शिमला/शैल। जयराम सरकार बनने के बाद सहकारी सभाएं ने 6 अप्रैल को कांगड़ा केन्द्रीय सहकारी बैक धर्मशाला के अध्यक्ष और बोर्ड को निलंबित करने का नोटिस जारी किया था। इस नोटिस को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी। चुनौती दिये जाने के बाद 19 जुलाई को तकनीकि आधार पर इस नोटिस को वापिस ले लिया गया और फिर उसी दिन नया नोटिस जारी कर दिया गया। इसे भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। अब इस पर उच्च न्यायालय का फैसला आ गया है। अदालत ने इस निलंबन को सही पाया है।
अदालत ने अपने फैसले में नाबार्ड की निरीक्षण रिपोर्ट का जिक्र उठाते हुए कहा है कि बैंक ने 90 लोगों को 31 दिसम्बर 2017 जोखिम सीमा से बाहर जाकर कर्ज दिया। इसके अतिरिक्त 119 लोगों को नियमों के बाहर जाकर ऋण दिया गया। सी.ए. की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से 2017 तक की आडिट रिर्पोटों में कई अनियमितताएं उजागर हुई है। जिसमें बैंक का एन.पी.ए. 11.43 प्रतिशत से बढ़कर 16.25 प्रतिशत होना सामने आया है। रिर्पोट में फ्राड उजागर हुआ है लेकिन इसमें शामिल रकम की वसूली के लिये कोई कदम नही उठाये गये हैं। यही नही आरबीआई के दिशा निर्देशों के खिलाफ जाकर रियल इस्टेट को कर्ज दिया गया है। विधानसभा के पिछले सत्र में इस संबध में पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में एनपीए हुये खातों की पूरी रिपोर्ट सदन के पटल पर आ चुकी है। इसमें भाजपा के कई शीर्ष नेताओं के नाम भी सामने आये हैं। ऐसा भी लगता है कि प्रदेश से बाहर भी ट्टण बांटे गये हैं।
सदन में सहकारी बैंकों के एनपीए की रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने कुछ बिन्दुओं पर विजिलैन्स जांच करवाने के लिये विजिलैन्स को पत्रा लिखा था। लेकिन सरकार के इस शिकायत पत्र पर आज तक कोई कारवाई नही हुई है जबकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार सात दिन के भीतर मामला दर्ज हो जाना चाहिये था। अब जब प्रदेश उच्च न्यायालय ने सरकार के निलंबन के फैसले को सही करार दे दिया है तब यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या अब विजिलैन्स इस पर कारवाई करेगी या नही और करेगी तो कितने समय के भीतर। क्योंकि सूत्रों के मुताबिक मुख्यमन्त्री कार्यालय में बैठे हुए कुछ लोग ऐसा नही चाहते है।
जयराम और सत्ती के लिये खड़ी हुई चुनौती
शिमला/शैल। दस माह के इन्तजार के बाद अन्ततः दस और नेताओं को ताजपोशीयों का उपहार नवरात्रों में नसीब हो गया है। इनमें अकेले गणेश दत्त ही हिमफैड की अध्यक्षता प्राप्त कर पाये हैं और बाकी नौ को उपाध्यक्ष की कुर्सी से हीे संतोष करना पड़ा है। इस ताजपोशी से पहले सरकार बनते ही चारों संसदीय क्षेत्रों के संगठन मंत्री और एक मीडिया सलाहकार को ताजपोशियां मिल गयी थी। उसके बाद तीन महिला नेत्रियां तथा
