Saturday, 17 January 2026
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सरकारी ज़मीन कब्जाने को लेकर मनोनीत पार्षद संजीव सूद के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर

नगर निगम से लेकर सरकार तक सबकी कार्यप्रणाली सवालों में

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला में यहां के भराड़ी एरिया से एक संजीव सूद को प्रदेश सरकार ने 2020 में पार्षद मनोनीत किया था। मनोनयन होने के बाद पद की शपथ लेने से पहले निदेशक शहरी विकास विभाग के पास अपनी पात्रता को लेकर वाकायदा एक शपथपत्र भी दायर किया। शपथ पत्र में दावा किया गया है कि उसके खिलाफ कहीं पर भी कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है। जबकि दो बार 28.2.2020 और 30.3.2020 को सरकारी जमीन अवैध रूप से कब्जाने को लेकर शिकायतें संवद्ध अधिकारियों के पास गयी हुई थी और लंबित थी। शिकायतकर्ता राकेश कुमार ने 26-5-2020 को इसकी सूचना निदेशक शहरी विकास को भी दे दी और आरोप लगाया कि संजीव सूद ने जो शपथ पत्र उनके पास दायर कर रखा है वह गलत है।
नगर निगम शिमला के पार्षदों को पद और गोपनीयता की शपथ निदेशक शहरी विकास दिलाता है। इस नाते जब किसी भी पार्षद को लेकर ऐसी कोई शिकायत उनके पास आ जाती है तब उसकी जांच करवाने के लिये पार्षद के खिलाफ मामला दर्ज करवाना और अन्य कदम उठाना निदेशक की जिम्मेदारी हो जाती है ऐसा नियमों में प्रावधान हैं लेकिन निदेशक ने ऐसा नहीं किया। मुख्यमन्त्री कार्यालय तक भी शिकायतें गयी लेकिन कोई कारवाई नही हुई। अन्ततः राकेश कुमार ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और अदालत ने इसकी प्रारम्भिक जांच किये जाने के निर्देश दिये। इन निर्देशों के बाद यह जांच हुई और इसकी रिपोर्ट अदालत में गयी। अदालत ने इस रिपोर्ट को देखने के बाद एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिये और अब पुलिस चौकी लक्कड़ बाज़ार शिमला में आपराधिक मामला दर्ज हो गया है।
इस प्रकरण में यह सवाल उभरता है कि जब यह मनोनयन हुआ तब अवैध रूप से सरकारी जमीन कब्जाने का मामला नगर निगम शिमला के ही जेई की रिपोर्ट के माध्यम से नगर निगम शिमला के संज्ञान में था। बल्कि जेई की रिपोर्ट के आधार पर ही राकेश कुमार ने इस संबंध में शिकायत की है। इसलिये यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह मामला सबके संज्ञान में होने के बाद भी नगर निगम के लिये मनोनयन हो जाता है। मनोययन के बाद निदेशक शहरी विकास के पास शपथपत्र झूठा होने की शिकायत आ जाती है। यह शिकायत आने के बाद निदेशक की सीआरपीसी धारा 200 के तहत यह जिम्मेदारी हो जाती है कि वह इसमें मामला दर्ज करवाकर जांच करवाते। लेकिन निदेशक भी ऐसा नहीं करता है। स्वभाविक है कि सभी पर राजनीतिक दबाव रहा होेगा। इस तरह स्थितियां होने के बाद भी जब सरकार सुशासन होने का दावा करे तो यही मानना पड़ेगा कि अब भ्रष्टाचार की परिभाषा बदल गयी है।

क्या 2009 से 2019 तक नगर निगम शिमला के शीर्ष प्रशासन और हाऊस तक सभी गैर जिम्मेदार थे

