Friday, 16 January 2026
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सरकार को नहीं पता की तीन लाख एकड़ जमीन कहां है

शिमला/शैल। देश में 1975 में जब आपातकाल लगा था तब गांवों के भूमिहीन लोगों को दस दस कनाल ज़मीने दी गयी थी ताकि कोई भी भूमिहीन न रहे। प्रदेश में इस योजना को पूरी ईमानदारी के साथ लागू किया गया था। जिन लोगों को इस योजना के तहत ज़मीने मिली थी उन्हे बाद में यहां पर उगे पेड़ों का अधिकार भी दे दिया गया था और इसी के साथ यह भी कर दिया गया था कि यह लोग इन जमीनों को आगे बेच नही सकेगें। बल्कि आज जब कोई भू-सुधार अधिानियम धारा 118 के तहत अनुमति लेकर जमीन खरीदता है तो बेचने वाले को यह घोषणा करनी पड़ती है कि वह इस जमीन को बेचने के बाद भूमिहीन नही हो रहा है। आपातकाल के दौरान लायी गयी इस योजना से पूर्व 1953 और फिर 1971 में दो बार भू- सुधार अधिनियम आ चुके हैं। 1953 में बड़ी जिमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिये Ablolition of Big Landed Estate Act. लाया गया था। इस अधिनियम के तहत सौ रूपये और उससे अधिक लगान देने वाले जिमींदारों की फालतू जमीने सरकार में शामिल कर ली गयी थी। इसके बाद 1971 में लैण्डसीलिंग एक्ट के तहत 161 बीघे से अधिक जमीन नही रखी जा सकती है। यह कानून लागू हो गया था।
सरकार के इन दोनों कानूनो के लागू होने के बाद सरकार के पास तीन लाख एकड़ जमीन आ गयी थी यह सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में इन्द्रसिंह ठाकुर की याचिका में स्वीकार किया हुआ है। सरकार को मिली यह जमीन भूमिहीनों को दी जानी थी यह भी इन दोनों अधिनियमों मे कहा गया है लेकिन आज भी सरकारी आंकड़ो के मुताबिक प्रदेश में 2,27000 परिवार भूमिहीन हैं। जिनमें से 80% दलित हैं। सरकार के इन आंकड़ों से यह सवाल उठता है कि प्रदेश में दो बार 1953 और 1971 में भू- सुधार अधिनियम लागू हुए हैं और फिर आपातकाल में हर भूमिहीन को 10 कनाल जमीन देने के बाद भी भूमिहीनों का यह आंकडा क्यों? क्या प्रदेश में इन अधिनियमों की अनुपालना केवल सरकारी फाईलों में ही हुई है। पिछले 24 सितम्बर को राज कुमार, राजेन्द्र सिंह बनाम एसजेवीएनएल में आये फैसले के बाद प्रदेश सरकार यह खोजने का प्रयास कर रही है कि उसके पास कितनी जमीनेे आयी हैं। विजिलैन्स प्रदेश के राजस्व विभाग से यह जानकरी मांगी है लेकिन अभी तक यह जानकारी मिल नही पायी है। सर्वोच्च न्यायालय ने राजेन्द्र सिंह के मामले में स्पष्ट आदेश किये हैं कि जब इन अधिनियमों के बाद इनकी फालतू जमीने सरकार में चली गयी थी तो फिर इनसे विकास कार्याें के नाम पर मुआवजा देकर ज़मीने कैसे ली गयी।
सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे परिवार के ऐसे चलने को फ्राॅड की संज्ञा देते हुए इन्हें दिये गये मुआवजे को ब्याज सहित वापिस लेने के आदेश दिये हैं। लेकिन जयराम सरकार अभी तक इस आदेश की अनुपालना नहीं कर पायी है। बल्कि सरकार के पास ऐसा रिकार्ड ही अभी उपलब्ध नहीं है। बल्कि एफ सी अपील ने इस परिवार को जो 98 बीघे जमीन सरपल्स घोषित की थी उस जमीन को भी सरकार अभी तक शायद अपने कब्जे में नहीं ले पायी है। इसी तरह तीन लाख एकड़ जमीन की हकीकत है।

क्या जयराम सरकार के मन्त्री भी आऊट सोर्सिंग के कारोबार में शामिल हैं

