तीन वर्षों में घट गये 1134 बलात्कार और 43 गैंगरेप
शिमला/शैल। जयराम सरकार का सत्ता में तीसरा वर्ष चल रहा है। दिसम्बर मे तीन वर्ष पूरे हो जायेंगे। विधानसभा के इस सत्र के पहले ही दिन नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री का एक अतारंकित प्रश्न लगा था कि गत तीन वर्षों में बलात्कार की कितनी घटनाएं हुई, इनमें से कितने गैंगरेप कहां-कहां हुए, बलात्कार के कितने मामले अदालत तक पहंुचे और कितने मामलों में अपराधियों को सज़ा हुई। अतारंकित प्रश्न था इसलिये लिखित सूचना ही आनी थी। इस सूचना के मुताबिक प्रदेश में बीते तीन वर्षों में 31-7-2020 तक 1134 मामले बलात्कार के दर्ज हुए जिनमें से 925 में चालान अदालत में दायर हुए और 30 मामलों में सज़ा हो चुकी है। गैंगरेप के 43 मामले हुए हैं। गैंगरेप के मामलों में कांगड़ा पहले स्थान पर शिमला दूसरे स्थान पर है।
यह आंकडे प्रदेश की कानून और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करते हैं क्योंकि प्रतिदिन औसतन बलात्कार की एक घटना हो रही हैं प्रदेश में मई 2017 में शिमला के ही कोटखाई में गुड़िया कांड घटा था। प्रारम्भिक जांच के पहले ही दिनों में पुलिस पर सवाल खडे हो गये थे। उच्च न्यायालय को मामले में दखल देना पड़ा और जांच सीबीआई को सौंप दी गयी। भाजपा उस समय विपक्ष मेें थी और इस मामले पर शिमला से लेकर दिल्ली तक धरने प्रदर्शन और कैण्डल मार्च आयोजित हो गये थे। दिसम्बर के विधानसभा चुनावों में यह सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बना था। लेकिन आज भाजपा सत्ता में है लेकिन गुड़िया को न्याय अब तक नही मिल पाया है। बल्कि आज भाजपा के ही शासनकाल में गैंगरेप के 43 मामले घट गये हैं। कांगड़ा के फतेहपुर में एक दलित लडकी की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गयी है। कोई बड़ी कारवाई इस मामले पर सामने नही आयी है। जिन लोगों ने गुड़िया कांड के समय सरकार और उच्च न्यायालय तक को हिलाकर रख दिया था वह सब अब चुप है। मीडिया के लिये भी यह गैंगरेप और फिर हत्या कोई बड़ी खबर नहीं है। अदालत भी अब दखल देने के लिये तैयार नही है।
शिमला/शैल। पिछले दिनों प्रदेश में कांगडा केन्द्रिय सहकारी बैंक के निदेशक मण्डल के लिये हुए चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। यह हार कितनी बड़ी रही है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस से बैंक के अध्यक्ष रहे सिपाहिया भी निदेशक का चुनाव हार गये हैं जबकि इसी चुनाव में भाजपा सरकार के वर्तमान मन्त्री राकेश पठानिया, सरवीण चैधरी, विक्रम ठाकुर और गोविन्द ठाकुर भी अपने-अपने जोन में भाजपा के उम्मीदवार को जीत नहीं दिला पाये हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा के पक्ष में भी कोई बड़ा माहौल नहीं था। कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक के चुनाव उस समय हुए जब किसान कृषि उपज विधेयकों के खिलाफ आन्दोलन में है। किसान आन्दोलन की बात कर चुका है और सहकारी क्षेत्र ने इस फैसले पर देशभर में अपना विरोध जताया है। इस तरह पूरे सहकारी क्षेत्र में भाजपा सरकार के खिलाफ रोष है लेकिन यह रोष होते हुए भी प्रदेश कांग्रेस इसका लाभ नही ले पायी।
