Friday, 16 January 2026
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विभाग और मन्त्री को नज़रअन्दाज करके मुख्यसचिव ने झारखण्ड से बुलाया डैपुटेशन पर एक अधिकारी

शिमला/शैल। सरकार में सरकारी कामकाज निपटाने के लिये वाकायदा रूलज़ ऑफ बिजनेस बने हुए हैं और यह सदन से भी पारित है। इन नियमों में सरकार की हर कर्मचारी एवम् अधिकारी की कार्य शक्तियां परिभाषित हैं। इन नियमों के अतिरिक्त हर विभाग में इस आश्य का एक स्टैण्डिंग आर्डर भी रहता है। इसमें स्पष्टतः परिभाषित रहता है कि विभाग से संबंधित किस विषय का निपटारा सचिव के ही स्तर पर हो जायेगा और किस विषय में मन्त्री के स्तर पर ही फैसला होगा तथा कौन सा विषय मुख्यमन्त्री या मन्त्री से जायेगा। इन शक्तियों का सामान्यत अतिक्रमण नही किया जाता है और अतिक्रमण को शक्तियों के दुरूपयोग और भ्रष्टाचार की संज्ञा दी जाती है।
फिर जब ऐसा अक्रिमण जब मुख्य सचिव के स्तर पर हो जाये तो उसे क्या कहा जायेगा। अभी कुछ दिन पहले सहकारिकता विभाग में एक महिला अधिकारी झारखण्ड सरकार से डैपुडेशन पर शिमला पंहुच गयी। शिमला पंहुच कर महिला अधिकारी ने विभाग में जाकर जब ज्वाईनिंग देने के लिये संपर्क किया तो विभाग हैरान हो गया कि यहां पर दूसरे राज्य से अधिकारी की सेवाएं लेने की आवश्यकता क्यों और कैस पड़ गयी। जब विभाग में इसकी पड़ताल की गयी तब पता चला कि विभाग की ओर से ऐसा कोई आग्रह झारखण्ड सरकार को गया ही नही है तो फिर यह महिला अधिकारी बतौर सहायक पंजियक झारखण्ड से पदमुक्त होकर शिमला कैसे आ गयी। पता करने पर यह सामने आया कि इस महिला का पति प्रदेश के पुलिस विभाग में बतौर डीआईजी कार्यरत है और उसने अपनी पत्नी को शिमला लाने के लिये मुख्य सचिव से आग्रह किया था। मुख्य सचिव ने इस आग्रह पर अपने ही स्तर पर झारखण्ड सरकार को पत्र भेज दिया जिसके परिणामस्वरूप वहां की सरकार ने इस महिला अधिकारी को पदमुक्त करके शिमला भेज दिया। अब इस महिला अधिकारी श्रीमति जलाल को विभाग में ज्वाईन करवाने को लेकर समस्या खड़ी हो गयी है।
सहकारिता विभाग में 2013 को जारी हुए स्टैण्डिंग आर्डर के मुताबिक विभाग से किसी को डैपूटेशन पर भेजने और विभाग में किसी को डैपुटेशन पर लेने का फैसला लेने के लिये केवल संबंधित मन्त्री ही अधिकृत हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि मुख्यसचिव ने विभाग और उसके मन्त्री को बाईपास करके अपने ही स्तर ऐसा फैसला कैसे ले लिया? क्या मुख्यसचिव की नजर में विभाग के मन्त्री की कोई अहमियत नही है। जबकि यही मुख्यसचिव जब वीरभद्र शासन में नज़रअन्दाज हुए थे तब कैट में यही याचिका लेकर गये थे कि कार्मिक विभाग का प्रस्ताव नियमों के विरू़़द्ध है। वैसे तो दिल्ली के ऐम्ज़ में रही तैनाती के दौरान भी इन पर अपने पद के दुरूपयोग का मामला अभी तक चल रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जो अधिकारी एक डैपुटेशन के मामले में उन शक्तियों का प्रयोग कर जाये जो नियमों में उसके पास है ही नही तो ऐसा अधिकारी अपनी शक्तियों का दुरूपयोग किस स्तर तक कर सकता है इसकी कल्पना करना भी भयावह लगता है। यह अधिकारी प्रदेश के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में सदस्य के खाली पद के लिये आवेदक है। यह भी चर्चा है कि प्रदेश में रेरा की स्थापना भी इन्ही को वहां समायोजित करने के लिये की जा रही है। जबकि एनजीटी के आदेश के मुताबिक अब प्रदेश में अढ़ाई मंजिल से अधिक निर्माण हो ही नही सकता है। इस परिदृश्य में प्रदेश में कोई भी बिल्डर कितना निवेश करने को तैयार होगा। वैसे जब इस स्तर का अधिकारी किसी विभाग के मन्त्री को नज़र अन्दाज कर जाये तो इससे मन्त्री और मुख्यमन्त्री के बीच भी संबंधों को लेकर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। वैसे जब चौधरी वीरभद्र शासन में नज़रअन्दाज होने से आहत होकर स्वयं स्टडीलीव पर चले गये थे तब इन्होने जाने से पहले वाकायदा सरकार को बांड भरकर दिया था। लेकिन जब छुट्टी स्थगित करके वापिस आ गये थे तब इस बांड की रिक्वरी के लिये कार्मिक विभाग ने जो कारवाई शुरू की थी वह अब तक लंबित चली आ रही है। बांड के मुताबिक इन्हें सरकार को करीब पांच लाख रूपये देने हैं। अब क्या जयराम बतौर मुख्यमन्त्री इस पांच लाख की रिकवरी को अन्जाम देते हैं या नही इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है।

