Saturday, 17 January 2026
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सरकार के लिये घातक होगा विधायकों का निलंबन और एफआईआर दर्ज करना

शिमला/शैल। प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन राज्यपाल के अभिभाषण पर उभरे विवाद के परिणाम स्वरूप नेता प्रतिपक्ष सहित कांग्रेस के पांच विधायकों को सदन की शेष अवधि के लिये निलंबित करने के साथ ही उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर दी गयी है। इस कारवाई के बाद स्वभाविक है कि कांग्रेस सदन में हर दिन मुद्दा उठायेगी और हर दिन सदन से वाकआऊट करेगी। यह निलम्बन कितने दिन चलता है और सरकार कितने दिन विपक्ष के बिना ही काम चलाती है। यह देखना रोचक होगा और इसका पता आने वाले दिनों में ही चलेगा। विधायकों के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर पर पुलिस कब और क्या जांच करती है और कांग्रेस की मांग पर उपाध्यक्ष के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज होती है या नहीं यह देखना भी दिलचस्प होगा। क्योंकि जिस हाथापाई को एफआईआर का आधार बनाया गया है उसके जो विडियो सामने आये हैं उनके अनुसार सत्तापक्ष भी इसके लिये उतना ही जिम्मेदार है जितना विपक्ष है।
राज्यपाल हर वर्ष सत्र के पहले दिन सदन को संबोधित करते हैं। इस संबोधन का भाषण सरकार द्वारा तैयार किया जाता है और इसमें सरकार की वर्ष भर की कारगुजारी दर्ज रहती है। भाषण के बाद इस पर चर्चा होती है और इसके लिये सरकार भाषण देने के लिये राज्यपाल के धन्यवाद का प्रस्ताव लाती है। राज्यपाल यह अभिभाषण पूरा पढ़ें या नहीं इसके लिये कोई तय नियम नही हैं। लेकिन पूर्व में जो प्रथा रही है उसके अनुसार पूरा भाषण पढ़ा जाता रहा है। प्रदेश के इसी सदन को जब कल्याण सिंह ने संबोधित किया था तब वह स्वास्थ्य कारणों से पूरा भाषण नहीं पढ़ पाये थे और इसके लिये उन्होंने सदन से एक प्रकार से अनुमति लेकर पूरा भाषण पढ़ने में असमर्थता जताई थी और शेष दस्तावेज को पढ़ा हुआ समझा जाये। इस बार शायद ऐसा नहीं हुआ और पूरा भाषण पढ़ने की मांग की। जब यह मांग नहीं मानी गयी तब कांग्रेस ने इसे झूठ का पुलिन्दा कहा और आरोप लगाया कि इसमें पैट्रोल और गैस की बढ़ती कीमतों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों का जिक्र तक नहीं है। इस समय बहुत सारे राज्यों में राज्यपालों की भूमिका को लेकर सवाल उठने शुरू हो गये हैं और संयोगवश ऐसा उन राज्यों में हुआ है जहां पर भाजपा सत्ता में नहीं है। महाराष्ट्र में तो राज्यपाल के खिलाफ अदालत में जाने तक की चर्चाएं उठ चुकी हैं। राज्यपाल यदि बिना किसी ठोस कारण के सदन में अपना पूरा भाषण न पढ़े तो क्या उसे सदन को हल्का आंकना करार दिया जाना चाहिये या नहीं। राज्यपाल और सदन के संबंधो और अधिकारों को लेकर सवाल उठने शुरू हुए हैं उससे इन सम्बन्धों पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता आ खड़ी हुइ है।
