Monday, 02 March 2026
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क्या कांग्रेस के वर्तमान ढांचे को ही चुनावों की शक्ल देने की योजना बनाई जा रही है

ऊना में हुई बैठक में आया सुझाव

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों संगठनात्मक चुनावों की प्रक्रिया चल रही है। ब्लॉक स्तर से लेकर जिला स्तर तक संगठन के पदाधिकारियों का चुनाव होगा। इस चुनाव में कार्यकर्ता जिसे प्रदेश अध्यक्ष चुनेंगे वह सर्वमान्य होगा क्योंकि वह चयन से आयेगा मनोनयन से नहीं। चुनाव की इस प्रक्रिया के संचालन के लिये हाईकमान की ओर से चुनाव अधिकारी तैनात हैं। दीपा दास मुंशी चुनाव की मुख्य अधिकारी हैं। चुनाव प्रक्रिया के पहले चरण में सदस्यता अभियान हैं। प्रदेश विधानसभा के लिए इसी वर्ष के अंत तक चुनाव होने हैं। वर्तमान मनोनीत अध्यक्ष के तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा हो चुका है। प्रदेश में यदि बतौर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की भूमिका का आकलन किया जाये तो विधानसभा के अंदर जितनी प्रभावी है बाहर फील्ड में उसका आधा भी नहीं। विधानसभा का यह बजट सत्र वर्तमान कार्यकाल का एक तरह से यह अंतिम प्रभावी सत्र होगा। इस सत्र के बाद व्यवहारिक रूप से सारे दलों की चुनावी गतिविधियों शुरू हो जायेंगी। इस चुनावी गणित को सामने रखकर कांग्रेस में पिछले कुछ अरसे से अध्यक्ष को बदलने की मांग उठनी शुरू हो गई है। विधायकों का एक वर्ग इस संबंध में दिल्ली के चक्कर भी लगा चुका है। अध्यक्ष को बदलने की मांग का यदि निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाये तो इसके लिए वर्तमान पदाधिकारी के आकार पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। इस समय संगठन में राज्य स्तरीय प्रवक्ता ही शायद डेढ़ दर्जन है। अन्य पदाधिकारी भी इसी अनुपात में हैं। बारह जिलों और चार लोकसभा क्षेत्रों वाले प्रदेश में यदि पदाधिकारी इतनी बड़ी संख्या में होंगे तो निश्चित है कि वहां संगठन कोई प्रभावी भूमिका अदा नहीं कर पायेगा। क्योंकि वहां पर पदों के सहारे नेताओं को संगठन में बनाये रखने की बाध्यता बन चुकी होती है।
अब जब संगठन के चुनाव हो रहे हैं तब चुनाव के माध्यम से ही नये अध्यक्ष का चयन होने देना भी लाभदायक माना जा रहा है। लेकिन जब संगठन में बैठे कुछ लोग इस प्रयास में लग जायें कि वर्तमान ढ़ांचे को ही चुनावों की शक्ल दे दी जाये तो उससे कुछ सवाल उठने स्वाभाविक हैं। क्योंकि प्रदेश विधानसभा के चुनाव से पहले ही राष्ट्रीय स्तर तक संगठन के चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जायेगी तब इस तरह के प्रयासों को स्वीकार किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक पिछले दिनों जब प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर दीपा दास मुंशी के साथ संगठन चुनाव के संबंध में ऊना आये थे तब यहां के संगठन द्वारा यह राय दी गई थी कि वर्तमान पदाधिकारियों को ही चयनित मान लिया जाये। इसके लिए यह तर्क दिया गया कि चुनावी वर्ष में संगठन के चुनाव करवाने से कई लोगों में नाराजगी पैदा हो सकती है। दीपा दास मुंशी से यह आग्रह किया गया कि वह इस सुझाव को हाईकमान के पास रखें और उसके लिये हाईकमान की सहमति प्राप्त करने का प्रयास करें। यदि यह प्रयास सुझाव मान लिया जाता है तो फिर से पुराने पदाधिकारियों का ही कब्जा संगठन पर बना रहेगा और इससे नीचे तक रोष व्याप्त हो जायेगा
इस पर एक चर्चा और शुरू हो गयी है कि क्या ऐसा सुझाव सारे विधायकों तथा पूरे संगठन का है या कुछ ही लोगों का है। क्योंकि इसका एक अर्थ यह भी लगाया जा रहा है कि जो लोग संगठन पर अपना कब्जा चाहते हैं वह संगठन के चुनाव के माध्यम से ऐसा कर पाने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं। इस समय जहां पूरी पार्टी को विधानसभा चुनावों की तैयारियों में लगना है वहीं पर संगठन के चुनावों को यह मोड़ देने से एक नया विवाद खड़ा होने की आशंका उभरती नजर आ रही है। क्योंकि इस समय पार्टी के अंदर दलित नेतृत्व के नाम पर कोई बड़ा चेहरा नहीं बचा है। ओबीसी वर्ग में भी चंद्र कुमार के बाद कोई बड़ा नेता नहीं है। ट्राईबल एरिया में भी जगत सिंह नेगी ही एक बड़ा नाम बचा है। राजपूत नेतृत्व के नाम पर सबसे बड़ा नाम कौल सिंह ठाकुर अपना विधानसभा चुनाव हारने के बाद लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। मंडी नगर निगम हारने के बाद कांग्रेस का प्रदर्शन लोकसभा उपचुनाव में भी मंडी जिले में कमजोर रहा है। यहां तक की द्रंग में भी बढ़त नहीं मिल पायी है। कॉल सिंह के बाद राजपूत नेताओं में आशा कुमारी, हर्षवर्धन चौहान, रामलाल ठाकुर और सुखविंदर सिंह सुक्खू आते हैं। ब्राह्मण नेताओं में मुकेश अग्निहोत्री के बाद दूसरा बड़ा नाम है ही नहीं। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मुकेश का प्रदर्शन सराहनीय रहा है। जातीय आंकड़ों में भी राजपूतों के बाद ब्राह्मण दूसरी बड़ी जाति है प्रदेश में। ऐसे में विधानसभा चुनावों के लिये भी मुख्यमंत्री के चेहरे का चयन करना आसान नहीं होगा। यह सही है कि इस समय पार्टी के पास सबसे बड़ा नाम आनंद शर्मा का है लेकिन उनके लिए विधानसभा क्षेत्र का चुनाव करना ही बड़ा सवाल है।


