शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार का कर्जभार 52000 करोड़ तक पहुंच गया है। इस बढ़ते कर्जभार पर अब आम आदमी भी चिन्ता व्यक्त करने लग गया है। क्योंकि जब सरकार को कर्ज उठाने की नौबत आ जाती है तब उसका असर हर चीज पर पड़ता है यह एक स्थापित सच है। फिर अगर कर्ज लेकर कोई स्थायी संपत्ति बनायी जाये और उससे भविष्य में आत्म निर्भर होने का साधन बने तब यह कर्ज चिन्ता का विषय नही होता है। यदि कर्ज से स्थायी आय के स्त्रोत न बने तो यह कर्ज गंभीर चिन्ता और चिन्तन का विषय बन जाता है। 31 मार्च को समाप्त होने जा रहे वित्त वर्ष 2018-1़9 का सरकार का कुल खर्च अनुपूरक मांगो को डालकर 44000 करोड़ से थोड़ा अधिक है। इस खर्च के मुकाबले इस वर्ष की सरकार की कुल आय 30,000 हजार करोड़ से कुछ अधिक है। इस तरह सरकार के आय और व्यय में 14000 करोड़ का अन्तर है। स्वभाविक है कि इस खर्च को पूरा करने के लिये सरकार के पास कर्ज लेने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। लेकिन सरकार बनने के बाद जिस तरह का खर्च यह सरकार करती आ रही है उसको लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते आ रहे हैं। जिनमें कर्ज लेकर आरामदेह मंहगी गाड़ियां खरीदे जाने का मुद्दा प्रमुखता से उठता रहा है। कर्ज लेने के बावजूद सरकार बेरोजगारों को स्थायी नौकरीयां नही दे पा रही है। नौकरीयों में अभी भी आऊट सोर्स, आर के एस और पीटीए जैसी योजनाएं चलानी पड़ रही है। क्योंकि इनमें नियमित नौकरी पर मिलने वाले वेतन के आधे से भी कम वेतन देकर काम चलाया जा रहा है।
ऐसे में यदि यह सवाल उठाया जाये कि इतना कर्ज लेकर सरकार ने आय के कौन से स्थायी साधन खड़े किये हैं तो शायद इसका कोई बड़ा प्रमाणिक जवाब सरकार के पास नही है। सरकार को टैक्स के रूप में जो कुल आय हो रही है उसकी स्थिति यह है

कर आय के बाद सरकार को गैर करों से भी आय होती है। उसकी स्थिति इस प्रकार है।

इस तरह टैक्स और नाॅन टैक्स दोनों का आंकलन करने से स्पष्ट हो जाता है कि सरकार आय के स्थायी साधन बढ़ाने में कोई बड़ा काम नही कर पायी है। एक समय सरकार ने पनवि़द्युत परियोजनाओं को यह माना था कि आने वाले समय में अकेले विद्युत से ही ही प्रदेश आत्मनिर्भर हो जायेगा लेकिन सरकार का रिकार्ड दिखाता है कि विद्युत क्षेत्र से हर वर्ष टैक्स और गैर टैक्स राजस्व में कमी आती जा रही है। प्रदेश सरकार की अपनी ही परियोजनाओं में हर वर्ष हजारों घण्टों शटडाऊन हो रहा है। सरकार और विजिलैन्स तक इसकी शिकयतें गयी हुई हैं लेकिन इसकी जांच करने के लिये कोई तैयार नही है। जबकि इस शटडाऊन से हर दिन करोड़ो के राजस्व का नुकसान हो रहा है।
दूसरी ओर सरकार का वित्तीय प्रबन्धन सरकार की नीयत और नीति पर भी बहुत गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। संविधान की धारा 204(3) के तहत राज्य की समेकित निधि से अधिक एक पैसा भी खर्च नही किया सकता है। यदि किन्ही अपरिहार्य कारणों से सरकार को इस निधि से अधिक खर्च करना पड़ जाये तो ऐसे खर्च को संविधान की धारा 205 के तहत एकदम सदन से अनुमोदित करवाना पड़ता है। कैग की 31 मार्च 2017 तक की रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 से लेकर 2015-16 तक हुए ऐसे खर्च को सितम्बर 2017 तक भी अनुमोदित नहीं करवाया गया था। कैग की रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाता है कि इस संद्धर्भ में सरकार संविधान की भी अनुपालना नहीं कर रही है। सरकार का कर्ज जीडीपी के अनुपात में तय सीमा से बढ़ता जा रहा है इसके लिये भारत सरकार का वित्त विभाग 2016-17 में प्रदेश सरकार को चेतावनी पत्र तक जारी कर चुका है। इस पत्र को शैल अपने पाठकों के सामने पहले ही रख चुका है। इस अधिक खर्च को लेकर कैग की टिप्पणी भी पाठकों के सामने रखी जा रही है।
As per Article 204 (3) of the Constitution of India, no money shall be withdrwwn from Consolidated fund of the State except under appropriation made by law passed in accordance with the provisions of this article.
