Friday, 16 January 2026
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उद्योगों को आमन्त्रण के साथ ही उनकी लूट पर भी नज़र रखनी होगी CGTMSE योजना के नाम पर बैंक की मिलीभगत से हो रहा फ्राॅड शिकायत मिलने के बावजूद पुलिस नही कर रही मामला दर्ज

शिमला/शैल। जयराम सरकार प्रदेश की आर्थिक सेहत को सुधारने तथा बढ़ती बेरोजगारी पर लगाम लगाने के लिये राज्य में नये उद्योग स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है। क्योंकि सरकार की नजर में उद्योग ही एक ऐसा अदारा है जिनके माध्यम से निवेश आने पर जीडीपी सुधरेगा और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। इस नीति पर काम करते हुए सरकार ने शिमला में आयोजित इन्वैस्टर मीट में उद्योगों के साथ 18 हजार करोड़ से अधिक के निवेश के उद्योपतियों के साथ एमओयू साईन किये हैं इस 18 हजार करोड़ के संभावित निवेश में से कितना सही में जमीनी हकीकत बन पायेगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। क्योंकि पूर्व में धूमल और वीरभद्र शासन में भी ऐसे प्रयास और प्रयोग हो चुके हैं लेकिन उनमें कितनी सफलता हासिल हुई है और कितना निवेश प्रदेश को मिल पाया है इसके सही आंकड़े संवद्ध प्रशासन नही दे पाया है। माना जाता है कि शीर्ष प्रशासन इस तरह की योजनाएं जीडीपी के आंकड़े सुधारने के लिये लाता है ताकि कर्ज लेने की सीमा बनी रही।
इस समय प्रदश में कितने उद्योग कार्यरत है और उनमें कितना निवेश है तथा कितने लोग काम कर रहे है इसको लेकर उद्योग विभाग ने 2017 में एक प्रपत्र तैयार किया था। इसके मुताबिक प्रदेश में 40 हजार उद्योग पंजीकृत हैं जिनमें 17 हजार करोड़ का निवेश है तथा इन उद्योगों में 2,58,000 कर्मचारी कार्यरत हैं। इस बार सदन में आये एक प्रश्न के उत्तर में उद्योगों की संख्या 49 हजार बतायी गयी है लेकिन इनमें कितना निवेश है और कितने कर्मचारी हैं इस पर कुछ नही कहा गया है। इसी बीच आयी एक कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल के 2009 से 2014 के बीच विभिन्न करों में 35 हजार करोड़ की राहत मिल चुकी है। लेकिन इसके बावजूद यह उद्योग प्रदेश के युवाओं को वांच्छित रोजगार नही दे पाये हैं। 35 हजार करोड़ का यह आंकड़ा सरकारी फाईलों में दर्ज रिटर्नज पर आधारित है। यह दावा है केन्द्र के वित्त विभाग का जिसे प्रदेश की अफसरशाही मानने को तैयार नही हैं लेकिन कैग में दर्ज इस रिपोर्ट को प्रदेश के बड़े बाबू खारिज भी नही कर पाये हैं। कैग रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ो और प्रदेश के उद्योग विभाग के 2017 के प्रपत्र के अनुसार इन उद्योगों के माध्यम से 52 हजार करोड़ निवेश से केवल तीन लाख लोगों को ही रोजगार मिल पाया है कि क्या प्रदेश की उद्योग नीति सही दिशा में है या नही।
