Monday, 02 March 2026
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चार साल के कार्यकाल के बाद कहां खड़े हैं भाजपा और जयराम

2019-20 कि कैग रिपोर्ट से सरकार पर  उठे गंभीर सवाल 
एडीबी के कर्ज से बनी संपत्तियां ऑपरेशनल होने से पहले ही प्राइवेट हाथों में क्यों ?
जयराम के अधिकांश मंत्रियों का विवादित होना क्या एक संयोग है या कुछ और...

शिमला/शैल। जयराम सरकार के सत्ता में चार साल पूरे होने जा रहे हैं इस अवसर पर मंडी में एक राज्य स्तरीय आयोजन किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इसमें शामिल होने की हां भी कर दी है। स्वाभविक है कि जब प्रधानमंत्री इस आयोजन में शामिल होंगे तो प्रदेश से ही ताल्लुक रखने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर भी इसमें शामिल होंगे ही। यह आयोजन उस समय हो रहा है जब अभी कुछ दिन पहले ही हुए चारों उपचुनाव भाजपा और जयराम सरकार हार गयी है। बल्कि इस हार के बाद प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के कयास चल पड़े थे। क्योंकि भाजपा गुजरात, उत्तराखंड और कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन बड़े छोटे-छोटे मुद्दों पर कर चुकी थी। लेकिन अभी तक प्रदेश की सरकार और संगठन किसी में भी कुछ भी बदलाव नहीं हो पाया है। कहा यह जा रहा है कि यदि मुख्यमंत्री जयराम ने हार के लिए अपनी तत्कालिक प्रतिक्रिया में महंगाई को जिम्मेदार न ठहराया होता और इस प्रतिक्रिया के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मोदी सरकार ने कमी न की होती तो शायद स्थितियां कुछ और होती। फिर इसी के साथ उत्तर प्रदेश के चुनाव को जोड़कर यह तर्क सामने आया है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों के बाद ही राज्यों की समस्याओं पर ध्यान दिया जायेगा। इस तरह जो दो-तीन माह का समय जयराम को मिल गया है उसमें वह अपनी कार्यशैली में कितना सुधार कर पाते हैं उस पर हाईकमान से लेकर प्रदेश के हर आदमी की नजर रहेगी।
किसी भी मुख्यमंत्री और उसकी सरकार के लिए सबसे बड़ी कसौटी यही होती है कि क्या वह सत्ता में वापसी कर पायेगी? यदि हार भी होती है तो वह शर्मनाक नहीं होनी चाहिये। इस गणित में अब तक रही कांग्रेस और भाजपा की सरकारों में कोई भी मुख्यमंत्री सत्ता में वापसी नही कर पाया है। इसलिए यदि जयराम भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाते हैं तो यह कोई अनहोनी नहीं होगी। वीरभद्र और प्रेम कुमार धूमल पर यह आरोप लगता रहा है कि उनके परिवारों का शासन प्रशासन में दखल ज्यादा बढ़ गया था इसलिए वह वापसी नहीं कर पाये। परंतु जयराम के परिवार से तो कोई भी राजनीति में नहीं है। इसके बावजूद भी यदि जयराम सत्ता में वापसी नहीं कर पाते हैं तो वीरभद्र और धूमल परिवार भी इस आरोप से मुक्त हो जाते हैं। उस सूरत में यह आरोप मुख्यमंत्री की अपने सलाहकारों की टीम और उनकी अपनी प्रशासनिक समझ पर ही आकर टिकेगा।
इस मानक पर यदि जयराम के चार वर्षों के कार्य का आकलन किया जाये तो इसका सबसे बड़ा प्रमाणिक दस्तावेज कैग की वर्ष 2019-20 की इस विधानसभा सत्र में आई रिपोर्ट हो जाती है। इस रिपोर्ट में जयराम सरकार पर सबसे बड़ा आरोप लगा है कि उसने जनहित से जुड़ी 96 योजनाओं पर एक पैसा भी खर्च नहीं किया और न ही खर्च न करने का कोई कारण ही बताया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कोई भी योजना एक करोड़ से कम की नहीं थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इसी अवधि में सरकार का कर्ज 62000 करोड़ से पार गया है। स्मरणीय है कि 9 मार्च 2018 के अपने पहले बजट भाषण में मुख्यमंत्री ने सदन में यह कहा है कि उनकी सरकार को 46000 करोड़ का कर्ज विरासत में मिला है। सीएजी की