केन्द्र राज्यों को उनका हिस्सा देने में असमर्थ हो गया है। राज्य इसके लिये सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर विवश हो गये हैं। सांसदो/विधायकों की क्षेत्र विकास निधि रद्द कर दी गयी है। लेकिन मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर जिस तरह से प्रदेश के विभिन्न भागों मेें दौरा करकेे हजारों करोड़ की योजनाएं घोषित कर चुके हैं उनसे यह कतई आभास नहीं होता है कि प्रदेश में किसी तरह का कोई वित्तय संकट चल रहा है। मुख्यमन्त्री की इन घोषणाओं का पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायकों पर गंभीर असर हुआ है। बल्कि एक बार दोनों ओर के विधायक इसके लिये विधानसभा सत्र बुलाने के लिये सांझा पत्र लिखने की कवायद भी कर चुके हैं। इस पर सत्ता पक्ष के विधायकों पर नाराज़गी भी व्यक्त की जा चुकी है। लेकिन अब जब विधानसभा का सत्र होने ही जा रहा है तो उसमें यह मुद्दा प्रमुख रूप से उठने की संभावना है। नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने एक ब्यान जारी करके विधायक निधि तुरन्त बहाल करने ही मांग की है। इस ब्यान से ही स्पष्ट हो जाता है कि इस बार सदन में यह मुद्दा उठेगा ही।शिमला/शैल। राज्य के स्टाफ को लागू होने वाले जनवरी 2016 से संशोधित वेतनमानों पर सरकार से शीघ्र गंभीरता से विचार कर फैसला लेने की मांग करते हुए हिमाचल प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी सेवाएं महासंघ के नेताओं ने कहा है कि देश में 10 वर्ष की अवधि के बाद वेतन आयोग का गठन होता है और उसके उपरांत आयोग देश के हर राज्य का बजटीय प्रावधान, राजस्व आय व्यय और वहां की जनसंख्या अनुपात जैसे विषयों के आकलन करने के उपरांत वेतनमानों के संशोधन की सिफारिश सरकार को देता है और सरकार आयोग की उन सभी सिफारिशों का आकलन कर रिपोर्ट को वैधानिक रूप से लागू करने की स्वीकृति देती है। केंद्र की मोदी सरकार ने 2016 के वेतन आयोग की रिपोर्ट को समय पर लागू करने के लिए पहले ही बजट में अग्रिम प्रावधान कर लिया था ताकि तय और देय समय पर देश का कर्मचारी वर्ग संशोधित वेतनमानो का लाभ उठा सकें, लेकिन हिमाचल का कर्मचारी वर्ग संशोधित वेतनमान लागू होने का पाँच साल से इन्तजार कर रहा है।
महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष विनोद कुमार, महासचिव गीतेश पराशर,जिला शिमला के अध्यक्ष गोबिन्द बरागटा महासचिव विनोद शर्मा वरिष्ठ उपाध्यक्ष संत राम शर्मा उपाध्यक्ष शालिग राम चौहान अतिरिक्त महासचिव एल डी चौहान ने कहा है कि हिमाचल का कर्मचारी वर्ग संशोधित वेतनमानो को लेकर केंद्रीय सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर रहा है और इस बारे लिखित रूप में सरकार को एक साल पहले दिए गए ज्ञापन पर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से भी चर्चा की गई है तथा प्रदेश के मुख्य सचिव अनिल खाची जी जो उस समय वित विभाग को देख रहे थे से भी लम्बी चर्चा हुई है और इस पर सरकार ने कार्य शुरू कर दिया था लेकिन वैश्विक महामारी कोरोना के कारण पैदा हुए विपरीत हालातों के चलते इसमें व्यवधान उत्पन्न हुऐ है,और इन परिस्थितियो में कर्मचारी वर्ग ने सरकार को हर सम्भव सहयोग किया है लेकिन वेतन आयोग की रिपोर्ट को केंद्र और अन्य राज्यों की तर्ज पर प्रदेश में लागू होना और करवाना यह प्रदेश के कर्मचारीयों का अधिकार है। महासंघ नेताओं ने कहा है कि यदि कोई संघ केन्द्रीय वेतनमान से सहमत नहीं है तो वह अपने विभाग और संस्था के लिए पंजाब वेतनमान का अलग से विकल्प दे सकता है। महासंघ नेताओं ने कहा कि पंजाब में अकाली भाजपा सरकार ने नवम्बर 2015 में वेतन आयोग की घोषणा कर दी थी लेकिन पंजाब की कैप्टन अमरेन्द्र सरकार अभी तक किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंची है और असमंजस में है, इसलिए जब मोदी सरकार देश मे राष्ट्रीय भर्ती नीति लागू कर रही है तो राष्ट्रीय वेतन नीति भी लागू हो जिस बारे मुख्यमंत्री शीघ्र फैसला ले। विनोद कुमार ने कहा है कि यदि किसी वर्ग के पदों के वेतन में कोई भिन्नता आती है तो उस विसंगति का निवारण 2.56 के फार्मूले से स्वत ही हो जाएगी।
