पालमपुर में ट्रांसफर की धमकी का आडियो वायरल
शिमला/शैल। नगर निगमों के चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों की ही प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। क्योंकि भाजपा और मुख्यमन्त्री जयराम को यह प्रमाणित करना है कि प्रदेश की सत्ता के वह भी अधिकारी हैं और अगले चुनावों में भी सत्ता में वापसी करके दिखायेंगे। दूसरी ओर कांग्रेस को यह प्रमाणित करना है कि भाजपा सरकार हर मोर्चे पर बुरी तरह असफल हो चुकी है। जनता बेरोज़गारी और मंहगाई से ग्रस्त है और प्रदेश कांग्रेस इस तथ्य को घर घर तक पहुंचा चुकी है। इन चुनावों में कांग्रेस जीत की शुरूआत करेन जा रही है। कौन अपने दावों को कितना प्रमाणित कर पाता है इसका पता चुनाव परिणाम आने पर ही लगेगा।
लेकिन इन चुनावों में सत्ता के दुरूपयोग का खेल जिस तरह से खेला जाने लगा है वह अपने में चिन्ताजनक है। पालमपुर में एक भाजपा नेता एक व्यक्ति को फोन पर यह धमकी दे रहा है कि भाजपा का विरोध करने के लिये उसकी पत्नी और मां को जो अध्यापक हैं ट्रांसफर करके दूर फेंक दिया जायेगा। नेता यह भी धमकी देता है कि स्पीकर साहिब सब नज़र रख रहे हैं। इस धमकी का आडियो सोशल मीडिया मंचो पर खूब वायरल हो रहा है। भाजपा की ओर से इसका कोई खण्डन नहीं आया है। चुनावों में मतदाताओं को इस तरह डराने का चलन शायद पहली बार इस शक्ल में सामने आया है। यदि नगर निगमों के चुनावों में ऐसी धमकीयां शुरू हो गयी हैं तो अगले चुनावों में यह कहां तक पहुंच जायेंगी इसका अन्दाजा लगाना कठिन नहीं होगा।
मण्डी में लोकसभा चुनावों के बाद से ही अनिल शर्मा और भाजपा में 36 का आंकड़ा चल रहा है क्योंकि अनिल के बेटे ने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था। यह चुनाव लड़ने पर अनिल शर्मा को जयराम के मन्त्रीमण्डल से अलग कर दिया गया था। परन्तु भाजपा अनिल को पार्टी से निकाल नहीं पायी थी और न ही अनिल ने भाजपा और विधायकी से त्यागपत्र दिया था। लेकिन इस राजनीतिक अन्तः विरोध का मण्डी की जनता को विकास से वंचित होने का दण्ड भोगना पड़ेगा यह शायद किसी ने नहीं सोचा था। इन निगम चुनावों में मुख्यमन्त्री से लेकर नीचे हर नेता तक ने सुखराम परिवार पर निशाना साधना नहीं छोड़ा। मण्डी के विकास में पंडित सुखराम के योगदान को पूरी तरह नजरअन्दाज कर दिया गया। लेकिन अन्त में अनिल शर्मा ने एक पत्रकार वार्ता में मुख्यमन्त्री और भाजपा के हमलों का तथ्यों के साथ जिस तरह जवाब दिया है उससे पूरी भाजपा बैकफुट पर आ गयी है। अनिल ने मुख्यमन्त्री पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए उनसे जवाब मांगा है कि जल जीवन मिशन का 45% बजट मुख्यमन्त्री के चुनाव क्षेत्र सिराज और जल शक्ति मन्त्री महेन्द्र सिंह के क्षेत्र धर्मपुर में ही क्यों खर्च हो रहा है। अनिल ने आंकड़े रखते हुए कहा है कि सिराज में 270 करोड़ और धर्मपुर में 170 करोड़ खर्च किये जा रहे हैं और जिले के आठ अन्य क्षेत्रों को पूरी तरह नजरअन्दाज कर दिया गया है। अनिल के इस आरोप का कोई जवाब नहीं आ पाया है।