कुछ सेवानिवृत अधिकारियों को भी ऐसे ही सम्मान के साथ नवाजा गया था। बल्कि इनमें एक नेत्री तो इतनी भाग्यशाली रही है कि उन्हे कांग्रेस सरकार में भी ताजपोशी प्राप्त थी और अब फिर हासिल हो गयी है। इसी के साथ दो विधायकों नरेन्द्र बरागटा और रमेश धवाला को भी मन्त्री स्तर का सम्मान हासिल हो गया है। इस तरह जयराम सरकार ने भी अब तब तीन दर्जन से अधिक नेताओं को अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों के रूप में सम्मान से नवाजा है। अभी कई महत्वपूर्ण कुर्सीयां खाली हैं और उम्मीद की जा रही है कि उन्हंे भी लोकसभा चुनावों से पूर्व भर दिया जायेगा। क्योंकि पार्टी को फिर से लोकसभा की चारों सीटों पर जीत हासिल करनी है और इसके लिये यदि ताजपोशीयों का आंकड़ा कांग्रेस के आंकड़े से भी बढ़ाना पड़ेगा तो जयराम इसमें भी गुरेज नही करेंगे।
लेकिन क्या इस सबके बावजूद जयराम चारों सीटों पर जीत हालिस कर पायेंगे यह सवाल भी साथ ही खड़ा हो गया है। क्योंकि इन ताजपोशीयों के बाद हमीरपुर के भोरंज और कांगड़ा के इन्दौरा में नाराजगीे के स्वर मुखर होकर पार्टी की चैखट लांघकर सड़क तक आ पहंुचे हैं। मनोहर धीमान से तो पद वापिस लेने तक की मांग रख दी गयी है। फिर जब दो विधायकों बरागटा और ध्वाला को ताजपोशी दे दी गई है तो उसी तर्क पर अन्य विधायकों को इससे वंचित कैसे रखा जा सकेगा। जयराम सिद्धान्त रूप से इतनी ताजपोशीयों के पक्षधर नही रहे हैं यह उन्होने ऊना के बंगाणा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए स्पष्ट कहा था। लेकिन अब जब उन्हे यह ताजपोशीयां देनी पड़ी है तो स्वभाविक है कि यह सब उन्हे भारी राजनीतिक दबाव में करना पड़ा है। पार्टी में किस तरह से आन्तरिक समीकरण उलझ चुकेे हैं इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जहां-जहां जिला परिषदों और ब्लाॅक समीतियों में पासे बदलवा कर सत्ता पर कब्जा करने का प्रयास किया गया वहां पर पूरी तरह सफलता नही मिल पायी है। बंजार में तो जनता ने ही भाजपा के खिलाफ वोट दिया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी में सब कुछ ठीक नही चल रहा है।
इसके अतिरिक्त आने वाले लोकसभा चुनाव में पार्टी के उम्मीदवारों को लेकर भी स्थिति बहुत सहज नही होने वाली है। क्योंकि इस समय पार्टी के शिमला और हमीरपुर के सांसदों के खिलाफ मामले अदालत में चल रहे हैं यदि पार्टी इन लोगों को फिर से उम्मीदवार बनाती है तो सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार इनके मामलों को पार्टी को चुनावों के दौरान पूरी तरह प्रचारित करके मतदाताओं के सामने रखना होगा। ताकि मतदाताओं को इनके खिलाफ चल रहे मामलों की विस्तृत जानकारी मिल सके। इसमें जब ‘‘कैशआॅन कैमरा’’ जैसा आरोप जनता के सामने जायेगा तो उससे निश्चित रूप से पार्टी की छवि पर नकारात्मक असर पड़ेगा। ऐसे में यह चुनाव सरकार को अपनी ही छवि पर लड़ना पड़ेगा। इस परिदृश्य में शिमला और हमीरपुर के वर्तमान सांसदों के स्थान पर नये उम्मीदवार लाने की मांग उठ सकती है। कांगड़ा के सांसद शान्ता कुमार तो पहले ही कह चुक हैं कि वह अगला चुनाव लड़ने के ज्यादा इच्छुक नही हैं। इसी के साथ यह सवाल भी उठेगा कि पार्टी किसी महिला को भी चुनाव में उतारती है या नही और उसके लिये कौन सी सीट रखी जाती है। मण्डी से मुख्यमन्त्री की पत्नी के भी उम्मीदवार होने की चर्चाएं काफी समय से चल निकली है और किसी ने इन अटकलों को खारिज भी नही किया है। लेकिन मण्डी से पंडित सुखराम ने भी उनके पौत्र को टिकट दिये जाने की मांग छेड़ दी है ऐसे में इस बार का लोकसभा चुनाव 2014 की तरह आसान रहने वाला नही है।