कांगड़ा बैंक के इन चुनावों में भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की ओर से यह शिकायत रही है कि प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व ने इन चुनावों को गंभीरता से नहीं लिया और न ही चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को कोई सहयोग दिया। जब आधा हिमाचल इस बैंक के कार्यक्षेत्र में आता है और इसका प्रबन्धन यहां की राजनीति को प्रभावित करता है। इस परिदृश्य में बैंक के इन चुनावों में मिली हार प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर एक बड़ा असर डालेगी। क्योंकि यह बैंक प्रदेश के 30 विधानसभा क्षेत्रों और दो लोकसभा क्षेत्रों पर सीधा असर डालता है। फिर इस समय कांगड़ा में भाजपा की गुटबाजी धवाला-पवन राणा और सरवीण चैधरी प्रकरण में खुलकर सामने आ चुकी है। कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और अब तक इतिहास भी यही रहा है कि जो दल यहां से दस सीटें जीत लेता है प्रदेश में सरकार उसी की बनती है। फिर इसका असर ऊना और हमीरपुर जिलों पर भी पड़ता है।
इस परिदृश्य में कांगड़ा बैंक के चुनावों में भी कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व पर पार्टी उम्मीदवारों को वांच्छित सहयोग न देने का आरोप लगना संगठन के भीतरी समीकरणों पर बहुत कुछ कह जाता है। बल्कि आज तक यह आरोप लगता आया है कि शिमला में बैठा नेतृत्व हमेशा कांगड़ा को कमजोर करता आया है। बल्कि कांगड़ा के अपने नेताओं पर जिले के हितों के लिये भी इकट्ठे न होने का आरोप लगता रहा है। इस समय यदि कांगड़ा से विप्लव ठाकुर, जीएसबाली, चन्द्र कुमार, सुधीर शर्मा, संजय रत्न और अजय महाजन ईमानदारी से इकट्ठे हो जायें तो उसी से प्रदेश की राजनीति बदल जाती है। क्योंकि कांगड़ा की इस एकता का सीधा प्रभाव ऊना और हमीरपुर पर पड़ता है। इस समय यदि कांग्रेस लोकसभा क्षेत्र से नेता पर सहमति बना लेती है और जिस तरह की आक्रामकता विप्लव ठाकुर ने संसद में दिखाई है यदि वही आक्रामकता प्रदेशभर में अपना ली जाये तो प्रदेश में सत्ता परिवर्तन को कोई नही रोक पायेगा। लेकिन इस समय भी जब यह आरोप लग रहे हैं कि जयराम को सबसे ज्यादा सहयोग वीरभद्र सिंह से मिल रहा है तो वहीं से कांग्रेस के भविष्य पर सवाल उठने शुरू हो जाते हैं।
शिमला/शैल। जिला शिमला के कुमारसेन क्षेत्र के भनालग महिला मण्डल में 28 जुलाई के दलित और ऊंची जाति की सदस्यों में एक विवाद खड़ा हो गया था। यह विवाद किसी समारोह में कोरोना बन्दिशो और आर्थिक साधनों की कमी के चलते स्वर्ण जाति के लोगोें को न बुलाये जाने के कारण हुआ था। समारोह में न बुलाये जाने से नाराज हुए स्वर्ण जाति के लोगों ने दलितों को महिला मण्डल से ही निकालने का फरमान सुना दिया। इस पर दोनो पक्षों मे