मौद्रीकरण के नाम पर पंचायतों की संपत्तियों का भी होगा विनिवेश

केंद्र ने राज्यों को भेजा पत्र
हिमाचल सरकार ने पंचायतों से मांगा संपत्तियों का विवरण
राजनैतिक दलों की चुप्पी सवालों में
पंचायतों को संपत्तियों के विनिवेश से जुटानी होगी आय

शिमला/शैल। केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग के सचिव द्वारा 16 अगस्त 2021 को राज्य सरकारों को भेजे पत्र में निर्देश दिये गये हैं की पंचायतें अपने राजस्व संसाधन बढ़ाने के लिए अपनी संपत्तियों का मौद्रीकरण करें। पत्र में कहा गया है कि पंचायतें to raise own sources of revenue by monetization  of assets, lease of common property, property tax, panchayat land, ponds and small buildings.  हिमाचल सरकार ने इन निर्देशों की अनुपालना में पंचायतों से खण्ड विकास अधिकारियों के माध्यम से ऐसी संपत्तियों का विवरण मांग लिया है। स्मरणीय है कि इस बार केंद्र सरकार में ग्रामीण विकास विभाग के बजट में पिछले वर्ष की तुलना में दस प्रतिशत की कमी की गई है। यही नहीं मनरेगा में 25.5% और पी डी एस में 28.5% की बजट में कमी की गयी है। मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध रहता था और पी डी एस के तहत सस्ता राशन मिल जाता था। इनमें बजट की कमी से यह योजनाएं प्रभावित होंगी यह तय है। इन सारी कमियों का संयुक्त प्रभाव पंचायतों के कामकाज पर पड़ेगा। ग्रामीण विकास के बजट में भी 10% की कटौती हुई है। इस सबका परिणाम होगा कि पंचायतों को मौद्रीकरण के नाम पर अपनी संपत्ति निजी क्षेत्र को विनिवेश के नाम पर देने की बाध्यता आ जायेगी। इसका यह भी परिणाम होगा कि प्राइवेट सैक्टर को गांव में भी आने का अवसर मिल जायेगा।
पंचायत संपत्तियों के मौद्रीकरण की इस योजना के दूरगामी परिणाम होंगे यह स्वभाविक है। लेकिन इस योजना पर सार्वजनिक मंचों पर कोई बहस न तो केंद्र ने उठायी है और न ही राज्य सरकारों ने। यहां तक कि विपक्ष ने भी इस बारे में कुछ नहीं कहा है। पंचायतों के पास संसाधनों के नाम पर ज्यादा कुछ है नहीं। केवल कुछ जमीन है जिनका दोहन हो नहीं पाया है। जयराम सरकार ने भी पिछले बजट में घोषणा की थी कि वह गांव में खाली पड़ी जमीनों को अपने नियंत्रण में लेंगे। सरकार की इस घोषणा पर अलग से कोई अमल नहीं हो पाया है। लेकिन राज्य सरकार की इस घोषणा को यह केंद्र के इस पत्र के आईने में देखा जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि सरकार गांव के स्तर पर तक अपनी संपत्तियों को प्राइवेट सैक्टर को देने का मन बना चुकी है और उस दिशा में लगातार बढ़ रही है। लैण्ड टाइटलिंग एक्ट का उद्देश्य की जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल बनाना है। यह अधिग्रहण आधारभूत ढांचा खड़ा करने के नाम पर किया जायेगा। आधारभूत ढांचे की संरचना का काम पहले ही निजी क्षेत्र को दिया जा चुका है। इस तरह सरकार की हर नीति गांव में प्राइवेट सैक्टर को लाने की बन चुकी है यह स्पष्ट हो जाता है।
इस परिदृश्य में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि पंचायतों की संपत्तियों के मौद्रीकरण को पंचायतों की आम ग्राम सभा बैठकों में चर्चा के लिये रखा जाये। सरकार ने तो अपने पत्र में पंचायतों के लिये पूरे वर्ष का माहवाार ऐजैण्डा तय कर दिया है। लेकिन पंचायत स्तर तक जो पत्र पहुंचा है उसमें पंचायतों से उनकी संपत्तियों और उनकी लोकेशन का विवरण ही पूछा गया है। पंचायतों से यह विवरण मांगे जाने का कोई कारण नहीं बताया गया है। इसका अर्थ हो जाता है कि सरकार द्वारा पंचायतों को भी पूरी और सही जानकारी नहीं दी गयी है। विपक्ष के पास भी शायद जानकारी नहीं है। सरकार ने भी इस योजना के उद्देश्यों पर कोई अलग से कुछ नहीं कहा है। ऐसे में आम आदमी की निगाहें इस पर लगी हुई है कि बजट सत्र में इस पर कोई चर्चा आती है या नहीं।

