Thursday, 23 April 2026
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अभी तक जारी नहीं हो पायी एससी एसटी ओबीसी छात्रों की छात्रवृत्ति

पढ़ाई छोड़ने की कगार पर पहुंचे सैकड़ों छात्र
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों को पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति प्रदान करती है। यह छात्रवृत्ति सरकारी और प्राइवेट तथा हिमाचल या हिमाचल से बाहर पोस्ट मैट्रिक शिक्षा ग्रहण कर रहे प्रदेश के बच्चों को दी जाती है। इस योजना के तहत पंजाब के मोहाली स्थित वी.जे.ई.एस. गु्रप शिक्षण संस्थान में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठयक्रमों में प्रदेश के कई बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन इन छात्रों को वर्ष 2017, 2018 और 2019 से यह भुगतान नहीं किया जा रहा है। शिक्षा विभाग भुगतान न किए जाने के कारणों से इन छात्रों और इनके अभिभावकों को कोई भी संतोषजनक कारण नहीं बता रहा है। जबकि छात्रों ने इसके लिए वांच्छित सारे सत्यापित दस्तावेज समय पर विभाग को भेज रखे हैं। इस छात्रवृत्ति के सहारे ही इन वर्गों के छात्र ऐसे संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन जब उन्हें सरकार से उचित समय पर यह छात्रवृत्ति ही नहीं मिलेगी तो यह लोग पढ़ाई कैसे जारी रख पायेंगे यह एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
पिछले दिनों एससी वर्ग के लोगों ने शिमला में एक आयोजन करके यह आरोप लगाया था कि सरकार इन वर्गों के लिए आवंटित बजट का केवल 7% ही इनके लिए खर्च कर रही है इस आशय का एक ज्ञापन भी राज्यपाल को सौंपा गया है। लेकिन इसके बावजूद व्यवहारिक स्थिति यह है।
यही नहीं इन वर्गों के नेताओं के लिए भी यह सवाल बना हुआ है क्योंकि इस समय सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी एस सी समुदाय से हैं। सरकार में मंत्री भी ओबीसी समुदाय से हैं। अभी जब स्वर्ण आयोग के गठन को लेकर 300 किलोमीटर की पदयात्रा और शिमला में स्वर्ण आयोग के समर्थकों द्वारा आरक्षण की शव यात्रा निकालने का मामला गरमाया तब एस सी के नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। इसे संविधान का अपमान बताकर उच्च न्यायालय से इस आश्य की याचिका दायर करने की बात की। लेकिन इन लोगों के लिए सैकड़ों बच्चों की यह समस्या कोई व्यवहारिक अर्थ नहीं रख रही है। बल्कि इससे यही संदेश जाता है कि इन वर्गों के नेताओं के लिए इनके नाम पर राजनीति करना ही प्राथमिकता है इनकी समस्याओं का हल नही।

बेबी केयर किट खरीद पर उठते सवालों का जवाब कब आयेगा

शिमला/शैल। जयराम सरकार अटल आशीर्वाद योजना के तहत नवजात शिशुओं और उनकी माताओं के लिये एक बेबी किट दे रही है। इस किट मेंं कुल 15 चीजें रखी गई हैं जो नवजात जच्चा-बच्चा दोनों के लिए उपयोगी मानी गयी है। 2019 से यह योजना लागू है। अभी कोविड कॉल में 01-04-2020 से 31-01-2021 तक 104738 किट खरीदी गयी है। इसके लिये ई- टेंडर के माध्यम से निविदायें मांगी गयी और इसमें 8 फर्मां ने भाग लिया। यह किट प्रदेश के स्वास्थय संस्थानों को दिए गए हैं। यह खरीद 1074.98 रुपए प्रति किट के हिसाब से हुई है। इस पर आम चर्चा है कि जो किट सरकार ने 1074.98 में खरीदी है उसकी बाजार में कीमत 500 से 600 के बीच है। उप चुनावों के दौरान सोलन से कांग्रेस नेता कुशल जेठी ने एक पत्रकार वार्ता में यह मुद्दा उठाया था और इस पर जांच की मांग की थी। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया है।
स्मरणीय है की 24 मार्च 2020 को कोरोना के कारण पूरे देश में लाकडाउन लग गया था। उस दौरान अस्पतालों की वर्किंग भी प्रभावित हुई थी । लोगों ने अस्पताल जाना छोड़ दिया था। इस दौरान कैसे यह किट प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचे होंगे यह अपने में एक सवाल बनकर खड़ा है और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी अधिकारी इस पर कुछ भी नही कह पा रहे हैं। इसी कारण से करोड़ों की इस खरीद पर सवाल उठ रहे हैं।

