शिमला/शैल। प्रदूषण नियन्त्रण और पर्यावरण सुरक्षा की जिम्मेदारी के लिये ही केन्द्र से लेकर राज्यों तक प्रदूषण नियन्त्रण बोर्डों का गठन किया गया है। क्योंकि आज अन्र्तराष्ट्रीय समुदाय की सबसे बड़ी चिन्ता पर्यावरण है। अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मेलनों और मंचो पर यह चिन्ता वयक्त की जा चुकी है। यूएन इस संद्धर्भ में कड़े नियम बना चुका है और सदस्य देश इन नियमों की पालना को बाध्य हैं। प्रदूषण और पर्यावरण की इसी गंभीरता का संज्ञान लेते हुए वीरभद्र शासनकाल के दौरान एनजीटी ने प्रदेश के प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के सदस्य सचिव और इसके अध्यक्ष की शैक्षणिक योग्यताओं को लेकर सवाल उठाया था और यह आदेश जारी किये थे कि इन पदों पर उन्हीं लोगों को तैनात किया जाये जिनके पास इस विषय की अनुकूल योग्यताएं हो।
प्रदेश में जब होटलों एवम् अन्य अवैध निर्माणों को लेकर उच्च न्यायालय में याचिकाएं आयी थी तब अदालत ने पर्यटन टीसीपी, लोक निर्माण के साथ- साथ प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड से भी जवाब तलबी की थी। इसी जवाब तलबी की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप कसौली कांड घटा था। एनजीटी प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड और टीसीपी के कुछ लोगों के खिलाफ नाम लेते हुए कारवाई करने के आदेश दिये थे। अदालत की इस सारी गंभीरता से स्पष्ट हो जाता है कि प्रदूषण और पर्यावरण की गंभीरता क्या है। लेकिन क्या अदालत की इस गंभीरता का सरकार और प्रदूषण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर कोई असर पड़ा है। इसका जवाब अभी 26-3-2019 को एनजीटी से आये एक आदेश के माध्यम से सामने आ जाता है।
एनजीटी के साप कांगड़ा के मण्डक्षेत्र में हो रहे अवैध खनन का एक मामला मंड पर्यावरण संरक्षण परिषद के माध्यम से आया था। यह मामला आने के बाद कलैक्टर कांगड़ा और प्रदेश के प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड से 21-12-2018 को जवाब मांगा गया था। इस पर बोर्ड ने 6-3-2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। शपथपत्र के साथ दायर हुई इस रिपोर्ट में बोर्ड ने सीधे कहा कि यह अवैध खनिज खनन का मामला उनके अधिकार क्षेत्र में ही नही आता है। यह उद्योग विभाग के जियोलोजिकल प्रभाग का मामला है जो कि 1957 के खनिज अधिनियम के तहत संचालित और नियन्त्रित होता है।
प्र्रदूषण बोर्ड के इस जवाब का कड़ा संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने यह कहा है कि शायद बोर्ड सदस्य सचिव को पर्यावरण के नियमों का पूरा ज्ञान ही नही है। पर्यावरण को लेकर प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है एनजीटी ने अपने आदेश में प्रदेश के मुख्य सचिव को भी निर्देश दिये हैं कि वह बोर्ड के सदस्य सचिव को पर्यावरण नियमों का पूरा ज्ञान अर्जित करने की व्यवस्था करें। एनजीटी का यह आदेश राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर सवाल खड़ा कर देता है क्योंकि इस आदेश से यह स्पष्ट हो जाता है कि या तो सदस्य सचिव को सही में ही पर्यावरण नियमों का ज्ञान नही है और उनकी नियुक्ति एनजीटी के पूर्व निर्देशों के एकदम विपरीत की गयी है। यदि यह नियुक्ति एनजीटी के मानकों