Saturday, 17 January 2026
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मंत्री मण्डल में हमीरपुर को अब भी नही मिल पाया स्थान मंत्री परिषद में राजपूतो को मिले छः स्थान पांच विधायकों ने पार्टी बैठक में न आकर दिये अलग संकेत

शिमला/शैल। जयराम सरकार में 2019 के लोकसभा चुनावों के परिदृश्य में मन्त्री परिषद में दो पद खाली हुए थे। किश्न कपूर को कांगड़ा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिये मन्त्री पद से त्याग पत्र देना पड़ा था। अनिल शर्मा के बेटे को कांग्रेस ने मण्डी लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया था और इसके कारण भाजपा ने नैतिक आधार पर उनका त्यागपत्र ले लिया था। इसके बाद स्वास्थ्य मन्त्री विपिन परमार को स्वास्थ्य विभाग में उभरे पत्र बम के परिणाम स्वरूप मन्त्री से विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया और यह पद भी खाली हो गया। इस तरह खाली हुए तीनों मन्त्री पदों को भरने का प्रयास लम्बे समय से किया जा रहा था। बल्कि कोरोना के कारण जिस हद तक सरकार को अपने खर्चो पर रोक लगाने के लिये वाकायदा वित्त विभाग से इस आश्य का पत्र सभी विभागों को जारी करवाना पड़ा था उसके परिदृश्य में यह माना जाने लगा कि शायद जब तक कोरोना संकट चल रहा है तब तक नये मन्त्रीयों के खर्च का बोझ सरकार के खजाने पर नही डाला जायेगा। लेकिन राजनीतिक जटिलताओं के कारण महामारी भी इस विस्तार को रोक नही पायी है। ऐसे में जब कोरोना संकट के बावजूद भी यह विस्तार हो ही गया है तो इसका आकलन भी राजनीति के ही मानकों पर किया जाना आवश्यक हो जाता है।
इस नाते सबसे पहला प्रश्न आता है कि क्या प्रदेश के सारे जिलों और वर्गों को बराबर का हिस्सा मिल पाया है। कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है वहां से पन्द्रह विधायक आते हैं। उसके बाद मण्डी दस सीटों के साथ दूसरे और शिमला आठ के साथ तीसरे स्थान पर आता है। बिलासपुर और कुल्लु से चार-चार और किन्नौर तथा लाहौल-स्पिति से एक एक सीट है। चम्बा, ऊन्ना, हमीरपुर, सोलन और सिरमौर से पांच-पांच सीटे हैं। जातीय गणित में ब्राहमण और राजपूत लगभग बराबरी पर हैं। इनके बाद एस सी एस टी और ओबीसी आतें हैं। इसके बाद अन्य छोटे वर्ग आते हैं। इस गणित में कांगड़ा से तीन मन्त्री हैं मण्डी से मुख्यमन्त्री सहित दो, शिमला, सोलन, सिरमौर, ऊना, बिलासपुर, कुल्लु और लाहौल स्थिति से एक एक मन्त्री हैं। जातीय गणित में ‘राजपूत वर्ग’ से छः ब्राहमण दो, ओबीसी दो, एससी एक और बनिया एक हैं । जिलों में हमीरपुर को मन्त्रीमण्डल में कोई स्थान नही मिला है। इसलिये यह नही कहा जा सकता कि जातीय और ़क्षेत्रीय सन्तुलन के मानक पर यह मन्त्रीमण्डल सही उतरता हो। इसी के साथ यह भी है कि विभागों के बंटवारे में भी राजपूत वर्ग को अन्यों की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण विभाग दिये गये हैं। आने वाले दिनों में यह चर्चाएं उठंेगी ही यह तय है।
