Saturday, 17 January 2026
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अदालत के फैसले पर अमल करने के आग्रह का परिणाम है शैल के खिलाफ राजस्व के मामले में एफ आई आर

एफ आई आर के मुताबिक शिकायत 21-8-2020 को गयी
नगर निगम ने 16-5-2020 को ही आर टी आई में शिकायत की कापी दे दी
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल को भेजी शिकायत में न तो कोई तारीख और न ही कोई फोन नम्बर
शिकायतकर्ता विजय कुमार के पत्ते पर कोई संदीप उपाध्याय रहता है
प्रदेश उच्च न्यायालय और दो बार नगर निगम की अदालत से जीतने के बाद विजिलैन्स में जमीन के मामले में एफ आई आर
शिमला/शैल। क्या किसी मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय और उसके बाद दो बार नगर निगम शिमला की अदालत से जीतने के बाद फैसले पर अमल करने के आग्रह का परिणाम व्यक्ति के खिलाफ विजिलैन्स में आपराधिक मामला दर्ज किया जाना हो सकता है? यह कमाल मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर की विजिलैन्स ने किया है और वह भी उस समय जब मुख्यमन्त्री स्वयं पत्रकार अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी को लोकतन्त्र के लिये घातक और चैथे सतम्भ की आजा़दी पर सीधा प्रहार करार दे रहे हों। संपादक शैल के खिलाफ बनाया गया मामला भाजपा सरकार और संगठन के इसी चेहरे को उजागर करता है। यह मामला क्या है क्यों बनाया गया है और कैसे बनाया गया यह जानकारी पाठकों के सामने रखा जाना इसलिये आवश्यक हो जाता है ताकि आम आदमी को सरकार के चरित्र की जानकारी हो सके। यह पता चल सके कि प्रशासन किस तरह की राय सरकार को देता है या सत्ता के आगे कैसे घुटने टेक देता है।
शैल ने प्रकाशन के लिये अपनी प्रिन्टिंग प्रैस लगाने हेतु 1990 में हिमाचल सरकार और शिमला स्थित पंजाब वक्फ बोर्ड से ज़मीन मांगी थी। सरकार ने तो इस आग्रह का कोई जवाब नही दिया लेकिन वक्फ बोर्ड ने इसे स्वीकार करते हुए शिमला के लक्कड़ बाजा़र स्थित मुस्लिम कालोनी ईदगाह में करीब 70 वर्ग गज़ जगह लीज पर दे दी। जून 1990 में मिली इस ज़मीन पर निर्माण शुरू किया जो बरसात में नाला बन्द होने के कारण आये तेज पानी के कारण गिर गया। करीब दो लाख का नुकसान हो गया। निर्माण बन्द करना पड़ा। बरसात के बाद जब पुनः निर्माण शुरू करने की तैयारी की तो वहां पर सार्वजनिक शौचालय का निर्माण हो चुका था। शौचालय बन जाने के कारण वहां पर प्रैस लगाना संभव नही रह गया था। शौचालय बना दिये जाने की जानकारी वक्फ बोर्ड को दी गयी। वक्फ बोर्ड से जानकारी मिली की यह नगर निगम द्वारा बनाये गये हैं और उससे मामला उठाया जाये। शौचालय बन जाने के कारण वहां पर प्रैस लगाना संभव नही रह गया था और लीज़ को रिन्यू करवाकर खाली ज़मीन का किराया भरने का भी कोई औचित्य नही था। नगर निगम से शौचालय को लेकर पत्राचार चलता रहा। नगर निगम के कारण 70 वर्ग गज़ ज़मीन चली गयी और लाखों का नुकसान हो गया। 