तीन बड़े अधिकारी प्रबोध सक्सेना, सुतनु बेहुरिया और देवेश कुमार भी है लाभार्थियों में शामिल
शिमला/शैल। कोई भी गैर कृषक गैर हिमाचली प्रदेश में सरकार की पूर्व अनुमति के बिना जमीन नही खरीद सकता है। प्रदेश के राजस्व और भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत यह बंदिश लगाई गयी है। लेकिन जब से प्रदेश की उद्योग नीति में बदलाव करके औद्योगिक निवेश को आमंत्रित किया जाने लगा है तभी से धारा
118 के प्रावधानो की उल्लंघना के मामले चर्चित होने लगे हैं। इन्ही प्रावधानों के कारण बेनामी खरीद तक का सहारा लिया गया। इस तरह की खरीद 1990 के शान्ता शासन में होने के आरोप लगे और वीरभद्र ने इस पर एस एस सिद्धु की अध्यक्षता मे जांच बैठायी। इसके बाद भाजपा शासन में आर एस ठाकुर और फिर जस्टिस डी पी सूद की अध्यक्षता मे जांच बिठाई गयी। वीरभद्र के 2003 से 2007 के शासन के दौरान हुई खरीद पर यहां तक आरोप लगे कि चुनाव आचार सहिंता लगने के बाद भी धारा 118 की अनुमतियां दी गई और चुनाव परिणाम आने के बाद तक भी यह अनुमतियां दी गई जब सरकार हार गई हुई थी। इस राजनैतिक नैतिकता से हटकर इन अनुमतियों पर धारा 118 के प्रावधानों की गंभीर उल्लंघना के आरोप लगे हैं। यहां तक की तीन वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी प्रबोध सक्सेना, सुतनु बेहुरिया और देवेश कुमार के खिलाफ भी आरोप लगे। ऐसे कई मामले विधान सभा पटल पर उल्लंघनाओं के ब्योरे सहित रखे गये थे। लेकिन किसी भी मामले में केवल प्रियंका गांधी वाड्रा को छोड कर कोई कारवाई नही हुई है। अब जब जयराम सरकार 92 हजार करोड़ के निवेश को अमली शक्ल देने का प्रयास करेगी तब उस पर ऐसे आरोप लगेंगे यह तय है। ऐसे में सरकार को इस संबंध में विपक्ष के साथ बैठ कर एक स्थायी नीति बनानी चाहिये ताकि भविष्य मे ऐसे मामलों पर विराम लग सके। क्योंकि आज स्थिति यह है कि भू- सुधार अधिनियम की धारा 118 की उल्लघंना दण्डनीय अपराध है। और विधान सभा पटल पर सारा खुलासा आने से बड़ा कोई साक्ष्य नही हो सकता। इस परिदृश्य में यह 97 मामले सरकार के लिये एक कड़ी परीक्षा सिद्ध होंगे यह तय है।

शिमला/शैल। क्या तीसरे राजनीतिक दल प्रदेश में अपने लिये कोई स्थान बना पायेंगे यह सवाल इन दिनों फिर उठने लगा है क्योंकि आम आदमी पार्टी, हिमाचल स्वाभिमान पार्टी, हिमाचल जन क्रांति पार्टी और एक समय आम आदमी पार्टी की हिमाचल ईकाई के अध्यक्ष रह चुके पूर्व सांसद डा. राजन सुशांत ने भी घोषणा की है कि वह आने वाले नवरात्रों में एक राजनीतिक दल का गठन करेंगे। इस परिप्रेक्ष में यह आकलन करना महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में क्या भाजपा और कांग्रेस से सत्ता छीनने में सफल हो पायेंगे? क्या सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर पायेंगे? या फिर कांग्रेस या भाजपा में से किसी एक दल को सत्ता से बाहर रखने में अपनी कारगर भूमिका निभायेंगे? इनमें से यदि किसी एक मकसद में भी यह लोग सफल हो जाते हैं तो इनके गठन को सार्थक माना जायेगा अन्यथा नहीं। प्रदेश के गठन से लेकर अब तक राज्य की सत्ता पर कांग्रेस या भाजपा का ही कब्जा रहा है। यही नहीं है कि इससे पहले कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनने के प्रयास न किये गये हों। यह भी नही है कि कांग्रेस या भाजपा के शासन में प्रदेश समस्याओं से मुक्त हो गया हो। लोकराज पार्टी से लेकर हिलोपा तक राजनीतिक विकल्प बनने के बहुत प्रयास हुए हैं। इन प्रयासों में मेजर विजय सिंह मनकोटिया, प.