किसके नेतृत्व में लडे़गी प्रदेश कांग्रेस अगला चुनाव उठने लगा है सवाल

शिमला/शैल। क्या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का बदलाव होगा? क्या विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के होने वाले मुख्यमन्त्री के नाम की घोषणा कर दी जायेगी? यदि ऐसी घोषणा हो जाती है तो वह चेहरा कौन होगा? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो एक कांग्रेस कार्यकर्ता से लेकर प्रदेश के आम आदमी के सामने आने लग पड़े हैं। क्योंकि इसी वर्ष के अंत में चुनाव होने हैं। भाजपा से सत्ता छीनने का सवाल होगा और इसमें यह हर समय सामने रहेगा कि संसाधनों के नाम पर कांग्रेस भाजपा का मुकाबला नहीं कर पायेगी। क्योंकि केंद्र और प्रदेश में दोनों जगह भाजपा की सरकारें हैं। फिर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और जेपी नड्डा से लेकर दर्जनों केंद्रीय मंत्री चुनाव प्रचार में आयेंगे। कांग्रेस को भाजपा के एक व्यवहारिक पक्ष को सामने रखकर अपनी तैयारियां करनी होगी। इसलिये यह सवाल अहम हो जाता है कि प्रदेश कांग्रेस का आकलन इस परिदृश्य में किया जाये। क्योंकि भाजपा का आकलन उस पर लगे आरोपों के आईने में कांग्रेस का उसकी अक्रमकता के आईने में किया जायेगा।
स्मरणीय है कि 2017 के चुनाव के समय स्व. वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री और सुखविंदर सिंह सुक्खू पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। कांग्रेस चुनाव हार गयी थी। इस हार के बाद जब कांग्रेस विधायक दल का नेता चुनने की बात आयी तब हाईकमान ने यह जिम्मेदारी ना तो स्व. वीरभद्र सिंह को दी और ना ही सुक्खू को। यह जिम्मेदारी मुकेश अग्निहोत्री को दी गयी। जबकि शायद 17 लोगों ने स्व. वीरभद्र सिंह के पक्ष में हस्ताक्षर करके उन्हें यह जिम्मेदारी दिये जाने की मांग की थी। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सुक्खू को हटाकर कुलदीप राठौर को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। पार्टी 2019 में लोकसभा की चारों सीटें हार गयी। सोलन में राजेंद्र राणा और पालमपुर में मुकेश अग्निहोत्री के हाथों में कमान थी। नगर निगम के बाद अब तीन विधानसभा और एक लोकसभा उपचुनाव पार्टी जीत गयी। मंडी लोकसभा की जिम्मेदारी फिर मुकेश अग्निहोत्री के पास थी। जिन्होंने 17 विधानसभा क्षेत्रों का संचालन किया।
इस परिपेक्ष में यह सवाल उठता है कि इस दौरान प्रदेश कांग्रेस की कार्यशैली विधानसभा के भीतर और बाहर क्या रही। विधानसभा के भीतर बतौर नेता प्रतिपक्ष जिस कदर मुकेश अग्निहोत्री जयराम और उनकी सरकार पर आक्रामक रहे हैं उसके कारण वह आज मुख्यमंत्री से लेकर भाजपा के हर छोटे बड़े नेता के निशाने पर चल रहे हैं। जब विधानसभा में राज्यपाल से ही टकराव की स्थिति धरने प्रदर्शन तक पहुंच गई थी तब संगठन की ओर से कोई बड़ा योगदान नहीं मिल पाया है यह कई दिन चर्चा का विषय बना रहा था। आज भी सदन के भीतर जो आक्रमकता कांग्रेस की सामने आती है उसके मुकाबले में संगठन सदन के बाहर कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। अभी तक कांग्रेस का आरोप पत्र सामने नहीं आ पाया है। जबकि भाजपा ने हर चुनाव में कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर आरोप लगाये हैं। स्व.वीरभद्र सिंह के खिलाफ बने मामलों को प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के हर नेता ने हर चुनाव में उछाला है। यह अब एक चुनावी संस्कृति बन गयी है कि जब तक विरोधी को व्यक्तिगत स्तर पर नहीं घेरा जायेगा तब तक जनता आपको गंभीरता से नहीं लेती हैं। प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व अभी तक मुख्यमंत्री जयराम और उनके दूसरे सहयोगियों को व्यक्तिगत स्तर पर नहीं घेर पाया है। जबकि दर्जनों गंभीर मामले सामने हैं। अभी घटे शराब कांड में ही भाजपा के दो बड़े नेताओं के नाम हर आदमी की जुबान पर हैं। लेकिन कांग्रेस नेता यह नाम लेने से बच रहे हैं। आज शायद प्रदेश के सात-आठ ठेकेदारों के पास ही सात सौ करोड़ से अधिक के ठेके हैं। एक मंत्री का भाई तो शायद पूरे जिले को संभाल रहा है। जनता में यह चर्चायें आम है लेकिन कांग्रेस मौन है। कांग्रेस का यह मौन तोड़ने के लिए हाईकमान को समय रहते नेतृत्व के सवालों को सुलझा लेना होगा अन्यथा नुकसान हो सकता है। जातीय समीकरण भी प्रभावी रहते हैं इस पर अगले अंक में चर्चा की जायेगी।

प्रदेश किसान यूनियन ने जयराम सरकार को भेजा मांग पत्र

केंद्रीय बजट से निराश होकर राज्य सरकार से अपने बजट में इन्हें पूरा करने को कहा
देश के जीडीपी का 45% किसानी बागवानी से आता है
रोजगार के सबसे ज्यादा अवसर भी यही क्षेत्र पैदा करता है