इसके बाद यदि राजनीतिक दृष्टि से आकलन किया जाये तो यह सामने आ ही गया है कि इस विस्तार के बाद जो भाजपा विधायक दल की बैठक बुलाई गयी थी उसमें पांच विधायक रमेश धवाला, नरेन्द्र बरागटा, राजीव बिन्दल, नरेन्द्र ठाकुर और विक्रम जरयाल इस बैठक में शामिल नही हुए हैं। यह सभी लोग विधायक हैं और माना जा रहा था कि इनके अनुभव को देखते हुए इन्हें मन्त्रीमण्डल में अवश्य स्थान मिलेगा। राजीव बिन्दल, नरेन्द्र बरागटा और रमेश धवाला धमूल सरकार में मन्त्री रह चुके हैं। बिन्दल को वरिष्ठता के आधार पर ही विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया था। स्वास्थ्य विभाग की जिस खरीद को लेकर बिन्दल विवाद में आये और स्पीकर पद से त्यागपत्र देना पड़ा उसमें सरकार ने एक जांच कमेटी बिठाई थी। उस कमेटी की रिपोर्ट आ चुकी है और उसमें बिन्दल को क्लीनचिट मिल चुकी है। लेकिन इसके बावजूद उन्हें मंत्री नही बनाया जाना अपने में कई सवाल खड़े करता है। ऐसे में इन पांच विधायकों का इस बैठक में न आना एक महज संयोग न होकर भविष्य की राजनीति का एक सकेंत हैं इसी के साथ सरवीण चैधरी और मारकण्डेय के विभागों में हुए इस तरह फेरबदल पर यह लोग कितने और कब तक सहज बने रहेंगे इसका पता भी आने वाले दिनों में ही लगेगा। इस तरह राजनीतिक मानक पर भी यह विस्तार कोई ज्यादा सन्तुलित नही माना जा रहा है।

कोरोना निर्देशों के उल्लघंन पर कारवाई हो या इन्हें वापिस लिया जाये के मुकाम पर पहुंचे हालात

शिमला/शैल। क्या प्रदेश सरकार कोरोना के संकट से निपटने में असमर्थ होती जा रही है। क्या कोरोना में आम आदमी के लिये नियम अलग हैं और विशिष्ठ व्यक्तियों के लिये अलग हैं। यह सवाल रोहडू में आयोजित किये गये एक टूर्नामैन्ट से उठे हैं आरोप है कि इस टूर्नामैन्ट में आयोजकों ने कोरोना को लेकर जारी किये गये निर्देशों की जमकर उल्लंघना की है। इसमें करीब एक हज़ार लोगों की भीड़ होने के साथ ही मास्क न पहनने और न ही सोशल डिस्टैन्सिंग की कोई परवाह की गयी है। स्वाभिमान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डा.के.एल शर्मा के मुताबिक इस  टूर्नामैन्ट में शामिल क्रासा टीम के कोच सुभाष तेगटा कोरोना संक्रमित पाये गये हैं। बालीवाल का यह टूर्नामैन्ट उस समय हुआ है जब मास्क न पहनने के लिये 5000 रूपये जुर्माना और जेल जाने तक के निर्देश जारी हो चुके हैं। इस आयोजन के मुख्य अतिथि भी शिक्षा मन्त्री सुरेश भारद्वाज के बेटे रहे हैं। इस आयोजन को लेकर प्रशासन पर यह सवाल आता है कि जब शादी ब्याह और अन्तेष्ठी तक में लोगों के शामिल होने की संख्या पर सीमा लगा दी गयी है तो फिर इस आयोजन की अनुमति कैसे दे दी गयी? इसके आयोजकों के खिलाफ कोई कारवाई क्यों नही की गयी। वहां पर बैठा प्रशासन क्या कर रहा था। कोरोना से निपटने के लिये सरकार के नियमों/निर्देशों और उसकी नियत का आकलन इससे किया जा सकता है।

कोरोना से प्रदेश में अब तक एक दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है और संक्रमितों की संख्या भी दो हजार से पार हो गयी है। इसके मामले लगातर बढ़ते जा रहे है। इसका शिखर आना अभी बाकी है। नाहन के गोबिन्दगढ़ में इसके सामुदायिक फैलाव की स्थिति आ गयी है। राजधानी शिमला में सचिवालय तक पहुंच गया है। मुख्यमन्त्री कार्यालय बन्द करना पड़ा है। प्रदेश का हर जिला इससे प्रभावित है। इस स्थिति में प्रदेश के कुछ हिस्सों में फिर लाकडाऊन आदेशित करना पड़ा है। नये सिरे से दिशा निर्देश जारी किये गये हैं और इनका पालन न करने पर जुर्माना और जेल तक प्रावधान कर दिया गया है। प्रदेश की स्थिति तब से बिगड़नी शुरू हुई है जब से नियमों में ढील दी जाने लगी है। आज औद्यौगिक और बागवानी क्षेत्र इससे ज्यादा प्रभावित हो गये हैं। लेकिन इस स्थिति में भी कम उपस्थिति के साथ उद्योगों को आपरेट करने की अनुमति दी गयी है। बसों में 100% यात्रियों के आने जाने की अनुमति दी गई है। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि बस में 52 सवारियों के आने जाने से संक्रमण का खतरा नही है तो फिर आन्तयेष्ठी और शादी में सीमा क्यों? इस तरह जो भी निर्देश आज तक दिये जाते रहे हैं उनमें अन्तः विरोध रहा है और यह विरोध इसलिये रहा है क्योंकि कोरोना को लेकर आकलन बदलते रहे हैं। एक समय कहा गया कि यह हवा से नही फैलता और अब कहा है कि हवा से भी फैलता है। इन बदलते आकलनों ने आम आदमी को डर परोसने का काम किया है और सरकार ने भी केन्द्र से लेकर राज्यों तक इस डर को कम करने की बजाये इसे और पुख्ता करने का ही काम किया है।
जहां एक ओर डर परोसा जा रहा था वहीं पर दूसरी ओर वीआईपी लोग कोरोना के दिशा निर्देशों की खुलेआम  धज्जीयां उड़ा रहे थे। हिमाचल में ही भाजपा ने गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया। कांग्रेस नेता वीरभद्र सिंह के घर जन्मदिन के उपलक्ष्य में भोज का आयोजन हुआ। कांग्रेस ने सचिवालय के बाहर प्रदर्शन किया। धर्मशाला में विधायक ने अपने जन्म दिन पर पार्टी की और मन्दिर में पूजा की। स्थानीय एसडीएम भी विधायक के साथ थे यह आरोप कांग्रेस नेता सुधीर शर्मा ने लगाया है। अब रोहडू में बाॅलीबाल टूर्नामैन्ट का आयोजन हो गया। स्वाभिमान पार्टी के अध्यक्ष डा.के.एल शर्मा ने इस पर कारवाई की मांग की है। इन सारे आयोजनों में निर्देशों का खुला उल्लघंन हुआ है। कांग्रेस ने भाजपा पर और भाजपा ने कांग्रेस पर खुलकर आरोप लगाये हैं लेकिन प्रशासन ने कारवाई किसी के खिलाफ नही की है। इस तरह पक्ष, विपक्ष और प्रशासन तीनों मिलकर आम आदमी को डराने का काम कर रहे हैं। जबकि यदि आंकड़ों के परिप्रेक्ष में देखे तो हिमाचल में 2015 में 41462, 2016 में 35819 और 2017 में 39114 मौतें हुई हैं यह आंकड़े भारत सरकार के गृह मन्त्रालय के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी रिपोर्ट में दर्ज है। इस दौरान स्वाईन फलू भी था जो प्रदेश में फरवरी 2020 तक रहा है लेकिन तब कोई लाॅकडाऊन नही रहा। इन आंकड़ों के मुकाबले आज कोरोना के आंकड़े कहां ठहरते हैं इसका अनुमान लगाया जा सकता है। सरकार का कोरोना को लेकर न तो आकलन सही रहा है और न ही नीति। इस समय परोसे गये डर के कारण स्थिति इस मुकाम पर पहुंच गयी है कि यदि कोरोना है तो फिर से पूर्ण लाकडाऊन की आवश्यकता है और यदि नही है तो किसी भी पाबन्दी की जरूरत नही है। लेकिन बीच की स्थिति नही चलेगी की एक जगह तो लाकडाऊन है और दूसरी जगह छूट है। निर्देश हैं तो सबको उनका कड़ाई से पालन करना होगा अन्यथा निर्देश जारी करने का कोई औचित्य नही है। आवश्यकता है आम आदमी को भयमुक्त करने की और सरकार वही काम नही कर रही है। आज प्रदेश सरकार ने आम आदमी से पूछा