कांग्रेस विधायकों के निलंबन और उनके खिलाफ हुई एफआईआर को असहमति की आवाज़ दबाने का प्रयास करार दिया जा सकता है। क्योंकि सदन में हर रोज मामला उठेगा, वाकआऊट होगा और सरकार तीखे सवालों से बच जायेगी कुछ लोगों की नज़र में मुख्यमन्त्री का यह कदम राजनीति का मास्टर स्ट्रोक है। यहां तक चर्चाएं उठ चुकी हैं कि सरकार नेता प्रतिपक्ष का पद भी कांग्रेस से वापिस लेना चाहती है। यदि यह चर्चाएं सही हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि सत्तापक्ष नेता प्रतिपक्ष से घबराकर इस तरह का कदम उठा रही है। वैसे ही नेता प्रतिपक्ष का निलंबन और फिर एफआईआर इसी डर के संकेत हैं। इस निलंबन और एफआईआर दर्ज करने से पूरे प्रदेश में कांग्रेस को मुद्दा मिल गया है। आज पूरे देश में भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप ही यह लग रहा है कि असहमति के स्वरों को दबाने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है इसी के साथ भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का आरोप भी सरकार पर लग रहा है। अभी कुछ दिन पहले एक पत्र चर्चा में आया है। इस पत्र में एक अधिकारी पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाये गये हैं इन आरोपों के साथ गंभीर आरोप यह है कि मुख्यमन्त्री कुछ निहित कारणों से इस अधिकारी को संरक्षण दे रहे हैं। यह पत्र प्रधानमन्त्री से लेकर प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्रीयों और नेता प्रतिपक्ष सहित करीब एक दर्जन लोगों को भेजा गया है। संयोगवश इस पत्र के चर्चा में आने के बाद ही धूमल खेमे में गतिविधियां तेज हो गयी है। धूमल स्वयं बहुत सक्रिय हो गये हैं। उनको लेकर अटकलों का एक नया बाजा़र गर्म हो गया है। इसी बीच पूर्व मुख्यमन्त्री एवम् पूर्व केन्द्रिय मन्त्री वरिष्ठ भाजपा नेता शान्ता कुमार की आत्मकथा बाज़ार में आ गयी है। इसमें शान्ता कुमार ने आरोप लगाया है कि जब केन्द्र में मन्त्री थे तब उन्होंने ग्रामीण विकास विभाग में 300 करोड़ का घपला पकड़ा था। जिसे पूरे दस्तावेजी प्रमाणों के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी के सामने रखा था। लेकिन इस पर प्रधानमन्त्री से लेकर संघ तक किसी ने उनका साथ नहीं दिया था। बल्कि मन्त्री पद से हटाकर इसकी सज़ा दी गयी थी।
शान्ता कुमार का यह खुलासा ऐसे वक्त पर सामने आया है जब भाजपा दूसरे दलों के भ्रष्ट नेताओं को अपने घर में शरण दे रही है। शान्ता के इस खुलासे से पूरी भाजपा केन्द्र से लेकर प्रदेशों तक कठघरे में आ जाती है। जयराम की सरकार पर भी भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के कई गंभीर आरोप हैं। ऐसे वक्त में विपक्ष के खिलाफ निलंबन और एफआईआर दर्ज करने की कारवाई कहीं अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारना न बन जाये। क्योंकि विपक्ष को सरकार पर हमला करने के लिये एक कारगर और प्रमाणिक हथियार मिल गया है। जिसे चलाने में विपक्ष पीछे नहीं हटेगा।

क्या भ्रष्टाचार को संरक्षण देना जयराम सरकार की नीयत है या नीति

वन विभाग के पत्र से उठी चर्चा
वन मन्त्री की अनुशंसा के बाद भी कारवाई न होना सवालों में
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के भूसुधार अधिनियम 1972 के अनुसार प्रदेश में कोई भी गैर कृषक सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ज़मीन नहीं खरीद सकता है। अनुमति के लिये इस अधिनियम की धारा 118 के तहत प्रावधान किया गया है। धारा 118 की उपधारा 2 (एच) के अनुसार ज़मीन खरीद की अनुमति लेने वाला कोई भी गैर कृषक इस अनुमति पर कृषक नहीं बन जाता है। जब व्यक्ति कृषक नहीं होगा तो उसे टीडी का अधिकार भी हासिल नहीं होगा यह एक स्थापित नियम है। लेकिन जब इस स्थापित नियम की अवहेलना सरकार के बड़े नौकरशाह करने लग जाये और वन विभाग तथा वन मन्त्री की स्पष्ट अनुशंसा के बाद भी सरकार ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कोई कारवाई करने को तैयार न हो तो यही सवाल सरकार से पूछना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देना सरकार की नीयत और नीति कब से हो गया है।