के अनुसार सही है तो फिर निश्चित रूप से बोर्ड अवैध के दोषीयों को किसी के दबाव में बचाने का प्रयास कर रहा है सबसे रोचक तो यह है कि एनजीटी का यह आर्डर 26 मार्च को आ गया था। लेकिन अभी तक इस पर कोई अमल नही किया गया है। क्योंकि या तो सदस्य सचिव को पर्यावरण नियमों की जानकारी/योग्यता हासिल करने के निर्देश दिये जाते या फिर उनकी जगह किसी दूसरे अधिकारी को तैनात किया जाता जो एनजीटी के पूर्व के निर्देशों अनुसार शैक्षणिक योग्यता रखता हो। लेकिन अभी तक ऐसा हुआ नही है और इसी से सरकार की नीयत और नीति पर सवाल उठता है।


शिमला/शैल। भाजपा अध्यक्ष सत्तपाल सत्ती द्वारा राहुल गांधी के खिलाफ प्रयोग की गयी अभद्र भाषा का जवाब देते हुए कांग्रेस शासन में रहे उप महाधिवक्ता विनय शर्मा सत्ती से भी दो कदम आगे निकल गये है। उन्होंने सत्ती को जवाब देते हुए यहां तक कह दिया कि जो कोई सत्ती की जीभ काटकर लायेगा उसे वह दस लाख का ईनाम देंगे। विनय के इस ब्यान पर पूरी भाजपा में रोष फैल गया और भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदेश के कई हिस्सों में उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के ज्ञापन दिये हैं। पुलिस ने इन ज्ञापनों का संज्ञान लेकर कारवाई भी की है। इस बवाल के बाद एक न्यूज चैनल ने विनय शर्मा को एक चर्चा के लिये बुलाया। इस चर्चा में भाजपा की ओर से प्रदेश मीडिया प्रभारी एडवोकेट प्रवीण शर्मा ने भाग लिया। इस चर्चा में सत्ती का प्रसंग उभरा और विनय शर्मा से पूछा गया कि क्या वह अपने वक्तव्य पर अब भी कायम है। इस पर कोई खेद व्यक्त करने की बजाये विनय शर्मा ने न केवल यह कहा कि वह अपने ब्यान पर कायम है बल्कि यह साथ जोड़ दिया कि वह अब दस लाख का ईनाम देंगे। न्यूज चैनल में यह ब्यान रिकार्ड हो गया है।
स्वभाविक है कि इस ब्यान पर हंगामा होना ही था क्योंकि यह एक कांग्रेस नेता ही नही बल्कि पूर्व महाधिवक्ता का ब्यान था। जोकि अधिवक्ता अधिनियम की संहिता से भी बंधे हुए हैं और जानकारों के मुताबिक यह अधिनियम इस तरह के ब्यान की ईजाज़त नही देता है। विनय के इस ब्यान पर प्रवीण शर्मा ने चुनाव आयोग को विधिवत शिकायत भेज दी है। इसी के साथ बार काऊंसिल को भी इसकी शिकायत कर दी गयी है। विनय के ब्यान की पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने निंदा की है जिनके कार्यकाल में वह उप महाधिवक्ता थे। लेकिन कांग्रेस के किसी और नेता या पदाधिकारी की इस पर कोई प्रतिक्रिया नही आयी है।
चुनाव आयोग ने कांग्रेस से पूछा है कि क्या विनय उनके सदस्य हैं या नहीं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस क्या स्टैण्ड लेती है। इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि बार काॅऊंसिल इस पर क्या गंभीरता दिखाती है और प्रवीण शर्मा तथा भाजपा इस मामले को कितना और आगे बढ़ाते हैं। लेकिन इस विवादित ब्यान के बाद विनय का सोशल मीडिया में एक फोटो भी चर्चा में आया है जिससे उसकी परेशानी और बढ़ सकती है।


