Thursday, 04 June 2026
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कब तक लिया जाता रहेगा विकास के नाम पर कर्ज


कैग रिपोर्टों के आईने में वित्तिय स्थिति

शिमला/शैल। इस समय प्रदेश का कर्जभार 60,000 करोड़ से ऊपर जा चुका है। इस कर्ज की किश्तें और ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लिया जा रहा है। वेत्तन और पैन्शन के बाद खर्च की तीसरी बड़ी मद कर्ज की किश्त और ब्याज है। सरकार विकास कार्यों के नाम पर कर्ज लेती है लेकिन सरकार का वित्तिय प्रबन्धन किस कदर गड़बड़ा चुका है इसका अनुमान सीएजी की रिपोर्ट की इस टिप्पणी से लगाया जा सकता है। जब विकास के नाम लिये गये कर्ज में से विकास पर खर्च करने के लिये कुछ भी शेष न बचे बल्कि स्थिति शून्य से भी नीचे की हो जाये तो उसका समग्रता से क्या प्रभाव पड़ेगा यह चिन्ता और चिन्तन के लिये एक बड़ा सवाल बन जाता है। प्रदेश का कर्जभार उसकी तय सीमाओं से आगे निकलता जा रहा है इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए केन्द्र के वित्तविभाग ने मार्च 2016 में ही प्रदेश सरकार को इसकी चेतावनी देते हुए कर्ज की सीमा तय कर दी थी। मार्च 2016 की इस चेतावनी के बाद ही नोटबन्दी का फैसला आया और उसके बाद जीएसटी का फैसला आया। इन फैसलों का अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा है यह हर आदमी जानता है।