1999 में नगर निगम ने माना कि शौचालय मेरे प्लाट की 13 वर्ग गज़ जगह पर बने हैं। इसके बदले में लक्कड़ बाज़ार बस स्टैण्ड पर स्थित रेनशैलटर के नीचे की 13 वर्ग गज़ लीज़ पर दे दी जिसे शैल ने अपने खर्चे पर बनाना था और यह खर्च एडवांस किराया के रूप में एडजैस्ट किया जाना था। दिसम्बर 1999 में नगर निगम के साथ लीज हुई और 2000 में यहां पर निर्माण शुरू किया। जब निर्माण शुरू किया तो एक अरूण कुमार ने इस पर एतराज उठाया और प्रदेश उच्च न्यायालय से स्टे करवा दिया। नोटिस होने पर जब उच्च न्यायालय में पक्ष रखा तब स्टे हटा दिया गया और 2006 में हमारे हक में फैसला भी आ गया। लेकिन इसी बीच 2003 में सरकार बदल गयी। वीरभद्र सरकार में नगर निगम ने हमारे खिलाफ वहां से हटाये जाने के लिये अपनी अदालत में मामला दायर कर दिया। इसका फैसला 2007 में हमारे हक में हुआ। इस फैसले की 2009 में मण्डलायुक्त के पास निगम ने अपील दायर कर दी। 2010 में मण्डलायुक्त ने यह मामला नये सिरे से सुनवाई करने के लिये नगर निगम को भेज दिया। 2016 में इसका फैसला फिर हमारे पक्ष में आया। अब जब इस फैसले पर अमल करने के लिये नगर निगम से आग्रह किया गया तब यह आपराधिक मामला खड़ा कर दिया गया। वैसे सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दे रखी है कि ऐसे राजस्व से जुड़े विषयों पर आपराधिक मामले न बनाये जायें।
यह मामला बनाये जाने के लिये एक शिकायतकर्ता विजय कुमार प्रधानमन्त्री, मुख्यमन्त्री और राज्यपाल को शिकायत भेजता है कि वक्फ बोर्ड की जिस ज़मीन के बदले में नगर निगम ने हमे रेनशैलटर के नीचे ज़मीन दी है उसे वक्फ बोर्ड और नगर निगम की जानकारी के बिना हमने चार आदमीयों को बेच दिया है तथा इस तरह से गलत ब्यानी करके निगम से जगह ले ली। वर्ष 2000 से यह मामला लगातार अदालतों में चल रहा है और नगर निगम ही हमारे खिलाफ अदालत में गया है। जब नगर निगम अदालत के फैसले को लागू न करे तो उससे निगम की नीयत कोई भी समझ सकता है। लेकिन जो आरोप विजय कुमार ने लगाया है यह आरोप कभी किसी अदालत में बीस वर्षो में नही लगा है। यदि सही में ऐसा होता तो यह आरोप कभी का अदालत के रिकार्ड पर लाकर हमें बाहर कर दिया जाता। 2003 में जब नगर निगम हमारे खिलाफ अदालत में गया तब एक समय पीठासीन अधिकारी की गैर हाजिरी में रीडर ही हमारे खिलाफ मामले की सुनवाई कर रहा था और जब लिखित में मौके पर प्रोटैस्ट किया तब सुनवाई रूकी। यह सब रिकार्ड पर उपलब्ध है।
अब विजय कुमार की शिकायत पर कोई तारीख नही है लेकिन विजिलैन्स ने एफ आई आर में शिकायत की तारीख 21.08.2020 कही है। लेकिन नगर निगम से एक डाॅ. बन्टा ने आर टी आई में शिकायत की कापी 16.05.2020 को प्राप्त कर रखी है। एफ आई आर में विजय कुमार का नाम नही दिखाया गया है। शिकायत में विजय कुमार ने जो पता दिखाया है वहां पर कोई संदीप उपाध्याय रहता है। शिकायत पर कोई तारीख और फोन नम्बर का न होना शिकायत और शिकायतकर्ता दोनों की प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। लेकिन विजिलैन्स ने इस शिकायत को सही मानते हुये एफ आई आर दर्ज कर ली है। एफ आई आर में ही 30-11-95 को इस जमीन की वक्फ बोर्ड द्वारा डिमारकेशन किये जाने का जिक्र है। क्या इस डिमारकेशन से वक्फबोर्ड को जमीन का सही संज्ञान नही हो गया? फिर 25-4-99 को इस जमीन का निरीक्षण नगर निगम की टीम करती है और इसकी रिपोर्ट भी एफ आई आर के मुताबिक रिकार्ड पर लगी है। इन दोनों रिपोर्टों में हम शामिल नही हैं। हमें तो निगम ने दिसम्बर 1999 में जगह दी। तब सब कुछ निगम के संज्ञान में था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हैै कि विजिलैन्स ने कैसे अपराधिक माामला दर्ज कर लिया। इस परिदृश्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि शैल की आवाज़ दबाने के लिये जबरदस्ती यह मामला खड़ा किया गया है। शैल के किस लिखने से सरकार को परेशानी हुई है इसका खुलासा अगले अकों में किया जायेगा।

