वन विभाग के पत्र से उठी चर्चा
वन मन्त्री की अनुशंसा के बाद भी कारवाई न होना सवालों में
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के भूसुधार अधिनियम 1972 के अनुसार प्रदेश में कोई भी गैर कृषक सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ज़मीन नहीं खरीद सकता है। अनुमति के लिये इस अधिनियम की धारा 118 के तहत प्रावधान किया गया है। धारा 118 की उपधारा 2 (एच) के अनुसार ज़मीन खरीद की अनुमति लेने वाला कोई भी गैर कृषक इस अनुमति पर कृषक नहीं बन जाता है। जब व्यक्ति कृषक नहीं होगा तो उसे टीडी का अधिकार भी हासिल नहीं होगा यह एक स्थापित नियम है। लेकिन जब इस स्थापित नियम की अवहेलना सरकार के बड़े नौकरशाह करने लग जाये और वन विभाग तथा वन मन्त्री की स्पष्ट अनुशंसा के बाद भी सरकार ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कोई कारवाई करने को तैयार न हो तो यही सवाल सरकार से पूछना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देना सरकार की नीयत और नीति कब से हो गया है।
स्मरणीय है कि वर्ष 2001 में प्रदेश सरकार में अतिरिक्त मुख्य सचिव रह चुके दो अधिकारियों अभय शुक्ला और दीपक सानन ने मशोबरा के मूल कोटी में धारा 118 के तहत सरकार से अनुमति लेकर ज़मीन खरीदी। इसके बाद 2004 में दोनो ने टीडी के तहत भवन निर्माण के लिये लकड़ी लेने के लिये सरकार मेें आवेदन कर दिया। इस आवेदन को छानबीन के लिये राजस्व विभाग को भेज दिया गया। राजस्व विभाग ने हलका पटवारी से लेकर ऊपर तक कहीं भी यह नहीं कहा कि धारा 118 के तहत अनुमति लेने के बाद भी यह लोग गैर कृषक ही रहते हैं और इसलिये टीडी के पात्र नहीं बन जाते। जब राजस्व विभाग ने ही अपनी रिपोर्ट में यह उल्लेख नहीं किया और रिपोर्ट वन विभाग को भेज दी। वन विभाग ने भी राजस्व रिपोर्ट के आधार पर टीडी की अनुमति दे दी। अनुमति मिलने के बाद देवदार के पेड़ काट लिये गये। निर्माण होने के बाद शायद पर्यटन विभाग ने यहां पर होम स्टे आप्रेट करने की अनुमति भी प्रदान कर दी। ऐसा होने के बाद स्थानीय स्तर पर चर्चाएं उठीं और टीडी दिये जाने पर भी सवाल खड़े हुए। शैल ने उस समय भी यह मामला अपने पाठकों के सामने रखा था। वन विभाग ने इस पर जांच करवाकर स्पष्ट कहा है कि राजस्व विभाग ने अपनी रिपोर्ट में सही तथ्य नहीं रखे थे। अब विभाग ने यह माना है कि यह अधिकारी 118 की अनुमति के बाद भी गैर कृषक ही रहते हैं और इस नाते टीडी के पात्र नहीं बन जाते।
वन विभाग की रिपोर्ट जून में सरकार के पास आ गयी थी। वन मन्त्री ने इस रिपोर्ट के बाद इस संबंध में धारा 420 के तहत मामला दर्ज करके कारवाई करने की अनुशंसा की है। लेकिन जून से लेकर अब फरवरी तक इसमें अगली कारवाई नहीं हो पायी है। शायद फाईल वनमन्त्री की अनुशंसा के बाद भी मुख्यमन्त्री के कार्यालय से अभी तक बाहर नहीं आ पायी है। क्या मुख्यमन्त्री कार्यालय के अधिकारियों की कृपा से यह फाईल दबी पड़ी है या मुख्यमन्त्री ही नहीं चाहते कि दोषीयों के खिलाफ कोई कारवाई हो यह सवाल अभी संशय ही बना हुआ है। वैसे धारा 118 के तहत जमीन खरीद के मामलों में इस समय कार्यरत दो अधिकारियों प्रबोध सक्सेना और देवेश कुमार को मिली अनुमति पर भी एक समय सवाल उठ चुके हैं। धूमल शासन में विधानसभा में आये एक प्रश्न के उत्तर में सदन में रखी गयी सूची में इन अधिकारियों का नाम भी प्रमुखता से आया है। लेकिन कारवाई कोई नहीं हुई है। मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव के खिलाफ विशेष जज वन द्वारा आदेशित जांच पर उच्च न्यायालय का स्टे आ चुका है लेकिन इस स्टे से हटकर भी मुख्यमन्त्री से यह अपेक्षा थी कि वह इस संबंध में अपने स्तर पर कोई निर्देश देते क्योंकि सरकार की निष्पक्षता इसमें कसौटी पर है।