शिमला/शैल। उप चुनावों के बाद पहली बार अपने घर बिलासपुर आये भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने वहां बने एम्स के उद्घाटन के अवसर पर प्रदेश की जनता से आग्रह किया है कि वह जो काम करें उसकी पीठ थपथपायें और जो काम न करें उसे घर बिठायें। इसी के साथ अपने पार्टी के लोगों से भी उन्होंने कहा है कि वह स्ट्रांग लीडर की खोज करें। राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा का हिमाचल अपना घर है और वह दो बार यहां मंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष के अपने गृह राज्य में ही भाजपा की सरकार होने के बावजूद यदि पार्टी उपचुनाव में सारी सीटें हार जायें तो इस पर राष्ट्रीय स्तर पर तो पहले सवाल उनसे पूछे जायेंगे। शायद इसीलिए उपचुनावों की हार राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया की चर्चा बनी। क्योंकि हिमाचल जैसे छोटे से राज्य से राष्ट्रीय अध्यक्ष होने से हिमाचल की भी पहचान बनी है। नड्डा के अपने लिये भी इस हार के दूरगामी परिणाम होंगे। इन्हीं परिणामों की आहट के कारण ही वह प्रदेश की सरकार को चाहकर भी न तो खुलकर अभयदान दे पा रहे हैं और न ही अनुशासन का चाबुक चला पा रहे हैं।
स्मरणीय है कि विधानसभा की तीनों ही सीटों पर जब उम्मीदवारों की घोषणा हुई थी तो तीनों ही जगह विरोध और विद्रोह के स्वर मुखर हुये थे। अर्की से गोबिंद राम शर्मा ने तो चुनाव प्रचार के लिए अपनी डयूटी ही बाहर लगवा ली थी। फतेहपुर से तो कृपाल परमार को तो मुख्यमंत्री अपने साथ हेलीकॉप्टर में बिठाकर ही ले आये थे। कोटखाई में तो बरागटा ने निर्दलीय होकर चुनाव लड़ भी लिया और पार्टी के उम्मीदवार की तो जमानत तक जब्त हो गयी। बरागटा का टिकट कटने पर ही यह बाहर आया था कि प्रदेश नेतृत्व तो उन्हें टिकट देना चाहता था परंतु हाईकमान ने काट दिया। हिमाचल के संदर्भ में यह हाईकमान नड्डा ही थे और हैं क्योंकि यह उनका अपना गृह राज्य है। तीनों जगह टिकटों के गलत आवंटन का आरोप लगा है और अपरोक्ष में यह आरोप नड्डा पर ही आता है। शायद इसीलिए वह खुलकर स्पष्ट कुछ भी नहीं बोल पा रहे हैं।
लेकिन अभी एम्स के उद्घाटन के अवसर पर ही जिस तरह से पुलिसकर्मियों के परिजनों ने मौन प्रदर्शन किया है वह नड्डा के लिये एक पर्याप्त संकेत और संदेश हो जाता है कि प्रदेश के कर्मचारीयों ही की क्या दशा है। क्योंकि जेसीसी की बैठक के बाद पहला प्रदर्शन बीएमएस के लोगों ने किया और दूसरा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने किया। आउटसोर्स पर लगे कर्मचारी अपने लिये एक निश्चित नीति की मांग कर रहे हैं। सरकार के फैसले के कारण जेबीटी प्रशिक्षु और बी एड में टकराव की स्थिति बन चुकी है। इस तरह प्रदेश कर्मचारियों का एक बहुत बड़ा वर्ग सरकार से नाराज चल रहा है। यह पूरी तरह सामने आ चुका है।
