आकलन अभी तक नही कर पायी है यह गृह सचिव के पत्र से स्पष्ट हो जाता है। लाकडाऊन से लेकर आज अनलाक तीन तक इस संबंध में कोई नयी स्वास्थ्य सुविधायें अभी तक नही जुटाई जा सकी है। आज भी अस्पतालों में एक डर का मौहाल स्पष्ट देखा जा सकता है। इस डर के कारण मरीजों को पहले जैसा ईलाज नही मिल पा रहा है क्योंकि हर मरीज को पहले कोरोना की नजर से देखा जा रहा है। बिमारी में भी अस्पताल न जाने की सलाह दी जा रही है।
इस समय कोरोना का डर ही सबसे बड़ा आतंक बन चुका है और इस आतंक से आम आदमी को बाहर निकालने  के कदम उठाने की बजाये डर को और पुख्ता किया जा रहा है। आज भी शैक्षणिक संस्थान और धार्मिक स्थल बन्द चल रहे हैं। अभिभावक बच्चों को स्कूलों में भेजने का साहस नही जुटा पा रहे हैं क्योंकि हर रोज़ बिमारी के आंकड़े बढ़ रहे हैं। क्योंकि व्यवहारिक पक्ष यही है कि बिमारी अभी बढ़ ही रही है और इसका ईलाज कोई है नही। इसी डर के कारण बाज़ार अभी तक 50% पर भी नही पहुंच पाया है। लेकिन इसी सबके बीच जब राजनीतिक गतिविधियां अपने स्तर पर यथास्थिति चल रही हैं तब सरकार की नीयत और नीति दोनों एक साथ शक के दायरे में आ खड़े होते हैं। ऐसे में अब हालात इस मोड़ पर पहुंच चुके हैं कि यदि सही में कोरोना है तो सबसे पहले राजनीतिक गतिविधियों पर पूरा विराम लगाना होगा अन्यथा किसी भी चीज पर किसी भी तरह का कोई प्रतिबन्ध नही रहना चाहिये। आज केन्द्र के पत्र ने राज्य सरकारों पर उनके निर्देशों की उल्लंघना करने का सीधा आरोप लगाया है। क्या इस उल्लघंना के लिये आम आदमी की तर्ज पर राज्य सरकारों/जिला प्रशासन को दण्डित किया जायेगा।




क्या 118 की इन अनुमतियों को रद्द कर पायेगी सरकार

क्या 118 की इन अनुमतियों को रद्द कर पायेगी सरकार
तीन बड़े अधिकारी प्रबोध सक्सेना, सुतनु बेहुरिया और देवेश कुमार भी है
लाभार्थियों में शामिल
शिमला/शैल। कोई भी गैर कृषक गैर हिमाचली प्रदेश में सरकार की पूर्व अनुमति  के बिना जमीन नही खरीद सकता है। प्रदेश के राजस्व और भू-सुधार अधिनियम की  धारा 118 के तहत यह बंदिश लगाई गयी है। लेकिन जब से प्रदेश की उद्योग नीति में बदलाव करके औद्योगिक निवेश को आमंत्रित किया जाने लगा है तभी से धारा  118 के प्रावधानो की उल्लंघना के मामले चर्चित होने लगे हैं। इन्ही  प्रावधानों के कारण बेनामी खरीद तक का सहारा लिया गया। इस तरह की खरीद 1990 के शान्ता शासन में होने के आरोप लगे और वीरभद्र ने इस पर एस एस सिद्धु की अध्यक्षता मे जांच बैठायी।
इसके बाद भाजपा शासन में आर एस ठाकुर और फिर जस्टिस डी पी सूद की अध्यक्षता मे जांच बिठाई गयी। वीरभद्र के 2003 से 2007 के शासन के दौरान हुई खरीद पर यहां तक आरोप लगे कि चुनाव आचार सहिंता लगने के बाद भी धारा 118 की अनुमतियां दी गई और चुनाव परिणाम आने के बाद तक भी यह अनुमतियां दी गई जब सरकार हार गई हुई थी। इस राजनैतिक नैतिकता से हटकर इन अनुमतियों पर धारा  118 के प्रावधानों की गंभीर उल्लंघना के आरोप लगे हैं। यहां तक की तीन  वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी प्रबोध सक्सेना, सुतनु बेहुरिया और देवेश कुमार के खिलाफ भी आरोप लगे। ऐसे कई मामले विधान सभा पटल पर उल्लंघनाओं के ब्योरे  सहित रखे गये थे। लेकिन किसी भी मामले में केवल प्रियंका गांधी वाड्रा को  छोड कर कोई कारवाई नही हुई है। अब जब जयराम सरकार 92 हजार करोड़ के निवेश को अमली शक्ल देने का प्रयास करेगी तब उस पर ऐसे आरोप लगेंगे यह तय है। ऐसे  में सरकार को इस संबंध में विपक्ष के साथ बैठ कर एक स्थायी नीति बनानी  चाहिये ताकि भविष्य मे ऐसे मामलों पर विराम लग सके। क्योंकि आज स्थिति यह  है कि भू- सुधार अधिनियम की धारा 118 की उल्लघंना दण्डनीय अपराध है। और  विधान सभा पटल पर सारा खुलासा आने से बड़ा कोई साक्ष्य नही हो सकता। इस  परिदृश्य में यह 97 मामले सरकार के लिये एक कड़ी परीक्षा सिद्ध होंगे यह तय है।

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