2014 के चुनाव में भाजपा ने वीरभद्र सिंह के खिलाफ लगेे आरोपों को खूब भुनाया था। लेकिन इस बार वही आरोप सरकार के गले की फांस बनने वाले हैं। क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार का अपना ही रिकार्ड बहुत अच्छा नही है। केन्द्र की ऐजैन्सी एनपीसीसी ने ही प्रदेश को आठ करोड़ का चूना लगा दिया है। लेकिन संवद्ध तन्त्र इस पर आॅंखे मूंदे बैठा है। जबकि कांग्रेस विधायक राम लाल ठाकुर पूरेे दस्तावेज़ी साक्ष्यों के साथ एक पत्रकार वार्ता में इस आरोप को उछाल चुके हैं। इसी तरह जहां सरकार 118 की जांच करवा रही है वहीं पर स्वयं इसमें नियमों/कानूनांे को अंगूठा दिखा रही है। ऐसे बहुत सारे प्रकरण घट चुके हैं और उनके दस्तावेजी साक्ष्य भी बाहर आ चुके हैं। सरकार और संगठन इन मुद्दों के प्रति पूरी तरह बेखबर होकर चल रहा है। बल्कि आपस में ही उलझा हुआ है और इस उलझन का आलम यहां तक पंहुच गया है कि पिछले दिनों अमितशाह को जयराम और पवन राणा को इक्कठे बैठाकर लम्बा प्रवचन पिलाना पड़ा है।
यह है नई ताजपोशियां
प्रदेश सरकार ने राज्य के विभिन्न बोर्डों व निगमों के लिए एक अध्यक्ष व नौ उपाध्यक्षों की नियुक्ति की है। गणेश दत्त को हिमफैड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। हमीरपुर के विजय अग्निहोत्री को हिमाचल पथ
परिवहन निगम के उपाध्यक्ष, ऊना के राम कुमार को एचपीएसआईडीसी का उपाध्यक्ष, पूर्व मंत्री प्रवीण शर्मा को हिमुडा का उपाध्यक्ष, किन्नौर के सूरत नेगी को वन निगम का उपाध्यक्ष, शिमला की रूपा शर्मा को सक्षम गुड़िया बोर्ड का उपाध्यक्ष, कांगड़ा के मनोहर धीमान को जीआईसी का उपाध्यक्ष, सोलन के दर्शन सैनी को हिमाचल जल प्रबन्धन बोर्ड का उपाध्यक्ष, सिरमौर के बलदेव तोमर को हि.प्र. खाद्य एवं आपूर्ति निगम का उपाध्यक्ष तथा कुल्लू के राम सिंह को एचपीएमसी के उपाध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया है।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने दावा किया है कि उन्होने केन्द्र से नौ हजार करोड़ की योजनाएं स्वीकृत करवा ली है। इसी दावे के साथ प्रदेश को सैद्धान्तिक तौर पर मिले 70 राष्ट्रीय उच्च मार्गों के लिये भी केन्द्र से प्रदेश को 65000 करोड़ रूपये स्वीकृत होने को एक बड़ी उपलब्धि कहा जा रहा है। मुख्यमन्त्री के इन दावों की ज़मीनी सच्चाई क्या है इसको लेकर नेता प्रतिप़क्ष मुकेश अग्निहोत्री ने सरकार से इन योजनाओं की तफसील के साथ इस संबन्ध में एक श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है। मुख्यमन्त्री के इन दावांे पर इसलिये
सवाल उठाये जा रहे हैं क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान मण्डी में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए प्रधानमन्त्री मोदी ने भी वीरभद्र सरकार से 72 हजार करोड़ का हिसाब मांगा था। मोदी ने दावा किया था कि उसकी सरकार ने हिमाचल को 72 हजार करोड़ दिये हैं और सरकार बताये उसने यह पैसा कहां खर्च किया है। लेकिन मोदी के इस दावे पर जयराम के बजट भाषण ने प्रश्नचिन्ह लगा दिया जब बजट मे यह कहा गया कि केन्द्र से प्रदेश को करीब 42 हजार करोड़ मिले हैं। आंकड़ो के इस खेल ने विधानसभा चुनाव में जो प्रभाव दिखाना था वह उस समय हो गया और इसके परिणामस्वरूप यहां पर भाजपा की