शिमला/शैल। किसान की राजनीतिक ताकत कितनी और क्या है इसका एहसास तेरह माह चले किसान आंदोलन ने सबको करवा दिया है। इसी आंदोलन के कारण अंततः सरकार को विवादित कृषि कानून वापस लेने पड़े। किसानों के खिलाफ बनाये गये आपराधिक मामले वापस लेने और एम एस पी के लिए कमेटी गठित करने की घोषणाएं करनी पड़ी। संसद में जब कृषि कानून वापस लेने का बिल पारित हो गया तो उसके बाद किसानों ने अपना आंदोलन वापस लिया। लेकिन व्यवहारिक रुप से जब मामले वापस लेने और एम एस पी के लिए कमेटी गठित करने की घोषणाओं पर अमल नहीं हो सका तब किसान यूनियन ने फिर से आंदोलन की घोषणा कर दी है। 2023 में भी आंदोलन जारी रखने का ऐलान किसान नेताओं की ओर से आ गया है। इसके लिए किसान संगठन ने जो रणनीति अपनाई है उसके तहत एक पूरे शोध के बाद कुछ किसान समस्याओं को चिन्हित करने के बाद इन्हें राज्य सरकारों को भेजा गया है। हिमाचल में भी भारतीय किसान यूनियन ने इसके अध्यक्ष अनेंदर सिंह नॉटी की अध्यक्षता में राज्य सरकार को एक ग्यारह सूत्रीय मांग पत्र सौंपा है। मांग पत्र में साफ कहा गया है कि केंद्र सरकार के बजट से किसानों को घोर निराशा हुई है। इसलिए राज्य सरकार से मांग की गई है कि वह अपने बजट में किसानों की इन मांगों को पूरा करने के लिए निश्चित और ठोस कदम उठाये। इस मांग पत्र में साफ कहा गया है कि प्रदेश की 80% जनता कृषि और बागवानी पर आश्रित है रोजगार के सबसे ज्यादा अवसर भी यही क्षेत्र पैदा करता है मांग पत्र में यह भी साफ कर दिया गया है कि सरकार जिस गंभीरता से प्रदेश के कर्मचारियों वर्ग को लेती है किसानों को उससे भी ज्यादा गंभीरता से लें ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि क्या जयराम सरकार अपने बजट में किसानों की मांगों को पूरा करने के लिए व्यवहारिक कदम उठा पाती है या नहीं

