Saturday, 17 January 2026
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जल जीवन मिशन का 45% बजट सिराज और धर्मपुर में ही खर्च -अनिल शर्मा

पालमपुर में ट्रांसफर की धमकी का आडियो वायरल
शिमला/शैल। नगर निगमों के चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों की ही प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। क्योंकि भाजपा और मुख्यमन्त्री जयराम को यह प्रमाणित करना है कि प्रदेश की सत्ता के वह भी अधिकारी हैं और अगले चुनावों में भी सत्ता में वापसी करके दिखायेंगे। दूसरी ओर कांग्रेस को यह प्रमाणित करना है कि भाजपा सरकार हर मोर्चे पर बुरी तरह असफल हो चुकी है। जनता बेरोज़गारी और मंहगाई से ग्रस्त है और प्रदेश कांग्रेस इस तथ्य को घर घर तक पहुंचा चुकी है। इन चुनावों में कांग्रेस जीत की शुरूआत करेन जा रही है। कौन अपने दावों को कितना प्रमाणित कर पाता है इसका पता चुनाव परिणाम आने पर ही लगेगा।
लेकिन इन चुनावों में सत्ता के दुरूपयोग का खेल जिस तरह से खेला जाने लगा है वह अपने में चिन्ताजनक है। पालमपुर में एक भाजपा नेता एक व्यक्ति को फोन पर यह धमकी दे रहा है कि भाजपा का विरोध करने के लिये उसकी पत्नी और मां को जो अध्यापक हैं ट्रांसफर करके दूर फेंक दिया जायेगा। नेता यह भी धमकी देता है कि स्पीकर साहिब सब नज़र रख रहे हैं। इस धमकी का आडियो सोशल मीडिया मंचो पर खूब वायरल हो रहा है। भाजपा की ओर से इसका कोई खण्डन नहीं आया है। चुनावों में मतदाताओं को इस तरह डराने का चलन शायद पहली बार इस शक्ल में सामने आया है। यदि नगर निगमों के चुनावों में ऐसी धमकीयां शुरू हो गयी हैं तो अगले चुनावों में यह कहां तक पहुंच जायेंगी इसका अन्दाजा लगाना कठिन नहीं होगा।
मण्डी में लोकसभा चुनावों के बाद से ही अनिल शर्मा और भाजपा में 36 का आंकड़ा चल रहा है क्योंकि अनिल के बेटे ने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था। यह चुनाव लड़ने पर अनिल शर्मा को जयराम के मन्त्रीमण्डल से अलग कर दिया गया था। परन्तु भाजपा अनिल को पार्टी से निकाल नहीं पायी थी और न ही अनिल ने भाजपा और विधायकी से त्यागपत्र दिया था। लेकिन इस राजनीतिक अन्तः विरोध का मण्डी की जनता को विकास से वंचित होने का दण्ड भोगना पड़ेगा यह शायद किसी ने नहीं सोचा था। इन निगम चुनावों में मुख्यमन्त्री से लेकर नीचे हर नेता तक ने सुखराम परिवार पर निशाना साधना नहीं छोड़ा। मण्डी के विकास में पंडित सुखराम के योगदान को पूरी तरह नजरअन्दाज कर दिया गया। लेकिन अन्त में अनिल शर्मा ने एक पत्रकार वार्ता में मुख्यमन्त्री और भाजपा के हमलों का तथ्यों के साथ जिस तरह जवाब दिया है उससे पूरी भाजपा बैकफुट पर आ गयी है। अनिल ने मुख्यमन्त्री पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए उनसे जवाब मांगा है कि जल जीवन मिशन का 45% बजट मुख्यमन्त्री के चुनाव क्षेत्र सिराज और जल शक्ति मन्त्री महेन्द्र सिंह के क्षेत्र धर्मपुर में ही क्यों खर्च हो रहा है। अनिल ने आंकड़े रखते हुए कहा है कि सिराज में 270 करोड़ और धर्मपुर में 170 करोड़ खर्च किये जा रहे हैं और जिले के आठ अन्य क्षेत्रों को पूरी तरह नजरअन्दाज कर दिया गया है। अनिल के इस आरोप का कोई जवाब नहीं आ पाया है।
मण्डी जिले में ही अन्य चुनाव क्षेत्रों के साथ हो रहे भेदभाव के इन आरोपों का आगे चलकर क्या असर पड़ेगा यह तो आगे ही पता चलेगा। लेकिन इस तरह के भेदभाव के आरोप प्रदेश के और भी कई क्षेत्रों में लग रहे हैं और शायद ऐसे ही सवालों से बचने के लिये वित्त राज्य मन्त्री अनुराग ठाकुर और पालमपुर से ताल्लुक रखने वाली राज्यसभा सांसद इन्दु गोस्वामी ने इन चुनावों में समय देना उचित नहीं समझा।