स्मरणीय है कि वर्ष 2001 में प्रदेश सरकार में अतिरिक्त मुख्य सचिव रह चुके दो अधिकारियों अभय शुक्ला और दीपक सानन ने मशोबरा के मूल कोटी में धारा 118 के तहत सरकार से अनुमति लेकर ज़मीन खरीदी। इसके बाद 2004 में दोनो ने टीडी के तहत भवन निर्माण के लिये लकड़ी लेने के लिये सरकार मेें आवेदन कर दिया। इस आवेदन को छानबीन के लिये राजस्व विभाग को भेज दिया गया। राजस्व विभाग ने हलका पटवारी से लेकर ऊपर तक कहीं भी यह नहीं कहा कि धारा 118 के तहत अनुमति लेने के बाद भी यह लोग गैर कृषक ही रहते हैं और इसलिये टीडी के पात्र नहीं बन जाते। जब राजस्व विभाग ने ही अपनी रिपोर्ट में यह उल्लेख नहीं किया और रिपोर्ट वन विभाग को भेज दी। वन विभाग ने भी राजस्व रिपोर्ट के आधार पर टीडी की अनुमति दे दी। अनुमति मिलने के बाद देवदार के पेड़ काट लिये गये। निर्माण होने के बाद शायद पर्यटन विभाग ने यहां पर होम स्टे आप्रेट करने की अनुमति भी प्रदान कर दी। ऐसा होने के बाद स्थानीय स्तर पर चर्चाएं उठीं और टीडी दिये जाने पर भी सवाल खड़े हुए। शैल ने उस समय भी यह मामला अपने पाठकों के सामने रखा था। वन विभाग ने इस पर जांच करवाकर स्पष्ट कहा है कि राजस्व विभाग ने अपनी रिपोर्ट में सही तथ्य नहीं रखे थे। अब विभाग ने यह माना है कि यह अधिकारी 118 की अनुमति के बाद भी गैर कृषक ही रहते हैं और इस नाते टीडी के पात्र नहीं बन जाते।
वन विभाग की रिपोर्ट जून में सरकार के पास आ गयी थी। वन मन्त्री ने इस रिपोर्ट के बाद इस संबंध में धारा 420 के तहत मामला दर्ज करके कारवाई करने की अनुशंसा की है। लेकिन जून से लेकर अब फरवरी तक इसमें अगली कारवाई नहीं हो पायी है। शायद फाईल वनमन्त्री की अनुशंसा के बाद भी मुख्यमन्त्री के कार्यालय से अभी तक बाहर नहीं आ पायी है। क्या मुख्यमन्त्री कार्यालय के अधिकारियों की कृपा से यह फाईल दबी पड़ी है या मुख्यमन्त्री ही नहीं चाहते कि दोषीयों के खिलाफ कोई कारवाई हो यह सवाल अभी संशय ही बना हुआ है। वैसे धारा 118 के तहत जमीन खरीद के मामलों में इस समय कार्यरत दो अधिकारियों प्रबोध सक्सेना और देवेश कुमार को मिली अनुमति पर भी एक समय सवाल उठ चुके हैं। धूमल शासन में विधानसभा में आये एक प्रश्न के उत्तर में सदन में रखी गयी सूची में इन अधिकारियों का नाम भी प्रमुखता से आया है। लेकिन कारवाई कोई नहीं हुई है। मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव के खिलाफ विशेष जज वन द्वारा आदेशित जांच पर उच्च न्यायालय का स्टे आ चुका है लेकिन इस स्टे से हटकर भी मुख्यमन्त्री से यह अपेक्षा थी कि वह इस संबंध में अपने स्तर पर कोई निर्देश देते क्योंकि सरकार की निष्पक्षता इसमें कसौटी पर है।


जब विधायक प्राथमिकताओं और इस आश्य की घोषणाओं में तालमेल ही नहीं तो फिर उनका औचित्य क्या है