Not withstanding the above excess expenditure over budget provision increased by Rs.189.18 crore ( 6.64 percent) from Rs. 2.848.43 crore in 2015-16 to Rs.3,037.61 crore ( includes Rs.2,890.50 crore relating to UDAY scheme) in 2016-17 indicating that budgetary estimates were not reviewed properly. Details of various grants / appropriations where aggregate expenditure (Rs. 10,803.41 crore) exceeded by Rs. 3,037.22 crore from the approved provisions in four cases (Rs. one crore or more in each case ) are given in Appendix 2.1
Firm measures need to be insitutied against the defaulting departments to avoid excess expenditure. There is no cogent reason for the inevitability of excess expenditure when Government gets opportunities to present the supplementary Demands for Grants during the three sessions of Legislature in a year. The exceeding of Budgetary Grant is the result of bad planning, lack of foresight and ineffective monitoring on the part of budget estimates as well as supplementary Demands for Grants.
2.3.1.1 Excess over provisions requiring regularization -As per Article 205 of the Constitution of India it is mandatory for a state Government to get the excess over a grant/appropriation regularised by the State Legislature. Although no time limit for rgularisation of excess expenditure is done after the prescribed under the Article , the regularization of excess expenditure is done after the completion of discussions on the Appropriation Accounts by the public Accounts Committee (PAC) However, the excess expenditure amounting to Rs.6,364.57 crore (Appendix 2.2) for the years 2011-12 to 2015-16 was yet to be regularized as of September 2017. The excess expenditure of Rs. 3,037.61 crore (Appendix 2.3) incurred in five grants and three appropriations during the years 2016-17 also requires regularisation.
कैग की इन टिप्पणीयों से सरकार के बजट प्रबन्धन पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं यह स्पष्ट हो जाता है। सरकार हर माह कर्ज ले रही है लेकिन यह कर्ज खर्च कहां किया जा रहा है इसकी जानकारी प्रदेश की जनता को नहीं दी जा रही है। यदि प्रदेश की वित्तीय स्थिति पिछली सरकारों के कार्यों और नीतियों के कारण बिगड़ी है तो उसके लिये यह सरकार इस संबंध में एक श्वेतपत्र जारी करके प्रदेश की जनता को विश्वास में ले सकती थी। लेकिन सरकार ने ऐसा नही किया है जिसका सीधा सा अर्थ है कि वर्तमान स्थितियों के लिये यही सरकार जिम्मेदार है। ऐसे में इस लगातार लिये जा रहे कर्ज से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि कहीं सरकार विकास के नाम पर अपने ही राजनीतिक दल के ऐजैंड़ा को पूरा करने के लिये प्रदेश पर यह कर्ज का भार तो नहीं बढ़ा रही है। यह आशंका इसलिये उभरती है कि जब इस कर्ज की स्थिति को लेकर चिन्ता जताते हुए एक जनहित याचिका प्रदेश उच्च न्यायालय में आयी तब इस याचिका पर सरकार का यह कहना कि आम आदमी को यह जानने का हक नही है कि सरकार कहां और कैसे खर्च कर रही है। आज चुनाव के परिदृश्य में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि न्यायालय राजनीतिक दलों के वायदों का संज्ञान लेकर उनसे यह पूछे कि इन वायदों को पूरा करने के लिये संसाधन कहां से आयेंगे? क्या इनके लिये कर्ज लिया जायेगा? आज यह समय की मांग है कि वायदों के प्रालोभनों से जनता को बचाया जाये और यह अब न्यायापालिका के लिये ही संभव रह गया है। प्रदेश उच्च न्यायालय में इस संदर्भ जो याचिका आयी है उस पर आगे जून में सुनवाई होगी। इसलिये यह उम्मीद की जा रही है कि उच्च न्यायालय जनहित में प्रदेश की इस आर्थिक स्थिति का समुचित संज्ञान लेते हुए प्रदेश को कर्ज के चक्रव्यूह में फंसने से बचाने के लिये सरकार को कुछ ठोस निर्देश देगा।
