शिमला/शैल। क्या प्रदेश कर्ज के चक्रव्यूह की ओर बढ़ रहा है? यह सवाल उठाना इसलिये प्रसांगिक हो जाता है क्योंकि हिमाचल प्रदेश भी उन राज्यों में शामिल है जिन्होंने केन्द्र द्वारा जीएसटी की क्षतिपूर्ति करने में असमर्थता दिखाने पर कर्ज लेने की सलाह को स्वीकार कर लिया है। हिमाचल की आर्थिक स्थिति यह है कि इसके कुल बजट का करीब 67% से प्राप्त होता है। राज्य के अपने संसाधनों से केवल 33% की ही उपलब्धता रह पाती हैै। कैग की वर्ष 2018- 19 की विधानसभा मेें रखी गयी रिपोर्ट के मुताबिक केन्द्रिय करों और शुल्कों का राज्यांश 18% और भारत सरकार से सहायतानुदान 49% मिला है। वर्ष 2020-21 का राज्य का कुल बजट 49 हज़ार करोड़ का है। इसके मुताबिक करीब 32 हज़ार करोड़ के लिये प्रदेश केन्द्र पर निर्भर रहेगा। ऐसे में जब केन्द्र राज्यों को उनका जीएसटी का हिस्सा देने में ही असमर्थता दिखा चुका है तो क्या उससे 67% की यह सहायता मिल पायेगी? क्या इस क्षतिपूर्ति के लिये राज्य सरकार ऋण उठायेगी और वह एफआरवीएम के मानकों के भीतर रह पायेगा यह एक बड़ा सवाल इस समय प्रदेश के समाने खड़ा है। लेकिन विडम्बना यह है कि इस सवाल पर विधानसभा के इस सत्र में कोई चर्चा नही हो पायी है।
मुख्यमन्त्री प्रदेश के वित्तमन्त्री भी हैं और पिछले दिनों यह कहा जाता रहा है कि प्रदेश सरकार के पास 12000 करोड़ की राशी अप्रयुक्त (Unspent) पड़ी हुई है। बल्कि इसके लिये जलशक्ति मन्त्री मेहन्द्र सिंह की अध्यक्षता में मन्त्रीयों की एक उप समिति भी बनी थी। महेन्द्र सिंह ने भी यह दावा किया था कि 12000 करोड़ का ऐसा धन सरकार के पास उपलब्ध है लेकिन इस विधानसभा सत्र में नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री का इस संबंध में एक प्रश्न आया था। इस प्रश्न के उत्तर में बताया गया है कि विभिन्न विभागों में केवल 5156.25 करोड़ की ही अप्रयुक्त राशी है और इसमें वह राशी भी शामिल है जो विधायक निधि और रेडक्रास की विभागों के पास बतौर डिपोजिट पड़ी हुई है। इसी के साथ सदन में विधायक राजेन्द्र राणा का यह सवाल भी था कि सरकार ने इस वर्ष जनवरी से लेकर जुलाई तक कितना ऋण लिया है 31 जुलाई तक जीएसटी मे केन्द्र से क्या मिला है और कितना जीएसटी केन्द्र के पास बकाया है। इसके जवाब में बताया गया है कि जनवरी से जुलाई तक शुद्ध ऋण 2953 करोड़ है। वर्ष 2019-20 में 2477 जीएसटी के रूप में मिल चुके हैं और 2020-21 के लिये 1628 करोड़ का बकाया है। इसी कड़ी में विधायक हर्षवर्धन ने पूछा था कि इन छः महीनों में केन्द्र से कितना पैसा प्रदेश को मिला है। इसके जवाब में बताया गया है कि इस अवधि में केन्द्र से 11001 करोड़ मिले हैं जिनमें से 10974 करोड़ ग्रांट और 27 करोड़ ऋण के रूप में मिले हैं।