रिपोर्ट और मुख्यमंत्री के भाषण से यह सामने आता है कि इस सरकार को 8000 करोड़ का कर्ज प्रतिवर्ष लेना पड़ रहा है। यदि इतना कर्ज लेकर भी जनहित की 96 योजनाओं पर इस सरकार में कोई पैसा ही खर्च नहीं किया है तो कार्यकुशलता पर इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता है। कैग के इस प्रमाण पत्र के बाद शायद विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने के लिये और किसी बारूद की जरूरत नहीं रह जाती है। इसी प्रमाण पत्र के साथ जब एडीबी के कर्ज से सिराज बड़ागांव और क्यारीघाट में बनी संपत्तियों को ऑप्रेशनल होने से पहले ही प्राइवेट सेक्टर को दे देने का सच सामने आयेगा तो फिर कांग्रेस के साठ/आठ के दावे को पूरा होने से कौन रोक पायेगा।
इस वस्तुस्थिति में राजनीतिक विश्लेषकों के सामने एक बड़ा सवाल यह भी आ रहा है कि यह सब कुछ ऐसे घट गया कि जयराम को इसका पता ही नहीं चल पाया या फिर अपनी कुर्सी पक्की करने के लिए यह सब कुछ घटने दिया गया। इस सवाल की पड़ताल करने के लिए कुछ तथ्यों पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। 2017 का चुनाव भाजपा ने धूमल को मुख्यमंत्री घोषित करके लड़ा था। लेकिन संयोगवश पार्टी को तो बहुमत मिल गया और धूमल अपनी पूरी टीम के साथ हार गये। इस हार के बाद भी विधायकों के एक बड़े वर्ग की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग और उनके लिये सीट खाली करने की पेशकश तक हुई। उस समय पार्टी में दूसरे वरिष्ठ लोगों में महेंद्र सिंह, जे.पी. नड्डा और सुरेश भारद्वाज आते थे। जयराम वरिष्ठता में इन सबके बाद थे। महेंद्र सिंह आर एस एस से ताल्लुक नहीं रखते और इसी गणित से में बाहर हो गये। नड्डा का नाम भी यहां तक आ गया था कि उनके समर्थकों ने तो मिठाईयां बांट दी और रास्ते से वापस हुए। इस गणित में जयराम फिर बैठ गये और मुख्यमंत्री बन गये। लेकिन इन दावेदारों का डर हर समय सिर पर मंडराता रहा। इस डर से बाहर आने के लिए सबसे पहले धूमल को शिमला से बाहर किया गया। उसके बाद हर जिले के बड़े नेता और संघ के नजदीकीयों को विवादित बनाने की कवायद शुरू हुई। मुख्यमंत्री के अपने ही कार्यालय के धर्मा-धर्माणी को लेकर एक पत्र वायरल हो गया। उसके बाद दूसरे पत्र में परमार और बिंदल तथा रविन्द्र रवि निशाने पर आ गये। इसी दौरान अनिल शर्मा और महेंद्र सिंह में मोर्चा खुल गया। महेंद्र सिंह सभी के निशाने पर आ गये। कांगड़ा में उद्योग मंत्री विक्रम भी पत्र बम के शिकार हुये। सरवीन चौधरी के खिलाफ विजय मनकोटिया आ गये। इंदु गोस्वामी को भी संगठन और सरकार के खिलाफ पत्र लिखना पड़ा। उपचुनाव में सुरेश भारद्वाज राजीव बिंदल और राकेश पठानिया सभी के चुनावी प्रबंधन कौशल की हवा निकल गयी। अभी नड्डा के अपने ही गृह जिले में उसके अपने ही लोग उससे नहीं मिल पाये और उल्टे मामलों के शिकार बन गये।
इस तरह यदि पूरी वस्तु स्थिति पर निष्पक्ष नजर डालें तो भाजपा का हर वह नेता तो देर सवेर नेतृत्व का दावेदार हो सकता था इस समय किसी न किसी कारण से विवादितों की कतार में आ गया है। इस सब में आज भी अकेले जयराम ही उन नेताओं में बचा है जो स्वयं ज्यादा विवादित नहीं है। भले ही इस सब की कीमत संगठन को चुकानी पड़ेगी लेकिन आज जयराम ने अपने को वहां लाकर खड़ा कर दिया है जहां उसका कोई विकल्प पार्टी के पास उपलब्ध नहीं है। जिस तरह से इस समय कांगड़ा को तीन जिलों में बांटने की योजना बन रही है और कांगड़ा का सारा नेतृत्व इस पर चुप्पी साधे बैठा है उसको क्या राजनीति की एक बड़ी शातिर चाल नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि इसके बाद कांगड़ा का सबसे बड़ा जिला होने का टैग खत्म हो जायेगा। क्या उसका नुकसान कांगड़ा के वर्तमान नेताओं को नहीं होगा ।