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के काम को सुचारू और प्रभावी बनाने के लिये निगम में सैहब सोसायटी का गठन किया गया था। सोसायटी का पंजीकरण 12 फरवरी 2019 को हुआ था। सोसायटी को कूडा गारबेज कलैक्शन के साथ ही पयार्वरण संरक्षण, हैरिटेज संरक्षण और शिमला के सौंदर्यकरण की भी जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। इस काम को अंजाम देने के लिये कर्मचारियों के अतिरिक्त सुपरवाईज़र और कोओडिनेटर भी लगाये गये थे। बाद में सोसायटी की सहायता के लिये एक सेवानिवृत उप सचिव एम एल शर्मा की सेवाएं भी ली गयी जो आज तक चल रही है। एम एल शर्मा को बतौर कन्सलटैन्ट 1-9-2018 को एक वर्ष के लिये रखा गया था। एम एल शर्मा के काम से प्रभावित होकर उनकी सेवाओं को 31-7-2021 तक विस्तार दे दिया गया है। इस विस्तार का आधार शर्मा की कार्य कुशलता बनी है। शर्मा के प्रयासों से ही नगर निगम सरकार के विभागों से कूडा उठाने की एवज में 6 करोड़ प्रतिवर्ष सरकार से ले पायी है इसे निगम ने अपने रिकार्ड में दर्ज किया है।
शर्मा की सेवाएं सैहब सोसायटी 2018 से ले रही है। 2019 में जब उन्हें कार्य विस्तार देने का प्रस्ताव सैहब की ओर से आया तब उसमें एक माह के लिये विस्तार देने का प्रस्ताव था। जिसे बाद में लिखने में गलती लग जाने के नाम पर एक वर्ष किया गया अब इसे 2021 तक कर दिया गया। शर्मा को सैहब के काम के लिये ही कन्सलटैन्ट नियुक्त किया गया है और उनके काम की भी प्रशंसा की गयी है। लेकिन निगम हाऊस की 10वीं साधारण बैठक में 31-1-2020 को जो प्रस्ताव लाया गया था उसमें यह कहा है कि जब से सहैब सोसायटी का गठन हुआ है तब से लेकर अब तक इसमें नियुक्त हुए सुपर वाईज़रों और कोआडिनेटरों को उनके कार्यो का निर्धारण ही नहीं किया गया था जो अब शर्मा ने किया है। नगर निगम में यह प्रस्ताव 31-1-20 को लाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि सैहब और नगर निगम मे जो भी शीर्ष प्रशासन और हाऊस रहा है वह सब लोग इतने गैर जिम्मेदार थे कि उन्हें यही पता नहीं लगा कि सोसायटी के निगरान स्टाफ को ग्याहर वर्षों से कार्यों और जिम्मेदारीयों का आंवटन ही नहीं हो पाया है। इस प्रस्ताव से यह भी सामने आता है कि शर्मा को भी यह समझने में एक वर्ष से भी अधिक का समय लग गया है। इसी प्रस्ताव के अन्त में कृत्यकारक समिति का प्रस्ताव भी दर्ज है जिसमें शर्मा को छः माह का विस्तार देने की बात रिकार्ड पर है।
नगर निगम के इन प्रस्तावों के परिप्रेक्ष में भीतरी सूत्रों का यह कहना है कि शर्मा को विस्तार देने के लिये ही इस तरह की भूमिका तैयार की गयी है। सैहब सोसायटी में निगम के आयुक्त से लेकर हैल्थ अफसर तक सभी बडे़ अधिकारी उसके संचालन मण्डल के वरिष्ठ पदाधिकारी हैं। मुख्यमन्त्री सोसायटी के चीफ संरक्षक हैं। ऐसे में निगम हाऊस में 31-1-2020 को लाया गया प्रस्ताव इन सब लोगों पर व्यक्तिगत रूप से एक गंभरी टिप्पणी बन जाता है।
Since the inception  of the office of the SEHB Society, the duties and functions of  supervisors/Co-ordinators were not prescribed which has now been done under the guidance of consultants.
साधारणकृत्यकारक समीति के उक्त मद् सख्या 2(3)पर विचार विमर्श उपरान्त समीति द्वारा विभागीय प्रस्तावना को इस आधार पर अनुमोदित किया गया कि श्री एम एल शर्मा  ( Consaltant with SEHB Society) की सर्वीसिज को छः माह क लियेे एक्सटैन्ड किया जाये।
अतः मामला सदन समुख अनुमोदनार्थ प्रस्तुत है।
विचार विमर्श उपरान्त सदन द्वारा उक्त समीति की सिफारिश को अनुमोदित किया गया।














