इस परिदृश्य में जयराम सरकार ने प्रदेश की सत्ता संभाली तो उसे कोई मजबूत अर्थव्यवस्था विरासत में नही मिली। जयराम के पहले बजट भाषण का केन्द्रिय बिन्दु भी वित्तिय स्थिति का यही पक्ष रहा है। लेकिन जयराम सरकार इस स्थिति पर कोई श्वेतपत्रा प्रदेश की जनता के सामने नही रख पायी। क्योंकि जिन अधिकारियों के प्रबन्धन के कारण केन्द्र से चेतावनी मिल गयी थी उन्ही अधिकारियों के हाथों में यह प्रबन्ध फिर केन्द्रित रहा और सफल प्रबन्धन की एक ही कसौटी बन गयी कर्ज हासिल करना। वित्तिय प्रबन्धन पर सबसे प्रमाणिक रिपोर्ट होती है कैग की रिपोर्ट। लेकिन कैग रिपोर्टों को पढ़ने और उनका संज्ञान लेने का जोखिम न तो अफसरशाही ने उठाया न ही राजनीतिक नेतृत्व ने। इन रिपोर्टो को नज़रअन्दाज करने का परिणाम है कि सरकार को लगभग हर माह कर्ज लेना पड़ रहा है। परन्तु जब यह सवाल सामने आता है कि यह कर्ज का पैसा खर्च कहां किया जा रहा है? इससे आम आदमी को क्या राहत मिल रही है तब यह सामने आता है कि सारी उपभोक्ता सेवाओं के दाम बढ़ गये हैं। जब पैट्रोल, डीजल, रसोई गैस से लेकर बिजली, पानी, बस किराया, स्कूल में बच्चों की फीस आदि सबके दाम बढ़ गये हैं का कड़वा सच सामने आता है तब यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि कर्ज का बढ़ना और चीजों के दामो का बढ़ना कब तक चलता रहेगा। क्योंकि इसी बढ़ते कर्ज का परिणाम है कि स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं में अध्यापकों और डाक्टरों के पद उच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद भी नहीं भरे जा रहे हैं। यही नही हर नियुक्ति आऊट सोर्स के माध्यम से की जा रही है क्योंकि उसमें आऊट सोर्स के संचालक को कमीशन दिया जाना है। अब आऊट सोर्स को लेकर यहां तक चर्चाएं चल पड़ी है कि शायद कुछ मन्त्राीयों के परिजन भी अपरोक्ष में आऊट सोर्स के कारोबार में लग गये हैं। विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में आयी जानकारी से ऐसे संकेत उभरे हैं।
इस सबके साथ जब यह जानकारी भी सामने आती है कि आर्थिक तंगी के बावजूद सरकार ने एक वर्ष में 229 गाड़ियां खरीदी है और यह खरीद भी बैंगलूर की कंपनी किर्लोस्कर मोटर प्रा. लि. के माध्यम से की गयी है। राजभवन के लिये 70 लाख की गाड़ी और मंत्रीयों के लिये 31 लाख से 36 लाख की गाड़िया खरीदी गयी है सेवानिवृति के बाद पुनः नियुक्ति पाने पर यदि किसी कर्मचारी के आवास में रिपेयर के नाम पर नया कमरा जोड़ दिया जाये तो आम आदमी का यह सोचना एकदम जायज़ हो जाता है कि यदि कर्ज लेकर यही विकास होना है तब इस विकास की कोई आवश्यकता नही रह जाती है। क्योंकि जब वित्तिय प्रबन्धन एफआरवीएम अधिनियम के प्रावधानों की भी उल्लघंना की जायेगी तो ऐसे प्रबन्धन पर सवाल उठना स्वभाविक हो जाते है। सरकार का वित्तिय प्रबन्धन एफआरवीएम अधिनियम से संचालित और नियन्त्रित होता है। इसलिये अधिनियम की धारा दस के मुताबिक प्रबन्धन की कमीयों को लेकर संवद्ध अधिकारियों के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नही बनाया जा सकता है लेकिन इसी अधिनियम की धारा 7(2) के तहत यह भी जिम्मेदारी है Whenever there is a prospect of either shortfall in revenue or excess of expenditure over pre-specified levels for a given year on account of any new policy decision of the state Government that affects either the   State Government or its public sector undertakings, the State Government, prior to taking such policy decision, shall take  measure to fully offset the fiscal impact for the current and      future years by curtailing the sums authorized to be paid and applied from and out of the consolidated Fund of the State under any Act enacted  by  Legislative Assembly to provide for the appropriation of such sums, or by taking interim measure for revenue augmentation, or by taking up a combination of both.
लेकिन यह जिम्मेदारी निभाई नही जा रही है क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व शायद इस अधिनियम को स्वयं पढ़ता ही नही है और अधिकारियों के ही सहारे रहता है।
मार्च 2016 का केन्द्र का पत्र

 
31 मार्च 2019 की रिपोर्ट

2014-19 के दौरान, ब्याज और चुकौती करने के पश्चात्, भारत सरकार से प्राप्त आन्तरिक कर्ज  ऋण व अग्रिमों तथा अन्य दायित्वों के माध्यम से उपलब्ध शुद्ध नीधियों में ऋणात्मक 63 करोड़ तथा धनात्मक 2,201 करोड़ के मध्य की भिन्नता पायी गयी। 2018-19 के दौरान राज्य को उपलब्ध निवल ऋण ऋणात्मक 1,204 करोड़ था।  

Liabilities  of  the  Government  consist  mainly  of  internal  borrowings,  loans  and advances from GoI and balances in the Public Account.  The total liability of the State as on 31st March 2018 was  Rs.51,030 crore.

The overall fiscal liabilities of the State increased by 17,146 crore (51 per cent) from  Rs.33,884 crore  in 2013-14 to Rs.51,030crore  in 2017-18. Fiscal liabilities of the State comprised Consolidated Fund liabilities  and Public Account  liabilities. The Consolidated   Fund liability (Rs.34,671 crore) comprised market   loans (Rs.21,574 crore),  loans from GoI (Rs.1,079 crore) and other loans (12,018 crore, which includes Rs.6,635 crore on special security issued to NSSF of the GoI).