आज उद्योगों को आमन्त्रित करने के लिये उन्हे कई तरह के प्रोत्साहन दिये जाते हैं। सबसे बड़ा तो यह है कि यह उद्योगपत्ति प्रदेश के बैंको से ही कर्ज लेकर निवेश करते हैं। जब यह कर्ज लौटाया नही जाता है तब एनपीए हो जाता है। आज प्रदेश के सारे सहकारी बैंक तक एनपीए में है। प्रदेश की वित्त निगम इन्ही उद्योगों के कारण डूब चुका है लेकिन प्रदेश की शीर्ष अफसरशाही और राजनीतिक नेतृत्व इस गंभीर पक्ष की ओर एकदम आंखे बन्द करके बैठा है। बल्कि कई जगह तो केन्द्र की योजनाओं के नाम पर कुछ शातिर लोग बैंक प्रबन्धन से मिलकर लोगों को लूट रहे हैं और संवद्ध प्रशासन इस बारे में आंख कान बन्द करके बैठा हुआ है। यहां तक की पुलिस भी ऐसी शिकायतों पर इन लोगों के प्रभाव में आकर कोई कारवाई नही कर रही है। इसलिये आज यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि उद्योगों को आमन्त्रित करने के साथ ही उनकी लूट पर भी नजर रखनी होगी।
केन्द्र सरकार की स्माॅल, माईक्रो और मीडियम उद्य़ोगों को प्रोत्साहन एवम् संरक्षण देने की योजना है। यह योजना 2006 में अधिसूचित हुई थी। इसके तहत उद्योग लगाने वाले व्यक्ति को दो करोड़ ऋण लेने के लिये किसी भी तरह की धरोहर/संपत्ति को बैंक में गिरवी रखने की आवश्यकता नही थी क्योंकि इसके लिये सरकार ने एक CGTMSE(Credit Guarntee Fund trust for Micro and small Entetprises) स्थापित कर रखा था। इस योजना के तहत स्थापित यदि कोई इकाई डिफाल्टर हो जाती है तो यह ट्रस्ट ऋण देने वाले बैंक को उसकी 50/75/80/85 प्रतिशत तक भरपाई करता है। इस योजना में 7-1-2009 को संशोधन करके ट्रस्ट की जिम्मेदारी 62.50% से 65% तक कर दी गयी थी। इसके बाद 16-12-2013 को इसमें फिर संशोधन हुआ और ट्रस्ट की जिम्मेदारी 50% तक कर दी गयी। इस योजना के तहत स्थापित हो रही इकाई और उसको स्थापित करने वाले का आकलन करना और उससे पूरी तरह आश्वस्त होना यह जिम्मेदारी ऋण देने वाले बैंक प्रबन्धन की थी। अभी पिछले दिनों मोदी सरकार ने भी इसी योजना के तहत 59 मिनट में एक करोड़ का ऋण देने की घोषणा की है। यह इसी आधार पर संभव है कि ऋण लेने वाले को कुछ भी धरोहर के रूप में बैंक के पास गिरवी नही रखना है केवल बैंक प्रबन्धन को ऋण लेने वाले और उसकी योजना से आश्वस्त होना है। केन्द्र सरकार की यह एक बहुत बड़ी योजना है और इसके लिये एक पूरा मन्त्रालय स्थापित है। वीरभद्र सिंह भी इसके केन्द्र में मन्त्री रह चुके हैं। इस योजना की पूरी जानकारी आम आदमी से ज्यादा बैंको के पास है और एक तरह से उन्हें ही लोगों को इसके लिये प्रोत्साहित करना है।
जब सरकार उद्योग स्थापित करने के लिये इस तरह की सहायता का आश्वासन देगी तो यह स्वभाविक है कि कोई भी आदमी इसका लाभ उठाना चाहेगा। इसी का फायदा उठाकर मोहम्मद शाहिद हुसैन ने पांच अलग नामों से उद्योग इकाईयां स्थापित की। शाहिद हुसैन हिमाचल का निवासी नही था और यहां पर उसके पास कोई संपत्ति नही थी। इसलिये उसे यहां पर उद्योग लगाने के लिये स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी चाहिये थी। इस हिस्सेदारी को हासिल करने के लिये उसने स्थानीय लोगों से मित्रता बनानी आरम्भ कर दी और सबको अपना परिचय एक मुस्लिम बुद्धिजीवि शायर के रूप में दिया। उसकी शायरी से प्रभावित होकर कुछ लोग उसके प्रभाव में आ गये। प्रभाव में आने के बाद उसने इन लोगों को केन्द्र की इस उद्योग योजना की जानकारी देना शुरू किया। इसका विश्वास दिलाने के लिये केनरा बैंक के प्रबन्धक एस के