कांग्रेस की जनचेतना यात्रा से उठते कुछ सवाल

शिमला/शैल। प्रदेश में हुए उपचुनाव में चारों सीटें जीतने के बाद कांग्रेस ने जन चेतना यात्रा शुरू की है। प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर इस यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश में जाएंगे । राठौड़ जहां भी जा रहे हैं उन्हें वहां पर कार्यकर्ताओं और जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है । यह समर्थन प्रमाणित कर रहा है जनता सही में वर्तमान सरकार से खुश नहीं है। महंगाई और बेरोजगारी ने हर आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित किया हुआ है। इन्हीं मुद्दों पर जनता को और जागरूक किया जा रहा है । इस यात्रा में स्थानीय नेताओं और संबंधित जिला के नेताओं को शामिल किया जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में इस तरह की यात्रा आवश्यक है ताकि जनता ने जो नाराजगी इन उपचुनावों में सरकार के प्रति दिखाई है उसे अगले चुनावों तक बरकरार रखा जा सके ।यह यात्रा जहां कांग्रेस की राजनीतिक आवश्यकता है वहीं पर इस यात्रा से कुछ सवाल भी उभरे हैं।
यह सही है कि इस समय महंगाई और बेरोजगारी से हर आदमी परेशान है। लेकिन कल को यदि महंगाई पर सरकार नियंत्रण कर लेती है और कुछ आवश्यक चीजों की कीमतें घटा दी जाती हैं तब भी क्या यह नाराजगी बरकरार रहेगी? इस सवाल पर यात्रा में यह नहीं बताया जा रहा है कि इस महंगाई और बेरोजगारी के मूल कारण क्या है। वह कौन सी आर्थिक नीतियां हैं जिनके कारण यह सब हो रहा है। जनता को यह नहीं बताया जा रहा है कि आज बैंकों का एनपीए ढाई लाख करोड़ से बढ़कर दस खरब करोड़ क्यों हो गया है । सरकार कृषि कानूनों को वापस क्यों नहीं ले रही है । इन कानूनों का दुष्प्रभाव किसान ही नहीं हर आदमी पर पड़ेगा । जनता को बुनियादी मुद्दों पर जागरूक करने की आवश्यकता है जो शायद नहीं किया जा रहा है।
इससे भी बड़ा सवाल यह है की इस यात्रा में कुलदीप राठौर के साथ प्रदेश स्तर के अन्य नेता एक टीम की शक्ल में देखने को नहीं मिल रहे हैं । इस समय कांग्रेस से यह सवाल पूछा ही जाएगा कि उसका अगला नेता कौन है। मुख्यमंत्री का संभावित चेहरा कौन होगा? यदि इस यात्रा में राठौर के साथ नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री , सी डब्लयू सी सदस्य आशा कुमारी पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुक्खू और कौल सिंह ठाकुर तथा मीडिया प्रमुख की जिम्मेदारी निभा रहे हर्षवर्धन चौहान साथ होते तो इससे टीम की शक्ल में पार्टी की एकजुटता का संदेश जाता। बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में यह सवाल उछले।

