Friday, 16 January 2026
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कांग्रेस प्रदेश को धनासेठों के हाथों में बिकने नही देगीःराठौर

शिमला/शैल। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर ने पत्रकार वार्ता में  कहा कि इस वर्ष हिमाचल के निर्माता पूर्व मुख्यमंत्री डा.वाॅई.एस.परमार की जयंती 5 अगस्त 2019 को उनके गांव बागठन में मनाई जायेगी। कांग्रेस पार्टी ने इस कार्यक्रम के लिये एक कमेटी गठित की है। इस दिन सिरमौर में एक विशाल जनसभा का आयोजन भी किया जायेगा जिसमें कांग्रेस के कार्यकर्ता भाग लेंगे। इस दिन को विशेष रूप से स्वतन्त्रता सेनानीयों को सम्मानित किया जायेगा। डाॅ. वाई एस परमार हिमाचल निर्माता के प्रयासों से ही हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल पाया था। जबकि उस समय भी जनसंघ के लोग हिमाचल बनाने के पक्ष में नही थे। इतिहास ग्वाह है जो जनसंघ के लोग आज सत्ता में बैठे हैं उस समय वही लोग ‘‘स्टे्ट हुड मारो ठुड का नारा’’ लगाया करते थे। हिमाचल एक पहाड़ी राज्य होने के साथ यहां के लोग गरीब और ईमानदार हैं हिमाचल की भूमि पर बाहरी लोगों की नजर हमेशा से रही है। धारा 118 डा. परमार की देन हैं जिसकी वजह से हिमाचल की जनता लूटने से आज तक बची हुई है। आज जिस तरह से हिमाचल के मुख्यमंत्री धारा 118 के सरलीकरण का प्रयास कर रहे है वह प्रदेशहित में नही है। आज हिमाचल की हरी भरी पहाड़ीयों पर उन धनासेठों की नजर है जिन्होने चुनाव के वक्त भाजपा को धन दिया था। लेकिन कांग्रेस प्रदेश को इन धनासेठों के हाथों में बिकने नही देगी। कांग्रेस हिमाचल में उद्योग स्थापित करने के पक्ष मेे है लेकिन जो पुराने उद्योग बन्द व पलायन कर रहे हैं उसके लिये सरकार को ठोस कदम उठाने की जरूरत है। आज भाजपा प्रदेश में बड़े-बडे़ रिजोट बनाने की बात कर रही है जिसका प्रदेश के  छोटे होटल कारोबारियों पर बुरा असर पड़ेगा। राठौर ने कहा कि अगर आज हिमाचल को बिकने से बचाने की बात आयी तो कांग्रेस सड़को पर उतरेगी और आन्दोलन करेगी। कांग्रेस पार्टी रक्षा मंत्री के आरट्रैक के शिमला से मेरठ शिफ्ट करने के निर्णय को वापिस लेने का स्वागत करती है। राठौर ने कहा कि कांग्रेस ने ही सबसे पहले यह मांग उठायी थी। राठौर ने कहा कि आज पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था निम्न स्तर चली गई है। हिमाचल में आये दिन बलात्कार की घटनाएं हो रही है। उन्होने ने बताया कि प्रदेश में 2018 में 19,549 आपराधिक मामले दर्ज हुए है। जिसमें 476 अपहरण, 151 अनुसूचित व जनजातिय, 342 एनडीएण्डपीएस,  14,693 आईपीसी, 1671 महिला उत्पीड़न और 345 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं। 2019 में अब तक 9814 मामले दर्ज हुए हैं जिसमें एनडीएण्डपीएस के 751 मामले, महिला उत्पीड़न के 511 और बलात्कार के 130 मामले दर्ज हुए हैं। राठौर ने कहा कि आंकडे साफ बताते है कि पिछले दो सालों में अपराधियों के हौंसले बहुत बढ़े हैं और शासन कमजोर हुआ है। उन्होने कहा कि आज प्रदेश में सड़को की बुरी हालत है आज प्रदेश केे बागवानों  को मंडी तक माल पहुंचाना मुश्किल हो रहा है जो सरकार किसानों की आय 2022 तक दोगुणा करने के दावे करती आयी है उसकी नीयत का पता तो 50 पैसे का समर्थन मुल्य बढ़ाने से ही लग गया है। कांग्रेस मांग करती है कि यह मूल्य 10 रू प्रति किलो होना चाहिये। सेब की फसल इस साल स्क्रैब की बीमारी से ग्रस्त हुई है। 