मण्डी में शिवधाम का काम 18 करोड़ से 36 का कैसे हो गया? क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर के गृह जिला मण्डी में कांगनी धार को पर्यटन विकास और अन्य गतिविधियों के लिये विकसित किया जा रहा है। यह काम पर्यटन निगम के माध्यम से किया जा रहा है। निगम ने इसके लिये एक कन्सलटैन्ट की सेवाएं ले रखीं हैं जिसने इसका ग्राफिक्ल विडियो भी तैयार किया है। जिलाधीश मण्डी ने यह विडियो रिलीज़ किया है। मण्डी को छोटी काशी भी कहा जाता है क्योंकि यहां पर भगवान शिव के भूतनाथ और पंचवक्र महादेव जैसे मन्दिर स्थित हैं। संभवतः शिव नगरी के कारण ही कांगनी धार प्रौजैक्ट को शिव धाम का नाम दिया गया है। यह कार्य दो चरणों में पूरा होगा फेज -1 को अन्तिम रूप दे दिया गया है। इसकी अनुमानित लागत 40 करोड़ आंकी गयी है और यह चालीस करोड़ इसके लिये जारी भी कर दिये गये हैं।
इस कार्य के लिये निविदायें 20-11-2020 से 25-11- 2020 के बीच आमन्त्रित की गयी थी। इन निविदाओं में इस कार्य की लागत 18 करोड़ रखी गयी थी। इसमें चार कंपनीयों ने टैण्डर में भाग लिया था। 25-2-2021 को यह कार्य मुंबई की एक कंपनी को 36 करोड़ में आंबटित कर दिया गया है। यह कार्य 18 करोड़ से 36 करोड़ का कैसे हो गया इसका कोई खुलासा नहीं किया गया है। सरकार की ओर से इसका कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं हुआ है जबकि इन निगम चुनावों में धर्मशाला में पूर्व मन्त्री सुधीर शर्मा ने इस पर सवाल भी उठाया है।
इसमें यह सवाल उठता है कि शिवधाम के नाम से क्या यह कार्य अपरोक्ष में धार्मिक भावनाओं का प्रतीक नहीं बन जायेगा। अभी तक संविधान में सरकार धर्म निरपेक्ष ही है। ऐसे में यदि पुराने शिव मन्दिरों का ही जीर्णोद्धार कर दिया जाता तो कोई प्रश्न उठने का स्कोप ही नहीं रह जाता। लेकिन जब सरकार अपने स्तर पर शिव धाम स्थापित करने जा रही है तो निश्चित रूप से धर्म निरपेक्षता पर सवाल उठेगा ही। पहले फेज के काम को 18 माह में सितम्बर 2022 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन टैण्डर आमन्त्रण और उसको अन्तिम रूप देने से पहले ही इसकी लागत दो गुणा कैसे बढ़ गयी इसको लेकर कई तरह की चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। पर्यटन विभाग मुख्यमन्त्री के अपने पास है लेकिन यह लागत इस बढ़ा दिये जाने की जानकारी मुख्यमन्त्री को है या नहीं इस पर विभाग कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। वैसे सरकार में न्यूनतम निविदा को नज़रअन्दाज करके अधिकतम को काम देने का चलन शुरू हो चुका है। बिलासपुर के बन्दला में बन रहे हाइड्रोकालिज में भी न्यूनतम निविदा 92 करोड़ थी लेकिन बिना कोई कारण बताये यह काम भी 100 करोड़ में दे दिया गया है। इस पर उठे सवालों का जवाब भी सरकार ने नहीं दिया है।

नगर निगम शिमला के मनोनीत पार्षद संजीव सूद गलत शपथ पत्र के दोषी करार -निदेशक ने अयोग्य ठहराया

सचिव शहरी विकास के पास पांच माह से आगामी कारवाई के लिये मामला लंबित
कांग्रेस ने उठाये सवाल


शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के मनोनीत पार्षद संजीव सूद को निदेशक शहरी विभाग हिमाचल प्रदेश ने झूठा शपथ पत्र दायर करने का दोशी पाते हुए उन्हें पार्षद बनने के लिये अयोग्य पाते हुए उन्हें निलंबित करने का आदेश पारित किया है। निदेशक शहरी विकास ने 3-11-2020 को इस आशय का आदेश पारित करते हुए इस मामले की फाईल अगले आदेशों के लिये प्रदेश सरकार के सचिव शहरी विकास विभाग को भेज दी थी। लेकिन 3-11-2020 को हुए इस आदेश पर पांच माह में अगली कारवाई नहीं हो पायी है। शिमला शहरी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पूर्व पार्षद जितेन्द्र चौधरी ने इस विषय पर सरकार के आचरण को लेकर गंभीर सवाल उठाये हैं। जितेन्द्र चौधरी ने इस संद्धर्भ में आयोजित पत्रकार वार्ता में स्थानीय विधायक एंवम मन्त्री शहरी विकास विभाग और मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर पर इस मामले में पक्षपात करने के आरोप लगाये हैं। संजीव सूद ने इस मामले में यह कहा है कि उनके ऊपर लगे अवैध कब्जे के आरोप में दो बार डिमार्केशन हुई है और इसमें अवैधता नहीं पायी गयी है।
स्मरणीय है कि जब संजीव सूद को नगर निगम शिमला के लिये पार्षद मनोनीत किया गया था तब एक रोकश कुमार ने 28-2-2020 और फिर 20-3-2020 को मुख्यमन्त्री, सचिव शहरी विकास और आयुक्त नगर निगम शिमला को शिकायत भेजी थी कि संजीव सूद ने पार्षद के लिये गलत शपथ पत्र दायर किया है। जबकि उसके खिलाफ अधिनियम की धारा 253 और 254 (1) के तहत मामला दर्ज था और लंबित चल रहा था। यह दोनो शिकायतें सरकार ने निदेशक शहरी विकास को 29-5-2020 को यह जांचने के लिये भेज दी कि इनके परिदृश्य मेे संजीव सूद पार्षद मनोनीत होने के लिये पात्र हैं या नहीं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि निदेशक शहरी विकास को इस सबकी सूचना राकेश कुमार ने 26-5-2020 को दे दी थी। लेकिन निदेशक के यहां से कोई कारवाई न होने पर राकेश कुमार ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत में मामला दर्ज करवा दिया। इस पर अदालत ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश कर दिये और अन्ततः यह एफआईआर दर्ज भी हो गयी।
संजीव सूद के खिलाफ दो आरोप लगे है। एक है कि उसने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है। इसको लेकर एसडीएम शहरी के पास अभी तक मामला लंबित चल रहा है और इसको लेकर निदेशक ने कोई आदेश पारित नहीं किये हैं। दूसरा आरोप लगा था कि उसने 5.25 वर्ग मीटर का एक अवैध निर्माण कर रखा है। इस अवैध निर्माण को लेकर आयुक्त नगर निगम के पास मामला चला। वहां पर संजीव सूद ने यह ब्यान दे दिया कि उसने निर्माण को हटा दिया है और इस आशय का आयुक्त के पास शपथ पत्र भी दायर कर दिया। इस शपथ पत्र पर निगम के अधिकारी ने मौके का निरीक्षण किया तो पाया कि अवैध निर्माण को हटाने की बजाये 206.42 वर्ग मीटर का अवैध निर्माण कर रखा है जिसको लेकर निगम आयुक्त के पास अभी भी मामला लंबित चल रहा है। इस तरह निगम आयुक्त के पास अवैध निर्माण को लेकर गलत शपथ पत्र दायर करने का दोषी पाये जाने पर निदेशक शहरी विकास ने मामले का जांच अधिकारी होने के नाते संजीव सूद को पार्षद होने के लिये आयोग्य करार दिया है।
सचिव शहरी के पास निदेशक का यह फैसला पांच माह से आगामी कारवाई के लिये लंबित पड़ा हुआ है। इस समय चार नगर निगमों के लिये चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में इस समय कांग्रेस को यह मामला सरकार पर हमला करने के लिये एक सशक्त हथियार मिल गया है।

