Friday, 16 January 2026
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बिन्दल को हुए नोटिस से जयराम सरकार आयी सवालों में

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष डा. राजीव बिन्दल के खिलाफ डेढ़ दशक से चल रहे आपराधिक एवम् भ्रष्टाचार मामले को पिछले वर्ष उस समय वापिस ले लिया था जब यह मामला एक तरह से फैसले के कगार पर पंहुच चुका था। क्योंकि इसमें अभियोजन पक्ष की ओर से सारी गवाहीयां हो चुकी थी। केवल इसमें नामज़द अभियुक्तों के ही धारा 313 के तहत ब्यान होने बाकी थे। इन ब्यानों के बाद बहस और फिर फैसले की स्टेज ही शेष बची थी। ऐसे में इस स्टेज पर आकर विजिलैन्स द्वारा सीआरपीसी की धारा 321 में आवेदन दायर करके मामलों को वापिस लेना सरकार और जांच ऐजैन्सी की नीयत तथा नीति पर गंभीर सवाल उठाता है। फिर जब आपराधिक मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय यह व्यवस्था दे चुका हो कि Every acquittal has to be viewed seriously शीर्ष अदालत की इस व्यवस्था के बाद हिमाचल उच्च न्यायालय भी जुलाई 2016 में कैप्टन राम सिंह के मामले में निचली अदालत द्वारा वहां आये धारा 321 के आवदेन को स्वीकार करने के फैसले को पलट चुका है।
यही नहीं 13 सितम्बर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस चन्द्र चूढ़ पर आधारित पीठ का एक फैसला आ गया था। इसमें धारा 321 पर विस्तार से चर्चा करने के बाद अदालत ने यह कहा कि We are compelled to recapitulate that there are frivolous litigations but that does not mean that there are no innocent sufferers who eagerly wait for justice to be done. That apart, certain criminal offences destroy the social fabric. Every citizen gets involved in a way to respond to it; and that is why the power is conferred on the Public Prosecutor and the real duty is cast on him/her. He/ she has to act with responsibility. He/she is not to be totally guided by the instructions of the Government but is required to assist the Court; and the Court is duty bound to see the precedents and pass appropriate orders.
In the case at hand, as the aforestated exercise has not been done, we are compelled to set aside the order passed by the High Court and that of the learned Chief Judicial Magistrate and remit the matter to the file of the Chief Judicial Magistrate to reconsider the application in accordance with law and we so direct.
The appeal is, accordingly, allowed. 
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के परिदृश्य में यह और फिर भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जयराम सरकार ने इस मामले को वापिस क्यों लिया। गृह और विजिलैन्स विभाग मुख्यमन्त्री जयराम के अपने पास हैं। फिर जयराम से लेकर मोदी तक भाजपा का सारा शीर्ष नेतृत्व भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता के दावे करता है।
अब इस मामले को पवन ठाकुर ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर बिन्दल समेत सभी अभियुक्तों और सरकार को नोटिस जारी कर दिये हैं वैसे तो आपराधिक मामलों में इस तरह की याचिका डालना केवल पीड़ित पक्ष का ही अधिकार होता है। इस मामले में प्रत्यक्षतः पीड़ित पक्ष सरकार ही है और उसकी ओर से कोई अपील दायर नही हुई है। ऐसे में तीसरे व्यक्ति की याचिका पर उच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी करना सर्वोच्च न्यायालय की समय समय पर आयी व्यवस्थाओं का ही परिणाम माना जा रहा है। प्रदेश उच्च न्यायालय में इस मामले में अन्तिम फैसला क्या आता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन इस मामले से जयराम सरकार की विश्वसनीयता के साथ ही विपक्ष की भूमिका भी सवालों में आ जाती है क्योंकि चुनावों के बीच आये उच्च न्यायालय के नोटिस पर विपक्ष की ओर से कोई प्रतिक्रिया नही आयी है। याद रहे कि 1999 में राजीव बिंदल सोलन नगर समिति के अध्यक्ष थे तो उस समय परिषद में हुई नियुक्तियों में उन्होंने कानूनों का उल्लंघन कर डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोगों को भर्ती कर दिया था।