वित्तिय स्थिति के इस परिदृश्य में प्रदेश के बजट पर नजर डाली जाये तो 31 मार्च 2019 को प्रदेश का कर्ज 54000 करोड़ हो चुका है। इसके बाद वर्ष 2019-’20 के ऋण को अब तक जोड़ा जाये तो यह आंकड़ा अब 60,000 करोड़ के पार जा चुका है। फरवरी से जुलाई तक 10974 करोड़ ग्रांट के रूप में मिले हैं जिनमें निश्चित रूप से पिछले वित्त वर्ष 2018-19 का भी एक बड़ा हिस्सा रहा होगा। इस तरह चालू वित्त वर्ष के लिये पूरी ग्रांट नही मिल पायी है। सरकार जो अपने पास 12000 करोड़ के अप्रयुक्त धन की उपलब्धता की बात कर रही थी वह अब केवल 5156.25 करोड़ ही रह गया है। इसी में 7000 करोड़ का आकलन गड़बड़ा गया है। ऐसी स्थिति में बजटीय जिम्मेदारीयां पूरी करने के लिये यदि ऋणों का सहारा लिया जाता है तो वह प्रदेश के भविष्य के लिये घातक होगा। ऐसे में प्रदेश को केन्द्र की तर्ज पर अपने खर्चे कम करने के लिये कड़े फैसले लेने होंगे।


शिमला/शैल। जयराम मन्त्रीमण्डल में उनकी सहयोगी मन्त्री सरवीन चौधरी के खिलाफ उनके राजनीतिक प्रतिद्वन्दी पूर्व मन्त्री विजय सिंह मनकोटिया ने एक पत्रकार वार्ता में कहा है कि यदि जयराम सरकार उनके द्वारा लगाये आरोपों पर जांच नही करवाते हैं तो वह यह सारा मामला प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के सामने ले जायेंगे। मनकोटिया ने अपने आरोपों को पुनः दोहराते हुए इस आश्य के पत्र भी प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमन्त्री तक लिख दिये हैं। मनकोटिया की इस चुनौती के साथ ही सरकार की उलझन भी बढ़ गयी है। स्मरणीय है कि जब मनकोटिया ने पहली बार यह आरोप लगाये थे तब उन्होंने सरवीन चौधरी का नाम नही लिया था। लेकिन आरोप सामने आने के बाद जिस तरह से इस मामले पर चर्चा आगे बढ़ी उससे यह संकेत उभरे कि सरकार ने विधिवत यह मामला विजिलैन्स को सौंप दिया है और प्रारम्भिक जांच में आरोपों में दम पाया गया है। लेकिन जब विधानसभा सत्र में इसका जिक्र आया तो यह सामने आया कि सरकार ने इसमें फार्मल तरीके से कुछ नही किया है। विधानसभा की चर्चा में इस तरह की जानकारी आने के बाद ही मनकोटिया ने दूसरी बार यह हमला बोला है और प्रधानमन्त्री तक जाने की बात की है।
मनकोटिया ने अब सीधे सरवीण पर नाम लेकर हमला बोला है। सरवीन के प्रति, उनके बेटे, भाई और भाई की पत्नी सभी पर जमीनें खरीदने के आरोप लगाये हैं। आरोपों में यह संकेत दिया है कि इन लोगों ने सक्षम और स्वतन्त्र आय स्त्रोत न होते हुए सर्कल रेट से कम कीमत पर यह जमीने खरीदी हैं। लेकिन इन आरोपों को प्रमाणित करने के कोई दस्तावेजी़ साक्ष्य साथ नही लगाये हैं। सरवीन के सीए पर भी आरोप लगाया गया है कि उसके परिजनों को कुछ सरकारी विभागों में नौकरीयां भी दी गयी हैं। इसी के साथ चुनाव क्षेत्र के विकास को भी नजरअन्दाज करने के आरोप लगाये गये हैं। इन आरोपों की जांच के लिये आयकर विभाग से भी सहयोग लेने की आवश्यकता होगी। क्योंकि यदि यह लोग आयकरदाता नहीं है तो आरोपो की दिशा ही बदल जाती है और उसके लिये आयकर में अलग से शिकायत जायेगी। आयकरदाता होने की स्थिति में वह जमीन खरीदने के लिये पात्र हैं और यही देखा जायेगा कि आयकर के मुताबिक उनके स्त्रोत वैध हैं या नही। सीए के परिजनों को नौकरी मिलने में संबधित विभागों की प्रक्रिया की जांच होगी। सरवीन उन विभागों की मन्त्री नही रही है। सर्कल रेट से कम पर रजिस्ट्री होने में राजस्व विभाग की प्रक्रिया जांच में आयेगी। क्या विजिलैन्स इन सारे कोणों से मामले को देख पाया है यह अभी स्पष्ट नही है।