है कि लाकडाऊन किया जाना चाहिये या नही जबकि 24 मार्च को आम आदमी से पूछना दूर उसे संभलने के लिये पर्याप्त समय तक नही दिया गया जो कि महामारी अधिनियम के तहत आवश्यक था। इसलिये आज जो असमंजस की स्थिति बन गई है उसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की है। क्योंकि लाकडाऊन घोषित करने से पहले पूराने रिकार्ड को देखा तक नही गया है। यदि पुराने उपलब्ध आंकड़ो को सामने रखकर फैसला लिया जाता तो शायद लाॅकडाऊन करने की शीघ्रता न की जाती।

आनलाईन पढ़ाई ने स्मार्ट फोन को दिया एक बड़ा बाज़ार स्कूलों में डिजिटल क्लास रूम बनाने, स्मार्ट फोन के लिये गाय बेचने, 25, 25 हज़ार का कर्ज लेने से उठे सवाल

शिमला/शैल। प्रदेश के शिक्षण संस्थान 24 मार्च को लाकडाऊन की घोषणा होने से पहले ही बन्द कर दिये गये थे। तब से अब तक बन्द चल रहे हैं और कब खुलेंगे इस पर शायद शिक्षा मन्त्रा भी निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नही हैं क्योकि कोरोना के मामले हर दिन बढ़ते चले जा रहे हैं। इन मामलों के बढ़ने से छात्रों के अभिभावक भी अभी बच्चों को स्कूल भेजने का जोखिम लेने को तैयार नही हैं। कोरोना के कारण आम आदमी के आय के स्त्रोतों पर विराम लग गया है। बल्कि अभिभावक स्कूलों द्वारा कोरोना काल की फीस आदि न लेने की गुहार लगा रहे हैं। छात्र अभिभावक मंच इसको लेकर शिक्षा निदेशालय पर कई बार धरना प्रदर्शन कर चुका है। सरकार भी इस मांग पर पूरी सहमति जताते हुए इस आशय के आदेश शिक्षण संस्थानों को जारी कर चुकी है। यह दूसरी बात है कि इन संस्थानों ने सरकार के आदेशो/निर्देशों की पूरी पालना नहीं की है। लेकिन इस वस्तुस्थिति से यह स्पष्ट हो जाता है कि आम आदमी की वित्तिय स्थिति इस संकट के काल में पूरी तरह चरमरा गयी है। 

स्थिति इस मोड़ पर पहुंच गयी है कि स्कूलों ने अपनी फीस की मांग को जायज ठहराने के लिये आनलाईन पढाई करवाना शुरू कर दिया है। लेकिन इस पढ़ाई के लिये घर में कम्पयूटर या स्मार्ट फोन का होना आवश्यक हो गया है। आज बाज़ार में कोई भी स्मार्ट फोन 6000 रूपये से कम कीमत में नहीं मिल रहा है। जो बच्चे स्मार्ट फोन के बिना है वह आनलाईन पढ़ाई से वंचित रह रहे हैं। ऐसे में बच्चों को यह आनलाईन पढ़ाई करवाने के लिये अभिभावकों को यह स्मार्ट फोन खरीदना अनिवार्य हो गया है। यह फोन खरीदने के लिये कई छात्रों/अभिभावकों द्वारा बैंकों से 25, 25 हजार के कर्ज लेने के लिये सैंकड़ों मामले सामने आ चुके हैं। इसमें सबसे चैंकाने वाला सच्च तो ज्वालामुखी क्षेत्र के गुम्मर निवासी कुुलदीप कुमार को अपने चैथी और दूसरी क्लास में पढ़ने वाले बच्चों को छः हज़ार में अपनी गाय बेचने के रूप में सामने आया है। कुलदीप इतना गरीब है कि उसे 6000 रूपये जुटाने के लिये अपनी गाय बेचनी पड़ी जो इस समय उसका रोज़ी रोटी का एक मात्र सहारा था। गाय इसलिये बेचनी पडी क्योंकि उसे किसी बैंक ने ़ऋण नहीं दिया। बैंकों के इस इन्कार ने सरकार की उन सारी योजनाओं और दावों पर सवाल खड़े कर दिये हैं जो गरीबों की मद्द के लिये किये गये हैं।