1999 में प्रदेश में भाजपा-हिविंका गठबंधन की सरकार थी। बाद में 2000 में बिंदल सोलन हलके के हुए उप चुनाव में विधयक बन गए थे। इसके बाद 2003 में सता में आई वीरभद्र सिंह सरकार ने इन नियुक्तियों की जांच कराई व विजीलैंस ने 2006 में बिंदल व बाकियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 471 और 120 बी के अलावा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13(2)के तहत मामला दर्ज किया था। लेकिन तब अदालत में चालान पेश नहीं हो पाया। दिसंबर 2007 में प्रदेश में दोबारा से धूमल सरकार सत्ता में आ गई और यह मामला लटक गया। बाद में दिसंबर 2012 में सत्ता में आई वीरभद्र सिंह सरकार में जुलाई 2013 में बिदंल व बाकियों के खिलाफ मुकदमा चलाने को लेकर सरकार ने अभियोजन को मंजूरी दे दी। बिंदल के अलावा इस मामले में नगर समिति सोलन के तत्कालीन पार्षद हेमराज गोयल, डीके ठाकुर और समिति के कार्यकारी अधिकारी एससी कलसोत्रा मुख्य रूप से आरोपी बनाए गए थे। बाकी आरोपी जिन्हें नियुक्त किया गया था, वह थे। 
वीरभद्र सिंह सरकार में ट्रायल शुरू हुआ। प्रदेश में जब जयराम सरकार सत्ता में आई तो इस मामले की पैरवी कर रहे वीरभद्र सिंह के बेहद करीबी व पूर्व निदेशक अभियोजन सतीश ठाकुर को जयराम सरकार ने नहीं हटाया। सतीश ठाकुर ने ही जांच अधिकारी समेत मुख्य गवाहों की गवाहियां जयराम सरकार में ही करवाई। सरकार के एक साल सत्ता में आ जाने के बाद सतीश ठाकुर को हटाया गया।
लेकिन तब केवल सीआरपीसी की धारा 313 के तहत ब्यान होने ही बाकी बचे थे। इस बीच जयराम सरकार की ओर से अदालत में बिंदल के खिलाफ मामले को वापस लेने के लिए अर्जी दायर की गई लेकिन अदालत ने कहा कि केवल एक आरोपी के खिलाफ मामला वापस नहीं हो सकता।
ऐसे में सरकार ने सभी आरोपियों के खिलाफ मामले वापिस लेने की अर्जी दायर की व सेशन जज सोलन ने भूपेश शर्मा ने अभियोजन की अर्जी मंजूर कर ली। पवन ठाकुर की ओर से पैरवी कर रही वकील सुनीता शर्मा ने कहा कि चार सप्ताह के भीतर जवाब दायर करने के आदेश दिए गए हैं।
इस मामले के दोबारा उठने से बिंदल का मंत्री बनना मुश्किल में आ सकता है। बिंदल एक अरसे से जयराम सरकार में मंत्री पद हासिल करने की जुगत में है लेकिन वह अभी तक कामयाब नहीं हुए हैं।

2017 की शिकायत पर अब जांच के आदेश

शिमला/शैल। राज्य सूचना आयोग ने 11 अप्रैल को पारित अपने एक आदेश मे प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य को न्यूरोसर्जन डा. जनक के खिलाफ 2017 में आयी एक शिकायत पर वांच्छित कारवाई शीघ्र पूरी करने के निर्देश दिये हैं। इस कथित शिकायत पर क्या कारवाई हुई है इस बारे में आरटीआई एक्टिविस्ट डा. बन्टा ने स्वास्थ्य विभाग से जानकारी मांगी थी। स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह जानकारी न दिये जाने पर यह मामला राज्य सूचना आयोग में पहुंच गया था जहां पर यह आदेश हुए हैं।
After hearing both the parties in detail and perusing the case file, the Commission observes that the PIO has denied the information with regard to RTI application dated 08-08-2018 by invoking the provisions of section 11(1) of the RTI Act. In this regard, the commission feels that the PIO has not followed the prescribed time schedule as provided in the Act with regard to dealing 3rd party information as provided in the Act. Further, considering the submissions made by both the parties, the Commission is of the view that as the enquiry has not been culminated, the provisions of section 8(1) (h) would be applicable in this case and according , it is ordered that as and when the same is accomplished, the PIO still provide complete in formation to the appellant, strictly as per his RTI application, free of cost. Further, the Commission also feels that as considerable time has elapsed to take action on the complaint made during September 2017, the matter is brought to the notice of Principal Secy., Health Govt. of H.P Shimla for appropriate action. With these observations and directions, these two second appeals are disposed off by a single order. Inform the parties accordingly.