सरकार बन गयी। क्योंकि उस समय इन आंकड़ों को किसी ने चुनौती नही दी थी। परन्तु अब मुकेश ने आंकड़ो की इस बाजीगरी को समझते हुए मुख्यमन्त्री को इस पर श्वेत पत्र जारी करने की चुनौती दे डाली है और जयराम इस चुनौती को स्वीकार नही कर पाये हैं। मुख्यमन्त्री इन आंकड़ो के स्पष्टीकरण में केवल यही कर पाये हंै कि यह योजनाएं सिद्धान्त रूप में स्वीकार हुई हैं और इन्हें अमलीशक्ल लेने में वक्त लगेगा। इसी के साथ मुकेश ने जगत प्रकाश नड्डा को लेकर आये ब्यानांे और समाचारों पर चुटकी लेते हुए जयराम द्वारा की गयी ताजपोशीयों को दवाब का परिणाम कहा है। बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सुक्खु ने तो दो कदम और आगे जाकर यहां तक कह दिया कि जयराम तो केवल मुखौटा हैं तथा सरकार तो आरएसएस चला रहा है। मुकेश और सुक्खू के ब्यानों पर पलटवार करते हुए जयराम ने इन्हे यह सुझाव दिया है कि वह अपने घर संभाले क्योंकि वहां पर अभी कई लोगों की नेता प्रतिप़क्ष तथा प्रदेश अध्यक्ष होने पर नज़रें लगी हुई हैं। यह सही है कि कांग्रेस में अध्यक्ष को बदले जाने को लेकर इन दिनों अटकलों का बाज़ार बहुत गर्म चल रहा है। कई नाम चर्चा में चल रहे हैं लेकिन इसी के साथ यह भी हकीकत है कि इन दिनों कांग्रेस एक जुट भी होती जा रही है और इस एकजुटता के परिणामस्वरूप आजकल वीरभद्र-सुक्खू के वाक्युद्ध पर भी पूरी तरह विराम लग गया है। इससे यह स्पष्ट संकेत उभर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी तैयारी और रणनीति के साथ उतरने वाली है।

शिमला/शैल। एनजीटी ने शिमला के कोर/ग्रीन एरिया में नये निर्माणों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाया हुआ है। इस प्रतिबन्ध के चलते इन क्षेत्रों में केवल पुराने निर्माणों को ही नये सिरे से बनाया जा सकता है। इसके लिये भी नक्शा एनजीटी के फैसले की अनुपालना में बनाई गयी कमेटीयां ही पास करेंगी। लेकिन क्या प्रशासन एनजीटी के इन आदेशों की अनुपालना करवा पा रहा है यह सवाल शहर के ग्रीन/कोर एरिया में अभी भी चल रहे निर्माणांे के कारण उठा है।
शहर का निगम बिहार एरिया ग्रीन एरिया में आता है और इस नाते यहां पर नये निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबन्ध है। पुराने निर्माण भी अढ़ाई मंजिल से ज्यादा के नही बन पायेंगे। यहां पर एक भवन का तीन मंजिलों का निर्माण 1993 में पूरा हो गया था। उसके बाद शायद 1994 में चैथी मंजिल का निर्माण रिटैन्शन के तहत मुआवजा देकर कर लिया गया। लेकिन अब 2018 में एनजीटी के फैसले के बाद पंाचवी मंजिल का निर्माण हो रहा है। जब यह निर्माण नगर निगम के संज्ञान में आया तब इस पर नोटिस जारी हुआ लेकिन नोटिस से काम नही रूका। इस पर जब पुनः निगम प्रशासन के संज्ञान में इसे लाया गया तब यह सामने आया कि भवन मालिक से नक्शा मांगा गया है और मालिक का दावा है कि उसका नक्शा पास है।
इसमें यह सवाल उठ रहा है कि जो भवन 1994 में पूरा हो गया है उसमें अब 2018 में एनजीटी के फैसले के बाद छत डालने के नाम पर पांचवीं मंजिल की अनुमति कैसे दी जा सकती है। क्या निगम ऐसी ही अनुमतियां औरों को भी उपलब्ध करवायेंगे? क्योंकि अब तो सभी जगह अढ़ाई मंजिल तक का ही निर्माण होना है। फिर यह छत के नाम पांचवी मंजिल कैसे?