अब विभाग में स्कैम होना होगा प्रशंसा का मानक

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री ने सत्ता के तीन वर्ष पूरे होने पर अपने ही अधिकारियों के काम काज का आकलन जिस तरह से प्रदेश की जनता के सामने रखा है उससे सरकार की नीति पर स्वतः ही सवाल उठने लग गये हैं क्योंकि इस अवसर पर मुख्यमन्त्री ने अपने ही कुछ अधिकारियों के काम काज पर यह कहा है कि अधिकारी काम नहीं कर रहे हैं और उनसे काम लेने के लिये आक्रामक रणनीति अपनाई जायेगी। संभव है कि मुख्यमन्त्री के इस अनुभव का अपना कोई ठोस आधार रहा हो। लेकिन इसी के साथ जब मुख्यमन्त्री ने स्वास्थ्य विभाग की प्रशंसा भी कर डाली तो उससे कुछ और ही सवाल उठने लग पड़े हैं। यह सही है कि महामारी के दौर में स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी दूसरों से ज्यादा रही है। लेकिन यह जिम्मेदारी निभाने के लिये उसके पास संसाधन भी ज्यादा रहे हैं। लेकिन इस बढ़ी हुई जिम्मेदारी में यह भी कड़वा सच रहा है कि विभाग पर इसी दौरान भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं। इन आरोपों पर सरकार को विजिलैन्स में मामला दर्ज करवाना पड़ा। यह मामला दर्ज होने पर विभाग के निदेशक तक की गिरफ्तारी हो गयी। इसी मामलें की आंच पार्टी अध्यक्ष तक जा पहुंची और उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा। यही नहीं यह मामला बनने से पहले विभाग पत्र बम का शिकार हुआ जिसकी आंच में पार्टी का पूर्व मन्त्री तक झुलस गया।
इसी तरह जब विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर बहुत पहले से ही सवाल उठने शुरू हो गये थे तब इन सवालों के साये में चल रहे विभाग की कार्यप्रणाली की प्रशंसा किया जाना क्या सरकार की नीयत और नीति पर सवाल नहीं उठायेगा। क्या इसका यह अर्थ नहीं निकलेगा कि जिस विभाग में नियमों/कानूनों को नज़रअन्दाज कर काम किया जायेगा उसी को प्रशंसा का प्रमाण पत्र मिलेगा। जो अधिकारी नियमों के दायरे में रह कर काम करेंगे क्या वह काम न करने वालों की श्रेणी में आयेंगे क्योंकि मुख्यमन्त्री के अपने ही आकलन से यह सवाल उठने लगा है। इस तरह के आकलन से शीर्ष अफसरशाही में न चाहे ही एक शीत युद्ध छिड़ गया है। संयोगवश इस समय कुछ ऐसे अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर बैठ गये हैं जिनकी कार्य निष्ठा को लेकर कई सवाल खड़े हैं। शायद जिन अधिकारियों को नियमों के अनुसार ओडीआई सूची में होना चाहिये था वह इस समय नीति निरधारकों की सक्रिय भूमिका में हैं। अधिकारियों में चल रहे शीत युद्ध से पूरी सरकार की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है। बल्कि इस शीत युद्ध का साया स्वयं मुख्यमन्त्री के अपने सचिवालय को भी प्रभावित कर रहा है। क्योंकि पिछले दिनों जिस ढंग से इस कार्यालय में अधिकारियों की तैनातियां सामने आयी हैं उनमें यहां तक टिप्पणीयां चर्चा में आ रही हैं कि अमुक अधिकारी संघ के निर्देश पर वहां तैनात हुआ है तो अमुक एक मन्त्री और सेवानिवृत नौकरशाह की सिफारिश पर यहां आया है। यह चर्चाएं इसलिये उठी हैं क्योंकि मुख्यमन्त्री के अपने सचिवालय में ही तीसरे वर्ष में इस तरह की रद्दोबदल हुई है।
मुख्यमन्त्री सचिवालय में तीसरे वर्ष में आकर रद्दोबदल होने को लेकर सवाल और चर्चाएं उठना स्वभाविक है। क्योंकि यही कार्यालय सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है। इसी की वर्किंग से सरकार को लेकर जनता में सन्देश जाता है। सामान्यतः ऐसे स्थलों पर कार्य कर रहे अधिकारियों का कार्यकाल तो मुख्यमन्त्री के अपने कार्यकाल के समान्तर ही रहता आया है परन्तु इस बार इसमें अपवाद घटा है और इसी कारण चर्चाओं का विषय भी बन गया है। अब यहां तक कहा जाने लग पड़ा है कि जब अधिकारी के अपने कार्यकाल की ही कोई निश्चितता नहीं रह जायेगी तो उनका कार्य निष्पादन भी कितना प्रभावी रह पायेगा। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर कई रोचक किस्से सामने आयेंगे क्योंकि जब सरकार कुछ के मामलों में अदालत के निर्देशों तक का संज्ञान नहीं लेगी तो ऐसे लोगों पर सरकार के ‘‘अति विश्वास’’ के चर्चे तो उठेंगे ही।