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने चम्बा, सिरमौर और ऊना के विधायकों से उनकी वित्त वर्ष 2021-22 के लिये विधायक प्राथमिकता पर चर्चा करते हुए यह खुलासा किया कि अगले वित्तिय वर्ष के लिये राज्य की वार्षिक योजना 9405.41 करोड़ की रहेगी। पिछले 2020-21 में यह योजना 7900 करोड़ की थी। सामान्यतः वार्षिक योजनाओं में प्रतिवर्ष दस प्रतिशत की वृद्धि रहती है लेकिन इस वर्ष यह वृद्धि करीब 20% है। इस वृद्धि से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या अब भविष्य में यह वृद्धि प्रतिवर्ष इसी अनुपात में रहेगी या कोरोना के कारण इसी वर्ष के लिये यह हुआ है। वैसे इसकी वास्तविक तस्वीर पूरा बजट आने पर साफ होगी। मुख्यमन्त्री ने विधायकों से चर्चा के दौरान विधायक प्राथमिकताओं को लेकर कुछ आंकड़े भी सामने रखे हैं। उन्होंने बताया कि विधायक प्राथमिकताओं के लिये वर्ष 2020-21 में 926.24 करोड़ की 251 परियोजनाएं स्वीकृत की गयी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्व सरकार के पहले तीन वर्षों में वार्षिक योजना का आकार 13,300 करोड़ रहा है जबकि उनकी सरकार के पहले तीन वर्षो में यह आकार 21,300 करोड़ हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्व सरकार के कार्यकाल के दौरान 2033 करोड़ की विधायक प्राथमिकता योजनाएं स्वीकृत की गई और इस सरकार के तीन वर्षों में 2382 करोड़ की योजनाएं स्वीकृत हुई। इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिये पूर्व सरकार ने 1276 करोड़ और इस सरकार ने 2221 करोड़ का प्रावधान किया है।
वर्ष 2020 -21 के लिये वार्षिक योजना 7900 करोड़ की थी। मुख्यमन्त्री ने अपने बजट भाषण में विधायक प्राथमिकताओं की प्रति विधानक्षेत्र 120 करोड़ की सीमा रखी थी। इसके अनुसार हर विधायक हर वर्ष 120 की योजनाएं अपनी प्राथमिकता के अनुसार दे सकता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र विकास निधि 1.75 करोड़ और विवेक अनुदान निधि दस लाख रखी गयी थी। इस तरह एक विधायक को एक वर्ष में मिलने वाली इन राशियों का यदि गणित लगाया जाये तो यह राशी 8285 करोड़ बनती है। इसलिये यह सवाल हमने उठाया था कि जब वार्षिक योजना ही 7900 करोड़ की है तो उसमें से विधायकों को ही 8285 कहां से दिये जा सकते हैं। अब मुख्यमन्त्री ने जो आंकड़े सामने रखे हैं उनके मुताबिक तीन वर्षों में केवल 2382 करोड़ की ही विधायक प्राथमिकता योजनाएं तीन वर्षों में स्वीकृत हुई हैं। जो प्रति वर्ष 794 करोड़ और प्रति विधायक करीब 12 करोड़ बैठती है। कार्यान्वयन के लिये किया गया प्रावधान स्वीकृति से भी कम है और वह प्रति दस करोड़ से भी कम बैठता है। इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि मुख्यमन्त्री की बजट घोषणाओं और उन्हीं के द्वारा विधायकों के सामने रखे गये आंकड़ों में कहीं कोई तालमेल नहीं बैठता है।