बरागटा बने सरकारी मुख्य सचेतक मन्त्री के बराबर पायेंगे वेतन भत्ते

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री एवम भाजपा विधायक दल के नेता जय राम ठाकुर द्वारा नरेन्द्र बरागटा को भाजपा दल का मुख्य सचेतक नियुक्त करने के आश्य का पत्रा प्राप्त होने के बाद विधानसभा सचिवालय ने इस नियुक्ति को मान्यता देते हुये इस आश्य की अधिसूचना जारी कर दी है। सचिव विधानसभा की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि बरागटा को सरकारी मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया है। इस अधिसूचना से यह संदेश जाता है कि संभवतः सचेतक एक सरकारी पद है जिसे इस तरह से भरा गया है। स्मरणीय है कि बजट सत्र के अन्तिम दिन जयराम ठाकुर की सरकार सदन में एक विधेयक लायी थी जिसमें मुख्य सचेतक और उप मुख्य सचेतक को वेतन-भते एवम् अन्य सुविधायें मंत्री के समकक्ष मिलेंगी। राज्यपाल की स्वीकृति के बाद यह विधेयक कानून बन गया है और इसके तहत यह पहली नियुक्ति सामने आयी है। इसके बाद दूसरी नियुक्ति कब किसकी आती है यह आन वाला समय ही बतायेगा। मुख्य सचेतक और उप मुख्य सचेतक को मन्त्री के समकक्ष दर्जा देकर क्या इन्हें सचिवालय में दफ्तर दिया जायेगा या विधानसभा मे इसकी व्यवस्था की जायेगी यह भी आने वाले समय में ही स्पष्ट हो पायेगा। मुख्य सचेतक को सरकार क्या काम देती है यह भी आगे ही पता चलेगा।
कानून के जानकारों के मुताबिक सचेतकों की भूमिका संसदीय सचिवों से भी कम है। दूसरे शब्दों में संसदीय सचिवों को तो यह अधिकार रहता है कि वह संबधित मंत्रा को विधायी कार्यां में राय दे सकते हैं। जबकि सचेतक न तो मंत्री से संवद्ध होगा न ही किसी विधायी कार्य में उसकी कोई भी भूमिका होगी। ऐसे में सरकारी मुख्य सचेतक के रूप में अधिसूचना जारी होना अपने में ही प्रश्नवाचक हो जाती है क्योंकि ‘‘सरकारी सचेतक’’ के नाम से सरकार में कोई पद ही सृजित नही है और शायद न ही हो सकता है।
इस परिदृश्य में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि सचेतक का संस्थान है क्या। भारत में सचेतक की प्रथा ब्रिटिश शासन से ली गई है। उसमें इसे इस तरह परिभाषित किया गया है  Every major political party appoints     a whip  who is responsible for the party's  disciplineand behaviour on the floor of the house. Usually, he /she directs theparty members to stick to the party's stand on certain    issuesand  directs them to vote as per the directions of the senior party members . 
संसद में 1998 में सचेतक को लेकर चर्चा आयी थी और 1999 में विधेयक लाया गया तथा पारित हुआ जिसे 2000 में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली। लेकिन संसद द्वारा पारित विधेयक में इन्हें मंत्री के समकक्ष नही रखा गया है। संसद में किस उद्देश्य के लिये यह विधेयक लाया गया था और उन्हे क्या क्या सुविधायें प्राप्त है वह इस प्रकार हैं THE LEADERS AND CHIEF WHIPS OF RECOGNISED PARTIES AND GROUPS IN PARLIAMENT (FACILITIES) ACT, 1998 (No. 5 of 1999) (As amended by Act No. 18 of 2000) [7th January, 1999] An Act to provide for facilities to Leaders and Chief Whips of recognised parties and groups in Parliament. Be it enacted by Parliament in the Forty-ninth Year of the Republic of India as follows:—