2018 में प्रदूषण बोर्ड के अध्यक्ष पद के लिए आये आवेदनों पर अब तक फैसला क्यों नही

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए नये नियम
शिमला/शैल। इन दिनों प्रदूषण को लेकर दिल्ली में जो स्थिति बनी हुई है उसने पूरे देश का ही नहीं वरन पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार से केंद्र सरकार तक को इसमें कड़ी फटकार लगायी है। सर्वोच्च न्यायालय की प्रताड़ना से यह सवाल उठ रहा है कि इसका केंद्र और राज्य सरकारों पर असर कितना हो रहा है। नवम्बर 2017 में एनजीटी ने एक फैसले में शिमला और अन्य प्लानिंग क्षेत्रों में भवन निर्माण को लेकर निर्देश दिये थे कि यहां पर अढाई मंजिल से ज्यादा के निर्माण ना हो। यह भी निर्देश दिए थे कि 1978 से चली आ रही अन्तरिम योजना के स्थान पर नई और स्थायी योजना लाई जाये। लेकिन एनजीटी के इन निर्देशों का कितनी इमानदारी से पालन हुआ है इसका अन्दाजा इस दौरान बने दर्जनों बहुमंजिला भवनों से लगाया जा सकता है। पिछले दिनों कच्ची घाटी में एक आठ मंजिला भवन के गिरने के बाद कुछ दिन सक्रियता नजर आयी जो अब गायब है। बल्कि अब तो नयी योजना लायी गयी है वह एकदम एनजीटी के आदेशों को अंगूठा दिखाने जैसी है क्योंकि इसमें कोर एरिया में भी चार मंजिला निर्माणों की स्वीकृति देने की बात की गयी है। सरकार का टी सी पी विभाग यह योजना ला रहा है। इस पर जनता और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की प्रतिक्रिया क्या होगी यह आने वाले दिनों में पता लगेगा। लेकिन इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार अदालत के फैसलों को कितनी अहमियत देती है।
स्मरणीय है कि 2017 में ही सर्वोच्च न्यायालय में एक और याचिका भी दायर हुई थी। इस याचिका में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में अध्यक्ष और सदस्य सचिवों की नियुक्तियों को लेकर कोई निश्चित नियम और योग्यता आदि ना होने का मुद्दा उठाया गया था। यह कहा गया था कि राजनीतिक नेताओं को अध्यक्ष पदों पर नियुक्तियां दी जा रही है और सदस्य सचिवों के पदों पर सरकार ऐसे अधिकारियों को नियुक्त कर रही है जो सरकार के इशारों पर नाचते हैं। इस याचिका में आग्रह किया गया था कि इन पदों पर नियुक्तियों के लिए आवश्यक योग्यता और नियम तय किये जायें। इस पर याचिका में हिमाचल का भी नाम था क्योंकि यहां एक पूर्व विधायक को अध्यक्ष लगाया गया था। इस याचिका पर फैसला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश दिये थे कि छः माह के भीतर यह नियम बनाये जायें और इनके भरने के लिए विज्ञापन जारी करके आवेदन आमंत्रित किए जायें। यह थे निर्देश Keeping the above in mind, we are of the view that it would be appropriate, while setting aside the judgment and order of the NGT, to direct the Executive in all the States to frame appropriate guidelines or recruitment rules within six months, considering the institutional requirements of the SPCBs and the law laid down by statute, by this Court and as per the reports of various committees and authorities and ensure that suitable professionals and experts are appointed to the SPCBs. Any damage to the environment could be permanent and irreversible or at least long-lasting. Unless corrective measures are taken at the earliest, the State Governments should not be surprised if petitions are filed against the State for the issuance of a writ of quo warranto in respect of the appointment of the Chairperson and members of the SPCBs. We make it clear that it is left open to public spirited individuals to move the appropriate High Court for the issuance of a writ of quo warranto if any person who does not meet the statutory or constitutional requirements is appointed as a Chairperson or a member of any SPCB or is presently continuing as such.
यह फैसला और निर्देश 2017 के अन्त तक जारी हुए थे। इन पर अमल 2018 में शुरू होना था। जयराम सरकार ने इन निर्देशों पर अमल करते हुए अध्यक्ष पद भरने के लिए विज्ञापन जारी करके आवेदन आमंत्रित किये थे। इस पर कई आवेदन आये हैं। लेकिन चार वर्षों में सरकार इनमें से कोई चयन नहीं कर पायी है। याचिका में यह आग्रह किया गया था कि इन पदों पर नियुक्तियां पांच-पांच वर्ष के लिये की जायें। लेकिन सरकार ने न तो यह नियम ही अब तक सार्वजनिक किये हैं और न ही आये हुये आवेदनों पर चार वर्ष में कोई फैसला लिया है। अब यह मामला फिर उच्च न्यायालय में पहुंच चुका है और माना जा रहा है कि शीर्ष अदालत प्रदेशों के मुख्य सचिवों को अदालत में कोई कड़े आदेश सुनायेगी। चर्चा है कि जयराम सरकार अभी पदोन्नत हुए मुख्य अभियंता प्रवीण गुप्ता को सदस्य सचिव के पद पर तैनात करना चाहती है और उसी के लिए सारी देरी की जा रही है।

क्या जयराम हटेंगे- महंगाई को हार का कारण बनाकर केंद्र के सिर ठीकरा फोड़ने से उठी चर्चा