मुख्यमन्त्री की घोषणाओं और इन आंकड़ों के परिदृश्य में विधायकों को लेकर भी यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारे विधायक इन घोषणाओं के अनुसार अपनी योजनाएं ही सरकार को नहीं दे पाते हैं या फिर वह मुख्यमन्त्री की घोषणाओं को गंभीरता से लेते ही नहीं है। जब घोषणाओं और उनके व्यवहारिक पक्ष में कोई तालमेल ही नहीं है। तब यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या यह घोषणाएं केवल जनता में तालीयां बरोटने के लिये ही की जाती है। क्या इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विधायकों से इस बारे में सवाल नहीं पूछे जाने चाहिये। इस समय प्रदेश लगातार कर्ज के दल दल में धंसता जा रहा है। सीएजी के मुताबिक सरकार जो कर्ज उठा रही है उसका 72% से अधिक तो लिये हुए मूल कर्ज की किश्तें चुकाने में और शेष उसका ब्याज अदा करने में निकल जाता है। जिस विकास के नाम पर कर्ज लिया जाता है उसमें निवेश करने के लिये कोई पैसा बचता ही नहीं है। सीएजी की रिपोर्ट बाकायदा सदन के पटल पर रखी जाती है और उस पर कभी सदन में चर्चा नहीं उठायी जाती है। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि आज जो प्रदेश की वित्तय स्थिति गंभीर हो चुकी है उसके लिये सरकार और विपक्ष दोनों बराबर के दोषी हैं।

क्या ‘‘आप’’ प्रदेश में अपनी विश्वसनीयता बना पायेगी

शिमला/शैल। आमआदमी पार्टी की हिमाचल ईकाई के कार्यालय का फिर उद्घाटन हुआ है क्योंकि पहले वाला कार्यालय बन्द हो गया था। हिमाचल में आम आदमी पार्टी ने 2014 से अपनी गतिविधियों शुरू की थी। उस समय इसकी बागडोर कांगड़ा के तत्कालीन भाजपा सांसद राजन सुशांत ने संभाली थी और तब प्रदेश के चारों लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था। उसके बाद हुए विधानसभा और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में कोई चुनाव नही लड़ा। यहां तक कि अब हुए स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों मेें भी अधिकारिक तौर पर भाग नही लिया। इस दौरान चार बार प्रदेश ईकाई का नेतृत्व बदला गया। सुशांत पार्टी से बाहर चले गये। महेन्द्र सोफत को भी जाना पड़ा। अब निक्का सिंह पटियाल को भी बदल दिया गया। जिन लोगों ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था और उसके बाद भी पार्टी से जुड़े थे वह लोग अब पार्टी में दिखायी नही दे रहे हैं। पार्टी में बार-बार नेतृत्व क्यों बदला गया और किसी भी चुनाव में भाग क्यों नही लिया गया इसको लेकर प्रदेश की जनता के सामने आज तक कुछ नही आया है।
राजनीतिक दल कोई प्राईवेट संगठन नही होते बल्कि सार्वजनिक संस्था होते हैं। जिसने हर आदमी के लिये काम करना होता है और उससे वोट के रूप में समर्थन लेना होता है। इसी नाते राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर हर आदमी की नजर रहती है। इस परिप्रेक्ष में यदि आम आदमी पार्टी का प्रदेश के संद्धर्भ में आकलन किया जाये तो यह सामने आता है कि इसमें शामिल होने वाले अधिकांश लोगो की निष्ठायें ‘‘आप’’ की बजाये भाजपा के प्रति थी और उन्होने इसका प्रयोग केवल कांग्रेस का विरोध करने के लिये ही किया। भाजपा के प्रति खामोश रहे और अधिकांश तो भाजपा में वापिस भी चले गये। हिमाचल की ज़मीनी हकीकत यह है कि यहां पर किसी भी तीसरे दल को अपना स्थान बनाने के लिये भाजपा और कांग्रेस दोनों का एक साथ ईमानदारी से विरोध करना होगा। इस समय भाजपा सत्ता में है इसलिये पहला विरोध उसका होना चाहिये। लेकिन ‘‘आप’’ के जो भी प्रदेश में कार्यकर्ता या नेता होने का दावा करते हैं यदि उनकी सोशल मीडिया पर आने वाली पोस्टों का अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि आज वह परोक्ष/ अपरोक्ष में कांग्रेस को ही अपना विरोधी मानते हैं। उनके इसी एक तरफा विरोध के कारण ‘‘आप’’ को भाजपा का ही दूसरा चेहरा कहा जाता है।