शिमला/शैल। प्रदेश में जनवरी 2018 तक पिछले तीन वर्षों में कितने कर्मचारियों/अधिकारियों को सेवा विस्तार दिया गया है यह सवाल इस बार बजट में 18 फरवरी को रमेश धवाला ने पूछा था। इसके जवाब में सरकार ने कहा है कि सूचना एकत्रित की जा रही है। यह सवाल वीरभद्र सरकार के कार्यकाल को लेकर था और इस सरकार पर भाजपा का यह आरोप रहता था कि इसे रिटायर्ड और टायर्ड लोग चला रहे हैं। लेकिन आज यह सूचना सरकार के पास उपलब्ध न होने से यही उभरता है कि या तो भाजपा का यह आरोप ही गलत था या फिर यह सरकार भी उसी नक्शे कदम पर चल रही है। इसी तरह मोहन लाल ब्राक्टा, मुकेश अग्निहोत्री और विक्रमादित्य सिंह का सवाल आऊट सोर्स कर्मचारियों को लेकर था। सरकार से पूछा गया था कि सरकारी विभागों/उपक्रमों में कितने कर्मचारी आऊट सोर्स पर काम कर रहे हैं। इन पर कितना खर्च हो रहा है कौन सी कंपनीयों के माध्यम से इन्हें रखा गया है। इन्हें पक्का करने की कोई नीति है या नहीं। सरकार ने एक वर्ष में आऊट सोर्स पर कितने कर्मचारी रखे हैं इस सवाल के जवाब में भी सरकार ने यह कहा कि सूचना एकत्रित की जा रही है। स्मरणीय है कि वीरभद्र सरकार के कार्यकाल में आऊट सोर्स कर्मचारियों ने आन्दोलन तक किया था उनकी मांग थी कि उन्हें पक्का करने की योजना बनायी जाये। 35000 कर्मचारी आऊट सोर्स पर रखे होने का आंकड़ा आया था। जयराम सरकार ने इन कर्मचारियों को हटाया नही हैं बल्कि बिजली बोर्ड में जो नया ठेका दिया जा रहा था उसमें फिर से टैंडर बुलाने का फैसला लिया गया है। जब तक नये टैण्डर पर फैसला नही हो जाता है तब तक पुरानी ही कंपनी को विस्तार दिया गया है।
स्वास्थ्य विभाग में अब नर्सों की भर्ती भी आऊट सोर्स के माध्यम से की जा रही है। इससे पहले स्वास्थ्य विभाग में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में 1061 स्टेट एडस कन्ट्रोल सोसायटी में 173, आर के एस में 94, और ईएसआई सोसायटी में 6 लोगों को रखा गया है। स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत इन सोसायटीयों के माध्यम से काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित करने का नियमों में कोई प्रावधान नही है। सोसायटीयों के माध्यम से रखे गये कर्मचारियों को कभी भी नियमित नहीं किया जा सकेगा। कल को यह लोग भी सरकार के खिलाफ आन्दोलन करने वालों में शामिल हो जायेंगे यह तय है।
इसी तरह शिक्षा विभाग की स्थिति तो और भी दयनीय है। इस समय प्रदेश स्कूल प्रबन्धन कमेटीयों के माध्यम से 2700 अध्यापक काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त पैट, पीटीए, पीटीए-जी आईए और गवर्नमैन्ट कान्ट्रैक्ट पर सहायक प्रोफैसर 819, पीजीटी 2121, टीजीटी 2941 डीपीई 190, सी एण्ड वी 3757 और जेबीटी 1207 काम कर रहे हैं। लेकिन इन 11035 लोगों का भविष्य क्या होगा? क्या यह नियमित हो पायेंगे? इसको लेकर सन्देह बना हुआ है। इस संद्धर्भ में सर्वोच्च न्यायालय में 2017 में तीन याचिकाएं दायर हुई थी जो अब तक लंबित चल रही है। इन 11035 लोगों के अतिरिक्त प्रदेश में 27000 लोग एसएमसी के माध्यम से काम कर रहे हैं। इस तरह करीब 14000 लोगों का भविष्य अकेले शिक्षा विभाग में ही अनिश्चिता में चल रहा है। क्योंकि इन्हें नियमित करने का नियुक्ति एवम् पदोन्नत्ति नियमों में कोई प्रावधान है ही नहीं। और न ही राज्य सरकार यह प्रावधन करने में सक्षम है।