सुशासन के लिये नियमों को अंगूठा

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने तीन वर्ष पूरे कर लिये हैं। यह तीन वर्ष पूरा होने पर आयोजित कार्यक्रम में इस अवधि को ‘‘सुशासन के तीन साल’’ कहा गया है और इसके लिये प्रदेश की जनता का भी आभार व्यक्त किया गया है। यह आभार व्यक्त करने और सुशासन का संदेश देने के लिये सरकार के सूचना एवम् जन संपर्क विभाग की ओर से मुख्यमन्त्री के चित्र के साथ एक बड़ा होर्डिंग भी माल रोड़ जैसे प्रदेश के प्रमुख स्थलों पर लगाया गया है।लेकिन मुख्यमन्त्री के अतिरिक्त पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिमला के सांसद सुरेश कश्यप के चित्र वाला होर्डिंग भी शिमला की माल रोड़ की दीवार पर लगाया गया है। इसमें भी सुशासन के तीन साल का सन्देश प्रदेश की जनता को दिया गया है। परन्तु पार्टी अध्यक्ष के चित्र वाला यह होर्डिंग सार्वजनिक स्थल पर किसकी ओर से लगाया गया है इसका कोई जिक्र होर्डिंग पर बिना किसी जारी कर्ता के उल्लेख से सार्वजनिक स्थल पर लग जाना अपने में ही सुशासन के दावे पर एक सवाल खड़ा कर देता है क्योंकि प्रचार की कोई भी सामग्री प्रकाशक और मुद्रक के नाम-पत्ते के बिना नहीं छापी जा सकती है यह एक स्थायी नियम है। इसी तरह कोई भी होर्ड़िंग किसी भी सार्वजनिक स्थल पर जारीकर्ता के जिक्र के बिना टांगा नहीं जा सकता है। फिर सार्वजनिक स्थल पर ऐसा होर्डिंग टांगने के लिये संबंधित प्रशासन से लिखित में अनुमति लेनी होती है और उसके लिये कुछ शुल्क भी अदा करना पड़ता है।

माल रोड़ पर टंगे इस होर्डिंग पर जब किसी जारी कर्ता का नाम ही नहीं है तो स्वभाविक है कि प्रशासन से इसकी अनुमति भी नहीं ली गयी होगी। फिर जब इस होर्डिंग पर सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का चित्र है तो स्वभाविक है कि प्रशासन की ओर से भी इस पर चुप रहने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह गया होगा। माल रोड़ प्रदेश का प्रमुख स्थल है जहां पर प्रशासन का हर छोटा बड़ा शिमला स्थित अधिकारी, और हर राजनीतिक दल का पदाधिकारी तथा मीडिया कर्मी प्रायः चक्कर काटता है लेकिन किसी ने भी इस पर कुछ कहने की जरूरत नहीं समझी है। भारत सरकार की आईवी के लोग भी रोज़ माल रोड़ पर होते हैं। इस होर्डिंग से किसी को कोई नुकसान नही पहुंच रहा है। लेकिन सवाल नियमों की अनुपालना का है और नियमों की निश्चित रूप से अवहेलना हुई है जिसकी सामान्यतः कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन क्या ऐसा ही कोई दूसरा होर्डिंग बिना किसी जारी कर्ता के नाम से ऐसे किसी भी सार्वजनिक स्थल पर टंग जाये तो क्या प्रशासन उसका भी कोई संज्ञान नहीं लेगा? किसी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनाया जायेगा? क्या यह छोटी से कोताही पूरे प्रशासन को कटघरे में खड़ा नहीं कर देती है? वैसे माल रोड़ पर लगे इस होर्डिंग के राजनीतिक मायने ही निकाले जाने लगे हैं क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है कि ऐसे अवसर पर मुख्यमन्त्री के बराबर पार्टी अध्यक्ष का होर्डिंग लगा हो। इस होर्डिंग को अध्यक्ष का राजनीतिक कद बढ़ाने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है। लेकिन यह होर्डिंग लगाने में जिस तरह से नियमों /कानूनों को अंगूठा दिखाया गया है वह देर सवेर मुद्दा अवश्यक बनेगा क्योंकि यह होर्डिंग पंचायत और निकाय चुनावों के लिये लगाई गयी आचार संहिता का भी खुला उल्लघंन है क्योंकि आचार संहिता तीन वर्षीय आयोजन से पहले ही लग चुकी थी। ऐसे में सुशासन का संदेश देने वाली होर्ड़िंग का अपने में ही नियमों/ कानूनों का उल्लंघन होना कई सवाल खड़े कर जाता है।