चारों सीटें हारने से शैल के आकलन पर लगी जनता की मोहर

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने उपचुनाव में मिली हार के लिये महंगाई को जिम्मेदार ठहरा कर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है। जयराम के ब्यान के बाद केंद्र के निर्देशों पर भाजपा शासित राज्यों में राज्य सरकारों द्वारा पेट्रोल-डीजल पर लगाये अपने करों में कटौती करके उपभोक्तओं को कुछ राहत भी प्रदान की है। इससे यह प्रमाणित हो जाता है की जनता में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से भारी आक्रोश है। यह आक्रोश इस हार के रूप में सामने आया और इसके परिणाम स्वरूप कीमतों में कमी आ गयी। बल्कि अब जनता में यह चर्चा चल पड़ी है कि यदि इतनी सी हार से कीमतों में इतनी कटौती हो सकती है तो इसमें और कमी का प्रयोग किया जाना चाहिये। यह सही है कि जयराम के ब्यान के बाद ही यह सब कुछ घटा है। लेकिन क्या जयराम इसी से अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं? क्या राज्य सरकारों को उपचुनाव से पहले यह समझ ही नही आया कि महंगाई बर्दाश्त से बाहर हो रही है? उप चुनाव की घोषणा के साथ ही खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ाकर क्या जयराम सरकार ने जनता के विवेक को चुनौती नहीं दी? प्रदेश की जनता ने चार नगर निगमों में से तीन में भाजपा को हराकर सुधरने की चुनौती दी थी और सरकार ने इस चुनौती का जवाब धर्मशाला नगर निगम में तोड़फोड़ करके दिया। तोड़-फोड़ की राजनीति को सफलता मान लिया गया। लेकिन जमीन पर काम नही कर पायी। हर काम केवल घोषणा तक सीमित होकर रह गया। जैसा कि केंद्र द्वारा घोषित 69 फोरलेन सड़कों की हकीकत आज भी सै(ांतिक संस्कृति से आगे नही सरक पायी है। युवाओं के लिये जब भी किसी विभाग में कोई नौकरियों की घोषणाएं की गई और प्रक्रिया शुरू की गयी तो ऐसी घोषणाएं भी एक ही बारी में अमली शक्ल नही ले पायी है। अधिकांश ऐसी घोषणाओं में कभी अदालत तो कभी किसी और कारण से व्यवधान आते ही रहे हैं। केंद्र की तर्ज पर राज्य सरकार भी घोषणाओं की सरकार बनकर रह गयी है। इन्हीं घोषणाओं के सिर पर सर्वश्रेष्ठता के कई पदक भी हासिल कर लिये हैं। इन्हीं कोरी घोषणाओं का परिणाम है कि आज 20 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान हुआ और हर एक में नोटा का प्रयोग हुआ। उपचुनावों में नोटा का प्रयोग होना सीधे सरकार से अप्रसन्नता का प्रमाण होता है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यदि 68 विधानसभा क्षेत्रों में ही नोटा का प्रयोग हुआ तो परिणाम क्या हो सकते हैं इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं होगा।
2014 की लोकसभा 2017 की विधानसभा और 2019 के लोकसभा के चुनाव सभी केंद्र की सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़े और जीते गये हैं। इन सभी चुनाव में वीरभद्र और उनके परिजनों के खिलाफ बने आयकर ईडी और सीबीआई के मामलों को खूब उछाला गया। इस बार यह पहला उपचुनाव है जो राज्य सरकार के कामकाज और मुख्यमंत्री के चेहरे पर लड़ा गया। इस उपचुनाव में कांग्रेस के किसी नेता के खिलाफ कोई मामला मुद्दा नहीं बन पाया। बल्कि भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता ने कांग्रेस को नेता वहीन संगठन करार दिया। कोविड में कांग्रेस द्वारा बारह करोड़ के खरीद बिल अपनी हाईकमान को भेजने के मामले को मुख्यमंत्री ने इन चुनावों में भी उछालने का प्रयास किया और जनता ने इसे हवा-हवाई मानकर नजरअंदाज कर दिया। ऐसे में यदि भाजपा की भाषा में नेता वहीन कांग्रेस ने जयराम सरकार को चार-शून्य पर उपचुनावों में ही पहुंचा दिया तो आम चुनाव में क्या 68-शून्य हो जाना किसी को हैरान कर पायेगा। इन उपचुनावों की पूरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्रा और उनकी टीम पर थी। इस उपचुनाव में महंगाई और बेरोजगारी ही केंद्रीय मुद्दे रहे हैं। जो सरकार मंत्रिमंडल की हर बैठक में नौकरियों का पिटारा खोलती रही और मीडिया इसको बिना कोई सवाल पूछे प्रचारित करता रहा है उसका सच भी इन परिणामों से सामने आ जाता है। यह परिणाम मुख्यमंत्री और उनकी टीम के अतिरिक्त भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा पर भी सवाल खड़े करते हैं क्योंकि वह हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं और दो बार प्रदेश में मंत्री भी रहे हैं।
