शिमला/शैल। भाजपा प्रदेश के दोनों उप चुनाव जीत गयी है लेकिन इस जीत के बाद यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इन चुनाव परिणामों पर जय राम सरकार को सही में खुश होना चीहियेया उसे आत्म मंथम करना चाहिये। क्योंकि इसी सरकार ने पांच माह पहले हुये लोकसभा चुनावो में प्रदेश की चारों सीटों पर रिकार्ड तोड जीत दर्ज की थी। इसी जीत के दम पर यह उप चुनाव बीस-बीस हजार से अधिक की बढ़त के साथ जीतने का दावा किया था। बल्कि गुप्तचर ऐजैन्सीयों ने भी शायद इसी तरह का आकलन सरकार को परोसा था। इसी तर्ज पर प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री पवन राणा ने हमीरपुर में पार्टी की एक बैठक में यह फैसला सुनाया था कि संगठन ने पचास से कम आयू के कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। पवन राणा के इसी ऐलान के परिणाम स्वरूप दोनों जगह युवाओं को तहरीज दी गयी। अब जो परिणाम आये हैं वह इन सब दावों की हवा निकालने वालें हैं बल्कि चर्चाएं तो यहां तक हैं कि यदि कांग्रेस में आपसी फूट नही होती और वह गंभीरता से इस उप चुनाव को लेती तो शायद परिणाम कुछ और ही होते।
इस परिदृश्य में यदि प्रदेश के राजनितिक परिदृश्य में उपचुनाव का आकलन किया जाये जो यह सपष्ट है कि 2022 मे भाजपा और जय राम के लिये राहें आसान नही होंगी। क्योंकि पिछले दिनों कांगड़ा की भाजपा राजनिति के अन्दर संगठन मंत्री पवन राणा और ज्वाला मुखी के विधायक रमेश ध्वाला को लेकर जो अलग-अलग ध्रुव खडे हुये थें उनका राजनितिक प्रतिफल उपचुनाव के परिणमों के बाद अपना रंग दिखाने की तैयारी में है।भाजपा के भीतरी सुत्रों की माने तो धर्मशाला मे जो समर्थन पार्टी के बागी राकेश चौधरी को मिला है उसके लिये कांगड़ा से ताल्लुक रखने वाले पार्टी के तीन चौधरी नेताओं रमेश धवाला सरवीण चौधरी और संजय चौधरी की जबाव तल्वी की जा रही है। इसी तरह का खेल पच्छाद मे भी खेलने की तैयारी की जा रही है। इस खेल के परिणाम क्या होंगे यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यह तय है कि जहां संगठन ने युवा नेतृत्व का आगे उभारने का फैसला लिया है वहीं पर उसे इस चुनाव में लोक सभा के अनुपात में बहुत कम अन्तर से जीत की समीक्षा करके इसकी जिम्मेदारी केन्द्र या राज्य सरकार किसी एक पर तो डालनी ही होगी। क्योंकि केन्द्र के कारण ही प्रदेश में सरकार बन पायी थी। फिर लोस चुनाव से पहले घटे पुलवामा और बालाकोट के कारण प्रदेश की चारों लोकसभा सीटें भाजपा को इतने बडे़ अन्तराल से मिल पायी हैं। लेकिन अब इन उपचुनावों में तो राज्य सरकार के कामकाज का आकलन जनता के लिये एक आधार बनता ही है और इस पैमाने पर राज्य सरकार अपनी सफलता का कोई दावा नही कर सकती है। बल्कि आने वाले दिनों में यदि पार्टी के भी तर यह सवाल भी खड़ा हो जाये कि क्या वर्तमान नेतृत्व के साये में 2022 पार्टी के लिये सुरक्षित हो सकता है या नही तो कोई आश्चर्य नही होना चाहिये।
अभी सरकार के दो मंत्री पद भरे जाने हैं। इन पदों को भरने के लिये परफारमैन्स के पैमाने की बाते अब फिर उठनी शुरू हो गई हैं। इस परफारमैन्स के आईने में यह सपष्ट है कि यदि पच्छाद में उपचुनाव की कमान आई पी एच मंत्री ठाकुर महेन्द्र सिंह न संभालते तो यहां पर जीत संभव नही हो पाती।