शिमला/शैल। क्या भाजपा में गुटबन्दी सुलगना शुरू हो गयी है? यह सवाल सरकार द्वारा धर्मशाला में एक साल पूरा होने के मौके पर मनाये गये जश्न के बाद अचानक चर्चा में आ गया है। क्योंकि इस मौके पर शान्ता, धूमल और नड्डा को मंच से जनता को संबोधित करने का अवसर नही मिल पाया। यही नही इस अवसर पर जो प्रदर्शनी आयोजित की गयी थी उसमें प्रधानमन्त्री के साथ जे.पी. नड्डा तक शामिल नही हो पाये। क्योंकि प्रधानमन्त्री के साथ प्रदर्शनी में कौन साथ रहेगा और मंच कौन -कौन सांझा करेगा इसकी सूची राज्य सरकार तैयार करके पीएमओ तथा एसपीजी को भेजती है। सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार की सूची में नड्डा का नाम ही शामिल नही किया गया था। इस
कारण से नड्डा यह प्रदर्शनी देखने और इसमें बुलाये गये लाभार्थियों को नही मिल पाये। नड्डा का नाम राज्य की सूची से जानबुझ कर बाहिर रखा गया या अनजाने में छूट गया इसको लेकर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। लेकिन यह जो कुछ भी घटा है उसका संदेश बहुत ज्यादा सकारात्मक नही गया है। क्योंकि इस रैली के मंच से मोदी के आने के बाद केवल दो ही भाषण हुए। एक जयराम का और दूसरा स्वयं मोदी का। यहां तक की धन्यवाद भाषण भी नही हुआ। यह सब जितनी जल्दी निपटाया गया उसके लिये उसी दिन संसद में तीन तलाक पर बहस और मतदान से पहले संसद में पहुंचने का कवर लिया गया। लेकिन यहां समय इतना भी कम नही था कि शान्ता और धूमल से दो-दो मिनट का संबोधन न करवाया जा सकता था। यही नही मोदी ने भी अपने भाषण में शान्ता-धूमल का केवल रस्मी तौर पर ही नाम लिया। जबकि पहले मोदी शान्ता-धूमल की सरकारों के वक्त हुए काम का जिक्र जरूर किया करते थे। लेकिन इस बार मोदी का पूरा फोक्स जयराम पर ही रहा। जयराम के एक वर्ष में अनेकों विकास योजनाएं बनी है यह कह कर मोदी ने यह साफ संकेत दिया कि अब उनके लिये हिमाचल में जयराम ही सब कुछ हैं। वह जयराम को अपना परम मित्र बता गये। जयराम ने भी इसके बदले में मोदी को आश्वस्त कर दिया कि वह हर मोर्चे पर उनके साथ खड़े मिलेंगे। मोदी हिमाचल के प्रभारी भी रहे चुके हैं और इस दौरान जो जो मोदी के घनिष्ठ रहे हैं उन्हें जयराम ने भी 32 सदस्यी योजना आयोग में स्थान देकर स्पष्ट कर दिया है कि वह मोदी की अपेक्षाओं पर पूरे खरे उतरेंगे।
धर्मशाला की रैली के इस सारे घटनाक्रम से यह साफ हो जाता है कि मोदी जयराम को प्रदेश में खुला हाथ दे गये हैं। इस नाते अब प्रदेश से चारों लोकसभा सीटें जीत कर मोदी के हाथ मजबूत करना जयराम की नैतिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी बन जाती है। आगे लोकसभा के लिये उम्मीदवार कौन होंगे यह तय करने में भी जयराम की भूमिका अहम होगी। क्या पूराने ही उम्मीदवार फिर से मैदान में होंगे या कोई नये चेहरे होंगे यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। यह साफ हो गया है कि लोकसभा जीतना अब केवल जयराम की ही जिम्मेदारी होगी। लेकिन क्या जयराम मोदी की अपेक्षाओं पर खरे उतर पायेंगे यह एक बड़ सवाल बनता जा रहा है क्योंकि इस समय जयराम की सरकार पर सबसे जयादा प्रभाव विद्यार्थी परिषद और आरएसएस का माना जा रहा है। क्योंकि मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर तथा पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सत्ती और कई अन्य मंत्री स्वयं विद्यार्थी परिषद के नेता रह चुके हैं। इस नाते विद्यार्थी परिषद का वर्तमान