आज जब नये सिरे से ईकाई का गठन और प्रदेश कार्यालय की स्थापना हुई है तब इस मौके पर भी ‘‘आप ’’ का नेतृत्व बहुत सारे प्रश्नों पर खामोश रहा है। प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ कुछ भी कहने से बचता रहा है। आज स्थानीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के लिये हुए चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन उतना नही रहा है जितने का दावा किया जा रहा है। निर्दलीयों को सत्ता के सहारे प्रभावित करके इन संस्थाओं पर कब्जा किया जा रहा है। इस परिदृश्य में आप का यह दावा करना कि उसके चालीस पार्षद जीत कर आये हैं और फिर उनकी सूची जारी न कर पाना तथा बाद में यह कहना कि यह चालीस लोग उनके संपर्क में हैं यह प्रमाणित करता है कि प्रदेश के कार्यकर्ताओं द्वारा अभी भी केन्द्रिय नेतृत्व के सामने सही स्थिति नही रखी जा रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार अच्छा काम कर रही है इसमें कोई दो राय नही है। लेकिन सरकार होने के बावजूद वहां की नगर निगमों पर भाजपा का कब्जा है। दिल्ली एक ऐसा राज्य है जहां पर सरकार से ज्यादा काम नगर निगमों पर है। फिर जितना कर राजस्व दिल्ली की सरकार को मिलता है उतना बहुत सारे राज्यों के पास नही है। इसी राजस्व के सहारे दिल्ली सरकार बहुत सारी सेवाएं अपने लोगों को मुफ्त में दे रही है। अन्य प्रदेशों में ऐसा कर पाना संभव नही है। शायद इसी कारण से दिल्ली से बाहर अन्य राज्यों में आप की प्रभावी इकाईयां नही बन पायी हैं। इसीलिये हिमाचल में दिल्ली जैसी सुविधाओं का दावा करके एक प्रभावी ईकाई का गठन कर पाना संभव नही होगा। हिमाचल में अपना स्थान बनाने के लिये आप जब तक यह स्पष्ट नही हो जाती है कि उसका पहला विरोध सत्तारूढ़ दल से है तब तक प्रदेश में उसकी विश्वसनीयता बनना संभव नही है।

कांग्रेस में गद्दार कौन है वीरभद्र के ब्यान से छिड़ी चर्चा

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता और छः बार प्रदेश के मुख्यमन्त्री रहे और वर्तमान में अर्की विधानसभा क्षेत्र के विधायक वीरभद्र सिंह ने अपने चुनाव क्षेत्र के नव निर्वाचित कांग्रेस समर्थक सदस्यों को संबोधित करते हुए यह कहा कि वह अब चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसी अवसर पर उन्होंने कांग्रेस जनो से भी यह आह्वान किया कि वह पार्टी के भीतर बैठे गद्दारों को बाहर करने के लिये आगे आयें। यहां पर उन्होंने यह भी स्पष्ट कहा कि वह कांग्रेसी थे-है और मरते दम तक रहेंगे। अर्की के इस संबोधन के बाद जब उनसे पुनः यह पूछा गया कि क्या वह सही में ही अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे तब कहा कि यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वीरभद्र छः बार मुख्यमन्त्री रह चुके हैं इस नाते प्रदेश के हर कोने में उनके समर्थक मिल जायेंगे यह स्वभाविक है। इस समय भी यदि यह सवाल आयेगा कि कांग्रेस का अगले चुनावों मे नेता कौन होगा तो उन्हीं का नाम सामने आयेगा। ऐसे में जब तक वीरभद्र यह पक्के तौर पर स्पष्ट नहीं कर देते हैं कि वह चुनाव लड़ेंगे या नहीं तब तक कांग्रेस में असमंजस की स्थिति बनी रहेगी और पार्टी को उसका नुकसान होगा।