शिमला/शैल। मोदी सरकार ने देश के दस करोड़ गरीबों की सेहत की चिन्ता करते हुए एक महत्वकांक्षी आयुष्मान भारत योजना शुरू की है। इस योजना के तहत गरीब आदमी पांच लाख के खर्चे तक का मुफ्त ईलाज करवा सकता है। इसके लिये इन गरीब लोगों के आयुष्मान कार्ड बने हुए हैं। ईलाज करवाने आये व्यक्ति को संबंधित अस्पताल में यह कार्ड दर्ज करवाकर अपना मुफ्त ईलाज करवाने की सुविधा है। इस ईलाज में दवाईयों पर ही इतना खर्च आये या आप्रेशन में यह खर्च आये अस्पताल यह पैसा मरीज से वसूल नही करेगा। आयुष्मान भारत योजना को और सहारा देने के लिये प्रदेश सरकार ने भी अपनी ओर से हिमकेयर योजना शुरू कर रखी है। यह योजनाएं देखने और सुनने में जितनी आकर्षक हैं इनका व्यवहारिक पक्ष उतना ही कठिन है। यदि मरीज के साथ कम से कम दो आदमी साथ
आये हों और अस्पताल का स्टाॅफ ईमानदारी से उनका सहयोग करें तभी यह ईलाज संभव है अन्यथा नही।
आईजीएमसी प्रदेश का सबसे बड़ा स्वास्थ्य संस्थान है। यहां पर पिछले वर्ष करीब आठ लाख मरीज ईलाज के लिये आये हैं जिनमें हजारों ऐसे रहे हैं जो इन कार्डों के सहारे आये थे। लेकिन इन कार्डों पर दवाई लेने के लिये इतनी लम्बी और पेचीदा प्रक्रिया बना रखी है कि आदमी अन्त में तंग आकर कार्ड पर ईलाज करवाना ही छोड़ देता है। मरीज को दाखिल करवाने और फिर ठीक होने पर डिस्चार्ज लेने के लिये इतनी लम्बी और पेचीदा प्रक्रिया बना रखी है कि कई मरीज ईलाज के डिस्चार्ज होने की प्रक्रिया को पूरा किये बिना ही अस्पताल छोड़कर चले जाते हैं। आईजीएमसी में पिछले एक साल में 900 से अधिक मामले ऐसे सामने आ चुके हैं जिनके ईलाज पर संस्था की ओर से तो करीब चार करोड़ खर्च कर दिये गये हैं लेकिन अस्पताल को यह पैसा वापिस नही मिला है क्योंकि इसमें दाखिल होते समय और फिर छुट्टी करते हुए सारी प्रक्रियाओं को पूरा नही किया गया है। यह प्रक्रियाएं पूरी न होने के कारण भारत सरकार यह पैसा हिमाचल सरकार या आईजीएमसी को रिफण्ड नही कर रही है। यहां पर यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब मरीज को दाखिल करते वक्त यह कार्ड रिकार्ड पर दर्ज कर लिया जाता है तो फिर उसे अस्पताल से छुट्टी होने तक बार-बार कार्ड दर्ज करवाने की जरूरत क्यों हो।
इन कार्डों के तहत ईलाज करवाने के लिये हर बिमारी के लिये ईलाज का एक पैकेज तैयार किया जाता है। किसी भी बीमारी में यह पैकेज पांच लाख का नही है। लेकिन फिर भी बीमारी में मरीज को अपनी जेब से कुछ न कुछ खर्च करना पड़ ही जाता है। ऐसा क्यों हो रहा है इसका डाक्टरों के पास कोई संतोषजनक जवाब नही है। कार्डधारक के सारे टैस्ट फ्री होने होते हैं। आईजीएमसी मे टैस्टों के लिये प्राईवेट लैब एसएलआर काम कर रही है इसको अस्पताल की ओर से जगह भी दे गयी है। लेकिन यह लैब सारे टैस्ट फ्री में नही कर रही है। पिछले दिनों जब इस आश्य की शिकायतें अस्पताल के प्रबन्धन के पास पहुंची तब प्रबन्धन ने लिखित में लैब से जवाब मांगा। लेकिन जवाब मांगने पर लैब के स्थानीय प्रबन्धन ने जवाब दिया कि यह फ्री टैस्ट उनके एमओयू में शामिल ही नही है और इसका जवाब दिल्ली से आयेगा। लैब के साथ हुई इस कारवाई के बाद यह सामने आया है कि लैब के साथ एमओयू दिल्ली में नड्डा के मन्त्रालय के साथ हुआ है और उसमें क्या टैस्ट फ्री होने हैं इसकी सूची तक आईजीएमसी प्रबन्धन या राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग के पास उपलब्ध नही है। इसी तरह सरकार की हिमकेयर योजना के तहत भी सप्लायरों को पैसा नही दिया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक शिमला के