इन आदेशों में यह सामने आया है कि यह कथित शिकायत सितम्बर 2017 में वन मन्त्री ठाकुर सिंह भरमौरी और तत्कालीन मुख्यमन्त्री द्वारा की गयी थी। 2017 में प्रदेश विधानसभा के लिये चुनाव हुए थे जिनमे भरमौरी हार गये थे और सत्ता भाजपा के हाथ आ गयी थी। लेकिन जब सितम्बर 2017 में यह शिकायत हुई थी तब उस समय तो कोई चुनाव आचार सहिंता लागू नही थी फिर इस शिकायत के बाद करीब चार माह तक यह सरकार सत्ता में रही थी। ऐसे मे जब शिकायत करने वाला स्वयं मन्त्री और मुख्यमन्त्री रहा हो तो उस समय इस पर जांच क्यों नही हो पायी। क्या अधिकारियों की नजर में यह शिकायत राजनीति से प्रेरित थी और इसी कारण से इस पर कोई कारवाई की आवश्यकता नही समझी गयी। लेकिन अब जिस ढंग से आरटीआई के माध्यम से इस शिकायत को अब स्वास्थ्य सचिव तक ला दिया गया है उससे कुछ अलग ही संकेत उभर रहे हैं। ऐसे में अब स्वास्थ्य सचिव पर नजरें आ गयी है। क्योंकि सूचना आयोग के निर्देशों के बाद इसमें कुछ तो कारवाई करनी ही पड़ेगी।

न्यायिक सेवाओं से जुड़े लोगों को ट्रिब्यूनल में नियुक्त किया जाये

शिमला/शैल। प्रदेश के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक सदस्यों के दो पद लम्बे समय से खाली चले आ रहे हैं। इन पदों को भरने के लिये कई बार आवेदन आमन्त्रित किये गये हैं। अब इन पदों को भरने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसके लिये चयन समिति की बैठक हो चुकी है। लेकिन इस बैठक में किन सदस्यों की नियुक्ति की अनुशंसा की गयी है इसका कोई अधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है। लेकिन माना जा रहा है कि शीघ्र ही यह फैसला सामने आ जायेगा। लेकिन यह फैसला अधिकारिक तौर पर सामने आने और यह नियुक्तियां होने से पहले ही यह चर्चा चल पड़ी है कि इस ट्रिब्यूनल को बन्द किया जा रहा है। इस संद्धर्भ में कर्मचारी नेता विनोद कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है।
प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के अस्तित्व पर उठे सवालों पर हि.प्र. अराजपत्रित कर्मचारी महांसघ ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि प्रदेश के अग्रिण कर्मचारी संगठन प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में चहेते नौकरशाहों की नियुक्तियों का हमेशा विरोध करते रहे हैं परन्तु सरकार कर्मचारीयों की भावनाओं को दरकिनार कर ऐसे नौकरशाहों को ट्रिब्यूनल का बतौर सदस्य नामांकित करती रही है जिनकी सरकारी उच्च पदों पर नकारात्मक कार्यशैली के कारण अधीनस्थ कर्मचारियों को अपने इन्साफ के लिए वर्षो कोर्ट-कचहरियों में भटकना पड़ता है। महासंघ के संयोजक एवं परिसंघ के पूर्व अध्यक्ष विनोद कुमार ने कहा है कि सरकारें ऐसे चहेते नौकरशाहों को प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का सदस्य नामांकित करती रही है, जिनकी सोच अपनी सेवाकाल के दौरान प्रजातांत्रिक न होकर सामंतवादी रही है और जो सेवा मामलों पर नियम/कानून सम्मत न्याय देने के मामले पर एक पृष्ठ का विवरण लिखने में भी सक्षम नहीं होते हैं। महासंघ ने कहा है कि प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में किसी भी सदस्य की नियुक्ति उसके सर्विस रिकाॅर्ड की समीक्षा किए बिना और कोई मैरिट निर्धारित न करना पूरी तरह से कर्मचारी वर्ग से अन्याय है, जो संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता को ही चोट करते हैं।