अदालतों के फैसले

 

नगर निगम की कारवाई

































कोरोना के बढ़ते आंकड़ों में स्कूल खोलने का फैसला घातक होगा

शिमला/शैल। इस समय प्रदेश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 25000 से पार जा चुका है। आने वाले सर्दियों के दिनों में यह आंकड़ा और बढ़ेगा यह तय है। इससे निपटने के लिये सरकार की तैयारियां सारे दावों के बावजूद इतनी नहीं है कि वह हर जिले में इससे एक साथ निपट सके। क्योंकि जितने वैन्टीलेटर सरकार के पास उपलब्ध है शायद उन्हें आप्रेट करने के लिये उतने प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं है। यह सारे आंकड़े एक याचिका में प्रदेश उच्च न्यायालय के सामने भी आ चुके हंै। इसके टैस्ट बढ़ाने के लिये भी पैरा मैडिकल स्टाॅफ और नर्सिंग स्टाॅफ को अब प्रशिक्षण देने की तैयारी हो रही है। दवाई आने में कितना समय और लगेगा यह कहना भी अभी कठिन है। आयूष का काढ़ा भी हर स्थान पर सुगमता से उपलब्ध नहीं है क्योंकि इस ओर कोई अलग से प्रयास किये ही नहीं गये हैं। प्रदेश की आयूष फारमैसियों के पास जितना भी काढ़ा उपलब्ध था उसे शुरू मे ही विभाग ने लेकर मन्त्रिायों, अधिकारियों तथा कोरोना उपचार में तैनात स्टाॅफ को बांट दिया था। अब भी विभाग जो काढ़ा मंगवा पाता है उसे इसी तरह कुछ विशेष लोगों को बांट दिया जाता है। आम आदमी के हिस्से में अब भी कुछ नहीं आ पाता है। आज कोरोना के लिये न तो कोई दवाई और न ही यह काढ़ा तक उपलब्ध है केवल बचाव का उपाय ही एक मात्रा विकल्प बचा है। इस बचाव में व्यवहारिक रूप से देह दूरी और मास्क पहनना ही प्रमुख रूप से आता है।
इस परिदृश्य में स्कूल खोलना और बच्चों को स्कूल भेजने के लिये अभिभावकों की लिखित अनुमति अनिवार्य करने का अर्थ है कि सरकार अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। ऐसी वस्तुस्थिति में सरकार के इस फैसले पर सवाल उठना स्वभाविक है। जब से स्कूल खोलने और बच्चों का स्कूल आना शुरू हुआ है तब से अध्यापकों और छात्रों में कोरोना संक्रमण का आंकड़ा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। प्रदेश का हर जिला इससे प्रभावित हो रहा है और यह बढ़ेगा ही यह भी तय है। इसलिये यह सवाल और भी प्रसांगिक हो जाता है कि सरकार ने स्कूल खोलने का फैसला क्यांे लिया। क्या सरकार का कोरोना को लेकर आकलन सही नहीं रहा है? क्या प्रशासन ने वस्तुस्थिति को गंभीरता से नहीं लिया है। जब सरकार ने बहुत अरसे से आॅनलाईन पढ़ाई शुरू कर रखी है और पाठ्यक्रम में भी कमी कर रखी है तब स्कूल खोलने की आवश्यकता और औचित्य क्या रह जाता है। मार्च से नवम्बर तक स्कूल बन्द रहे हैं। आठ माह स्कूल बन्द रखने के बाद अब सर्दीयों के मौसम में जब वैसे ही सर्दी, जुकाम का प्रकोप रहता है तब सरकार के इस फैसले को व्यवहारिक कैसे कहा जा सकता है।
