शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में नवम्बर 2016 को एनजीटी का फैसला आने के बाद अढ़ाई मंजिल से अधिक के भवन निर्माण पर रोक लग गयी है। इस फैसला का कई हल्कों ने विरोध किया है। सरकार भी इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील में गयी हुई है परन्तु अभी तक इसमें कोई राहत नही मिली है और न ही इस फैसले पर कोई स्टे लगा है। ऐसे में यह फैसला इस समय पूरी तरह प्रभावी है और इस पर अमल सुनिश्चित करना सरकारी तन्त्र की जिम्मेदारी है। लेकिन संवद्ध सरकारी तन्त्र यह अमल सुनिश्चित करने में पूरी तरह असफल हो रहा है। तन्त्र की यह असफलता राजनीतिक दबाव के चलते है या पैसे के प्रभाव के कारण है यह अभी तक रहस्य ही बना हुआ है। लेकिन
इस फैसले को सीधे-सीधे अंगूठा दिखाया जा रहा है यह सामने है।
प्राप्त विवरण के मुताबिक शिमला के सरकुलर रोड़ की निवासी रानी कुकरेजा शिमला के मशोबरा सडोहरा में एक भवन बना रही है। इस निर्माण की अनुमति उन्हें टीसीपी से 15-9-2012 में मिली थी। टीसीपी के अनुमति पत्र की शर्त संख्या 19 के मुताबिक यह अनुमति केवल तीन वर्ष के लिये वैध थी और 14-9-15 को समाप्त हो जानी थी। लेकिन इस अवधि में यह निर्माण कार्य शुरू नही हो पाया। इस पर अनुमति की अवधि बढ़ाने का टीसीपी से अनुरोध किया गया और यह अनुरोध स्वीकार करते हुए टीसीपी ने 2-12-15 को पत्र लिखकर 15000 रूपये की फीस इस संद्धर्भ में जमा करवाने के निर्देश दिये ताकि यह फीस आने के बाद अनुमति बढ़ाने का पत्र जारी किया जा सके। इस तरह दिसम्बर 2016 तक की अनुमति मिल गयी। अनुमति की शर्त संख्या 15 के अनुसार The NOC from this at plinth level at every hour level shall be mendatory obtained from the competent authority CE, SADA kufri shoghi otherwise the permission shall withdrawn. लेकिन 2-12-2015 के टीसीपी के पत्र के बाद 15000 रूपये की फीस जमा करवाकर यह एक वर्ष की एक्सटैन्शन हासिल की गयी या नही इसका कोई रिकार्ड सामने नही आया है। जबकि जब यह निर्माण शुरू हुआ तब इसकी शिकायतें आना भी शुरू हो गयी। आरटीआई के माध्यम से सारा रिकार्ड हासिल किया गया। शिकायतकर्ता एक सूर्यकान्त भागड़ा के मुताबिक यह निर्माण ही मई 2019 में शुरू हुआ है। भागड़ा ने अपनी शिकायत में प्लाॅट के 2017, 2018 और 2019 के फोटो साथ लगाये हैं। भागड़ा की शिकायत 29 मई 2019 की है।
भागड़ा की शिकायत पर कारवाई करते हुए 27-6-2019 को सहायक टाऊन प्लानर टीसीपी रानी कुकरेजा को स्पष्ट निर्देश देते हैं कि वह इस अवैध निर्माण को तुरन्त बन्द कर दें। टीसीपी के 27-6-2019 के पत्र में साफ कहा गया है कि इस निर्माण के लिये 15-9-2012 को ली गयी अनुमति समाप्त हो गयी है। टीसीपी के इस पत्र से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि 2015 में 15000 रूपये की फीस जमा करवाकर एक साल का अनुमति विस्तार भी नही लिया गया है। क्योंकि टीसीपी 27-6-2019 के पत्र में इसका कोई जिक्र ही नही है। भागड़ा ने रानी कुकरेजा द्वारा यह ज़मीन खरीदने के लिये हासिल किये गये कृषक प्रमाण पत्र की प्रमाणिकता पर भी सन्देह जाहिर किया है। इस कृषक प्रमाण पत्र को लेकर भी डीसी शिमला के पास शिकायत अब तक लंबित चल रही है। वैसे एक वर्ष का अनुमति विस्तार भी 13-9-2016 को समाप्त हो जाता है।