पुलिसकर्मीयों के परिजन निकालेंगे रोष रैली

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने प्रदेश कर्मचारियों के साथ जेसीसी बैठक करके उन्हें नये वेतनमान देने और अनुबंध कर्मचारियों की अनुबंध अवधि तीन साल से घटाकर दो साल करने का फैसला लिया है। जेसीसी में हुये इस फैसले को मंत्रिमंडल की बैठक में भी अनुमोदित कर दिया गया है। लेकिन सरकार के इस फैसले का लाभ उन पुलिसकर्मियों को नहीं मिलेगा जो पुलिस में 2015, 16, 17 और 19 में भर्ती हुये हैं। इन वर्षों में भर्ती हुये करीब 5700 पुलिस कर्मी इस फैसले से लाभान्वित नहीं होंगे। क्योंकि इनके लिए अनुबंध अवधि अभी भी आठ वर्ष ही है। इन्हें 10300+3200 का वेतनमान लेने के लिये आठ वर्ष का इंतजार करना ही पड़ेगा।
निश्चित रूप से इन पुलिस कर्मचारियों के साथ यह ज्यादती है। इस न इन्साफी के खिलाफ यह लोग पुलिस मैस का बहिष्कार करके और बाकायदा इसका रोजना मचे में जिक्र करके अपना विरोध प्रकट करते आये हैं। जब जेसीसी की बैठक में इनकी मांगों पर सुनवाई नहीं हुई तब तय लोग मुख्यमंत्री के आवास पर उनसे मिलने भी पहुंच गये थे। मुख्यमंत्री ने इनकी बात सुनके आश्वासन भी दिया था। लेकिन इस आश्वासन के बावजूद इन्हें पुलिस मुख्यालय से अनुशासन के चाबुक का सामना करना पड़ा। जुबान बंद रखने की पाबंदी लग गयी। सोशल मीडिया में भी अपनी तकलीफ सांझा नहीं कर सकते ऐसे निर्देश जारी हो गये। ऐसी पाबंदी लगने पर इनके परिजनों ने इनकी मांगे उठाने की जिम्मेदारी ले ली। बिलासपुर में जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा आये थे तब उनके सामने यह मांगे रखने का फैसला लिया और इसकी जानकारी जिला प्रशासन को दे दी गयी थी। लेकिन जब परिजन नड्डा से मिलने पहुंचे तब उनके खिलाफ एफ आई आर दर्ज कर दी गयी।
अब यह परिजन अपने बच्चों की लड़ाई लड़ने के लिए विवश कर दिये गये हैं। क्योंकि जब विधानसभा में भी यह मामला उठा तब इस विसंगति की जिम्मेदारी पूर्व की कांग्रेस सरकार पर डाल दी गयी। ऐसे में अब इन परिजनों ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि इनकी मांगों को पूरा न किया गया तो यह लोग प्रधानमंत्री की प्रस्तावित मण्डी यात्रा के दौरान रोष रैली निकालकर प्रधानमंत्री के सामने अपनी मांगें रखेंगे। कर्मीयों के दर्जनों अभिभावकों ने इस आशय के पत्र लिखकर मुख्यमंत्री को अपने फैसले से अवगत करवा दिया है। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से इनकी मांग स्वीकार करने के कोई संकेत नहीं आये हैं। ऐसे में तय माना जा रहा है की मण्डी में बिलासपुर से भी बड़ा कुछ घटेगा।

संवैधानिक अधिकारों की शव यात्रा पर राजद्रोह क्यों नहींःबसपा

सामान्य वर्ग आयोग के गठन की अधिसूचना मंत्रिमंडल की बैठक से गायब क्यों रही
मंडी में क्यों बड़े दलित अत्याचार के मामले
ओबीसी भी पूरा 27% आरक्षण लागू किए जाने की मांग पर आ गए हैं

