Saturday, 17 January 2026
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क्या भ्रष्टाचार की फर्जी शिकायत पर आईपीसी की धारा 505(2) के तहत मामला दर्ज हो सकता है

शिमला/शैल। प्रदेश सरकार के पर्यावरण विभाग में कार्यरत अतिरिक्त निदेशक प्रवीण गुप्ता ने शिमला के थाना सदर में एक एफआईआर 20 जुलाई को दर्ज करवाई है। गुप्ता ने पुलिस को दी शिकायत में कहा है कि बद्दी - बरोटीवाला - नालागढ़ फार्मा एण्ड ड्रग ऐसोसियेशन की ओर से सोशल मीडिया में एक जाली और मनघडंत पत्र वायरल हो रहा है। गुप्ता ने दावा किया है कि उक्त ऐसोसियेशन की ओर से ऐसा कोई पत्र जारी नहीं किया है क्योंकि उन्होंने इस बारे में इन्कार किया है। प्रवीण गुप्ता ने आरोप लगाया है कि इस पत्र में उनके और उनके परिवार के सदस्यों को घटिया झूठे और आधारहीन आरोप लगाकर उन्हें परिवार सहित बदनाम करने का प्रयास किया गया है। पुलिस ने गुप्ता की इस शिकायत पर आई पीसी की धाराओं 505(2) 500 और 504 में एफआईआर दर्ज करके इस मामले की छानबीन एसएचओ संदीप चौधरी को सौंपी है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक शिकायत का आधार बने पत्र में भ्रष्टाचार और सरकार के संरक्षण तथा कई अन्य आरोप भी हैं।
प्रवीण गुप्ता इस समय पर्यावरण विभाग में अतिरिक्त निदेशक प्रदुषण नियन्त्रण बोर्ड में अधीक्षण अभियन्ता और पर्यावरण इम्पैक्ट असैसमैन्ट अप्रेज़ल विशेषज्ञ कमेटी के सदस्य सचिव की भी जिम्मेदारी निभा रहे हैं अभी पिछले दिनों प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड में मुख्य अभियन्ताओं के भी दो पद सृजित किये गये हैं। माना जा रहा है कि शीघ्र ही बोर्ड में इस पद पर भी उनकी पदोन्नति हो जायेगी। स्मरणीय है कि जब 2016 में Preservation of Kasauli and its Environs ने एनजीटी में एक याचिका दायर की थी उसमें जब प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के अधिकारी पेश हुए थे तो उनकी भूमिका पर एनजीटी ने बड़ी कड़ी टिप्पणी की थी। उनजीटी के समक्ष पेश हुए अधिकारियों में यह प्रवीण गुप्ता भी शामिल थे। एनजीटी की टिप्पणीयों पर आज तक किसी भी सरकार ने किसी भी अधिकारी के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की है।
अब जब प्रवीण गुप्ता ने थाना सदर में एफआईआर दर्ज करवायी है और उस पर पुलिस ने जो धाराएं लगाई है उससे अनचाहे ही एक नयी चर्चा छिड़ गयी है। कानून के जानकारों के मुताबिक आईपीसी की जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है वह शायद इसमें बनती ही नहीं है। क्योंकि यह मामला धारा 505 (2), 500 और 504 के तहत दर्ज किया गया है। इसमें धारा 500 और 504 दोनो संज्ञेय नही है। यह शैडयूल के मुताबिक Non Cognizable धाराएं हैं। इनमें Defamation का मामला सीधा अदालत में दायर होता है। धारा 505(2) उन मामलों में आकर्षित होती है जहां पर किसी लिखित, प्रकाशित या मौखिक ब्यान-कथन से दो वर्गों/समुदायों के बीच शत्रुता आदि बढ़ने की संभावना हो वहां यह धारा आकर्षित होती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या प्रवीण गुप्ता पर लगाये आरोपों से दो समुदायों के बीच विभिन्न वर्गों के बीच घृणा, शत्रुता या दुर्भावना पैदा हो सकती है। यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ बेबुनियाद और फर्जी शिकायत में भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये हो तो क्या उससे सामाजिक सदभाव बिगड़ने की आशंका हो सकती है?
यदि पुलिस को प्रवीण गुप्ता की शिकायत पर सामाजिक सदभाव बिगड़ने की संभावना नज़र आयी है तो उससे तो यह स्वतः ही प्रमाणित हो जाता है कि गुप्ता एक प्रभावशाली व्यक्ति है। तब इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ कोई भी सीधे सामने आकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का साहस कैसे करेगा? क्या तब कोई गुमनाम या फर्जी शिकायत कर्ता होने का ही रास्ता नहीं लेगा? पुलिस द्वारा इसमें यह एक धारा 505(2) लगाये जाने से सारे मामले की गंभीरता ही बदल जाती है। पुलिस इस मामले की जांच कैसे आगे बढ़ाती है और अदालत क्या संज्ञान लेती है यह देखना रोचक होगा। वैसे गुप्ता द्वारा दी गयी शिकायत में यह खुलासा नहीं किया गया है कि यह फर्जी पत्र उनके पास या इस ऐसोसियेशन के पास किस माध्यम से आया है। कानून के जानकारों के मुताबिक इस शिकायत की जांच और उसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे तथा कईयों पर इसके छीटें पड़ेंगे क्योंकि अब यह मामला सार्वजनिक विषय बन गया है।
यह है दर्ज हुई एफआईआर