भान से मिलाना शुरू किया। बैंक मैनेजर ने भी लोगों को इस योजना की जानकरी दी और बताया कि इसमें उन्हे ऋण लेने के लिये कुछ भी गिरवी रखने की आवश्यकता नही है। स्वभाविक है कि जब ऋण देने वाला बैंक भी ऐसी योजना की पुष्टि करेगा तब आदमी उद्योग लगाने के लिये तैयार हो ही जायेगा। उद्योग इकाईयां स्थापित कर ली यह इकाईयां आर आर वी क्रियेशनज़, रामगढ़िया इन्टरप्राईज़िज, बाला जी इन्टर प्राईज़िज, आर के इन्डस्ट्रीज और पारस होम एप्लांईसेज़ शाहिद के षडयन्त्र का असली चेहरा पासर होम एप्लाॅंईसैज मे सामने आया। यहां पर उसने पीयूष शर्मा को अपना हिस्सेदार बनाया। पीयूष के पिता कुलदीप शर्मा का यहां एक होटल और अपना बड़ा मकान है। शाहिद की नज़र इस संपत्ति पर आ गयी। उसने पीयूष को पार्टनर बनाकर जून 2013 में केनरा बैंक से ण स्वीकृत करवा लिया। फिर नवम्बर 2013 में पीयूष के पिता कुलदीन शर्मा को यह कहानी गढ़ी कि उसे 1.10 लाख यू एस डॅालर का आर्डर मिला है और इस आर्डर को पूरा करने के लिये उसे एक करोड़ के अतिरिक्त ऋण की आवश्यकता है यदि कुलदीप शर्मा इस ऋण के लिये अपना मकान कुछ समय के लिये बैंक में गिरवी रखने को तैयार हो जायें तो यह आसान हो जायेगा। बेटे के भविष्य को ध्यान में रखते हुए वह इसके लिये तैयार हो गये। शाहिद उन्हें केेनरा बैंक ले गया वहां बैंक प्रबन्धक ने भी इसकी पुष्टि कर दी और कुलदीप को मकान मारटगेज करने के लिये राजी कर लिया। 9.12.2013 को यह मारटगेज डीड साईन हो गयी। यह डीड साईन होने के बाद अन्य इकाईयों की जानकारी सामने आयी और कुलदीप के बेटे ने शाहिद के साथ अपनी पार्टनरशिप भंग कर दी। कुलदीप शर्मा ने बैंक को यह मारटगेज डीड रद्द करने के लिये लिखित में दे दिया क्योंकि इस डीड के एवज में बैंक ने कोई अतिरिक्त ऋण जारी नहीं किया था। बैंक के साथ ही कुलदीप ने संबन्धित तहसीलदार को भी सूचित कर दिया कि यह इस डीड पर अमल न करे। लेकिन तहसीलदार ने कुलदीप के आग्रह को नजरअन्दाज करके मकान बैंक के नाम लगा दिया। इस सारे किस्से की पुलिस को भी लिखित में शिकायत दे दी गयी लेकिन पुलिस ने आज तक शाहिद और बैंक प्रबन्धन के खिलाफ कोई मामला दर्ज नही किया है।
कुलदीप जैसा ही व्यवहार अन्य तीन लोगों के साथ भी हुआ है वह भी पुलिस को शिकायत कर चुके हैं लेकिन कोई कारवाई सामने नही आयी है। अब यह भी सामने आया है कि आर के इन्डस्ट्रीज़ शाहिद की पत्नी के नाम है लेकिन यह इकाई केवल कागजों में ही कही जा रही है और इसी केनरा बैंक प्रबन्धन ने इस ईकाई के नाम पर भी कोई 50 लाख का ऋण दे रखा है। इन सारे उद्योगों को इसी बैंक से करीब दो करोड़ का ऋण दिया जा चुका है और इन उद्योगों में हिस्सेदार बनाये गये सारे स्थानीय लोग इस षडयन्त्र का शिकार हो चुके हैं। यह सारे ऋण एक ही बैंक प्रबन्धक द्वारा दिये जाना यह प्रमाणित करता है कि यह एक सुनियोजित षडयन्त्र है जिसमें बैंक प्रबन्धक की सक्रिय भूमिका रही है। अब जब पुलिस शिकायत मिलने के बाद भी मामला दर्ज नही कर रही है तब पुलिस की भूमिका भी सन्देह के घेरे में आ गयी है। इस षडयन्त्र का शिकार हुए लोगों की हताशा कब क्या गुल खिला दे इसका अनुमान लगाना कठिन है।

