कुलदीप राठौर की अध्यक्षता में दूसरी बड़ी सफलता है यह जीत
इस जीत से बडे़ नेताओं में नेतृत्व को लेकर टकराव की संभावना भी बढ़ी
शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2019 के चुनावों तक जिस तरह की हार का सामना करना पड़ा है उस परिदृश्य में यह चारों उपचुनाव जीतकर उस हार की काफी हद तक भरपायी कर ली है । जीत की जो शुरुआत कांग्रेस ने दो नगर निगमें जीतकर की थी उसे टूटने नहीं दिया है यह प्रदेश नेतृत्व की एक बड़ी सफलता है। कांग्रेस इस जीत की कड़ी को कैसे आगे बढ़ाये रखती है यह नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती होगी और इसकी अगली परीक्षा नगर निगम शिमला के चुनाव होंगे। इस समय प्रदेश में कांग्रेस के अतिरिक्त भाजपा का और कोई कारगर विकल्प नहीं है इसलिए जनता की नाराजगी का स्वभाविक लाभ कांग्रेस को मिला है। कांग्रेस की इस जीत के लिए उसके अपने प्रयासों की बजाये जनता की नाराजगी का योगदान ज्यादा रहा है। क्योंकि जयराम सरकार के चार वर्ष के कार्यकाल में कांग्रेस का ऐसा कोई बड़ा काम नहीं रहा जिसने जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा हो। बल्कि सच तो यह है कि इन चार वर्षों में कांग्रेस जयराम सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आरोप पत्रा तक नहीं ला पायी है। विधानसभा में उठे सवाल भी वॉक आउट से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाये हैं। यदि बंगाल की हार से नरेंद्र मोदी के ग्राफ पर प्रश्न चिन्ह न लगता तो शायद कांग्रेस में बिखराव देखने को मिल जाता और हिमाचल भी उससे अछूता न रहता क्योंकि जी तेईस के ग्रुप में हिमाचल से भी कुछ बड़े नेता सक्रिय थे। बड़े-बड़े नाम चर्चा में आने लग गये थे। कई नेता चुनाव लड़ने से घबराने लग गये थे। लेकिन आज बंगाल की हार और बढ़ती महंगाई ने सारा राजनीतिक परिदृश्य बदल कर रख दिया है। यह परिस्थिति बहुत संवेदनशील है और इसमें भाजपा केंद्र से लेकर राज्यों तक कांग्रेस को कमजोर करने के लिए साम-दाम और दंड भेद के सारे खेल खेलने का प्रयास करेगी। इस प्रयास में सबसे पहला निशाना प्रदेश अध्यक्ष का पद होगा।
कुलदीप राठौर विधायक या सांसद नहीं रहे हैं क्योंकि उनके विधानसभा क्षेत्र में उनसे हर तरह से वरिष्ठ नेता मौजूद थे और चुनाव टिकट उनको मिलते रहे। लेकिन एनएसयूआई और युवा कांग्रेस से लेकर आज मुख्य संगठन के अध्यक्ष पद तक जो उनका राजनीतिक अनुभव है वह उनके किसी भी समकालिक से किसी भी तरह कम नहीं आंका जा सकता। बतौर प्रदेश अध्यक्ष हाईकमान उनकी राय को कम नहीं आंक सकता। क्योंकि इस समय उनकी अध्यक्षता में प्रदेश से लोकसभा में 8 वर्ष बाद कोई सदस्य जा रहा है। इन उप चुनावों से पहले दो नगर निगमों में भी उन्हीं की अध्यक्षता में सफलता मिली है। ऐसे में इस समय अध्यक्ष पद में बदलाव का कोई भी प्रयास कांग्रेस को कमजोर ही करेगा। इसलिए इस समय नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू और सीडब्ल्यूसी की सदस्य आशा कुमारी तथा वर्तमान अध्यक्ष कुलदीप राठौर जितनी एकजुटता का व्यवहारिक परिचय देंगे संगठन को उससे उतना ही लाभ मिलेगा।