1:- Case FIR No. 143/21 Dated 20.07.2021 u/s 505(2),500,504 IPC has been registered at PS Sadar on the complaint of Sh. Parveen Gupta Additional Director, Department of Environment, Science and Technology, Paryavaran Bhawan, Near US Club, Shimla that one forged, fabricated letter has been circulated on behalf of the Baddi Barotiwala Nalagarh Parma and Drug association whereby certain derogatory, false, baseless and wild allegations have been leveled against him and his family. This letter has not been issued by and on behalf of the Baddi Barotiwala Nalagarh Parma and Drug association as denied by them. This letter has been issued by some vested interest persons, tarnishing him and his family image. Insp/ SHO Sandeep Choudhary PS Sadar is investigating the case

यह हैं आईपीसी की धाराएं

 

Section 505. Statements conducing to public mischief.
1[505. Statements conducing to public mischief.-- 2[(1)] Whoever makes, publishes or circulates any statement, rumour or report,
(a) with intent to cause, or which is likely to cause, any officer, soldier, 3 [sailor or airman] in the Army, 4 [Navy or Air Force] 5 [of India] to mutiny or otherwise disregard or fail in his duty as such; or
(b) with intent to cause, or which is likely to cause, fear or alarm to the public, or to any section of the public whereby any person may be induced to commit an offence against the State or against the public tranquility; or
(c) with intent to incite, or which is likely to incite, any class or community of persons to commit any offence against any other class or community,
shall be punished with imprisonment which may extend to 6[three years], or with fine, or with both.
7[(2) Statements creating or promoting enmity, hatred or ill-will between classes. Whoever makes, publishes or circulates any statement or report containing rumour or alarming news with intent to create or promote, or which is likely to create or promote, on grounds of religion, race, place of birth, residence, language, caste or community or any other ground whatsoever, feelings of enmity, hatred or illwill between different religious, racial, language or regional groups or castes or communities, shall be punished with imprisonment which may extend to three years, or with fine, or with both.
(3) Offence under sub-section (2) committed in place of worship, etc.Whoever commits an offence specified in sub- section (2) in any place of worship or in any assembly engaged in the performance of religious worship or religious ceremonies, shall be punished with imprisonment which may extend to five years and shall also be liable to fine.]
Exception.It does not amount to an offence, within the meaning of this section, when the person making, publishing or circulating any such statement, rumour or report, has reasonable grounds for believing that such statement, rumour or report is true and makes, publishes or circulates it 2 [in good faith and] without any such intent as aforesaid.]