मनचन्दा जैसे सप्लायर का ही करोड़ो का बिल कई दिनों से भुगतान के लिये फंस गया है। सप्लायरों की हालत यह हो गयी है कि वह आगे सप्लाई देने की स्थिति में नही है। ऐसे में जब आयुष्मान और हिमकेयर जैसी योजनाओं में आईजीएमसी का ही करीब पांच करोड़ फंस गया है तो प्रदेश के अन्य अस्पतालों में स्थिति कहां तक पहुंच गयी होगी और इस परिदृश्य में यह योजनाएं आगे कितना समय चल पायेगी इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है।
शिमला/शैल। जयराम सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे अनिल शर्मा के बेटे आश्रय शर्मा को मण्डी संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस द्वारा प्रत्याक्षी बनाये जाने के बाद प्रदेश का लोकसभा चुनाव सुखराम परिवार बनाम भाजपा होता जा रहा है। क्योंकि बेटे को कांग्रेस का टिकट मिलने के बाद सबसे पहले यह मुद्दा बना कि अनिल शर्मा मण्डी में भाजपा प्रत्याशी के लिये चुनाव प्रचार करें। जब अनिल ने ऐसा करने में असमर्थता जताई तो फिर यह मुद्दा अनिल के मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र देने का बन गया। अब जब अनिल ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया है तो मुद्दा विधानसभा की सदस्यता से भी
नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देने का बन गया है। पूरी भाजपा का हर बड़ा छोटा नेता अनिल का त्यागपत्र मांगने लग गया है। इस तरह पूरी प्रदेश भाजपा का केन्द्रिय मुद्दा अनिल शर्मा बना गया है और यह मुद्दा बनना ही सुखराम परिवार की पहली रणनीतिक जीत है।
जब सुखराम अपने पौत्र को कांग्रेस का टिकट दिलाने में सफल हो गये हैं तो यह तय है कि देर सवेर अनिल शर्मा भाजपा से किनारा कर ही लेंगे। लेकिन ऐसा कब होगा यह इस समय का सबसे अहम सवाल है। अनिल भाजपा के टिकट पर जीत कर आये हैं और तभी मन्त्री बने थे इस नाते वह पार्टी के अनुशासन से बंधे हैं। पार्टी अनुशासन के खिलाफ जाने पर पार्टी सदस्य के खिलाफ कारवाई करके सदस्य को पार्टी से बाहर निकाल सकती है। जो व्यक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक या सांसद बना हो उसकी सदन से सदस्यता तब तक समाप्त नही की सकती है जब तक वह सदन में पार्टी द्वारा जारी व्हिप का उल्लंघन न करे। सदन के बाहर कोई भी सांसद/विधायक पार्टी की नीतियों/ फैसलों पर अपनी अलग राय रख सकता है। अलग राय रखने के कारण सदन की सदस्यता रद्द नही की जा सकती है। यह नियमों में स्पष्ट कहा गया है। पार्टी में शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद इसके अभी प्रत्यक्ष और ताजा उदाहरण हैं। इसलिये अभी मानसून सत्र तक अनिल की सदस्यता को कोई खतरा नही है। ऐसे में अनिल के लिये यह राजनीतिक आवश्यकता हो जाती है कि वह सार्वजनिक चर्चा में आने के लिये पूरे दृश्य को ऐसा मोड़ देते कि पूरा राजनीतिक परिदृश्य उन्ही के गिर्द घूम जाता और वह ऐसा करने में पूरी तरह सफल भी रहे हैं।