शिमला/शैल। अभी कुछ दिन पहले प्रदेश विश्वविद्यालय के समीप पाॅटर हिल में आरएसएस की शाखा लगाने और क्रिकेट खेलने को लेकर उठे विवाद में आरएसएस के स्यवंसेवकों, विद्यार्थी परिषद के छात्रों और एसएफआई के बीच खूनी झड़प हो गयी जिसमें इन तीनों संगठनों के करीब डेढ़ दर्जन लोग घायल हुए हैं। घायलों को आईजीएमसी और रिपन अस्पताल में भर्ती करना पड़ा है। यह पहला मामला है जहां इस तरह के संघर्ष में आरएसएस का नाम आया है। इस झगड़े के बाद दोनो पक्षों की ओर से पुलिस में मामले दर्ज करवाये गये हैं। मामले दर्ज होने के बाद पुलिस आरोपियों को पकड़ने के लिये कारवाई में जुट गयी है। इस संघर्ष में कुछ लोग गंभीर रूप से घायल हैं और उन्हें डाक्टरों की निगरानी में रखा गया है। इस मामले पर मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर से लेकर शिक्षा मन्त्री सुरेश भारद्वाज और एसएफआई तथा नौजवान सभा के नेता आमने-सामने आ गये हैं। प्रदेश सीपीएम के शीर्ष नेतृत्व ने इस संबंध में एक पत्रकार वार्ता करके सरकार और मुख्यमन्त्री की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाये हैं। आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय का भगवाकरण किया जा रहा है। आरएसएस के कार्यकर्ताओं की गतिविधियों को लेकर चुनाव आयोग तक से शिकायत की गयी है।
नौजवान सभा के संयोजक चन्द्रकांत वर्मा ने आरोप लगाया है कि इस खूनी झड़प का मूल कारण विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आऊट सोर्स पर की गयी भर्तियां हैं। उसके मुताबिक आऊट सोर्स पर भर्तीयां करने के लिये टैण्डर मंगवाये गये थे और भर्ती का ठेका किसी काॅरपोरेट नामक कंपनी को दे भी दिया गया था। लेकिन इस ठेेके को बाद में शिक्षा मंत्री के हस्तक्षेप से रद्द कर दिया गया। बाद में फिर टैण्डर मांगे गये और इस बार सिंगल टैण्डर पर ही एक उत्तम हिमाचल नामक कंपनी को यह ठेका दे दिया गया। यह उत्तम हिमाचल कंपनी शिक्षा मंत्री के किसी करीबी की बताई जा रही है। आऊट सोर्स के माध्यम से विश्वविद्यालय की परिणाम शाखा में 18 प्रोग्रामर भर्ती किये गये हैं। आरोप है कि यह सारे लोग भाजपा और आरएसएस से संवद्ध लोग हैं। इन लोगों के भर्तीे होने से परिणामों की निष्पक्षता प्रभावित होने का सन्देह व्यक्त किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय की परिणाम शाखा एक गोपनीय प्रभाग मानी जाती है जिसमें गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा जाता है। ऐसे में यह पहला सवाल उठता है कि क्या इस शाखा में गोपनीयता का काम आऊट सोर्स पर तैनात किये गये कर्मचारियों को सौंपा जा सकता है। आऊटसोर्स पर सेवा उपलब्ध करवाने वाली कंपनी शिक्षा मन्त्री के करीबी की कही गयी है। इसका कोई खण्डन नही आया है। यह सरकार भी अपने विभिन्न अदारों में आऊट सोर्स पर भर्तीयां कर रही है। विश्वविद्यालय के इस विवाद से पहले राज्य बिजली बोर्ड में आऊट सोर्स के टैण्डर को लेकर विवाद खड़ा हो चुका है। अभी आऊट सोर्स कर्मीे कालीबाडी़ में एक सम्मेलन करके आन्दोलन की रूप रेखा तैयार कर चुके हैं। जयराम के एक मन्त्री के तो इस संबंध में पत्र भी छप चुके हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार के कुछ मन्त्री इस आऊट सोर्स नीति को