भाजपा के लिये आसान नही होगा उपचुनावों के लिये उम्मीदवारों का चयन करना गोविन्द के तेवरों से उठी चर्चा

शिमला/शैल। प्रदेश में चार उपचुनाव होने जा रहे हैं जिनमें तीन विधानसभा के लिये और एक लोकसभा के लिये। विधानसभा के तीन रिक्त स्थानों में 2017 में दो कांग्रेस के पास और एक भाजपा के पास रहा है। लोकसभा की चारों सीटें 2014 में भी और 2019 में भी भाजपा के पास ही रही है। बल्कि जीत का अन्तर 2019 में 2014 के मुकाबले कही ज्यादा रहा है। 2014 के बाद हुए सभी चुनाव कांग्रेस हार गयी है। केवल इस बार चार नगर निगमों के लिये हुए चुनावों में कांग्रेस सोलन और पालमपुर की नगर निगम में जीत कर इस पर ब्रेक लगाने में सफल हुई है। इस वस्तुस्थिति में आज दोनों पार्टीयां कांग्रेस और भाजपा की साख दांव पर लगी हुई है। भाजपा और जयराम सरकार के लिये यह आवश्यक होगा कि वह चारों सीटों पर जीत दर्ज करे। यदि जयराम के नेतृत्व में भाजपा ऐसा कर पाती है तभी जयराम का कब्जा नेतृत्व पर बना रहेगा। अन्यथा उस पर सवाल लगने शुरू हो जायेंगे। इन उपचुनावों में शायद प्रधानमन्त्री और गृह मन्त्री अमितशाह चुनाव प्रचार के लिये न आ पायें। इसलिये यह उपचुनाव पूरी तरह प्रदेश नेतृत्व की ही परीक्षा माने जायेंगे।
इन चुनावों में टिकटों का बंटवारा भी एक बड़ा सवाल होगा। क्योंकि चारों स्थानों के लिये कई कई प्रत्याक्षी दावेदारी जताने पर आ गये हैं। विधानसभा के लिये फतेहपुर जुब्बल कोटखाई और अर्की तीनों ही स्थानों पर पार्टी में बगावत के स्वर सामने आने लग पड़े है। फतेहपुर में राजन सुशांत लम्बे अरसे से ओल्ड पैन्शन स्कीम के मुद्दे पर कर्मचारीयों का समर्थन जुटाने के लिये धरने पर हैं। राजन सुशांत को मनाने के लिये पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती का उनसे मिलना चर्चा में आ चुका है और इसी से वहां पर पार्टी के कार्यकर्ताओं में और रोष पनप गया है। अर्की में 2017 में वहां से दो बार विधायक रह चुके गोविन्द राम शर्मा का टिकट काट कर रतन पाल को उम्मीदवार बनाया गया था। वह वीरभद्र सिंह से चुनाव हार गये थे। लेकिन हारने के बाद भी उनकी सरकार और संगठन में ताजपोशी कर दी गयी। जबकि गोविन्द राम शर्मा के साथ उस समय किये गये वायदे आज तक वफा नही हुये हैं। इस बेवफाई पर गोविन्द और उनके समर्थकों का नाराज होना स्वभाविक है। अब जब अर्की में उपचुनाव आ खड़ा हुआ है तब गोविन्द और उनके समर्थकों को अपनी नाराज़गी जाहिर करने का मौका मिल गया। दाड़लाघाट में अपने समर्थकों के साथ एक बैठक करके गोविन्द ने इस नाराज़गी को उजागर भी कर दिया है। इस नाराजगी के बाहर आते ही प्रभारी को अर्की पहुंचना पड़ा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार गोविन्द राम शर्मा से किये गये वायदे कितने सिरे चढ़ते हैं।
जुब्बल कोटखाई में जो रार एक समय स्व.बरागटा और शहरी विकास मन्त्री सुरेश भारद्वाज के बीच रही है वह शायद अब भी पूरी तरह खत्म नही हुई है। सुरेश भारद्वाज को जब इस उप चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी तब यह पुराने प्रंसग एक बार फिर सामने आ चुके हैं। इसी स्थिति को जानकर आज मुख्यमन्त्री को यहां पर चुनावों से पहले दो एसडीएम कार्यालय खोलने की घोषणा करनी पड़ी है। चुनावों के लिये किये गये वायदे कितने पूरे होते हैं यह सभी जानते हैं। इसी तरह मण्डी लोकसभा के लिये तो स्थिति और भी रोचक होगी। इस चुनाव की जिम्मेदारी संभाले जल शक्ति मन्त्री महेन्द्र सिंह के ब्यानों से पैदा हुए विवादों को राजनीतिक विश्लेषक एक सोची समझी चाल मान रहे हैं। फिर यहां पर स्व. रामस्वरूप शर्मा की आत्महत्या का मामला अभी तक सुलझा नहीं है। दिल्ली पुलिस की अब तक की जांच के बाद राम स्वरूप शर्मा के बेटे ने भी इसे आत्महत्या का मामला मानने की बजाये इस हत्या का मामला मानकर जांच करने की मांग कर दी है। वह इस संद्धर्भ में केन्द्रिय मन्त्री नितिन गडकरी से भी इस आश्य की गुहार लगा चुका हैं। रामस्वरूप के बेटे के इस ब्यान का कोई खण्डन नही कर पाया है। यह सवाल इस चुनाव में अहम मुद्दा बन सकता है। इस परिदृश्य में मण्डी लोकसभा के लिये उम्मीदवार का चयन करना आसान नही होगा।