जब भाजपा और मुख्यमन्त्री जयराम ने उनके चुनाव क्षेत्र में जाकर यह कहा कि उनका मन्त्री गायब हो गया है और घर में घास काट रहा है तब अनिल को पलटवार करने का मौका मिला और उसने सीधे कहा कि जब चाय वाला प्रधानमंत्री हो सकता है तो फिर मन्त्री घास क्यों नही काट सकता। इसके बाद यह वाकयुद्ध आगे बढ़ा और अनिल ने जयराम को बाईचांस बना मुख्यमन्त्री करार दे दिया। इस पर जब जयराम ने जबाव दिया तब अनिल ने मण्डी में स्वास्थ्य और सड़क सेवाओं के मुद्दे पर घेर लिया। आज पूरे प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क सेवाओं की बुरी हालत है। शिक्षा में प्राईवेट स्कूलों की लूट को लेकर छात्र-अभिभावक मंच आन्दोलन की राह पर हैं। सरकार अदालत के फैसले पर अमल नही करवा पायी है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन स्कूलों की लूट को अपरोक्ष में सरकार का समर्थन हासिल है। इसलिये आज तक इस आन्दोलन को लेकर मुख्यमन्त्री और शिक्षा मंत्री की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रिया नही आयी है। इसलिये अब अनिल शर्मा जब जयराम के मन्त्री नही रहे हैं तब सरकार के हर फैसले पर अपनी राय सार्वजनिक रूप से रख सकते हैं। वह सरकार के फैसलों की आलोचना कर सकते हैं। अनिल शर्मा सरकार में मन्त्री रहे हैं इसलिये सरकार की हर नीति की जानकारी उनको होना स्वभाविक है। सरकार की प्राथमिकताएं क्या रही हैं और उन पर किस मन्त्री का क्या स्टैण्ड था यह सब अनिल के संज्ञान में निश्चित रूप से रहा होगा। क्योंकि जिस सरकार को वित्त वर्ष के पहले ही सप्ताह में अपनी धरोहरों की निलामी करके कर्ज उठाना पड़ जाये उस सरकार की हालत का अन्दाजा लगाया जा सकता है। आज सरकार की हालत यह है कि सारे निगमों/बोर्डों में राजनेताओं को तैनातीयां नही दे पायी है। सरकार में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के पद अभी तक नही भरे जा सके हैं। राईट टू फूड के तहत नियमित फूड कमीश्नर की नियुक्ति नही हो पायी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टाॅलरैन्स का दावा करने वाली सरकार आज तक लोकायुक्त की नियुक्ति नही कर पायी है। यहां तक कि नगर निगम शिमला में मनोनीत पार्षदों का मनोनयन नही हो पाया है। यह सवाल उठ रहा है कि सरकार ने लोकसेवा आयोग में तो पद सृजित करके अपने विश्वस्त की ताजपोशी कर दी लेकिन अन्य अदारे आपकी प्राथमिकता नही रहे। ऐसा क्यों हुआ है हो सकता है कि इस बारे में बहुत सारी जानकारियां अब सामने आयें और उनका माध्यम अनिल शर्मा बन जायें।
अनिल शर्मा से नैतिकता के आधार पर सदन से त्यागपत्र मांगा जा रहा है। सुखराम पर पार्टी से विश्वासघात का आरोप लगाया जा रहा है। शान्ता कुमार ने कहा कि वह सुखराम को भाजपा में शामिल करने के पक्ष में नही थे। शान्ता ने यह भी कहा कि सुखराम से पूरे देश में भाजपा की बदनामी हुई है। सुखराम ने यह कहा कि उनके कारण भाजपा को 43 सीटें हालिस हुई हैं। इस तरह सुखराम/अनिल को केन्द्रित करके इतने मुद्दे खड़े हो गये हैं कि चुनाव में उन मुद्दों से ध्यान हटाना संभव नही होगा। भाजपा जब नैतिकता की बात करती है तो पहला सवाल यह उठता है कि इसी भाजपा ने 1996 में सदन के अन्दर एक लघुनाटिका प्रदर्शित की थी उसमें किश्न कपूर और जब जेपी नड्डा ने अनिल-सुखराम के किरदार निभाये थे। लेकिन उसके बाद 1998 में सुखराम के सहयोग से सरकार बनायी और पांच वर्ष चलायी भी। तब क्या भाजपा की नैतिकता कोई दूसरी थी? क्या भाजपा नेता आज नैतिकता दिखायेंगे कि सार्वजनिक रूप से कहे कि 1998 में सुखराम के सहयोग से सरकार बनाना और चलाना दोनो अनैतिक थे। इसके बाद अब 2017 में जब अनिल को भाजपा