सुखराम और महेश्वर सिंह जैसे नाम विशेष उल्लेखनीय रहे हैं। लेकिन अन्त में आज सब शून्य होकर खड़े हैं। शून्य होने के सबके अपने -अपने कारण रहे हैं लेकिन ऐसा भी नहीं रहा है कि प्रदेश की जनता ने इनके प्रयासों को पहले दिन ही नकार दिया हो। सबको विधानसभा के पटल तक पहुंचाया लेकिन वहां पहुंचने के बाद यह लोग जनता में अपने को प्रमाणित नही कर पाये। इसलिये आज जब कोई कांग्रेस या भाजपा का विकल्प होने का प्रयास करेगा तो उसे प्रदेश के पूर्व राजनीतिक इतिहास का ज्ञान रखना आवश्यक हो जाता है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प 1977 में जनता पार्टी तब बन पायी थी जब जनसंघ सहित वाम दलों को छोड़ अन्य सभी दलों ने अपने को जनता पार्टी में विलय कर दिया था। 1977 में देश की जनता ने यह इतिहास रचा था जिसे 1980 में ही राजनीतिक नेतृत्व ने तोड़ कर रख दिया था। क्योंकि जनता पार्टी के प्रमुख घटक जनसंघ ने अपनी त्ैै की सदस्यता जारी रखी और इसी दोहरी सदस्यता के नाम पर जनता पार्टी की सरकार टूट गयी। जनसंघ का नया नाम भारतीय जनता पार्टी हो गया। 1980 के बाद 1989 में फिर प्रयास हुआ। भाजपा से अलग दलों ने जनता दल का गठन किया और एक बार फिर भाजपा जनता दल की सरकारें बन गयी लेकिन तब फिर आर एस एस का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आरक्षण के विरूद्ध आन्दोलन के रूप में सामने आया जो अन्त में राम मन्दिर आन्दोलन बना और इसमें चार राज्यों की सरकारें बलि चढ़ गयी। इस तरह जब-जब कांग्रेस का विकल्प खड़ा करने के प्रयास हुए और उन प्रयासों का नेतृत्व अकेले भाजपा के हाथ नहीं आया तब-तब उन प्रयासों को विफल करने में भाजपा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है क्योंकि इसका नियन्त्रण त्ैै के पास रहा। आज पहली बार है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार को लेकर समय-समय पर उछाले गये नोरों के परिणामस्वरूप भाजपा केन्द्र की सत्ता पर काबिज हुई है कि उसे अब किसी भी अन्य दल के सहारे की आवश्यकता नही रही है। जो भी व्यक्ति संघ का स्वयं सेवक रह चुका है वह भले ही किसी भी अन्य दल में क्यों न हो इसकी पहली निष्ठा संघ के प्रति ही रहती है। इस परिदृश्य में आज जब केन्द्र की सत्ता पर भाजपा का कब्जा चल रहा है तो इसी कब्जे को राज्यों तक ले जाने की दिशा में राज्यों में सरकारें गिराने की रणनीति पर अमल किया जा रहा है। इस समय जिस तरह का आर्थिक परिदृश्य देश में निर्मित हो गया है उससे राज्यों की केन्द्र पर निर्भरता एक अनिवार्यता बनती जा रही है। क्योंकि हर राज्य पर कर्ज का बोझ उसके संसाधनों से कहीं अधिक बढ़ चुका है और दुर्भाग्य से केन्द्र भी इसी स्थिति में पहुंच चुका है। आने वाले समय में कर्जदारों के निर्देशों की अनुपालना करने के अतिरिक्त राज्यों से लेकर केन्द्र तक के पास और कोई विकल्प नहीं रह जायेगा। आज हिमाचल का ही कर्ज साठ हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर चुका है जोकि शायद राज्य के जीडीपी के 50% से अधिक है। इस बढ़ते कर्ज को कैसे रोका जाये और कर्ज के बिना राज्य की आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जाये यह आने वाले दिनों के केन्द्रीय मुद्दे होने जा रहे हैं। लेकिन आज राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों नेतृत्व इस सवाल पर आंखें बन्द करके बैठे हैं। ऐसे में जब भी कोई व्यक्ति राजनीतिक विकल्प के मकसद से राजनीतिक संगठन खड़ा करने का प्रयास करेगा उसे इस सवालों पर पूरी ईमानदारी से चिन्तन करके इस संबंध में एक समझ बनाकर उसे सार्वजनिक बहस का विषय बनाना होगा। राज्य के संसाधनों का पूरा विश्लेषण अपने पास रखना होगा और उन संसाधनों को कैसे आगे बढ़ाया जाये इसकी एक पूरी कार्य योजना तैयार रखनी होगी। राज्य की वर्तमान समस्याओं की जानकारी के साथ उनके लिये जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व को पूरे प्रमाणिक साक्ष्यों के साथ चिन्हित करके पूरी बेबाकी से जनता के सामने रखना होगा। जब तक कोई ऐसा नही करेगा तब तक जनता उसे कतई गंभीरता से नही लेगी क्योंकि आज 1989 जैसे ही प्रयास करने की आवश्यकता होगी। क्योंकि आज जो राजनीतिक वातावरण बना हुआ है उसे भेदने के लिये 1977 और 1989 जैसे ही प्रयास करने की आवश्यकता होगी। क्योंकि आज जो सत्तापक्ष है उसके हर राजनीतिक कार्य के पीछे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ऐसी विचार शक्ति क्रियाशील है कि उससे सारे आर्थिक सवाल गौण होकर रह गये हैं जबकि हर आदमी पर इनका सीधा प्रभाव पड़ रहा है। इसलिये आज स्थिति यह चयन करने पर पहुंच गयी है कि प्राथमिकता आर्थिक सवालों को दी जाये या संास्कृतिक राष्ट्रवाद को। प्रदेश में दस्तक देने को तैयार हो रहे इन तीसरे राजनीतिक दलों को स्थान बनाने के लिये इस चयन के टैस्ट से गुजरना होगा। लेकिन इसमें व्यवहारिक स्थिति यह है कि इस समय आम आदमी पार्टी की प्रदेश ईकाई की कमान एक ऐसे व्यक्ति के पास है जो अपनी व्यवसायिक व्यस्तताओं के कारण ज्यादा समय प्रदेश से बाहर रहता है। इस बाहर रहने के कारण प्रदेश ईकाई के अन्य सदस्यों में आपसी तालमेल की स्थिति यह है कि अभी से उनके संबंधों के आॅडियो वायरल होने लग पडे हैं। अभी तक प्रदेश ईकाई जनता को यह नही बता पायी है कि उसका विरोध विपक्ष में बैठी कांग्रेस से है या सत्ता पक्ष में बैठी भाजपा से है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के सहारे राज्यों में ईकाईयों का गठन करके उसे राजनीतिक विकल्प के स्तर तक ले जाना ईकाई के वर्तमान नेतृत्व के तहत संभव नही है। फिर दिल्ली की जो राजनीतिक और आर्थिक स्थितियां है वैसी देश के अन्य राज्यों की नही है। प्रदेश की आम आदमी पार्टी से जुड़े अधिकांश लोगों की निष्ठायें पहले संघ भाजपा के साथ हैं उसके बाद आम आदमी पार्टी के साथ। इसी तरह की स्थिति स्वाभिमान पार्टी और जनक्रान्ति पार्टी की है यह लोग अभी तक स्पष्ट नही हो पाये हैं कि उनका पहला विरोध संघ/भाजपा से है या कांग्रेस से। डा. सुशान्त तो भाजपा से प्रदेश में मन्त्री और केन्द्र में सांसद रह चुके हैं। संघ से प्रशिक्षित भी हैं ऐसे में उन्हे भी कांग्रेस को कोसना आसान है भाजपा संघ को नहीं। इसलिये उन्होने कर्मचारियों के उस पैन्शन को उठाया जो उनके सांसद रहते घटा और तब वह उस पर चुप रहे। आज भी उन्होंने यह नही बताया कि इसके लिये वह केन्द्र को कितना दोषी मानते हैं। ऐसे में जब तक यह लोग अपनी सोच में स्पष्ट नही हो जाते हैं तब तक इनके राजनीतिक प्रयासों का कोई लाभ नही होगा।