वीरभद्र के इस दोहरे कथन के साथ ही उनका यह आह्वान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि पार्टी के भीतर बैठे गद्दारों को बाहर निकाला जाये। स्वभाविक है कि उनकी नज़र में पार्टी के भीतर कुछ गद्दार हैं और उनको निकालने के लिये वीरभद्र ने एक तरह से लड़ाई का ऐलान कर दिया है। वीरभद्र जिसको एक बार अपना विरोधी मान लेते हैं तो उसे हराने के लिये वह किसी भी हद तक जा सकते हैं। 1980 में प्रदेश के वन माफिया के खिलाफ सांसदो/विधायकों के नाम खुला पत्र लिखने से शुरू करके, 1993 में आधे विधायकों के चण्डीगढ़ में बैठे रहने के बावजूद उनका मुख्यमन्त्री पद की शपथ लेना फिर कौल सिंह ठाकुर और सुक्खविन्द्र सुक्खु को अध्यक्ष पद से हटवाने तथा उनके समर्थकों द्वारा एक समय वीरभद्र ब्रिगेड तक का गठन कर लेना ऐसे उदाहरण हैं जो उनकी लड़ाई के स्पष्ट प्रमाण है। इस सबसे वीरभद्र कांग्रेस के ऐसे वटवृक्ष बन गये कि उनके साये तले कोई दूसरा नेता उभर ही नहीं पाया। इसका पार्टी को यह नुकसान हुआ कि आज ‘‘वीरभद्र के बाद कौन’’ यह पार्टी के लिये पक्ष प्रश्न बन कर खड़ा है। क्योंकि कौल सिंह, जी एस बाली और सुधीर शर्मा जैसे नेताओं की पिछले चुनावों में हार से यह सवाल और गहरा गया है। इस समय मुकेश अग्निहोत्री, आशा कुमारी, हर्षवर्धन और सुक्खु से पहले वरीयता में आनन्द शर्मा का नाम आता है।
इस परिदृश्य में पार्टी के गद्दारों को लेकर वीरभद्र के ब्यान के राजनीतिक मायने बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्योंकि इस समय पार्टी के बड़े चेहरे यही छः सात नेता हैं और कांग्रेस के प्रति इनकी निष्ठा को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है। ऐसे में यह जानना रोचक हो जाता है कि वीरभद्र की नज़र में पार्टी के गद्दार कौन हैं और उनको बाहर करने के लिये वह किस तरह की लड़ाई छेड़ सकते हैं। पिछले दिनों जब कांग्रेस के बडे़ नेताओं द्वारा सोनिया गांधी को पत्र लिखा गया और उसमें आनन्द शर्मा का नाम सामने आया था तब उस पर प्रदेश के भीतर तीव्र प्रतिक्रिया सामने आयी थी। आनन्द शर्मा से सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करने की मांग की गयी थी। संयोगवश यह पत्र लिखने के बाद आनन्द शर्मा केन्द्र में पार्टी की बहुत सारी कमेटीयों से बाहर भी हो गये हैं। इसको यह माना जाने लगा था कि शायद आनन्द शर्मा को प्रदेश का नेतृत्व दिया जा रहा है। प्रदेश कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष कुलदीप राठौर को बनवाने में सबसे अहम भूमिका आनन्द शर्मा की ही रही है यह सभी जानते हैं। ऐसे में वीरभद्र के ब्यान के बाद पार्टी के भीतर यह चर्चा उठना स्वभाविक है कि प्रदेश राजनीति के इस शेर का अगला शिकार कौन होने जा रहे हैं। इस समय केन्द्र से लेकर राज्यों तक जो राजनीतिक माहौल हर रोज़ बनता जा रहा है उसमें हर जगह कांग्रेस पर ही सबकी निगाहें लगी हुई हैं। विपक्ष के नाम पर कांग्रेस ही भाजपा का पहला निशाना है। ऐसे में जहां कांग्रेस को पूरी एकजुटता के साथ सरकार और भाजपा को मुकाबला करना हैं वहीं पर पार्टी के अन्दर इस तरह की लड़ाई का छिड़ना संगठन और प्रदेश के लिये नुकसानदेह होगा यह तय है।

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