शिमला/शैल। प्रदेश के स्वर्ण संगठन जातिगत आरक्षण समाप्त करके सारा आरक्षण आर्थिक आधार पर करने और एट्रोसिटी एक्ट खत्म करने की मांग करते रहे हैं। मंडल बनाम कमण्डल आंदोलन के दौरान तो यह विरोध प्रदेश में आत्मदाह के प्रयासों तक पहुंच गया था। लेकिन उसके बाद अब जयराम सरकार के समय में यह विरोध फिर मुखर हो उठा है। बल्कि इस दौरान दलित उत्पीड़न के मामलों में भी वृद्धि हुई है। दलित वर्ग से ताल्लुक रखने वाले मंत्री तक को मंडी में मन्दिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया था। स्वर्ण समाज का यह विरोध उस समय पूरी तरह खुलकर सामने आ गया जब 15 से 21 नवम्बर के बीच एट्रोसिटी अधिनियम की राजधानी शिमला में भी शव यात्रा निकाली गयी। प्रशासन इस शव यात्रा पर पूरी तरह खामोश रहा जबकि एट्रोसिटी अधिनियम संविधान द्वारा इन वर्गों को दिया गया अधिकार है। ऐसे में यह शव यात्रा एक तरह से संविधान की ही शव यात्रा बन जाती है और इस तरह से राष्ट्रद्रोह के दायरे में आती है। दलित समाज की मांग के बावजूद प्रशासन द्वारा कोई कदम न उठाया जाना और धर्मशाला में विधानसभा सत्र के दौरान स्वर्ण संगठनों के आन्दोलन के दबाव में मुख्यमंत्री द्वारा सामान्य वर्ग आयोग के गठन की अधिसूचना जारी करवा दिये जाने से यह मामला एक अलग ही पायदान पर पहुंच गया है।
प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए राज्यपाल को इस संदर्भ में एक ज्ञापन सौंपकर शव यात्रा निकालने वालों और इस पर संवद्ध प्रशासन के मौन रहे अधिकारियों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह के तहत मामला दर्ज करके कारवाई करने की मांग की है। बसपा ने इस आशय का एक ज्ञापन भी राज्यपाल को सौंपा है। इस ज्ञापन में बसपा ने मुख्यमंत्री के गृह जिले मंडी और उनके ही चुनाव क्षेत्र सिराज में हुए दलित उत्पीड़न के मामलों को प्रमुखता से उठाया है। सिराज में हुए पदम देव हत्याकांड कमल जीत उर्फ कोमल हत्याकांड और द्रंग में 80 वर्षीय बुजुर्ग से हुई मारपीट तथा जोगिन्दर नगर में 11 वर्षीय बच्ची के साथ हुए बलात्कार के मामलों का जिक्र करते हुये आरोप लगाया गया है कि एट्रोसिटी एक्ट को हटाने की मांग करके इन वर्गों के खिलाफ अत्याचार करने की छूट की मांग की जा रही है। क्योंकि संविधान द्वारा दिए गए इस अधिकार के बावजूद भी दलित अत्याचार के इन मामलों पर कार्रवाई न होना अपने में यही प्रमाणित करता है।
दूसरी और स्वर्ण संगठनों की मांग पर सरकार ने धर्मशाला में सामान्य वर्ग के लिए आयोग के गठन की अधिसूचना जारी करके आन्दोलन की धारा को तो रोक दिया है। लेकिन इस अधिसूचना के बाद मंत्रिमंडल की हुई पहली बैठक में अधिसूचना का मुद्दा न आने से भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्योंकि आन्दोलनकर्ताओं की मांग है जातिगत आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट को समाप्त करना। लेकिन यह दोनों ही संविधान द्वारा दिये गये अधिकार हैं। इनमें कोई भी संशोधन करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसमें राज्य सरकार या उसके द्वारा गठित आयोग की कोई भूमिका ही नहीं है। यहां तक कि ऊंची जातियों के आर्थिक रूप से पिछड़ा को 10 प्रतिशतआरक्षण 1991 में नरसिंह राव सरकार ने दिया था उसे भी सर्वोच्च न्यायालय 1992 में आये इन्दिरा साहनी मामले के फैसले में रद्द कर चुका है। फिर अन्य पिछड़े वर्गों को जो 27 प्रतिशत आरक्षण मिला है उस पर भी प्रदेश में पूरी तरह अमल नहीं हो पाया है। यह वर्ग भी इस पर अमल की मांग को लेकर सामने आ रहा है। इस परिदृश्य में जयराम सरकार के लिये आने वाला समय काफी रोचक रहने वाला है।