शिमला/शैल। शिमला में गाड़ी पार्क करना एक बड़ी समस्या है। शायद 25% घरों के पास ही अपनी पार्किंग की सुविधा है जबकि गाड़ी लगभग हर घर के पास है। शहर की व्यवस्था नगर निगम के पास है इसलिये शहर में बनने वाले हर मकान का नक्शा नगर निगम से पास करवाया जाता है। नक्शा पास करने की फीस ली जाती है। यह इसीलिये किये जाता है ताकि उस घर को मिलने वाली सारी सार्वजनिक सेवाएं उसे आसानी से उपलब्ध हो सकें। नक्शा पास करने का जो शुल्क लिया जाता है वह यही सेवाएं उपलब्ध करवाने के नाम पर लिया जाता है। मकान बन जाने के बाद फिर संपति कर लेना शुरू हो जाता है। सारे शुल्क सेवाएं उपलब्ध करवाने के नाम पर लिये जाते हैं लेकिन क्या यह संवायें हर घर को आसानी से उपलब्ध हो पा रही हैं शायद नहीं। आज भी ऐम्बुलैन्स और अन्गिशमन की गाड़ी हर घर के पास नही पहुंच पाती है। यह सब योजना की कमीयां हैं। आज भी नक्शा पास करते हुए पार्किंग का प्रावधान अनिवार्य नही किया गया है। जबकि जो भी मकान सड़क के साथ लगता हो उसे उस लेबल पर पार्किंग का प्रावधान करना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। इस समय सड़कों पर येलो लाईन लगाकर पार्किंग का प्रावधान किया जा रहा है। लेकिन इस प्रावधान के नाम पर इन सड़कों को एक मुश्त नीलाम करके इकट्ठा शुल्क ले लिया जा रहा है। इस नीलामी के नाम पर शहर के दुकानदारों का इन सड़कों पर एकाधिकार का रास्ता खोल दिया गया है। इससे जो दूसरे लोग लोअर बाजा़र, मालरोड़ नगर के दूसरे हिस्सों से सामान खरीदने या थोड़ी देर के लिये घूमने आते हैं उन्हे अब गाड़ी पार्क करने की सुविधा नही मिल पा रही है। जबकि पहले यूएस क्लब से लिफ्रट तक आने वाली सड़क पर सबको गाड़ी पार्क करने की सुविधा मिल जाती थी। नगर निगम ठेकेदारों को यह काम सौंप देती थी और वह उतने समय की फीस ले लेता था जितनी देर गाड़ी पार्क रहती थी। लेकिन अब सडक पर गाड़ियों के नम्बर लिख दिये गये हैं और वह उनकी स्थायी पार्किंग बन गयी है। इसमें यह भी देखने को मिल रहा है कि सड़क का नम्बर किसी और गाड़ी का लिखा है और पार्क उसी की दूसरे नम्बर की गाड़ी हो रही है। इस तरह गाड़ी को नहीं व्यक्ति को स्थायी रूप से स्थान दे दिया गया है। ऐसा शहर की कई सकड़ों पर किया गया है जबकि रोड़ टैक्स तो हर गाड़ी से लिया जाता है ऐसे में जिस भी गाड़ी के पास इन सड़कों पर आने का परमिट है उन्हें अब यहां पार्किंग नही मिल रही है जबकि रोड़ टैक्स तो सब गाड़ीयों से एक बराबर लिया जाता है। फिर सबसे रोड़ टैक्स लेने के बाद कुछ एक को नीलामी के नाम पर स्थायी सुविधा कैसे दी जा सकती है। चर्चा है कि नगर निगम ने व्यापार मण्डल के दबाव में आकर यह सब किया है और राजनीतिक तथा प्रशासनिक नेतृत्व ने इस पर आखें बन्द कर ली हैं। शहर की सार्वजनिक सड़कों को नीलामी के नाम पर कुछ अमीर लोगों को सौंप देना बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है।