 

क्या प्रदेश में महिला मुख्यमन्त्री लाने के प्रयास हो रहे हैं

शिमला/शैल। इस समय भाजपा शासित किसी भी राज्य में महिला मुख्यमन्त्री नहीं है। केन्द्रिय मन्त्रीमण्डल के फेरबदल मे इस बार महिलाओं को अधिमान दिया गया है। लेकिन कोई भी महिला मुख्यमन्त्री न होना भाजपा हाई कमान में सूत्रों के मुताबिक चिन्ता और चिन्तन का विषय बना हुआ है। प्रदेश भाजपा कोर कमेटी की जब शिमला और धर्मशाला में मन्थन बैठक हुई थी और उसमें सरकार तथा संगठन के काम काज का आकलन हुआ था। तब उसी दौरान दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा तथा प्रदेश से राज्य सभा सांसद महिला मोर्चा की राष्ट्रीय महामन्त्री इन्दु गोस्वामी में भी एक बैठक हुई थी। प्रदेश कोर कमेटी की बैठक के बाद तैयार हुई रिपोर्ट कार्ड में बड़े पैमाने पर नान परफारमैन्स का जिक्र हुआ है यह बाहर आ चुका है। इसी के साथ जलशक्ति मन्त्री महेन्द्र सिंह के कुछ ब्यानों ने भी विवाद की स्थिति पैदा कर दी है। सरकार की वर्किंग को लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गये हैं। प्रदेश के 47 कॉलिजों में नियमित प्रिंसिपल नहीं है। एचपीएमसी के परवाणु प्लांट से 60 लाख के जूस के गायब पाये जाने पर अभी कोई कारवाई सामने नहीं आयी है। परिवहन निगम द्वारा दो सौ बसें खरीदने का प्रयास किया जाना जबकि फील्ड से इस तरह की कोई मांग न आयी हो। बल्कि पहले से खरीदी हुई कई बसें अभी तक ऑपरेशन में ही नहीं आ पायी हैं। निगम में ड्राईवरों और परिचालकों के कई पर रिक्त हैं। सेवनिवृत कर्मीयों को पैन्शन आदि का नियमित भुगतान न हो पाने पर यही कर्मी पत्रकार वार्ताओं के माध्यम से अपनी समस्या सरकार और निगम प्रबन्धन के सामने रख चुके हैं। ऐसे हालात में भी नयी बसें खरीदने की कवायद करना सरकार की नियत और नीति पर सवाल उठायेगा ही। ऐसी वस्तुस्थिति जब हाई कमान के संज्ञान में आयेगी तो निश्चित रूप से इसका कड़ा संज्ञान लिया ही जायेगा।
सूत्रों की माने तो हाई कमान के सामने यह सारे मुद्दे आ चुके हैं। कोर कमेटी की बैठक के बाद जब प्रवक्ता ने नेतृत्व के प्रश्न पर जवाब दिया था उस जवाब पर भी शायद बीएल सन्तोष ने अप्रसन्नता व्यक्त की थी। प्रदेश की इन परिस्थितियों के परिदृश्य में अब जब मुख्यमन्त्री दिल्ली गये थे तब यह चर्चा फैल गयी थी कि शायद हाई कमान प्रदेश में महिला मुख्यमन्त्री लाने का प्रयोग करने जा रहा है। इस प्रयोग में इन्दु गोस्वामी का नाम सामने आया था। कांगड़ा में तो यह चर्चा बहुत जोरों पर थी बल्कि सचिवालय तक भी आ पहुंची थी। सूत्रों के मुताबिक इन्दु गोस्वामी के संज्ञान में भी यह सब रहा है और उन्होंने ऐसी चर्चाओं का कोई खण्डन भी नहीं किया है। माना जा रहा है कि भाजपा हाईकमान महिला मुख्यमन्त्री लाने का गंभीरता से विचार कर रहा है। यह प्रयोग हिमाचल में किया जाता है या किसी अन्य प्रदेश में इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं। ऐसे में यदि मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर अपनी टीम में नॉन परफार्मरज़ के खिलाफ कोई कदम नही उठा पाते हैं तो आने वाले दिनों में कुछ कठिनाईयां बढ़ना तय है। वैसे इस नॉन परफार्मिंग का पता इन आने वाले उपचुनावों में लग जायेगा।