अपना समर्थन दे रहे हैं। लेकिन इस संद्धर्भ में सरकार की नीयत और नीति पर उस समय शक हो जाता है जब सरकार आऊट सोर्स को लेकर विधानसभा में पूछे गये सवालों को यह कहकर लंबित कर देती है कि सूचना एकत्रित की जा रही है। जब सरकार आऊट सोर्स पर भर्तीयां कर ही रही है फिर इसमें पूरी सूचना सार्वजनिक रूप से सामने न रखना सवाल तो खड़े करेगा ही। क्योंकि इन भर्तीयों में शैक्षणिक मैरिट और आरक्षण के तहत रोस्टर आदि की अनुपालना करने की कोई बंदिश नही रहती है। और ठेकेदार को बिना किसी काम के मोटा कमीशन मिलता रहता है। यह कंपनी अपने दफ्तर का काम भी केवल एक बोर्ड टांगकर ही चला लेती है। न्यू शिमला में इस तरह की एक कंपनी का बोर्ड काफी चर्चा में रहा है।
इस परिदृश्य में आज यह एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है कि जो लाखों लोग रोज़गार कार्यालयों के माध्यम से नाम पंजीकृत करवाकर रोजगार की प्रतीक्षा में बैठे हैं उनका क्या होगा। इस समय प्रदेश के रोजगार कार्यालयों में 8,34084 लोग पंजीकृत हैं। जिनमें 73077 पोस्ट ग्रैजुएट, 1,32,186 ग्रैजुएट, 5,86,453 मैट्रिक, 40819 अन्य पढ़े लिखे और 1549 अनपढ़ है। लेकिन पिछले पन्द्रह वर्षों में प्रतिवर्ष कितने लोगों को सरकार और प्राईवेट क्षेत्र में रोजगार मिल सका है यह सरकार के अर्थ एवम् संख्या विभाग के इन आंकड़ो से स्पष्ट हो जाता है।
इसी के साथ यह आंकड़ा भी महत्वपूर्ण है कि इस सरकार में कुल 1,77,338 कर्मचारी नियमित रूप से कार्य कर रहे हैं जबकि 42,877 कर्मचारी नियमित नही हैं। इन आंकड़ो में वाॅलंटियर, तदर्थ, विद्याउपासक, टैन्योर और कान्ट्रैक्ट आदि सब शामिल है इसमें आऊट सोर्स का आंकड़ा शामिल नही है क्योंकि आऊट सोर्स को सरकारी कर्मचारी की संज्ञा नही दी जा सकती। आज आऊट सोर्स कर्मचारियों की संख्या भी करीब पचास हजार का आंकड़ा छूने वाली है क्योंकि जब वीरभद्र सरकार के दौरान इन्हें नियमित करने की नीति बनाने की चर्चा उठी थी तब इनकी संख्या 35000 कही गयी थी। उसके बाद आजतक इसमें 15000 से अधिक और भर्ती होने की चर्चा है। ऐसे में आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय की तरह और कहां-कहां क्या घट सकता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इन आंकड़ो से सरकार के इन दावों का सच भी सामने आ जाता है कि कब कितना रोजगार मिला है।

अनिल बने भाजपा के गले की फांस

शिमला/शैल। जयराम के ऊर्जा मंत्री अनिल शर्मा के बेटे आश्रय मण्डी लोकसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी बन गए। आश्रय के कांग्रेस का उम्मीदवार होने से भाजपा के लिये अनिल शर्मा को मंत्रीमण्डल और पार्टी में बनाये रखना गले की फांस बनता जा रहा है। क्योंकि जब तक अनिल शर्मा भाजपा के लिखित आदेशों की अनुपालना करने से इन्कार नहीं करते हैं तब तक उनके खिलाफ दल बदल एंवम् अनुशासनहीनता के तहत कारवाई नही की जा सकती है। अभी तक सूत्रों के मुताबिक रिकार्ड पर ऐसा कुछ नही आया हालांकि अनिल शर्मा लोकसभा क्षेत्रा के लिये आयोजित कार्यक्रम ‘‘मै भी चैकीदार हूं’’ में जाहू में शामिल नही हुए हैं। लेकिन इसके लिये कोई लिखित आदेश नही थे। ऐसे में अनिल शर्मा का निष्कासन पेचीदा होता जा रहा है। क्योंकि अनिल शर्मा मुख्यमन्त्री के अपने ही गृह जिला से ताल्लुक रखते हैं और वरिष्ठ मंत्री है। इस नाते उन्हें सरकार के अन्दर की जानकारियों का ज्ञान होना स्वभाविक है। फिर यह बाहर आ ही चुका है कि अनिल शर्मा मुख्यमन्त्री के सलाहकारों के प्रति बहुत सन्तुष्ट नही रहे हैं। इससे यह इंगित हो जाता है कि जब चुनाव के दिनों में भाजपा अनिल को बाहर करती है तब सरकार को लेकर बहुत सारी असहज स्थितियां पैदा हो सकती हंै।
