Thursday, 04 June 2026
Blue Red Green
Home देश

ShareThis for Joomla!

क्या प्रदेश कांग्रेस संगठन में भी बदलाव आयेगा

शिमला/शैल। कांग्रेस हाईकमान को जब पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पत्र लिखकर यह मांग की थी कि संगठन में पदाधिकारियों का चयन मनोेनयन से नही बल्कि चुनाव से होना चाहिये तब उस पत्र पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं पार्टी के भीतर और बाहर भी उभरी थीं। इस पत्र के सार्वजनिक होते ही पूर्व मन्त्रीे और प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रहे ठाकुर कौल सिंह ने अपना स्पष्टीकरण जारी करके कहा था कि उन्हेे यह बताया गया था कि यह पत्र पार्टीे में सदस्यता अभियान को लेकर लिखा जा रहा है। हिमाचल से इस पत्र पर हस्ताक्षर करनेे वाले दो ही नेता थे कौल सिंह और आनन्द शर्मा। कौल सिंह ने तो स्पष्टीकरण जारी करकेे अपनीे स्थिति स्पष्ट कर दी थी लेकिन आनन्द शर्मा की ओर सेे ऐसा कुछ भी सामनेे नही आया। परन्तु आनन्द शर्मा के खिलाफ पार्टी केे भीतर रोष बनने लगा और यह उपाध्यक्ष खाची के ब्यान के माध्यम से बाहर भी आ गया। खाची ने सीधेे शब्दो में आनन्द शर्मा सेे यह पत्र लिखने के लिये क्षमा मांगने की मांग कर दी। संयोगवश खाची के ब्यान के बाद ही पार्टी में राष्टीय स्तर पर कई पदाधिकारियों को बदला गया। इस बदलाव से आनन्द शर्मा और गुलाम नवी जैसे नेता भी प्रभावित हुए। इसी बदलाव में हिमाचल की प्रभारी रजनी पाटिल को भी बदल दिया गया। चर्चा है कि रजनी पाटिल को हिमाचल का प्रभार आनन्द शर्मा के आर्शीवाद से ही मिला था। हिमाचल कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष कुलदीप राठौर भी आनन्द शर्मा के आर्शीवाद से ही इस पद पर पहंुचेे हैं यह सब जानते हैं। भले इस विवादित पत्र के बाद राठौर और आनन्द में नीतिगत असहमति उभरी हो। लेकिन आनन्द शर्मा के ही कारण राठौर को यह पद मिला है क्योंकि यह आनन्द ही थे जिन्होने इसके लिये वीरभद्र, आशा कुमारी और मुकेश अग्निहोत्री को सहमत कर लिया था। अब क्योंकि रजनी पाटिल की जगह यह प्रभार राजीव शुक्ला को मिल गया है इसलिये यह उम्मीद की जा रही है कि कुलदीप राठौर को कोई और जिम्मेदारी देकर प्रदेश को नया अध्यक्ष दिया जायेगा। राजीव शुक्ला पहले भी प्रदेश का कार्यभार संभाल चुके हैं इस नाते वह सारे वरिष्ठ नेताओं को पहले से ही जानते हैं। इसलिये उन्हे कोई बड़ी कठिनाई नही आयेगी यह माना जा रहा है।
कुलदीप राठौर ने जब सुक्खु की विरासत संभाली थी तब उन्होने संगठन के पदाधिकारियों को बदलने की बजाये लगभग उतने ही नये पदाधिकारी उसमें और जोड़ दिये। लेकिन इस तरह कार्यकारिणी का लम्बा चैड़ा विस्तार भी चुनावांे में पार्टी को कोई लाभ नही दे पाया। क्योंकि वरिष्ठ नेता ही संभावित उम्मीदवारों को लेकर इतनी हल्की प्रतिक्रियाएं देते रहे कि उससे पार्टी की चुनावी गंभीरता ही नही बन पायी। जब पार्टी के वरिष्ठ नेता ही उम्मीदवार को मकरझण्डू की संज्ञा देंगे और ऐसे ब्यान पर पार्टी अध्यक्ष और प्रभारी दोनांे खामोश रहेंगे तो राजनीति की थोड़ी सी समझ रखने वाला अन्दाजा लगा सकता है कि इसका अर्थ क्या है। इस तरह लोकसभा चुनावों मेें जो वातावरण बना उससे विधानसभा के उपचुनावों में भी पार्टीे उभर नही पायी और अध्यक्ष के सारे आकलन और दावे फेल हो गये।
आज केन्द्र में जिस तरह से सरकार नयी नौकरीयों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया है उससे पूरे युवा वर्ग में असन्तोष है। इसी असन्तोष के चलते प्रधानमंत्री के जन्मदिन को बेरोजगार दिवस के रूप में मनाया गया। लेकिन यह आयोजन केवल एक दिन का कार्यक्रम होकर ही रह गया है। जबकि इसको प्रदेश भर में हर रोज ताजा रखने की जरूरत है लेकिन ऐसा हो नही रहा है। इसी तरह आज कृषि विधेयकों को लेकर किसान सड़कों पर हैं। इन विधेयकों से आने वाले दिनो में हर रशोई प्रभावित होगी। लेकिन इस रोष को भी जनता तक ले जाने के लिये कोई कार्यक्रम पार्टी की ओर से सामने नही आ पाया है। पार्टी को यह लाईन देना अध्यक्ष का काम है। लेकिन वर्तमान में स्थिति यह बन चुकी है कि हर विषय पर अध्यक्ष को स्वंय ही मीडिया के सामने आना पड़ रहा है। अध्यक्ष और प्रवक्ता दोनों की जिम्मेदारी स्वंय को निभानी पड़ रही है। यही इस समय की अध्यक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जा रही है। ऐसा लग रहा है कि पार्टी के बड़े नेताओं से अपेक्षित सहयोग नही मिल रहा है। जब आवश्यकता हर रोज सरकार के खिलाफ आक्रमकता बढ़ाने की है इस परिदृश्य में यह माना जा रहा है कि पार्टी को सरकार खिलाफ लड़ाई के लिये तैयार करने हेतु संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करने होंगे।