रानी कुकरेजा के इस निर्माण की वैधता पर टीसीपी के 27-6-2019 के पत्र से ही सारी स्थिति स्पष्ट हो जाती है कि यह निर्माण अनुमति के बिना किया जा रहा है। टीसीपी ने यह पत्र मौके पर जाकर निर्माण का निरीक्षण करने के बाद जारी किया है। परन्तु टीसीपी के पत्र के बाद भी निर्माण जारी है। टीसीपी ने यह पत्र लिखने के अतिरिक्त और कोई कारवाई नही की है जब कि उसके पास निर्माण को रोकने के लिये पुलिस की सेवाएं लेने का पूरा अधिकार है कसौली प्रकरण में यह सब कुछ सामने आ चुका है। मशोबर भी कसौली ही की तरह का संवेदनशील क्षेत्र है। ऐसे में यह सवाल उठने स्वभाविक है कि एनजीटी के फैसले और कसौली प्रकरण के बाद भी यदि इस तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं तो यही मानना पड़ेगा कि सरकार और कानून सही में ही ‘‘प्रभाव’’ के आगे बौने हो गये हैं क्योंकि इस मामले की एक आन लाईन शिकायत मुख्यमन्त्री को डायरी न. 151351 और 137429 के तहत उनके शिकायत सैल को भी भेजी गयी थी परन्तु उसके ऊपर भी कोई कारवाई नही हुई है।


शिमला/शैल। जयराम सरकार ने अभी 250 करोड़ का और कर्ज लिया है और सरकार का कर्जभार 50,000 करोड़ का आकंड़ा पार कर चुका है। माना जा रहा है कि सरकार की वित्तिय स्थिति जिस तरह की चल रही है उसके हिसाब से इस वित्तिय वर्ष में कर्ज लेने का आकंड़ा पिछले वर्षों की अनुपातिक तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ जायेगा। आज सरकार का कर्जभार जितना हो चुका है उसका ब्याज ही शायद राज्य के अपने साधनों से मिलने वाले राजस्व से बढ़ जायेगा। इस बढ़ते कर्ज पर नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री के चिन्ता व्यक्त करने के बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष
कुलदीप राठौर ने सरकार से उसके खर्चों पर श्वेतपत्र की मांग कर ली है। राज्य सरकार अपनी तय सीमा से अधिक कर्ज ले रही थी। इस पर वीरभद्र शासन में भी केन्द्र की ओर से वर्ष 2016 में एक चेतावनी पत्र भेजा गया था। शैल इस पत्र को अपने पाठकों के सामने रख चुकी है। ऐसा ही एक पत्र इस बार भी राज्य सरकार को मिल चुका है। बल्कि यह पत्र मिलने के बाद एजी ने भी सरकारी खर्चों को लेकर जानकारी मांगी है। सरकार कांग्रेस की मांग पर यह श्वेतपत्र जारी करती है या नही इसका पता तो आने वाले समय में ही लगेगा। यह सही है कि सरकार लगभग हर मीहने कर्ज ले रही है और यह तथ्य हर महीने प्रदेश की जनता के सामने आता भी रहा है। इस परिदृश्य में कांग्रेस का कर्जों और खर्चों पर चिन्ता करना जायज बनता है क्योंकि सरकार ने सत्ता संभालते ही राज्य की वित्तिय स्थिति पर कोई श्वेतपत्र जारी नही किया था। बल्कि विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश को आर्थिक सहायता देने के जो आकंड़े प्रधानमन्त्री ने चुनावी सभाओं में रखे थे उनका सच मुख्यमन्त्री के पहले ही बजट भाषण में रखे आकंड़ो से सामने आ चुका है। शैल इन आकंड़ो को भी पाठकों के सामने रख चुका है।
इस परिदृश्य में वर्तमान स्थिति को समझने के लिये चालू वित्त वर्ष के आकंड़ो पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। वर्ष 2019-20 के बजट अनुमानों के अनुसार सरकार की कुल राजस्व आया 33746.95 करोड़ रहने का अनुमान है। इसी वर्ष में सरकार का कुल राजस्व व्यय 36089.03 करोड़ रहेगा। इन आकंड़ो के मुताबिक सरकार का खर्च उसकी आये से 2342.08 करोड़ बढ़ जाता है। सरकार की पूंजीगत प्राप्तियां 8357.48 करोड़ और पूंजीगत खर्च 8298.70 करोड़ रहने का अनुमान है। इसमें सरकार के 58.78 करोड़ बच जाते हैं। इस तरह वर्ष में सरकार को कुल 2283.30 करोड़ की कमी रह जाती है। जिसे पूरा करने के केवल 2283.30 करोड़ का कर्ज लेने की आवश्यकता होगी। परन्तु अभी तक ही सरकार इससे अधिक का कर्ज ले चुकी है। इसलिये यह चिन्ता करना वाजिब है कि जब इन आकंड़ो के अनुसार सरकार को हर माह 200 करोड़ से भी कम कर्ज लेने की आवश्यकता है तो फिर इससे अधिक का कर्ज क्यों लिया जा रहा है। क्या मुख्यमन्त्री को आय और व्यय के सही आंकडे़ नही दिये जा रहे हैं?