इन उपचुनावों के लिए जिस तरह के चारों उम्मीदवारों का चयन किया गया और उसमें अर्की के अतिरिक्त कहीं भी बड़ा विरोध देखने को नहीं मिला तथा उस विरोध के खिलाफ पहले ही दिन कारवाई करके जो संदेश जनता में गया उससे भी संगठन को लाभ मिला। अन्यथा जब मंडी में कुलदीप राठौर ने प्रतिभा सिंह की उम्मीदवारी के संकेत दिए थे तब उस पर पंडित सुखराम की यह प्रतिक्रिया जब आयी की उम्मीदवारी तय करने वाला राठौर कौन होता है यह फैसला तो हाईकमान करता है। उससे नकारात्मक संकेत उभरने शुरू हो गए थे जिन पर दोनों प्रभारियों ने कंट्रोल कर लिया। लेकिन क्या आगे भी इसी सबसे काम चल जायेगा यह सवाल अब बड़ा होकर उभरने लगा है। क्योंकि केंद्र ने एक ही हार के बाद भाजपा शासित राज्यों में वैट में कटौती कराकर कीमतें कम करने का पहला कदम उठा लिया है। आने वाले दिनों में ऐसे और भी कई कदम देखने को मिलेंगे। इसलिए जिन मुद्दों को उठाकर 2014 में भाजपा ने सत्ता छिनी थी आज उन्हीं मुद्दों पर पलटकर भाजपा और नरेंद्र मोदी को घेरना होगा और इसके लिए प्रमाणिक तथ्यों के साथ हमलावर होना होगा। आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं प्रदेश में दो बार मंत्री रहे चुके हैं। क्या उनको घेरने की शुरुआत हिमाचल से नहीं होनी चाहिये? अनुराग ठाकुर को तो एक समय जयराम के मंत्री गोविन्द ठाकुर ने ही घेर दिया था। परंतु प्रदेश कांग्रेस इन बिन्दुओं पर आज तक खामोश है। पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ सदस्य पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने अपनी आत्मकथा में भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जिस तरह से अपनी ही सरकार की कथनी और करनी को नंगा किया है उस पर भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर घेरा जा सकता है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के किसी भी नेता द्वारा इन मुद्दों को छुआ तक नहीं गया है। ऐसे अनेकों मामले हैं जिन पर भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस ऐसे मुद्दों को उठाने से जिस तरह से बचती आ रही है उससे प्रदेश कांग्रेस की नीयत और नीति दोनों पर शंकाएं भी उठना शुरू हो गयी हैं जो आगे चलकर नुकसान देह होगी।
क्योंकि आज वीरभद्र सिंह के निधन के बाद सही में कुछ नेताओं की महत्वकांक्षाएं जिस तरह से सामने आने लग गयी है उससे यही प्रमाणित हो रहा है कि निकट भविष्य में कांग्रेस के अंदर नेतृत्व का प्रश्न ही कहीं चुनाव से भी बड़ा ना हो जाये। क्योंकि कांगड़ा में स्व.जी.एस.बाली को श्रद्धांजलि देने के लिए रखी गयी सभा में कांगड़ा जिले के ही कई बड़े नेताओं का ना आना जनता की नजर से छुप नहीं पाया है। यही नहीं कुछ बड़े नेताओं का आनंद शर्मा के साथ ही इस सभा से चले जाना भी कई सवाल खड़े कर जाता है। यदि समय रहते इस सुलगने लगी चिंगारी को शांत नहीं किया गया तो यह कभी भी ज्वाला बन कर सबसे पहले अपने ही घर को जलाने से परहेज नहीं करेगी। इसमें प्रतिभा सिंह की जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है क्योंकि वह दो बार सांसद रह चुकी है और इस बार जिस तरह से उन्होंने ब्रिगेडियर खुशहाल सिंह और पूरी जयराम सरकार को मात दी है उससे जनता की उम्मीदें उनसे और बढ़ गई हैं। इस समय जो तीन नवनिर्वाचित विधायक रोहित ठाकुर, भवानी पठानिया और संजय अवस्थी पूरी सरकार की ताकत को मात देकर आये हैं जहां वह प्रशंसा और बधाई के पात्र हैं वहीं पर उनकी यह जिम्मेदारी भी होगी कि वह प्रदेश नेतृत्व से ऐसी परिस्थितियों में सवाल पूछने से भी गुरेज ना करें।