उपचुनावों में हार के कारण जानने के लिए हुए मंथन में भी एक राय नहीं बन पायी है। यह रणधीर शर्मा और सुरेश कश्यप के अलग-अलग ब्यानों से सामने आ चुका है। राजीव बिंदल के करीबी पवन गुप्ता ने तो त्यागपत्र देने का सबसे बड़ा कारण ही मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा भ्रष्टाचार को संरक्षण देना बताया है। कृपाल परमार ने यहां तक कह दिया कि अब जलालत सहने की सारी हदें पार हो गयी हैं। पार्टी ने भले ही इन त्याग पत्रों पर ज्यादा चर्चा नहीं होने दी है। लेकिन जनता के पास तो यह सब कुछ पहुंच चुका है। बल्कि इसके बाद यहां और मुखरता के साथ चर्चा में आ गया है कि धूमल के करीबियों को इस सरकार में चुन-चुन कर हाशिये पर धकेलने के प्रयास हुये हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालय को लेकर तो जयराम और अनुराग ठाकुर का टकराव तो एक ही मंच पर सामने भी आ चुका है। यह सब प्रदेश की जनता के सामने घटा है और वह याद रखे हुए हैं। आज जब नड्डा काम की परख की बात करते हैं तो यह सही है। क्योंकि हर सरकार यही दावा करती है कि उसने बहुत काम किये हैं। अपने कामों के लिये सर्वश्रेष्ठता के पुरस्कार भी सरकारें प्राप्त कर लेती हैं। जो सर्वश्रेष्ठता आज जयराम सरकार को मिल रही है पूर्व में वही सर्वश्रेष्ठता के पुरस्कार प्रो. धूमल और फिर वीरभद्र की सरकारों को भी मिल चुके हैं। लेकिन इन पुरस्कारों की जमीनी हकीकत की भुक्तभोगी रही जनता ने उनको रिपीट नहीं करवाया। उनके वक्त में ऐसे उपचुनाव नहीं आये थे अन्यथा वह अपना संदेश पहले ही दे देती। आज जयराम के वक्त में आये यह उपचुनाव और उनके परिणाम नड्डा के आग्रह पर पूरे उतरते हैं। जनता ने अपना फैसला एक तरह से सुना दिया है। इस फैसले को पढ़ना या इस पर आंखें बंद कर लेना यह राष्ट्रीय अध्यक्ष का अपना इम्तहान होगा।
क्योंकि जब वह स्ट्रांग लीडर तलाशने की बात करते हैं तब वह यह तलाश कार्यकर्ताओं के जिम्मे लगाकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते। पुलिस कर्मियों के परिजन अपने नेता को मिलने आये थे उसके सामने अपनी बात रखने आये थे यदि अपने नेता को मिलने के लिये भी उनके खिलाफ कार्रवाई की बात हो और नड्डा इस पर भी खामोश रहे तो इसी से भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है
शिमला/शैल। हिमाचल कांग्रेस के लिए 2014 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद यह 202
1 के उप चुनाव जीतना एक बहुत बड़ी जीत है। शायद इतनी जीत की उम्मीद कांग्रेस को भी नहीं थी। इन उपचुनावों में सरकार भाजपा और कांग्रेस सभी के आकलन फेल हुये हैं। यदि कांग्रेस को उम्मीद होती कि वह मंडी का लोकसभा उपचुनाव जीत जायेगी तो शायद प्रतिभा सिंह की जगह कॉल सिंह या सुखराम का पौत्र आश्य शर्मा यहां से उम्मीदवार होते। प्रतिभा सिंह को अर्की से विधानसभा ही लड़नी पड़ती और वह इंकार न कर पाती। यदि राष्ट्रीय स्तर पर बदल रहे राजनीतिक परिदृश्य को पंडित सुखराम थोड़ा सा भी समझ पाते तो अनिल शर्मा 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ही भाजपा और उसकी विधायकी छोड़कर कांग्रेस में जा चुके होते। यह सब इस समय इसलिए प्रसांगिक है क्योंकि अभी भी सभी पक्षों के नेता गण जन आकलन नहीं कर पा रहे हैं।