1. Short title and commencement. — (1) This Act may be called the Leaders and Chief Whips of Recognised Parties and Groups in Parliament (Facilities) Act, 1998. (2) ) It shall be deemed to have come into force on the 5th day of February, 1999’’.
2. In this Act, unless the context otherwise requires,—
(a) ‘‘recognised group” means,— (i) in relation to the Council of States, every party which has a strength of not less than fifteen members and not more than twenty-four members in the Council;
(ii) in relation to the House of the People, every party which has a strength of not less than thirty members and not more than fifty-four members in the House.
(b) “recognised party” means,— (i) in relation to the Council of States, every party which has a strength of not less than twenty-five members in the Council; (ii) in relation to the House of the People, every party which has a strength of not less than fifty-five members in the House.
*3. Facilities to the Leaders and Chief Whips of recognised groups and parties.—Subject to any rules made in this behalf by the Central Government, each leader, deputy leader and each Chief Whip of a recognised group and a recognised party shall be entitled to telephone and secretarial facilities: Provided that such facilities shall not be provided to such leader, deputy leader or Chief Whip, as the case may be, who— (i) holds an office of Minister as defined in section 2 of the Salaries and Allowances of Ministers Act, 1952; or (ii) holds an office of the Leader of the Opposition
as defined in section 2 of the Salary and Allowances of Leaders of Opposition in Parliament
Act, 1977; or (iii) is entitled to similar telephone and secretarial facilities by virtue
of holding any office of, or representation in, a Parliamentary Committee or other Committee, Council, Board, Commission or other body set up by the Government; or (iv) is entitled to similar telephone and secretarial facilities provided to him in any other capacity by the Government or a local authority or Corporation owned or controlled by the Government or any local authority.

सचेतक की परिभाषा और संसद द्वारा पारित किये गये विधेयक से यह स्पष्ट हो जाता है कि सचेतक न तो कोई सरकारी कार्य और न ही विधानसभा का ही अधिकारिक कार्य करेगा। सचेतक की भूमिका तो केवल विधानसभा सत्र के दौरान अपने ही विधायक दल के प्रति रहेगी। सत्र के बाहर सचेतक की कोई भूमिका नही रहती है। सदन में सत्र के दौरान किसी भी विधेयक या अन्य मुद्दे पर जिसमें सदन के भीतर मतदान होना हो उसमें सचेतक जारी करके अपने दल के विधायकों को सदन के नेता की ईच्छानुसार मतदान करने के लिये बाध्य किया जा सकता है। सचेतक जारी होने के बाद भी यदि कोई सदस्य सदन के नेता की ईच्छानुसार वोट नही करता है तब सचेतक की उल्लंघना पर संबंधित सदस्य के खिलाफ अनुंशासनात्मक कारवाई की जा सकती है यदि सदन का नेता चाहे तो। सदन के हर दल को अपना अपना सचेतक नियुक्त करने का अधिकार रहता है।
इस नियुक्ति के बाद यह बहस अवश्य उठेगी कि क्या सचेतक लाभ के पद के दायरे में आता है या नहीं। क्योंकि जब सचेतक की भूमिका उसके अपने दल से बाहर है ही नही तो फिर उसे सरकारी कोष से वेतन-भते और अन्य सुविधायें कैसे दी जा सकती हैं। जब यह विधेयक सदन मे आया था तब कांग्रेस ने इसका विरोध किया था। अब जब इसमें पहली नियुक्ति भी हो गयी है तब क्या कांग्रेस इसे उच्च न्यायालय में चुनौति देगी या नही। यह कांग्रेस की नीयत और नीति को लेकर एक बड़ा सवाल रहेगा। भाजपा के भीतर भी इस नियुक्ति के बाद किस तरह के समीकरण बनते बिगड़ते हैं और उनका आने वाले लोक सभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा यह देखना भी दिलचस्प होगा।