शिमला/शैल। इन उप चुनावों का परिणाम क्या होगा उसका भाजपा और कांग्रेस की अपनी-अपनी राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? यह सवाल इस उपचुनाव के विश्लेषण के मुख्य बिन्दु होंगे। क्योंकि यदि भाजपा इसमें हारती है तो भी उसकी सरकार पर इसका कोई असर नहीं होगा। हां यदि भाजपा जीत जाती है तो यह उसकी नीतियों की जन स्वीकारोक्ति होगी और इसके बाद जनता को महंगाई बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार पर कोई आपत्ति करने का हक नहीं रह जायेगा। दूसरी और यदि कांग्रेस हारती है तो उसके नेतृत्व के अक्षम होने पर और मोहर लग जायेगी। यदि कांग्रेस जीतती है तो जनता को भविष्य के लिए एक आस बंध जायेगी। महंगाई और बेरोजगारी पर रोक लगने की उम्मीद जग जायेगी। यह उपचुनाव कांग्रेस भाजपा की बजाये जनता की अपनी समझ की परीक्षा ज्यादा होगी। क्योंकि आज सरकार के पक्ष में ऐसा कुछ नही है जिसके लिये उसे समर्थन दिया जाये। हां यह अवश्य है कि उपचुनाव के परिणाम मुख्यमंत्री और उनकी सलाहकार मित्र मण्डली की व्यक्तिगत कसौटी माने जायेंगे। राम मंदिर निर्माण तीन तलाक और 370 खत्म करने की सारी उपलब्धियां महंगाई और बेरोजगारी में ऐसी दब गयी हैं कि उपलब्धि की बजाये कमजोर पक्ष बन चुके हैं। जनता का रोष यदि कोई पैमाना है तो यह परिणाम एक तरफा होने की ओर ज्यादा बढ़ रहे हैं। क्योंकि इन चुनावों में ‘‘भगवां पटका-बनाम भगवां पटका’’ जिस तरह से फतेहपुर और जुब्बल कोटखाई में सामने आया है उससे पार्टी के चाल चरित्र और चेहरे पर ही ऐसे सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनसे विश्वसनीयता ही सवालों में आ जाती है।
मंडी मुख्यमंत्री का गृह जिला है कांग्रेस विधानसभा की दसों सीटें हार चुकी है और लोकसभा भाजपा ने चार लाख के अंतर से जीती है। आज इसी मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में चौदह हेलीपैड बनाये जाने का आरोप लगा है और इस मामले में कोई भी इसके पक्ष में नहीं आया है। फोरलेन प्रभावितों का मुद्दा आज भी जस का तस है। ऊपर से बल्ह में प्रस्तावित हवाई अड्डे से यहां के लोगों की हवाईयां उड़ी हुई हैं। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि वह मंडी से मुख्यमंत्री के होने को वरदान माने या अभिशाप। मंडी शहर के बीच स्थित विजय माध्यमिक विद्यालय के प्रांगण में शॉपिंग मॉल का निर्माण और वह भी तब जबकि बच्चों की याचिका उच्च न्यायालय में लंबित है इससे क्या संदेश जायेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। मंडी में सड़कों की हालत सुंदरनगर से मंडी तक के गड्डे ही ब्यान कर देते हैं। शिवधाम प्रोजेक्ट पर अभी काम तक शुरू नहीं हो पाया है। इस जमीनी हकीकत का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा यह अंदाजा लगाया जा सकता है। कुल्लू में देव संसद की नाराजगी नजरानें के मुद्दे पर सामने आ गयी है। लाहौल स्पीति में मंत्री का अपने ही क्षेत्र में घेराव हो चुका है। एस टी मोर्चा के पदाधिकारी के साथ मंत्री का झगड़ा सार्वजनिक हो चुका है। किन्नौर की त्रासदी ने प्रशासन और पर्यावरण से छेड़छाड़ को जिस तरह से मुद्दा बनाया गया है उसके परिणाम दुरगामी होंगे। इन बिंदुओं को सामने रखकर मंडी सीट का आकलन कोई भी कर सकता है। फतेहपुर में खरीद केंद्र को लेकर भाजपा प्रत्याशी का घेराव हो चुका