इस परिदृश्य में यह सवाल पैदा होता है कि जब इन्हें अध्यापकों की स्कूलों में आवश्यकता है तो फिर इन्हें नियमित प्रक्रिया के तहत ही क्यों नही भरा जा रहा है। क्या इस तरह से भर्ती करने में मैरिट और आरक्षण आदि के रोस्टर को नजरअन्दाज करने में आसानी होती है। इसलिये ऐसी प्रक्रिया का सहारा लिया जा रहा है। प्रदेश में पीटीए के तहत शिक्षकों की भर्ती करने की योजना 2006 में बनाई गयी थी। इस योजना के तहत पी टीए को ग्रान्ट-इन-ऐड का प्रावधान किया गया था। 29-9-2006 को अधिसूचित हुई इस योजना के तहत हुई भर्तीयांे पर 28 जनवरी 2008 को एक जांच बिठाई गयी थी। इस पर 7-3-2008 को 16 पन्नों की एक जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी गयी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रान्ट- इन-ऐड नियमों में इन बिन्दुओं पर कुछ नहीं कहा गया है।
1. The GIA Rules specify the maximum amount of grant-in-aid admissible for each post filled but do not lay down any specific emoluments to be paid to the appointees.
2. Period of employment : GIA Rules are silent on the subject. It may please be clarified if there are any other instructions in this regard. The actual process followed by PTAs in this matter may be elucidated.
3. Terms and conditions of employment by PTA: GIA Rules are silent on the subject.
4. Selection process: GIA Rules are silent on the process to be followed by PTAs.
5. Administrative and financial arrangements by PTAs for the scheme: GiA Rules are silent on the subject.
6. There is nothing in the GiA Rules about the leave admissible to the PTA appointees.
GiA Rules are silent on the social security of the PTA appointees. There is nothing about PF contributions and /or insurance for them.
There is nothing on evaluation and appraisal of the work and conduct of the PTA appointees except that the PTA appointees will work under overall supervision of the head of the institution. The GiA Rules are silent on the role of PTAs after the selection.
There is no right to appeal in the GiA Rules and there is no mechanism to addresss the grievances of PTA appointees.
7. PTAs accountability and procedural requirements: The GiA Rules are silent on the role, responsibility, accountability of the PTAs in relation to the teachers appointed by them.
इस जांच रिपोर्ट में आये इन बिन्दुओं पर आज तक वैसी ही स्थिति बनी हुई है। जबकि इसके तहत आज भी स्कूलों में शिक्षक भर्ती किये जा रहे हैं। इन्ही बिन्दुओं पर 2017 में सर्वोच्च न्यायालय में तीन याचिकाएं दायर हुई हैं। इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब पीटीए के नियम इन बिन्दुओं पर खामोश हैं और 2006 से लेकर आज तक सरकार इसमें कोई संशोधन भी नही कर पायी है तो क्या जानबूझकर सरकार हजारों लोगों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है। आऊट सोर्स के माध्यम से रखे गये लोगों को नियमित करने का प्रावधान नही है। पीटीए और आर के एस आदि के तहत रखे कर्मचारी नियमित नही किये जा सकते तो फिर क्या यह योजनाएं लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने के लिये है।