शिमला/शैल। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना के तहत कोरोना काल में केवल 100 दिन का ही रोजगार गांव के लोगों को मिल पा रहा है। केन्द्र सरकार ने मनरेगा के तहत वर्ष 2019-2020 में 71000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया था। लेकिन वर्ष 2020 -21 के बजट में इसे घटाकर 61000 करोड़ कर दिया था। परन्तु जब 24 मार्च को कोरोना के कारण लाकडाऊन लगाया गया था तब देशभर में प्रवासी मजदूरों की समस्या खड़ी हो गयी थी। करोड़ो लोगो का रोज़गार छीन गया था। यह लोग अपने-अपने पैतृक स्थान को वापिस आने के लिये बाध्य हो गये थे। प्रवासी मजदूरों को अपने घर गांव में ही रोज़गार देने के लिये जब 20 लाख करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा की गई थी तब मनरेगा के लिये दस हजार करोड़ रूपये का और प्रावधान कर दिया गया था।
मनरेगा का प्रावधान बढ़ाने के साथ ही यह घोषणा की गयी थी कि प्रवासी मजदूरों को रोज़गार का संकट नही आने दिया जायेगा और उनको मनरेगा के तहत काम दिया जायेगा। लेकिन सरकार की इस घोषणा के बाद का व्यवहारिक सच यह है कि मनरेगा के तहत पहले 120 दिन का रोजगार मिलता था जो कि अब केवल 100 दिन का ही रहा गया है। इसमें दैनिक मजदूरी भी 198 रूपये ही मिल रही है। 100 दिन का यह रोजगार भी पूरे परिवार को मिल रहा है भले ही परिवार में काम की आवश्यकता चार लोगों को हो। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मनरेगा में हर प्रभावित प्रवासी को रोजगार मिल जायेगा इस दावे की कथनी और करनी में दिन रात का अन्तर है। बल्कि इसका व्यवहारिक सच यह है कि जो रोजगार पहले एक आदमी को मिलता था अब वही काम चार आदमीयों में बांटकर हरेक के हिस्से में केवल 25-25 प्रतिशत ही रह गया है। इसी तरह रसोई गैस सिलैण्डर पर मिलने वाला अनुदान बंद होने से सभी लोग इससे प्रभावित हो गये हैं जबकि एक समय लोगों को मुफ्त रसोई गैस का सिलैण्डर और चूल्हा देकर इसके प्रति आकर्षित किया गया था। परन्तु अब सभी उपभोक्ता इससे प्रभावित हो रहे हैं।
शिमला/शैल। जब से पूर्व मन्त्री विजय सिंह मनकोटिया ने गृहमन्त्री से लेकर मुख्यमन्त्री तक को एक पत्र लिखकर कांग्रेस से जयराम के एक सहयोगी मन्त्री पर जमीने खरीदने के आरोप लगाये हैं तबसे प्रदेश भाजपा के भीतर ही में तूफान खड़ा हो गया है। मन्त्री पर जो आरोप लगाये गये हैं उन आरोपों पर जांच को लेकर अधिकारिक रूप से अभी तक सरकार की ओर से कुछ नही कहा गया है और न ही विजिलैन्स को कोई मामला भेजा गया है लेकिन इसके बावजूद इस मामले का संज्ञान हाईकमान ने ले लिया है क्योंकि मनकोटिया ने शिकायत पत्र प्रधानमन्त्री को न भेजकर गृहमन्त्री अमितशाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को भेजा है और यहीं से इसके पीछे की सारी राजनीतिक रणनीति स्पष्ट हो जाती है।
मनकोटिया के
आरोपों का इंगित सरवीण चौधरी है और सरवीण ने भी इस इंगित को यह कहकर स्वीकार कर लिया है कि मेरी जमीने तो सबको नजर आ रही है लेकिन वह चेहरे नजर नही आ रहे हैं जिन्होंने एक मंजिला भवन को चार मंजिला कर लिया है। सरवीण ने शिमला में मुख्यमन्त्री सहित कई नेताओं से इन आरोपों को लेकर अपना पक्ष रखने का प्रयास किया लेकिन जब इस पर कोई ज्यादा बात नही बनी तब यह दिल्ली चली गयी। दिल्ली में सरवीण ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात करके अपने पक्ष को रखा और यह भी बताया कि चार मंजिला भवन वाला नेता कौन है। दिल्ली में सरवीण के इस खुलासे के बाद जो खेल शुरू हुआ उसके बाद प्रदेश के सबसे ताकतवर मन्त्री ठाकुर महेन्द्र सिंह को तलब कर लिया गया। महेन्द्र सिंह जिला शिमला के अपने सारे कार्यक्रम रद्द करके दिल्ली चले गये और उनके जाने से अखबारों का बाज़ार और गर्म हो गया।