कांग्रेस में चारों उपचुनाव जीतने के बाद अभी से अगले मुख्यमंत्री के लिए रेस लग गयी है। इस रेस के संकेत हॉली लॉज में पिछले दिनों हुये आयोजन से उभरने शुरू हो गये हैं। प्रतिभा सिंह की जीत के बाद जिस तरह से कुछ लोग उन्हें जीत की बधाई देने पहुंचे और इस जीत पर जिस तरह से भोज दिया गया तथा कांग्रेस ऑफिस से बाहर पत्राकार सम्मेलन का आयोजन किया गया उससे यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि वह अब प्रदेश कांग्रेस की धुरी बनने की भूमिका में आ गयी है। इसी से एक वर्ग उन्हें अभी प्रदेश का अध्यक्ष बनाने की योजना में लग गया है। लेकिन यह वर्ग भूल गया है कि जो लोग उन्हें बधाई देने पहुंचे वह पूरे प्रदेश का नहीं वरन एक क्षेत्रा विशेष का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन जैसे ही यह संकेत सामने आये की वह प्रदेश कांग्रेस का केंद्र होने कीओर बढ़ रही हैं तभी दिल्ली में उनके शपथ ग्रहण समारोह में सारे बड़े नेता नहीं पहुंचे और वहीं से कांग्रेस की एकजुटता पर सवाल उठने शुरू हो गये। प्रतिभा सिंह को वीरभद्र सिंह बनने में समय लगेगा। यह वीरभद्र सिंह ही थे जो अपने विरोधी की योग्यता की भी कदर करते थे। लेकिन उन्ही वीरभद्र सिंह को सुखबिन्द्र सुक्खु को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाने के लिये आनंद शर्मा, आशा कुमारी और मुकेश अग्निहोत्री का साथ लेना पड़ा। इसका परिणाम हुआ की कुलदीप राठौर को अध्यक्ष बनाना पड़ा।
लेकिन कुलदीप राठौर को 2019 के लोकसभा चुनाव और इन चुनावों के कारण आये दो विधानसभा चुनावों में संगठन के सारे बड़े नेताओं का कितना सहयोग मिला वह स्वःवीरभद्र सिंह के उसी ब्यान से स्पष्ट हो जाता है जब उन्होंने यहां तक कह दिया था की मंडी से कोई भी मकर झंडू चुनाव लड़ लेगा। इस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों से निकलकर कुलदीप राठौर की प्रधानगी में ही सोलन और पालमपुर की नगर निगमों में कांग्रेस को जीत हासिल हुई। यही जीत अब उपचुनावों में सामने आ गयी। जबकि इसी दौरान राठौर के राजनीतिक संरक्षक माने जाने वाले आनंद शर्मा का नाम कांग्रेस के असंतुष्ट के जी -23 के ग्रुप का एक बड़ा नाम बनकर सामने आ गया। इस समय कांग्रेस की जीत के श्रेय से कुलदीप राठौर के नाम को हटाना जनता में कोई अच्छा संदेश नहीं देगा। जब कुलदीप राठौर पर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 12 करोड़ के फर्जी बिल बनाकर हाईकमान को भेजने का आरोप लगाया था तब भी कांग्रेस के बड़े नेता उनके पक्ष में नहीं आये थे।
अभी प्रदेश कांग्रेस को वीरभद्र के समय में बने वीरभद्र ब्रिगेड के साथ जुड़े नेताओं कि संगठन में स्थापना के मुद्दे का भी सामना करना पड़ेगा। इसकी पहली जिम्मेदारी प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह पर आयेगी। यह वीरभद्र की रणनीति रहती थी कि वह कई जगह समानांतर सत्ता केंद्र खड़े कर देते थे। लेकिन आज क्या प्रदेश कांग्रेस में इस सामर्थय का कोई नेता है शायद नहीं। फिर चारों उपचुनाव हारने से जो फजीहत भाजपा और जयराम सरकार की हुई है उससे उबरने के लिए भाजपा भी कुछ कदम तो उठायेगी ही। इसमें केंद्र से लेकर राज्यों तक भाजपा सरकारें