36 साल पहले इस रोग के लक्षण पाये गए थे तब 1983 में कांग्रेस सरकार की ओर से इस रोग को रोकने के लिये सस्ते दामों पर दवाई उपलब्ध करवायी गयी थी। आज कांग्रेस पार्टी यह मांग करती है कि इसके बारे में उचित कदम उठाये। राठौर ने कहा कि भाजपा सरकार में आज प्राईवेट इन्शोरेंस कंपनी को फायदा दिलाया जा रहा है और किसानों की फसलों को जबरन इंन्शोरेंस करवाया जा रहा है जबकि हकीकत यह है इन कंपनीयों की ओर से एक भी बागवान को क्लेम नही मिला है। कांग्रेस पार्टी इन सभी मुद्दों को लेकर आने वाले दिनों में प्रदेशभर में धरना प्रर्दशन करेगी और नये राज्यपाल को अस बारे में ज्ञापन सौंपेगी।

इन्दु गोस्वामी के त्यागपत्र से भाजपा सरकार और संगठन पर उठते सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष इन्दु गोस्वामी ने 9-7-2019 को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। इन्दु गोस्वामी ने जब यह त्यागपत्र दिया तब यह पत्र के अनुसार दिल्ली में थी। गोस्वामी ने अपने पत्र में लिखा है कि मेरे प्रदेश अध्यक्षा बनने से लेकर विधानसभा चुनाव लड़ने तक मुझे कई विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लेकिन मेरा विधानसभा चुनाव लड़ना प्रदेश संगठन और सरकार  दोनों को शायद सुखद नही लगा। बहुत बार अपनी परिस्थिति से प्रदेश नेतृत्व और सरकार को अवगत करवाया लेकिन समस्या कम होने की बजाये बढ़ती गयी। इन्दु गोस्वामी प्रदेश महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्षा थी और पिछले 32 वर्षों से संगठन में विभिन्न पदों पर रह कर इस मुकाम तक पहुंची हैं। लेकिन इन्दु के त्यागपत्र पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती की यह प्रतिक्रिया कि वह तो घर बैठी हुई थी उन्हें महिला मोर्चा का अध्यक्ष बनाकर हमने पहचान दी है। इस प्रतिक्रिया से इन्दु गोस्वामी का 32 वर्षों तक संगठन में काम करना एकदम अर्थहीन हो जाता है।
इन्दु गोस्वामी ने संगठन और सरकार  दोनों पर सवाल उठाये हैं। संगठन में सतपाल सत्ती स्वयं प्रदेश अध्यक्ष हैं। ऐसे में जब गोस्वामी यह कहती है कि संगठन और सरकार  दोनों को उनका चुनाव लड़ना शायद सुखद नही लगा तो यह आरोप स्वयं सत्ती पर आ जाता है। गोस्वामी ने प्रदेश नेतृत्व और सरकार  दोनों को अपनी परिस्थिति से अवगत करवाया। इसमें भी सत्ती पर बात आती है लेकिन सत्ती ने इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया न देते हुए गोस्वामी की अहमियत को ही एक तरह से नकार दिया है। सरकार की ओर से मुख्यमन्त्री की कोई प्रतिक्रिया नही आयी है जबकि गोस्वामी के त्यागपत्र में सरकार का अर्थ सीधे मुख्यमन्त्री है।