सरवीण चौधरी प्रदेश की शहरी विकास मन्त्री रही है। इस नाते प्रदेश के किस नगर क्षेत्र मे किस राजनेता या अधिकारी का कोई होटल या अन्य भवन बना है इसकी जानकारी स्वभाविक रूप से उन्हें होगी ही। फिर बहुत सारे मामले तो प्रदेश उच्च न्यायालय, एनजीटी से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जा चुके हैं। इन्ही मामलों में महेन्द्र सिंह के होटल का मामला भी शामिल है जो की एनजीटी से होकर अब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है।
महेन्द्र सिंह जयराम मन्त्री मण्डल में सबसे वरिष्ठ और अनुभवी मन्त्री हैं। इसी अनुभव के कारण वह जयराम के सबसे ज्यादा भरोसेमन्द भी माने जाते हैं। जयराम का भरोसेमन्द होने के कारण वह विरोधीयों के निशाने पर भी सबसे पहले आ गये हैं। 2018 से ही उनके ऊपर नजर रखी जा रही है। इन्हीं नजरों का परिणाम था कि मण्डी जिला परिषद के सदस्य भूपेन्द्र सिंह ने 5 फरवरी 2018 से 19 जुलाई 2019 तक के उनके कार्यकाल को लेकर आरटीआई के माध्यम से यह सूचना सार्वजनिक की। उन्होने इस दौरान 340 दिन क्षेत्र का भ्रमण किया और इस भ्रमण के दौरान 1800 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से खाने का खर्च 6 लाख 23 हज़ार रूपये सरकार से वसूल किया फील्ड में उनको खाने का प्रबन्ध जनता या अधिकारी कर रहे थे। इसी भ्रमण का 11.53 लाख यात्रा भत्ते के रूप में वसूल किये। इसी दौरान उनकी 26 जनवरी से 31 जनवरी के बीच हुई ईज़रायल यात्रा के 3.45 लाख के खर्च पर भी सवाल उठाया गया है। इसी दौरान उनके कुछ नियुक्तियों को लेकर जारी किये गये सियासी पत्र भी मुद्दा बनाये गये थे। महेन्द्र अब राजनीति में अपने बेटे और बेटी को भी स्थापित करने के जुगाड़ में लग गये हैं यह आरोप भी क्षेत्र में उन लोगों द्वारा लगाया जा रहा है जिनकी निष्ठाएं संघ के साथ हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी के भीतर ही एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ सुनियोजित ढंग से काम कर रहा है।
वैसे तो जयराम मन्त्रीमण्डल के कुछ अन्य मन्त्रीयों के खिलाफ समय समय पर पत्र बम वायरल होते रहे हैं। लेकिन इन सारी चीजों को अब तक नजरअन्दाज किया जाता रहा है। स्वास्थ्य विभाग की खरीददारीयों पर लगे आरोपों के कारण ही विपिन परमार को स्वास्थ्य मन्त्री से हटाकर विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया और डा. राजीव बिन्दल को हटाया गया। लेकिन इस सबका परिणाम आज सरवीण चौधरी के तेवरों की तल्खी के रूप में सामने आने लग गया है। क्योंकि जमीन खरीद के जो आरोप लगाये गये हैं उनमें यह नही बताया गया है कि इसमें गैर कानूनी क्या है। क्योंकि जमीन खरीद के मामलों में सामान्यतः यही देखा जाता है कि बेचने वाला भूमिहीन तो नही हो रहा है। जमीन बेचने के बाद उसका आय का क्या साधन रह जाता है। क्या खरीदने वाले के पास वैध साधन थे या नहीं। लैण्डसिलिंग से ज्यादा जमीन तो नही हो रही है। सर्कल रेट की अनदेखी तो नही हुई है। ऐसा कोई आरोप लगाया नही गया है और न ही ऐसी कोई जांच आदेशित की गयी है। ऐसे में सरवीण चौधरी पर लगे उसी संज्ञान में आयेंगे जैसे पत्र बम्बों में लगे आरोप थे। बल्कि अदालत तक पहुंच चुके मामले इनसे ज्यादा गंभीर हो जाते हैं।
इस परिदृश्य में जयराम सरकार के लिये यह स्थिति एक गंभीर मुद्दा बन गयी है। क्योंकि यदि सरवीण के खिलाफ लगे आरोपों पर कोई कारवाई की जाती है तो उसी गणित से अन्यों पर लगे आरोपों में भी वही कारवाई करनी पड़ेगी। यदि इन आरोपों पर नजरअन्दाजी की रणनीति अपनाई जाती है तब सरकार पर भ्रष्टाचार से समझौता करने का आरोप लगेगा। विपक्ष निश्चित रूप से अब हमलावर रहेगा और विपक्ष के खिलाफ आक्रामकता अपनाना शायद अब जयराम सरकार के बस में नही रह गया है। फिर संगठन में भी जिस तरह से कुछ लोगों के खिलाफ गाज गिराई गयी और कुछेक ने स्वयं अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया है उससे यही संदेश गया है कि भाजपा में सबकुछ अच्छा नही चल रहा है।