शिमला/शैल। पूर्व मन्त्री और जुब्बल कोटखाई के विधायक नेरन्द्र बरागटा को पिछले दिनों भाजपा विधायक दल का मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया है और उन्होने यह ग्रहण भी कर लिया है। इस पद ग्रहण के बाद उन्होने अपने समर्थकों की एक रैली आयोजित करके मुख्यमन्त्री जयराम का धन्यवाद भी किया है। जयराम सरकार ने बजट सत्रा के दौरान एक विधेयक लाकर मुख्य सचेतक और उप मुख्य सचेतक को मन्त्री के ही समकक्ष वेतन भत्तेेेे एवम् अन्य सुविधाएं दे दी हैं। बरागटा को सचिवालय में कार्यालय भी दे दिया गया है। अब धन्यवाद मिलने के बाद जयराम ने बरागटा को सरकार के जनमंच कार्यक्रम सचिवालय स्तर पर कोआरडिनेटर भी लगा दिया है।
सरकार में सचेतक मुख्य सचेतक या उप मुख्य सचेतक के नाम से कोई पद सृजित नही है। संविधान में मुख्यमन्त्री से लेकर उपमुख्यमन्त्री तक के पद परिभाषित है। इन पदों के अधिकार और कर्तव्य भी परिभाषित हैं लेकिन सचेतक की सरकार में कोई भूमिका नही है। सरकार में उसका न ही कोई अधिकार है और न ही कोई कर्तव्य। सचेतक केवल एक पार्टी के विधायक दल का पदाधिकारी है। इसलिये वेतन भत्तों का जो विधेयक पारित किया है उसमें सचेतक के अधिकारों और कर्तव्यों का भी कोई उल्लेख नही है। इस तरह मुख्य सचेतक को अपने विधायक दल का कर्तव्य निभाने के लिये सरकार की ओर से मन्त्री के बराबर वेतन भत्ते एवम् अन्य सुविधायें दिया जाना एक चर्चा का विषय बनकर उभरा है। अब सरकार ने जो जन मंच का कार्यक्रम शुरू किया है वह भी सरकार में कोई अलग से विभाग नही है। इस कार्यक्रम के तहत भी जो शिकायतें आयेंगी और जिनका मौके पर ही निपटारा नही हो पायेगा उनका सचिवालय स्तर पर समन्यव करेंगे। लेकिन इनमें भी अपने स्तर पर वह कोई योगदान नही कर सकेंगे। यह काम एक मन्त्री स्तर के व्यक्ति की बजाये सचिवालय का साधारण सहायक भी कर सकता था। इस तरह बरागटा को सचिवालय में कार्यालय देने को जायज ठहराने का प्रयास किया गया है। क्योंकि समन्वयक के लिये कोई अलग से वेतन भते नही हैं और इस नाते वह लाभ के पद की परिभाषा के दायरे से बाहर रह सकेगा। लेकिन बतौर मुख्य सचेतक या समन्वयक संविधान के तहत कोई गोपनीयता की शपथ तो ली नही है। जबकि जन मंच के समन्वय के तौर पर उनके पास कई विभागों से जुड़े दस्तावेज आयेंगे और तब यह सवाल उठेगा कि जिस व्यक्ति का पद संविधान में परिभाषित नहीं है न ही जिसने संविधान के तहत गोपनीयता की कोई शपथ ली है उसके पास कोई भी सरकारी दस्तावेज किस अधिकार से आ सकते हैं यह सवाल देर सवेर उठेंगे ही। जैसे कि राज्यपाल के सलाहकार के पद को लेकर सवाल उठाया और तब उस पद का नाम बदल कर मीडिया सलाहकार करना पड़ा था।
बरागटा एक भले और कर्मठ व्यक्ति हैं बतौर मंत्री उनका योग्दान सराहनीय रहा है। लेकिन इस बार जब वह मंत्री नहीं बन पाए और सचेतक बनने के लिए भी उन्हें काफी प्रयास करने पड़े है। और यह सब कुछ करने के बाद भी यह आंशका बराबर बना रहेगी कि यदि इस विधेयक को उच्च न्यायालय में चुनौती मिली तो इससे नुकसान भी हो सकता है। मुख्य सचेतक और समन्वयक बनने से यह संदेश आम आदमी में जाता है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नही चल रहा था। कभी भी कोई भी बड़ा विस्फोट घट सकता है। इस तरह के प्रयासों से उस संभावना को कन्ट्रोल करने की कवायद की गई है। लेकिन मंत्री और सचेतक के बीच जो पद प्रतिष्ठा का अन्तराल है क्या उसकी टीस ऐसे प्रयासों से कम हो पायेगी- शायद नही। क्योंकि जिन लोगों को मंत्री रह चुकने के बाद अब इन पदों पर अपना आत्म सम्मान दांव पर लगाना पड़ा है वह हर समय इस ताक में रहेंगे कि कब उनको कुछ और करने का मौका मिले। विधानसभा के पिछले सत्र में धवाला ने जिस तर्ज और मुद्रा में सरकार से कई कुछ असहज सवाल पूछे थे। इसी का परिणाम है कि वह योजना के उपाध्यक्ष बन पाये हैं। यह पद मुख्य सचेतक से हर तरह से बेहतर है क्योंकि इसको लेकर शायद कोई संवैधानिक सवाल न उठें।