नेतृत्व भी सरकार पर पूरा दखल बनाये हुए है। प्रदेश के संघ प्रमुख संजीवन तो सचिवालय में अधिकारियों और मन्त्रियों के साथ बैठक में भाग ले चुके हैं इसी के साथ मुख्यमन्त्री के गिर्द कुछ अधिकारियों का भी पूरा घेरा है। मुख्यमन्त्री के विश्ववस्त पत्रकार इन अधिकारियों की प्रशसां के पुल भी बांध चुके हंै। भले ही स्तुतिगान के बाद अन्य अधिकारियों ने नियमों के दायरे में रह कर सरकार के आदेशों की अनुपालना करने की नीति अपना ली है। इस तरह मुख्यमन्त्री के गिर्द घेरा डाले बैठे कुछ अधिकारी और कुछ पत्रकारों का दखल आज सबकी चर्चा का विषय बना हुआ है।
इस परिदृश्य में यह बड़ा सवाल हो जाता है कि क्या यह सब लोग मिलकर जयराम और भाजपा को प्रदेश की चारों लोकसभा सीटें दिला पायेंगे? इसके लिये यदि एक साल पर नज़र दौड़ाएं तो सबसे पहले यह आता है कि जब जयराम ने सत्ता संभाली थी तब प्रदेश का कर्जभार 45000 करोड़ था जो अब 50973 करोड़ को पहुंच गया है । इस एक वर्ष में सरकार कितनों को रोज़गार दे पायी है इसका पता इसी से चल जाता है कि आज शिक्षा विभाग के अध्यापकों के खाली पद उच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद नही भरे जा सके हैं। बिजली बोर्ड में आऊट सोर्स के लिये टैण्डर आने के बाद भी कुछ फाइनल नही हो पाया है। हर विभाग में कोई भी रिक्त पद भरने के लिये मन्त्रीमण्डल की बैठक में प्रस्ताव लाये जाते हैं। जबकि यह एक सतत प्रक्रिया है जो स्वतः ही चलती रहनी चाहिये। इससे यह सामने आता है कि अधिकारी हर छोटे काम पर भी कबिनेट की मोहर लगवा रहे हैं जो एक तरह से सरकार पर विश्वास की कमी को दिखाता है। मुख्यमन्त्री ने अपने बजट भाषण में जिन नयी योजनाओं को शुरू करने की बात की थी उनमें से अभी अधिकांश की अधिसूचनाएं तक जारी नही हुई हैं। ऐसे में केन्द्र से जो राष्ट्रीय उच्च मार्ग प्रदेश को मिलने का दावा किया गया था वह अब महज जुमला साबित होने वाला है। इसी तरह जिन नौ हजार करोड़ की योजनाओं के केन्द्र से मिलने का दावा मुख्यमन्त्री और जेपी नड्डा करते आये हैं उनकी व्यवहारिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगने का खतरा मडराता नजर आ रहा है। क्योंकि यह सारी योजनाएं एडीवी से पोषित होनी है और पर्यटन के मामले में एडीवी ने जो नाराजगी जाहिर की है उसका असर इन योजनाओं पर पड़ने की पूरी संभावना है। भ्रष्टाचार के मामले में जो सरकार अपनी ही पार्टी के आरोप पत्र पर गंभीर न हो वह अन्य मामलों में क्या करेगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इस वस्तुस्थिति में लोकसभा चुनावों में सफलता मिलना लगातार संदिग्ध होता जा रहा है और इस परिदृश्य में जयराम की चुनौतीयां बढ़ती जा रही है।
शिमला/शैल। शिमला के माल रोड पर बन रहे कालरा कम्पलैक्स का अन्ततः नगर निगम शिमला के आयुक्त की अदालत ने बिजली पानी काटने के आदेश सुनाने के साथ ही इस पर पचास हजार का जुर्माना भी लगा दिया है। यही नही इसके निर्माण पर भी रोक लगा दी है और अपने आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित करने के लिये यहां पर इसी व्यवसायी के खर्च पर निगम का कर्मचारी भी तैनात कर दिया है। अभी यह कम्पलैक्स निर्माणाधीन स्टेज के दायरे में आता है और निगम के नियमों के मुताबिक ऐसे निर्माण में कोई व्यवसायी गतिविधियां शुरू नही की जा सकती हैं। लेकिन निगम के नियमों को नजरअन्दाज करते हुए यहां पर सरेआम व्यवसायी गतिविधियां भी चल रही हैं। निगम कोर्ट