भाजपा के प्रस्ताव में कांग्रेस की केवल रस्मी आलोचना

शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा कार्यसमिति का दो दिन का सत्र राजनीतिक प्रस्ताव पास करके संपन्न हो गया है। इस प्रस्ताव में मोदी सरकार के महिमा मण्डन के अतिरिक्त कुछ भी नया सामने नही आया है। बल्कि एक तरह से प्रदेश कार्यसमिति के इस आयोजन को मोदी सरकार और उसकी नीतियों में विश्वास व्यक्त करने की ही कबाद करार देना ज्यादा संगत होगा। इस प्रस्ताव में प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी का तो जिक्र किया गया है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस की विकास नीति क्या और कैसी रही है और कांग्रेस प्रदेश को आर्थिक मोर्चे पर कहां छोड गयी है इसका कोई जिक्र इस प्रस्ताव में नही आया है। जबकि आने वाले चुनावों में कांग्रेस इसी मुद्दे पर सरकार को घेरेगी। भाजपा प्रस्ताव से ऐसा लगता है कि यह प्रस्ताव राजनेताओं की बजाये शायद सरकार के अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया है।
यह है प्रस्ताव-ः
हिमाचल प्रदेश भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति का यह दृढ़ मत है कि मोदी सरकार की दूरदर्शी नीतियों, आतंकवाद व अलगाववाद पर सख्त निर्णयों, कुशल विदेश नीति और लोक कल्याण व विकासोन्मुखी योजनाओं से जहां भारत दुनिया में शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा है वहीं देश में जनमानस का विश्वास सरकार के प्रति बढ़ा है।
कार्यसमिति का यह भी मानना है कि हिमाचल प्रदेश में भी जयराम सरकार ने अपने इस छोटे से कार्यकाल में प्रदेशहित व जनहित में अनेक निर्णय लेकर हिमाचल प्रदेश के सुनहरे भविष्य की नीव रख दी है।
देश की कमजोर, अपारदर्शी व पूर्णतः पूजींवादी अर्थव्यवस्था को बदलने के लिए मोदी सरकार ने देशहित में नोटबंदी, जीएसटी, दिवालियापन कानून व शोधन अक्षमता संहिता लागू कर भारतीय अर्थव्यवस्था में मूलभूत सुधार किए जिसके फलस्वरूप भारतीयअर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। भारत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा अनुमानित 7.5 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की वृद्धि दर के साथ दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार 2018 में भारत में विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना है।
हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा सरकार का पहला बजट समाज के सभी वर्गों के हितों की रक्षा करने व प्रदेश में चहुंमुखी विकास को सुनिश्चित करने वाला साबित होगा। बजट में जनकल्याण व प्रदेश को नई दिशा देने के लिए 30 नई योजनाएं शुरू की गई जो हिमाचल प्रदेश को स्वर्णिम बनाने में कारगर सिद्ध होगी।
भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने की दृष्टि से देश में कालाबाजारी व कालाधन रखने वालों की कमर तोड़ दी है। मई, 2014 के बाद देश में कोई घोटाला नहीं घटा। ऑनलाईन ट्रांजेक्शन व डायरक्ेट बेनिफिट स्कीम भी भ्रष्टाचार रोकने हेतु उपयोगी सिद्ध हो रही है।
हिमाचल सरकार ने भी भ्रष्टाचार रोकने व माफिया राज मिटाने के लिए सख्त कदम उठाए हैं जिनकी प्रदेश कार्यसमिति सराहना करती है।
यह एक निर्विवाद सत्य है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वच्छता को एक जनांदोलन बनाया और आज स्वच्छता जन मन का विषय बन चुका है। अक्तूबर, 2014 के बाद देश में 7 करोड़ 81 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया और 417 जिलों ने स्वयं को खुल में शौच मुक्त घोषित किया जिसे यह कार्यसमिति एक बड़ी सफलता मानती है। सस्ते व सर्वसुलभ ईलाज के लिए तो मोदी सरकार ने अनेक कदम उठाए ही परन्तु अब दुनिया की सबसे बड़ी योजना आयुष्मान भारत शुरू करके देश के 10 करोड़ गरीब परिवरों को प्रतिवर्ष स्वास्थ्य लाभ के लिए 5 लाख की राशि प्रदान की जाएगी जिससे लगभग 50 करोड़ की आबादी लाभान्वित होगी। इस अद्वितीय योजना को शुरू करने के लिए प्रदेश कार्यसमिति देश के स्वास्थ्य मंत्री और प्रधानमंत्री को बहुत-2 बधाई देती है।
वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के उद्देश्य से जहां केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना व प्रधानमंत्री सिचाई योजना शुरू करने व किसानों की पैदावार का लागत से डेढ़ गुना ज्यादा समर्थन मूल्य देने का निर्णय लिया वहीं प्रदेश सरकार ने जंगली जानवरों व बेसहरा पशुओं से फसलों को बचाने के लिए सौर ऊर्जा बाड़ लगाने में 85 प्रतिशत उपदान देने व गौ सदन निर्माण हेतु जमीन व धन उपलब्ध कराने जैसी उपयोगी कदम उठाए।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं की अहम भूमिका समझते हुए हमारी सरकारों ने स्वरोजगार के माध्यम से युवाओं के समग्र विकास पर जोर दिया जिसके लिए जहां केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुद्रा योजना, स्टार्ट अप इंडिया और स्टैण्ड अप इंडिया जैसी योजनायें चला करोड़ों युवाओं को लाभ दिया वहीं प्रदेश सरकार ने कम ब्याज पर ट्टण देने वाली मुख्यमंत्री स्वाबलम्बन योजना समेत अनेक योजनाएं शुरू की।
गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को लेकर मोदी सरकार ने उज्जवला व प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी 112 योजनायें चलाई जिनके फलस्वरूप देश के लगभग 22 करोड़ गरीब लोगों को लाभ मिला, जिनमे अधिकतर अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग से सम्बन्धित है। अन्य पिछड़ा आयोग वर्ग के गठन से भी इन वर्गों की समस्याओं का समाधान होगा। इसी तर्ज पर प्रदेश सरकार हिमाचल गृहणी सुविधा योजना व सामाजिक सुरक्षा पैंशन के अंतर्गत 70 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों की आय सीमा की शर्त हटाकर उनको 1300 पैंशन देने के निर्णय और अन्य योजनाओं के माध्यम से लगभग 3 लाख पात्र व्यक्तियों को फायदा पहुंचा चुकी है जिसकी यह कार्यसमिति प्रशंसा करती है।
हिमाचल सरकार ने प्रदेश में हैली टैकसी सेवा शुरू कर और रोप-वे निर्माण हेतु उचित कदम उठा पर्यटन विकास की दृष्टि से प्रशंसनीय कार्य कर रही है। मण्डी में कलस्टर विश्वविद्यालय शुरू करना और रूसा प्रणाली में वांछित संशोधन करना प्रदेश सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जनमंच कार्यक्रम के माध्यम से जनससमयाओं का मौके पर समाधान कर मुख्मयंत्री व मंत्रीगण जन सेवा-नारायण सेवा के मूलमंत्र को चरितार्थ कर रहे हैं।
पहले भूतपूर्व सैनिकों के लिए वन रैंक वन पैंशन लागू कर और अब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं व सहायिकाओं के मानदेय में बढ़ौतरी कर प्रधानमंत्री महोदय ने अभूतपूर्व कार्य किया है। मोदी सरकार ने हिमाचल प्रदेश को एम्स, हाइड्रो पावर इंजीनियरिंग कॉलेज, चार मेडिकल कॉलेज, पीजीआई के सैटेलाईट सेन्टर, आईआईएम, आईआईटी, 69 राष्ट्रीय उच्च मार्ग, 3 फोरलेन, 8 ओवरहैड ब्रिज, रेलवे विस्तार हेतु लगभग 500 करोड़ का बजट, शिमला व धर्मशाला को स्मार्ट सिटी व हिप्र को विशेष राज्य के दर्जे जैसी सौगातें तो पहले ही दे दी है और अब वर्तमान प्रदेश सरकार के प्रयासों से हिमाचल प्रदेश को एनडीआरएफ बटालियन स्वीकृत होना, बागवानों की दशा व दिशा बदलने वाले 1681 करोड़ के प्रोजैक्ट को स्वीकृत करना, वॉटर कंजरवेशन के प्रोजेक्ट हेतु 4751 करोड़ मंजूर करना व शिमला शहर के लिए पीने के पानी की समस्या के समाधान हेतु 791 करोड़ स्वीकृत होना, अनेक ऐसे विषय हैं जिनके लिए हिमाचल भाजपा केन्द्र सरकार का आभार प्रकट करती है।
भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि भाजपा सरकारों की उपलब्धियां देख कर कांग्रेस पार्टी के नेता बौखला गए हैं। बौखलाहट में तथ्यहीन व आधारहीन बयानबाजी कर राजनीति में नौसिखिये साबित हो रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी मुद्दाविहीन कांग्रेसी नेता आलोचना के लिए आलोचना करने की आदत से मजबूर तथ्यों के बिना सरकार की आलोचना करते रहते हैं।
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की गुटबाजी तो पहले से जगजाहिर है और अब उनकी प्रभारी आग में घी डालने का काम कर रही है। वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे कांग्रेसी नेता रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने में पूरी तरह से नाकाम सिद्ध हुए हैं। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संसद के अंदर व बाहर नाटकीय व्यवहार कर जनता के बीच हास्य के पात्र बन रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व व कृतत्व से घबरा कर सभी विपक्षी दल एक जुट होने का प्रयास कर रहे हैं। उनके पास सर्वमान्य नेता व नीति का अभाव है, सिर्फ एक ही उद्देश्य है मोदी रोको, परन्तु मोदी जी की लोकप्रियता जिस तरह से देश और दुनिया में बड़ी है और भारतीय जनता पार्टी का संगठन जिस तरह से बूथ स्तर तक मजबूत हुआ है, विपक्षी दल अपने मंसूबों में कभी कामयाब नहीं होंगे। हिमाचल भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति कार्यकर्ताओं से आहवान करती है कि वे आगामी लोकसभा चुनाव हेतु कमर कस लें, अपनी सरकारों की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचायें, कांग्रेसी नेताओं के कुप्रचार का बखूबी जवाब दें, दिन-रात मेहनत कर पार्टी के कार्यक्रमों को सफल बनायें और फिर से चारों लोकसभा सीटें जीतने में अपनी अहम भूमिका अदा करें।
प्रस्ताव भाजपा प्रवक्ता रणधीर शर्मा ने पेश किया और पार्टी के महासचिव राम कुमार ने इसका अनुमोदन किया।