केन्द्र सरकार ने खर्चे कम करने के लिये नौकरीयों पर लगाया प्रतिबन्ध क्या जयराम सरकार भी ऐसा करेगी

शिमला/शैल। देश की आर्थिक स्थिति किस कदर बिगड़ चुकी है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जीडीपी शून्य से भी 24% नीचे चली गयी है। एक समय जनता को जो विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का सपना परोसा गया था वह अब टूट गया है। सारे सरकारी उपक्रमों को निजिक्षेत्र के हवाले किया जा रहा है। इसी निजिकरण के परिणाम स्वरूप रेल, एयरपोर्ट, बन्दरगाह और सौर ऊर्जा पर अदानी का कब्जा बढ़ता जा रहा है। पैट्रोल, डीजल, रसोई गैस और दूरसंचार व्यवस्था पर अंबानी का अधिपत्य है। ऐसे कई और घराने हैं जो नीजिकरण की नीति के परिणाम स्वरूप मालामाल होने जा रहे हैं। राष्ट्रीय बैंको को नीजिक्षेत्र के हवाले किये जाने का फैसला कभी भी सुनने को मिल सकता है। करोड़ों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। मनरेगा मे मिलने वाला 120 दिन का रोज़गार अब 90 दिन का ही रह गया है।
केन्द्र सरकार राज्यों को जीएसटी का हिस्सा देने में असमर्थता व्यक्त कर चुकी है। हिमाचल को दिये गये 69 राष्ट्रीय राज मार्गों का किस्सा खत्म होने के बाद पहले से चल रहे मटौर-शिमला मार्ग से भी केन्द्र ने अपने हाथ पीछे खींच लिये हैं। राष्ट्रीय उच्च मार्ग अभिकरण ने इस आश्य का पत्र प्रदेश सरकार को भेज दिया है। केन्द्र की आर्थिक स्थिति कितनी कमजोर हो गयी है इसका प्रभाव अब नयी नौकरियों पर लगाये गये प्रतिबन्ध से सामने आ गया है। केन्द्र के वित्त मंत्रालय ने खर्चे कम करने के लिये सारे मन्त्रालयों/विभागों और अन्य संस्थानों पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया है कि कोई भी नया पद सृजित नही किया जायेगा न ही कोई पद भरा जायेगा। एक जुलाई के बाद से आये ऐसे सारे आवेदन रद्द समझे जायेंगे। वित्त मन्त्रालय ने यह आदेश 4 सितम्बर को जारी किया है। इससे पहले 2 सितम्बर को जारी एक आदेश में नये वर्ष के उपलक्ष्य में छपने वाले सारे सरकारी कलैण्डरों/डायरीयों आादि के मुद्रण पर भी पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। इसके लिये डिजिटल होने का तर्क दिया गया है। केन्द्र के इन आदेशों / निर्देशों से यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या राज्य सरकार भी इन आदेशों की अनुपालना करेगी या नहीं। केन्द्र के यह आदेश पहली जुलाई से लागू हो गये हैं। इनके मुताबिक सारे अवांच्छित खर्चों पर रोक लगा दी गयी है। लेकिन प्रदेश में तो पहली जुलाई के बाद ही मन्त्रीमण्डल का विस्तार करके तीन नये मन्त्री बनाये गये हैं। कई नेताओं की ताजपोशीयां हुई हैं। हर माह मन्त्रीमण्डल की बैठकों में नये पदों की भर्तीयों की घोषणाएं हुई हैं कई आवदेन आये हैं। मुख्यमन्त्री प्रदेश के कई भागों में जाकर लोगों को करोड़ों की घोषणाएं दे आये है। केन्द्र के इन आदेशों से स्पष्ट हो जाता है कि निकट भविष्य में यह संभव नही हो पायेगा कि केन्द्र से राज्य को कोई आर्थिक सहयोग मिल पायेगा। ऐसे में प्रदेश सरकार के पास अपनी घोषणाओं और आश्वासनों को पूरा करने के लिये कर्ज लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नही रह जायेगा फिर कर्ज के लिये भी जीडीपी का शून्य से नीचे जाना एक बड़ा संकट होगा। इस परिदृश्य यह बड़ा सवाल होगा कि जयराम सरकार केन्द्र के इन कदमों के बाद प्रदेश में क्या फैसला लेती है।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कोरोना पर चर्चा में विपक्ष और सत्तापक्ष की जीत में जनता की फिर हार