The Public Account liabilities(Rs.16,360 crore) comprises Small Savings   and Provident Funds (Rs.13,237 crore), interest   bearing obligations and non-interest bearing obligations like deposits (Rs.2,798 crore) and reserve funds (Rs.325 crore). The growth rate of   fiscal liabilities was 8.01 per cent during 2017-18. The   ratios of fiscal liabilities to  GSDP varied between 36 per cent and 38 per cent during 2013-18. During 2017-18 it  was 38 per cent and was  higher than the norms as recommended by 14thFC (32.99 per cent) and FRBM Act/MTFPS (32.92 per cent). These liabilities stood at  1.86 times the revenue  receipts and 5.39 times the own revenue resources at the end of 2017-18. The   buoyancy ratio of fiscal  liabilities to GSDP stood at 0.85 during 2017-18.

Transactions under Reserve fund and Deposits

Closing balance in the  Reserve Fund as on 31  March 2018 was Rs.325.02 crore (Credit). Out of this,     reserve fund bearing interest was Rs.8.48 crore (credit) and the share of the fund not bearing interest was Rs.316.54 crore (credit). In terms of the recommendations of the Twelfth Finance Commission, State   Governments were  required to create two significantreserve funds i.e. (i) Consolidated  Sinking Fund to be administered by the    Reserve Bank of India (RBI) for redemption of outstanding liabilities and    amortization of open market loans availed of by them and (ii) Guarantee  Redemption Fund  to meet the contingent liabilities arising from the  guarantees given. The position of these funds is depicted as  under:  

Consolidated Sinking Fund 

The State Government required to make minimum  annual contribution to the Fund at0.5 percent of the outstanding liabilities at the end of the previous financial year. The State   Government, however,  had not created a consolidated sinking fund. As on 31 March 2017, the outstanding liabilities  of the Government of  Himachal Pradesh were Rs.47,244 crore. Had  there been a   consolidated sinking fund, the liability of the State Government  towards the  fund would have been Rs.236.22 crore (0.5 percent of outstanding liabilities in  previous year) in 2017-18 indicating that the revenue surplus is overstated and fiscal deficit is understated to that extent.

क्या मुख्यमन्त्री को गुमराह किया जा रहा है या सलाहकारों को सही में जानकारी ही नही है