सरकार के अपने साधनों से उसकी राजस्व आय वर्ष 2017-2018 में 9470.43 करोड़, 2018-19 में 10,229.12 करोड़ और 2019-20 में 10,364.28 करोड़ अनुमानित है। जबकि 2017-18 में पूंजीगत प्राप्तियां 6866.55 करोड़, 2018-19 में 7764.75 करोड़ और 2019-20 में 8357.48 करोड़ होंगी। यहां यह समझना आवश्यक है कि पूंजीगत प्राप्तियां भी कर्ज ही होती हैं। पूंजीगत प्राप्तियों का प्रावधान इसलिये रखा गया है ताकि इस निवेश से सरकार अपने आय के साधन बढ़ा सके। लेकिन उपरोक्त आकंड़ो को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि शायद यह निवेश साधन बढ़ाने पर नही हो रहा है। इसकी पुष्टि सरकार के राजस्व व्यय के आंकड़ों से हो जाती है। वर्ष 2017-18 में यह व्यय 27053.16 करोड़, 2018-19 में 33567.96 करोड़ और 2019-20 में 36089.03 करोड़ होगा। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जिस अनुपात में व्यय बढ़ रहा है उसी अनुपात में साधन नही हैं यहां पर यह उल्लेख करना भी आवश्यक हो जाता है कि इस समय सरकार ने 13 सार्वजनिक उपक्रमों और सहकारिता में जो 5149.05 करोड़ की प्रतिभूतियां दे रखी हैं उनमें ही करीब 2400 करोड़ की प्रतिभूतियां जोखिम वाली हो चुकी हैं। सरकार की यह स्थिति तब है जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, बागवानी और पेयजल तथा वानिकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अधिकांश योजनाएं केन्द्र के 90:10 के अनुपात में वित्त पोषित हो रही हैं। यह दुर्भाग्य है कि केन्द्र की इतनी उदार सहायता के बावजूद प्रदेश की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। इससे यह आशंका होना स्वभाविक है कि आर्थिक प्रबन्धन केवल कर्ज प्रबन्धन होकर ही तो नही रह गया है।
शिमला/शैल। जयराम सरकार ने टीसीपी में संशोधन के लिये एक मंत्री कमेटी का गठन किया है। लेकिन इस कमेटी में विभाग की मंत्री सरवीन चैधरी को ही बाहर रखा गया है। सरवीन चैधरी ने इस बाहर रखे जाने पर अपनी नाराज़गी जा
हिर की है। सरवीन चैधरी की इस नाराज़गी से पहले ज्वालामुखी के विधायक रमेश धवाला और प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री पवन राणा का द्वन्द भी सुर्खीयों में रह चुका है। पालमपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी इन्दु गोस्वामी ने प्रदेश महिला मोर्चा के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देते हुए सरकार और संगठन पर गंभीर आरोप लगा रखे हैं। नूरपुर के विधायक राकेश पठानिया के तलख तेवर पिछले विधानसभा सत्रों में सामने आ चुके हैं और यह तेवर अभी अपनी जगह कायम है। कांगड़ा के सांसद किश्न कपूर भी अब उनके बेटे की धर्मशाला उपचुनाव में दावेदारी को लेकर अपने तेवर दिखाने लग पड़े हैं। सूत्रों की माने तो कपूर शायद लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये इसी आश्वासन पर तैयार हुए थे कि उनकी जगह उनके बेटे को उपचुनाव में उतारा जायेगा। उधर शान्ता कुमार के निकटस्थ राजीव भारद्वाज और राष्ट्रीय ट्राईबल मोर्चा के उपाध्यक्ष त्रिलोक कपूर का नाम भी इस उपचुनाव के दावेदारों मे गिना जा रहा है।
लेकिन अब इन सारी चर्चाओं के बीच कांगड़ा नगरोटा भाजपा मण्डल के अध्यक्ष ने धर्मशाला उपचुनाव में पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल को यहां से उम्मीदवार बनाने की मांग कर दी है। यह सही है कि भाजपा ने प्रदेश का 2017 विधानसभा चुनाव धूमल को नेता घोषित करने के परिणाम स्वरूप ही जीता था। विधानसभा चुवानों मे धूमल और उनके कई निकटस्थों का चुनाव हार जाना आज भी कई लोगों के लिये रहस्य ही बना हुआ है। बल्कि चुनाव हार जाने के बावजूद भी विधायकों का बहुमत धूमल के पक्ष में खड़ा था और दो विधायकों ने तो उनके लिये विधायकी से त्यागपत्र देने की भी पेशकश कर दी थी। लेकिन उस समय किसी तरह से जयराम ठाकुर का नाम सामने आ गया। जबकि सुरेश भारद्वाज, जगत प्रकाश नड्डा, और