CGTMSE -Credit Guarantee Fund trust for Micro and Small Enterprises:A special protection is given to the micro, small and Medium enterprises via the MSME Act, 2006. These are small scale industries which require immunity and special protection to flourish. These industries from the very backbone of our Indian Economy.One of the government- sponsored schemes for MSMEs is the CGTMSE (Credit Guarantee Fund Trust for Micro and small Enterprises).
What is the CGTMSE?
The whole idea behind this trust is to provide financial assistance to these industries without any third party guarantee/ or collateral. These schemes provide the assurance to the lenders that in case of default by them a guarantee cover will be provided by trust in the ration of 50/75/80/85 percent of the amount so given.


17 करोड़ की मुख्यमन्त्री राहत से सिराज को मिले 3 करोड़

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री राहत कोष एक ऐसा साधन है जिससे किसी भी व्यक्ति की सहायता की जा सकती है। इसकी सहायता की पात्रता के लिये कोई बडे़ कडे़ नियम नही है जैसा की अन्य योजनाओं में होता है। इसके तहत दी गयी सहायता को किसी भी तरह से किसी अदालत में चुनौती नही दी जा सकती है। इसमें केवल यही देखा जाता है कि जिस दिन यह सहायता मांगी जाती है उस दिन मुख्यमन्त्री राहत कोष में धन उपलब्ध होना चाहिये और सहायता मांगने वाले के पास उस समय और कोई साधन उपलब्ध नही था। मुख्यमन्त्री राहत कोष से सामान्यतः आवदेन संबंधित एसडीएम कार्यालय के माध्यम से भेजे जाते हैं ताकि वह यह सुनिश्चित कर सके की सहायता मांगने वाला सही में इसका पात्र है। वैसे नियमों में ऐसी कोई बंदिश नही है क्योंकि यह सहायता मुख्यमन्त्री के अपने विवके पर निर्भर करती है और मुख्यमंत्री किसी भी ऐसे आग्रह को अस्वीकार भी कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री राहत कोष शुद्ध रूप से केवल सरकारी धन ही नही होता है। इसमें कोई भी व्यक्ति मुख्यमंत्री को इसमें योगदान दे सकता है और मुख्यमंत्री अपने विवके से इसमें से कोई भी आंवटन कर सकते हैं। इस वित्तिय वर्ष में मुख्यमंत्री राहत कोष से 27 दिसम्बर 2017 से 15 जनवरी 2019 तक प्रदेश के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में 17,34,51,949 रूपये की सहायता दी गयी है। इसमें मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र सिराज में 3,03,17,140 रूपये की सहायता दी गयी है।































 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रदेश का कर्जभार पंहुचा 52000 करोड़

शिमला/शैल। इस बार बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री और कांग्रेस के ही विधायक पूर्व मंत्री राम लाल ठाकुर का सवाल था कि 15 जनवरी 2019 तक जयराम सरकार ने कितना कर्ज लिया है। इस सवाल के जवाब में बताया गया कि 3451 करोड़ का कर्ज लिया गया और इसमें 3000 करोड़ खुले बाजार से लेना पड़ा है। इसी के साथ यह भी बताया गया कि इसमें सरकार ने कुछ कर्ज वापिस भी कर दिया है और इस तरह शुद्ध रूप से केवल 1838.75 करोड़ का ही ऋण लिया गया है। मुकश अग्निहोत्री के सवाल के जवाब में बताया गया कि सरकार की कर्ज लेने की सीमा 4524 करोड़ है और सरकार का कुल कर्ज 4975.45 करोड़ है। लेकिन मुख्यमन्त्री ने अपने बजट भाषण में सदन को बताया है कि इस वर्ष 5068 करोड़ का ऋण लेना पडे़गा। मुख्यमन्त्री के बजट भाषण के आंकड़ों को सही मानते हुए कुल कर्ज 52000 करोड़ से ऊपर चला जाता है। कर्ज का दस्तावेज 2003 से 2017-18 तक का शैल के पिछले अंक में पाठकों के सामने रखा जा चुका है।