जांच एजेंसियों का ही सबसे पहले उपयोग करती आयी है। बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में भाजपा कांग्रेस के खिलाफ सौंपे अपने आरोप पत्रों पर कुछ कार्रवाई करने का प्रयास करे। ऐसे में इस समय यदि कांग्रेस में मुख्यमंत्री की रेस अभी से शुरू हो जाती है तो वह संगठन और प्रदेश के हित में नहीं होगी। प्रदेश में पहले से ही स्वर्ण आयोग का भूत सक्रिय हो गया है और विक्रमादित्य सिंह तक इसकी छाया पड़ चुकी है। यहां यह स्मरण रखना होगा कि केंद्र ने क्रीमी लेयर की सीमा 8 लाख करने के बाद उस पर उठने वाले सवालों का रुख मोड़ने के लिए ही इस भूत को जगाया है। बल्कि आने वाले दिनों में भाजपा के बजाय कांग्रेस से लड़ने के लिए आम आदमी पार्टी और टीएमसी भी मैदान में होंगी। क्योंकि जिन कारपोरेट घरानों के इशारे पर कृषि कानून लाये गये थे अब इन कानूनों की वापसी के बाद इन घरानों का रुख टीएमसी की ओर मुड़ गया है। ममता बनर्जी और गौतम अडानी की मुलाकात से इसकी शुरुआत हो चुकी है। प्रदेश कांग्रेस को इन आने वाले खतरों के प्रति अभी से सावधान होना होगा।
क्रीमी लेयर की सीमा आठ लाख करना क्या सही है
क्या स्वर्ण आयोग के पक्षधर विधानसभा में क्रीमी लेयर पर चर्चा करेंगे
शिमला/शैल। पिछले दिनों प्रदेश की राजधानी शिमला में कुछ स्वर्ण संगठनों ने स्वर्ण आयोग की मांग को लेकर 800 किलोमीटर की हरिद्वार तक पदयात्रा करने के कार्यक्रम की घोषणा की है। इस घोषणा के साथ ही शिमला में एट्रोसिटी एक्ट की शव यात्रा भी निकाली है। इस शव यात्रा का अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के संगठनों ने विरोध किया है। इस शव यात्रा को संविधान का अपमान करार देते हुए प्रदेश उच्च न्यायालय में इस आश्य की याचिका दायर करने की भी बात की है। इस शव यात्रा के विरोध में हर जिले में इन वर्गों का नेतृत्व जिलाधीशों के माध्यम से राज्यपाल को ज्ञापन देने की रणनीति पर आ गया है। जो स्वर्ण संगठन स्वर्ण आयोग गठित किए जाने की मांग कर रहे हैं उनकी मांगों में यह भी शामिल है कि आरक्षण जातिगत आधार पर नहीं वरन आर्थिक आधार पर होना चाहिए। क्रीमी लेयर के मानक का कड़ाई से पालन होना चाहिए। यदि इन मांगों को ध्यान से देखा समझा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि यह मांग राजनीति से प्रेरित और अंतः विरोधी है। क्योंकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए 22.5% आरक्षण का प्रावधान देश की पहली संसद द्वारा गठित काका कालेलकर आयोग की सिफारिशें आने पर कर दिया गया था। इसके बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने पर गठित हुए मंडल आयोग की सिफारिशें स्व.वी.पी. सिंह की सरकार के कार्यकाल में लागू करने से अन्य पिछड़ा वर्ग को भी 27% का आरक्षण लाभ मिल गया था। इसी सरकार में इस आरक्षण के खिलाफ आंदोलन हुआ। वीपी सिंह की सरकार इसकी बलि चढ़ गई और आरक्षण का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय में जा पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए आरक्षण का आधार आर्थिक कर दिया। आर्थिक संपन्नता के लिए क्रीमी लेयर को मानक बना दिया। उस समय जो क्रीमी लेयर की सीमा एक लाख तय की गई थी वह आज मोदी सरकार में आठ लाख हो गई है। मोदी सरकार ही क्रीमी लेयर की सीमा दो बार बढ़ा चुकी है। यह है आज की व्यवहारिक सच्चाई। हो सकता है स्वर्ण आयोग के गठन की मांग करने वाले सभी लोगों को इस स्थिति का ज्ञान ही ना हो।