केन्द्रीय विश्वविद्यालय प्रकरण में

शिमला/शैल। केन्द्रिय विश्वविद्यालय के निर्माण में हो रही देरी पर जब केन्द्रिय वित्त राज्य मन्त्री हमीरपुर से लोकसभा सांसद अनुराग ठाकुर ने देहरा के डाडासिवा में एक जनसभा में मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर की मौजूदगी में चिन्ता जताई और इसके लिये प्रदेश के प्रशासनिक तन्त्र को जिम्मेदार ठहराते हुए इस तन्त्र पर पकड़ मजबूत करने का सुझाव दिया तो यह सारा मुद्दा एकदम सियासी रंग ले गया। मुख्यमन्त्री ने इसे सार्वजनिक मंच से उठाये जाने को पसन्द नही किया और यहां तक कह दिया कि शायद सांसद तकनीकी पेचीदगीयों को नही समझते हैं। मुख्यमन्त्री के बाद देहरा के निर्दलीय विधायक होशियार सिंह ने तो वाकायदा एक पत्रकार वार्ता करके इस पर कई सवाल कर दिये और वित्त मन्त्री से तुरन्त इसके लिये पैसे जारी करने को कहा ताकि इस पर शीघ्र कार्य शुरू किया जा सके। निर्दलीय विधायक के बाद तो राजस्व मन्त्री महेन्द्र सिंह ठाकुर ने एक प्रैस नोट जारी करके इस विश्वविद्यालय को लेकर हुए सारे पत्रचार का ब्योरा जारी करते हुए यह खुलासा भी प्रदेश की जनता के सामने रख दिया कि केन्द्रिय विश्वविद्यालय के अतिरिक्त तीस प्रोजैक्ट भी केन्द्र के पास अनुमोदन के लिये काफी अरसे से लंबित पड़े हुए हैं। इसी में महेन्द्र सिंह ने यह भी जोड़ दिया कि 2010-11 में प्रदेश से जो प्रस्ताव केन्द्र को भेजा गया था उसी में गलती हो गयी थी। स्मरणीय है प्रदेश में 2010-11 में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा की सरकार थी।
मेहन्द्र सिंह के प्रैस नोट के मुताबिक भारत सरकार ने केन्द्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के दो परिसर स्थापित करने के लिए स्वीकृति दी है, जिनमें तहसील धर्मशाला में उत्तरी परिसर जदरांगल और देहरा में दक्षिणी परिसर शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि दक्षिणी परिसर देहरा के निर्माण के लिए प्रदेश सरकार ने 34.55 हेक्टेयर सरकारी भूमि 2010 में ही केन्द्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के नाम स्थानांतरित कर दी थी, जिसका इंतकाल भी 2010 में हो गया था।
उन्होंने बताया कि इसके अलावा 81.79 हेक्टेयर वन भूमि को उपयोगकर्ता एजेंसी (यूजर एजेंसी) निदेशक उच्चतर शिक्षा, हिमाचल प्रदेश के नाम वन संरक्षण अधिनियम के तहत परिवर्तित (डाईवर्जन) करने की मंजूरी 11 दिसम्बर, 2018 को प्राप्त हुई थी, लेकिन इसमें यह शर्त लगाई गई थी कि जिस भूमि को परिवर्तित करने की मंजूरी प्रदान की गई है, वह किसी भी स्थिति में बिना केंद्र सरकार के अनुमोदन से किसी अन्य एजेंसी, विभाग या किसी अन्य व्यक्ति के नाम स्थानांतरित नहीं की जा सकती। ऐसी परिवर्तित वन भूमि की विधिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा।
इस मामले और कुछ अन्य मामलों को राजस्व विभाग के आग्रह पर वन विभाग ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार से आवश्यक स्पष्टीकरण के लिए 22 अप्रैल, 2019 को आग्रह किया था, कि क्या परिवर्तित वन भूमि को उपयोगकर्ता एजेंसी के नाम इंतकाल के माध्यम से स्थानांतरित किया जा सकता है या नहीं। राजस्व विभाग ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार से यह आग्रह भी किया था कि क्या परिवर्तित वन भूमि के कब्जे के लिए क्या कागजात माल (राजस्व अभिलेख) में इंद्राज किया जा सकता है या नहीं।