कर्ज को लेकर सदन में आये राम लाल ठाकुर और मुकेश अग्निहोत्री के प्रश्नों पर चर्चा नही हो पायी है और इस तरह यह सरकार का लिखित जवाब ही रह गया है। लेकिन बजट भाषण पर हुई चर्चा में कर्ज  की स्थिति पर चिन्ता व्यक्त की गयी है। मुख्यमन्त्री ने इस चर्चा का जवाब देते हुए यहां तक कह दिया कि पूर्व में कर्ज लेकर मौज मस्ती होती रही है। मुख्यमन्त्री का यह आरोप कितना सही है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण  यह है कि क्या जयराम सरकार इस बढ़ते कर्जभार का रोकने का कोई ठोस उपाय कर रही है? जयराम पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं इस नाते उनका दामन कर्ज करने के दाग से साफ था। ऐसे में यदि वह प्रदेश की वित्तिय स्थिति पर कोई श्वेतपत्र ले आते तो प्रदेश की जनता उनके कथन पर आसानी से विश्वास कर लेती। लेकिन वह कर्ज के लिये जिम्मेदार अफरशाही के हाथों में ऐसे खेल गये कि यह श्वेत पत्र नही ला सके। जबकि 1998 में धूमल यह श्वेतपत्र लेकर आये थे और इसी कारण से वह वीरभद्र शासन पर लगातार भारी पड़ते रहे।

अभी जो आंकड़े अफसरशाही ने मुख्यमन्त्री के सामने परोसे हैं उनमें अपने में अन्त विरोध है। सवाल के जवाब में कुछ है और बजट भाषण में कुछ। फिर बजट की विवरणिका में जो पूंजीगत प्राप्तियों का सकल ऋण कहा गया है वह क्या है इस पर कोई स्पष्टीकरण नही आ पाया है। भारत सरकार मार्च 2016 में भी कर्ज को लेकर चेतावनी पत्र भेज चुकी है। लेकिन इस पत्र पर कोई अमल नही हुआ है। क्योंकि एफआरबीएम अधिनियम की धारा दस के तहत अधिकारियों को यह छूट हासिल है कि उनके खिलाफ किसी भी तरह की कोई कानूनी कारवाई नही की जा सकती है।No suit, prosecution or other legal proceedings shall lie against the state government or any of its officers, for anything which is in good faith done or intended to be done under this Act or the rules made there under. लेकिन इसी अधिनियम की धारा 7(2) में सरकार की यह भी जिम्मेदारी है कि वह अपने संसाधन बढ़ाये

Whenever there is a prospect of either shortfall in revenue or excess of expenditure over pre-specified levels for a given year on account of any new policy decision of the state Government that affects either the State Government or its public sector undertakings, the State Government, prior to taking such policy decision, shall take measure to fully offset the fiscal impact for the current and future years by curtailing the sums authorized to be paid and applied from and out of the consolidated Fund of the State under any Act enacted by Legislative Assembly to provide for the appropriation of such sums , or by taking interim measure fro revenue augmentation, or by taking up a combination of both.

लेकिन एफआरवीएम के इन प्रावधानों के तहत क्या संसाधन बढ़ाने की ओर कोई ध्यान दिया जा रहा है शायद नही। केवल हर बार हर मुख्यमन्त्री के नाम से हर बजट में ऐसी घोषणाएं कर दी जाती हैं जिनको पूरा करने के लिये केवल कर्ज लेना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। इसी का परिणाम है कि आज प्रदेश 52000 करोड़ के कर्ज तले डूबा है। इसी कारण से आज हर काम आऊटसोर्से पर किया जा रहा है।

 

दस्तावेजों के आईने में प्रदेश का बजट 16 नयी योजनाओं के साथ आया 44384 करोड़ का बजट