जब सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही हर तरह के आरक्षण का आधार आर्थिक करके क्रीमी लेयर का मानक तक बना दिया है तब आरक्षण के विरोध का आधार कहां बनता है। या तो यह मांग की जाये की किसी भी तरह का आरक्षण हो ही नहीं। चाहे कोई अमीर है या गरीब है किसी के लिए भी आरक्षण होना ही नहीं चाहिये। गरीबों के लिए किसी भी तरह की कोई योजना होनी ही नहीं चाहिये। वेलफेयर स्टेट की अवधारणा ही खत्म कर दी जानी चाहिये। क्या आज स्वर्ण आयोग के गठन की मांग करने वाला कोई भी राजनेता या राजनीतिक दल यह कहने का साहस कर सकता है कि सभी तरह का आरक्षण बंद होना चाहिये। वी.पी. सिंह सरकार के समय में जब मंडल बनाम कमंडल हुआ था तो उस समय किस विचारधारा के लोगों ने आरक्षण का विरोध किया था। अब जब से मोदी सरकार आयी है तब से कई राज्यों में आरक्षण को लेकर आंदोलन हुये हैं। हर आंदोलन में यही मांग उठी है कि या तो हमें भी आरक्षण दो या सबका समाप्त करो। संघ प्रमुख मोहन भागवत तक आरक्षण पर बयान दे चुके हैं। लेकिन इसी सबके साथ जब भी इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण को लेकर कोई व्यवस्था दी तो मोदी सरकार ने संसद में शीर्ष अदालत के फैसले को पलट दिया है।
इस दौरान हिमाचल ही एक ऐसा राज्य रहा है आरक्षण को लेकर कोई आंदोलन नही उठा है। अब जयराम सरकार के अंतिम वर्ष में आरक्षण पर स्वर्ण आयोग की मांग के माध्यम से एक मुद्दा खड़ा किया जा रहा है। इसमें भी महत्वपूर्ण यह है कि यह मुद्दा भी मुख्यमंत्री के उस बयान का परिणाम है जिसमें उन्होंने कहा की स्वर्ण जातियों के हितों की रक्षा के लिए स्वर्ण आयोग का गठन किया जायेगा। मुख्यमंत्री के इस बयान में कांग्रेस के भी विक्रमादित्य सिंह जैसे कई विधायक पार्टी बन गये हैं। सभी स्वर्ण आयोग गठित करने के पक्षधर बन गये हैं। क्या यह लोग विधानसभा के इस सत्र में इस पर चर्चा करेंगे की क्रीमी लेयर में आठ लाख का मानक कैसे तय हुआ है। आठ लाख की वार्षिक आय का अर्थ है करीब 67000 प्रति माह। यदि 67 हजार प्रतिमाह की आय वाला व्यक्ति भी आरक्षण का हकदार है तो सरकार को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि इस मानक में प्रदेश के कितने लोग आ जाते हैं। स्वर्ण आयोग की मांग करने वालों को भी इस मानक पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिये। जब आरक्षण आर्थिक आधार पर मांगा जा रहा है तो फिर और मुद्दा ही क्या बचता है।
सुरेश कश्यप ने अतिविश्वास और सहानुभूति को हार का कारण बताया
रणधीर शर्मा ने कहा भीतरघात से हुई हार
कृपाल परमार और पवन गुप्ता के त्याग पत्रों का जिक्र तक नहीं हुआ