अभी पंडित सुखराम को लेकर जिस तरह का ब्यान शान्ता कुमार का आया है उससे भाजपा पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं कि जब 1998 और 2017 में सुखराम का सहयोग भाजपा ने लिया था और उनके साथ मिलकर सरकार बनाई थी तब सुखराम अच्छे थे और उससे भाजपा की कोई बदनामी नही हुई थी जो आज उनके भाजपा के साथ छोड़ने से हो गयी है। यह निश्चित है कि भाजपा जितना ज्यादा सुखराम और अनिल को कोसेगी उतना ही ज्यादा भाजपा का नुकसान होगा। आज राजनीतिक परिस्थितियों में विष्लेशकों के मुताबिक अनिल शर्मा को यह सुनिश्चित करना है कि भाजपा जल्द से जल्द उन्हें पार्टी से निकाले और वह खुलकर बेटे के लिये चुनाव प्रचार करें। अभी अनिल शर्मा के खिलाफ संगठन की अनुशंसा पर दल बदल कानून के तहत कितनी कारवाई संभव है इस पर स्थिति स्पष्ट नही है। क्योंकि संगठन में लोकतान्त्रिक अधिकारों के तहत मत भिन्नता की पूरी छूट रहती है। आज जब पूरी भाजपा ‘‘मै भी चैकीदार हूं’’ हो रही है तब इसके कई वरिष्ठ सांसदों/मन्त्रीयों ने चैकीदार होने से मना कर दिया है। यह कार्यक्रम संगठन का है और इसे न मानने से दल बदल के तहत कारवाही आकर्षित नही होती है। यह कारवाही सामान्यतः सदन में विहिप की उल्लघंना पर ही होती है और अभी प्रदेश विधानसभा का कोई सत्र होने नही जा रहा है। ऐसे में अनिल के लिये सदन की सदस्यता से वंचित होने और फिर उपचुनाव का सामना करने की स्थिति लोकसभा चुनावों के बाद ही आयेगी ऐसे में यह भाजपा को देखना है कि वह अनिल के निष्कासन का जोखिम अभी उठाती है या बाद में।

हमीरपुर का फैसला बना कांग्रेस रणनीति की परीक्षा आश्रय, शांडिल और काजल के नामों की हुई घोषणा

शिमला/शैल। कांगे्रस के मण्डी और शिमला से उम्मीदवारों की हाईकमान द्वारा घोषणा के बाद अब प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर ने शिमला में आयोजित एक प्रेस वार्ता में कांगड़ा से पवन काजल की उम्मीदवारी का भी ऐलान कर दिया है। राठौर के इस ऐलान के बाद अब केवल हमीरपुर से उम्मीदवार की घोषणा होना बाकी है। हमीरपुर से भाजपा ने वर्तमान सांसद पूर्व मुख्यमन्त्री के बेटे अनुराग ठाुकर को फिर से उम्मीदवार बनाया है। भाजपा ने कांगड़ा और शिमला से उम्मीदवार बदले हैं जबकि प्रदेश चुनाव कमेटी ने सभी वर्तमान चारो सांसदों के फिर से उम्मीदवार बनाने की संस्तुति की थी। प्रदेश कमेटी की इस संस्तुति के बावजूद दो उम्मीदवारों का बदलना जिनमें शान्ता जैसा बड़ा नाम भी शमिल है यह स्पष्ट करता है कि भाजपा हाईकमान की प्रदेश को लेकर मिली सर्वे रिपोर्टाें के अनुसार हिमाचल 2019 में 2014 की तरह सुरक्षित नही रह गया है। इन्ही रिपोर्टों के कारण भाजपा ने प्रदेश के चुनाव प्रचार की कमान पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल को सौंपी है। क्योंकि जब शान्ता कुमार को टिकट नही दिया गया है तो यह स्वभाविक है कि इस चुनाव में उनकी पहले जैसी सक्रीयता नही रह जायेगी। शान्ता ने टिकट कटने को गंभीरता से लिया है। सभी जानते हैं कि इस फैसले से पहले उनकी राय नही ली गयी थी। इस तरह इस चुनाव में भाजपा में धूमल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