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर का 2019-20 का कुल बजट 44384 करोड़ का होगा यह खुलासा मुख्यमन्त्री ने सदन में अपने बजट भाषण में रखा है। इस बजट में मुख्यमन्त्री ने अगले वित्त वर्ष के लिये 16 नयी योजनाओं की घोषणा की है। पिछले वित्त वर्ष में ऐसी ही 30 योजनाओं की घोषणा की गयी थी। अब यह पिछली ओर अगली दोनों योजनाएं एक साथ चलेंगीं। लेकिन पिछली 30 योजनाओं में से अधिकांश अभी तक अमली शक्ल नही ले पायी हैं। ऐसे में 31 मार्च को समाप्त होने वाले वित्त वर्ष में यह बची हुई योजनाएं आकार ले पाती है या नही इसका पता आने वाले दिनों में लगेगा। इन सारी योजनाओं के लिये धन का प्रावधान कैसे हो पायेगा यह एक गंभीर सवाल है। प्रदेश का बजट योजना और गैर योजना दो भागों में बंटा रहता है। इसमें योजना के लिये 90ः की सहायता केन्द्र से मिलती है और 10% योगदान राज्य सरकार का होता है। यह योजना 2019-20 के लिये 7100 करोड़ की है। लेकिन गैर योजना का सारा खर्च राज्य को अपने ही संसाधनों से पूरा करना होता है चाहे उसके लिय कर्ज ही क्यों न लेना पड़े। वर्ष 2019-20 में प्रदेश का गैर योजना खर्च 36089.03 करोड़ होगा जबकि राजस्व आय केवल 33746.95 करोड़ रहने वाली है। इस तरह राजस्व आय से राजस्व व्यय 2342.08 करोड़ बढ़ जाता है। योजना और गैर योजना दोनों का मिलाकर राज्य की समेकित निधि बनती है।

राजस्व आय और व्यय के साथ ही बजट में पूंजीगत प्राप्तियों  का ब्योरा भी रहता है। इसके मुताबिक वर्ष 2019-20 में सरकार 8330.75 करोड़ ऋणों के माध्यम से जुटायेगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब राजस्व आय और व्यय में केवल 2342.08 करोड़ का घाटा है तब 8330.75 करोड़ का पूंजीगत ऋण क्यों? जब योजना का आकार 7100 करोड़ है और उसमें से 90% केन्द्र देगा फिर राजस्व व्यय में योजना के नाम पर 2822.24 करोड़़ का खर्च क्यों? फिर पूंजीगत प्राप्तियों में भी योजना के नाम पर केवल 3661.30 करोड़ का खर्च क्यों जबकि योजना तो 7100 करोड़ की है। बजट के आंकड़ो की इस जादूगरी से यह आंशका होना स्वभाविक है कि क्या योजना के तहत किये जा रहे कार्यों को पूरा होने के बाद भी गैर योजना में ट्रांसफर नही किया जा रहा है। क्या इसी कारण से कई कई वर्षों तक कार्यों के उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी नहीं किये जाते हैं और हर वर्ष सीएजी की रिपोर्ट में समेकित निधि से अधिक खर्च होने का पैरा बनता है। इस आने वाले वित्त वर्ष में एफआरबीएम के तहत केवल 4524 करोड़ की ही ऋण लिया जा सकता है। ऐसे में कर्ज की सीमा 4524 करोड़ ही हो सकती है तो फिर पूंजीगत प्राप्तियों के तहत 8330.75 करोड़ का ऋण क्यों और कैसे?
प्रदेश का 2003 में कुल कर्ज 13209.47 करोड़ था जो कि बढ़कर 2017-18 में 4790.21 करोड़ हो गया है। मुख्यमन्त्री के बजट भाषण के अनुसार 2018-19 में 4546 करोड़ का ऋण लिया जायेगा। इस तरह 2018-19 में यह कर्जभार 52 हजार करोड़ से ऊपर चला जायेगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या वित्तिय प्रबन्धन केवल कर्ज का जुगाड़ करना ही रह गया है? यदि इसी तरह लोक लुभावन घोषणओं को पूरा करने के लिये कर्ज लिया जाता रहा तो मुख्यमन्त्री के इस कार्यकाल में ही यह कहां तक पहुंच जायेगा इसका अनुमान आंकड़ों और दस्तावेजों से लगाया जा सकता है।

