इससे हटकर यदि शुद्ध व्यवहारिक राजनीति के आईने से आकलन करें तो पहला सवाल ये उठता है कि इस उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल दोनों स्टार प्रचारकों की सूची में थे। लेकिन प्रेम कुमार धूमल एक दिन भी प्रचार पर नहीं निकले। शांता कुमार ने मंडी और अपने गृह जिला कांगड़ा की फतेहपुर सीट पर प्रचार किया। परिणाम दोनों जगह हार रहा। जनता ने शांता कुमार पर भी भरोसा नहीं किया। जनता ने शांता पर क्यों भरोसा नहीं किया और धूमल क्यों प्रचार पर नहीं निकले? इस पर जब नजर दौड़ायें तो सबसे पहले शांता की आत्मकथा सामने आती है। शांता ने भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने के जो आरोप अपनी ही सरकार पर लगाये हैं क्या उनके बाद भी कोई आदमी भाजपा पर विश्वास कर पायेगा इन्हीं शांता कुमार ने इन उप चुनावों की पूर्व संध्या पर जब मानव भारती विश्वविद्यालय का फर्जी डिग्री कांड उठाया और आरोप लगाया कि डिग्रियां बिकती रही और सरकार सोयी रही। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और डीजीपी संजय कुंडू ने इस बारे में बात करके यहां तक कह दिया कि जिनको जेल में होना चाहिये वह खुले घूम रहे हैं। क्या यह इशारा धूमल की ओर नहीं था। इस मामले में जब शैल ने दस्तावेज जनता के सामने रखते हुए यह पूछा कि जयराम सरकार ने इस मामले में एफ आई आर दर्ज करने में 2 साल की देरी क्यों कर दी। इस सवाल से सारा परिदृश्य बदल गया और सभी शांत हो गये। ऐसे में यदि धूमल प्रचार पर निकलते तो क्या इस हार को उनके सिर लगाया जाता?
इसी तरह इस उपचुनाव में उछले परिवारवाद के मुद्दे पर भी भाजपा अपने ही जाल में उलझ गयी। मण्डी और जुब्बल कोटखाई में परिवारवाद की परिभाषा बदल गयी। यही नहीं चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह का ब्यान सुरेश भारद्वाज और प्रदेश प्रभारी अविनाश खन्ना का सामने आया उसे सीधे इन नेताओं की नीयत ही सवालों में आ गयी। इन उपचुनावों में वह मामले तो उछले ही नहीं जो इनके ही लोगों द्वारा करवाई गई एफ.आई.आर. से उठे हैं। यदि कल को उन मामलों को लेकर कोई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा देता है तो उसके परिणाम कितने भयानक होंगे उसका अंदाजा लगाना आसान नहीं होगा। क्योंकि उससे 68-शून्य होना कोई हैरानी नहीं होगी। आज उपचुनावों में मिली हार आने वाले समय में पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर भी घातक प्रमाणित होगी यह तह है। इस परिदृश्य में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन होता है या नहीं। कांग्रेस के लिए जयराम सबसे आसान टारगेट होंगे। क्योंकि जिस तरह के सलाहकारों और चाटुकारों से मुख्यमंत्री घिर गये है उनसे बाहर निकलना शायद अब संभव नहीं रह गया है। जितने मुद्दे जयराम ने अपने लिये खड़े कर लिये हैं वह स्वाभाविक रूप से आने वाले दिनों में एक-एक करके जनता के सामने आयेंगे। अब शायद अधिकारी भी मुख्यमंत्री या उनकी मित्र मंडली के आगे मूकबघिर बनकर डांस करने से परहेज करेंगे। क्योंकि यदि मुख्यमंत्री परिणामों के तुरंत बाद हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर पद त्यागने की पेशकश कर देते तो शायद उनके राजनीतिक कद में सुधार हो जाता। लेकिन सलाहकारों ने महंगाई पर ब्यान दिलाकर स्थिति को और बिगाड़ दिया है।

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