महेन्द्र सिंह ठाकुर सब जयराम से पार्टी में वरिष्ठ थे। जयराम के मुख्यमन्त्री बनने के बाद जंजैहली प्रकरण को लेकर जयराम और धूमल में मतभेद काफी गहरा गये थे। माना जाता है कि कुछ लोगों ने उस समय एक सुनियोजित योजना के तहत इन मतभेदों की भूमिका तैयार की थी। लेकिन जिस तरह से उस समय इन मतभेदों को इस मुकाम तक पहुंचा दिया गया कि धूमल को यहां तक कहना पड़ गया कि सरकार चाहे तो सीआईडी से जांच करवा ले। उस समय मुख्यमन्त्री के गिर्द कुछ ऐसे सत्ता केन्द्र उभर गये थे जिनके कारण एक समय जयराम को भी यहां तक कहना पड़ गया था कि ‘‘अब तो उन्हे मुख्यमन्त्री स्वीकार कर लो’’ संयोगवश यह सत्ता केन्द्र आज भी मुख्यमन्त्री के गिर्द अपनी घेराबन्दी बनाये हुए है। चर्चा है कि एक सत्ता केन्द्र ने तो इसी अवधि में चण्डीगढ़ में एक दो करोड़ का मकान खरीद लिया है।
आज इसी सत्ता केन्द्र के कारण मुख्यमन्त्री के अपने कार्यालय के अधिकारी पत्र बम्बों के शिकार हो रहे हैं। बल्कि अब तो कई बैठकों के विडियों तक वायरल हो रहे हैं। सरकार को हर महीने कर्ज लेना पड़ रहा है। व्यवहारिक स्थिति यह बन चुकी है कि सरकार की अधिकांश घोषणाएं जमीन पर नजर ही नही आ रही है। माना जा रहा है कि जिस तरह से प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा में बड़े नेताओं के मतभेद उभरते जा रहे है उसका धर्मशाला उपचुनाव पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। ऐसी वस्तुस्थिति में जिले के एक मण्डल द्वारा धूमल को धर्मशाला उपचुनाव में उम्मीदवार बनाने की मांग उठना एक बहुत बड़ा राजनीतिक धमाका है। इस मांग से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में आज भी धूमल का एक स्थान बराबर बना हुआ है। यह माना जा रहा है कि जो परिस्थितियां बनती जा रही हैं उन पर नियन्त्रण रखने के लिये धूमल जैसे अनुभवी नेता की ही प्रदेश को आवश्यकता है।
शिमला/शैल। प्रदेश लोकसेवा आयोग की सदस्य डा़ रचना गुप्ता लोक सेवा आयोग में आने से पहले पत्रकार थी। दैनिक जागरण के हिमाचल संस्करण की रैजिडैन्ट संपादक थी। दैनिक जागरण में काम करते हुए उनके खिलाफ 2016 में जे एम आई सी जोगिन्द्रनगर की अदालत में एक मानहानि का आपराधिक मामला दायर हुआ था। इस मामले में अब 12-7-2019 को उन्हें जमानत लेनी पड़ी है। यह मामला अभी तक अदालत में लंबित चल रहा है। डा. रचना गुप्ता की नियुक्ति बतौर सदस्य लोक सेवा आयोग में होने से पहले से ही उनके खिलाफ यह आपराधिक मान हानि का मामला दायर हो चुका था। अब इस मामले को लेकर एक देवाशीष भट्टाचार्य ने प्रदेश के राज्यपाल को एक पत्र लिखा है। देवाशीष ने यह सवाल उठाया है कि क्या रचना गुप्ता ने अपनी नियुक्ति से पहले यह आपराधिक मामला दायर होने की सूचना राज्यपाल और लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को दी थी। अब जब उन्हें इस मामले में जमानत लेनी पड़ी है तब क्या इस जमानत की सूचना भी राज्यपाल और चेयरमैन लोक सेवा आयोग को दी है।
स्मरणीय है कि वर्तमान में लोक सेवा आयोग के सदस्यों /अध्यक्ष की नियुक्ति के लिये सरकार ने कोई मानक तय नहीं कर रखे हैं। इन पदों को विज्ञापित करके इनके लिये कोई आवेदन नही मंगवाये जाते है और न ही इन्हें चयन के लिये किसी साक्षात्कार बोर्ड के सामने आना पड़ता है। इनकी नियुक्तियां एकदम सरकार की ईच्छा पर निर्भर करती हैं। ऐसे में यह धारणा बनना स्वभाविक है कि इन लोगों पर इन्हें नियुक्त करने वाली सरकार का प्रभाव तो रहेगा ही। लोक सेवा आयोग एक ऐसा संस्थान है जो प्रदेश की शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं एचए एस, एच पी एस, एच एफ एस और एच जे एस के लिये सदस्यों का चयन करता है। ऐसे में यह सवाल उठना भी स्वभाविक है कि जिन लोगों ने ऐसी वरिष्ठ सेवाओं के लिये चयन करना है उनका अपना चयन कैसे होना चाहिये? क्योंकि सेवा आयोग का सदस्य लग जाने के बाद उसके व्यक्ति को हटाने का अधिकार उस राज्यपाल के पास भी नही रह जाता है जिसने उसे नियुक्त किया होता है। इन पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को हटाने का अधिकार केवल राष्ट्रपति के पास है लेकिन उसके लिये भी सर्वोच्च न्यायालय से जांच करवाकर उसकी संस्तुति लेना आवश्यक है अन्यथा इन्हें नीयत समय से पहले हटाने का कोई प्रावधान नही है।
लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति का आधार क्या हो इस पर संविधान में कोई स्पष्ट रूप से कुछ नही कहा गया है। यह लोग सरकार के प्रभाव से दूर रहे हैं इसके लिये यह बंदिश तो लगा रखी है कि आयोग छोड़ने के बाद यह लोग केन्द्र या राज्य सरकार में कोई पद स्वीकार नही कर सकते हैं। इस तरह लोक सेवा आयोग के सदस्यों /अध्यक्ष का चयन अपने में एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो जाता है। क्योंकि इस समय जिस तरह से डा. रचना गुप्ता के खिलाफ यह आपराधिक मानहानि का मामला सामने आया है इससे एक दम स्थिति बदल जाती है। जब सदस्यों के चयन के लिये कोई प्रक्रिया या मानक पहले से तय ही नही है तो ऐसे में किसी आपराधिक मामले का सदस्य के खिलाफ लंबित होने का वैधानिक प्रभाव क्या होगा? अब जब राज्यपाल को इस विषय में एक पत्र जा चुका है तो उस पर राजभवन की प्रतिक्रिया क्या रहती है यह देखना रोचक होगा।
स्मरणीय है कि पंजाब लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति का जो मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया था उस पर 15 फरवरी 2013 को आया फैसला महत्वपूर्ण हो जाता है। इस मामले में इन नियुक्यिों के लिये क्या आधार रहने चाहिये इस पर विस्तार से चर्चा की गयी है। जस्टिस ए. के. पटनायक और जस्टिस मदन वी लोकूर की खण्डपीठ में इस संबंध में जस्टिस पटनायक ने कहा है कि I, therefore, hold that even though Article 316 does not specify the aforesaid qualities of the Chairman of a Public Service Commission, these qualities are amongst the implied relevant factors which have to be taken into consideration by the Government while determining the competency of the person to be selected and appointed as Chairman of the Public Service Commission under Article 316 of the Constitution. Accordingly, if these relevant factors are not taken into consideration by the State Government while selecting and appointing the Chairman of the Public Service Commission, the Court can hold the selection and appointment as not in accordance with the Constitution. To quote De Smith’s Judicial Review, Sixth Edition: “If the exercise of a discretionary power has been influenced by considerations that cannot lawfully be taken into account, or by the disregard of relevant considerations required to be taken into account (expressly or impliedly), a court will normally hold that the power has not been validly exercised. (Page 280) इसी में जस्टिस लोकूर ने कहा है In the view that I have taken, there is a need for a word of caution to the High Courts. There is a likelihood of comparable challenges being made by trigger-happy litigants to appointments made to constitutional positions where no eligibility criterion or procedure has been laid down. The High Courts will do well to be extremely circumspect in even entertaining such petitions. It is necessary to keep in mind that sufficient elbow room must be given to the Executive to make C.A. No. 7640 of 2011 constitutional appointments as long as the constitutional, functional and institutional requirements are met and the appointments are in conformity with the indicators given by this Court from time to time.