जुबानी जंग शुरू हो गया जो हाथापाई के मुकाम तक पहुंच गया और उसमें जातिसूचक शब्दों तक का भी प्रयोग किया गया। दलित समाज ने इसके खिलाफ स्थानीय पुलिस थाना में शिकायत भी दी लेकिन इस पर कोई कारवाई नही हुई। अन्ततः 17 सितम्बर को इन लोगों ने एसपी शिमला से भेंट कर उन्हें यह शिकायत सौंपी। शिकायत सौपनें के बाद इन सदस्यों ने मीडिया से भी बात की। शैल ने इनकी बात को स्थान दिया और पाठकों के सामने रखा जिसे 60,000 से ज्यादा पाठकों ने देखा पढ़ा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश के दलित समाज के भीतर का लावा सुलग रहा है।
भनालग प्रकरण पर जब दलित समाज की महिलाओ ने एसपी शिमला से भेंट की तब पुलिस प्रशासन हरकत
में
आया लेकिन अभी तक कोई ठोस कारवाई सामने नही आयी है। लेकिन भनालग की घटना के बाद दलितों के खिलाफ पूर्व में इसी सरकार के कार्यकाल में जो मामले घट चुके हैं वह फिर से चर्चा में आ गये हैं। इन मामलों में कर्मचन्द भाटिया द्वारा दर्ज कारवाई गयी एफआईआर से लेकर दलित नेता नरेन्द्र कुमार एडवोकेट द्वारा उठाये मामले फिर से चर्चा में आ गये हैं क्योंकि इन पर अबतक कोई प्रभावी कारवाई सामने नही आयी है। सबसे बड़ा आरोप तो यह लग रहा है कि स्कूलों में दिये जाने वाले मीड डे मील में कई स्थानों पर दलित समाज के बच्चो को स्वर्णों से अलग बैठाया जाता है। इस भेदभाव का शिकार तो दलित मन्त्री तक हो चुके हैं जब उन्हें मन्दिर में प्रवेश नहीं मिला था। स्कूलों में दलित और ऊंची जाति के बच्चों को अलग अलग भोजन परोसने के मामले कुल्लु, मण्डी ही नहीं बल्कि लगभग सभी जिलों में घट चुके हैं। ऐसे मामलों मे दलित उत्पीडन अधिनियम के तहत मामला दर्ज करवाने के लिये CRPC156 (3) के माध्यम से अदालत का भी सहारा लेना पडा है।
दलित महिलाओं के मामलो में कांगड़ा के फतेहपुर में नाबालिग लड़की के साथ हुए गैंगरेप का मामला सबसे बड़ा मामला बन गया है। इसके बाद चुराह की बिमला देवी की हत्या, दरंग की लीला देवी और उसके बेटे के साथ मारपीट सराज की उमा देवी के अपहरण का मामला ऐसे प्रकरण हैं जो सभी के लिये गंभीर चिन्ता के मामले हैं। कई स्थानों पर दलितों का स्वर्णों के मन्दिरो में प्रवेश आज भी वर्जित है। दलित और स्वर्ण एक ही रास्ते से नहीं गुजर सकते ऐसा दरंग में है और उल्लघंन करने पर देवता दलितों से बकरे की मांग करता है। स्वभाविक है कि जब इस तरह का आचरण व्यवहार होगा तो दलित समाज मेें ऐसी मानसिकता के प्रति रोष और घृणा एक साथ उभरेंगे। लेकिन हैरानी इस बात की है कि सरकार का महिला सशक्तिकरण और समाज कल्याण विभाग ऐसे मामलों का गंभीरता से संज्ञान नहीं ले रहा है जबकि वह उसके अधिकार और कर्तव्य क्षेत्र में आता है।
ऊना का एक मामला रविदास समाज को लेकर विधानसभा के इस सत्र में विधायक राकेश सिंघा एक प्रश्न के माध्यम से उठा चुके हैं। इसमें अदालत के आदेश के बावजूद इन लोगों के खिलाफ बनाये गये आपराधिक मामलों को वापिस नहीं लिया जा रहा है। यह स्वभाविक है कि जब प्रशासन इस तरह करेगा तो इस समाज में रोष और बढ़ेगा ही। सिरमौर मेे एक वकील की हत्या का प्रकरण भी अभी तक किसी मुकाम तक नहीं पहुंचा है।





प्रदेश में 261423 हैं गरीब परिवार