प्रधानमंत्री की संभावित यात्रा से पहले प्रदेश भाजपा में फिर उभरी हलचल

शिमला/शैल। जयराम सरकार को सत्ता में चार वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इस अवसर पर मंडी में राज्य स्तरीय एक आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन के लिए प्रधानमंत्री को आमंत्रण भेजा गया है। नरेंद्र मोदी इस आयोजन में शामिल होंगे या नहीं यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। जहां सरकार सता के चार साल पूरे करने जा रही है वहीं पर इस चौथे वर्ष में हुए चारों उपचुनाव की सरकार हार गयी है। इस हार पर तत्कालिक प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने महंगाई को इसका कारण बताया था। यह संयोग है कि मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी आयी थी। लेकिन 2014 से अगर तुलना की जाये तो आज भी कीमतें कई गुना ज्यादा है। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री इस जश्न पर मंडी आते हैं तो वह इस महंगाई और बेरोजगारी के लिए क्या जवाब देते हैं यह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि जहां मंडी को आयोजन स्थल बनाया गया है वही पर उसी मंडी में लोकसभा के लिये भी उपचुनाव हुआ और भाजपा हार गयी। जबकि इसी मंडी में एक समय स्व.वीरभद्र सिंह और उनके परिवार पर यह आरोप लगाया गया था कि उनके पेड़ पर भी नोट उगते हैं। इस आरोप के बाद प्रतिभा सिंह चुनाव हार गयी थी। लेकिन आज वही प्रतिभा सिंह उन पुराने सारे कलंको को धोते हुये मोदी और जयराम दोनों की सरकारों के हाथों से यह सीट छीन कर ले गयी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मंडी की हार की जिम्मेदारी कौन लेता है जयराम या मोदी।
उपचुनावों की हार के लिए हुये मंथन के बाद कुछ हलकों में इस हार के लिए धूमल और उनके नजदीकियों को भी जिम्मेदार ठहराया गया है। इसके लिए यह तर्क दिया गया है कि 2017 में धूमल मुख्यमंत्री का चेहरा थे परंतु जब वह स्वयं चुनाव हार गये और जयराम को पार्टी ने मुख्यमंत्री बना दिया तो अब जयराम को नीचा दिखाने के लिए इन लोगों ने उपचुनाव में हार की पटकथा लिख दी। जब इस तरह की चर्चाएं सार्वजनिक हुई और उसके बाद प्रेम कुमार धूमल दिल्ली पहुंच गये तो भाजपा के राजनीतिक हलकों में फिर से अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। इस गर्मी से क्या निकलता है यह आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह एक रोचक स्थिति बन गयी है। क्योंकि अब जब पार्टी चार वर्षों का जश्न चारों उपचुनाव हारने के बाद भी मना रही है तो यह स्वभाविक है कि इन चार वर्षों में जो कुछ प्रदेश और सरकार में घटा है वह सब भी चर्चा में आयेगा ही। क्योंकि इस सरकार में जिस तरह से समय-समय पर पत्र बम फूटते रहे हैं उनमें उठाये गये मुद्दे आज भी यथास्थिति बने हुये हैं। इन्हीं पत्र बम्बों का परिणाम है स्वास्थ्य विभाग को लेकर हुई एफ आई आर/संगठन को लेकर आये इन्दु गोस्वामी के पत्र को क्या आज भी नजरअंदाज किया जा सकता है शायद नहीं। आज इस सरकार पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि इस ने प्रदेश को कर्ज के ऐसे चक्रव्यूह में उलझा दिया है जिससे बाहर निकलना संभव नहीं होगा। इतने कर्ज के बावजूद भी यह सरकार प्रदेश के युवाओं को रोजगार देने में असफल रही है। आज जब मल्टी टास्क वर्कर भर्ती करने के लिये आठ हजार संस्थानों में चार हजार मुख्यमंत्री के कोटे से भरने की नीति बनाने पर सरकार आ जाये तो अन्दाजा लगाया जा सकता है कि उसका बेरोजगार युवाओं और उनके अभिभावकों पर क्या असर हुआ होगा।
सरकार की इसी तरह की नीतियों का परिणाम है कि हर चुनाव क्षेत्र का प्रभाव किसी ना किसी मंत्री के पास होने के बावजूद सरकार हार के गयी। क्या इन प्रभारी मंत्रियों ने चुनाव के दौरान किसी भीतरघात की शिकायत की थी शायद नहीं। क्या टिकटों का आवंटन इन मंत्रियों या धूमल गुट ने किया था शायद नहीं। ऐसे में आज जो भूमिका तैयार की जा रही है क्या उसे आने वाले आम चुनाव में मिलने वाली हार की जिम्मेदारी अभी से दूसरों पर डालने की नीयत और नीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये। इस परिदृश्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस हार के बावजूद प्रधानमंत्री क्या संदेश देकर जाते हैं। 