अपनी ही शर्तों पर राज किया है राजा ने

कुछ संस्मरण
वीरभद्र सिंह प्रदेश की राजनीति का वह अध्याय रहे हैं जिसे पढ़े बिना प्रदेश का कोई भी आकलन संभव नहीं होगा। क्योंकि जिस व्यक्ति को 1962 में स्व. पंडित जवाहर लाल नेहरू लाये हों और 2021 तक लगातार सक्रिय राजनीति में रहा हो तथा इसी बीच केन्द्र में मन्त्री होने के अतिरिक्त छः बार मुख्यमन्त्री बना हो वह स्वतः ही अपने में एक पूरी किताब बन जाता है। राजनीति में इतना लम्बा सफर और वह भी एक ही पार्टी में रहकर जिसने तय किया हो उसे शब्दों में आंकना संभव नहीं होगा। इतने लम्बे सफर में स्वभाविक है कि सैंकड़ों उनके संपर्क में आये होंगे और हरेक के पास कहने -सुनाने के लिये अलग -अलग कथा होगी। इसीलिये तो प्रदेश के हर कोने में हर आंख उनके लिये नम है।
वीरभद्र सिंह वह राजनेता रहे हैं जिन्होंने अपनी ही शर्तो पर राजनीति की है। कोई व्यक्ति ऐसा तब कर पाता है जब उसने अपने लिये अपनी ही संहिता उकेर रखी हो। 1962 से 1977 तक वह लगातार सांसद रहे। 1977 के चुनावों से पहले केन्द्र में उपमन्त्री बने। लेकिन 1977 का लोकसभा चुनाव जनता पार्टी की लहर में मण्डी से गंगा सिंह ठाकुर से हार गये। केन्द्र से लेकर राज्यों तक सभी जगह जनता पार्टी की सरकारें बन गयी। 1980 में जनता पार्टी टूट गयी और उसी के साथ जनता पार्टी की सरकारें भी टूट गयीं। लोकसभा के लिये फिर चुनाव हुए और वीरभद्र फिर सांसद बन गये। हिमाचल में लगभग पूरी जनता पार्टी कांग्रेस में शामिल हो गयी और स्व. रामलाल ठाकुर मुख्यमन्त्री बन गये। केन्द्र में हिमाचल से विक्रम महाजन राज्य मन्त्री बन गये। वीरभद्र का चुनाव परिणाम आने से पहले ही विक्रम महाजन मन्त्री बन गये थे। हिमाचल में दलबदल से सरकार बनी थी। वीरभद्र सिंह सहित कांग्रेस जन इसका विरोध कर रहे थे। इस विरोध के लिये एक हस्ताक्षर अभियान चला जो नाहन से प्रैस में लीक हो गया। इस हस्ताक्षर अभियान के असफल होने पर वीरभद्र सिंह ने अकेले ही मोर्चा संभाला। वन माफिया के खिलाफ आवाज़ उठाई और एक लम्बा चौड़ा पत्र इस पर दाग दिया। यह पत्रा जब सार्वजनिक हुआ तो शिमला से लेकर दिल्ली तक हलचल हुई। इसी दौरान केन्द्र में स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा बगावत पर उतर चुके थे। वीरभद्र और बहुगुणा में एक-दो मुलाकाते भी रिपोर्ट हो गयी थी। कांग्रेस में टूटने के आसार बन रहे थे। इसी दौरान प्रदेश युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकताओं का एक प्रतिनिधि मण्डल स्व. इन्दिरा गांधी जी से मिला। इस प्रतिनिधिमण्डल में मेरे साथ महेन्द्र प्रताप राणा, प्रदीप चन्देल और कांगड़ा से सुमन शर्मा शामिल थे। इस प्रतिनिधि मण्डल से प्रदेश का फीडबैक लिया गया। नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति मे नये नेता का नाम मांगा गया जिसमें सबने वीरभद्र का नाम सुझाया और कुछ समय बाद वीरभद्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री बन गये तथा रामलाल ठाकुर को राज्यपाल बनाकर भेज दिया। वीरभद्र सिंह की यह पहली लड़ाई थी जिसमें वह जीते।