ऐसे में जब हमीरपुर से धूमल का अपना बेटा उम्मीदवार है तब स्वभाविक है कि कांग्रेस उन्हें हमीरपुर में ही बांध कर रखना चाहेगी। क्योंकि प्रदेश भाजपा के पास आज भी धूमल से बड़ा कोई नाम नही है। क्योंकि यह धूमल ही थे जिन्होंने अपनी रणनीति से वीरभद्र को अपने दोनों शासनकालों मे ऐसे बांध कर रखा कि आज तक वीरभद्र उस दंश को नही भूल पाये हैं। संभवतः यही कारण है कि हमीरपुर से कांग्रेस के सारे बड़े नेता उम्मीदवार बनने से बचना चाहते रहे हैं। कांग्रेस के इस क्षेत्र के बडे़ नेताओं के साथ धूमल के अपरोक्ष में कैसे रिश्ते रहे हैं यह पूर्व में उस समय सामने आ चुका है जब कांग्रेस ने यहां से एक बार क्रिकेटर मदन लाल को प्रत्याशी बनाने का प्रयास किया था। संभवतः यह रिश्ते एक बार फिर सक्रिय भूमिका में आ चुक हैं और इन्ही के कारण हमीरपुर के टिकट का फैसला अभी तक नही हो पाया है। इस समय हमीरपुर से भाजपा के तीन बार सांसद रह चुके सुरेश चन्देल ने कांग्रेस में जाने और फिर कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के संकेत दिये हैं। इन संकेतो के बाद भाजपा ने चन्देल को रोकने के पूरे प्रयास किये हैं। सत्तपाल सत्ती और जयराम ने चन्देल से बैठक की है। इनके बाद अमितशाह से भी चन्देल की बैठक करवाई गयी लेकिन इन सारे प्रयासों का कोई सार्थक परिणाम नही निकल पाया। परन्तु इस सबसे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि यदि कांग्रेस चन्देल को उम्मीदवार बना लेेती है तो वह धूमल को हमीरपुर में ही बांधे रखने में बहुत हद तक सफल हो जाती है।
इस परिदृश्य में यह माना जा रहा है कि कांग्रेस हाईकमान ने अभी तक चन्देल का विकल्प खुला रखा है। क्योंकि आज जब सुक्खु ने एक साक्षात्कार के माध्यम से हमीरपुर से उम्मीदवार बनने की हामी भरी है उससे यह स्वभाविक सवाल उठता है कि प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष को एक अखबार में साक्षात्कार के माध्यम से उम्मीदवार होने की बात क्यों करनी पड़ रही है। क्या वह कांगे्रस के कार्यकर्ताओं को यह बताना चाह रहे हैं कि उनकी नीयत पर शक न किया जाये। यदि सुक्खु सही में उम्मीदवार होने के लिये तैयार थे तो उन्हें यह सब चन्देल के नाम की चर्चा उठने से पहले ही कर देना चाहिये था आज जिस हद तक चन्देल का कांग्रेस में आना चर्चित हो चुका है। उसके बाद इसका रूकना चन्देल से ज्यादा कांग्रेस की सेहत के लिये ठीक नही रहेगा। क्योंकि जब कांगे्रस सुखराम को लेने के बाद उनके पौत्र को इसलिये टिकट दे सकती है कि इससे जयराम को उसी के जिले में झटका दिया जा सकता है। तब उसी गणित से चन्देल को शामिल करके हमीरपुर से उम्मीदवार बनना एक कारगर रणनीति की मांग हो जाती है। इस तरह आज कांग्रेस की पूरी रणनीति की परीक्षा हमीरपुर का फैसला बन गयी है और यह तय है कि इस फैसले का असर प्रदेश की चारों सीटों पर पड़ेगा।

आसान नही होगी भाजपा की चुनावी डगर, जयराम की प्रतिष्ठा आयी दाव पर