यह महेन्द्र सिंह ही थे जिन्होने हर रोज आचार संहिता उल्लंघन की शिकायते सहते हुये भी अपनी कार्यप्रणाली नही बदली। ऐसे मे सिरमौर से मंत्री पद का दावा उनकी संस्तुति के बिना आगे नही बढ़ पायेगा यह तह है। इसी तरह धर्मशाला में उप चुनाव की कमान स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार के पास थी। वहां पर परमार के साथ राकेश पठानिया ने भी सक्रीय भूमिका निभायी है। लेकिन इस सब के बाद भी धर्मशाला में जीत का अन्तर वह नही रह पाया जिसका दावा किया जा रही था। अब यदि धर्मशाला के लिये चौधरी नेताओं की संभावित जवाब तल्वी सही में ही हो जाती है तब पार्टी के अन्दर कई और सच सामने आयेंगे। इस जवाब तल्वी के साथ ही कांगड़ा से मंत्री पद के दावे पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े हो जायेंगे। इसी के साथ यह सवाल भी चर्चा मे आयेगा कि पार्टी से बगावत करके निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले राकेश चौधरी और दयाल प्यारी को क्या पार्टी कुछ बड़ें नेताओं का आर्शीवाद तो हासिल नही था। क्योंकि जितने वोट यह विद्रोही केन्द्र और राज्य सरकार दोनों का विरोध सहते हुये ले गये हैं उससे प्रमाणित हो ही जाता है कि पार्टी में निष्ठा से काम करने वालों के लिये कोई जगह नही रह गयी है निष्ठा का स्थान जब नेतृत्व के गिर्द परिक्रमा ले लेती है तब ईमानदार कार्यकर्ता के पास बगावत के अतिरिक्त और कोई विकल्प शेश नही रह जाता है।
अब इन उपचुनावों के बाद दो मंत्री पदो ंके साथ ही विभिन्न निगमों बोर्डों में भी ताजपोशियां होनी है। इनमें यह सामने आ जायेगा कि पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को कहां क्या स्थान हासिल हो पाता है। फिर जो लोग एक समय हिलोपा और आम आदमी पार्टियों में चले गये थे उनकी वापसी तो भाजपा में हो गई है लेकिन भाजपा का वरिष्ठ कार्यकर्ता होने के सम्मान के अतिरिक्त उन्हे अभी तक कुछ भी हासिल नही हो पाया है। ऐसे में कांग्रेस आदि के जिन नेताओं के भाजपा मे शामिल होने की परोक्ष /अपरोक्ष चर्चा चली थी और इस चर्चा के संकेत एक समय पार्टी अध्यक्ष सतपाल सती तक ने दे दिये थे अब उनकी भूमिका और रिश्ते भाजपाके साथ क्या मोड़ लेते हैं यह देखना भी दिलचस्प होगा। ऐसे में इस उपचुनाव के परिणाम प्रदेश भाजपा के लिये कई ऐसे सवाल खड़े कर गये हैं जिनके उतर तलाशना आसान नही होगें।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश बिजली बोर्ड की कर्मचारी यूनियन ने राज्य सरकार को एक पत्रकार वार्ता के माध्यम से सीधी चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगे न मानी गयी तो बोर्ड के दस हजार कर्मचारी प्रदेश सचिवालय का घेराव करने को बाध्य हो जायेंगे। बोर्ड कर्मचारी इस घेराव के रास्ते पर आने के लिये तब विवश हुए हैं जब मुख्यमन्त्री उनके सम्मेलन में आने का न्योता स्वीकार करने के बाद भी नहीं पहुंचे। स्वभाविक है कि यदि मुख्यमन्त्री इस सम्मेलन में पहुंच जाते तो यह कर्मचारी उनके सामने अपनी मांगो के साथ-साथ बोर्ड के भीतर की असली तस्वीर
भी उनके सामने रखते जिसे शायद प्रबन्धन सार्वजनिक नहीं होने देना चाहता है।
कर्मचारी यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह खरबाड़ा ने बोर्ड केअध्यक्ष ई0 जेपी काल्टा को तुरन्त उनके पद से हटाने की मांग की है। स्मरणीय है कि बोर्ड अध्यक्ष अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद भी इसी पद पर बने हुए हैं। यूनियन ने आरोप लगाया है कि अध्यक्ष राजस्व की उगाही में भी पूरी तरह से विफल रहे हैं और उनके कार्यकाल में बोर्ड में भ्रष्टाचार अपने चरम सीमा पर पहुंच चुका है। भ्रष्टाचारियों को सजा देने के स्थान पर उन्हे संरक्षण दिया जा रहा है। राजस्व की उगाही का एक बड़ा खुलासा सोलन में सामने आया है जहां पर 29,81,869.95 पैसे के बिजली के बिलों का भुगतान लम्बे समय से लटका हुआ है लेकिन यह भुगतान न होने पर भी इनके बिजली कनैक्शन नहीं काटे जा रहे हैं।