है। जिस तरह के पोस्टर लगाकर कृपाल परमार का टिकट काटा गया था वैसे ही पोस्टर उम्मीदवार के खिलाफ भी आ चुके हैं। जिस मंत्री को फतेहपुर की कमान दी गयी है उस मंत्री के बेटे के खिलाफ बने मामले ने मंत्री की धार को कुंद करके रख दिया है। कोटखाई जुब्बल में तो यही स्पष्ट नहीं हो पाया है कि बरागटा और उनके समर्थकों का विद्रोह प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ है या केंद्रीय नेतृत्व के। फिर सेब का सवाल अपनी जगह खड़ा ही है। इन दोनों क्षेत्रों में भगवां बनाम भगवां होने से भाजपा की कठिनाईं ज्यादा बढ़ गयी है। अर्की में कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ जब अदालत में लंबित मुद्दों को उठाने का प्रयास किया गया और उसका जबाव लीगल नोटिस जारी करके दिये जाने से मुद्दे उठाने वाले ही कमजोर हुये हैं। क्योंकि भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ क्षेत्र के टमाटर उत्पादकों में ही रोष है। अब इस रोष को कांग्रेस को तालिबान से जोड़कर दबाने का प्रयास किया जा रहा है परंतु इसका जबाव सोलन में एक भाजपा नेता की गाड़ी से एक समय चिट्टा पकड़े जाने से दिया जा रहा है। इस प्रकरण में पुलिस ने नेता के ड्राइवर के खिलाफ तो मामला बना दिया था परंतु नेता की गाड़ी को छोड़ दिया गया था। इस कांड का वीडियो भी वायरल हो चुका है। इन मुद्दों के आने से अर्की में भी समीकरण बदलने शुरू हो गये हैं।
शिमला/शैल। क्या भ्रष्टाचार पर चुप रहने के लिए राजनीतिक दलों में कोई आपसी सहमति बन गयी है। यह सवाल अब जनता में उठने लग पड़ा है। क्योंकि इस उपचुनाव में कोई भी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार पर बात नहीं कर रहा है। जबकि महंगाई और बेरोजगारी सिर्फ भ्रष्टाचार की ही देन होते हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी तब कांग्रेस की सरकार के खिलाफ कई आरोप पत्र लाये गये थे। लेकिन जयराम सरकार के अब तक के कार्यकाल में उन आरोप पत्रों पर कोई कार्यवाही सामने नहीं आ पाई है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस ने भी अभी तक कोई आरोप पत्र सरकार के खिलाफ जारी नहीं किया है। कुछ हल्कों में यह तर्क दिया जा रहा है कि कोविड के कारण जब सारा कामकाज भी बंद था तो फिर भ्रष्टाचार होने की कोई संभावना ही नहीं बची थी। लेकिन यह लोग भूल रहे हैं कि कोविड के कारण लॉकडाउन 24 मार्च 2020 को हुआ था और इस सरकार ने सत्ता 2018 जनवरी में संभाली थी। सत्ता संभालने से लेकर लॉकडाउन लगने तक 2019 का लोकसभा चुनाव भी हुआ है। इस चुनाव से पहले ही 2018 से ही प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना शुरू हो गई थी। इस योजना के तहत ‘‘59 मिनट में एक करोड़ ले जाओ’’ किया गया था। हिमाचल सरकार ने इस योजना के तहत 2541 करोड़ का ट्टण बांटा है । 2020 के आर्थिक सर्वेक्षण में यह एक बड़ी उपलब्धि के रूप में दर्ज है। यह योजना भी 2019 में ही समाप्त हो गयी थी। यह जो ऋण बांटा गया था यह सार्वजनिक धन है। इसलिए इस धन का कितना सदुपयोग हुआ है इसमें कितने उद्योग लगे हैं कितना रोजगार पैदा हुआ है इस ऋण में से कितना वापस आया है। कितने लोग नियमित किस्तें दे रहे हैं। इन सवालों के जवाब जानना प्रदेश की जनता का हक है क्योंकि यह उनका पैसा है। लेकिन यह जानकारी तभी सामने आयेगी जब विपक्ष सदन में यह सवाल