इन्दु गोस्वामी के त्यागपत्र से पहले जयराम सरकार के एक मन्त्री एक सलाहकार और एक ओ एस डी को लेकर पत्र आ चुके हैं। यह पत्र मीडिया में चर्चित भी हुए हैं। इन पत्रों में गंभीर आरोप भी दर्ज रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले एक बड़े नौकरशाह के खिलाफ भी एक पत्र चर्चा में आया था। इस पत्र के पीछे जिन लोगों का हाथ होने की चर्चा थी अब शायद सरकार ने उस व्यक्ति को ही उस पद से हटा दिया है। लेकिन मजे की बात यह है कि इन सभी लोगों के खिलाफ आये पत्रों पर संगठन की ओर से प्रदेश अध्यक्ष की कोई प्रतिक्रियाएं नही आयी है।
इन्दु गोस्वामी अपनी परिस्थितियां प्रदेश नेतृत्व के सामने ला चुकी हैं और अब उन्होने अपना त्यागपत्र दिल्ली से दिया है। इसका स्वभाविक अर्थ है कि भाजपा के केन्द्रिय नेतृत्व को भी इस सबसे उन्होने अवगत करवाया होगा और आज की तारीख में केन्द्रिय नेतृत्व का सीधा अर्थ हो जाता है जे.पी. नड्डा। नड्डा प्रदेश से ताल्लुक रखने के नाते अपने स्तर पर भी बहुत सारी जानकारी रखे हुए हैं। विशेषकर जो पत्र बम पिछले दिनों आ चुके हैं उनके संद्धर्भ में। राज्य की वित्तिय स्थिति पर जो नियन्त्रण रखने के लिये केन्द्रिय वित्त मंत्रालय ने वीरभद्र शासन के अन्तिम के दिनों में लिखा था अब उस पर अमल करने की बाध्यता आ खड़ी हो चुकी है और इस बारे में पुनः निर्देश भी जारी हो चुके हैं। ऐसे में आज यदि सरकार के अन्दर से ही सरकार पर इस तरह से सवाल उठते है तो इससे विपक्ष को स्वतः ही एक बड़ा मुद्दा मिल जायेगा। अभी सरकार में बहुत सारे निगमों/बोर्डो में ताजपोशीयां होनी हैं। बल्कि अभी तक सरकार नगर निगम शिमला में मनोनीत किये जाने वाले सदस्यों तक को नामित नही कर पायी है। यह सारे ऐसे सवाल हैं जो अभी तक जन चर्चा में नही आये हैं लेकिन जैसे ही मन्त्रीमण्डल के खाली पद भर लिये जायेंगे उसके बाद जिन लोगों को मन्त्री पद नही मिल पायेंगे उनके लिये इन्दु गोस्वामी जैसे नेताओं के पत्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने के सहज़ हथियार बन जायेंगे। यही नही ऐसे पत्रों का असर आने वाले उपचुनावों पर भी पड़ सकता है।
माना  जा रहा है कि इन्दु गोस्वामी के पत्र से कांगड़ा की राजनीति में विशेष असर पडे़गा। क्योंकि धर्मशाला का उपचुनाव होना है और यहीं से मन्त्रीमण्डल का स्थान खाली हुआ है। कांगड़ा से ही रमेश धवाला और राकेश पठानिया इसके प्रबल दावेदारों में गिने जा रहे हैं। धवाला, शान्ता कुमार तो पठानिया, जे.पी.नड्डा के नजदीकी माने जाते हैं। कांगड़ा के ज्वालामुखी से ही भाजपा के प्रदेश के संगठन मन्त्री राणा भी ताल्लुक रखते हैं। पार्टी में राणा संघ के प्रतिनिधि हैं और शायद शीघ्र ही संघ में उनकी पदोन्नति हो रही है। उन्हें चार राज्यों का दायित्व सौंपा जायेगा। इस नाते राणा का स्थान पार्टी में महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिये मन्त्रीयों के चयन में उनकी राय भी महत्वपूर्ण रहेगी यह तय है। लेकिन कांगड़ा के ही कुछ विधायक राणा के दखल को राजनीतिक हस्ताक्षेप और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी करार दे रहे हैं। सूत्रों की माने तो कुछ लोग इस बारे में मुख्यमन्त्री से भी बात कर चुके हैं। शायद इनमें राणा के विरूद्ध सबसे अधिक शिकायत रमेश धवाला को ही है क्योंकि संयोगवश दोनांे एक ही विधानसभा क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। इस तरह कुल मिलाकर जो कुछ भाजपा के अन्दर गोस्वामी के पत्र के माध्यम से उभरता नज़र आ रहा है उसके परिणाम दूगामी होंगे यह तय है।