कोरोना काल में जब आॅनलाईन पढ़ाई शुरू की तब बच्चों और अभिभावकों को स्मार्ट फोन लेना अनिवार्य हो गया था। इसके लिये नेटवर्क आवश्यक हुआ और यह बीएसएनएल की जगह जियो से लेना पड़ा। जियो ने नेटवर्क का शुल्क भी बढ़ा दिया। लेकिन इस व्यवस्था में स्कूल अध्यापक और बच्चे के बीच तीसरा कोई नहीं था। लेकिन अब जब इस व्यवस्था में सरकार ने बाकायदा एक एमओयू साईन करके जियो को बीच में लाकर खड़ा कर दिया है तब स्थिति बदल जाती है। जियो नेटवर्क सर्विस प्रदाता है और सामान्यतः उसकी भूमिका इससे अधिक हो ही नहीं सकती है तब क्या जियो को नेटवर्क प्रदान करने के लिये भी सरकार पैसा देगी? छात्रा जितना नेटवर्क प्रयोग करेंगे उसकी कीमत तो वह स्वयं देंगे फिर सरकार जियो को किस बात के लिये पैसा देगी। यह सवाल अभी तक अनुतरित है ऐसे में सवाल उठना स्वभाविक है कि जब तक नियमित रूप से स्कूल नही खुलेंगे और छात्रा नहीं आयेंगे तब तक जियो को भुगतान करना आसान नहीं होगा। जियो के कारण ही छात्रों की फीस आदि में बढ़ौत्तरी की गयी है। इस फीस बढ़ौत्तरी को लेकर रोष चल रहा है क्योंकि इसी के कारण प्राईवेट स्कूलों को भी पूरी फीस वसूल करने का मौका मिल गया है। इस फीस बढ़ौत्तरी के अतिरिक्त बिजली, पानी और बस किराया तक कोरोना काल में बढ़ा दिया गया है। वाहनों का पंजीकरण दस प्रतिशत कर दिया गया है। इस तरह हर ओर से आम आदमी में रोष व्याप्त हो रहा है। ऐसे में जब बच्चों में संक्रमण के बढ़ने के आंकड़े सामने आते जायेंगे तब उसी अनुपात में जनता में रोष बढ़ता जायेगा और यह रोष कोई भी शक्ल ले लेगा।
ऐसे परिदृश्य में व्यवहारिक यही होगा कि स्कूल खोलने का फैसला छोड़कर इस सत्रा में बच्चों को वैसे ही प्रोमोट कर दिया जाना चाहिये। क्योंकि जब तक कोरोना को लेकर आम आदमी में बैठा डर दूर नही होगा तब तब अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के लिये तैयार नही हो पायेंगे।

क्या केन्द्रीय मुद्दों पर खामोश रहकर सुशान्त का प्रयोग सफल हो पायेगा

शिमला/शैल। पूर्व मन्त्री एवम् सासंद डा. राजन सुशान्त ने राजनीतिक विकल्प के नाम पर प्रदेश में ‘‘अपनी पार्टी-हिमाचल पार्टी’’ के नाम से एक राजनीतिक दल का गठन किया है। इस दल की औपचारिक घोषणा करते हुए सुशान्त ने स्वयं इसे एक राजनीतिक प्रयोग कहा है। राजनीतिक प्रयोग कहकर आने वाले समय में यदि यह प्रयोग अफसल भी हो जाता है या कोई और आकार ले लेता है तो वह इसकी असफलता के दोष से बच जाते हैं। प्रयोग शब्द का चयन ही अपने में महत्वपूर्ण है। सुशान्त आरएसएस के तृतीय वर्ष प्रशिक्षित कार्यकर्ता हैं और प्रदेश में भाजपा के संस्थापकों में से एक हैं। सुशान्त प्रदेश की राजनीति में आन्दोलन से आये हैं। उन्हें यह राजनीति विरासत मे नही मिली है। इसलिये आन्दोलनों की पृष्ठिभूमि से राजनीति में आया व्यक्ति जब इस तरह के प्रयोग करने पर आ जाता है तब सब कुछ का नये सिरे से आकलन करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि राजनीतिक दल का गठन और उसकी गतिविधियां एक व्यक्ति या एक परिवार तक ही सीमित नही रहती हैं बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करती हैं।