इस परिदृश्य में यह सवाल खड़े होते है कि इस समय आनलाईन पढ़ाई के लिये बच्चों को स्मार्ट फोन खरीदना अनिवार्य होगा। लाखों बच्चे प्रदेश के स्कूलों में पढ़ रहे हैं और यह फोन खरीदने से फोन बेचने वालों को निश्चित बाज़ार उपलब्ध हो जायेगा। फोन चलाने के लिये नेटवर्क सेवा आवश्यक होगी और उसे चलाने के लिये नियमित रूप से रिचार्ज करवाना अनिवार्य होगा। यह खर्च स्थायी रूप से परिवार पर पड़ता रहेगा। जो राहत सरकार किसी परिवार को दे रही है उसे इस तरह अपरोक्ष में वापिस लेने का जुगाड़ भी कर लिया गया है। क्योंकि कल जब स्कूल खुल जायेंगे तब आनलाईन पढ़ाई का कोई औचित्य ही नही होगा। यह व्यवस्था तो तभी उपयोगी होगी यदि आने वाले समय में भी इसे ही चलाये रखना हो और कालान्तर में अध्यापकों की संख्या कम करनी हो। क्योंकि यदि आॅनलाईन पढ़ाई का प्रयोग सफल सिद्ध होता है तो निश्चित रूप से उसमें इतने अध्यापकों की आवश्यकता नही होगी। यदि ऐसी कोई मंशा नही है तो छात्रों अभिभावकों पर यह स्मार्ट फोन का हजारों का खर्चा डालना गलत होगा।
फिर आनलाईन पढ़ाई को स्थायी व्यवस्था बनाने की आशंकाओं को सरकार के स्कूलों में डिजिटल क्लास रूम बनाने के फैसले से भी बल मिला है। डिजिटल क्लास रूम पहले चरण में 440 स्कूलों में बनाये जा रहे हंै। इलैक्ट्राॅनिक्स निगम ने इसके लिये निविदायें आमन्त्रित करने का काम भी शुरू कर दिया है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि डिजिटल क्लास रूम में क्या क्या सुविधाएं उपलब्ध करवाई जायेंगी इसके बारे में अध्यापकों को विशेष जानकारी नही है। इसके लिये धन का प्रावधान केन्द्र की ओर से कितना होगा और प्रदेश की हिस्सेदारी कितनी रहेगी इसको लेकर भी शिक्षा विभाग स्पष्ट नही है।

कोरोना के लिये यज्ञ नही एक स्पष्ट नीति की आवश्यकता है

शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा के महिला मोर्चा ने चार दिन पहले शिमला में एक गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया है इस आयोजन में करीब दो सौ कार्यकर्ताओं ने भाग लिया है। इसमें मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर और शिक्षा मन्त्री सुरेश भारद्वाज भी शामिल रहे हैं दोनों ने इसके हवन में आहूतियां डालकर कोरोना के कहर से निजात  दिलाने के लिये दैवीशक्तियों का आह्वान किया है। मोर्चा की प्रदेश अध्यक्षा रश्मिधर सूद ने इसे कोरोना के संद्धर्भ में प्रदेश की जनता को जागरूक करने की दिशा में एक बडा योगदान करार दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमन्त्री के आह्वान पर देश कोरोना को भगाने के लिये ताली-थाली बजाने से लेकर दीपक जलाने तक के सारे प्रयोग कर चुका है। लेकिन इन सारे प्रयासों के बाद भी कोरोना का कहर थमा नही है और आज इससे प्रभावितों में भारत दुनिया का तीसरा बड़ा देश बन गया है। हिमाचल में भी इस यज्ञ से कोई लाभ नही मिला है बल्कि इसके मामलों में और अधिक वृद्धि हुई है। इस वृद्धि से यह समझ आता है कि यह महामारी इन उपायों से कम होने वाली नहीं है और इसके लिये कोई अलग ही कदम उठाने होंगे। गायत्री यज्ञ के आयोजन में उन सारे निर्देशों की अवेहलना हुई है जो कोरोना को लेकर प्रधानमन्त्री देश के नाम जारी कर चुके हैं। बल्कि पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के आवास पर उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य पर रखें आयोजन को लेकर कोरोना निर्देशों के उल्लंघन के जो आरोप भाजपा ने लगाये थे आज स्वयं उन्हीं आरोपों के साये में घिर गयी है। प्रदेश कांग्रेस ने राज्य सरकार के पर्यटकों को लेकर किये गये फैसले के विरोध में सचिवालय तक एक रोष रैली का आयोजन किया था। इस आयोजन में कोरोना निर्देशों के उल्लंघन के आरोपो के तहत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सहित कई कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामले बनाये गये हैं। लेकिन महिला मोर्चा के आयोजन में भी उन सारे निर्देशों का उल्लंघन हुआ है लेकिन इस पर प्रशासन कोई भी कारवाई करने का साहस नही कर पाया है। लाहौल स्पिति मे जब वहां की महिलाओं ने कृषि मन्त्री डा. मारकण्डेय पर कोरोना निर्देशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए उनका रास्ता रोका था तब उन पर आपराधिक मामले बना दिये गये। इन प्रकरणों में भी यही प्रमाणित होता है कि भाजपा सरकार इस महामारी में भी राजनीति कर रही है और महामारी को इस राजनीति का एक अवसर मानकर आचरण कर रही है। पिछले चार दिनों से प्रदेश में हर रोज़ कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। अब जो मामले बढ़ रहे है वह सोलन, मण्डी, सिरमौर, शिमला, कुल्लु, किन्नौर ज़िलों में बढ़ रहे हैं। आज सोलन, कांगड़ा के बराबर पहुंच गया है जबकि ऊना इनसे बहुत पीछे चल रहा है जिसे एक समय तबलीगी समाज का केन्द्र बता दिया गया था। लेकिन आज जो स्थिति देश/प्रदेश की बन गयी है वो किसी हिन्दु-मुस्लिम के कारण नहीं बल्कि सरकार के गलत आकलन और उसके प्रभाव में बनी नीतियों के कारण हुई प्रदेश में जो मामले अब बढ़ रहे हैं वह सेब क्षेत्रों और औद्यौगिक क्षेत्रों में बढ़ रहे हैं। यहां इसलिये बढ़ रहे है क्योंकि जो श्रमिक निति इन क्षेत्रों के लिये बनाई गयी उसमें कोरोना के लिये पहले बनाये गये बहुत सारे निर्देशों में ढील दे दी गयी। श्रमिक नीति के साथ ही पर्यटक नीति में भी वैसी ही कमीयां रहने दी गयी। बल्कि पर्यटकों के लिये अलग और प्रदेश के बाहर से आने वाले हिमाचलियों के लिये अलग नीति बन गयी। इस नीति को लेकर कई वरिष्ठ पूर्व नौकरशाहों ने प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर रोष भी व्यक्त किया है।
कोरोना आई एम ए के मुताबिक सामुदायिक संक्रमण और प्रसार की स्टेज पर पहुंच गया है। ऐसे में यदि इसका संक्रमण शहरी क्षेत्रों से निलकर ग्रामीण क्षेत्रों में फैल गया तो उससे स्थिति बहुत जटिल हो जायेगी। क्योंकि प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बहुत ही कमजा़ेर है। प्रदेश में जो 400 के करीब डाक्टरों के पद खाली हैं वह अधिकांश में ग्रामीण क्षेत्रों में ही हैं। इसलिये कोरोना को लेकर नये सिरे से आकलन करके नीति बनानी होगी यह स्पष्ट होना होगा कि सही में सरकार कोरोना को कितना घातक मानती है क्योंकि इसमें डाक्टरों की राय अलग-अलग रही है। ऐसे में यदि सरकार अपने आकलन में कोरोना को गंभीर मानती है तब इसके निर्देश सबके ऊपर एक समान लागू करने होंगे। यह नहीं हो सकता कि पर्यटकों, उद्योग श्रमिकों, बागवानी श्रमिकों और प्रदेश के स्थायी निवासियों