पूछेगा और विपक्ष ने इस बारे में एक बार भी सवाल नहीं उठाया है। जबकि चर्चा है कि इस ऋण का अधिकांश एनपीए होकर बैड लोन हो चुका है। यही नहीं जिस कोविड के कारण लॉकडाउन हुआ और सारी गतिविधियां शुन्य हो गयी थी उसी कोविड के नाम पर आपदा प्रबंधन में जो खर्च हुआ है आज शायद उस खर्च के हिसाब किताब के वांछित दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। कोविड की रोकथाम के लिए स्थापित किए गए क्वारेन्टिन केंद्रों की अधिसूचना और इन केंद्रों में रखे गए संक्रमितों तथा उन पर हुए खर्च के दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। यह सारा खर्च आपदा प्रबंधन के नाम पर किया गया है। सूत्रों के मुताबिक आपदा प्रबंधन में जब इस खर्च की समीक्षा की जाने लगी तब इन दस्तावेजों की आवश्यकता हुई और यह नहीं मिल पाये हैं। आपदा प्रबंधन ने इस संबंध में जिलों को एक कड़ा पत्र भी लिखा है और इसका पूरा लेखा तैयार करने के लिए ए.जी. की टीम को भी बुला लिया गया है। कोविड के नाम पर हुये इस करोड़ों के खर्च पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गये हैं। परंतु विपक्ष इस पर भी मौन है। इसी तरह इस सरकार को सर्वोच्च न्यायालय में भी कई मामलों में गंभीरता ना दिखाने के लिए जुर्माने लग चुके हैं। कई मामलों में तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों से यह जुर्माना वसूलने के आदेश हैं। जब भी किसी विभाग की लापरवाही के लिए सर्वोच्च न्यायालय जुर्माना लगता है तो कायदे से सरकार संबद्ध अधिकारी से जवाब मांगती है। लेकिन इस सरकार में आज तक एक भी मामले में ऐसी कारवाई नहीं हो पायी है। यही नहीं करीब आधा दर्जन ऐसे मामले हैं जिनमें अदालतों के फैसलों पर अमल नहीं किया गया है और यह सारे मामले भ्रष्टाचार से जुड़े हुए हैं। ऐसे मामलों में कोई कार्यवाही ना किया जाना और इन पर विपक्ष के खामोश रहने को ही शायद सरकार विकास मान रही है। वैसे आज तक प्रदेश में कोई भी सरकार विकास के नाम पर चुनाव नहीं जीत पायी है। हर चुनाव में भ्रष्टाचार केंद्रीय मुद्दा रहा है। इस उपचुनाव में भ्रष्टाचार पर कांग्रेस-भाजपा दोनों का बराबर चुप रहना है क्या गुल खिलायेगा यह देखना रोचक होगा।
शिमला/शैल। क्या भ्रष्टाचार को संरक्षण और इसके खिलाफ आवाज उठाने और सवाल पूछने वालों की आवाज बंद करवाने का प्रयास करना भाजपा सरकारों की संस्कृति है? यह सवाल शांता कुमार द्वारा अपनी आत्मकथा में भ्रष्टाचार की सनसनी खेज खुलासा करने और इसके कारण मंत्री पद छीने जाने के बाद भी भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार करने से उठ खड़ा हुआ है। क्योंकि जयराम सरकार की स्कूल के बच्चों को सरकार शिक्षा विभाग के माध्यम से हर वर्ष वर्दी देने का काम कर रही है। शिक्षा विभाग ने यह जिम्मेदारी निदेशक प्राईमरी शिक्षा को दी गई है। शिक्षा विभाग के लिए वर्दी खरीद का काम सरकार की नागरिक आपूर्ति निगम करती है। 2015 में वर्दी खरीद में घपला होने के आरोप लगे थे। विधानसभा में इस आशय के सवाल पूछे गए थे। यह सवाल उठने के बाद सरकार ने इस खरीद की जांच करने के आदेश दिए थे। जांच के लिए 2 अतिरिक्त मुख्य सचिवों की अध्यक्षता में दो कमेटियों का गठन हुआ था। एक कमेटी ने 2012-13 में और 2013-14 में खरीद की जांच की और दूसरी ने 14-15 की जांच की। 