के फैसले पर अमल करते हुए बिजली बोर्ड ने यहां की बिजली जो काट दी है लेकिन बिजली काटने के बाद यहां पर जैनरेटर से काम चलाया जा रहा है लेकिन यहां पर एक रोचक सवाल यह खड़ा हो गया है कि बिजली काटने के आदेश कोई बिल की अदायगी न हो पाने के कारण नही हुए हैं बल्कि यह निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुरूप न होने पर सज़ा के तौर पर हुए हैं। अब इस काॅम्पलैक्स में जैनरेटर से बिजली दी जा रही है ऐसे में इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है कि इस पर क्या प्रावधान समाने आता है।
कालरा काॅम्पलैक्स माल रोड़ पर स्थित है और यह हैरिटेज जोन में आता है। इस क्षेत्र में प्रदेश सरकार ने वर्ष 2000 से ही नये निर्माणों पर प्रतिबन्ध लगा रखा है। सरकार के इसी प्रतिबन्ध पर एनजीटी ने दिसम्बर 2017 में दिये फैसले में मोहर लगा दी है। एनजीटी के फैसले का अनुमोदन सर्वोच्च न्यायालय भी कर चुका है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी पिछले दिनों अवैध निर्माणों का कड़ा संज्ञान लेते हुए इनके बिजली, पानी काटने के आदेश किये हुए हैं और इन आदेशों की अनुपालना भी हुई है। इस तरह यह कालरा काॅम्पलैक्स हैरिटेज जोन में आता है और यहां पर केवल ओल्ड लाईनज़ पर ही निर्माण करने की अनुमति है। यहां पर भी गौरतलब है कि यहां के पुराने भवन में 1991 में आग लगी थी। उसके बाद जब यहां पर पुनः निर्माण की बात आयी थी तब यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय तक पहुंच गया था और अदालत ने नये निर्माण के लिये कुछ शर्ते लगा दी थी। तब इन शर्तों पर अमल न हो पाने के कारण यहां कोई निर्माण नही हो पाया था।
उसके बाद यह काॅम्पलैक्स कालरा के पास आ गया और 25.5.2008 को इसके निर्माण का नक्शा पास करवाया गया। अब जब सरकार ने वर्ष 2000 में ही हैरिटेज जोन में नये निर्माणों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया था तब स्वभाविक है कि इसका नक्शा भी ओल्ड लाईनज पर ही स्वीकृति हुआ होगा। लेकिन अब जब यह निर्माण सामने आया तब इस पर स्वीकृत नक्शें से हटकर निर्माण करने के आरोप लगने शुरू हो गये। इन आरोपों का संज्ञान लेते हुए निगम ने कालरा को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए तुरन्त प्रभाव से काम बन्द करने के आदेश दिये। लेकिन इन आदेशों पर कोई अमल नही हुआ। निगम ने पहला नोटिस 11-7-2018 और अन्तिम नोटिस 2-11-18 को दिया तथा इस तरह चार नोटिस दिये। इस निर्माण में स्वीकृत नक्शे से हटकर कितना निर्माण हुआ है इस पर संबंधित जेई से लेकर निगम के वास्तुकार तक से रिपोर्टे ली गयी। जब लगातार नोटिस दिये जाने के बाद भी काम बन्द नही किया गया तब यह मामला आयुक्त की कोर्ट में आया और अन्ततः यह फैसला सुनाया गया। इस फैसले की अपील की जा रही है। अब सबकी नज़रें इस अपील पर आने वाले फैसले पर लगी हैं।
स्मरणीय है कि इस समय नगर निगम के पास इस तरह के निर्माणों के 960 मामले लंबित हैं इनमें कई मामले तो ऐसे भी है जहां पर रिटैन्शन पाॅलिसी आने के बाद निर्माण बढ़ाये गये हैं लेकिन संयोगवश ऐसे निर्माणों की कम्पलीशन रिपोर्ट न तो गिनम में दायर हो पायी और न ही स्वीकृत हो पाये। अब एनजीटी का फैसला उन्ही निर्माणों पर लागू नही होगा। जिनकी कम्लीशन फैसला आने तक स्वीकार हो चुकी है अन्य पर नही। ऐसे में कालरा कम्पलैक्स के मामले में सबकी निगाहें इस पर लगी है कि निर्माणों में अवैधतता को रोकने के लिये अदालत, प्रशासन और सरकार क्या रूख अपनाते हैं क्योंकि कालरा को सरकार का नजदीकी माना जाता है।



शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता और छः बार मुख्यमन्त्री रह चुके वीरभद्र सिंह ने मण्डी से लोकसभा के अगामी चुनावों में उम्मीदवार होने के लिये अपनी सहमति जाहिर कर दी है। इसमें एक ही शर्त रखी है कि चुनाव लड़ने के लिये पार्टी हाईकमान उन्हें कहेगी तो? इसी के साथ वीरभद्र सिंह ने हमीरपुर और कांगड़ा लोस सीटों के लिये जिन उम्मीदवारों की सार्वजनिक संस्तुति की थी अब उस स्टैण्ड से ही हट गये हैं। एक अरसे से वीरभद्र सिंह ने सुक्खु को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग पर खामोशी ओढ़ ली है। जबकि एक समय सुक्खु को
हटवाना ही उनकी प्राथमिकता थी। बल्कि जब यह कहा गया था कि मण्डी से उनसे बेहतर कोई उम्मीदवार नही हो सकता है तब उन्होने यहां तक कह दिया था कि कोई भीम मकरझण्डू यहां से लड़ लेगा। वीरभद्र की इस प्रतिक्रिया को सीधे -सीधे ‘‘जयराम की सार्वजनिक मद्द की घोषणा’’ करार दिया गया था। वीरभद्र के सुक्खु विरोध को भाजपा पूरी तरह भुना रही थी यह माना जा रहा था कि जयराम को वीरभद्र का सहयोग और आर्शीवाद दोनों प्राप्त है। इस धारणा पर उस समय मोहर भी लग गयी थी जब वीरभद्र ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया था कि कांग्रेस अभी जयराम को विधानसभा में नही घेरेगी और उन्हें समय दिया जाना चाहिये।
वीरभद्र सिंह का यह स्टैण्ड पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले था। लेकिन जैसे ही यह चुनाव परिणाम आये और भाजपा सभी जगह हार गयी तथा कांग्रेस तीन राज्यों में भाजपा से सत्ता छीन कर स्वयं सरकार में आ गयी तभी वीरभद्र सिंह के स्वर बदल गये। इस बदलाव की पहली झलक तब आयी जब वीरभद्र के विधायक बेटे विक्रमादित्य सिंह ने एक पत्रकार वार्ता में जयराम सरकार पर निशाना साधते हुए दो अधिकारियों संजय कुण्डु और प्रवीण गुप्ता पर सीधे हमला बोला। इसी पत्रकार वार्ता में विक्रमादित्य ने मन्त्री महेन्द्र सिंह के दोनोें विभागों आईपीएच और बागवानी पर गंभीर आरोप लगायें। महेन्द्र सिंह और वीरभद्र सिंह के रिश्तो में कड़वाहट जगजाहिर है। महेन्द्र सिंह ही इस समय जयराम के सबसे अनुभवी मन्त्री हैं। कांग्रेस के आरोप पत्र में वही सारे आरोप है जो विक्रमादित्य सिंह की प्रैस वार्ता में सामने आये थे। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस के आरोप पत्र में दर्ज सारे आरोपो की न केवल वीरभद्र सिंह को जानकारी ही रही है बल्कि उनका पूरा समर्थन भी रहा है। वीरभद्र सिंह का यह कहना है कि उन्होंने आरोप पत्र को पढ़ा ही नही है। यह एक अलग रणनीति है क्योंकि उन्होंने यह नही कहा है कि वह इन आरोपों से सहमत नही है। यह आरोप आने वाले समय में जयराम सरकार के लिये सिरदर्द बनेंगे इसमें कोई दो राय नही हो सकती। वीरभद्र छः बार इस प्रदेश के मुख्यमन्त्री रह चुके हैं इस नाते वह पूरे प्रशासन को अच्छी तरह समझते हैं। बल्कि यह माना जा रहा है कि आज भी सरकार की सारी अन्दर की सूचनाएं उन तक पहुंच जाती है। वीरभद्र सिंह प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र से परिचित हैं और हर जगह उनके समर्थक मिल जायेंगे। ऐसे में जो लोग यह मानकर चल रहे थे कि कांग्रेस के अन्दर सुक्खु टीम के प्रति वीरभद्र सिंह के विरोधी तेवरों से भाजपा को लाभ मिलेगा आज वीरभद्र सिंह की मण्डी से उम्मीदवारी पर सहमति से एक बड़ा झटका लगा है। क्योंकि वीरभद्र की इस सक्रियता का प्रदेश की चारों सीटों पर प्रभाव पड़ेगा यह तय है।