शिमला/शैल। प्रदेश में कोरोना के मामले हर रोज़ बढ़ते जा रहे हैं। इन्ही बढ़ते मामलों के कारण जयराम सरकार ने राज्य की जनता से यह पूछा था कि लाकडाऊन फिर से लगाया जाये या नहीं। इस पर जनता की राय एक तरफा नही रही थी। इसलिये सरकार ने पूरे प्रदेश में एक साथ लाकडाऊन लगाने का विचार छोड़ दिया था। जहां जहां मामले ज्यादा बढ़ेगे वहीं पर यह कदम उठाने का फैसला लिया गया था। लेकिन इसी के साथ कोरोना के लिये जारी दिशा निर्देशों की अनुपालना को और कड़ा करते हुए इसकी अवहेलना पर जुर्माना और सज़ा तक का प्रावधान कर दिया था। कोरोना निर्देशों की अनुपालना सुनिश्चित करने और अवहेलना करने वालों के खिलाफ कारवाई का अधिकार तथा जिम्मेदारी भी प्रशासन को
ही दी गयी थी।
लेकिन आज स्थिति यह हो गयी है कि जैसे जैसे प्रदेश में इसके मामले बढ़ते जा रहे हैं उसी अनुपात में इसकी अवहेलना के किस्से भी बढ़ रहे हैं। इसमें भी रोचक यह हो रहा है कि निर्देशों की अवहेलना सत्तापक्ष की ओर से हो रही है। मुख्यमन्त्री के अपने ऊपर यह आरोप लग रहे हैं। सबसे पहले यह आरोप प्रदेश के महाधिवक्ता कार्यालय के खिलाफ लगा। 27 जुलाई को भाजपा प्रवक्ता अधिवक्ता तेजेन्द्र कुमार, अतिरिक्त महाधिवक्ता नन्दलाल और इनके दो साथीयों ज्ञान चन्द ठेकेदार तथा ड्राईवर देवेन्द्र कुमार के खिलाफ कांग्रेस के लीगल सैल के संयोजक अधिवक्ता देवेन भट्ट, चन्द्र मोहन, कांग्रेस सचिव वेद प्रकाश ठाकुर व पवन चौहान ने शिमला के थाना सदर में शिकायत दर्ज करवायी। लेकिन इस शिकायत पर कोई कारवाई नही हुई। यहां तक कि महाधिवक्ता कार्यालय के सारे कर्मचारी और अधिकारी संगरोध नही हुए। अब ऊर्जा मन्त्री और उनसे संवद्ध लोगों के कोरोना पाजिटिव पाये जाने पर सिरमौर मेें पूर्व मन्त्री गंगू राम मुसाफिर ने इसको लेकर प्रशासन के पास शिकायत दर्ज करवाई है। अब मुख्यमन्त्री के कांगड़ा प्रवास के दौरान कई स्थानों पर कोरोना निर्देशों की अवहेलना की शिकायतें कांगड़ा के कांग्रेस नेताओं ने प्रशासन से की हैं।
इस समय स्थिति यह है कि राजनीति के लोग मुख्यमन्त्री से लेकर विधायकों तक जनता सेे संपर्क किये बिना रह नहीं सकते। लेकिन जब भी जनता में जायेंगे तो वहां पर कोरोना के दिशा निर्देशों की पूरी तरह अनुपालना कर पाना संभव हो नहीं सकता है। यह सत्तापक्ष और विपक्ष सभी के नेताओं पर एक समान लागू होता है। इसी कारण से कांग्रेस नेताओं ने जब धरना-प्रदर्शन आयोजित किया तो उनके खिलाफ निर्देशों की अवहेलना के आरोप लगे। अब मुख्यमन्त्री और उनके मन्त्रीयों के खिलाफ यह आरोप लग रहे हैं। प्रशासन किसी के भी खिलाफ कोई कारवाई करने का साहस नही कर पा रहा है। प्रशासन का जोर आम आदमी पर ही चलता है और उसके खिलाफ मामले दर्ज भी हुए हैं। इस तरह कुल मिलाकर स्थिति यह बन गयी है कि आम आदमी तो इन निर्देशों के कारण आज अनलाक तीन में बन्दिशों में चल रहा है और अवहेलना करने पर जेल और जुर्माना दोनों झेल रहा है। लेकिन राजनेता चाहे वह किसी भी पक्ष के क्यों न हो इन निर्देशों की खुले आम अवहेलना भी कर रहे हैं और उनके खिलाफ कारवाई भी कोई नहीं हो रही है। इस परिदृश्य में आज यह आवश्यक हो गया है कि कोरोना को लेकर सारा आकलन नये सिरे से किया जाये। आम आदमी में जो इसको लेकर डर बैठा दिया गया है उसे दूर करने का प्रयास किया जाये। क्योंकि कोरोना को लेकर अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी एकदम यूटर्न ले लिया है और उसको लेकर कोई भी उसका खण्डन नहीं कर पाया है।