यूनियन ने यह भी आरोप लगाया है कि फील्ड मे काम कर रहे कर्मचारियों को आवश्यक उपकरणों के बिना काम करना पड़ रहा है जिसके कारण दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही है। पिछले दो वर्षों में ही इन उपकरणों की कमी के कारण 50 से अधिक दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। लेकिन प्रबन्धन को इन हादसों की कोई चिन्ता नही है। कर्मचारी यूनियन ने बोर्ड में खाली पड़े 7000 पदों को शीघ्र भरने और निजिकरण को तुरन्त बन्द करने की मांग की है। बोर्ड में पिछले दिनों 48 श्रेणियों के कर्मचारियों के वेतन मान कम किये जाने पर कड़ा रोष जताते हुए इसे तुरन्त प्रभाव से बहाल करने की मांग की है। कर्मचारी 2003 के बाद भर्ती किये कर्मचारियों के लिये भी पुरानी पैन्शन योजना बहाल किये जाने की मांग कर रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि कर्मचारियों की मांगो का समय रहते हल न किया गया तो यह आन्दोलन 1990 के शान्ता कुमार के कार्यकाल में हुए बड़े आन्दोलन का कारण बन जायेगा क्योंकि आऊट सोर्स कर्मचारी वीरभद्र सरकार के समय से ही अपने लिये सीधी सरकारी नौकरी की मांग करते आ रहे हैं और आज भी वह बड़े संघर्ष के लिये तैयार है।
शिमला/शैल। प्रदेश विधानसभा की दो सीटों के लिये हुए उपचुनावों के परिणाम भविष्य की राजनीति पर निर्णायक प्रभाव डालेंगे यह तय है क्योंकि लोकसभा चुनावों के छः माह के अन्दर ही यह उपचुनाव आ गये हैं। इन उपचुनावों में जहां जयराम सरकार के अब तक के कामकाज पर लोग फतवा देंगे वहीं पर इस बात की भी परख हो जायेगी कि इन छः महीनों में मोदी सरकार के प्रभाव में कितनी कमी या बढ़ौत्तरी हुई हैं। इसी के साथ जनता की सामान्य समझ का भी पता चल जायेगा कि विपक्षी नेतृत्व के अभाव में उसे अपने तौर पर राष्ट्रीय और प्रादेशिक मुद्दों की कितनी समझ आ पायी है।
उपरोक्त संद्धर्भ में यदि इस उपचुनाव की समीक्षा की जाये तो सबसे पहले जयराम सरकार के अब तक के कामकाज का सवाल आता है। प्रदेश सरकार ने जब सत्ता संभाली थी तब उसे किस तरह की आर्थिक विरासत मिली थी उसको लेकर यह सरकार कोई श्वेतपत्र प्रदेश की जनता के सामने नही रख पायी है। इसलिये आज यह सरकार खराब आर्थिक स्थिति का कोई कवर नही ले सकती है। अब अगर सरकार की आर्थिक सेहत की बात की जाये तो सरकार केवल कर्ज के सहारे ही चली हुई है। हर माह सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा है यह तथ्य विधानसभा सत्रों में इस संद्धर्भ में पूछे गये सवालों के जवाबों से हर बार सामने आ चुका है और शैल यह आंकड़े हर बार अपने पाठकों तक पहुंचाता रहा है। आर्थिक स्थिति के बाद यदि रोजगार की उपलब्धता की बात की जाये तो प्रतिवर्ष जितने सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत हुए हैं उतने उनके स्थान पर नये भर्ती नही हो पाये हैं। जो भी थोड़ा बहुत रोजगार दिया गया है वह आऊट सोर्स के माध्यम से दिया गया है और उसमें यहां तक आरोप लग चुके हैं कि सरकार के मन्त्री तक आऊट सोर्स के ऐजैन्ट बने हुए हैं। प्रदेश विश्वविद्यालय और राज्य बिजली बोर्ड इसके सबसे बड़े प्रमाण के रूप में सामने हैं। सरकार के विभागों की परफारमैन्स का अन्दाजा इसी से लग जाता है कि शिक्षा विभाग में मेधावी बच्चों को यह सरकार अब तक लैपटाॅप नहीं दे पायी है। यही नहीं बच्चों को दी जाने वाली मुफ्त बर्दी की भी यही कहानी है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन में जिलावार जो रैंकिंग स्वयं अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य ने पत्रकारों के सामने रखी है उसमें मुख्यमन्त्री के अपने जिले की रैंकिंग से ही पता चल जाता है।