शिमला/शैल। प्रदेश की लोकसभा सीटों के लिये भाजपा के प्रत्याशी कौन होंगे अभी इसका फैसला नही हो पाया है। लेकिन इस फैसले से पहले ही मुख्यमन्त्री के अपने जिले से ही पंडित सुखराम के पौत्र और ऊर्जा मन्त्री अनिल शर्मा के बेटे आश्रय शर्मा ने मण्डी संसदीय हल्के से अपना चुनाव प्रचार अभियान भी शुरू कर दिया है। आश्रय काफी अरसे से यह दावा करते आ रहे हैं कि वही यहां से भाजपा के उम्मीदवार होंगे। जब एक सम्मेलन में प्रदेश अध्यक्ष सत्तपाल सत्ती ने यह घोषणा की थी कि मण्डी से राम स्वरूप शर्मा ही फिर से पार्टी के उम्मीदवार होंगे तब इस घोषणा पर पंडित सुखराम ने कड़ी प्रतिक्रिया जारी की थी। सुखराम की प्रतिक्रिया के बाद सत्ती ने भी अपना ब्यान बदल लिया था। लेकिन अभी तक टिकटों का फैसला हुआ नही है। ऐसे में आश्रय शर्मा के प्रचार अभियान के राजनीतिक हल्कों में कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। क्योंकि यह संभव नही हो सकता कि उसके अभियान को बाप और दादा का आशीर्वाद हासिल न हो। पंडित सुखराम का प्रदेश की राजनीति में अपना एक अलग से विषेश स्थान है।
इसलिये यह एक बड़ा सवाल हो जाता है कि यदि आश्रय को टिकट नही मिलता है तो सुखराम और अनिल का अगला कदम क्या होता है। क्योंकि पिछले दिनों यह चर्चा जोरों पर हरी है कि पंडित सुखराम कांग्रेस में वापिस जा सकते हैं। अनिल शर्मा जयराम के साथ मंत्राी होने के बावजूद भी मण्डी में अपने को बहुत सुखद महसूस नही कर रहे हैं। यह चर्चा भी कई बार मुखर हो चुकी है। फिर जयराम मण्डी का नाम बदल कर माण्डव करने की बात भी कर चुके हैं और इस नाम को बदलने का प्रस्ताव पर सुखराम और अनिल शर्मा की कतई सहमति नही है। नाम बदलने का यह प्रस्ताव भाजपा /जयराम से राजनीतिक रिश्ते अलग करने का एक आसान और तात्कालिक कारण बन सकता है।
इसी तरह हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से भी सिनेतारिका कंगना रणौत का नाम अचानक राजनीतिक हल्कों में चर्चा का विषय बन गया है। इस समय हमीरपुर ससंदीय क्षेत्र से अनुराग ठाकुर सांसद हैं। अनुराग को प्रदेश का भविष्य का नेता भी माना जा रहा है और उन्होंने अपने काम से क्रिकेट और भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी है। लेकिन अनुराग के इस बढ़ते कद से पार्टी के भीतर ही एक बड़ा वर्ग उनका अघोषित विरोधी बना हुआ है। बल्कि चर्चा तो यहां तक है कि इसी वर्ग की धूमल को हटवाने में बड़ी भूमिका रही है। इसी के चलते तो जयराम की सरकार बनने के बाद उठे जंजैहली प्रकरण में धमूल -जयराम के रिश्ते यहां तक पंहुच गये थे कि कुछ हल्कों में जंजैहली प्रकरण में धूमल की भूमिका होने के चर्चे चल पड़े थे। धमूल को इस चर्चा के कारण यहां तक कहना पड़ गया था कि सरकार चाहे तो उनकी भूमिका की सीआईडी से जांच करवा ले। अब इसी परिदृश्य को सामने रखकर कुछ लोगों ने कंगाना रणौत का नाम उछालकर एक नयी विसात बिच्छाई है।