में शामिल किया और फिर मन्त्री बनाया तब क्या भाजपा के आरोपपत्र में उसके खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप नही था? क्या सत्ता के लिये उस आरोप को नज़रअन्दाज नही किया गया? क्या यह प्रदेश की जनता के साथ विश्वासघात नही था। क्या इस परिदृश्य में भाजपा से यह सवाल नही बनता है कि भाजपा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कब क्या कारवाई की? शान्ता कुमार ने 1992 में होटल यामिनी के बदले में अपनी प्राईवेट ज़मीन का तबादला करवाया। सचिवालय से यह लिखा गया कि विशेष परिस्थितियों में इसकी अनुमति दी जाती है। ऐसी सुविधा प्रदेश में कितने लोगों को दी गयी है। 1998 में धूमल सरकार में चिट्टों पर हजा़रों लोगों की भर्तीयों का मामला सामने आया। सरकार ने हर्ष गुप्ता और अभय शुक्ला के अधीन दो जांच कमेटीयां बैठाई। इन कमेटीयों की रिपोर्ट में सनसनी खेज खुलासे सामने आये। लेकिन अन्त में सरकार ने कोई कारवाई नही की। अब जयराम सरकार के सामने फिर भाजपा द्वारा सौंपा हुआ आरोप पत्र सामने है। इसी आरोप पत्र में अनिल के खिलाफ आरोप था। भाजपा इस आरोप पत्र पर कारवाई नही कर पायी है। इसके अतिरिक्त दर्जनों और मामले हैं जहां भाजपा की नैतिकता पर गंभीर सवाल उठते हैं। आज भी भ्रष्टाचार जारी है। ऐसे में भाजपा जब सुखराम और अनिल की नैतिकता पर सवाल उठायेगी तब सबसे पहले उसी की नैतिकता उसके सामने आ जायेगी। विश्लेष्कों के मुताबिक मुख्यमन्त्री के सलाहकारों ने ही मुख्यमन्त्री को आज संकट में लाकर खड़ा कर दिया है। इन्ही सलाहकारों के कारण यह चुनाव सुखराम परिवार के गिर्द केन्द्रित होता जा रहा है।
शिमला/शैल। कांग्रेस ने हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से अन्ततः पूर्व मन्त्री और श्री नयना देवी के विधायक रामलाल ठाकुर को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। इस घोषणा के साथ प्रदेश की चारों सीटों के लिये उम्मीदवारों के चयन की क्रिया पूरी हो गयी है। जिन चार लोगों को उम्मीदवार बनाया गया है उनमें से तीन रामलाल ठाकुर, पवन काजल और धनी राम शांडिल मौजूदा विधायक हैं। केवल मण्डी से ही युवा और नये चेहरे आश्रय शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा गया है। लेकिन आश्रय की राजनीतिक पृष्ठभूमि बाकी तीनों से कहीं ज्यादा भारी है। क्योंकि उनके दादा
पंडित सुखराम प्रदेश और केन्द्र सरकार में मन्त्री रहे हैं तथा पिता अनिल शर्मा अभी तक जयराम सरकार में मन्त्रिमण्डल में ऊर्जा मंत्री हैं।
इस तरह कांग्रेस द्वारा तीन विधायकों को लोकसभा चुनावों में उतारने से संगठन की स्थिति सामने आ जाती है कि कांग्रेस का संगठन कितना मज़बूत है। जब संगठन किन्ही कारणों से कमजोर से हो तो रणनीति ही रह जाती है जिससे प्रतिद्वन्दी को मात दी जा सकती है। इस रणनीति के तहत ही पंडित सुखराम और उनके पौत्र को भाजपा से तोड़कर कांग्रेस में शामिल किया गया तथा चुनाव का टिकट भी दे दिया गया। इसी गणित में हमीरपुर से भाजपा के तीन बार सांसद रह चुके और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुरेश चन्देल को कांग्रेस में शमिल करके उन्हें उम्मीदवार बनाने की चर्चा उठी थी। इसी चर्चा के कारण हमीरपुर के टिकट का फैसला इतनी देर से हुआ और चन्देल की चर्चा सिरे नहीं चढ़ी