Given the experience in the making of such appointments, there is no doubt that until the State Legislature enacts an appropriate law, the State of Punjab must step in and take urgent steps to frame a memorandum of procedure and administrative guidelines for the selection and appointment of the Chairperson and members of the Punjab Public Service Commission, so that the possibility of arbitrary appointments is eliminated. अब एक मामला लोक सेवा आयोग के सदस्यों को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय में भी लंबित चल रहा है। राज्य सरकार ने 2013 में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद अब तक इस संद्धर्भ में कोई कदम नही उठा रखें हैं। अब देखना यह है कि राज्यपाल को आयी इस शिकायत और उच्च न्यायालय में मामला लंबित होने के चलते सरकार क्या कदम उठाती है।





शिमला/शैल। सरकार प्रदेश में एक लाख करोड़ का औद्यौगिक निवेश लाने का स्वप्न देख रही है। इसके लिये दस हजार बीघे का लैण्ड बैंक भी बना लिया गया है। इसी के साथ केन्द्र द्वारा एक समय घोषित 69 राष्ट्रीय राजमार्गों की डीपीआर भी शीघ्र ही तैयार कर लिये जाने का दावा भी सरकार ने किया है। स्वभाविक है कि यह डीपीआर तैयार होने के बाद इन राजमार्गों के निर्माण का काम भी शुरू हो जायेगा। सैंकड़ों उद्योगों के साथ एमओयू साईन होने के बाद इनका निर्माण कार्य भी शुरू होगा।
इस समय एनजीटी के फैसले के तहत प्रदेश में कहीं भी अढ़ाई मंजिल से अधिक निर्माण नही किया जा सकता। सरकार इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय गयी हुई है लेकिन वहां से अभी तक कोई राहत की खबर नही मिली है। पूरा प्रदेश भूकंप के जोन चार और पांच में है। इसी वर्ष प्रदेश के विभिन्न भागों से पांच बार भूकम्प के झटके आ चुके हैं। भूकम्प के इस खतरे को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय से राहत मिलने की उम्मीद नहीं के बराबर है।
शिमला-कालका फोरेलन का निर्माण प्रदेश के विकास का एक बड़ा आईना है। हजारों करोड़ के इस प्रौजैक्ट का काम कब पूरा होगा यह कहना आज असंभव हो गया है। क्योंकि जिस तरह से इस मार्ग पर भूस्ख्लन से जगह- जगह खतरे पैदा हो गये हैं उससे सैंकड़ों करोड़ का नुकसान अबतक इसमें हो चुका है। कई -कई घन्टों तक इस पर यातायात बन्द रखना पड़ रहा है। इस फोरलेन को लेकर लोग उच्च न्यायालय का दरवाजा तक खटखटाने की सोच रहेे हैं लेकिन इस निर्माण ने एक गंभीर सवाल यह तो खड़ा कर ही दिया है कि क्या प्रदेश में विकास के लिये इस तरह की कीमत चुकाना पर्यावरण की दृष्टि से कितना जायज़ होगा।
(कैथलीघाट व वाकनाघाट के बीच) (जाबली के पास) (कुमारहट्टी के पास)

(डगशाई के पास) (धर्मपुर से सनवारा के बीच) (क्यारीघाट व कण्डाघाट के बीच मे)