शिमला/शैल। भाजपा ने प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों के लिये उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। इस ऐलान के तुमाबिक कांगड़ा से शान्ता कुमार की जगह अब जयराम के मन्त्री किश्न कपूर को उम्मीदवार बनाया गया है। शिमला आरक्षित सीट से ‘‘ कैश आन कैमरा’’ का मामला झेल रहे वीरेन्द्र कश्यप का टिकट काट कर उनकी जगह पच्छाद के विधायक सुरेश कश्यप को टिकट दिया गया है। हमीरपुर और मण्डी से पुराने ही चेहरों को चुनाव में उतारा गया है। भाजपा की इस सूची के बाहर आते ही यह चर्चा शुरू हो गयी है कि क्या इन चेहरों के सहारे भाजपा 2014 की तरह फिर से चारों सीटों पर कब्जा कर पायेगी या नही। इसका सही आकलन तो प्रतिद्वन्दी कांगे्रस की टीम की घोषणा के बाद ही किया जा सकेगा। लेकिन इससे हटकर भी यह सवाल अपनी जगह खड़ा रहता है कि भाजपा के इन उम्मीदवारों की अपनी-अपनी मैरिट क्या है। क्योंकि ऐसा नही है कि बदले गये उम्मीदवारों के स्थान पर लाये गये लोग पहली बार चुनाव का समाना कर रहे हों। किश्न कपूर वरिष्ठ मन्त्री हैं और लम्बे समय से विधायक चुनकर आ रहे हैं। बतौर मन्त्री भी उनके विभाग को लेकर लोगों में कोई बहुत ज्यादा शिकायतें नही हैं। सुरेश कश्यप भी इस समय विधायक हैं। हां, वह विधायक के नाते कोई बहुत ज्यादा अनुभवी नही हैं। अभी संपन्न हुए बजट सत्र में उनके नाम से केवल आठ प्रश्न सदन में आये हैं और इन प्रश्नों में भी उनका फोकस अपने विधानसभा क्षेत्र तक ही सीमित रहा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें पूरे शिमला संसदीय क्षेत्र की भी अपने स्तर पर सीधी जानकारी नही रही होगी। जबकि मण्डी के रामस्वरूप शर्मा मौजूदा सांसद भी हैं और इससे पहले पार्टी के प्रदेश संगठन मन्त्री भी रह चुके हैं इस नाते उन्हें अपने चुनाव क्षेत्र में परिचय की आश्वयकता नही है। इसी तरह हमीरपुर से अनुराग ठाकुर की स्थिति है वह चैथी बार सांसद बनने जा रहे हैं। क्रिकेट में जितना काम उन्होने पूरे प्रदेश में किया है उसकी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग ही पहचान है। फिर धूमल की विरासत उनकी एक बहुत बड़ी धरोहर है। इस नाते अनुराग ठाकुर सबसे सशक्त उम्मीदवार माने जा रहे हैं।
लेकिन इस सबके बावजूद आज यह दावे से नही कहा जा सकता कि भाजपा को चारों सीटों पर सफलता मिल ही जायेगी। क्योंकि यह जग जाहिर है कि कांगड़ा से शान्ता कुमार का टिकट अन्तिम क्षणों में काटा गया। मुख्यमन्त्री जयराम की मुलाकात के बाद वह यह ब्यान देने पर राज़ी हुए कि वह चुनाव नही लड़ना चाहते। सब जानते है कि वह पूरी तरह से चुनावी काम में जुट गये थे कार्यकर्ताओं/पन्ना प्रमुखों की बैठके ले रहे थे। बल्कि जब उनकी इस सक्रियता पर यह सवाल आया कि इस बार किसी गद्दी नेता को टिकट दिया जाना चाहिये तब उनकी तुरन्त यह प्रतिक्रिया आयी कि यह कोई गद्दी युनियन का चुनाव नही हो रहा है। हांलाकि इस प्रतिक्रिया के लिये उन्हे गद्दी समुदाय को स्पष्टीकरण तक देना पड़ा। इस परिदृश्य में जब उनका टिकट कटा तब कुछ हल्कों में तो यहां तक चर्चा उठ गयी कि शान्ता कुमार को चुनावी राजनीति से जिस चुतराई के साथ जयराम ने बाहर कर दिया ऐसा तो धूमल भी नही कर पाये थे। अब जब उनके स्थान पर किश्न कपूर आ गये हैं तब उनका यह कहना कि वह अब केवल विवेकानन्द ट्रस्ट का ही काम देखेंगे अपने में बहुत कुछ कह जाता है। फिर चुनाव प्रचार अभियान में यह खुलकर सामने आ जायेगा कि उनकी सक्रियता का स्तर क्या रहता है।