महासंघ नेता विनोद कुमार ने कहा है कि 1986 में स्थापित प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को वर्ष 2008 में धूमल सरकार ने कर्मचारी संगठनों की मांग पर इसे बन्द करके कर्मचारियों के मसलों की पैरवी के लिए उच्च न्यायालय में व्यवस्था दी, चूंकि उस समय तक 24 वर्षों के इतिहास में सरकार द्वारा प्रताड़ित कर्मचारियों/कर्मचारी नेताओं के अनुभव जिस उद्देश्य से ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई थी, उसके विपरीत थे। इसलिए धूमल सरकार का यह फैसला पूरी तरह से कर्मचारियों के हक में गया था। परन्तु सत्ता परिवर्तन के बाद 2013 में राजनीतिक दृष्टिकोण से वीरभद्र सरकार ने अगस्त 2013 की कैबिनट की बैठक में ट्रिब्यूनल को दुबारा से चालू करने का फैसला लिया, सम्भवतः उसके पीछे बेरहम राजनीतिक तबादलों पर उच्च न्यायालय की सरकार को फटकार थी। लेकिन सरकार के इस फैसलें के विरूद्ध उस समय कर्मचारी परिसंघ ने सितम्बर 2013 के सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए प्रदेश सरकार उच्च न्यायालय और भारत सरकार को लिखित तौर पर ज्ञापन के माध्यम से कर्मचारियों की भावनाओं से अवगत करवाया गया। जिसके चलते फरवरी 2015 तक मामला लटका रहा, परन्तु राजनीतिक कारणों से वीरभद्र सरकार ने आखिर इसे दोबारा खोलते हुए पूर्व की तर्ज पर अपने चहेते नौकरशाहों को वहां बतौर सदस्य लगाया। विनोद कुमार ने कहा है कि वर्तमान में भी सरकार से यह कई बार मांग की जा चुकी है कि प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में किसी भी चहेते नौकरशाहों को एड़जस्ट करने की परीपाटी को विराम लगाते हुए ट्रिब्यूनल में न्यायिक सेवाओं से जूड़े जजों/सदस्यों की ही नियुक्तियां की जायें जिसमें सीधे सरकार का हस्तक्षेप न हो ताकि नकारात्मक कार्यशैली वाली नौकरशाही और भ्रष्ट राजनेताओं की प्रताड़ना के शिकार कर्मचारी/अधिकारी वर्ग को समय रहते उचित न्याय मिल सके, चूंकि प्रशासनिक ट्रिब्यूनल एक्ट 1985 में भी देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे कई फैसलों के सन्दर्भ अंकित है जिसमें ट्रिब्यूनल की ऐसी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं।

सबसे अधिक बीमार है प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल आईजीएमसी

शिमला/शैल। मोदी सरकार ने देश के करोड़ों गरीब लोगों के स्वास्थ्य की चिन्ता करते हुए उनके लिये आयुष्मान भारत योजना शुरू कर रखी है। बल्कि इन्ही योजनाओं के दम पर यह सरकार सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाकर बैठी हुई है। क्योंकि इस योजना के तहत गरीब आदमी पांच लाख तक का अपना ईलाज मुफ्त में करवा सकता है। इसी योजना की तर्ज पर जयराम सरकार ने भी अपनी ओर से हिमकेयर योजना इसमें और सहयोग करने