यही नही मण्डी संसदीय क्षेत्र से कुल्लु से पूर्व मंत्री और सांसद रहे महेश्वर सिहं को लेकर भी यह चर्चाएं चल रही हैं कि वह भाजपा का दामन छोड़कर कभी भी कांग्रेस का हाथ थाम सकते हैं। महेश्वर सिंह कुल्लु से विधानसभा का चुनाव हारने के बाद मण्डी से इस बार लोकसभा का उम्मीदवार होने की आसा में थे। लेकिन यहां से जब मुख्यमन्त्री की पत्नी डा. साधना ठाकुर का नाम भी संभावित उम्मीदवार के रूप में अखबारों की खबरों तक पहुंच गया तब मण्डी का सारा राजनीतिक गणित ही बदल गया है। यह एक सार्वजनिक सच है कि यदि विधानसभा चुनावों से पहले महेश्वर सिंह और पंडित सुखराम परिवार ने राजनीतिक पासा बदल न की होती तो शायद भाजपा अकेले सत्ता तक न पंहुच पाती। लेकिन आज यह दोनों अपने को भाजपा में हशिये पर धकेल दिया महसूस कर रहे हैं। ऐसे में बहुत संभव है कि राजनीति में अपने को फिर स्थापित करने के लिये पासा बदल की राजनीति का सहारा ले लें। यही स्थिति हमीरपुर से भाजपा पूर्व सांसद रहे सुरेश चन्देल की रही है। पार्टी ने उन्हे "Cash for Question" में चुनावी राजनीति से बाहर कर दिया। लेकिन "Cash on camera" में आरोप तय होने के बावजूद शिमला के सांसद वीरन्द्र कश्यप को लेकर पार्टी का आचरण सुरेश चन्देल से भिन्न है। एक ही जैसे आरोप पर दो अलग-अलग नेताओं के साथ अलग -अलग आचरण होने से पार्टी की अपनी ही नीयत और नीति पर सवाल उठने स्वभाविक है। ऐसे में इस संभावना से इन्कार नही किया जा सकता कि अब सुरेश चन्देल भी पार्टी को अपनी अहमियत का अहसास कराने के लिये कोई पासा बदल के खेल पर अलम कर जायें। क्योंकि यह कतई नही माना जा सकता कि आश्रय शर्मा के प्रचार अभियान के पीछे कोई बड़ी रणनीति नही है। इस परिदृश्य में यदि आने वाले लोकसभा चुनाव का एक पूर्व आकलन किया जाये तो यह स्पष्ट झलकता है कि भाजपा के अन्दर बढ़े स्तर पर एक बड़ी खेमेबाजी चल रही है क्योंकि अभी सम्पन्न हुए बजट सत्र में जिस तरह से भाजपा के कुछ अपने ही विधायकों की अपनी ही सरकार के प्रति आक्रमकता देखने को मिली है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी के अन्दर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। सरकार वित्तिय संकट में चल रही है इसका खुलासा उस वक्त सार्वजनिक रूप से सामने आ गया जब प्रधानमन्त्री की योजना के नाम पर किसानों को दिये गये दो-दो हज़ार रूपये बैकों ने किसानों को भुगतान करने से मना कर दिया। ऐसा बैकों ने क्यों कर दिया इसका कोई संतोषजनक जवाब भी सामने नहीं आया है। इस आशय की खबरें तक छप गयी लेकिन सरकार की तरफ से इनका किसी तरह का कोई खण्डन सामने नहीं आया इसी के साथ यह चर्चा भी सामने आयी है कि इस बार सेवानिवृत कर्मचारियों को पैंशन का भुगतान भी समय पर नहीं हो पाया है। जहां सरकार की एक ओर इस तरह की वित्तिय स्थिति हो वहीं पर सरकार द्वारा बड़ी लगर्ज़ी गाड़ियां खरीदा जाना सरकार की नियत और नीति पर सवाल उठेगा ही।
अभी इसी के साथ सरकार द्वारा कर्मचारी भर्तीयों को लेकर अपनायी जा रही आउटसोर्स नीति पर भी गंभीर सवाल बजट सत्र में देखने को मिले हैं। यह सही है कि सरकार ने हर गंभीर सवाल को ‘‘सूचना एकत्रित की जा रही है’’ कहकर टालने का प्रयास किया है लेकिन यह माना जा रहा है कि यह सारे सवाल चुनावों के वक्त सरकार से जवाब मांगेंगे और यही सरकार के लिये सबसे बड़ा संकट होगा।
शिमला/शैल। राजधानी के उप नगर न्यू शिमला मे मुख्य सड़क के किनारे बने दुर्गा मन्दिर को लेकर नगर निगम शिमला के कलैक्टर कोर्ट से आये फैसले के अनुसार यह पूरा मन्दिर सरकार/नगर निगम की जमीन पर बना है। इस जमीन पर मन्दिर बनाने के लिये सरकार/नगर निगम से यह जमीन नही ली गयी है। इस तरह जब मन्दिर निर्माता किसी भी तरह से इस जमीन के मालिक ही नही है तो स्वभाविक है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके अवैध रूप से इस मन्दिर का निर्माण हुआ है। मन्दिर निर्माण के लिये कोई नक्शा आदि भी निगम से स्वीकृत नही करवाया गया है। नगर निगम की जमीन के खसरा न. 3244/22 में 29.88 वर्ग मीटर और खसरा न. 3251/ में 21.63 वर्ग मीटर भूमि पर मन्दिर का निर्माण हुआ है। इस जमीन की निशानदेही 3-2-2010 को सम्बन्धित नायब तहसीलदार कानूनगो और हल्का पटवारी की देखरेख में हो गयी थी। निशानदेही के वक्त मन्दिर का निर्माण करवाने वाले भी मौके पर मौजूद रहे हैं। इस निशानदेही में यह स्पष्ट रूप से आ गया था कि यह जमीन सरकार/नगर निगम की है। इसी कारण से मन्दिर निर्माताओं ने इस निशानदेही को कोई चुनौती नही दी और यह स्वीकार कर लिया कि यह निर्माण अवैध रूप से सरकारी जमीन पर हो रहा है।