तथा रामलाल ठाकुर को टिकट दिया गया। राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में चन्देल का शामिल न हो पाना कांग्रेस की बड़ी रणनीतिक असफलता मानी जा रही है क्योंकि यदि चन्देल पार्टी में शामिल हो जाते तो यह भाजपा के लिये मनोवैज्ञानिक तौर पर एक बड़ा झटका होता है। अब रामलाल के उम्मीदवार होने के बाद यहां कांग्रेस किस तरह से अपनी ईमानदार एकजुटता का परिचय देती है यह आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र के सत्रह विधानसभा क्षेत्रों में से पांच पर कांग्रेस का कब्जा है और एक पर निर्दलीय का है। यहीं से नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खु ताल्लुक रखते हैं। इन्हीं के साथ सुजानपुर के राजेन्द्र राणा जिन्होंने विधानसभा में प्रेम कुमार धूमल को हराकर प्रदेश की राजनीति को ही एक नयी करवट पर ला दिया उन्हें भी अपने को पुनः प्रमाणित करने की चुनौती होगी। क्योंकि वीरभद्र सिंह ने बहुत अरसा पहले ही राजेन्द्र राणा के बेटे अभिषेक राणा को हमीरपुर से भावी प्रत्याशी घोषित कर दिया था और अन्त तक अपने स्टैण्ड पर टिके रहे हैं। ऐसे में सुजानपुर में कांग्रेस का प्रदर्शन राणा और वीरभद्र सिंह दोनो की ही नीयत और नीति की कसौटी भी बन जाता है।
इस समय प्रदेश कांग्रेस में सबसे बड़ा नाम वीरभद्र सिंह का ही है इसमें कोई दो राय नही है। भले ही वह ईडी और सीबीआई के मनीलाॅडिंªग तथा आय से अधिक संपत्ति के मामले झेल रहे हैं। वीरभद्र एक प्रमाणित राजनीतिक प्रबन्धक हैं यह सभी मानते हैं। उनके इसी प्रबन्धन का कमाल है कि इन मामलो में सहअभियुक्त बने आनन्द चौहान और वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर की तो गिरफ्तारी हो गयी लेकिन वीरभद्र पर हाथ नही डाला जा सका। बल्कि जब ऐजैन्सी ने वक्कामुल्ला की जमानत रद्द करवाने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय में दस्तक दी तब न्यायालय ने इसी बिन्दु पर ऐजैन्सी को लताड़ लगायी कि मुख्य अभियुक्त को छोड़कर सहअभियुक्तों के खिलाफ कारवाई क्यों। आज वीरभद्र के खिलाफ चाहे दोनों मामलों में प्रतिकूल फैसला आ जाए लेकिन अब उनकी गिरफ्तारी का वक्त निकल गया है और सर्वोच्च न्यायालय तक अपीलों का रास्ता खुला है। आज मोदी सरकार भ्रष्टाचार के प्रति कितनी गंभीर और ईमानदार है उसका इसी से अन्दाजा लग जाता है। वीरभद्र के बाद दूसरे बड़े नाम हैं कौल सिंह ठाकुर, जी एस बाली, सुक्खु, अग्निहोत्री, आशा कुमारी और सुधीर शर्मा। कांग्रेस के बाकी नेताओं की गिनती इनके बाद आती है। अग्निहोत्री, आशा कुमारी और सुधीर शर्मा वीरभद्र कैंप माना जाता है। कौल सिंह और सुक्खु इकट्ठे माने जाते हैं और जी एस बाली को कभी दोनों के साथ तो कभी अलग गिना जाता है। इस तरह प्रदेश कांग्रेस दो हिस्सों में बंटी हुई है। दिल्ली में बैठे आनन्द शर्मा दोनो धड़ों को बराबर अपनी सुविधानुसार समर्थन देते रहते हैं। उनका इतना ही तय है कि वह वीरभद्र सिंह का कभी भी मन से विरोध नही करते हैं बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि आज आनन्द शर्मा जिस मुकाम पर हैं उसमें सबसे ज्यादा योगदान और समर्थन वीरभद्र सिंह का ही रहा है