सभी के लिये अलग अलग नियम बनाये जायें। अब तक सरकार अपने नियमों को एक ही दिन में दो दो बार बदलने का खेल कर चुकी है। जब सरकार अपने ही नियमों के बारे में स्थिर और स्पष्ट नही होगी तब उसकी गायत्री यज्ञ जैसी ही फजीहत होगी कि भगवान से ऊपर नेताओं के चित्रों को स्थान मिल जाये। इस समय एक स्पष्ट नीति के साथ प्रदेश की जनता को आयूष का काढ़ा उपलब्ध करवाना होगा जो कि पहले वरिष्ठ नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों तक ही उपलब्ध करवाया गया है।

जब मुख्यमन्त्री वित्तिय घोषणाएं कर रहे हैं तो विधायक क्षेत्र विकास निधि भी बहाल हो

शिमला/शैल। हिमाचल की जयराम सरकार ने कोरोना काल में बिजली की दरों का युक्तिकरण करने के नाम पर 100 करोड़ का बोझ प्रदेश की जनता पर डाला है। इस बोझ के कारण प्रदेश में बिजली के रेट बढ़ गये हैं। इसी काल में एपीएल परिवारों को सस्ते राशन के दायरे से बाहर कर दिया और बीपीएल परिवारों को मिलने वाले सस्ते राशन की मात्रा में भी कमी की है। अब बस किराये में भी बढ़ौत्तरी की जा रही है। सरकारी स्कूलों मे तीन माह की फीस आदि लेने का भी फैसला हो गया है। यह भी चर्चा है कि बिजली बोर्ड को भी प्राईवेट सैक्टर को दिया जा रहा है। उसमें शायद प्राईवेट सैक्टर बोर्ड के मौजूदा करीब नौ हजार करोड़ के कर्ज की जिम्मेदारी लेने को तैयार नही है। लेकिन यह पक्का है कि विनिवेश के नाम पर बोर्ड प्राईवेट सैक्टर को दिया जा रहा है। वैसे तो सरकार मन्त्रीमण्डल की हर बैठक में किसी
न किसी विभाग में कुछ पदों पर नयी नियुक्तियां करने के फैसले लेती रही है लेकिन इसी दौरान नागरिक आपूर्ति निगम से 76 डाटा एन्ट्री आप्रेटरों को नौकरी से भी निकाल दिया गया है। पथ परिवहन निगम और पर्यटन निगम में कई कर्मचारियों को शायद नियमित वेतन भी नही मिल पाया है। कोरोना के चलते सरकार को प्रतिमाह अनुमानित राजस्व नही मिल पा रहा है। इसी कारण से वित्त सचिव ने 29 जून को सारे प्रशासनिक सचिवों और विभागाध्यक्षों को पत्र लिखकर निर्देशित किया है कि वह सितम्बर माह तक एस ओ ई का 20ः से अधिक खर्च नही करेंगे। भारत सरकार ने भी सीमा से
अधिक कर्ज लेने के लिये शर्तें और कड़ी कर दी हैं। इस वस्तुस्थिति से यह आभास होता है कि सरकार की वित्तिय स्थिति ठीक नही है। लेकिन वित्त विभाग के 29 जून के बाद भी मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर और उनके सहयोगी मन्त्रीयों ने जनता में जितने पैसे की घोषणाएं विभिन्न कार्यों और योजनाओं के नाम पर कर दी हैं उससे यह कतई नही लगता कि सरकार को
कोई वित्तिय कठिनाई भी है। बल्कि जब से सरकार ने यह खुलासा किया है कि उसके पास 14000 करोड़ रूपये अनसपैंट पड़े हैं तब से वित्तिय स्थिति को लेकर स्थिति एकदम अस्पष्ट सी हो गयी है। क्योंकि इसी दौरान सरकार ने कर्ज भी उठाया है और केन्द्रिय वित्त राज्य मन्त्री अनुराग ठाकुर के ब्यानों के मुताबिक केन्द्र से भी प्रदेश को अच्छी आर्थिक सहायता मिली है। इस तरह सरकार के पास चैदह हजार करोड़ अनस्प्पैंट पड़े हो और केन्द्र से भी पर्याप्त सहायता मिल रही हो उसे बिजली के रेट तथा बस किराये में बढ़ौत्तरी करने की आवश्यकता क्यो ंपड़नी चाहिये। लेकिन सरकार न केवल इन