3.2.2010 को निशानदेही हो जाने के बाद नगर निगम ने कलैक्टर की कोर्ट में 2-11-2010 इस संबंध में मामला दायर कर दिया। इस मामले में दीपक रोहाल और अश्वनी ठाकुर को प्रतिवादी बनाया गया। 18-11-2010 को प्रतिवादियों को इस बारे में नोटिस भेजे गये। लेकिन नोटिस के बाद प्रतिवादी इसमें कोई जवाब दायर नही कर पाये। जवाब के लिये सात बार मौका दिया गया लेकिन कोई जवाब नही आया। इसी बीच प्रदेश उच्च न्यायालय में आयी एक जनहित याचिका CWP12 No. 08/2018 में उच्च न्यायालय ने कलैक्टर नगर निगम को ऐसे 36 मामलों को तुरन्त निपटाने के आदेश दिये। यह मामले दो माह में निपटाये जाने थे। उच्च न्यायालय के इन निर्देशों के बाद इस मामले में कारवाई आगे बढ़ी और अन्ततः 13-6-2018 को कलैक्टर नगर निगम ने प्रतिवादियों के खिलाफ फैसला सुना दिया। फैसले में इस निर्माण को गैर कानूनी/अवैध कारार देकर इसे गिराने और इस जमीन को नगर निगम को सौंपने के आदेश किये हैं। इन आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित करने के लिये नगर के अधीक्षक एस्टेट, लीज़ निरीक्षक और इन्सपैक्टर तहबाज़ारी की जिम्मेदारी लगाई गयी है।
निगम के कलैक्टर कोर्ट से यह फैसला आये आठ माह का समय हो गया है। कलैक्टर के फैसले पर किसी ऊपरी अदालत का कोई स्टे नहीं है। लेकिन इसके बावजूद इस फैसले पर अब तक अमल नहीं हो पाया है। जब यह मामला 2010 में निशानदेही के बाद कलैक्टर के कोर्ट में दायर हुआ था तब इस मन्दिर का निर्माण चल रहा था और आज तक इसमें कुछ न कुछ काम चला ही रहता है। निशानदेही में ही स्पष्ट हो गया था कि यह जमीन सरकार/नगर निगम की है। इसमें नगर निगम प्रशासन इस निर्माण को कभी भी बलपूर्वक बन्द करवा सकता था जैसा कि अन्य मामलों में अक्सर होता है। लेकिन इस मामले में आज तक ऐसा कुछ भी नही हुआ है। अब भी जून 2018 में आये फैसले पर आजतक अमल न हो पाने से यही सन्देश उभर रहा है कि आस्था कानून पर भारी पड़ती जा रही है।


शिमला/शैल। 20 फरवरी को किन्नौर के पूह से आगे चीन सीमा पर सेना के पांच जवान हिमखण्ड के नीचे दब गये थे। इन जवानों को निकालने के लिये चलाये जा रहे राहत कार्य का जायज़ा लेने के लिये सरकार की ओर से मुख्यमन्त्री या उनका कोई भी मन्त्री मौके पर नही जा पाया है। इन जवानों में एक सोलन के नालागढ़ का भी है। जब इसके दबे होने की खबर परिवार तक पहुंची तब से परिवार का बुरा हाल है लेकिन परिवार की सुध लेने कोई नही पहुंचा। प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की संवेदनहीनता को हिलाने के लिये इस जवान के ही गांव के एक युवक ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है। इनका एक वीडियो वायरल हुआ है इसमें रायफलमैन राजेश की मां की गुहार है।
वीडियो में ऋषि की मां मायादेवी कह रही है कि उसके बच्चे को फटाफट निकाला जाए। वह कह रही है कि इतनी ढील क्यों पाई गई है। उनके साथ कोई नहीं है। वीडियो में एक युवक कह रहा है कि गांव में कोई मीडिया वाला भी नहीं आ रहा है। हम आने जाने का खर्च देने को तैयार है। ये युवक सवाल भी उठा रहा है कि क्या मीडिया वाले तभी आते है जब कोई अमीर का बच्चा ऐसे बर्फ में दबा हो। ये युवक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से गुहार लगा रहा है कि ऋषि को तुरंत निकाला जाए।