के लिये शुरू कर रखी है। लेकिन आज इन योजनाओं की व्यवहारिक स्थिति यह है कि पैसों के अभाव में यह योजनाएं बन्द होने के कगार पर पंहुच चुकी है। क्योंकि इन योजनाओं के तहत खरीदी जा रही दवाईयां एवम अन्य उपकरणों के सप्लायरों को उनके बिलों का भुगतान नही हो पा रहा है। आईजीएमसी में ही सप्लायरों का करीब दस करोड़ का भुगतान रूका पड़ा है। एक सप्लायर के 6.88 करोड़ के बिल भुगतान के लिये पड़े हुए हैं। जब राजधानी में ही यह हालत होगी तो प्रदेश के अन्य भागों की हालत का अन्दाजा लगाया जा सकता है। भुगतान न हो पाने के कारण कुछ सप्लायरों ने तो सप्लाई ही बन्द कर दी है। भुगतान न हो पाने का कारण है कि केन्द्र से इसके लिये पैसा नही आ पा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि चुनावों के बाद इन योजनाओं को पुनर्विचार के नाम पर बन्द कर दिया जायेगा।
आईजीएमसी में ही ईलाज की स्थिति यह है कि पिछले दिनों मुख्यमन्त्री के प्रधान अतिरिक्त मुख्य सचिव डा. श्रीकान्त बाल्दी ने एक मरीज को अस्पताल भेजा लेकिन इस मरीज को तीन घन्टे तक डाक्टारों ने देखा तक नहीं परिणामस्वरूप इस मरीज ने ईलाज से पहले ही दम तोड़ दिया। इस पर डा. बाल्दी नाराज हुए और उन्होने आईजीएमसी प्रबन्धन से इस बारे में रिपोर्ट तलब की। यह रिपोर्ट मांगे जाने पर ऐसी लापरवाही के लिये एक जांच कमेटी गठित की गयी। इस कमेटी ने अपनी जांच में डाक्टारों और अन्य स्टाॅफ को इस लापरवाही के लिये कुछ लोगों को नाम से चिन्हित करते हुए अपनी रिपोर्ट जांच कमेटी के प्रमुख को सौंप दी। नामों का खुलासा हो जाने पर संबंधित डाक्टर हरकत में आये और अन्ततः फाईनल रिपोर्ट में यह कह दिया कि मरीज की मौत के लिये कोई भी जिम्मेदार नही है। यही नही आईजीएमसी के डाक्टरों का आचरण डाॅ. आर जी सूद और डाॅ. गोयल के मामलों में भी इसी तरह का रहा है चर्चा है कि डा. गोयल भी तीन घन्टे तक बाहर बैंच पर पड़े रहे थे और किसी ने भी उन्हे देखा तक नही था।
अब आयुष्मान योजना के तहत ईलाज के लिये आये एक मरीज को डाक्टरों ने 42000 रूपये के खर्चे के प्रबन्ध के लिये बोल दिया। गरीब आदमी यह प्रबन्ध करने में असमर्थ था। उसने आईजीएमसी प्रबन्धन से इस बारे में शिकायत की और सरकार तक भी यह सूचना पंहुच गयी। इस पर भी एक गंभीर जांच हुई है और इसकी रिपोर्ट सरकार को सौंप भी दी गयी है। लेकिन अभी तक इस रिपोर्ट पर कोई कारवाई नही हुई है। यही नही पिछले दिनों आईजीएमसी में ही एक नर्स की ट्रांसफर हुई यह ट्रांसफर कुछ रिपोर्टों के आधार पर हुई थी। लेकिन इस ट्रांसफर को रोकने के लिये तीन विधायक सिफारिश लेकर आ गये और मुख्यमन्त्री इस दबाव के आगे झुक गये।
जहां प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल की स्थिति इस तरह की है वहीं पर सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राईवेट सैक्टर को बढ़ावा दे रही है। लेकिन प्राईवेट सैक्टर की हालत यह है कि यहां पर टैस्ट आदि के लिये जो मशीने लगायी जा रही हैं वह 15 से 20 वर्ष पुरानी तकनीकी की है। जबकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में आये दिन नई रिसर्च सामने आ रही है। फिर प्राईवेट सैक्टर में टैस्टों की फीस सरकार से कई गुणा अधिक है और जब मरीज इन टैस्ट रिपोर्टोें के आधार पर ईलाज के लिये आता है। तो उसे नये सिरे से टैस्ट करवाने पड़ते हैं और दोनों रिपोर्टो के परिणामों मे भारी भिन्नता सामने आती है। यह सब इस लिये हो रहा है क्योंकि प्राईवेट सैक्टर को रैगुलेट करने के लिये कोई प्रावधान नही रखा गया है।