26 लाख की जमीन 90 लाख में क्यों ली जा रही थी
जब 2020 में सर्किल रेट 26 लाख है तो 2016 में तो इससे भी कम रहा होगा
क्या 85 लाख की पैमेन्ट करने के बाद रजिस्ट्री के लिये चार वर्ष का इन्तजा़र करेगा कोई
यदि भाजपा को 118 की अनुमति लेने में चार वर्ष लग सकते हैं तो आम आदमी का क्या होगा।
शिमला/शैल। सत्तारूढ़ प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के साथ जमीन खरीद के एक मामले में हुई धोखाधड़ी को लेकर अब पार्टी के भीतर ही सवाल उठने शुरू हो गये हैं। पार्टी के साथ धोखाधड़ी का यह मामला सोलन में घटा है और सोलन के ही कुछ कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखकर प्रदेश में खरीदी गयी सारी जमीनों के मामलों में एक उच्च स्तरीय जांच करवाने का आग्रह किया है। इन कार्यकर्ताओं ने इस बात पर हैरानी जताई है कि कैसे 85 लाख देने के बाद भी तीन वर्ष तक इस जमीन की रजिस्ट्री नही करवा पायी? स्मरणीय है कि वर्ष 2016 में पालमपुर में पार्टी की एक बैठक तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह की अध्यक्षता में हुई थी। इस बैठक में प्रदेश के सभी सत्रह संगठनात्मक जिलों में पार्टी के कार्यालय बनाने का फैसला हुआ था। कृपाल परमार की अध्यक्षता मे इस आशय की कमेटी गठित की गयी थी। इस कमेटी ने सभी जिलों में इस काम के लिये कमेटीयां गठित की थी। सोलन के लिये पवन गुप्ता की अध्यक्षता में यह कमेटी बनी थी। कमेटी ने आगे कुछ कार्यकर्ताओं को जमीन तलाश करने के काम पर लगा दिया जिसमें पार्षद मनीष भी शामिल थे। इन लोगों ने मौजा समलेच में एक भूमि चिन्हित की और खरीद का इकरारनामा जमीन के मालिक दीनानाथ के साथ 7-10-2016 को हस्ताक्षरित हो गया। एक बीघा जमीन 90 लाख में खरीद ली गयी और इकरारनामा साईन करते समय 35 लाख की पैमेन्ट बाकायदा आरटीजीएस के माध्यम से कर दी गयी। खरीद का इकरारनामा पार्टी के कैशियर कपिल देव सूद और दीनानाथ के मध्य हुआ और मनीष कुमार इसमें बतौर गवाह शामिल हुए 7-10-2016 को 35 लाख देकर खरीद का अनुबन्ध होता है और 50 लाख 30-3-2017 तक देने का वायदा होता है। शेष 5 लाख रजिस्ट्री के समय देना तय हुआ। इस अनुबन्ध के तहत 50 लाख 29-3-2017 को आरटीजीएस के माध्यम से कर दिया जाता है।
यह 50 लाख देने के बाद धारा 118 के तहत जमीन खरीद की अनुमति लेने के लिये हिमाचल सरकार को आवेदन कर दिया जाता है। लेकिन धारा 118 के तहत जीमन खरीद की अनुमति 2020 तक भी नही ली जाती है या नही मिलती है और इसी बीच 17-2-2020 को इस जमीन का मालिक इसे एक श्रीमति पारूल संगल को 26 लाख में बेच देता है और 17-2-2020 को ही इसकी रजिस्ट्री भी हो जाताी है। यह जानकारी मिलने के बाद पार्टी के जिला सोलन के अध्यक्ष आशुतोष वैद्य 16-7-2020 को इस संबंध में पुलिस अधीक्षक सोलन को इसकी लिखित शिकायत सौंपते हैं। इस शिकायत की प्रति मुख्य सचिव, गृह और डीजीपी को भी सौंपी जाती हैं। इस शिकायत के बाद पुलिस जांच शुरू कर देती है