ऋषि के चचेरे भाई धर्मवीर ने कहा कि वह वीडियो उन्होंने ही बनाया है। उनकी कोई सुन ही नहीं रहा है। ऋषि की शादी अभी हाल ही में दिसंबर में हुई थी। उन्होंने कहा कि वीडियो में गांव की महिलाएं है व जो युवक कुछ कह रहा है वह भी गांव का ही है। धर्मवीर ने कहा कि ट्टषि परिवार का एक ही कमाने वाला सदस्य है। दूसरा भाई मानसिक तौर पर कमजोर है। पूरा परिवार सदमे में है।
ऋषि की यूनिट से संपर्क कर रहे ऋषि के ताया रणदीप सिंह ने कहा कि सेना की ओर से उनसे लगातार बातचीत की जा रही है। सचिवालय की ओर से कोई मिलने नहीं आया है न ही किसी मंत्री का फोन आया है। उन्होंने कहा कि बीते रोज उन्होंने एसडीएम नालागढ़ को फोन किया था कि हमारा बच्चा आठ दिन से गायब है। प्रशासन की ओर से कोई नहीं आया। ऐसे में अब एसडीएम नालागढ़ घर आए थे। इससे पहले पूर्व भाजपा के पूर्व विधायक के एल मेहता व कांग्रेस विधायक लखविंदर राणा भी एक दिन घर आए थे।
उन्होंने कहा कि ऋषि के पिता चल फिर नहीं सकते। मां को पोलियो था जबकि उसका भाई इतना तेज नहीं है कि किसी स्तर पर बातचीत कर सके। उन्होंने कहा कि वह शादी के बाद 28 जनवरी को ही डयूटी पर वापस लौटा था। अब घर में सबका बुरा हाल है।
बचाव व राहत टीम को मिला मोबाईल- राहत व वचाव कार्य के बीते रोज आठवें दिन राहत व बचाव दल को मौके पर से एक मोबाईल मिला है। यह भी खोजी कुतों की मदद से मिला। इसके अलावा एक गैंती और टोपी मिली थी। आज जो मोबाईल मिला है वह बंद था जब उसे आन किया गया तो वह चल पड़ा। संभवतः वह यहां दबे रायफलमैन नीतिन राणा का है। लेकिन इस बावत कहीं से कोई पुष्टि नहीं हो रही है। एडीएम पूह शिव मोहन सिंह सैणी ने कहा कि उन्हें इतनी ही जानकारी है कि एक मोबाईल मिला है। उन्होंने कहा कि अब भी राहत व बचाव कार्य दिन भर चलता रहा। मौसम खराब था लेकिन बाद में मौसम साफ हो गया। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि संभवतः कल कुछ सफलता मिलने की संभावना है। उन्होंने कहा कि मौके पर 25 से 30 फुट ऊंची बर्फ है और नाला बेहद तंग है। इसके अलावा लगातार बर्फबारी पड़ रही है।
सेना के यह पांचो जवान भी चीन की सीमा पर देश के ही काम से सेना द्वारा भेजे गये थे। वहां पर उसी तरह अचानक हिम खंड हादसे के शिकर हो गये जिस तरह पुलवामा में सीआरपीएफ के जवान आतंकी हमले के शिकार हुए। पुलवामा में शिकार हुए सीआरपीएफ के जवानों के परिवारों को उनके संबधित राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार ने भरपूर सहायता दी है। पुलवामा में हिमाचल के कांगड़ा का तिलक राज भी शिकार हुआ है। जयराम सरकार ने तिलक राज की विधवा पत्नी को डीसी आफिस धर्मशाला में लिपिक की नौकरी दी है। इसके अलावा और भी कई लोगों ने परिवार को सहायता का आश्वासन दिया है। लेकिन रायफल मैन राजेश के परिवार को वैसी ही सहायता न तो केन्द्र सरकार और न ही प्रदेश सरकार की ओर से दी गयी है। आज पुलवामा में जो कुछ घटा है उनके फोटो चुनावी सभाओं में लगाये जाने के समाचार सामने हैं। अनचाहे ही यह एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है। लेकिन जब पुलवामा के साथ ही किन्नौर के हिमखण्ड में दबे सेना के ही पांच जवानों का हादसा सामने रखा जायेगा तो क्या उसमें अपने आप ही राजनीतिक आचरण पर सवाल नही उठेंगे। क्या यह नही पूछा जायेगा कि इनकी अहमियत कम क्यों?