केन्द्र कर्ज और संपति बेचकर जुटायेगा 8,23,588.42 करोड़ की पूंजीगत प्राप्तियां

केन्द्र सरकार का वर्ष 2019-20 के बजट आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष सरकार का कर्जा और घाटा उसकी राजस्व आय से काफी अधिक बढ़ने जा रहा है। सरकार 27,86,349 करोड़ का खर्च पूरा करने के लिये 8,23,588.42 लाख करोड़ की पूंजीगत प्रप्तियां कर्ज लेकर जुटा रही हैं यह कर्ज कहां-कहां से लिया जायेगा उसका विवरण इस प्रकार रहेगा।

























































































क्या शिमला के भराड़ी में भी कसौली कांड घटने की तैयारी हो रही है लोक निर्माण विभाग के नोटिस से उभरी आशंका

शिमला/शैल। राजधानी शिमला के उपनगर भराड़ी के दुधली गांव क्षेत्र से देवीधार जाने वाली सड़क के किनारे करीब एक दशक पहले से बने आठ भवनों के मालिकों को लोक निर्माण विभाग के डिविजन न. 1 शिमला के कनिष्ठ अभियन्ता ने 15 दिन के भीतर अपने भवन तोड़ने के नोटिस जारी किये हैं। प्रदेश उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता श्रवण डोगरा सहित उर्मिला ठाकुर, राजकुमार, सीमा सूद, रविन्द्र ठाकुर, राजेश चौहान, हीरा सिंह वर्मा और मोहन सिंह के खिलाफ आरोप है कि इन लोगों ने रोड़ साईड़ Control Width के तीन मीटर दायरे के भीतर मकान बनाकर एक्ट की उल्लंघना की है। स्मरणीय है कि प्रदेश उच्च न्यायलय ने एक समय यह निर्देश जारी किये थे कि इलेजियम/देवीधार सड़क की चौड़ाई वाहन चलाने योग्य होनी है। उच्च न्यायालय के इन निर्देशों पर कितना और क्या अमल हुआ है इसकी जानकारी एक आरटीआई के माध्यम से एक डॉ. बन्टा ने 11.5.18 को मांगी थी। इस आर टीआई के परिणाम स्वरूप अब एक साल बाद यह नोटिस भेजने की कारवाई की गयी है।
इन नोटिसों से जो सवाल खड़े हुए हैं वह महत्वपूर्ण हैं और पूरे तन्त्र की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाते हैं। स्मरणीय है कि यह मकान और यह सड़क उच्च न्यायालय के निर्देशों से बहुत पहले बने हैं और तभी रोडसाईड एक्ट का उल्लंघना हो चुकी थी। एक्ट में तो पहले दिन से ही यह मौजूद है कि कन्ट्रोल width के 3 मीटर के दायरे के भीतर बिना अनुमति के निर्माण नहीं हो सकता। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब यह निर्माण शुरू हुए थे तब लोक निर्माण विभाग का संवांच्छित प्रशासन कहां था। उसने उस समय इन निर्माणों का संज्ञान लेकर तब ऐसा ही नोटिस भेजने की कारवाई क्यों नहीं की। फिर भराडी क्षेत्र टीसीपी और नगर निगम शिमला दोनों के दायरे में आता है। इसलिये स्वभाविक है कि इन भवनों के नक्शे भी संबद्ध अथारिटी से पास करवाये ही गये होंगे। यदि यह भवन नक्शा पास करवा कर बनाये गये हैं तो उस समय नक्शा पास करने से पहले इस एक्ट की अनुपालना सुनिश्चित क्यों नहीं की।  