इस पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 30 जुलाई, 2019 को पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया था कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत जो वन भूमि परिवर्तित की जाती है, उसकी विधिक स्थिति वन भूमि ही रहेगी। ऐसी परिवर्तित भूमि इंतकाल के माध्यम से उपयोगकर्ता एजेंसी या उपयोगकर्ता विभाग के नाम कागजात माल में राजस्व विभाग द्वारा स्थानांतरित नहीं की जा सकती।
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार के स्पष्टीकरण के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के साथ-साथ अन्य 30 मामलों में अभी तक भी परिवर्तित वन भूमि का इंतकाल संबंधित उपयोगकर्ता एजेंसी के नाम नहीं दिया जा सका है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालय व अन्य सभी विकासात्मक परियोजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत कार्यवाही करते हुए मंजूरी के लिए आवश्यक कदम उठा रही है, किंतु वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के स्पष्टीकरण के दृष्टिगत केंद्रीय विश्वविद्यालय और कई अन्य महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं का काम शुरू करने में देरी हो रही है।
राजस्व मंत्री ने स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए वन भूमि को परिवर्तित करने में त्वरित कार्यवाही की है। इसके लिए आवश्यक अनुमोदन भी 11 दिसम्बर, 2018 को जारी कर दिया था तथा ग्रीन कवर प्लान के अंतर्गत पांच करोड़ 60 लाख रुपये भी नवम्बर, 2018 में कैम्पा हेड में जमा करवा दिए थे। यह राशि पहले जमा की गई राशि 17 करोड़ 27 लाख 53 हजार रुपये के अतिरिक्त थी।
सरकार के प्रैस वक्तव्य के अनुसार 11 दिसम्बर 2018 को वन भूमि को डाईवर्ट करने की अनुमति प्राप्त हो गयी थी। इस अनुमति के बाद कैंपा के तहत 5.60 करोड़ रूपये भी इसके लिये जमा करवा दिये गये थे। यहां यह सवाल उठता है कि जब दिसम्बर 2018 में ही यह वन भूमि हिमाचल उच्चतर शिक्षा विभाग को बतौर यूज़र ऐजैन्सी मिल गयी थी तब इसे केन्द्रिय विश्वविद्यालय के नाम बतौर यूज़र ऐजैन्सी बदलने में इतना समय क्यों लगा। जबकि एफ सी ए अधिनियम के चैप्टर पांच में एक यूज़र ऐजैन्सी से दूसरी यजूर ऐजैन्सी के नाम बदलने की प्रक्रिया का पूरा खुलासा किया गया है। इसके अनुसार उच्चतर शिक्षा निदेशालय की ओर से अपने एन ओ सी के साथ आवेदन जाना था। इस आवेदन के साथ एक लाख रूपये की फीस जमा होनी थी। यह प्रक्रिया पूरी करने में क्या प्रदेश सरकार को दो वर्ष का समय लगाना चाहिये? क्या सरकार को इस प्रक्रिया की जानकारी ही नही थी? क्या सरकार जानबूझ कर इस मामले को लटकाना चाहती थी? 2010-11 में जब इस आश्य का प्रस्ताव उच्चतर शिक्षा विभाग की ओर से भेजा गया था तो उसमें क्या गलत हो गया था? वन भूमि की मलकीयत नही बदलती है यह एक स्थापित नियम है और सरकार में इसे सभी जानते हैं। वन भूमि का उपयोग गैर वन कार्यों के लिये बदलने की भी एक स्थापित प्रक्रिया है। एक बार उपयोग बदलने की अनुमति मिलने के बाद उसकी यूज़र ऐजैन्सी बदलने की प्रक्रिया तो और भी सरल है। ऐसे में केन्द्रिय विश्वविद्यालय के इस मामले में इतना समय लगा दिया जाना निश्चित रूप से कई सवाल खड़े करता है। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह हो जाता है कि क्या मुख्यमन्त्री के सलाहकार जानबूझकर उन्हे गुमराह कर रहे हैं या सही में उन्हें नियमों /कानूनों की जानकारी ही नही है।