शिमला/शैल। विधानसभा का मानसून सत्र सात तारीख से शुरू हुआ और पहले ही दिन इसमें स्थगन प्रस्ताव के माध्यम से चर्चा हुई। छः घन्टे पच्चीस मिनट चली इस चर्चा में सदन के 28 सदस्यों ने भाग लिया। यह चर्चा नियम 67 के तहत हुई और क्यांेकि इस सदन के इतिहास में स्थगन प्रस्ताव पर पहली बार चर्चा हुई इसलिये विपक्ष ने इसे अपनी बड़ी सफलता करार दिया है। नियम 67 के तहत विपक्ष इसके विषय का नोटिस एक घन्टा पहले तक भी दे सकता है यह इसमें प्रावधान है क्योंकि इस नियम के तहत लाये गये विषय पर शेष सारे विषयों को रोककर  चर्चा की जाती है। इसमें यह धारणा रहती है कि जो विषय चर्चा के लिये लाया जाये उस पर सरकार पूरी तरह असफल हो चुकी है। इसी धारणा के कारण इसे काम रोको प्रस्ताव भी कहा जाता है। कोई भी सरकार किसी भी विषय पर अपने खिलाफ फेल होने का तमगा नही लेना चाहती है इसलिये सामान्यतः ऐसे प्रस्ताव का सत्तापक्ष पूरी ताकत से विरोध करता है और अध्यक्ष ऐसे प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। विपक्ष प्रस्ताव लाया और सत्तापक्ष इस पर चर्चा के लिये तैयार हो गया। सत्तापक्ष की सहमति से यह संदेश गया कि जहां विपक्ष कोरोना को प्रमुख मुद्दा मान रहा था तो सत्ता पक्ष भी उसे उतना ही गंभीर मानते हुए इस पर हर समय चर्चा के लिये तैयार था। इस तरह विपक्ष और सत्तापक्ष दोनो इसे अपने-अपने गणित से अपनी-अपनी सफलता करार दे रहे हैं।
इस परिदृश्य में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि जिस जनता के नाम पर यह चर्चा दो दिन चली उसे चर्चा के बाद क्या हासिल हुआ। कोरोना को लेकर 24 मार्च को पूरे देश में लाकडाऊन कर दिया गया था। लोगों को घरों से बाहर निकलने पर पाबन्दी लगा दी गयी थी उस समय देशभर में कोरोना के केवल 500 मामले थे। हिमाचल में एक भी नही था। 24 मार्च को विधानसभा बजट सत्र चल रहा था जिसे लाकडाऊन के कारण तय समय से पहले ही समाप्त कर दिया गया था। अब जब मानसून सत्र में इस पर चर्चा हो रही है तब हिमाचल प्रदेश में इसके मामले दस हजार का आंकडा़ छूने वाले हैं। स्वास्थ्य मन्त्री और मुख्यमन्त्री ने माना है कि यह सामुदायिक प्रसार का शुरूआती स्टेज़ है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले समय में इसके आंकड़े और बढ़ेंगे। इस वस्तुस्थिति में प्रदेश का आम आदमी क्या करे इसको लेकर सदन की चर्चा में कुछ भी ठोस निकल कर सामने नही आया है। इस दौरान जो एसओपी जारी किये गये हैं वह कितने व्यवहारिक और अन्तः विरोधी हैं इस पर कोई चर्चा नही हो सकी है।