यदि भवन निर्माण के समय लोकनिर्माण विभाग और टी सी पी या नगर निगम शिमला ने इस ओर ध्यान नही दिया है तो क्या आज भवन मालिकों के मकान गिराने से पहले संबद्ध विभागों के कर्मचारियों/ अधिकारियों के खिलाफ कारवाई नही  की जानी चाहिये। क्योंकि यह नोटिस देने से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि  इसमें एक्ट की उल्लंघना तो हुई ही है। हो सकता है कि प्रदेश के अन्य स्थानों  पर भी ऐसी ही उल्लंघनाएं हुई हों और आज भी हो रही हों। आज जब भराड़ी क्षेत्र में इन मकानों को गिराने की कारवाई होगी तो क्या वहां भी एक और कसौली कांड घटने की सम्भावना नही बन जाती है।

एनजीटी आदेश के परिदृश्य में प्रस्तावित औद्योगिक निवेश पर उठते सवाल

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर और उनकी टीम प्रदेश में औद्योगिक निवेश जुटाने के लिये पिछले कुछ अरसे से अपने देश से लेकर विदेशों तक यात्राएं करके प्रयास कर रहे हैं। उनके इन प्रयासों से करीब 80,000 करोड़ के एमओयू साईन होने की जानकारी विभिन्न सरकारी विज्ञप्तियों के माध्यम से जनता में आयी है। जो एमओयू साईन हुए हैं उनसे अभी ज्यादा खुश होने की भी बात नही है क्योंकि इनमें निवेशकों की ओर से इतना ही भरोसा है कि वह यहां निवेश करने को ईच्छुक हैं और सरकार की ओर से यह आश्वासन है कि वह निवेशकों को इसमें पूरा सहयोग करेगी। इस भरोसे और आश्वासन को अमली शक्ल लेने में कितना समय लगेगा यह कहना संभव नही है। निवेश को लेकर शंकायें केन्द्र का बजट आने के बाद ज्यादा उभरी हैं क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर ही निवेशकां का करीब छः लाख करोड़ डूब गया है। स्वभाविक है कि जब देश में ही निवेशक नही आयेगा तो प्रदेश में कैसे आयेगा।
इस  परिप्रेक्ष में यह आकलन करना आवश्यक हो जाता है कि प्रदेश में चल रहे उद्योगों की वर्तमान में स्थिति क्या है क्योंकि इससे पहले रहे दोनां मुख्यमन्त्रीयों प्रेम कुमार धूमल और वीरभद्र सिंह के काल में भी ऐसे प्रयास हुए हैं और इन्ही प्रयासो के बाद दोनां सरकारों पर ‘‘ हिमाचल ऑन सेल’’ के आरोप भी लगे है। पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से हर मुख्यमन्त्री के बजट भाषण में प्रदेश में सैटलाईट टाऊन बनाने की घोषणाएं दर्ज हैं लेकिन व्यवहार में अब तक कुछ नही हो पाया है। इसलिये यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या जिस तरह के औद्योगिक विकास की परिकल्पना लेकर हम चले हुए हैं क्या वह प्रदेश के लिये व्यवहारिक भी है या नही। क्योंकि प्रदेश को विद्युत राज्य बनाते-बनाते आज यह परियोजनाएं एक संकट का कारक बनती नजर आ रही है विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों से यह सामने आ चुका है। अब तक के औद्योगिक विकास से प्रदेश को क्या हासिल हुआ है उसमें कर राजस्व और गैर कर राजस्व में तो कोई बड़ा योगदान नही रहा है लेकिन इससे जीडीपी का आंकड़ा बढ़ने से कर्ज लेने की सीमा बढ़ती चली गयी और आज प्रदेश 52000 करोड़ के कर्ज में डूबा हुआ है और रोजगार कार्यालयों में दर्ज बेरोजगारों की संस्था भी दस लाख के करीब हो चुकी है। इसी परिदृश्य में यदि  पिछले एक दशक के आंकड़ो पर नजर डाले तो सरकार के ही आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2009-10 में कुल 36315 उद्योग ईकाईयां प्रदेश में पंजीकृत थी जिनमें मध्यम और बड़ी ईकाईयों की संख्या 428 थी। इनमें 8936.57 करोड़ का निवेश था तथा 2.35 लाख लोगों को रोजगार हासिल था। 2018-19 में आज ईकाईयों की संख्या 49058 हो गयी है जिनमें 140 बड़ी और 522 मध्यम हैं लेकिन इनमें निवेश कितना है और इसमें कितने लोगां को रोजगार मिला है इसको लेकर आर्थिक सर्वेक्षण में कोई जिक्र नही है। 31-12-2014 तक 40,429 ईकाईयां पंजीकृत थी और इनमें 18307.95 करोड़ का निवेश था तथा 2,84599 लोगों को रोजगार हासिल था।