2012-13 में हुई खरीद में कोई घपला नहीं पाया गया। परंतु 2013-14 की खरीद में गड़बड़ी पाई गई और इसके लिए सप्लायरों पर 1.52 करोड का जुर्माना लगाया गया। 2014-15 की खरीद में भी घपला पाया गया और कमेटी ने इसके लिए 3.88 करोड़ का जुर्माना लगाया। कमेटियों की यह रिपोर्ट आने के बाद सप्लायर आर्बिट्रेशन में चले गए और वहां पर इस आधार पर उनको राहत मिल गई कि वर्दियां सप्लाई हो चुकी हैं और बच्चों ने इस्तेमाल भी कर ली। आर्बिट्रेशन का फैसला 2017 के अंत तक आया। तब चुनावी प्रतिक्रिया भी चल पड़ी थी। इसलिए इस फैसले पर ज्यादा कार्यवाही ना हो सकी। इसी दौरान सरकार बदल गयी। नई सरकार में शिक्षा मंत्री के सामने जब यह मामला आया तब यह पाया गया कि शिक्षा विभाग ने इसमें आर्बिट्रेशन के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का नागरिक आपूर्ति निगम से आग्रह किया था । क्योंकि यह खरीद टेंडर इसी निगम के माध्यम से जारी हुआ था। इसको उच्च न्यायालय में ले जाने के लिए नागरिक आपूर्ति निगम ही अधिकृत था। शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज ने भी फाइल पर इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाने की संस्तुति की हुई है। नागरिक आपूर्ति निगम ने शिक्षा विभाग के आग्रह को सीधे-सीधे नजरअंदाज कर दिया। नागरिक आपूर्ति निगम ने किसके दबाव में उच्च न्यायालय जाने का साहस नहीं किया यह आज तक रहस्य बना हुआ है। सप्लायरों का पैसा निगम के पास पड़ा हुआ था। जिसे बाद में दे दिया गया। इससे सरकार को करीब 6 करोड़ का नुकसान हुआ है और यह भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का सीधा मामला बनता है।
इसी तरह हाइड्रो कालेज के निर्माण में करीब 10 करोड़ का नुकसान हुआ है। और यह नुकसान भी भारत सरकार के उपक्रम एनपीसीसी के माध्यम से हुआ है। क्योंकि निर्माण के लिए भारत सरकार की एजेंसी का चयन हुआ था। और ठेकेदार आमंत्रित करने का टेंडर इस एजेंसी ने जारी किया। इसमें जो निविदायें आई उनमें न्यूनतम रेट 92 करोड था। परंतु एजेंसी ने काम 103 करोड़ का रेट देने वाले को दे दिया। हिमाचल का तकनीकी विभाग इस पर खामोश रहा। यह तर्क दिया कि भारत सरकार की एजेंसी काम करवा रही है। विभाग यह भूल गया कि पैसा तो हिमाचल सरकार का है। कांग्रेस विधायक रामलाल ठाकुर दो बार सदन में सवाल रख चुके हैं। परंतु यह सवाल लिखित उत्तर तक ही रह गया। सरकार ने अपने स्तर पर इसमें कोई कार्रवाई करना ठीक नहीं समझा। यह दोनों मामले 2018 में इस सरकार के आते ही घट गए थे । इन मामलों में अफसरशाही हावी रही है या राजनीतिक नेतृत्व के भी सहमति रही है इस पर अब तक रहस्य बना हुआ है परंतु करोड़ों का चूना लग गया यह स्पष्ट है।
FY 2013-14

FY 2014-15

यदि प्रदेश नेतृत्व बरागटा के साथ था तो क्या यह विद्रोह नड्डा और मोदी के खिलाफ है।
क्या सहानुभूति के कवर में सेब का सवाल गौण हो जायेगा।