क्या तीन वर्ष की असफलताओं के लिये केवल नौकरशाही ही जिम्मेदार है

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर को प्रदेश की सत्ता संभाले हुए तीन वर्ष हो गये हैं और इतना कार्यकाल सरकार का आकलन करने के लिये बहुत काफी होता है। सरकार हर बार एक वर्ष पूरा होने पर अपनी उपलब्धियां जनता के सामने रखने के साथ ही परोक्ष/अपरोक्ष में स्वयं अपना आकलन भी करती आयी है। हर वर्ष पूरा होने पर उपलब्धियों का विज्ञापन जारी होता रहा है। लेकिन इस बार तीन वर्ष पूरे होने पर आयोजित पत्रकार वार्ता में मुख्यमन्त्री ने स्वयं यह कहकर कि अफसरशाही काम नही करती है और उससे आगे दो वर्षो में काम लेने के लिये आक्रमक रणनीति अपनाई जायेगी। अपने समर्थकों और विरोधीयों दोनांे को ही एक चर्चा और चिन्तन का मुद्दा दे दिया है। हर कोई यह सवाल कर रहा है कि क्या सही में ही अफसरशाही को समझने में तीन वर्ष लग गये हैं या अब अफसरों ने भी नियमों/कानूनों से बाहर जाने के लिये हाथ खड़े कर दिये हैं। क्योंकि तीन वर्षों का यह कड़वा सच है कि इस दौरान प्रदेश सरकार कर्ज की सारी सीमाएं लांघ गयी है। शायद इसी कारण से उपलब्धियों का कोई विधिवत विज्ञापन भी जारी नही हो सका है।
इन तीन वर्षो में चैथा मुख्यसचिव प्रदेश देख रहा है यह चर्चा भी चल पड़ी है कि पांचवा मुख्य सचिव लाया जा रहा है। इन तीन वर्षों में यदि सरकार ने कोई बड़ा काम किया है तो यह शायद प्रशासनिक तबादलों का ही रहा है। कई बार तो शायद ऐसा भी हुआ है कि कार्मिक विभाग से कोई तबदाला प्रस्ताव जाने से पहले ही उसके पास आदेश आ जाते रहे हैं बल्कि सरकार को तबादला सरकार की संज्ञा दी जाने लग पडी थी। अधिकारियों के तबादलों में किसका दखल ज्यादा रहा है इसकी चर्चा सचिवालय से स्कैण्डल तक कभी भी सुनी जा सकती है। इन्ही चर्चाओं के कारण इस सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई करने की बजाये उसे संरक्षण देना आवश्यकता बन गयी थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने, बोलने वालों को सरकार का विरोधी माना जाता रहा है। ऐसे लोगों की आवाज दबाने के लिये हर संभव प्रयास किया गया है। इसके कई प्रमाण मौजूद है।
लेकिन यह सब करने के बावजूद इन तीन वर्षों की उपलब्धियों का आकलन मुख्यमन्त्री के इसी कथन से हो जाता है कि अफसरशाही काम नही करती है। अफसरशाही की चुन चुन कर नियुक्तियां किसके ईशारों पर होती रही है। क्या नियुक्तियां पाने के लिये कई अधिकारी ऐसे प्रभावी लोगों के चरण स्पर्श तक नही करते रहे हैं? हो सकता है कि मुख्यमन्त्री इन प्रभावी लोगों की सामर्थय और प्रशासन में इनकी भूमिका का सही आकलन न कर पाया हों। परन्तु यह सच है कि सरकार का अब तक का कार्याकाल कतई रचनात्कम नही रहा है। किसी भी मुद्दे पर सरकार को अपेक्षित सफलता नही मिल पायी है। औद्यौगिक निवेश के लिये किये गये सारे प्रयासों का परिणाम कोई सन्तोषजनक नही रहा है। कोरोना का फैलाव प्रदेश में रोकने के लिये सरकार के सारे फैसले अप्रसांगिक रहे है। ऐसे में इन सारे फैसलों के लिये अकेले नौकरशाही को जिम्मेदार ठहराना कतई सही नही होगा। बल्कि मुख्यमन्त्री को अपने में आत्म मंथन करने की आवश्यकता है।

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