यह है यूज़र ऐजैन्सी बदलने की प्रक्रिया 

Transfer/Re-diversion

Any forest land diverted for a non-forest use with prior approval of GOl under FCA shall be used by the User Agency for the purpose for which it has been diverted.
However, transfer of user agency for same purpose, or re-diversion for another purpose by same or another user agency may be considered on following basis:
5.1 Transfer of User Agency:
The following procedure shall be followed:
(a) An application from the concerned State/Union Territory Government along with an undertaking from the new user agency shall be submitted.
(b) The undertaking shall state that the new user agency will abide by all conditions on which diversion of forest land was approved in favour of the previous user agency.
(c) Transfer of User Agency can be considered by the Central Government (MoEF&CC) for same use and on same conditions.
(d) The Central Government shall levy a transfer fee, to discourage middle men from processing applications and then selling it to other, @10% of NPV or Rs. 100,000 whichever is less.
(e) The transfer fee will not be applicable to change of UA associated with change in legal heir, and wind power generation projects involving of transfers
(f) However, in case the transfer is from a Central Government Department/Central Government Undertaking (CPSU) to a User Agency other than Central Government Department /CPSU, the proposal will be examined by the Central Government afresh, and transfer can be agreed to with additional conditions so as to ensure that special concessions given to Central Government Department/CPSU while granting the approval are not extended to the new User Agency
5.2 Change of the name of UA without any change in shareholding pattern
When change in the name of user agency without any change in its shareholding pattern becomes necessary, permission of the Central Government would be required. The State Govt., shall submit following documents within three months:
(a) no-objection certificate for such change by the State Government.
(b) A certified copy of fresh certificate of incorporation consequent upon change of name issued by the Registrar of Companies
(c) An explanatory statement from the user agency for such change.
Similarly, when change in the name of user agency due to inheritance (change in legal heirs) becomes necessary, permission of the Central Government would be required. For this purpose, the State Government, within three months from the date of issue of legal heir certificate shall submit documents as specified in para (b) and (c) above.
a. Transfer of leases - Wind Energy projects
For transfer of leases from the developer i.e. the User Agency to investors /power producers, State Government shall submit following details:
1. User Agency shall submit duly filled up prescribed form given at Annexure-3 to the Nodal Officer (FC) of the concerned State/UT.
2. A copy of the application will also be marked to the MoEF&CC.
3. The Nodal Officer will examine the particulars furnished by the UA in 45 days of the date of subm ission of the application and forward it to the State/UT Government.
4. The State/UT Government, or an Officer authorized by will forward its
recommendation within 45 days to the Central Government. If decision is not
communicated by the State/UT Government on the proposal within the expiry of a period of 90 days i.e. from the date of submission of the proposal, action, as considered appropriate will be initiated by the Central Government.