सुशान्त ने दल की घोषणा करते हुए प्रदेश की समस्याओं का जिक्र करते हुए यह आरोप लगाया है कि भाजपा या कांग्रेस की सरकारों के हाथों प्रदेश समस्याओं से नही निकल पायेगा। क्योंकि इन दलों का प्रदेश नेतृत्व दिल्ली के नेतृत्व की सूबेदारी से ज्यादा अहमियत ही नही रखता है। इसके उदाहरण के लिये उन्होने पंजाब पुनर्गठन में प्रदेश को मिले 7.19% हिस्से को व्यवहारिक रूप में ले पाने में कांग्रेस और भाजपा सरकारों का असफल रहना कहा है। क्योंकि जिन प्रभावित प्रदेशों से हिस्सा मिलना है उनके संसद में 48 सांसद है और जिन्होने हिस्सा लेना है उनके केवल चार सांसद हैं। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने भी चण्डीगढ़ में एक पत्रकार वार्ता आयोजित करके दावा किया था कि यह हिस्सा लेना उनकी प्राथमिकता होगा। लेकिन अब तक यह दावा पत्रकार वार्ता से आगे नहीं बढ़ पाया है यह व्यवहारिक स्थिति है। यह बात सही है कि बहुत सारे मुद्दों पर हिमाचल का नेतृत्व केन्द्र में अपना पक्ष प्रभावी तरीके से नही रख पा रहा है। लेकिन ऐसा शायद इसलिये होता रहा है कि बजट की दृष्टि से हिमाचल की केन्द्र पर निर्भरता 67 से 70% रहती आयी है। प्रदेश की आत्मनिर्भरता के लिये जिन संसाधनों की बात सुशान्त ने कही है उन पर आज तक उन्होने भी सत्ता पक्ष में रहते हुए कभी बात नही की है। क्योंकि जब भी हिमाचल पानी और बर्फ की बात करेगा तो बदले में जवाब मिलेगा कि पानी का बहाव और बर्फ के पिघलने को रोक ले जो कि संभव नही है। इसके दोहन के लिये साधन नही हैं। ऐसे में प्रदेश के अपने संसाधनों पर निर्भरता के लिये बहुत कुछ चाहिये और उस सबकी चर्चा से सुशान्त दूर रहे हैं। इसलिये जिन मुद्दों पर सुशान्त ने शुरूआत करने की बात की है वह है पुरानी पैन्शन योजना की बहाली। इस समय देशभर का कर्मचारी इस योजना की बात कर रहा है। यह मुद्दा कर्मचारी राजनीति के लिये तो महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन यही मुद्दा प्रदेश के आम आदमी का मुद्दा नही बन जाता है।
इस समय देश और प्रदेश अभूतपूर्व आर्थिक संकट से गुजर रहा है। यह संकट देश में नोटबन्दी से शुरू हो गया था। आज कोरोना काल में आये लाकडाऊन के कारण इस संकट पर सार्वजनिक बसह नही चल पायी है। मोदी सरकार के आने के बाद बैंकों का एनपीए कितना बढा है? इस दौरान कितने लाख करोड़ का ऋण राईटआफ कर दिया गया। कितने लाख करोड़ के बैंक फ्राड हुए हैं। इन सबके कारण देश आर्थिक संकट में आया है कोरोना तो इसमें एक बड़ा छोटा सा फैक्टर रहा है लेकिन सुशान्त ने इस आर्थिक संकट को लेकर एक शब्द भी नही कहा है। इसी के साथ कृषि उपज विधेयकों को लेकर देशभर का किसान आज आन्दोलन में है। श्रम कानूनों के संशोधन से श्रमिकों के हितों को कुचल कर रख दिया गया है। लेकिन सुशान्त इन सारे ज्लवन्त मुद्दों पर एकदम खामोश रहे हैं। क्योंकि इस सबके पीछे संघ की सोच प्रभावी है। हिन्दु ऐजैण्डा संघ का मूल मुद्दा है। मोदी सरकार को तो उसे लागू करने की जिम्मेदारी दी गयी है। आज वैचारिक स्तर पर देश संघ की विचारधारा के साथ टकराव में चल रहा है। ऐसे में जो भी राजनेता देश स्तर पर या प्रदेश के स्तर पर किसी राजनीतिक दल के गठन की बात करेगा उसे इन मुद्दों पर स्पष्ट होना होगा। सुशान्त ने शायद संघ की पृष्ठभूमि के कारण इन मुद्दों से बचने का प्रयास किया है। इस समय पूरे देश की राजनीतिक केन्द्र से प्रभावित हो रही है। क्योंकि जो परिस्थितियां इस समय बनती जा रही है वह आज से पहले नही रही हैं। इसलिये जो भी नेता इन परिस्थितियों पर स्पष्ट पक्ष लेने से बचेगा जनता में उसकी स्वीकार्यता बनना संभव नही होगा ।

क्या नगर निगम आयुक्त का पद भी उगाही वाले दायरे में आ गया है?