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कई संपन्न राजपत्रित व्यक्ति भी बी पी एल कोटे में शामिल मिले हैं और इसकी योजनाओं का लाभ उठाते हुये सस्ता राशन तक लेते रहे हैं। जैसे ही यह जानकारी सामने आई तब सारे संबद्ध विभाग इस बारे में सजग और सक्रीय हुये। ऐसे लोगों की सूची जारी हुई और इन लोगो के खिलाफ कारवाई शुरू हुई। लेकिन बी पी एल योजना के इस दुरूपयोग से पूरी व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गये हैं। क्योंकि ऐसे भी कई मामले सामने आये हैं जहां सही में गरीब लोगों को बी पी एल में आने के लिये लम्बा संघर्ष भी करना पड़ा है। पिछले दिनों सरकार ने दावा किया था कि उसने एक लाख लोगों को बी पी एल से संपन्न लोगों की लाईन में लाने मे सफलता हासिल की है। इस संद्धर्भ में बी पी एल की पूरी चयन प्रक्रिया पर नजर डालना और इसके लिये तय मानकोे का आकलन करना आवश्यक हो जाता है।
बी पी एल चयन के लिये तेरह मानक तय किये गये हैं। इन सामान्य आर्थिक मानको के आधार पर परिवारों का सरक्षण किया जाता है और प्रत्येक मानक के लिये चार अंक दिये जाते हैं। यह तेरह मानक हैः
1. Size group of operational holding of land (क्रियाशील जोत की भूमि का आकार समूह)
2. Type of house (मकान का प्रकार)
3. Average availability of normal wear clothing (सामान्यतःपहनने के कपड़ों की उपलब्धता)
4. Food security (भोजन की सुनिश्चितता)
5. Sanitation (स्वच्छता)
6. Ownership of consumer durables (उपभोक्ता चिरस्थायी सामान का स्वामित्व)
7. Literacy status of the highest literate adult (उच्चतम साक्षर व्यस्क की साक्षरता की स्थिति)
8. Status of the household labour force (परिवार मजदूर बल की स्थिति)
9. Means of livelihood (आजीविका का साधन)
10. Status of Children (बच्चोें की स्थिति)
11. Type of indebtedness (ऋण की किस्म)
12. Reason for migration from household (परिवार में प्रवास का कारण)
13.Preference of assistance (सहायता की प्राथमिकता)
विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देश में यह भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि निम्न श्रेणी के परिवारों को (Exclusion Criteria) बी0पी0एल0 सूची में शामिल न किया जाएः- ऐसे परिवार जिनके पास 2 हैक्टेयर से ज्यादा असिंचित भूमि या 1 हैक्टेयर से ज्यादा सिंचित भूमि हो। ऐसे परिवार जिनके पास बडे़ आकार का पक्का घर हो। ऐसे परिवार जो आयकर देते हों। ऐसे परिवार जिनके पास चार पहिया वाहन जैसे कि कार, मोटर, जीप, टैªैैैक्टर, ट्रक और बस इत्यादि हों। ऐसे परिवार जिनकी वेतन, पैंशन, मानदेय, मजदूरी, व्यवसाय इत्यादि से नियमित मासिक आय मु0 2500/- रू0 से अधिक हो। परिवार से कोई सदस्य सरकारी नौकरी अथवा गैर सरकारी नौकरी में नियमित तौर पर या अनुबन्ध पर कार्यरत हो। विभाग द्वारा जारी अधिसूचना 13-07-2018 के संदर्भ में प्रत्येक बी0पी0एल0 परिवार के मुखिया से सादे कागज पर स्वयंसत्यापित करके उपरोक्त Exclusion Criteria पर ग्राम पंचायत में घोषणा पत्र दिये जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त हर वर्ष अप्रैल माह में होने वाली ग्राम सभा की प्रथम बैठक में ग्राम पंचायत की बी0पी0एल0 सूची की समीक्षा करने का निर्णय लिया गया है । बी0पी0एल0 में