मित्रा के माध्यम से जयराम का धूमल पर निशाना

अफसरशाही ने बिछायी बिसात

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने वीरभद्र शासन के दौरान धूमल के खिलाफ आयी आय से अधिक संपति की शिकायत की जांच बन्द करने का फैसला लिया है। ऐसा विजिलैन्स की सिफारिश पर किया गया है। लेकिन धूमल पुत्रों अनुराग और अरूण के खिलाफ यह जांच जारी रहेगी। क्या अनुराग और अरूण के खिलाफ जांच चलाये रखने लायक कोई ठोस तथ्य विजिलैन्स के पास हैं इसका कोई खुलासा सामने नही आया है। जबकि अरूण धूमल तो पब्लिक सर्वैन्ट की परिभाषा में ही नही आते हैं और उन पर पीसी एक्ट लगता ही नही है। प्रशासनिक और राजनीतिक हल्कां में सरकार के इस फैसले के कई अर्थ लगाये जा रहे हैं। अब इसी के साथ सरकार ने वर्ष 2010 में रहे प्रधान सचिव राजस्व पूर्व मुख्य सचिव पी मित्रा के खिलाफ उस मामले में पुनः जांच करने का फैसला लिया है जिसमें विजिलैन्स ने एक समय क्लोजर रिपोर्ट अदालत में डाल दी थी। इस क्लोज़र रिपोर्ट के खिलाफ विजिलैन्स ने इस वर्ष मई में अदालत में आग्रह डाला कि वह इसमें नये सिरे से जांच करना चाहती है। अदालत ने नियमानुसार इस आग्रह को मान लिया और जांच की अनुमति दे दी। अब विजिलैन्स ने इसमें जांच शुरू कर दी है और मित्रा से पूछताछ करने के लिये विजिलैन्स मुख्यालय तलब किया है।
शिकायत है कि भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत ज़मीन खरीदने की अनुमति मांगने के लिये आये एक आग्रह में यह स्वीकृति देने के एवज में घूस के तौर पर पैसे का लेनदेन हुआ है। यह पैसा एक बिचौलिये के माध्यम से हुआ है और इसमें संबधित लोगों के बीच हुई बातचीत की रिकार्डिंग उपलब्ध होने का दावा किया गया है। यदि ऐसी कोई रिकार्डिंग उपलब्ध है तो क्या यह फोन टेपिंग सरकार से अनुमति लेकर की गयी है या यह अवैध रूप से की गई फोन टेपिंग है। यह सवाल भी अपने में अलग से खड़ा है क्योंकि पिछले दिनों पूर्व डीजीपी आईडी भण्डारी ने अवैध फोन टेपिंग के आरोपों का जो मामला अदालत में लड़ा है उसमें शायद ऐसी किसी फोन टेपिंग का कोई जिक्र नहीं आया है। न ही इस टेपिंग के आधार पर कोई कारवाई की गयी है। स्मरणीय है कि 118 के इस मामले की जांच पूर्व में वीरभद्र शासन के दौरान हुई है और तभी विजिलैन्स ने इसमें क्लोजर रिपोर्ट दायर की थी। अब इस जांच के पुनः शूरू होने से वीरभद्र शासन के दौरान रहे विजिलैन्स तन्त्रा पर भी अपरोक्ष में गंभीर आरोप आते हैं। वैसे विजिलैन्स ने अब पुनः जांच शुरू करने पर भी इस मामले में रहे कथित बिचौलियों के खिलाफ कोई कारवाई नही की है। पैसे का लेन देन होने के आरोप का जो दावा किया जा रहा है उसकी भी कोई रिकवरी किसी से अब तक नही हुई है।
विजिलैन्स द्वारा की जा रही इस जांच के कई गंभीर परिणाम होंगे। इसलिये धारा 118 के तहत ज़मीन खरीद की अनुमति मांगने की प्रक्रिया को भी समझना आवश्यक है। धारा 118 के तहत अनुमति की प्रार्थना व्यक्ति जिलाधीश, सचिव या संबंधित विभागाध्यक्ष किसी के पास भी दायर कर सकता है। ऐसी प्रार्थना कहीं भी डाली जाये उस पर संबंधित जिलाधीश की रिपोर्ट लगती है। इस रिपोर्ट में बहुत सारे बिन्दुओं पर सूचना दी जाती है। जिसमें यह शामिल रहता है कि ज़मीन बेचने वाला ज़मीन बेचने के बाद भूमिहीन तो नही हो जायेगा। जम़ीन पर कोई पेड तो नही है यदि है तो उनकी किस्म क्या है। फिर जिस उद्देश्य के लिये ज़मीन ली जा रही है उससे जुड़े विभाग से एनओसी इसी के साथ बिजली, पानी, सड़क सभी विभागों से भी एनओसी चाहिये। यह एनओसी मिलने के साथ जिलाधीश रिपोर्ट लगाकर फिर सचिव को भेजगा। सचिव से फिर मुख्यमन्त्रा तक फाईल जायेगी। इसके लिये वाकायदा स्टैण्डिंग आर्डर जारी है कि धारा 118 के तहत अनुमति की कोई भी स्वीकृति सचिव या मन्त्री के स्तर पर नही होगी। यह अनुमति केवल मुख्यमन्त्री के स्तर पर ही मिलेगी। यह पूरी प्रक्रिया परिभाषित है। इसमें फील्ड के एनओसी फिर जिलाधीश सबकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। सचिव के स्तर पर तो यह देखा जाता है कि वांच्छित अनुमतियां और रिपोर्ट है या नही। इसे स्वीकारने या नकारने का अन्तिम फैसला तो मुख्यमन्त्री का रहता है।
अब जब 118 के मामले में प्रधान सचिव राजस्व से पूछताछ की जायेगी तो निश्चित रूप से उसके बाद मुख्यमन्त्री से भी पूछताछ करनी पड़ेगी। 2007 के दिसम्बर में भाजपा की धूमल के नेतृत्व में सरकार बन गयी थी। उस दौरान धूमल सरकार पर हिमाचल ऑनसेल का आरोप लगा था। विधानसभा में 25.8.2011 को कुलदीप सिंह पठानिया, कौल सिंह और जी एस बाली का प्रश्न लगा था इसमें पूछा गया था कि जनवरी 2008 से अब तक कितने गैर हिमाचलीयों और गैर कृषको को धारा 118 के तहत अनुमतियां दी गयी हैं। कितनों को अनुमति के बाद भू उपयोग बदलने की भी अनुमति दी गयी है। इस प्रश्न के उत्तर में 1004 गैर हिमाचलीयों और 370 गैर कृषकां को अनुमति दी गयी है। इसमें कुछ आईएएस भी अनुमति पाने वालों में शामिल हैं। इसके बाद राजन सुशान्त ने भी किसी के नाम पर आरटीआई डालकर इन अनुमतियां की जानकारी ली है। जिसमें कई पत्रकार और अखबार घराने तक शामिल हैं। आरटीआई में हजा़रो की सूची सामने आयी है। अब जब जयराम सरकार ने यह जांच शुरू करवा दी है तो निश्चित रूप से इन सारे मामलों की जांच करवानी ही पड़ेगी। यदि सरकार जांच को सीमित रखने का प्रयास करेगी तो उसे कोई भी न्यायालय में चुनौती दे देगा। जिस अफसरशाही ने इस जांच की विसात बिछाई है वह इस प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित है। इससे स्वतः ही सि़द्ध हो जाता है कि हिमाचल ऑन सेल के जिस आरोप की जांच वीरभद्र सरकार ने नही करवाई वह जांच अब जयराम सरकार करवाने जा रही है।