लेकिन इस मामले का राजनीतिक स्वरूप अब गंभीर हो जायेगा यह तय है क्योंकि मनकोटिया की प्रतिष्ठा अब दाव पर आ गयी है। सरकार के लिये अपनी साख का सवाल हो जायेगा। मामले की जांच पूरी होने में सरकार का पूरा कार्यकाल निकल जायेगा। बिना पूरी जांच के मन्त्री के खिलाफ कारवाई करना यह दर्शायेगा कि इस पृष्ठभूमि में सरकार में ही बैठे कुछ लोगों की भूमिका है। ऐसे में आने वाले समय में और भी कई बड़े लोगों पर इससे भी गंभीर आरोप लगने की संभावनाओं से इन्कार नही किया जा सकता।


शिमला/शैल। क्या प्रदेश कांग्रेस के संगठन में भी कुछ बदलाव होने जा रहे हैं? यह सवाल इन दिनों चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। यह चर्चा इसलिये चली है क्योंकि प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले दो नेता आनन्द शर्मा और आशा कुमारी जो केन्द्रिय संगठन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रहे थे उनके दायित्वों में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। यह माना जा रहा है कि इस बदलाव से आन्नद शर्मा का राजनीतिक कद काफी हद तक कम हुआ है। इसी तरह आशा कुमारी को भी यदि कोई और जिम्मेदारी साथ में नही दी जाती है तो वर्तमान को उसके कद में भी कटौती ही माना जायेगा। लेकिन कुछ हल्कों में यह क्यास लगाये जा रहे हैं कि उन्हे प्रदेश कांग्रेस का अगला अध्यक्ष बनाया जा रहा है। इसके लिये तर्क यह दिया जा रहा है कि आशा कुमारी के पास पंजाब का प्रभार काफी समय से चला आ रहा था इसलिये वहां से उनका बदला जाना तय था। पंजाब में उन्होंने अपना कार्यभार पूरी सफलता के साथ निभाया है। अपने इसी अनुभव के नाते वह सीडब्ल्यूसी तक पंहुची है और उनके अनुभव का पूरा लाभ उठाने के लिये हाईकमान उन्हे प्रदेश में यह नयी जिम्मेदारी दे सकता है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रदेश कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष कुलदीप राठौर को यह जिम्मेदारी दिलाने में आनन्द शर्मा, वीरभद्र सिंह, आशा कुमारी और मुकेश अग्निहोत्री सबकी बराबर की भागीदारी रही है। लेकिन अब जब कांग्रेस के 23वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर संगठन में प्रभावी फेरबदल करने का सुझाव दिया था तो उनमें आनन्द शर्मा भी शामिल थे। आनन्द शर्मा के इसमें शामिल होने पर प्रदेश में प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं उभरी और संगठन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष केहर सिंह खाची ने वाकायदा एक प्रैस ब्यान जारी करके शिमला के कुछ नेताओं ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई की मांग कर दी। लेकिन इस मांग को अन्य लोगों का समर्थन नही मिल पाया और यह मांग इसी पर दम तोड़ गयी। लेकिन सूत्रों की माने तो खाची ने जो मोर्चा आनन्द के खिलाफ खोला है उसमें कई बड़े नेता भी शामिल हो गये हैं। चर्चा है कि इन लोगों ने हाईकमान को एक पत्र भेजकर जहां आनन्द शर्मा के प्रदेश में जनाधार को लेकर गंभीर सवाल उठाये हैं वहीं पर कुछ पुराने प्रसंग भी ताजा किये हैं जब प्रदेश में कांग्रेस के एक बडे़ वर्ग द्वारा इकट्ठे शरद पवार की एनसीपी में जाने की तैयारी कर ली थी। शरद पवार के साथ जाने