सेवाओं के रेट बढ़ा रही है बल्कि अलग से प्रदेश पर कर्ज का बोझ भी बढ़ाती जा रहा है। 31 मार्च 2018 तक की कैग रिपोर्ट के मुताबिक उस समय तक सरकार का कर्जभार 52000 करोड़ से ऊपर हो गया था। यह कर्ज इस समय साठ
हजार करोड़ का आंकड़ा पार करने वाला है। सरकार केवल कार्यों के नाम पर कर्ज लेती है। लेकिन विकास के नाम पर लिये गये इस कर्ज की सही तस्वीर कैग रिपोर्ट के मुताबिक इस कर्ज में से एक भी पैसा विकास कार्यों के लिये उपलब्ध नही था। सरकार ने कर्ज का उपयोग कैसे और क्या किया है इस पर कैग की टिप्पणी चैंकाने वाली है। यही नहीं सरकार आपदा प्रबन्धन के पैसे का उपयोग भी सरकारी भवनों की रिपेयर के लिये करती रही है। आपदा प्रबन्धन के पैसे में से सरकार के पास जरूरतमंद आपदा पीड़ितों को देने के लिये पैसा नहीं था। आपदा प्रबन्धन कोष का पैसा आपदा प्रभावी पर ही खर्च किया जा सकता है। इसका कहीं और उपयोग अपराध की श्रेणी में आता है।
Interest payments as percentage of Revenue Receipts increased from
9.36 per cent of 2016-17 to 10.34 per cent in 2017-18 which shows that the interest payments on public debt was increasing resulting in less availability of funds for development activities.
42.06 to 75.94 per cent of debt receipts were used for its repayments
during 2013-18. During 2017-18, 63 per cent of borrowed funds were
used for discharging existing liabilities.
The net funds available on account of the Internal debt and loans and
advances from GoI and other obligations after providing for the interest and repayments varied between minus ` 63 crore and ` 2,201 crore during 2013-18. The net debt available to the State for the year 2017-18 was minus ` 729 crore.
The State Executive Committee was not discharging its duty of ensuring that money drawn from SDRF was being properly utilised, resulting in diversion and misutilisation of ` 2.19 crore from SDRF by Deputy Commissioners for repair and restoration of Government office and residential buildings not damaged by disaster/ calamity, while claims of 3.19 crore for immediate relief to victims of natural calamities remained pending, defeating the purpose of SDRF. कैग की इन टिप्पणीयों के परिदृश्य में सरकार के वित्तिय प्रबन्धन पर बहुत ही गंभीर सवाल खड़े होते हैं। वित्त विभाग के पत्र के बाद भी जितनी वित्तिय घोषणाएं मुख्यमन्त्री स्वयं कर चुके हैं उस परिप्रेक्ष में शायद अब विधायक भी अपनी क्षेत्र विकास निधि की बहाली की मांग करने लग पड़े हैं। यही नहीं वित्तिय प्रबन्धन की इन्हीं विसंगतियों के कारण सरकार से श्वेत पत्र की मांग की जाने लग पड़ी है क्योंकि जब सरकार एक ओर से तो यह दावा करे कि उसके चैदह हजार करोड़ बिना खर्चे पड़े हैं और दूसरी ओर जनता पर कीमतें बढ़ाने और कर्ज का बोझ डालने का प्रयास करे तो सही स्थिति जानने के लिये श्वेतपत्र जारी किये जाने की मांग जायज हो जाती है।

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