और जमीन के मालिक दीनानाथ को गिरफ्तार कर लेती है। मनीष कुमार सर्वोच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत लेने मंें सफल हो जाता है और फिर प्रैस के समाने आकर यह दावा करता है कि इस धोखाधड़ी मे उसकी कोई भूमिका नही है। मनीष के मुताबिक उसने तो पार्टी कार्यकर्ता होने के नाते अनुबन्ध पर हस्ताक्षर किये हैं और वह जांच में पूरा सहयोग देने को तैयार है। इसी के साथ शिकायतकर्ता आशुतोष वैद्य ने दीनानाथ की जमानत याचिका रद्द करने के लिये भी सोलन के कोर्ट न0 एक में याचिका दायर कर दी है। अभी इस मामले की जांच चल रही है और पारूल संगल को उसके 26 लाख देकर उससे जमीन वापिस ले ली गयी है।
इस प्रकरण में जो प्रमुख सवाल उभरकर सामने आते हैं उन पर अभी तक कोई ध्यान नही दिया जा रहा है। भाजप के साथ इस जमीन का सौदा 7-10-2016 को नोटबंदी से कुछ पहले 90 लाख में किया जाता है और उसी दिन 35 लाख का भुगतान आरटीजीएस के माध्यम से ओबीसी बैंक शिमला किया जाता है। इसके बाद 29-3-2017 को नोटबंदी के बाद जब आम आदमी को बैंकों से नये नोटों में इनता पैसा मिलने में कठिनाई आ रही थी तब फिर इसी ओबीसी बैंक से 50 लाख रूपया आरटीजीएस के माध्यम से अदा किया जाता है। इस तरह मार्च 2017 में 85 लाख खर्च करने बाद भी चार वर्ष तक रजिस्ट्री न करवाने की सोच सकता है ऐसा तभी संभव हो सकता है जब जमीन के मालिक पर पूरा विश्वास हो। दूसरा सवाल आता है कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि भाजपा को ही चार वर्ष में धारा 118 के तहत जमीन खरीद की अनुमति न मिल पाये। जबकि जनवरी 2018 से तो भाजपा की ही सरकार प्रदेश में है। यदि भाजपा को ही यह अनुमति लेने में तीन वर्ष लग जायेंगे तो औरों का क्या हाल होगा? इसके बाद सबसे गंभीर प्रश्न तो यह है कि जब पारूल संगल के नाम 17-2-2020 को इस जमीन की 26 लाख में रजिस्ट्री हुई तब राजस्व विभाग के दस्तावेज के मुताबिक इस जमीन का सर्किल रेट 2609119 रूपये दर्ज और इसकी रजिस्ट्री 26.20 लाख में हुई। यदि 2020 में इसका सर्किल रेट 26 लाख है तो निश्चित रूप से 2016 में इससे अधिक नही नही था। कम तो हो सकता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि 26 लाख की जमीन भाजपा 90 लाख में क्यों ले रही थी? क्या आज इसकी रजिस्ट्री भाजपा 90 लाख में करवायेगी?
जो जमीन 90 लाख रूपये में ली जा रही है स्वभाविक है कि उसके ऊपर किये जाने वाले निर्माण पर भी तीन -चार करोड़ तो खर्च किया ही जायेगा। भाजपा प्रदेश के सभी सत्रह संगठनात्मक जिलों में अपने कार्यालयों का निर्माण करने जा रही है और इस तरह यह पूरा प्रोजेक्ट सौ करोड़ के करीब का अवश्य रहा होगा। यदि सभी जगहों पर 26 लाख की जमीन 90 लाख में ली जा रही होगी तो यह अपने में कितना बड़ा सवाल हो सकता है यह प्रकरण तो सोलन की ज़मीन के पुनः बिकने से सामने आ गया और इस पर जिलाध्यक्ष ने पुलिस में शिकायत कर दी। यदि ऐसा न होता तो इसकी रजिस्ट्री भी 26 लाख के सर्किल रेट पर ही न होती और बाकी का पैसा कहीं और बंट जाता। ऐसी सारी संभावनाओं को सामने रखकर ही इस बारे में राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्रा लिख कर पूरे प्रदेश की खरीद पर जांच करवाने का आग्रह किया गया है।