की चर्चाएं प्रदेश में पूर्व में दो बार उठ चुकी है। एक बार तो यहां तक चर्चा आ गयी थी कि शरद पवार ने इस नये बनने वाले ग्रुप को विधानसभा चुनावों में भारी आर्थिक सहायता का आश्वासन देने के साथ ही पहली किश्त भी दे दी है। शरद पवार के साथ जिन लोगों के जाने की चर्चाएं चली थी वह सभी लोग संयोगवश वीरभद्र सिंह के ही समर्थक थे। बल्कि इसे वीरभद्र ही रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा था। इस सबमें उस समय आनन्द शर्मा और हर्ष महाजन की सक्रिय भूमिकाएं बड़ी चर्चित रही है। माना जा रहा है कि इस आश्य के खुलासे का जो पत्र हाईकमान को भेजा गया है वह प्रदेश अध्यक्ष राठौर की पूरी जानकारी में रहा है। इस पत्र के जाने से आनन्द सहित कई नेता राठौर से नाराज़ भी हो गये हैं।
इस परिदृश्य में प्रदेश संगठन के नेतृत्व में बदलाव किया जाता है या नही यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यह तय है कि प्रदेश में कांग्रेस भाजपा से तब तक सत्ता नही छीन पायेगी जब तक वह भाजपा को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति पर नही चलती है। पुराना अनुभव यह स्पष्ट करता है कि हर चुनाव से पहले भाजपा कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय प्रचारित करने में पूरी ताकत लगा देती है सत्ता में आने पर उन आरोपों के साक्ष्य जुटाती है और उनके दम कुछ लोगों को अपने साथ मिलाने में भी सफल हो जाती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ ईमानदारी से लड़ाई लड़ना और उसे अन्तिम अंजाम तक पहुंचाना भाजपा का सरकार में आकर कभी भी ऐजैण्डा नही रहा है। जयराम सरकार भी इसी ऐजैण्डे पर काम कर रही है। यदि कांग्रेस भाजपा की इस रणनीति को अभी से समझकर इस पर अपनी कारगर नीति नही बनाती है तो उसे चुनावों मे लगातार चौथी हार भी मिल जाये तो इसमें कोई हैरानी नही होगी। क्योंकि आज कांग्रेस नेतृत्व के एक बड़े वर्ग पर यह आरोप लगना शुरू हो गया है कि वह भाजपा के खिलाफ केवल रस्मअदायगी के लिये मुद्दे उठा रही है। जनता में कांगेस नेतृत्व अभी भी अपना विश्वास बना पाने में सफल नही हो रहा है।
शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के पास एनजीटी का आदेश आने से पहले करीब एक हजार लोगों के भवन निर्माण के नक्शे पास करने के आवेदन लंबित थे। अब इनमें से कुछ लोगों के नक्शे पास करके उन्हे निर्माण की अनुमति दी जा रही है। यह सभी निर्माण तीन से अधिक मंजिलों के हैं। इसमें तर्क यह दिया जा रहा है कि यह नक्शे एनजीटी का आदेश आने से बहुत पहले ही पास कर दिये गये थे लेकिन नगर निगम इसकी सूचना नही भेज पाया था। नगर निगम का यह तर्क निगम ही नही पूरी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्योंकि एनजीटी ने अढ़ाई मंजिल से अधिक के निर्माणों पर रोक लगा रखी है। एनजीटी का यह आदेश उन निर्माणों पर भी लागू है जो उस समय चल रहे थे और पूरे नही हुए थे। एनजीटी ने यहां पर अढ़ाई मंजिल से अधिक के निर्माणों पर इसलिये रोक लगायी क्योंकि यह क्षेत्र गंभीर भूकंप जोन में आते हैं। सरकार के अपने ही अध्ययनो में यह आ चुका है कि भूकम्प के हादसे में सैंकड़ो भवनों का नुकसान होगा और हजारों लोगों की जान जायेगी। प्रदेश उच्च न्यायालय भी इस संबंध में सरकार और निगम प्रशासन के खिलाफ सख्त टिप्पणीयां कर चुका है। एनजीटी के आदेशों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने के कई बार आश्वासन दिये जा चुके हैं लेकिन अभी तक ऐसा हो नही पाया है और जब तक एनजीटी का फैसला रद्द नही हो जाता है तब तक तो यही फैसला लागू रहेगा।