शिमला/शैल। जयराम सरकार उपचुनाव में चारों सीटें हार गयी है। यह हार तब हुई है जबकि प्रदेश और केंद्र दो जगह भाजपा की सरकारें हैं। तीन विधानसभा और एक लोकसभा की सीट पर उपचुनाव हुए। ऐसे में चारों सीटों पर हार का अर्थ है कि लोग प्रदेश और केंद्र दोनों ही सरकारों से खफा हैं। इस हार के कारणों को चिन्हित करने के लिए शिमला में प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक हुई। तीन दिन की इस बैठक में पहले दो दिन तो कोर कमेटी और उसकी विस्तारित बैठक ने ही ले लिये। दो दिन की कोर कमेटी में जो कुछ पका उसे तीसरे दिन कार्यकारिणी को परोसा गया। कोर कमेटी की दूसरे दिन की बैठक के बाद मुख्य प्रवक्ता रणधीर शर्मा ने प्रैस को संबोधित किया और कहा कि भीतरघात के कारण हार हुई तथा इन भीतरघातियों के खिलाफ कारवाई की जायेगी। मुख्य प्रवक्ता के इस ब्यान से यह स्पष्ट हो जाता है कि भीतरघातियों को चिन्हित कर लिया गया था। लेकिन तीसरे दिन की बैठक के बाद प्रदेश अध्यक्ष सुरेश कश्यप ने लंच पर मीडिया को संबोधित किया। सुरेश कश्यप ने भाजपा नेताओं के अति विश्वास और कांग्रेस के 6 बार रहे मुख्यमंत्रा स्वर्गींय वीरभद्र सिंह के प्रति उपजी सहानुभूति की लहर को अपनी हार तथा कांग्रेस की जीत का कारण बताया। सुरेश कश्यप ने भीतरघात का जिक्र तक नहीं किया। यहां यह उल्लेखनीय हो जाता है कि इस मंथन बैठक से ठीक पहले पूर्व राज्यसभा सांसद और पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष कृपाल परमार ने अपने पद से त्यागपत्रा दे दिया। यह त्यागपत्रा देने के साथ ही परमार का जो पत्रा सोशल मीडिया में सामने आया उसमें उन्होंने आरोप लगाया कि वह चार वर्षों से लगातार जलालत का सामना कर करते आ रहे हैं। कृपाल परमार ने यह भी कहा कि उन्होंने इस संबंध हर स्तर पर बात करके देख लिया और अब त्यागपत्र देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प उनके पास नहीं बचा है। कृपाल परमार के बाद प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य और सिरमौर के प्रभारी पवन गुप्ता का त्यागपत्र सामने आया। पवन गुप्ता ने तो सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का आरोप लगाया। बघाट सरकारी बैंक का संद्धर्भ उठाते हुये गुप्ता ने पूरी बेबाकी से यह आरोप लगाया कि मुख्यमंत्रा कार्यालय में बैठा एक अधिकारी भ्रष्टाचारियों को बचा रहा है क्योंकि उसने अपनी पत्नी के नाम से भारी कर्ज ले रखा है।
इन त्याग पत्रों को प्रदेश प्रभारी ने यह कहकर हल्का बताने का प्रयास किया कि यह त्यागपत्रा अभी सोशल मीडिया में ही चर्चा में है। जब उनके पास आयेंगे तब उस पर चर्चा करेंगे। इसी तर्ज को दोहराते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने भी अपने आभासी संबोधन में इन त्यागपत्रों का उल्लेख तक नहीं किया। राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक सभी की यह राजनीतिक मजबूरी है कि वह त्यागपत्रां के कड़वे घूंट को चुपचाप निगल जायें। लेकिन यह त्यागपत्रा और इनमें उठे मुद्दे पर देश की जनता के संज्ञान में आ चुके हैं क्योंकि यह सब लंबे अरसे से संगठन और सरकार में घटता आ रहा है। एक समय इन्दु गोस्वामी ने भी