इसी तरह मण्डी संसदीय क्षेत्र में पंडित सुखराम अपने पौत्र आश्रय शर्मा के लिये इस हद तक जा पंहुचे है कि वह कांग्रेस में भी अपने पुराने रिश्तों के सहारे टिकट का जुगाड़ बिठा रहे थे। कांग्रेस नेताओं के साथ उनकी मुलाकातें जग जाहिर हो चुकी हैं। पौत्र आश्रय को बहुत अरसे से उन्होने प्रचार अभियान में उतार रखा था। अब जब भाजपा का टिकट अन्तिम रूप से घोषित हो चुका है तब पंडित सुखराम क्या इस स्थिति से समझौता करके चुपचाप भाजपा के प्रचार अभियान में जुट पायेंगे? क्योंकि यदि सुखराम आज आश्रय के लिये कांग्रेस टिकट का भी प्रबन्धन न कर पाये और न ही उसे निर्दलीय के रूप में चुनाव में उतार पाये तो इसका सीधा नुकसान मण्डी में उनकी चाणक्य होने की छवि को लगेगा। क्योंकि भाजपा में सुखराम परिवार की वरियता अन्त में ही रेहेगी और फिर वह आरएसएस के सदस्य भी नही हैं तथा यह बहुत अच्छी तरह जानते है कि भाजपा में गैर आरएसएस होने का अर्थ क्या होता है। सुखराम और अनिल शर्मा को इसका अहसास तो मेहश्वर सिंह की स्थिति से भी हो जाना चाहिये। जो मेहश्वर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद तक रह चुके हैं। अपनी पार्टी का भाजपा में विलय तक कर चुके हैं। वह आज कहां खड़े हैं। इसको ध्यान में रखने से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है इस परिदृश्य में सुखराम परिवार का अगला कदम परोक्ष/अपरोक्ष में क्या होता है। इसका प्रभाव मण्डी क्षेत्र पर पड़ेगा ही यह तय है। इसी तरह की स्थिति संयोगवश हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में भी सुरेश चन्देल की सक्रियता से बढ़ गयी है। सुरेश चन्देल कांग्रेस में जाने का प्रयास कर रहे थे यह सामने आ चुका है। उन्हे रोकने के लिये खुद मुख्यमन्त्री जयराम और पार्टी अध्यक्ष सत्ती को मोर्चा संभालना पड़ा है। इस प्रक्रिया में चन्देल उनको मिले आश्वासनों पर कितना भरोसा कर पाते हैं या फिर कांग्रेस में जाने की जुगत बिठा ही लेते हैं इसका पता तो आने वाले दिनों में लगेगा। लेकिन इसी के साथ यह भी जाहिर है कि बिलासपुर के ही वरिष्ठ नेता रिखी राम कौण्डल भी कोई बहुत ज्यादा सन्तुष्ट नही चल रहे हैं। उनका टिकट काट कर जीत राम कटवाल को लाया गया था और इसके लिये वह धूमल परिवार को जिम्मेदार ठहराते हैं। फिर जंजैहली प्रकरण पर धूमल और जयराम के रिश्तों में भी काफी कड़वाहट आ गयी थी यह भी जग जाहिर है।
इस परिदृश्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा के यह भीतरी समीकरण आने वाले दिनों में क्या शक्ल लेते हैं और प्रचार अभियान में कौन कितना सक्रिय भूमिका में रहता है। यह स्पष्ट है कि इस चुनाव में जयराम सरकार की परफारमैन्स पर ही सब कुछ केन्द्रित रहेगा। कांग्रेस इस सरकार के खिलाफ कितनी आक्रामक हो पाती है और कौन से मुद्दों पर सरकार को घेर पाती है। इसी सबसे चुनाव का रूख तय होगा। इस समय दोनों दल एक बराबर धरातल पर खड़े हैं। लेकिन इसमें जयराम की अपनी साख दाव पर रहेगी यह भी स्पष्ट है।

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