राजधानी में सनातन धर्मसभा का कारनामा
शिमला/शैल। शिमला की सनातन धर्म सभा ने फरवरी 1992 में स्कूल भवन बनाने के लिये 3744 वर्ग फुट भूमि 99 वर्ष की लीज सौ रूपये प्रतिवर्ष पर सरकार से ली थी। यह ज़मीन शिमला के गंज बाजार में स्थित एसडी स्कूल के सामने वाली पहाड़ी पर स्थित है। अब 27 वर्ष बाद इस ज़मीन पर स्कूल भवन के स्थान पर एक बड़ी सराय का निर्माण हुआ है। सराय के नाम पर हुआ यह निर्माण किसी आलीशान होटल से कम नही है सरकार द्वारा 26-2-1992 को जो लीज अनुमति हस्ताक्षरित हुई है उसमें यह कहा गया है कि ‘‘उक्त सभा के प्रबन्धन मण्डल में प्रदेश सरकार द्वारा मनोनीत दो सदस्य रखे जायेंगे तथा इस स्कूल में 10 प्रतिशत दाखिला उन गरीब परिवारों के बच्चो को दिया
जायेगा जिन्हें सरकार मनोनीत करेगी और ऐसे छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी जायेगी’’।
इस लीज में यह भी कहा गया है कि ‘‘उपरोक्त पट्टा पर प्रदान की गयी सरकारी भूमि का उपयोग दो वर्ष की अवधि के भीतर प्रस्तावित स्कूल के भवन के लिये ही किया जायेगा। यदि इसका उपयोग किसी और उद्देश्य के लिये किया गया तो यह भूमि सरकर को वापिस हो जायेगी और उक्त भूमि पर किये गये निर्माण का कोई भी मुआवजा़ नही दिया जायेगा।
यह लीज फरवरी 1992 में शान्ता कुमार के शासनकाल में ही दी गयी थी। 1992 के बाद से प्रदेश में तीन बार वीरभद्र के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकारें रह चुकी हैं। दो बार भाजपा की सरकारें धूमल के नेतृत्व में और अब तीसरी बार जयराम के नेतृत्व में भाजपा की सरकार सत्ता में है। यह लीज जब हुई थी तब सुरेश भारद्वाज ही शिमला के विधायक थे और आज फिर भारद्वाज ही शिमला के विधायक हैं और उन्होंने ही अब बतौर शिक्षा मन्त्री इस होटलनुमा सराय का उद्घाटन किया है। इस नाते यह नही माना जा सकता कि इस लीज और इसकी शर्तों के बारे में उन्हे कोई जानकारी नही रही हो।
लीज़ के दस्तावेजों में साफ है कि यहां पर केवल स्कूल का ही भवन बनना है जो कि नही बना। जब स्कूल का भवन ही नही बना तो उसमें गरीब बच्चों के दाखिले और उन्हे निःशुल्क शिक्षा का भी कोई सवाल नही रहता तथा साथ ही प्रबन्धक मण्डल में दो सरकारी सदस्यों के मनोनीत होने का सवाल नही उठता। अब जब स्कूल भवन ही नही बना तो क्या सरकार लीज की शर्त के अनुसार इस सराय का अधिग्रहण करेगी? यह एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। क्या शिक्षा मन्त्री स्थानीय विधायक और प्रदेश के कानून मन्त्री होने के नाते इस लीज में लगी शर्तो की अनुपालना सुनिश्चित करेंगे। इसी के साथ एक बड़ा सवाल प्रदेश के प्रशासनिक तन्त्र पर भी खड़ा होता है। 1992 में मिली इस भूमि पर दो वर्ष के भीतर निर्माण होना था और ऐसा न होने पर यह लीज रद्द हो जानी थी लेकिन ऐसा नही हुआ। यही नहीं अब जब इस सराय के निर्माण का नक्शा संवद्ध प्रशासन को सौंपा गया होगा तब उसके साथ ज़मीन की मलकियत के दस्तावेज भी सौंपे गये होंगे क्योंकि ऐसा नियम है। इस जमीन की मलकियत का दस्तावेज यह लीज दस्तावेज है। जिसमें यह सारी शर्ते दर्ज हैं। ऐसे में यह स्वभाविक है कि नक्शा पास करने वाले संवद्ध तन्त्र के संज्ञान में यह अवश्य आया होगा कि इस जमीन पर तो स्कूल भवन बनना और उसके स्थान पर सराय बनायी जा रही है। ऐसा तभी संभव हो सकता है जब इसका नक्शा ही न सौंपा गया हो लेकिन इतना बड़ा निर्माण शहर के केन्द्रीय स्थान में नक्शा पास हुए बिना हो जाना संभव नही लगता। ऐसे में यह जयराम सरकार के लिये एक बहुत बड़ा प्रश्न बन जायेगा कि वह इस पर क्या करती है क्योंकि इसका परिणाम बहुकोणीय होगा।