अपने पद से त्यागपत्रा देते हुये यही सब कुछ कहा है। भले ही संगठन सरकार और मीडिया के कुछ हल्के इस सबको नजरअंदाज कर दे लेकिन प्रदेश की जनता ने इसका संज्ञान लिया है और उसका प्रमाण चार शून्य के परिणाम में सामने की भी आ चुका है। इसी मन्थन बैठक में मुख्य प्रवक्ता और प्रदेश अध्यक्ष के भीतरघातियों को लेकर अलग-अलग ब्यानों से यह स्पष्ट हो जाता है की इन त्यागपत्रों ने जयराम से लेकर नड्डा तक सभी की नींद हराम कर दी है।
सुरेश कश्यप जब भाजपाइयों के अति विश्वास को हार का कारण मान रहे हैं तब उन्हें यह बताना होगा कि जयराम सरकार की ऐसी कौन सी उपलब्धियां जिनसे अति विश्वास बना। कल तक तो कांग्रेस को हर भाजपाई नेता विहीन पार्टी करार दे रहा था। यदि नेता विहीन होते हुए भी कांग्रेस जयराम सरकार से चारों सीटें छीन ले गयी तो अब आगे क्या होगा। स्वर्गीय वीरभद्र के निधन से उपजी सहानुभूति की लहर की पूरी पिक्चर तो आम चुनाव में सामने आयेगी। इस मंथन में भले ही भाजपा नेतृत्व ने अपने ही नेताओं के उन ब्यानों का संज्ञान लिया हो जिनमें यह कहा गया था कि आगे ठेकों के काम उसी को मिलेंगे जिन की सिफारिश पार्टी के प्रत्याशी से आयेगी। यह भी कहा गया था कि यदि हमारा कुत्ता भी पड़ोसी के घर चला जाये तो हम उसे भी घर वापस नहीं आने देते हैं। इन ब्यानों के वीडियोज चुनावों में खूब चर्चित रहे हैं। क्या ऐसे ब्यानों से पार्टी की छवि निखरेगी या यह सामने आयेगा कि अब सत्ता का नशा दिमाग तक चढ़ चुका है। इस मंथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों तक प्रदेश में न तो सरकार और न ही संगठन के स्तर पर किसी भी तरह का कोई परिवर्तन होगा। जो भी घटेगा वह यूपी के परिणामों के बाद ही घटेगा। इसका प्रमाण त्यागपत्रों पर अपनाई गयी खामोशी से सामने आ चुका है। इसी दौरान यह भी सामने आ जायेगा की मुख्यमंत्री की कार्यशैली में क्या अंतर आता है।
2021-22 में 50,192 करोड़ का बजट पूरा करने के लिए 20,000 करोड़ का कर्ज लिया जायेगा
इस वर्ष करों और गैर करों से 7938.14 करोड़ ही मिलेंगे
केन्द्रीय करों का हिस्सा भी 22672 करोड़ ही रहने की संभावना है
30,000 करोड़ की आय से 50,000 करोड का खर्च कैसे होगा
25 करोड़ की लागत से बने होटल सिराज को प्राइवेट सेक्टर को देने की चर्चा
शिमला/शैल। जयराम सरकार इस माह दो हजार करोड़ का ऋण लेने जा रही है। इसके लिए भारत सरकार से वांच्छित अनुमति ले ली गया है। इसमें कुछ पैसा प्रतिभूतियों की नीलामी से जुटाया जा रहा है। इसके लिए 18 नवम्बर को आरबीआई को लिखे पत्र में कहा गया है कि सरकार को यह कर्ज विकास कार्यों में निवेश के लिये चाहिये। परंतु इस संद्धर्भ छपे समाचारों में यह कहा गया कि सरकार को वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए पैसा चाहिये। सरकार के वित्तीय प्रबंधन के लिए एफआरबीएम अधिनियम पारित है। इस अधिनियम के अनुसार सरकार अपने प्रतिबद्ध खर्चे पूरा करने के लिए कर्ज नहीं ले सकती। कर्ज केवल जन विकासात्मक कार्यों के लिए लिया जा सकता है जिनसे नियमित रूप से राजस्व आय होगी। एफआरबीएम की धारा सात में इसका स्पष्ट उल्लेख है और इसकी खुलकर अवहेलना हो रही है। ऐसा इसलिये है क्योंकि इसी अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि किसी भी आर्थिक फैसले के लिए कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसी का लाभ उठाकर अफसरशाही केवल कर्ज लेकर घी पीने के सिद्धांत पर चल रही है।