शिमला/शैल। इस उपचुनाव में भाजपा ने फतेहपुर और जुब्बल कोटखाई में इन लोगों को उम्मीदवार बनाया है जो 2017 के चुनावों में पार्टी के विरोधी थे। इन्हें इस उपचुनाव में अपना प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने यह प्रमाणित कर दिया है कि पार्टी में वरियता का क्या स्थान और सम्मान है। यही नहीं जुब्बल-कोटखाई में स्व. श्री नरेन्द्र बरागटा के बेटे और पार्टी के आईटी सैल के प्रदेश इन्चार्ज चेतन बरागटा को परिवारवाद के नाम पर टिकट नहीं दिया गया। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि संगठन में तो परिवार के कई सदस्य एक साथ कई पदों पर सेवाएं दे सकते हैं, जिम्मेदारियां निभा सकते हैं लेकिन संसद या विधानसभा के सदस्य नहीं हो सकते। वैसे स्व. श्री नरेन्द्र बरागटा के निधन के बाद उनके बेटे को टिकट दिया जाना यदि परिवारवाद की परिभाषा में आ जाता है तो क्या कल को यही गणित धूमल, महेन्द्र सिंह और विरेन्द्र कंवर के परिवारों पर भी लागू होगा? यह सवाल भी कुछ हल्कों में उठने लग पड़ा है। क्योंकि इनके बच्चों ने भी पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से राजनीति में प्रवेश कर लिया है। स्वभाविक है कि इनकी अगली मंजिल देर-सवेर विधनसभा और संसद रहेगी ही। क्योंकि जब चेतन बरागटा के टिकट पर तो यह कहा गया कि प्रदेश नेतृत्व तो उनके हक में था परन्तु प्रधानमन्त्री परिवारवाद का आरोप नहीं लगने देना चाहते थे। अब यह परिभाषा इसी उपचुनाव तक रहेगी या आगे भी इस हथियार से कई गले काटे जायेंगे यह देखना दिलचस्प होगा।
चेतन बरागटा ने टिकट न मिलने से नाराज़ होकर आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में ताल ठोक दी है। मण्डल के बहुत सारे पदाधिकारी भी उनके समर्थन में आ गये हैं। पार्टी ने बरागटा को संगठन से निष्कासित भी कर दिया है। परन्तु उनके साथ विद्रोही बने अन्य कार्यकत्ताओं/पदाधिकारियों के खिलाफ अभी कोई बड़ी कारवाई नहीं की गई है। वैसे यदि इस चुनाव में नीलम सरैक को टिकट मिल सकता है तो अगले चुनाव यही टिकट बरागटा या किसी अन्य को मिल जाये तो इसमें कोई हैरानी भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस बार के टिकट आवंटन से यही सन्देश संगठन में गया है। वैसे चेतन बरागटा ने जब से यह कहा है कि मुख्यमन्त्रा जय राम ठाकुर से उन्हें कोई शिकायत नहीं है और यदि वह जीत जाते हैं तो जीतने के बाद वह भाजपा के ही साथ रहेंगे तो इससे एक सवाल यह भी उठने लगा है कि क्या वह किसी विशेष रणनीति के तहत चुनाव लड़ रहे हैं। क्योंकि सेब उत्पादक क्षेत्रों में कृषि कानूनों को लेकर बागवानों में भारी रोष है। अदाणी के एक झटके ने पाँच हजार करोड़ की आर्थिकी को हिलाकर रख दिया है। इससे सेब उत्पादक क्षेत्रों में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। बल्कि इस झटके ने भाजपा के हाथों मिले पुराने गोलीकाण्ड के जख्मों को फिर से हरा कर दिया है।
बागवान सरकार के कृषि कानूनों से कितने रोष में है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि किसान आन्दोलन के नेता इस उपचुनाव में भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार करने जा रहे हैं। ऐसे में चेतन बरागटा पिता की मौत से उपजी सहानुभूति में कृषि कानूनों को लेकर सरकार पर उठते सवालों को उठने का मौका ही नहीं आने देने का माहौल अप्रत्यक्षतः खड़ा कर रहे हैं ऐसी चर्चा भी कुछ क्षेत्रों में चल निकली है। क्योकि चेतन बरागटा सहानुभूति के कवर में यदि सरकार पर उठते सवालों का रूख मोड़ने में सफल हो जाते हैं तो इसका सीधा लाभ भाजपा और जयराम सरकार को मिलेगा। इस परिपेक्ष में यदि आने वाले दिनों में बरागटा कृषि कानूनों को लेकर अपना स्टैण्ड स्पष्ट नहीं करते हैं तो उन्हें इस चुनाव में भी जनता भाजपा की ‘ही’ टीम माने लग जायेगी यह तय है।