                                 मुख्यमन्त्री के भाषण के अंश

अध्यक्ष महोदय, अब मैं 2018-19 के संशोधित अनुमानों तथा 2019-20 के बजट अनुमानों पर आता हूँ।
वर्ष 2018-19 के संशोधित अनुमानों के अनुसार कुल राजस्व प्राप्तियां 31 हजार, 189 करोड़ रुपये हैं, जबकि 2018-19 के बजट में यह प्राप्तियां 30 हजार, 400 करोड़ रुपये अनुमानित थीं। इसी प्रकार 2018-19 के संशोधित अनुमानों के अनुसार कुल राजस्व व्यय 33 हजार, 408 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जबकि बजट में 33 हजार 568 करोड़ रुपये अनुमानित था। इस प्रकार संशोधित अनुमानों के अनुसार कुल राजस्व घाटा 2 हजार, 219 करोड़ रुपये रहेगा जो कि 2018-19 के बजट अनुमान से 949 करोड़ रुपये कम है। संशोधित अनुमानों के अनुसार वर्ष 2018-19 के दौरान कुल राजकोषीय घाटा 7 हजार, 786 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो कि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 5.14 प्रतिशत है। 2018-19 के बजट अनुमानों के अनुसार कुल राजकोषीय घाटा राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 5.16 प्रतिशत आँका गया था।
वित्तीय वर्ष 2018-19 में इस घाटे को पूरा करने के लिये 4 हजार, 546 करोड़ रुपये का शुद्ध ऋण लेने का अनुमान है, जो कि Fiscal Responsibility and Budget Management Act (FRBM) के प्रावधानों के अनुसार है।
वर्ष 2019-20 के दौरान कुल राजस्व प्राप्तियां 33 हजार, 747 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है तथा कुल राजस्व व्यय 36 हजार, 089 करोड़ रुपये अनुमानित है। इस प्रकार कुल राजस्व घाटा 2 हजार, 342 करोड़ रुपये अनुमानित है। राजकोषीय घाटा 7 हजार, 352 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो कि प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद का 4.35 प्रतिशत होगा। प्राप्तियों एवं व्यय के बीच के अन्तर को ऋण के माध्यम से पोषित किया जाएगा तथा यह शुद्ध ऋण 5 हजार, 068 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह ऋण FRBM अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ही लिये जाएंगे।

जब पूंजीगत प्राप्तियां सकल ऋण है तो क्या इस वर्ष राजस्व व्यय पूरा करने के लिये 14000 करोड़ का कर्ज लिया गया?