इसके बाद 1993 में फिर वीरभद्र सिंह को मुख्यमन्त्री बनने के लिये लड़ना पड़ा। पंडित सुखराम दूसरे दावेदार थे। केन्द्र का समर्थन भी पंडित सुखराम के साथ था। वीरभद्र सिंह को दिल्ली बुलाया गया लेकिन वह अपने समर्थकों के साथ परवाणु से आगे नहीं गये। केन्द्र ने सुशील कुमार शिंदे को पर्यवेक्षक भेजा। विधानसभा परिसर में बैठक रखी गयी। इस बैठक में पंडित सुखराम और उनके समर्थक नहीं आये और चण्डीगढ़ बैठे रहे। यहां पर वीरभद्र समर्थकों ने विधानसभा परिसर का घेराव कर दिया। वीरभद्र सिंह को नेता घोषित करने की मांग उठ गयी। पूरी स्थिति तनावपूर्ण हो गयी थी। शिन्दे ने सी आई डी आफिस से फोन करके दिल्ली को सारी स्थिति से अवगत करवाया और अन्ततः वीरभद्र सिंह को नेता घोषित कर दिया गया। राज्यपाल के यहां अकेले वीरभद्र सिंह की शपथ हुई और इस तरह दूसरी बार मुख्यमन्त्री की लड़ाई जितने में सफल हुए।
जिस भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर वीरभद्र पहली बार मुख्यमन्त्री बने थे उस भ्रष्टाचार के खिलाफ 31 अक्तूबर 1997 को एक रिवार्ड स्कीम अधिसूचित की गयी। इस स्कीम में यह कहा गया कि इसमें आयी हर शिकायत की एक माह के भीतर प्रारम्भिक जांच की जायेगी। इस स्कीम के तहत मैंने ही 21 नवम्बर 1997 को कुछ शिकायतें दायर कर दी जिनमें एक शिकायत राज कुमार राजेन्द्र सिंह जो वीरभद्र के भाई थे उनके खिलाफ थी। इस पर किसी ने जांच का साहस नहीं किया। 1998 में सरकार बदल गयी परन्तु धूमल सरकार ने भी कुछ नहीं किया। अन्ततः मुझे उच्च न्यायालय में जाना पड़ा। इसी दौरान सागर कत्था मामला सामने आया। यह मामला भी शैल में छपा। कुछ समय बाद वीरभद्र सिंह ने मेरे खिलाफ मानहानि का मामला दायर कर दिया। दो वर्ष बाद स्वतः इस मामले को वापिस भी ले लिया। लेकिन यह सब होने के बावजूद एक समय वीरभद्र सिंह ने मुझे अपने आवास होली लॉज बुलाकर कांग्रेस पार्टी का प्रवक्ता बनने का आग्रह किया। इस आग्रह के विक्रमादित्य और कुछ दूसरे लोग गवाह हैं। जिस विषय पर मैंने रिवार्ड स्कीम में शिकायत की थी और प्रदेश उच्च न्यायालय में स्वयं इस मामले की पैरवी की थी उस पर सितम्बर 2018 में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी मेरी बात को स्वीकार किया है। इस फैसले पर जयराम सरकार अमल नहीं कर रही है।
इस प्रसंग से पाठक यह स्वीकारेंगे कि वीरभद्र कितने बड़े थे। वह अपनी गलती को स्वीकारने का साहस रखते थे। वह योग्यता के पारखी थे और उसे अपने साथ रखने का प्रयास करते थे। आज पूरा हिमाचल इसीलिये शोक में है क्योंकि वह लोगों के दिलों पर राज करते थे। वह सही मायनों मे राजा थे। इन्ही यादों के साथ उन्हें शत् शत् नमन।