अब शैक्षणिक और धार्मिक स्थल खोले जा रहे हैं। स्कूलों में छात्रों के आने के लिये अभिभावकों की सहमति होना अनिवार्य है। जब कोरोना के मामले हर रोज़ बढ़ रहे हैं तब क्या ऐसी स्थिति में अभिभावक भय के वातावरण से बाहर आ पायेंगे? बच्चों को स्कूल भेजने का साहस कर पायेंगे? आम आदमी को इस भय की मानसिकता से कैसे बाहर लाया जाये इस पर कोई चर्चा नही हुई। धार्मिक स्थलों में 65 वर्षों से ऊपर के व्यक्ति को जाने की मनाही है। क्या दफ्तर जाने वाला और कारोबारी मन्दिर जाने का समय निकाल पाता है चर्च जैसे धार्मिक स्थलों में सामुहिक प्रार्थना का चलन हैं क्या वह जारी हुए एसओपी के मुताबिक इन स्थलों को खोल पायेंगे। ऐसे दर्जनो विरोधाभास है जिन पर चर्चा आवश्यक थी लेकिन ऐया नहीं हो पाया। क्या यह आम आदमी की हार नही है। कोरोना  पर केन्द्र से लेकर राज्यों तक का हर आकलन गलत साबित हुआ है और इसी के कारण से अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गयी है। जीडीपी शून्य से नीचे चली गयी है। केन्द्र ने राज्य को जीएसटी का हिस्सा देने में असमर्थता जाहिर कर दी है। केन्द्रिय योजनाओं के वित्त पोषण से केन्द्र पीछे हट रहा है। प्रदेश के लाखों लोगों का रोज़गार प्रभावित हुआ है। मनरेगा मे जो 120 दिन का रोज़गार मिलता था वह भी 90 दिन कर दिया गया है। हर आदमी की आय प्रभावित हुई है। लेकिन सरकार ने इस गंभीरता को नजरअन्दाज करते हुए आम आदमी पर मंहगाई का बोझ डाल दिया है संकट के इस काल में राशन के दाम बढ़ गये। चीनी, नमक, दालें सबके दाम बढ़ गये हैं। बीपीएल और एपीएल में राशन की सब्सिडी के लिये भेद कर दिया और कई वर्गों को इससे बाहर कर दिया गया है। बिजली के दाम और बसों का किराया इस संकटकाल में बढ़ा दिया गया। जब मुख्यमन्त्री जनता में यह कह रहे हैं कि उनके पास 12000 करोड़ अनस्पैंट पड़ा हुआ है तो फिर संकट के इस दौर में यह सारे खर्च क्यों बढ़ा दिये गये? सरकार अपने खर्चे कम करने की बजाये कब तक प्रदेश पर कर्ज का बोझ बढ़ाती जायेगी। जब यह सरकार कोरोना में कुप्रबन्धन के आरोपों से इन्कार कर रही है तब क्या उसे यह सारे बढ़े हुए दाम वापिस लेने की घोषणा सदन के पटल पर नही करनी चाहिये थी। लेकिन ऐसा हुआ नही है। अब यह देखना बाकि है कि विपक्ष सदन के बाहर इन मुद्दों को जनता तक कैसे और कब ले जाता है। यदि ऐसा नही हो पाता तो निश्चित रूप से विपक्ष और पक्ष के इस खेल में जनता लगातार हारती रहेगी। यही नहीं जब कोरोना के लिये भारत सरकार से 17,46,99,727 रूपये के वैंटिलेटरज़ निशुल्क उपलब्ध करवाये गये हैं और इस पर प्रदेश सरकार का कुछ भी खर्च नही हुआ है तब प्रदेश की जनता पर बोझ डालने का क्या औचित्य है।