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के आयुक्त का पद एक सप्ताह से खाली चला आ रहा है। सरकार ने पिछले दिनों 21 आईएएस अधिकारियों के तबादले किये थे और उनमें निगम के आयुक्त को जिलाधीश लाहौल- स्पिति भेजा था। उसके बाद से यह पद खाली है। सरकार कोई नियुक्ति इस पद पर नही कर पायी है। चर्चा है कि करीब आधा दर्जन अधिकारी इस पद की दौड़ में हैं एक समय तो यहां तक चर्चा आ गयी थी कि एक आईएफएस अधिकारी पर मुख्यमन्त्री और शहरी विकास मन्त्री जो शिमला के वर्तमान विधायक भी हैं दोनो सहमत हो गये थे। लेकिन इस चर्चित सहमति के बाद भी नियुक्ति न हो पाने से कई सवाल खड़े हो गये हैं। शिमला प्रदेश का सबसे पुराना और बड़ा नगर निगम है। शिमला के नगर निगम को एक तरह से प्रदेश की लघु विधानसभा माना जाता है। यहां पर प्रदेश के हर जिले का ही नही बल्कि देश के हर राज्य का आदमी मिल जायेगा। पर्यटन की दृष्टि से शिमला विश्वस्तरीय स्थलों में गिना जाता है। ब्रिटिश शासन में देश की ग्रीष्मकाल की राजधानी होने के नाते यहां के अनेक स्थलों और भवनों को हैरिटेज का दर्जा हासिल है।
इसी कारण से यहां पर कई लोगों का हित जुड़ा हुआ रहता है। इसी हित का परिणाम है कि यहां के अवैध निमार्णों को नियमित करने के लिये कांग्रेस और भाजपा की सरकारें नौ बार रिटेन्शन पालिसी ला चुकी है। प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक इस स्थिति का कड़ा संज्ञान लेकर सरकार और प्रशासन को गंभीर लताड़ लगा चुका है। एनजीटी तो वाकायदा फैसला सुनाकर शहर के कोर एरिया में निमार्णों पर प्रतिबन्ध लगा चुका है। कोर एरिया के बाहर भी अढ़ाई मंजिल से अधिक का कोई नया निर्माण नही किया जा सकता है। कई हित धारकों के दवाब में सरकार को यह वायदा करना पड़ा था कि वह एनजीटी के फैसलों की अपील सर्वोच्च न्यायालय में करेंगे। लेकिन ऐसा कर नही पायी है। परन्तु एनजीटी के फैसले के वाबजूद नगर निगम क्षेत्र में छः मंजिला निर्माण हो रहे है। सैंकड़ों निर्माणों को इस नाम पर अनुमति दी जा रही है कि इनके नक्शे एनजीटी का फैसला नम्बर 2016 में आने से पहले ही यह नक्शे पास हो चुके थे और अनुमति की सूचना नही दी जा सकी थी। यह सारे निर्माण अढ़ाई मंजिल से अधिक के ही हैं। फिर शिमला स्मार्ट सिटी घोषित हो चुका है। स्मार्ट सिटी के नाम पर सैंकड़ों करोड़ की नयी योजनाएं नियमित की जानी है। कई योजनाएं तो अधिकारीयों की डील से पहले ही बन्द हो चुकी हैं। शहर की सबसे बड़ी पेयजल योजना शहर के रिज से संचालित है इसके जिर्णोद्वार के लिये ही सौ करोड़ की योजना तैयार है। शहर में पार्किंग एक बड़ी समसया है। इसके लिये नगर निगम ने पीपीपी योजना के तहत कुछ पार्किंग स्थलों का निर्माण करवाया था। अब स्मार्ट सिटी के नाम पर इन्ही पार्किंग स्थलों को शायद निगम उन ठेकेदारों से वापिस ले रही है। जिस पर ठेकेदार ने 16 करोड़ खर्च किये हैं उसे 48 करोड़ में वापिस लिया जा रहा है।
स्मार्ट सिटी से अलग शहर में एशियन विकास बैंक के सहयोग से सौंदर्यकरण की योजना चल रही है। इस योजना के तहत शहर में स्थित दोनो चर्चों की रिपेयर के लिये 21 करोड़ खर्च किये जाने थे। इसके लिये प्रक्रिया संबंधी सारी औपचारिकताएं भी पूरी हो गयी थी। इसमें कुछ काम भी शुरू हुआ था। लेकिन क्यों और कैसे बन्द कर दिया गया इसकी कोई जानकारी आज तक बाहर नही आयी है। इसी सौंदर्यकरण की योजना के तहत ही टाऊनहाल की रिपेयर पर करीब दस करोड़ खर्च किये गये हैं। लेकिन रिपेयर के बाद इस बरसात में इसके अन्दर पानी आया है और इसको लेकर वर्तमान और पूर्व मेयर में वाक्युद्ध भी हो चुका है। इस तरह नगर निगम शिमला में स्मार्ट सिटी से लेकर सौंदर्यकरण जैसी कई बड़ी योजनाओं पर अमल होना है। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि प्रशासनिक दृष्टि से निगम के आयुक्त का पद कितना अहम हो गया है। इसी के साथ भाजपा के ही दो बड़े नेताओं के राजनीतिक हित भी नगर निगम क्षेत्र से जुडे हुए हैं। फिर निगम का जो भी आयुक्त होता है उसकी काम के कारण राजभवन से लेकर उच्च न्यायालय तक बराबर पैठ बन जाती है और सचिवालय तो इन दोनों के बीच ही स्थित है। नगर निगम शिमला के इस राजनीतिक भूगोल के कारण यहां के आयुक्त की नियुक्ति मुख्यमन्त्री और शहरी विकास मन्त्री के लिये भी काफी जटिल हो गयी है। वैसे तो पुलिस थानों, एक्साईज़ और फारैस्ट की चैक पोस्टों और प्रदूषण नियन्त्रण केन्द्रों पर होने वाली नियुक्तियों को लेकर मोलभाव होने के आरोप दबी जुबान में काफी असरे से चर्चा में चले आ रहे हैं। यह काम इस सत्ता के गलियारों से जुड़े दलालों के नाम लगते रहे हैं। इन चर्चाओं को उस समय अधिमान भी मिल जाता है जब किसी चैकिंग गार्ड की वाहन से कुचल कर हत्या कर दी जाती है और हत्यारे पकड़े नही जाते हैं। कई होशियार सिंह इन्साफ के लिये तरस्ते रहते हैं। आज तक नगर निगम शिमला के आयुक्त की नियुक्ति के लिये भी इतना समय लग जाये तो स्वभाविक है कि राजधानी नगर होने के नाते आम आदमी का ध्यान इस ओर जायेगा ही। अनचाहे ही यह चर्चा चल निकलेगी कि कहीं यह पद भी उगाही वाले दायरे में तो नही आ गया है और दलालों का इस पर सीधा दखल हो चुका है क्योंकि जितने काम स्मार्ट सिटी और सौंदर्यकरण के नाम पर होने हैं उनको देखकर इस तरह की आशंकाओं को एकदम आधारहीन भी नही कहा जा सकता है।

शान्ता के ब्यान और पत्र से असन्तुष्टों को मिले पंख सरकार केे लियेे हो सकते है खतरे के संकेत

शिमला/शैल। हिमाचल भाजपा के वरिष्ठतम पूर्व मुख्यमन्त्री एवम् पूर्व केन्द्रिय मन्त्री शान्ता कुमार क्या अपनी ही पार्टी और उसकी सरकार से आहत महसूस कर रहे हैं? यह सवाल प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में इन दिनों चर्चा में चल रहा है। क्योंकि बीते एक सप्ताह में दो बार इस आशय के ब्यान उनके सामने आये हैं। विवेकानन्द ट्रस्ट उनका ड्रीम प्रौजैक्ट रहा है जिसे इस मुकाम तक पहुंचाने के लिये उन्होनें बहुत परिश्रम किया है और इस परिश्रम की अपनी ही एक अलग दास्तान रही है। क्योंकि एक समय इसी ट्रस्ट के ट्रस्टी रहे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एस.के.आलोक तक ने बगावत कर दी थी। प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर हुई याचिका भी इसी दास्तान का हिस्सा रहा है। कांगड़ा के ही दो बड़े राजनेता विजय मनकोटिया और जी .एस. बाली भी इस ट्रस्ट को लेकर शान्ता कुमार के साथ सीधे टकराव में रह चुके हैं। प्रदेश विधानसभा में भी इस ट्रस्ट को लेकर सवाल उठ चुके हैं। इन सवालों के जवाब में भी बहुत कुछ रिकार्ड पर आ चुका है। इसी ट्रस्ट के परिप्रेक्ष में डा. राजन सुशान्त ने शान्ता कुमार की आय का 1977 में विधानसभा में दिया गया ब्यौरा भी सार्वजनिक करते हुए कई सवाल उछाले थे। स्वभाविक है कि जिस प्रोजैक्ट के लिये इतना सब कुछ सहा गया हो तो जब उस विषय पर प्रदेश उच्च न्यायालय का इस तरह का फैसला आये तब उस पर दर्द और खुशी दोनों एक साथ छलकेंगे ही। ट्रस्ट के मामलें में जो शान्ता कुमार ने अपनी ही पार्टी के लोगों पर अपरोक्ष में उन्हें परेशान करने का आरोप लगाया है उसका असर पार्टी के भीतर दूर तक जायेगा। क्योंकि शान्ता कुमार का प्रदेश की जनता में और राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में अपना एक अलग स्थान है। इस नाते शान्ता कुमार का यह अपरोक्ष आरोप वर्तमान सरकार और संगठन के लिये एक बहुत बड़ा संकेत बन जाता है। क्योंकि उच्च न्यायालय में जयराम सरकार के कार्यकाल में भी प्रशासन की इस याचिका को फैसले तक पहुचानें में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