क्या वीरभद्र की राजनीतिक विरासत को भुना पायेगी कांग्रेस-राठौर और मुकेश के लिये चुनौति

क्या अनिल शर्मा भाजपा और विधायकी से त्यागपत्र देंगे
शिमला/शैल। वीरभद्र प्रदेश भर में कितने लोकप्रिय थे इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी अन्तिम यात्रा में शिमला से रामपुर तक कैसे हजा़रों लोग सड़कों के किनारे खड़े होकर उसमें अपने को शामिल कर रहे थे और शमशान घाट पर भी हज़ारों की उपस्थिति इसका प्रमाण है। यही नहीं प्रदेश के हर कोने में बाज़ार बन्द करके और उनके चित्र पर फूल मालायें चढ़ा कर हज़ारों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। किसी नेता के प्रति जनता की इतनी श्रद्बा और आस्था निश्चित रूप से उस पार्टी के लिये एक बहुत बड़ी विरासत बन जाती है। आज वीरभद्र सिंह अपने जाने के बाद पार्टी के लिये कितना बड़ा आधार छोड़ गये हैं इस अपार भीड़ से उसका प्रमाण मिल जाता है। अब यह पीछे बचे नेताओं की जिम्मेदारी होगी कि वह इस जनाधार को कैसे आगे बढ़ाते हैं और अपने साथ रखते हैं।
आज प्रदेश में चार उपचुनाव होने जा रहे हैं और यह उपचुनाव अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के लिये एक बड़े संकेत की भूमिका अदा करेंगे यह तय है। इस समयबंगाल चुनावों के बाद प्रधानमन्त्री और भाजपा दोनों का ग्राफ लगातार गिर रहा है। यह इन परिणामों के बाद घटी सारी राजनीतिक घटनाओं से प्रमाणित हो जाता है। इसी गिरावट का परिणाम है कि अब संघ प्रमुख डा. मोहन भागवत को यह कहना पड़ा है कि इस देश में रहने वाले सारे हिन्दुओं और मुस्लमानों का डीएनए एक है तथा लिंचिंग करने वाले हिन्दू नही हो सकते। तय है कि इस गिरावट का असर हर प्रदेश पर पड़ेगा और उसमें हिमाचल भी अछूता नहीं रहेगा। वीरभद्र सिंह अपने पीछे किसी एक नेता को पार्टी का नेता नहीं घोषित कर गये हैं। ऐसे में हर नेता अपनी अपनी परफारमैन्स के आधार पर आने वाले समय में अपना स्थान प्राप्त कर लेगा।
इस समय दो विधानसभा क्षेत्रों जुब्बल-कोटखाई और फतेहपुर में उम्मीदवारों के चयन में कोई बड़ी बाधा नहीं आयेगी। क्योंकि जुब्बल -कोटखाई में रोहित ठाकुर की उम्मीदवारी को कोई चुनौती नहीं हो सकती। 2017 के चुनावों में भी यदि प्रेम कुमार धूमल को नेता घोषित न किया जाता और यह संदेश न जाता कि नरेन्द्र बरागटा मन्त्री बनेंगे तो शायद उस समय भी परिणाम कुछ और होते। फतेहपुर में पठानिया के बेटे के बाद दूसरे दावेदार इतने बड़े आधार वाले नहीं हैं। बल्कि वहां पर भाजपा और कांग्रेस दोनों में बराबर की कलह है और उसे प्रायोजित भी कहा जा रहा है। क्योंकि धर्मशाला बैठक के बाद