More Articles...

  1. प्रदेश के तीस मानवाधिकार संगठनों ने दी आवाज हम अगर नहीं उठे तो...
  2. पत्र प्रकरण पर आनन्द शर्मा माफी मांगे उपाध्यक्ष खाची के ब्यान से गरमायी कांग्रेस की सियासत
  3. जज पर आरोप लगाने का मामला पहुंचा उच्च न्यायालय
  4. घातक होगा भ्रष्टाचार के मामलों में दोहरे मापदण्ड अपनाना तीनों अधिकारियों के मामलों में बेचने वाले भूमि हीन हो गये हैं भूमिहीन होने के कारण ही अनुराग- अरूण मामले में विजिलैन्स की कैन्सेलेशन रिपोर्ट अस्वीकार हो चुकी हैं
  5. क्या केन्द्र के निर्देशों की उल्लंघना पर राज्य सरकारों को दंडित किया जायेगा
  6. क्या 118 की इन अनुमतियों को रद्द कर पायेगी सरकार
  7. क्या तीसरे दल प्रदेश में स्थान बना पायेंगे
  8. अनुराग ठाकुर और अरूण धूमल के ज़मीन खरीद मामले में अदालत ने लौटाई विजिलैन्स की कैन्सेलेशन रिपोर्ट
  9. कांगड़ा-धर्मशाला क्षेत्र में भू माफिया सक्रिय मनकोटिया ने लिखा पत्र
  10. बाॅस फार्मा उद्योग प्रकरण में प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की नीयत और नीति पर उठे सवाल भारत सरकार प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग और स्वयं अपने ही अनुमति पत्रों को नही मान रहा
  11. चुनौती पूर्ण होगा सुरेश कश्यप को यह विरासत संभालना
  12. प्रदेश कांग्रेस के धरने में नही आ पाये सारे विधायक
  13. अपंगता प्रमाणपत्रों का उच्च न्यायालय ने लिया कड़ा संज्ञान बंद हो यह कारनामा सरकार को दिये आदेश
  14. कोरोना के चलते छः माह के लिये चुनाव टाल दिये जायें हिमाचल से भी उठी मांग
  15. छात्रवृति घाटोले की जांच में सीबीआई की कार्यशैली भी सवालो में
  16. वित्त विभाग ने सरकार के खर्चों पर चलाई कैंची बजट का 20% से अधिक नही खर्च कर पायेंगे विभाग
  17. प्रधानमन्त्री चीन की कम्पनीयों से पैसा ले रहे हैं और चीन की सेना भारत में घुसपैठ कर रही हैः सिंघवी
  18. जब सरकार 12000 करोड़ खर्च ही नहीं कर पायी है तो उसे कर्ज लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी
  19. क्या भाजपा की यह ज्वाला किसी बलि के बिना ही शान्त हो पायेगी
  20. दूरगामी होंगे वेन्टिलेटर खरीद की जांच के आदेश

Subcategories

  • लीगल
  • सोशल मूवमेंट
  • आपदा
  • पोलिटिकल

    The Joomla! content management system lets you create webpages of various types using extensions. There are 5 basic types of extensions: components, modules, templates, languages, and plugins. Your website includes the extensions you need to create a basic website in English, but thousands of additional extensions of all types are available. The Joomla! Extensions Directory is the largest directory of Joomla! extensions.

  • शिक्षा

    We search the whole countryside for the best fruit growers.

    You can let each supplier have a page that he or she can edit. To see this in action you will need to create a users who is in the suppliers group.  
    Create one page in the growers category for that user and make that supplier the author of the page.  That user will be able to edit his or her page.

    This illustrates the use of the Edit Own permission.

  • पर्यावरण

Facebook



  Search