दलित उत्पीड़न पर पुलिस की बेरूखी फिर आयी सामने

शिमला/शैल। दलित उत्पीड़न के मामलों मे पुलिस के व्यवहार को लेकर प्रायः बेरूखी और पक्षपात करने के आरोप लगते रहते हैं। पिछले दिनों नाहन का जिन्दान मामला इसका बड़ा तल्ख उदाहरण प्रदेश के सामने रहा है। अब राजधानी शिमला के उपनगर ढ़ली में एक दलित अमीचन्द के परिवार पर गुण्डों ने राॅड और डंडो से 23 अप्रैल रात दस बजे हमला कर दिया। इस हमले में अमीचन्द उसकी पत्नी और बेटी रितु तथा लड़के को गंभीर चोंटे आयी है। रितु का सिर फोड़ दिया गया हैं इस घटना की सूचना पीड़ित परिवार ने उसी रात को पुलिस को दे दी। पुलिस मौक पर आयी और हमला करने वाले रामदेव और मनीराम को गाड़ी में बैठाकर अपने साथ ले गयी। लेकिन पीड़ित परिवार की कोई सुध नही ली।
घायल लड़की रितु को उसके परिवार वाले ही अस्पताल लेकर गये। लेकिन अस्पताल में भी इनका ईलाज सही ढंग से नही किया गया। इनका आयुष्मान के तहत स्वास्थ्य कार्ड तक बना हुआ है लेकिन इस कार्ड का उपयोग तक नही करने दिया गया। इस घटना की एफआईआर लिखवाने 24 तारीख को रितु को बहन पुष्पा ढली थाना में गयी लेकिन उसकी एफआईआर नही लिखी गयी। जबकि पुलिस को 23 तारीख रात में ही सूचना मिलने और फिर घटनास्थल पर जाने के कारण स्वत ही प्राथमिकी दर्ज कर लेेनी चाहिये थी। लेकिन परिवार को एफआईआर लिखवाने के लिये आनलाईन शिकायत का माध्यम लेना पड़ा। इस मामले में 18 घन्टे बाद एफआईआर दर्ज की गयी। डीएसपी सिटी को भी इसकी शिकायत की गयी। फिर धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने ब्यान दर्ज करके अनुसूचित जाजि उत्पीड़न अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया। लेकिन इस पर अभी तक न तो कोई कारवाई हुई है और न ही इन्हें एफआईआर की कापी उपलब्ध करवायी गयी है।
पुलिस की बेरूखी के कारण परिवार को इस मामले में पूर्व महापौर संजय चौहान की सहायता लेनी पड़ी है। संजय चौहान ने इस मामले में ढली पुलिस के कर्मीयों और आईजीएमसी के डाक्टरों जिन्होंने ईलाज में कोताही बरती है उन सभी के खिलाफ कारवाई की मांग की है। स्मरणीय है कि दलित उत्पीड़न के मामलों पर सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिकता विभाग के तहत एक कमेटी गठित है। इस तरह के मामले इस कमेटी के संज्ञान में लाये जाते हैं इन मामलों को वापिस लेने के लिये इस कमेटी से अनुमति लेनी पड़ती है। पिछले दिनों इस संबंध में सचिवालय में एक बैठक हुई थी। इस बैठक में डीजीपी भी शामिल थे। लेकिन इस बैठक में डीजीपी का जो स्टैण्ड था उसको लेकर कमेटी में विवाद हो गया था अधिकारी डीजीपी के स्टैण्ड से सहमत नही थे।

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