यह है किसानों का मांग पत्र

1. केंद्र सरकार की फसल बीमा योजना हिमाचल प्रदेश के किसानों को लाभ पहुंचाने में पूर्णत विफल रही है इसलिए स्थानीय परिस्थितियों और मौसम को देखते हुए राज्य सरकार अपने स्तर पर फसल बीमा योजना लाए ताकि हिमाचल के किसानों को इसका असली लाभ मिल सके।
2. हिमाचल प्रदेश के किसानों , बागवानों, खासतौर पर ऊपरी क्षेत्र के बागवानों हेतु यूटिलिटी तथा पिकअप जैसे वाहन जो अभी तक ’व्यवसायिक श्रेणी’ में रखे गए हैं उनको ’प्राइवेट रजिस्ट्रेशन’ के दायरे में लाया जाए तथा इस पर भी ’ट्रैक्टर’ की तर्ज पर सरकार सब्सिडी दे क्योंकि पहाड़ी क्षेत्र में ट्रैक्टर से अधिक इन वाहन की जरूरत पड़ती है तथा खेती में उपयोग होने वाली वस्तुओं से लेकर अपनी फसल की ढुलाई के लिए इन वाहनों की सारा साल जरूरत पड़ती है। निजी उपयोग के बावजूद व्यवसायिक श्रेणी में होने के कारण किसानों को ’रोड टैक्स, पासिंग और इंश्योरेंस’ के रूप में भारी-भरकम पैसा सरकार को भरना पड़ता है।
3. कृषि उपज मंडी समिति की आय का खर्च भी किसानों के लिए होना चाहिए और किसी अन्य मद में इसका पैसा खर्च ना हो। एपीएमसी की आय का एक हिस्सा ’कोल्ड स्टोर बनाने और खेती में रिसर्च’ हेतु रखा जाए। हिमाचल प्रदेश में हर ब्लॉक स्तर पर एक नई मंडी बनाई जाए तथा पहले से मौजूद मंडियों की क्षमता और सुविधा बढ़ाई जाए। टमाटर, अदरक, लहसुन,सेब, स्टोन फ्रूट पर आधारित पल्प प्लांट्स को लगाया और बढ़ावा दिया जाए फल सब्जी साथ मटर आदि के कैनिंग यूनिट भी कृषि मंडी में लगाए जाएं।
4. पहाड़ी क्षेत्रों में जहां सड़क नहीं है वहां फसलों को सड़क तक लाने हेतु छोटे रोपवे पर भी सरकार 80% तक सब्सिडी का प्रावधान करें इससे सुदूर पहाड़ों पर बगीचों में नए होमस्टे भी खुलेंगे तथा किसान पर्यटन के द्वारा भी अपनी आर्थिकी को मजबूत कर पाएंगे।
5. गेहूं के साथ मक्की हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक बोई जाने वाली फसल है, इसलिए सरकार 2022 वर्ष से मक्की की फसल की भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद सुनिश्चित करे तथा हिमाचल प्रदेश की मक्की का आटा पूरे भारत में सबसे अधिक पौष्टिक तथा गुणवत्ता वाला है इसलिए सरकारी डिपो में गेहूं के साथ-साथ मक्की का आटा भी उपलब्ध करवाया जाए ताकि हिमाचल प्रदेश में खरीदी गई ’मक्की का आटा हिमाचल प्रदेश में ही रसोई घरों’ तक पहुंचे।
6. हिमाचल प्रदेश में किसानों की सुविधा तथा फसलों के भंडारण के लिए कोल्ड स्टोर चेन के लिए उचित बजट का प्रावधान हो तथा हिमाचल प्रदेश में ’कोल्ड स्टोर कॉरपोरेशन’ की स्थापना करके अलग से विभाग बनाया जाए।
7. भांग व अफीम के औषधीय और औद्योगिक उपयोग के लिए सरकार इसकी खेती को कानूनी दर्जा जल्द से जल्द प्रदान करें।