क्या निगम चुनावों में जीत की शुरूआत कर पायेगी कांग्रेस

शिमला/शैल। क्या कांग्रेस इन नगर निगमों के चुनावों में जीत की शुरूआत कर पायेगी? यह सवाल प्रदेश कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व और आगे आने वाले उपचुनावों से लेकर अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के परिदृश्य में बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों से 2019 के चुनावों और उसके बाद हुए उपचुनावों तक में कोई बड़ी जीत हासिल नहीं कर पायी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर को संगठन के मामलों में एक तरह से खुला हाथ मिला है। अब तक ऐसा कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया है जहां किसी बड़े नेता की ओर से ऐसा आरोप लगा हो कि उसके समर्थकों को संगठन में नज़र अन्दाज किया जा रहा है। कुल मिलाकर संगठन के हर बड़े नेता की ओर से राठौर को पूरा सहयोग मिला है। पिछले दिनों जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सहित कांग्रेस के पांच विधायकों को सदन से निलंबित कर दिया गया था। उस मुद्दे पर प्रदेश अध्यक्ष की सक्रियता उस स्तर की नहीं रह पायी है जो होनी चाहिये थी। उस समय कुछ कोनो से अध्यक्ष को बदलने की मांग उठी थी जिसे वीरभद्र सिंह ने एक ही ब्यान से खारिज कर दिया था। बल्कि जब आनन्द शर्मा को लेकर पार्टी उपाध्यक्ष केहर सिंह खाची ने ब्यान दागा था तब भी राठौर को लेकर या सवाल नहीं उठा था कि वह आनन्द शर्मा की पसन्द हैं।
ऐसे में अब जब निगम चुनावों में पालमपुर में दो और धर्मशाला में एक उम्मीदवार का नामांकन रद्द होने की स्थिति बन गयी तो उससे संगठन की कमजोरी सामने आती है। क्योंकि पार्टी के उम्मीदवार का नामांकन रद्द होना एक बड़ी बात होती है। उससे चुनाव की रणनीति पर असर पड़ता है फिर जब हर वार्ड के लिये कई-कई लोगों की जिम्मेदारी लगी हो तब ऐसा हो जाना सवाल खड़े करता है। निगम चुनावों में कांग्रेस के अन्दर बगावत भाजपा की अपेक्षा बहुत कम सामने आयी है। केवल चार लोग ही ऐसे निकले हैं जो अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं और जिन्हें निकाल दिया गया है। इस परिदृश्य में कांग्रेस का पलड़ा भाजपा से भारी है। अब यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस जयराम सरकार और भाजपा के खिलाफ किस तरह की आक्रामकता दिखाती है। जबकि भाजपा सांसद किश्न कपूर ने धर्मशाला में एक पत्रकार वार्ता में कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाये हैं। क्योंकि धर्मशाला नगर निगम पर कांग्रेस का कब्जा था। कपूर ने आरोप लगाया है धर्मशाला को विभिन्न योजनाओं में केन्द्र की ओर से 271 करोड़ रूपये दिये गये हैं जिसको खर्च करने में भ्रष्टाचार हुआ है। कांग्रेस की ओर से इस आरोप का अभी तक कोई जबाव नहीं दिया गया है। जबकि प्रेदश में तीन वर्षो से भाजपा की सरकार है और वह इस कथित भ्रष्टाचार की कोई जांच तक नहीं करवा पायी है। यदि कांग्रेस इन चुनावों में भाजपा के खिलाफ आक्रामक नहीं हो पायी तो सफलता मिलना आसान नहीं होगा।

कर्ज लेकर खैरात कब तक बांटी जायेगी

प्रदेश के हर आदमी पर है साढ़े आठ लाख का कर्ज
कर्ज के अनुपात में प्रतिव्यक्ति आय है 1,90,407
इस कर्ज के बावजूद आज कुल कर्मचारियों की संख्या है 1,91,278
2002 में कर्मचारियों की संख्या थी 2,27,879
क्या इस स्थिति के बाद भी शगुन आदि की रस्में निभाई जानी चाहिये?