परिवारों का चयन हेतु ग्राम सभा स्वयं सक्षम है और चयन में मापदण्ड की अवहेलना के संदर्भ में विभाग के दिशा-निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है किःग्राम सभा द्वारा किये गये बी0पी0एल0 परिवारों के चयन बारे यदि कोई शिकायत अथवा आपत्ति हो तो एक माह के भीतर सम्बन्धित उपमण्डलाधिकारी (नागरिक) के पास अपील दायर की जा सकती है । उपमण्डलाधिकारी (नागरिक) के निर्णय से असंतुष्ट होने पर एक मास के भीतर उपायुक्त के पास आगामी अपील दायर की जा सकती है। गलत चयन से सम्बन्धित शिकायत मामलों में भी उपमण्डलाधिकारी (नागरिक) जांच उपरान्त ऐसे परिवारों के नाम बी0पी0एल0 सूची से काटने के आदेश जारी कर सकते हैं। यदि किसी मामले में जारी किया गया बी0पी0एल0 प्रमाण पत्र झूठा/गलत पाया जाता है तो उस स्थिति में सम्बन्धित पंचायत सचिव/पंचायत सहायक/ पंचायत प्रधान के विरूद्ध दण्डनीय कार्रवाई की जायेगी तथा जो व्यक्ति ऐसे प्रमाण पत्र का लाभ प्राप्त करेगा उसे सेवा से बर्खास्त किया जाएगा तथा उसके विरूद्व नियमानुसार आपराधिक मामला दर्ज किया जायेगा। सरकार के यह बी पी एल के मानक लम्बे समय से चलन में हैं लेकिन इस योजना के साथ मनरेगा योजना भी चलन में है और अब इसे शहर क्षेत्रों के लिये भी बढ़ा दिया गया है। इस योजना के तहत प्रत्येक व्यक्ति के वर्ष में 120 दिन का रोजगार सुनिश्चित है। इसमें दो सौ रूपये प्रति मजदूरी मिलता है। इस तरह मनरेगा में काम करने वाले मजदूर 1000 रूपये महीने के कमा लेते हैं और हजार कमाने वाला बी पी एल मानको में नही आता। फिर हा भूमिहीन का कम से कम दस कनाल(एक एकड़) जमीन बहुत पहले ही सरकारी योजना के तहत दी जा चुकी है। इस तरह मनरेगा में काम करने मासिक आय और एक एकड़ भूमि का मालिक होने के नाते क्या बी पी एल मानको में बाहर नही हो जाते हैं। जबकि व्यवहार में वह सही में ही बहुत गरीब है। यदि दो हैक्टेयर और एक हैक्टेयर के मानक पर चला जाये तो एक हैक्टेयर 25 कनाल का होता है। हिमाचल में बहुत कम परिवार होंगे जिनके पास 25 कनाल में सिंचाई होती होगी या वह 50 कनाल भूमि के मालिक होंगे। भूमि के इन मानक के आधार पर तो प्रदेश के आधे से भी ज्यादा लोग बी पी एल परिवार में आ जायेंगे। ऐसे में इन मानकों की नये सिरे से समीक्षा की जानी चाहिये।
कोरोना काल में
शिमला/शैल। कोरोना के कारण जब 24 मार्च को लाॅकडाऊन लगाकर पूरे देश को घरों में बन्द कर दिया गया था तब ऐसा करने की कोई पूर्व सूचना नही दी गयी थी। लेकिन इस घरबन्दी का किसी ने विरोध नही किया क्योंकि यह प्रधानमन्त्राी का आदेश-निर्देश था और जनता उन पर विश्वास करती थी। इसी विश्वास पर लोगों ने ताली/थाली बजाई, दीपक जलाये और ‘गो कोरोना गो’, के नारे लगाये इन सारे प्रयासों के बाद भी कोरोना समाप्त नही हुआ है। बल्कि आज इतना बढ़ रहा है कि यह कहना संभव नही रह गया है कि इसका अन्तिम आंकड़ा क्या होगा और इससे छुटकारा कब मिलेगा। जब लाॅकडाऊन किया गया था तब इसका आंकड़ा केवल पांच सौ था और जब कई लाखों में पहंुच गया तब अनलाॅक शुरू कर दिया। अब अनलाॅक चार चल रहा है और सारे प्रतिबन्ध हटा लिये गये हैं। लाॅकडाऊन