आज लोकसभा चुनावों के परिदृश्य में कांग्रेस के इस गणित को नजऱअन्दाज करके कोई आकलन नहीं किया जा सकता। यह एक जमीनी सच है कि आज यदि वीरभद्र सिंह ईडी और सीबीआई के हाथों बड़ी कारवाई से बचे रहे हैं तो इसके लिये उनके मोदी सरकार के साथ भी कहीं न कहीं अच्छे रिश्तों की भूमिका अवश्य रही है। यह भी स्वभाविक है कि जब आप किसी से सहयोग लेते हैं तो कभी उसे ब्याज समेत लौटाना भी पड़ता है। फिर राजनीति मे इस लेनदेन का सबसे सही वक्त चुनाव ही होता है। यदि इस गणित से पिछले करीब चार महीनों की प्रदेश की राजनीति का आकलन किया जाये तो सबसे पहले यह आता है कि जब वीरभद्र सिंह ने जयराम सरकार को यह अभय दान दिया था कि उनके खिलाफ सत्र में बड़ी आक्रामकता नही अपनाई जायेगी। इसके बाद वीरभद्र सिंह ने खुलेआम कहा कि मण्डी से कोई भी मकरझण्डू चुनाव लड़ लेगा। मण्डी के बाद हमीरपुर और कांगड़ा से उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया। अभिषेक राणा और सुधीर शर्मा की उम्मीदवारी घोषित कर दी। इस उम्मीदवारी की घोषणा के बाद सुक्खु को अध्यक्ष पद से हटाने के लिये कुलदीप राठौर के नाम पर अपनी मोहर लगा दी। जब हमीरपुर से एक समय प्रैस ने सुक्खु के संभावित उम्मीदवार होने पर प्रश्न प्रश्न पूछा तो सीधे कह दिया कि हाईकमान में ऐसा कोई मूर्ख नही है जो सुक्खु का उम्मीदवार बनायेगा। अब सुखराम को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया वीरभद्र दे रहे हैं उससेे और स्पष्ट हो जाता है कि वह किसी बड़े दवाब में चल रहे हैं। क्योंकि जो कुछ पिछले चार-पांच महीनों में घटा है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वीरभद्र की प्राथमिकता भाजपा को हराने की तो बिल्कुल भी नही रही है। आज राष्ट्रीय स्तर पर पूरा देश भाजपा और गैर भाजपा में बंटा खड़ा है और वीरभद्र जयराम सरकार को ईमानदारी का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं जबकि अभी कुछ समय पहले ही कांग्रेस ने इसी सरकार के खिलारफ राज्यपाल को एक आरोपपत्र सौंपा है। इस परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस और वीरभद्र दो अलग- अलग ध्रुवों के रूप में सामने आते हैं और यही सबकुछ इस पर गंभीर सवाल भी खड़े कर जाता है।
क्योंकि जब वीरभद्र जैसा बड़ा नेता भाजपा की प्रदेश सरकार को ईमानदारी का प्रमाणपत्र बांटेगा तो फिर चुनाव प्रचार अभियान में किस आधार पर उस सरकार के खिलाफ वोट मांगेगा। जब सुखराम को आया राम गया राम की संज्ञा देंगे तो फिर कैसे उसके साथ स्टेज शेयर करेंगे।
इस तरह के कई सवाल एक साथ उठ खड़े हुए हैं। इन सवालों से कांग्रेस का पक्ष निश्चित रूप से कमजोर होता है। फिर इसी के साथ चारों क्षेत्रों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की एक दूसरे से नाराज़गी की खबरें भी आये दिन प्रमुखता से सामने आ रही हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर के लिये संगठन के भीतर की इस खेमेबाजी को नियन्त्रण में रख पाना बहुत आसान नही होगा। क्योंकि वीरभद्र जैसे बड़े नेताओं को इस ऐज-स्टेज पर पार्टी अनुशासन में बांध कर रखना बहुत आसान नही होगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी भाजपा का मुकाबला करने से पहले अपने ही घर को अनुशासन में कैसे रख पाती है।
यह हैं कांग्रेस प्रत्याशी
आश्रय शर्मा (मण्डी) रामलाल ठाकुर (हमीरपुर)

डाॅ. धनीराम शांडिल पवन काजल
शिमला कांगड़ा