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने वित्तिय वर्ष 2021-22 के बजट में महिला कल्याण और सशक्तिकरण के तहत प्रदेश के बीपीएल परिवारों की बेटियों को शादी के वक्त पर 31 हजा़र का शगुन देने की योजना घोषित की है। इसी के साथ यह भी घोषित किया है कि बीपीएल परिवारों को दो लड़कियों तक अब 21 हज़ार रूपये की "Post Birth" ग्रांट फिक्सड डिपाजिट के रूप में दी जायेगी। इन योजनाओं से इन परिवारों की महिलाओं का कल्याण और सशक्तिकरण कैसे होगा यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। लेकिन इन योजनाओं और ऐसी दर्जनों योजनाओं को जब प्रदेश के बजट के आईने में देखते हैं तब कुछ ऐसे सवाल आते हैं जिनका असर प्रदेश के हर व्यक्ति पर पड़ता है। इस समय प्रदेश की 70 लाख जन संख्या पर 60500 करोड़ से अधिक का कर्ज है जो प्रति व्यक्ति 8.50 लाख रूपये बैठता है। जिसका अर्थ है कि जिस बेटी को शादी के वक्त पर 31000 हज़ार का शगुन दिया जा रहा है उसके सिर पर सरकार की नीतियों के परिणामस्वरूप 8.50 लाख का कर्ज भी है। जिन दो लड़कियों की पैदाईश तक परिवार को 21000 फिक्सड डिपाजिट के रूपे में दिये जायेंगे उस परिवार के चार लोगों के नाम 34 लाख कर्ज आयेगा।
कर्ज की यह स्थिति तब है जब केन्द्र से राज्य का 90ः10 के अनुपात में ग्रांट मिलती है क्योंकि हिमाचल विशेष राज्य की श्रेणी में आता है। परन्तु केन्द्र के बजट की चर्चा के दौरान एक प्रश्न के उत्तर में बताया गया है कि अब विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने का प्रावधान खत्म कर दिया गया है। प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने राज्य सरकार से इस पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। लेकिन राज्य सरकार ने इसका कोई जबाव नहीं दिया है। वित्त विभाग के सूत्रों के मुताबिक इस आश्य की सूचना राज्य सरकार तक पहुंच चुकी है। शायद इसी कारण से सरकार ने अभी बहुत सारी स्वास्थ्य सेवाओं के दाम बढ़ा दिये हैं। बिजली के दाम बढ़ाने के लिये रैगुलेटरी कमीशन में याचिका डाल दी गयी है और यह रेट बढ़ जाने की सूचना कभी भी जारी हो सकती है। विशेष राज्य का दर्जा समाप्त होने के बाद प्रदेश 90ः10 के अनुपात से 50ः50 के अनुपात पर आ जायेगा। जिसका अर्थ होगा कि राज्य पर कर्ज का बोझ और बढ़ेगा। इस बढ़ते कर्ज के कारण सरकार निवेश करने की स्थिति में नहीं होगी और जब निवेश नहीं होगा तो रोजगार के अवसर भी नहीं होंगे।
वर्ष 2009 -10 में प्रदेश का कर्जभार 23163.74 करोड़ था जो आज 60500 करोड़ से ऊपर जा चुका है। जबकि आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2002 में सरकार में सभी वर्गों के कर्मचारियों की कुल संख्या 2,27,879 थी जो आज 2020 में 1,91,278 रह गयी है। सरकार के इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि जैसे जैसे सरकार का कर्जभार बढ़ता जाता है उसी अनुपात में सरकार में नियमित रोज़गार कम होता जाता है। इसी कर्ज के कारण मंहगाई होती है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इस कर्ज पर कैसे नियन्त्रण किया जाये। इसके लिये सबसे पहले सरकार की प्रत्येक योजना का व्यवहारिक पक्ष देखना होगा। यह समझना होगा कि जब अमुक योजना नहीं थी तब उससे आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ रहा था और अब योजना आने के बाद क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिये सरकार ने बेटियों की शादी पर बीपीएल परिवारों को 31000 का शगुन देने की घोषणा की है। क्या सरकार के पास ऐसी कोई रिपोर्ट थी जिसमें यह कहा गया हो कि इस शगुन के बिना इन बेटियों की शादी नहीं हो पा रही थी और उसके लिये यह सहायता देना आवश्यक था। क्या यह शगुन देकर इन बेटियों को स्वावलम्बी बनने में सहायता मिल पायेगी। यदि निष्पक्षता से इसका आकलन किया जाये तो इससे चुनावों में तो एक वोट बैंक बन जायेगा लेकिन इससे आम आदमी पर कर्ज भी जरूर बढ़ जायेगा।
शगुन देना, पोस्ट बर्थ ग्रांट देना, गैस रिफिल देना आदि वह योजनाएं हैं जिन्हें सरप्लस पैसे से पोषित किया जाना चाहिये। जब सरकार अपने खर्चे कर्ज लेकर चला रही है तब कर्ज लेकर खैरात बांटना कोई समझदारी नहीं कही जा सकती। सरकारें जब अपना वोट बैंक बनाने बढ़ाने के लिये आम आदमी पर कर्ज का बोझ बढ़ाने का काम करती है तो उससे सत्ता में वापसी सुनिश्चित नहीं हो जाती। क्योंकि ऐसे में आम आदमी की नजर सरकार की फिजूल खर्ची और भ्रष्टाचार पर गढ़ जाती है। संयोगवश इस समय में फिजूल खर्ची और भ्रष्टाचार दोनों खुले रूप से चल रहे हैं जिनके खुलासे आने वाले दिनों में सामने आयेंगे। कर्ज लेकर खैरात बांटने की बजाये संसाधन बढ़ाने पर विचार किया जाना चाहिये।

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