प्रदेश में स्थापित उद्योगों के माध्यम से अब तक तीन लाख से कम लोगों को रोजगार हासिल हो पाया है इसमें भी रोजगार पाने वाले सभी हिमाचली नही है। लेकिन सरकार की ओर से 40 औद्योगिक बस्तियों और 15 एस्टेट्स के विकास पर करोड़ो रूपया खर्च किया गया है। पंडोगा में 88.05 और कन्दरोड़ी में 95.77 करोड़ आधारभूत ढ़ाचा विकसित करने में खर्च किया गया है। उद्योगों के लिये 781701 बीघा का भूमि बैंक तैयार करने के अतिरिक्त दमोटा में 515 बीघा वन भूमि ली गई है इसके अतिरिक्त  विभिन्न समयों पर उद्योगां को जो सुविधा पैकेजों के माध्यम से दी गयी है यदि उसका पूरा विवरण खंगाला जाये तो उस रकम का जो ब्याज बनता है वह उद्योगों से मिलने वाले राजस्व से शायद दो गुणा से भी अधिक होगा।
आज प्रदेश में एनजीटी के आदेश के बाद निर्माण कार्यों पर लगभग रोक जैसी स्थिति बनी हुई है। प्रदेश सरकार को अभी तक सर्वोच्च न्यायालय से कोई राहत नही मिल पायी है और राहत की संभावना भी नही के बराबर है क्योंकि पूरा प्रदेश अधिकांश में सिस्मक जोन पांच में आता है। अधिकांश परियोजनाएं इसी जोन में स्थित हैं इसलिये यहां और स्थापनाओं से पर्यावरण के लिये और संकट बढ़ जायेगा। पर्यावरण के असन्तुलन के खतरे को सामने रखते हुये यह संभव नही लगता है कि अढ़ाई मंजिला से अधिक के निर्माण की अनुमति मिल पायेगी। एनजीटी का आदेश इसी  सचिवालय के बड़े बाबूओं की कमेटी की रिपोर्ट पर आधारित है और आज वही बाबू बाहर से निवेशक लाने के प्रयासों में लगे हैं। टीसीपी एक्ट पूरे प्रदेश में लागू है और उसी के कारण एनजीटी का आदेश भी सभी जगह लागू है। सरकार टीसीपी एक्ट में संशोधन करने की बात कर रही है लेकिन क्या इससे पहले रैगुलर प्लान नही लाना होगा। 1979 से अन्तरिम प्लान के सहारे ही काम चलाया जा रहा था और उसमें भी एक दर्जन से अधिक संशोधन किये गये है। सरकार की इन्ही विसंगतियों के कारण यह मामला एनजीटी और सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा है। ऐसे में जब तक सरकार इन विसंगतियों को दूर नही कर लेती है तब तक कोई भी निवेशक यहां निवेश का जोखिम नही ले पायेगा। क्योंकि अढ़ाई मंजिल का आदेश उसके सामने आ जायेगा। अवैध निर्माणों को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक कड़ा संज्ञान लेकर दोषीयों के खिलाफ सख्त कारवाई करने के निर्देश दे चुके हैं। गौरतलब यह है कि ऐसे सभी मामलां में संवद्ध प्रशासन ने नियमों कानूनो की जानबुझ कर अनदेखी की है और इस अनदेखी का नुकसान पूरे प्रदेश को झेलना पड़ रहा है। आज ठीक यही स्थिति इस प्रस्तावित औद्योगिक विकास में फिर घटती दिख रही है। क्योंकि इसमें सुधार अधिनियम की धारा 118 से लेकर टीसीपी एक्ट और एनजीटी के फैसले जैसे कई गंभीर मुद्दों पर खुली चर्चा की आवश्यकता है।

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