जिस तरह से बड़े नेताओं ने बाली और सुधीर खेमों का संकेत दिया है उससे फतेहपुर का झगड़ा स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है। इन विधानसभा क्षेत्रों के बाद बड़ा सवाल मण्डी लोकसभा क्षेत्र का रह जाता है। यहां वीरभद्र परिवार, पंडित सुखराम परिवार और ठाकुर कौल सिंह का ही प्रभाव है। इस समय वीरभद्र सिंह के निधन के बाद अर्की विधानसभा भी खाली हो गयी है। यहां से यदि प्रतिभा सिंह चुनाव लड़ने का फैसला लेती है तो विश्लेषकों की राय में यह उनके लिये लाभदायक होगा। क्योंकि अगले वर्ष ही विधानसभा के चुनाव होने हैं और कांग्रेस की सरकार होने पर उनका मन्त्री बनना निश्चित हो जाता है जबकि लोकसभा मे जाकर इसकी संभावना नहीं रहती है। वीरभद्र के निधन से उपजी सहानुभूति को दोंनो जगह बराबर लाभ मिलेगा और इससे दोनों जगह जीत की संभावना बन जायेगी।
मण्डी में पिछली बार पंडित सुखराम के पौत्र आश्रय शर्मा को कांगेस ने उम्मीदवार बनाया था। लेकिन उस समय आश्रय के पिता अनिल शर्मा जयराम सरकार में ऊर्जा मन्त्री थे। तब वह न बेटे के लिये खुलकर काम कर पाये और न ही भाजपा के लिये। अनिल शर्मा आज भी भाजपा के विधायक हैं और यदि इस बार भी आश्रय कांग्रेस के उम्मीदवार होते हैं तो फिर वही दुविधा रहेगी। मण्डी नगर निगम के चुनावों मे भी यही दुविधा थी। ऐसे में यदि आश्रय को कांग्रेस फिर से उम्मीदवार बनाती है तो यह आवश्यक हो जायेगा कि अनिल शर्मा भाजपा और विधायकी दोनों से इन उपचुनावों से पहले त्यागपत्र दें या फिर आश्रय को उम्मीदवार न बनाया जाये। इनके बाद ठाकुर कौल सिंह का नाम आता है। यदि इस बार कौल सिंह ईमानदारी से यह चुनाव लड़ लेते हैं तो आने वाले समय में वह बड़े पद के भी दावेदार हो जाते हैं इस बार मण्डी उपचुनाव के लिये भाजपा को भी उम्मीदवार तय करना आसान नहीं होगा। क्योंकि इन दिनों जिस तरह से स्व. रामस्वरूप शर्मा के बेटे ने रामस्वरूप की हत्या होने की आशंका जताई है और पुलिस जांच पर सवाल उठाये हैं तथा केन्द्रिय मन्त्री नितिन गड़करी से मुलाकात की है उससे तय है कि इस उपचुनाव में यह मुद्दा उछलेगा और सरकार को जवाब देना कठिन हो जायेगा। फिर जल शक्ति मन्त्री महेन्द्र सिंह पहले ही अपने ब्यानों से विवादित हो चुके हैं। ऐसे में यदि इन उपचुनावों को कांग्रेस ‘‘वीरभद्र के हकदार’’ के सवाल पीछे रखकर चुनाव लड़ती है तो वर्तमान परिस्थितियों में उसकी जीत सुनिश्चित मानी जा रही है। इस परिदृश्य में यह उपचुनाव कांग्रेस के प्रभारीयों और प्रदेश के बड़े नेताओं के लिये एक कसौटी होंगे।

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