जब सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ही पारदर्शी न हो तो

शिमला/शैल। हर सरकार अपनी नीतियों योजनाओं और कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करती है। इस प्रचार का एक बड़ा माध्यम समाचार पत्र और इलेक्ट्रॉनिक संचार तंत्र रहता है। सूचना और जनसंपर्क विभाग के माध्यम से इस काम को अंजाम दिया जाता है। इसके लिये सरकारी धन खर्च किया जाता है। इसी कारण से विपक्ष इस खर्च की जानकारी सरकार से मांगता है। इस संदर्भ में पिछले कुछ अरसे से विधानसभा के हर सत्र में जयराम सरकार से यह पूछा जा रहा है कि उसने अपने प्रचार प्रसार पर कितना खर्च किया है। किन-किन अखबारों को कितने-कितने विज्ञापन जारी किये हैं। विधानसभा के इस सत्र में भी आशीष बुटेल और राजेंद्र राणा के दो अतारांकित प्रश्न आये लेकिन हर बार की तरह इस बार भी इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देने की बजाये यही कहा गया है कि सूचना एकत्रित की जा रही है। हर बार यही जवाब आने से यह सवाल उठना और आशंका होना स्वभाविक है कि सरकार का आचरण इस संबंध में भी पारदर्शी नहीं है। क्योंकि जब सरकार अखबारों को विज्ञापन जारी करती ही है और प्रचार के अन्य माध्यमों पर भी खर्च करती है तब इस खर्च की जानकारी का विवरण सदन में रखने से हिचकिचाहट क्यों? इसके लिए सरकारी धन का करोड़ों में खर्च हो रहा है। यह सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का पैसा नहीं है। जिसके खर्च पर पार्टी का नियंत्रण हो। जब सरकार यह जानकारी भी सदन के माध्यम से जनता के सामने नहीं रखना चाहती है तो इसका अर्थ है कि वह इसमें कुछ छुपाना चाहती है। कुछ छुपाने की व्यवस्था तब आती है जब इसमें नियमों का पालन न किया गया हो। उन अखबारों को प्रोत्साहन दिया गया हो जिन्होंने तबलीगी समाज को करोना बम्ब करार दिया था। जिन अखबारों ने सरकार से सवाल पूछने का दुस्साहस किया है उनके विज्ञापन बंद करके उन्हें प्रताड़ित करने का प्रयास किया गया हो। जब सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क ही पारदर्शी न हो तो सरकार की कारगुजारीयों को लेकर उसके माध्यम से भेजी गई सूचनायें कितनी विश्वसनीय और पारदर्शी होंगी। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सूचना और जनसंपर्क विभाग का प्रभार स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। इस विभाग का महत्व कई अर्थों में सरकार के गुप्तचर विभाग से भी ज्यादा होता है। क्योंकि हर अखबार और अन्य माध्यमों से आने वाले समाचारों की जानकारी मुख्यमंत्री तथा तंत्र के अन्य बड़े अधिकारियों तक ले जाना इसकी जिम्मेदारी है। जहां कोई सूचना या जानकारी गलत छप गई हो उसका खंडन और स्पष्टीकरण जारी करना इस विभाग की जिम्मेदारी है। लेकिन इस सरकार के कार्यकाल में यह विभाग सरकार और पत्रकारों के मध्य एक संवाद स्थापित करने में पूरी तरह से विफल रहा है। शायद यह विभाग इस नीति से चला कि सवाल पूछने वाले के विज्ञापन बंद करके उस प्रकाशन को ही बंद करवा दिया जाये। लेकिन विभाग यह भूल गया कि अब जबसे मीडिया के बड़े वर्ग पर गोदी मीडिया होने का टैग लगा है तबसे पाठक उन छोटे बड़े समाचार पत्रों को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं जो दस्तावेजी प्रमाणों के साथ जनता में जानकारियां रख रहे हैं।

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