8. इस वर्ष हिमाचल प्रदेश में धान की खरीद में किसानों को बहुत दिक्कत आई जिसका मुख्य कारण किसी प्रादेशिक एजेंसी का मध्यस्थ ना होना रहा है अतः सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन व कृषि उपज मंडी समिति को खरीद में मध्यस्थ नियुक्त किया जाए तथा टोकन की व्यवस्था को और सरल किया जाए।
9. जिला सिरमौर स्थित धौलकुआं में कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर की स्थापना हो ताकि किसानों के बच्चे कृषि के विषय में पढ़ाई कर सकें।इसके अतिरिक्त स्कूली पाठ्यक्रम में भी कृषि बागवानी को दसवीं तक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
10. बड़े शहरों में किसान हाट हेतु जगह उपलब्ध करवाई जाए जहां किसान अपने उत्पाद सीधे बेच पाए और उपभोक्ता को भी ताजे फल सब्जी सीधे सस्ते मिलें।
11. दिल्ली चंडीगढ़ देहरादून जैसे शहरों हिमाचल के फलों और सब्जी के अपने आउटलेट हों और हिमाचली ब्रांड के तहत सीधे किसानों से खरीद कर कृषि विभाग वहां फल सब्जी बेचे।

2017 में भाजपा के पुराने नेतृत्व नेता और नीयत को खत्म करके लाया गया था नया नेतृत्व

सुरेश भारद्वाज के इस ब्यान से पार्टी में बढ़ी हलचल
जयराम की धूमल और अनुराग से बैठकें चर्चा में

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर संगठन के मण्डल मिलन कार्यक्रमों के तहत जब हमीरपुर और कांगड़ा के दौरे पर आये तो पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के साथ हुई उनकी बैठक को लेकर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में एक बार फिर चर्चाओं का दौर चल पड़ा है। इस दौर से पहले वह दिल्ली भी गये थे कुछ केंद्रीय नेताओं से मिलने। दिल्ली के दौरे में भी पहले अनुराग ठाकुर को मिले और फिर उनको साथ लेकर अन्य नेताओं से मिले। धूमल और अनुराग से जयराम का यह मिलना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि पिछले दिनों हुए उपचुनाव में चारों सीटें हारने का ठीकरा जयराम से जुड़े एक वर्ग ने सीधे धूमल के सिर फोड़ा था। उपचुनाव की हार के बाद यह लगातार प्रचारित किया गया कि सरकार और संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव हो रहा है। चार-पांच मंत्रियों को बदले जाने की चर्चाएं चली। लेकिन आज तक यह चर्चाएं अमली शक्ल नहीं ले पायी। इसी बीच स्वास्थ्य मंत्री ने एक पत्रकार वार्ता बुलाई। हॉलीडे होम में रखी यह वार्ता सफल नहीं हो पायी। क्योंकि पहले पत्रकार नहीं पहुंचे और जब कुछ पत्रकार पहुंचे तब आयोजकों में से कोई नहीं था। इसके बाद शहरी विकास मंत्री ने वार्ता आयोजित कि उन्होंने अपने संबोधन में यह कहा कि 2017 में जो सरकार जयराम ठाकुर के नेतृत्व में बनी थी वह पुराने नेतृत्व नीयत और नेता सभी को खत्म करके बनी थी।