स्मरणीय है कि जब मुख्यमंत्री जयराम ने अपना पहला बजट भाषण नौ मार्च 2018 को सदन में पड़ा था तब यह कहा था कि सरकार को 46385 करोड़ का कर्ज विरासत में मिला है। यह भी कहा था कि पूर्व सरकार ने 18000 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज ले रखा है। आज यदि कर्ज पर नजर डाली जाये तो यह आंकड़ा इस इसी वित्तीय वर्ष के अंत तक 70,000 करोड़ से भी पार चला जायेगा यह स्थिति बनी हुई है। प्रदेश का कर्ज भार जितना बढ़ता जायेगा उसका सीधा असर रोजगार और महंगाई पर पड़ेगा। इसलिए आज जनता के सामने यह रखा जाना चाहिये कि यह कर्ज कौन से विकास कार्यों पर खर्च हो रहा है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 2021-22 के लिए 50192 करोड़ के कुल खर्च का बजट सदन में रखा है। इस कुल खर्च में सरकार के पास कर राजस्व से 5184.49 करोड़ और गैर कर राजस्व से 2753.65 मिलेगा अर्थात करों से कुल 7938.14 करोड़ मिलेगा। इस वर्ष की वार्षिक योजना 9405 करोड़ की है जिसमें 90% केंद्र से मिलेगा और 10% अपने साधनों से जुटाना पड़ेगा। केंद्रीय करों में हिस्से के तहत पिछले वर्ष 22672 करोड़ मिलने का अनुमान था। कोरोना के कारण केंद्र और राज्य सरकारों सभी के राजस्व पर असर पड़ा है। उसके चलते यह माना जा सकता है कि इस बार भी केंद्रीय हिस्से के रूप में 22672 करोड़ तो मिल ही जायेंगा। इस तरह प्रदेश की कुल आय 30610.14 करोड़ रहेगी। लेकिन इस तीस हजार करोड़ की आय के मुकाबले सरकार का कुल खर्च 50,000 करोड़ का है। इसका सीधा अर्थ है कि यह खर्च पूरा करने के लिए सरकार को बीस हजार करोड़ लेना पड़ेगा।
इस वस्तु स्थिति में सरकार से यह सवाल करना आवश्यक हो जाता है कि वह यह बीस हजार करोड़ का निवेश कहां कर रही है और उससे कितना राजस्व सरकार को कितने समय में मिलेगा? यह जानना इसलिए आवश्यक हो जाता है कि सरकार जिस तरह से दो मंजिला मकानों में लिफ्ट लगा रही है और शिमला में ही कर्ज के पैसे से 50 लाख में शौचालय और 35 लाख में वर्षाशालिका का निर्माण करती रही तो आम आदमी ऐसे खर्च को विकास के स्थान पर कर्ज लेकर घी पीने की ही संज्ञा देगा। क्योंकि जब एशियन विकास बैंक के पैसे से सरकार होटल बनाकर उसे पहले ही दिन से चलाने के लिए प्राइवेट सेक्टर को दे देगी तो उसके वित्तीय प्रबंधन पर तो सवाल उठेंगे ही। चर्चा है कि मण्डी के जंजैहली में सरकार ने एशियन विकास बैंक के वित्तपोषण से 25 करोड़ की लागत से होटल सिराज का निर्माण किया है। लेकिन इस होटल को एचपीटीडीसी द्वारा चलाने के बजाये प्राइवेट सेक्टर को दिया जा रहा है। इस निर्णय से सरकार को नियमित आय हो सकती है यदि एचपीटीडीसी इसे स्वयं चलाये तो। ऐसा कई और जगह भी हो रहा है जिसकी चर्चा आने वाले दिनों में की जाएगी।