क्या सानन की शिकायत के राजनीतिक अर्थ भी हैं उठने लगी है यह चर्चा

धूमल-वीरभद्र दोनों की ही सरकारें आयेंगी जांच के दायरे में

शिमला/शैल। सेवानिवृत अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक सानन ने वीरभद्र सरकार के कार्यकाल मे हुई कुछ धांधलियों को उजागर करते हुए जयराम ठाकुर की सरकार से इस संबंध में एफआईआर दर्ज करके जांच किये जाने की मांग की है। स्मरणीय है कि इस बारे में सानन ने जून माह में भी मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर यह मांग की थी। लेकिन तीन माह में इस पत्र पर कोई कारवाई न होने के कारण सानन ने अब एक पत्रकार वार्ता करके इसे सार्वजनिक संज्ञान में ला दिया है। यहां यह विचारणीय है कि सानन और मुख्य सचिव विनित चौधरी एक ही बैच के अधिकारी हैं और जब वीरभद्र शासनकाल मे इनको नज़रअन्दाज करके वीसी फारखा को मुख्य सचिव बना दिया गया था तब इन दोनों ने ही संयुक्त रूप से एक याचिका डालकर फारखा की नियुक्ति को कैट में चुनौती दी थी। इस चुनौती के परिणामस्वरूप जब कैट ने चौधरी को फारखा के समकक्ष सिवधाएं प्रदान करवा दी थी और चौधरी ने छुट्टी कैन्सिल करके पुनः पदभार संभाल लिया था तब भी सानन को अपनी सेवानिवृति से एक सप्ताह पहले तक छुट्टी पर रहना पड़ा था। उस समय ली गयी तीन माह की छुट्टी का लाभ चौधरी ने मुख्य सचिव बनने के बाद 2018 में सानन को स्टडी लीव के रूप में मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर से दिलवाया। इस खुलासे से यह स्पष्ट हो जाता है कि चौधरी और सानन में कितने घनिष्ठ रिश्ते है।