सुरेश भारद्वाज के इस ब्यान को राजनितिक हलकों में इस तरह देखा जा रहा है कि क्या उस समय घूमल की हार प्रायोजित थी। भारद्वाज के इस ब्यान से पूरी पार्टी शिमला से लेकर दिल्ली तक हिल गयी है। स्मरणीय है कि 2017 में भाजपा ने प्रेम कुमार धूमल को नेता घोषित करके प्रदेश का चुनाव लड़ा था और सत्ता में पहुंची थी। यह सही है कि उस समय धूमल अपना चुनाव हार गये थे। उनके विश्वस्त माने जाने वाले कुछ अन्य भी चुनाव हार गये। लेकिन यह भी सच है कि यदि उस समय धूमल को नेता न घोषित किया जाता तो भाजपा सत्ता में ना आती। उस समय धूमल के हारने के बाद भी विधायकों का बहुमत उनको मुख्यमंत्री बनाना चाहता था और दो तीन लोगों ने उनके लिये सीट खाली करने की पेशकश भी कर दी थी। लेकिन धूमल ने जनता के निर्णय को स्वीकार करते हुये अपने को नेता की दौड़ से किनारे कर लिया। लेकिन उसके बाद जंजैहली प्रकरण को लेकर जो कुछ घटा वह भी सबके सामने है। लेकिन इस बीच एक बार भी यह सामने नहीं आया कि धूमल की ओर से सरकार को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष में असहज करने के लिए कुछ किया गया। जयराम ठाकुर के नेतृत्व को कहीं से कोई चुनौती वाली स्थिति नहीं आयी। लेकिन मुख्यमंत्री के अपने ही गिर्द कुछ ऐसे लोगों का जमावड़ा हो गया जो शायद सत्ता के बहुत ज्यादा पात्र नहीं थे। यह लोग सत्ता से जुड़े लाभों को ऐसे बटोरने लगे कि आपस में ही इनके हितों में टकराव आना शुरू हो गया। यही टकराव पत्र बम्बों के रूप में उठना शुरू हुआ। इसका नजला हर किसी पर गिराना शुरू हो कर दिया। इन पत्र बम्बों को लेकर पुलिस तक मामले बनाये गये। कुछ लोगों पर निशाना साधना जारी रहा। लेकिन यह लोग इतने मदान्ध हो गये कि यह भी भूल गये कि वह अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। कुछ मामले तो ऐसे खड़े कर लिये गये जिनकी जांच से शायद मुख्यमंत्री भी नहीं बच पायेंगे।
इस तरह इन लोगों ने एक ऐसा वातावरण खड़ा कर दिया कि यह लोग निरंकुश हो गये। यह इसी निरंकुशता का परिणाम है कि उपचुनावों में चारों सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। अब जिस तर्ज में शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज ने 2017 में पुराने नेतृत्व नेता और नीयत को हटाकर नया नेता लाने की बात की है उससे पार्टी के एक वर्ग में फिर से रोष पनपने की संभावनायें उभरने लग पड़ी हैं। इस परिदृश्य में यह माना जा रहा है कि पार्टी हाईकमान इन ब्यानों और इन से उपजी स्थितियों का संज्ञान लेकर नेतृत्व के प्रश्न पर नये सिरे से विचार करने के लिये बाध्य हो जायेगा। पांच राज्यों के चुनाव के बाद नेतृत्व के सवाल के उभरने की पूरी संभावनायें बन रही हैं। क्योंकि जयराम ठाकुर को इन चुनावों के लिए हाईकमान ने उत्तराखंड भेजा था लेकिन वहां पर उनकी जनसभा में लोगों का होना जब नहीं के बराबर होकर रह गया तो उसे हाईकमान पुनःविचार के लिए बाध्य हो रहा है। अन्यथा यह माना जा रहा है कि जिस तरह से 2017 के नेतृत्व और उसकी नियत पर निशाना साधा गया है उससे पार्टी में धरूवीकरण बढ़ने की संभावना फिर बनना शुरू हो गयी है।

 

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