लगाने का तर्क था कि सोशल डिस्टैसिंग की अनुपालना करने से इसके प्रसार को रोका जा सकता है। सोशल डिस्टैन्सिंग एक अचूक हथियार हमारे प्रधानमन्त्री खोज लाये हैं जिस पर अन्तर्राष्ट्रीय जगत भी प्रंशसक बन गया है ऐसे कई दावे कई विदेशीयों के कथित प्रमाण पत्रों के माध्यम से किये गये थे। देश की जनता ने इस सबको बिना कोई सवाल किये मान लिया। अब अनलाक शुरू करने पर तर्क दिया गया कि आर्थिक गतिविधियों को लम्बे समय तक बन्द नहीं रखा जा सकता। लाकडाऊन का अर्थ व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। सरकार को राजस्व नही मिल रहा है। इन तर्कों को भी जनता ने बिना कोई प्रश्न किये मान लिया। लाकडाऊन में सारे शिक्षण संस्थान और धार्मिक स्थल बन्द कर दिये गये थे। इन्हें अब खोल दिया गया है। धार्मिक स्थलांें में बच्चों और बजुर्गों के जाने पर अभी भी प्रतिबन्ध है।
स्कूलों को खोल दिया गया है। अध्यापक और गैर शिक्षक स्टाफ स्कूल आयेंगे। लेकिन सभी एक साथ नही आयेंगे। आधा स्टाफ एक दिन आयेगा तो आधा दूसरे दिन आयेगा। कोई भी क्लास नियमित नही लगेगी। कक्षा नौंवी से बाहरवीं तक के छात्र स्कूल आयेंगे। यदि वह चाहें और उनके अभिभावक अनुमति दें। अभिभावकों की अनुमति के बिना छात्र स्कूल नहीं आयेंगे। स्कूल आकर वह अध्यापक से केवल मार्ग दर्शन ले सकेंगे रैग्युलर पढ़ाई नही होगी। स्कूलों के लिये जारी इन निर्देशों का अर्थ है कि बच्चों की जिम्मेदारी माता-पिता की ही होगी। सरकार और स्कूल प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। कोरोना का सामुदायिक प्रसार बढ़ रहा है यह लगातार बताया जा रहा है। इस महामारी की कोई दवा अभी तक नहीं बन पायी है और यह भी निश्चित नही है कि कब तक बन पायेगी। ऐसी वस्तुस्थिति में बच्चों को लेकर इस तरह के निर्देश जारी करने का क्या यह अर्थ नही हो जाता है कि सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से हाथ खींच लिये हैं और लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। जब संक्रमण बढ़ रहा है और दवाई कोई है नहीं तब कोई कैसे जोखिम उठाने की बात सोच पायेगा। जनता आज तक सरकार के हर फैसले को स्वीकार ही नहीं बल्कि उस पर विश्वास करती आयी है लेकिन आज जब सरकार जनता को उसके अपने हाल पर छोड़ने पर आ गयी है तब उसकी नीयत और नीति दोंनोे पर सवाल करना आवश्यक हो जाता है।
जब से कोरोना सामने आया है तभी से डाक्टरों का एक वर्ग इसे साधारण फ्लू बता रहा है। इसी वर्ग ने इसे फार्मा कंपनीयों का अन्तर्राष्ट्रीय षडयंत्र कहा है। जब किसी बिमारी को महामारी की संज्ञा दी जाती है तो ऐसा कुछ अध्ययनों के आधार पर किया जाता है। लेकिन कोरोना को लेकर ऐसा कोई अध्ययन सामने नही हैं। कारोना चीन ने फैलाया यह आरोप लगा है लेकिन अमरीका में बिल गेट्स ने ऐसी महामारी की घोषणा तीन साल पहले ही किस आधार पर कर दी थी पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। अमेरिका और चीन एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे और बाकि लोग इसी बहस का हिस्सा बनते रहे। किसी बीमारी का ईलाज खोजने के लिये उस बीमारी की गहन पड़ताल करनी