सरकार और संगठन के लिये आसान नही होगा आने वाला समय

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश भाजपा के प्रभारी और सह प्रभारी दोनों बदल दिये गये हैं। हिमाचल ही नही बल्कि अन्य राज्यों के प्रभारी भी बदले गये हैं। इस नाते हिमाचल के संद्धर्भ में इस बदलाव को अलग से देखने आंकने की कोई ज्यादा आवश्यकता नही बनती है। लेकिन प्रदेेश भाजपा के अन्दर जो कुछ पिछले कुछ असरे से घट रहा है उस परिदृश्य में यह बदलाव महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि हाईकमान सबसे पहले और सबसे ज्यादा अधिमान राज्य के बारे में प्रभारी की रिपोर्ट को ही देता है। कई बार प्रभारी हाईकमान के सामने बहुत सारी चीजों को आने ही नही देते हैं क्योंकि वह ज्यादातर सरकार से प्रभावित रहते हैं। सरकार के कारण बहुत सारे कार्यकर्ता तो प्रभारी तक पहुुच ही नही पाते है। प्रभारी सभी कार्यकर्ताओं को जान ही नही पाते हैं। भाजपा के पिछले प्रभारी मंगल पंाडे की इस संद्धर्भ में बहुत सारी स्वभाविक सीमाएं रही हैं क्योंकि वह स्वयं बिहार के रहने वाले थे इस नाते हिमाचल के सभी लोगों को समझना-जानना उनके लिये संभव था ही नही। फिर वह प्रभारी के साथ-साथ बिहार में मन्त्री भी थे। इस परिप्रेक्ष में अब जो प्रभारी अविनाश राय खन्ना लगाये गये हैं वह हिमाचल के बारे में सारी जानकारी रखते हैं क्योंकि पंजाब से ताल्लुक रखते हैं। गडशंकर एकदम ऊना से लगा क्षेत्र है। 1966 तक तो आज का आधा हिमाचल पंजाब ही था। इस कारण खन्ना एक ऐसे प्रभारी सिद्ध होंगे जो राज्य सरकार की फीडबैक पर निर्भर नही करेंगे। यही स्थिति सह प्रभारी टण्डन की है क्योंकि वह चण्डीगढ से हैं। इस परिप्रेक्ष में यह बदलाव महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेताओं शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को प्रभारी और सह प्रभारी बहुत अरसे से व्यक्तिगत स्तर पर जानते है। संभवतः इसी कारण से भाजपा के भीतर इन नियुक्तियोें के बाद एक हलचल शुरू हो गयी है। कई कयास लगने शुरू हो गये हैं इस हलचल का आधार यह माना जा रहा है कि जब प्रभारियों की नियुक्तियों को दिल्ली में अन्तिम रूप दिया जा रहा था उस समय केन्द्रिय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर प्रदेश के दौरे पर थे। उन्हंे यह दौरा बीच में ही छोड़कर दिल्ली बुला लिया गया। उनके कार्यक्रमों को यहां पर संासद किश्न कपूर ने पूरा किया। अनुराग के दिल्ली वापिस जाने के बाद प्रभारियों का यह फैसला आया और उसके बाद उन्हंे जम्मू कश्मीर के निकाय चुनावों के लिये प्रभारी भी नियुक्त कर दिया गया। आने वाले दिनों में केन्द्रिय मन्त्रीमण्डल में भी फेरबदल होने जा रहा है। इस फेरबदल में अनुराग के प्रभावित होने की भी अटकले हैं हिमाचल में सरकार को तीन वर्ष हो गये है। हिमाचल में हर चुनाव में सरकार बदल जाती है यह इतिहास रहा है। इस बार सरकार लम्बे अरसे से विवादों में चल रही है यह विवाद भी अपने ही लोगों के कारण रहे हैं। सरकार और उसके मन्त्रीयों की कारगुजारियों को लेकर कई गुमनाम पत्र अपने ही कार्यकर्ता लिख चुके हैं। एक पत्र पर हुई हलचल का परिणाम है अपने ही पूर्व मन्त्री के खिलाफ एफआईआर बाद में इसी प्रंसग में निदेशक स्वास्थ के खिलाफ मामला बना और गिरफ्तारी हुई। स्वास्थ्य मन्त्री बदला, विधानसभा अध्यक्ष बदला और फिर पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी गयी। संगठन में नये अध्यक्ष के आने के बाद कई स्थानों पर संगठन की ईकाईयों में फेरबदल हुआ। सरवीण चैधरी, रमेश धवाला, पवन राणा, राजीव बिन्दल, महेन्द्र सिंह और नरेन्द्र बरागटा सबके सब अपने-अपने में मुद्दा बने हुए हंै। सोलन में पार्टी कार्यालय के लिये ली गयी ज़मीन में जो घपला हुआ है उससे यह सन्देश गया है कि जो पार्टी अपने ही घर में घपला कर सकती है वह अन्य जगहों पर क्या कुछ करती होगी। स्वभाविक है कि जिस सरकार के साये तले इतना सब कुछ घट जाये उसके सत्ता मेें वापसी करने को लेकर सोचना भी दूर की बात हो जाती है। सरकार किन लोगों के प्रभाव में काम कर रही है यह अब एक सामान्य जन चर्चा बन चुकी है लेकिन शायद पार्टी हाईकमान ही इस जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ रही है।
संभव है कि पूर्व प्रभारी हिमाचल का आकलन भी बिहार के आईने से ही करते रहे हैं इसीलिये इस सब पर ध्यान नही दिया गया। माना जा रहा है कि नये प्रभारी इस सब कुछ को तुरन्त प्रभाव से हाईकमान के संज्ञान में लायंेगे। क्योंकि हिमाचल के सन्द्धर्भ में यह जो कुछ घट चुका है बहुत मायने रखता है। अब तो अदालत तक ने सात विभागों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने की अनुशंसा कर दी है। इसी के साथ प्रदेश लोक सेवा आयोग में नयी नियुक्तियों से पहले नये नियम बनाने और प्रक्रिया तय करने का मामला भी इस सरकार के लिये एक परीक्षा से कम नही होने वाला है हर आदमी की निगाहें इस ओर लगी हुई हैं।

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