लेकिन जब इतने घनिष्ठ रिश्ते होने के बावजूद चौधरी ने सानन के पत्र पर कोई कारवाई नही की और सानन को आर.एस. गुप्ता को साथ लेकर पत्रकार वार्ता करनी पड़ी तो निश्चितरूप से इस मामले के उस पक्ष को देखना आवश्यक हो जाता है जो अबतक सामने नही आया है। गौरतलब है कि जो पत्रा जून में सानन ने मुख्य सचिव को भेजा था उसमें होटल वाईल्ड फ्रलावर छराबड़ा और रामपुर के मन्दिर को ग्रांट देने के मामले शामिल नही थे। छराबड़ा के होटल का मामला निश्चित रूप से अन्य मामलों से ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि इसमें प्रदेश सरकार को जो प्रतिवर्ष करोड़ों की आमदनी होनी थी वह नही हो रही हैं। इस होटल प्रकरण में दो-दो बार एमओयू हस्ताक्षरित हुए हैं। इस होटल प्रकरण का तो विशेष ऑडिट करवाये जाने की सिफारिश ए.जी. तक ने की हुई हैं। लेकिन आज तक यह ऑडिट नही हो पाया है क्योंकि किसी भी सरकार ने इस आश्य का पत्र कैग को लिखने की हिम्मत नही की है। यह होटल प्रकरण 1993 से 1995के बीच घटा है और इसके बाद दो बार भाजपा तथा दो बार कांग्रेस की सरकारें रह चुकी हैं। ऐसे में जब आज इस मामले में वाकायदा एफआईआर दर्ज करके जांच करवायी जाने की मांग की जा रही है तो निश्चित रूप से इस जांच के दायरे में वीरभद्र के साथ ही धूमल का भी दोनो बार का कार्यकाल रहेगा ही।
इसमें यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या इस होटल का मामला किसी विशेष राजनीतिक मकसद से उठाया गया है। क्योंकि इस प्रकरण में कैग से विशेष ऑडिट करने के लिये तो जयराम सरकार की ओर से भी कोई कदम नही उठाया गया हैं । वैसे तो सानन स्वयं भी एक समय वित्त विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और ऐसे मामलों में जब भी कोई एमओयू हस्ताक्षरित होने की कारवाई होती है तब ऐसे बड़े फैसलों में वित्त सचिव या उसका कोई प्रतिनिधि शामिल रहता है ताकि वह यह सुनिश्चित कर सके की इसमें राज्य के हित सुरक्षित रह रहे है या नही। ऐसे मे यह होटल प्रकरण एक ऐसा मुद्दा खड़ा हो गया है कि यदि इसमें सरकार कोई कारवाई नही करती है तो कोई भी इसे जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय तक ले जा सकता हैं।
सानन के पत्रा और अब पत्रकार वार्ता के बाद यह संभावना भी प्रबल हो गयी है सानन के स्टडीलीव और टीडी लेने के मामलों को भी कोई विजिलैन्स और फिर अदालत में ले जा सकता है। क्योंकि स्टडीलीव मामले में जो जवाब विधानसभा में आये एक प्रश्न के उत्तर में दिया गया है उससे स्थिति और गंभीर हो गयी हैं इस जवाब में स्टडी लीव के जो नियम पटल पर रखे गये हैं उनके अनुसार इस स्टडीलीव के लिये पहले भारत सरकार से अनुमति लेना आवश्यक था जो नही ली गयी है। फिर स्टडी पर जाने से पहले एक बॉंड भरना पड़ता है जो कि नही भरा गया। जबकि मुख्य सचिव विनित चौधरी ने उस समय ऐसी ही छुट्टी जाने पर बॉंड  भरा था। जिसको लेकर अब एक विवाद भी चल रहा है फिर सानन ने इस स्टडी लीव के बाद जो करीब तीस पन्नों का अपना अध्ययन ''Property Titling in India''  जो सरकार को सौंपा है उससे सरकार को कितना लाभ हुआ है और इस अध्ययन के आधार पर आगे क्या कदम उठाये गये है। इस बारे में प्रश्न के जवाब में कुछ नही कहा गया है जानकारों के मुताबिक मुख्यमन्त्री को इसका जवाब देना कठिन हो जायेगा क्योंकि सानन को सेवानिवृति के बाद यह स्टडीलीव लाभ उनके अनुमोदन से ही मिला है। नियमों के मुताबिक सानन इस लाभ के पात्र नही थे।

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