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने जब सदन में 2018 के लिये 41440 करोड़ रूपये के कुल खर्च का बजट रखा था तब उन्होने वीरभद्र शासन पर यह आरोप लगाया था कि इस शासनकाल में 18787 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज लिया गया है। जयराम ने सदन में आंकड़ेे रखते हुए खुलासा किया था कि जब भाजपा ने 2007 में सत्ता संभाली थी तब प्रदेश पर 19977 करोड़ का कर्ज था। 31 दिसम्बर 2012 को सत्ता छोड़ते समय यह कर्ज 27598 करोड़ हो गया था। लेकिन अब 18 दिसम्बर को यह बढ़कर 46,385 करोड़ हो गया है। जयराम ठाकुर को 46385 करोड़ का कर्ज विरासत में मिला है। इस विरासत के साथ जयराम ने 41440 करोड़ के कुल खर्च का बजट पेश किया था जो अब 3142.65 करोड़ की अनुपूरक मांगेे आने के बाद कुल 44582.65 करोड़ पर पहुंच गया है।
मुख्यमन्त्री जयराम ने जब 41440 करोड़ के कुल खर्च का बजट सदन में रखा था उसमें सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियां 30400.21 करोड़ दिखाई गयी थी और राजस्व व्यय 33567.97 करोड़ दिखाया गया था। इस तरह राजस्व व्यय और आय में 3167.76 करोड़ का अन्तर था। राजस्व आय के बाद सरकार पूंजीगत प्राप्तियों के माध्यम से पैसा जुटाती है। सरकार की यह पूंजीगत प्राप्तियां 7764.75 करोड़ रही है। जिनमें 7730.20 करोड़ की प्राप्तियां कर्ज के रूप में है। यह बजट दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से दर्ज है। इस तरह पूंजीगत प्राप्तियों और राजस्व प्राप्तियों को मिलाकर सरकार के पास कुल 38164.96 करोड़ आता है और राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय को मिलाकर कुल खर्च 41439.94 करोड़ हो जाता है। इस तरह सरकार के पास 3274.98 करोड़ का ऐसा खर्च बच जाता है जिसके लिये कोई साधन बजट में नही दिखाया गया है। जिसका सीधा सा अर्थ यह रहता है कि इस खर्च को पूरा करने के लिये पूंजीगत प्राप्तियों के अतिरिक्त और कर्ज लेना पड़ेगा।
अब सरकार 3142.65 करोड़ की अनुपूरक मांगे लेकर आयी है। यह मांगे आने का अर्थ है कि सरकार का इस वर्ष का कुल खर्च बढ़ कर 44582.65 करोड़ का हो गया है। इन खर्चो को पूरा करने क लिये क्या अतिरिक्त उपाय किये गये हैं इसका कोई उल्लेख अनुपूरक मांगों में नही है। स्वभाविक है कि इस खर्च को पूरा करने के लिये या तो सरकार को और कर्ज लेना पड़़ेगा या फिर और टैक्स जनता पर परोक्ष/अपरोक्ष रूप से लगाने पड़ेंगे। इस तरह यदि पूंजीगत प्राप्तियों के नाम पर जुटाये गये ऋण और उसके बाद भी खुले छोड़ेे गये खर्चो और अब आयी अनुपूरक मांगो को मिलाकर देखा जाये तो जो आरोप मुख्यमन्त्री ने वीरभद्र शासन पर अतिरिक्त कर्ज लेने का लगाया था आज यह सरकार स्वयं भी उसी चक्रव्यूह में फंसती नज़र आ रही है। अब अनुपूरक मांगे आने के बाद सरकार का इस वित्तिय वर्ष का कुल राजस्व व्यय बढ़कर 44582.65 करोड़ को पहुंच गया है लेकिन राजस्व की आय तो पूराने 30400.21 करोड़ के आंकड़े पर ही खड़ी है। इससे यह सामने आता है कि इस राजस्व व्यय को पूरा करने के लिये सरकार को 14000 करोड़ का ऋण लेना पड़ा है। यह खुलासा एफआरवीएम अधिनियम के तहत सदन में पेश बजट दस्तावेजों में सामने आता है। इस अधिनियम के तहत बजट दस्तावेजों में व्याख्यात्मक विवरणिका सदन में रखना अनिवार्य है। इस विवरणिका में वित्तिय वर्ष में होने वाला कुल राजस्व व्यय और कुल राजस्व आय के आंकड़े रखे जाते हैं। इसी में पूंजीगत प्राप्तियों का आंकड़ा भी दिखाया जाता है। यह सारी विवरणिका पहले पन्ने पर ही दर्ज रहती है। इस विवरणिका को देखने से सामने आ जाता है कि पूंजीगत प्राप्तियों को सकल ऋण माना जाता है। वर्ष 2018 -19 में यह पूंजीगत प्राप्तियां सकल ऋणों के रूप में 7730.20 करोड़ दिखायी गयी हैं। इन आंकड़ो को देखने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि कुल खर्च को पूरा करने के लिये 14000 करोड़ के ऋण की आवश्यकता है क्योंकि कुल आय तो 30400 करोड़ से बढ़ नही पायी है। इस तरह यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह स्थिति कब तक और कितनी देर तक ऐसे चल पायेगी? यह स्थिति सबसे अधिक चिन्ता और चर्चा का विषय बनती है और एक लम्बे समय से ऐसे ही चली आ रही है। लेकिन आज तक इस पर न तो कभी माननीयों ने सदन में कोई चर्चा उठायी है और न ही प्रदेश के मीडिया ने इसे जनता के सामने रखा है।

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