शिमला/शैल। जयराम सरकार ने आरएसएस की ईकाई मातृवन्दना को उसकी गतिविधियों के संचालन के लिये नगर निगम शिमला क्षेत्र में 22669.38 वर्ग मीटर भूमि लीज़ पर दी है। यह भूमि नगर निगम शिमला के क्षेत्र में आती है इस कारण से इसमें नगर निगम से अनापत्ति प्रमाणपत्र चाहिये था। इसके लिये यह मामला नगर निगम को भेजा गया और निगम प्रशासन ने मातृवन्दना से आये इस प्रस्ताव को निगम की बैठक में विचार के लिये प्रस्तुत कर दिया निगम के हाऊस ने इस पर विचार करके इसे अनुमोदित करके अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया।
मातृवन्दना से जब इसके लिये प्रस्ताव आया तब निगम प्रशासन ने इस प्रस्ताव को निगम हाऊस में रखने के लिये जो प्रारूप तैयार किया उसमें स्पष्ट कहा गया था कि राजस्व अभिलेख के अनुसार भूमि की मालिक हिमाचल प्रदेश सरकार का कब्जा स्वयं तावे हुकम्म बर्तन दारान है। सम्बन्धित भूभाग नगर निगम की परिधि में आता है परन्तु नगर निगम शिमला न तो भूमि का मालिक है न ही कब्जाधारी है। निगम की इस टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है कि यह भूमि सरकार की है और कब्जा बर्तन दारान का है। इस नाते यह भूमि विलेज काॅमन लैण्ड की परिभाषा में आती है।
सर्वोच्च न्यायालय के 28-1-2011 को आये फैसले में इन जमीनों के ऐसे आवंटन पर रोक लगा रखी है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा हैं ...

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर अमल करते हुए 10 मार्च 2011 को ही सारे जिलाधीशों को आवश्यक कारवाई के निर्देश जारी कर दिये और 29 अप्रैल को इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय को भी सूचित कर दिया था। विलेज काॅमन लैण्ड का आवंटन सरकार 1974 में पारित Village common lands vesting and Utilisation Act. के तहत करती है। इस एक्ट में 1981, 2016 और 2017 में संशोधन किये गये हैं और इसमें राजनीतिक दलों और सामाजिक संस्थाओं के मुताबिक भी एक बीघा जमीन देने का प्रावधान किया गया है। इस तरह सरकार के अपने संशोधन के मुताबिक भी एक बीघा से अधिक जमीन देने का प्रावधान नही है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में ऐसी जमीनों के आवंटन पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया है और ऐसे आवंटनों का प्रावधान करने वाले सारे निमयों/कानूनों को एकदम गैर कानूनी करार दे रखा है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और सरकार के अपने ही संशोधन के मुताबिक मातृवन्दना को इतनी जमीन नही दी जा सकती है। इस कारण से कांग्रेस ने अपने आरोप पत्र में भी यह मुद्दा उठाया है।
शीर्ष अदालत के फैसले और सरकार के अपने ही संशोधन के बारे में संवद्ध प्रशासन को जानकारी होनी ही चाहिये और रही भी होगी। लेकिन इस सबके बाद भी करीब 30 बीघा जमीन का आंवटन कर देना निश्चित रूप से सरकार पर गंभीर सवाल उठाता है इस आवंटन को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सरकार ने इस आवंटन के लिये प्रशासन पर दबाव डाला गया या प्रशासन ने मुख्यमन्त्री के सामने सही स्थिति ही नहीं रखी। स्थिति जो भी रही हो इसका परिणाम सरकार के लिये सुखद नही होगा।