मण्डी जिले में ही अन्य चुनाव क्षेत्रों के साथ हो रहे भेदभाव के इन आरोपों का आगे चलकर क्या असर पड़ेगा यह तो आगे ही पता चलेगा। लेकिन इस तरह के भेदभाव के आरोप प्रदेश के और भी कई क्षेत्रों में लग रहे हैं और शायद ऐसे ही सवालों से बचने के लिये वित्त राज्य मन्त्री अनुराग ठाकुर और पालमपुर से ताल्लुक रखने वाली राज्यसभा सांसद इन्दु गोस्वामी ने इन चुनावों में समय देना उचित नहीं समझा।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर के गृह जिला मण्डी में कांगनी धार को पर्यटन विकास और अन्य गतिविधियों के लिये विकसित किया जा रहा है। यह काम पर्यटन निगम के माध्यम से किया जा रहा है। निगम ने इसके लिये एक कन्सलटैन्ट की सेवाएं ले रखीं हैं जिसने इसका ग्राफिक्ल विडियो भी तैयार किया है। जिलाधीश मण्डी ने यह विडियो रिलीज़ किया है। मण्डी को छोटी काशी भी कहा जाता है क्योंकि यहां पर भगवान शिव के भूतनाथ और पंचवक्र महादेव जैसे मन्दिर स्थित हैं। संभवतः शिव नगरी के कारण ही कांगनी धार प्रौजैक्ट को शिव धाम का नाम दिया गया है। यह कार्य दो चरणों में पूरा होगा फेज -1 को अन्तिम रूप दे दिया गया है। इसकी अनुमानित लागत 40 करोड़ आंकी गयी है और यह चालीस करोड़ इसके लिये जारी भी कर दिये गये हैं।
इस कार्य के लिये निविदायें 20-11-2020 से 25-11- 2020 के बीच आमन्त्रित की गयी थी। इन निविदाओं में इस कार्य की लागत 18 करोड़ रखी गयी थी। इसमें चार कंपनीयों ने टैण्डर में भाग लिया था। 25-2-2021 को यह कार्य मुंबई की एक कंपनी को 36 करोड़ में आंबटित कर दिया गया है। यह कार्य 18 करोड़ से 36 करोड़ का कैसे हो गया इसका कोई खुलासा नहीं किया गया है। सरकार की ओर से इसका कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं हुआ है जबकि इन निगम चुनावों में धर्मशाला में पूर्व मन्त्री सुधीर शर्मा ने इस पर सवाल भी उठाया है।
इसमें यह सवाल उठता है कि शिवधाम के नाम से क्या यह कार्य अपरोक्ष में धार्मिक भावनाओं का प्रतीक नहीं बन जायेगा। अभी तक संविधान में सरकार धर्म निरपेक्ष ही है। ऐसे में यदि पुराने शिव मन्दिरों का ही जीर्णोद्धार कर दिया जाता तो कोई प्रश्न उठने का स्कोप ही नहीं रह जाता। लेकिन जब सरकार अपने स्तर पर शिव धाम स्थापित करने जा रही है तो निश्चित रूप से धर्म निरपेक्षता पर सवाल उठेगा ही। पहले फेज के काम को 18 माह में सितम्बर 2022 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन टैण्डर आमन्त्रण और उसको अन्तिम रूप देने से पहले ही इसकी लागत दो गुणा कैसे बढ़ गयी इसको लेकर कई तरह की चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। पर्यटन विभाग मुख्यमन्त्री के अपने पास है लेकिन यह लागत इस बढ़ा दिये जाने की जानकारी मुख्यमन्त्री को है या नहीं इस पर विभाग कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। वैसे सरकार में न्यूनतम निविदा को नज़रअन्दाज करके अधिकतम को काम देने का चलन शुरू हो चुका है। बिलासपुर के बन्दला में बन रहे हाइड्रोकालिज में भी न्यूनतम निविदा 92 करोड़ थी लेकिन बिना कोई कारण बताये यह काम भी 100 करोड़ में दे दिया गया है। इस पर उठे सवालों का जवाब भी सरकार ने नहीं दिया है।
सचिव शहरी विकास के पास पांच माह से आगामी कारवाई के लिये मामला लंबित
कांग्रेस ने उठाये सवाल
शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के मनोनीत पार्षद संजीव सूद को निदेशक शहरी विभाग हिमाचल प्रदेश ने झूठा शपथ पत्र दायर करने का दोशी पाते हुए उन्हें पार्षद बनने के लिये अयोग्य पाते हुए उन्हें निलंबित करने का आदेश पारित किया है। निदेशक शहरी विकास ने 3-11-2020 को इस आशय का आदेश पारित करते हुए इस मामले की फाईल अगले आदेशों के लिये प्रदेश सरकार के सचिव शहरी विकास विभाग को भेज दी थी। लेकिन 3-11-2020 को हुए इस आदेश पर पांच माह में अगली कारवाई नहीं हो पायी है। शिमला शहरी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पूर्व पार्षद जितेन्द्र चौधरी ने इस विषय पर सरकार के आचरण को लेकर गंभीर सवाल उठाये हैं। जितेन्द्र चौधरी ने इस संद्धर्भ में आयोजित पत्रकार वार्ता में स्थानीय विधायक एंवम मन्त्री शहरी विकास विभाग और मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर पर इस मामले में पक्षपात करने के आरोप लगाये हैं। संजीव सूद ने इस मामले में यह कहा है कि उनके ऊपर लगे अवैध कब्जे के आरोप में दो बार डिमार्केशन हुई है और इसमें अवैधता नहीं पायी गयी है।
स्मरणीय है कि जब संजीव सूद को नगर निगम शिमला के लिये पार्षद मनोनीत किया गया था तब एक रोकश कुमार ने 28-2-2020 और फिर 20-3-2020 को मुख्यमन्त्री, सचिव शहरी विकास और आयुक्त नगर निगम शिमला को शिकायत भेजी थी कि संजीव सूद ने पार्षद के लिये गलत शपथ पत्र दायर किया है। जबकि उसके खिलाफ अधिनियम की धारा 253 और 254 (1) के तहत मामला दर्ज था और लंबित चल रहा था। यह दोनो शिकायतें सरकार ने निदेशक शहरी विकास को 29-5-2020 को यह जांचने के लिये भेज दी कि इनके परिदृश्य मेे संजीव सूद पार्षद मनोनीत होने के लिये पात्र हैं या नहीं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि निदेशक शहरी विकास को इस सबकी सूचना राकेश कुमार ने 26-5-2020 को दे दी थी। लेकिन निदेशक के यहां से कोई कारवाई न होने पर राकेश कुमार ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत में मामला दर्ज करवा दिया। इस पर अदालत ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश कर दिये और अन्ततः यह एफआईआर दर्ज भी हो गयी।
संजीव सूद के खिलाफ दो आरोप लगे है। एक है कि उसने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है। इसको लेकर एसडीएम शहरी के पास अभी तक मामला लंबित चल रहा है और इसको लेकर निदेशक ने कोई आदेश पारित नहीं किये हैं। दूसरा आरोप लगा था कि उसने 5.25 वर्ग मीटर का एक अवैध निर्माण कर रखा है। इस अवैध निर्माण को लेकर आयुक्त नगर निगम के पास मामला चला। वहां पर संजीव सूद ने यह ब्यान दे दिया कि उसने निर्माण को हटा दिया है और इस आशय का आयुक्त के पास शपथ पत्र भी दायर कर दिया। इस शपथ पत्र पर निगम के अधिकारी ने मौके का निरीक्षण किया तो पाया कि अवैध निर्माण को हटाने की बजाये 206.42 वर्ग मीटर का अवैध निर्माण कर रखा है जिसको लेकर निगम आयुक्त के पास अभी भी मामला लंबित चल रहा है। इस तरह निगम आयुक्त के पास अवैध निर्माण को लेकर गलत शपथ पत्र दायर करने का दोषी पाये जाने पर निदेशक शहरी विकास ने मामले का जांच अधिकारी होने के नाते संजीव सूद को पार्षद होने के लिये आयोग्य करार दिया है।
सचिव शहरी के पास निदेशक का यह फैसला पांच माह से आगामी कारवाई के लिये लंबित पड़ा हुआ है। इस समय चार नगर निगमों के लिये चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में इस समय कांग्रेस को यह मामला सरकार पर हमला करने के लिये एक सशक्त हथियार मिल गया है।