विवेकानन्द ट्रस्ट के बाद गुड़िया मामले ने उन्हें और आहत किया है। इस मामले में प्रदेश पुलिस से लेकर सीबीआई की जांच तक से शान्ता ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए मुख्यमन्त्री को सुझाव दिया है कि वह इसकी नये सिरे से जांच करवाने के लिये एसआईटी का गठन करें। एसआईटी में किस स्तर के कौन लोग हों यह तक सुझाव दिया है। इस मामले में मुख्यमन्त्री ऐसा कर पाते हैं कानून इसकी ईजा़जत देता है या नही और प्रदेश उच्च न्यायालय ऐसा करने की अनुमति देता है या नहीं इसका पता आने वाले समय में ही लगेगा। क्योंकि गुडिया की मां इसमें इन्साफ मांगने के लिये सर्वोच्च न्यायालय गयी थी और सर्वोच्च न्यायालय ने उसे उच्च न्यायालय में जाने के निर्देश दिये थे। इस कारण से यह मामला अब उच्च न्यायालय में है। लेकिन शान्ता कुमार के पत्र से जयराम सरकार निश्चित रूप से कठघरे में आ खड़ी होती है क्योंकि उसे सत्ता मेें तीसरा वर्ष पूरा होने जा रहा है। इन तीन वर्षों में न तो गुडिया और न ही होशियार सिंह मामले में पीड़ित पक्षों को न्याय मिल पाया है। बल्कि आज प्रदेश में हर रोज़ एक बलात्कार होने का रिकार्ड खड़ा हो गया है। इस परिदृश्य में शान्ता का जयराम को पत्र लिखना निश्चित रूप से सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है।
लेकिन शान्ता के इस पा के साथ ही पार्टी के उन लोगों को भी बल मिल जाता है जो किसी न किसी कारण सरकार और संगठन से नारा़ज चल रहे हैं। ऐसे लोगों में सबसे पहले डा. राजीव बिन्दल और नरेन्द्र बरागटा के नाम आते हैं। बिन्दल को उन आरोपों पर पद छोड़ना पड़ा या उनसे छुड़वाया गया जिनके साथ उनका कोई सीधा संबंध नही था। फिर विजिलैन्स जांच में भी उनको क्लीन चिट मिल गया लेकिन सम्मान बहाल नहीं हुआ। नरेन्द्र बरागटा मुख्यमन्त्री और पार्टी प्रधान दोनों से यह शिकायत कर चुके हैं कि उनके चुनाव क्षेत्र में एक दूसरे नेता दखल दे रहे हैं। चर्चा है कि इस तरह की शिकायतें कई और विधायकों से भी आनी शुरू हो गयी हैं। कांगड़ा में रमेश धवाला और संगठन मन्त्री पवन राणा का विवाद अभी तक अपनी जगह कायम है। माना जा रहा है कि यह विवाद पवन राणा के प्रभाव को कम करने की रणनीति का परिणाम है। सरवीण चौधरी और इन्दु गोस्वामी मामले भी कांगड़ा की राजनीति को प्रभावित करेगें ही यह तय है। अब अनिल शर्मा ने भी मोर्चा खोल दिया है। पूर्व विधायक गोविन्द राम शर्मा के समर्थक भी अपनी नाराज़गी मुखर कर चुके हैं। प्रशासन किस तर्ज पर चल रहा है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार नगर निगम शिमला के आयुक्त का पद ही एक सप्ताह से नहीं भर पायी है। प्रशासन पर इससे बड़ी व्यवहारिक टिप्पणी और कोई नहीं हो सकती है। क्योंकि यह पता ही नहीं चल रहा है कि सरकार में आदेश किसका चल रहा है। इसको लेकर कई तरह की चर्चाएं चल निकली हैं क्योंकि एच ए एस से आई ए एस में आये अधिकारियों को नियुक्तियां देने में ही बहुत वक्त लगा दिया गया और अब आयुक्त का पद भरना ही कठिन हो गया है।

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