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने चम्बा, सिरमौर और ऊना के विधायकों से उनकी वित्त वर्ष 2021-22 के लिये विधायक प्राथमिकता पर चर्चा करते हुए यह खुलासा किया कि अगले वित्तिय वर्ष के लिये राज्य की वार्षिक योजना 9405.41 करोड़ की रहेगी। पिछले 2020-21 में यह योजना 7900 करोड़ की थी। सामान्यतः वार्षिक योजनाओं में प्रतिवर्ष दस प्रतिशत की वृद्धि रहती है लेकिन इस वर्ष यह वृद्धि करीब 20% है। इस वृद्धि से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या अब भविष्य में यह वृद्धि प्रतिवर्ष इसी अनुपात में रहेगी या कोरोना के कारण इसी वर्ष के लिये यह हुआ है। वैसे इसकी वास्तविक तस्वीर पूरा बजट आने पर साफ होगी। मुख्यमन्त्री ने विधायकों से चर्चा के दौरान विधायक प्राथमिकताओं को लेकर कुछ आंकड़े भी सामने रखे हैं। उन्होंने बताया कि विधायक प्राथमिकताओं के लिये वर्ष 2020-21 में 926.24 करोड़ की 251 परियोजनाएं स्वीकृत की गयी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्व सरकार के पहले तीन वर्षों में वार्षिक योजना का आकार 13,300 करोड़ रहा है जबकि उनकी सरकार के पहले तीन वर्षो में यह आकार 21,300 करोड़ हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्व सरकार के कार्यकाल के दौरान 2033 करोड़ की विधायक प्राथमिकता योजनाएं स्वीकृत की गई और इस सरकार के तीन वर्षों में 2382 करोड़ की योजनाएं स्वीकृत हुई। इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिये पूर्व सरकार ने 1276 करोड़ और इस सरकार ने 2221 करोड़ का प्रावधान किया है।
वर्ष 2020 -21 के लिये वार्षिक योजना 7900 करोड़ की थी। मुख्यमन्त्री ने अपने बजट भाषण में विधायक प्राथमिकताओं की प्रति विधानक्षेत्र 120 करोड़ की सीमा रखी थी। इसके अनुसार हर विधायक हर वर्ष 120 की योजनाएं अपनी प्राथमिकता के अनुसार दे सकता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र विकास निधि 1.75 करोड़ और विवेक अनुदान निधि दस लाख रखी गयी थी। इस तरह एक विधायक को एक वर्ष में मिलने वाली इन राशियों का यदि गणित लगाया जाये तो यह राशी 8285 करोड़ बनती है। इसलिये यह सवाल हमने उठाया था कि जब वार्षिक योजना ही 7900 करोड़ की है तो उसमें से विधायकों को ही 8285 कहां से दिये जा सकते हैं। अब मुख्यमन्त्री ने जो आंकड़े सामने रखे हैं उनके मुताबिक तीन वर्षों में केवल 2382 करोड़ की ही विधायक प्राथमिकता योजनाएं तीन वर्षों में स्वीकृत हुई हैं। जो प्रति वर्ष 794 करोड़ और प्रति विधायक करीब 12 करोड़ बैठती है। कार्यान्वयन के लिये किया गया प्रावधान स्वीकृति से भी कम है और वह प्रति दस करोड़ से भी कम बैठता है। इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि मुख्यमन्त्री की बजट घोषणाओं और उन्हीं के द्वारा विधायकों के सामने रखे गये आंकड़ों में कहीं कोई तालमेल नहीं बैठता है।
मुख्यमन्त्री की घोषणाओं और इन आंकड़ों के परिदृश्य में विधायकों को लेकर भी यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारे विधायक इन घोषणाओं के अनुसार अपनी योजनाएं ही सरकार को नहीं दे पाते हैं या फिर वह मुख्यमन्त्री की घोषणाओं को गंभीरता से लेते ही नहीं है। जब घोषणाओं और उनके व्यवहारिक पक्ष में कोई तालमेल ही नहीं है। तब यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या यह घोषणाएं केवल जनता में तालीयां बरोटने के लिये ही की जाती है। क्या इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विधायकों से इस बारे में सवाल नहीं पूछे जाने चाहिये। इस समय प्रदेश लगातार कर्ज के दल दल में धंसता जा रहा है। सीएजी के मुताबिक सरकार जो कर्ज उठा रही है उसका 72% से अधिक तो लिये हुए मूल कर्ज की किश्तें चुकाने में और शेष उसका ब्याज अदा करने में निकल जाता है। जिस विकास के नाम पर कर्ज लिया जाता है उसमें निवेश करने के लिये कोई पैसा बचता ही नहीं है। सीएजी की रिपोर्ट बाकायदा सदन के पटल पर रखी जाती है और उस पर कभी सदन में चर्चा नहीं उठायी जाती है। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि आज जो प्रदेश की वित्तय स्थिति गंभीर हो चुकी है उसके लिये सरकार और विपक्ष दोनों बराबर के दोषी हैं।