पड़ती है इस पड़ताल के लिये मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाता है। लेकिन हमारे यहां ऐसा नही किया गया। हमारे स्वास्थ्य मन्त्री स्वयं एक अच्छे डाक्टर हैं और वह जानते हैं कि पोस्टमार्टम कितना आवश्यक होता है दवाई खोजने के लिये फिर डा. हर्षवर्धन तो स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक पदाधिकारी हैं। क्या देश को यह जानने का हक नही है कि पोस्टमार्टम क्यांे नहीं किये गये। क्या इसके बिना कोई दवाई खोज पाना संभव है? क्या अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर यह सवाल हमने उठाया है शायद नहीं क्या कोरोना को लेकर लिये गये आज तक के सारे फैसले अन्तः विरोधी नही रहे हैं। इसी अन्त विरोध का परिणाम है स्कूलों और बच्चों को लेकर लिया गया फैसला। ऐसा अन्तः विरोध तब आता है जब हम स्वयं स्थिति को लेकर स्पष्ट नही होते हैं। कुछ छिपाना चाहते हैं। कोरोना से पहले प्रतिवर्ष कितनी मौतें देश में होती रही है। यह केन्द्र सरकार के गृह विभाग की रिपोर्ट से सामने आ चुका है। 2015, 16 और 2017 तक के आंकड़े इस रिपोर्ट में जारी किये गये हैं। इसके मुताबिक 2017 में देश में 64 लाख से अधिक मौतें हुई हैं। हिमाचल का आंकड़ा ही चालीस हजार रहा है। क्या इस आंकड़े के साथ कोरोना काल के आकंड़ो की तुलना नही की जानी चाहिये। क्या इससे यह स्वभाविक सवाल नही उठता है कि शायद सच्च कुछ और है। आज अर्थव्यवस्था पूरी तरह तहस नहस हो चुकी है। अनलाक चार में भी बाज़ार 30ः से ज्यादा नही संभल पाया है और इसे सामान्य होने में लंबा समय लगेगा। क्योंकि सरकार का हर फैसला आम आदमी के विश्वास को बढ़ाने की बजाये उसके डर को बढ़ा रहा है। यह स्थिति आज आम आदमी को भगवान भरोसे छोड़ने की हो गयी है। यह विश्वास तब तक बहाल नहीं हो सकेगा जब तक सरकार यह नही मान लेती है कि उसके आकलन सही साबित नहीं हुए हैं।
आज कोरोना पर जब सरकार के निर्देश ही भ्रामकता और डर को बढ़ावा दे रहे हैं तो आम आदमी इस पर स्पष्ट कैसे हो पायेगा। जब बिना दवाई के ही इसके मरीज़ ठीक भी हो रहे हैं और इससे संक्रमित डाक्टरों की मौत भी हो रही है तब ऐसी व्यवहारिक सच्चाई के सामने आम आदमी एक सही राय कैसे बना पायेगा। क्योंकि यह भी सच है कि अकेले कोरोना से ही मरने वालों का आंकड़ा तो नहीं के बराबर है। ऐसे में यही उभरता है कि जब किसी अन्य बिमारी से ग्रसित व्यक्ति कोरोना से भी संक्रमित हो जाता है तब उसका बच पाना कठिन हो जाता है। यहां यह भी कड़वा सच है कि लाकडाऊन शुरू होते ही अस्पतालों में अन्य बिमारीयों के ईलाज पर विराम लग गया था। इस विराम का अर्थ था कि इन मरीजों को भगवान और उनके अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। आज ठीक उसी बिन्दु पर सरकार और प्रशासन आ खड़ा हुुआ है जब उसने बच्चों का स्कूल आना माता-पिता की स्वेच्छा पर छोड़ दिया है। इस स्वेच्छा के निर्देश से पूरी व्यवस्था की विश्वनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। ऐसे में यह ज्यादा व्यवहारिक होगा कि सरकार कोरोना को एक सामान्य फ्लू मानकर जनता में विश्वास बहाली का प्रयास करे।