लेकिन शिमला शहरी चुनाव क्षेत्र की राजनीति में यह नक्शे ही सबसे बड़ा जनहित का मुद्दा होता है। इसी जनहित के नाम पर नौ बार अवैध निर्माणों को नियमित करने के लिये रिटैन्शन पालिसियां लायी जा चुकी हैं। ऐसे में इस बार यदि अदालत के आदेशों को नज़रअन्दाज करने के लिये इन नक्शों के एनजीटी के आदेशों से पहले ही पास होने का तर्क लिया जाता है तो इसमें कोई आश्चर्य नही होना चाहिये। क्योंकि नगर निगम में अराजकता का आलम यह है कि यहां पर अदालत के फैसलों पर अमल करने या उसमें अपील में जाने की बजाये प्रशासन ऐसे फैसलों को मेयर के सामने पेश करके उस पर हाऊस की कमेटी बनाकर राय ली जाती है। ऐसा उन लोगो के मामलों में होता है जिन्हें सरकार परेशान करना चाहती है। विकास के मामलों को भी जिनमें किसी पार्षद का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हित जुड़ा होता है उन्हे वर्षों तक अदालत में लटकाये रखा जाता है ऐसा एक अम्बो देवी बनाम नगर निगम मामलें मे देखने को मिला है। इसमें निगम के नाले की चैनेलाइजेशन होनी है।
अभी बेमलोई बिल्डर्ज़ प्रकरण में इसी तरह का आचरण देखने को मिला है। स्मरणीय है कि एक समय इस प्रौजैक्ट ने प्रदेश की सियासत को हिला कर रख दिया था। प्रदेश विधानसभा में यह मामला गर्माया था। इसी मामलें में तत्कालीन मेयर और आयुक्त नगर निगम एक दूसरे से टकराव में आ गये थे। इसी टकराव के बाद यह मामला CWP 8945/2011 के माध्यम से प्रदेश उच्च न्यायालय में पहुंच गया था। उच्च न्यायालय में यह मामला अब तक लम्बित है उच्च न्यायालय ने बेमलोई बिल्डर्ज़ के निर्माण को बिजली-पानी का कनैक्शन देने पर रोक लगा रखी है और यह रोक अब तक जारी है जब तक किसी निर्माण को बिजली -पानी नही मिल जाता है उसे तब तक कम्पलीशन का प्रमाण पत्रा जारी नही किया जा सकता यह स्थापित नियम है। लेकिन इस नियम को नजऱअन्दाज करके इस वर्ष फरवरी में इन्हे यह पूर्णता का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। यह प्रमाण पत्र जारी होने के बाद डीएलएफ ने अपने ग्राहकों को इसकी सूचना देकर अगली कारवाई भी शुरू कर दी। लेकिन सरकार और नगर निगम का यह मामला याचिकाकर्ता के संज्ञान में आया तब उसने अपने वकील संजीव भूषण के माध्यम से इस पर नोटिस भिजवा दिया। वकील का नोटिस मिलने के बाद पूर्णता के प्रमाण पत्र को वापिस ले लिया गया है। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि अदालत के आदेशों को क्यों नज़रअन्दाज किया गया। वकील के नोटिस में साफ कहा गया है कि इस नोटिस का खर्च 21000 रूपये भी निगम से वसूला जायेगा। क्या इस तरह की कार्यप्रणाली को अराजकता की संज्ञा नही दी जानी चाहिये? क्या इसके लिये शीर्ष प्रशासन को भी बराबर का जिम्मेदार नही ठहराया जाना चाहिये।