लोक निर्माण विभाग मुख्यमन्त्री के अपने पास है। सरकार प्रदेश में तीन मैडिकल काॅलिजों का निर्माण करवा रही है लेकिन यह निर्माण कार्य अपने लोक निर्माण विभाग से न करवा कर केन्द्र सरकार के उपक्रमों से करवाया जा रहा है और उसमें खुली टैण्डर प्रक्रिया को सरकारी उपक्रम के नाम पर नजरअन्दाज कर दिया गया है जबकि प्रदेश सरकार के अपने निर्देशों और उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तथा सीबीसी के निर्देशों के अनुसार ऐसा नहीं किया जा सकता। केन्द्रिय उपक्रमों की कार्यशैली का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिलासपुर के बन्दला में हाईड्रो कालिज का निर्माण किया जा रहा है इसके लिये भारत सरकार ने पैसा दिया है और सचिव तकनीकी शिक्षा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी हुई है। इस निर्माण के लिये जब निविदायें आमन्त्रित की गयी तब भारत सरकार के उपक्रम एनपीसीसी ने इसमें भाग लिया और उसके रेट कम होने से काम उसको आवंटित हो गया। लेकिन जब आगे एनपीसीसी ने ठेकेदारों से इसके लिये निविदायें मांगी तो इस केन्द्र के उपक्रम ने न्यूनतम दर 92 करोड़ को नजरअन्दाज करके 100 करोड़ की दर वाली कंपनी को काम दे दिया और टैण्डर आवंटन में ही प्रदेश सरकार को आठ करोड़ का चुना लग गया। संवद्ध प्रशासन के संज्ञान में है यह सबकुछ लेकिन इस पर कोई कारवाई नही हो रही है। मान जा रहा है कि मैडिकल कालिज के निर्माण में भी इसी तरह का कुछ घट सकता है। इस प्रकरण से सरकार के खिलाफ विभिन्न वायरल हुए पत्रों के माध्यम से भ्रष्टाचार के जो आरोप अब तक लगे हैं उन्हें स्वतः ही प्रमाणिकता हासिल हो जाती है।
प्रशासनिक स्तर पर तो अधिकारियों के करीब हर माह हो रहे तबादलों का रिकार्ड सबकुछ ब्यान कर देता है। शायद इसी प्रशासनिक परामर्श के कारण सरकार इस पूरे साल इन्वैस्टर मीट क माध्यम से निवेश जुटाने के प्रयासों में लगी हुई है। इसी सरकार के कार्यकाल में कितना निवेश सही में आ पाता है इसका पता तो आने वाले समय में ही लगेगा। जबकि अब तक केन्द्र द्वारा घोषित राष्ट्रीय उच्च मार्ग अभी तक कोई शक्ल नहीं ले पाये हैं। ऐसे कई और उदाहरण हैं। इसलिये इस परिदृश्य में हुए इन उपचुनावों के परिणाम प्रदेश के भविष्य की राजनीति को प्रभावित करेंगे यह तय है। क्योंकि केन्द्र सरकार का धारा 370 हटाना और तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं को निजात दिलाना, मंहगाई और बैंकिंग क्षेत्र पर आये संकट के साये तले बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं रह जाते हैं। इसलिये इन उपचुनावों के बाद नड्डा, अनुराग और जयराम के नाम से उभरे तीनों सत्ता केन्द्रों में संघर्ष का शुरू होना अवश्यंभावी है। फिर इस उपचुनाव में जिस तरह से शांता कुमार के पुतले तक जलाने और उनके धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाने को लेकर आये ब्यान से राजनीतिक विवाद उभरा है उसकी भी प्रभावी भूमिका रहेगी यह तय है। इसलिये यह चुनाव परिणाम मुख्यमन्त्री की राजनीतिक सेहत पर सीधा प्रभाव डालेंगे यह स्पष्ट है।
शिमला/शैल। राजीव गांधी पंचायती राज संस्थान के संयोजक दीपक राठौर ने कहा कि प्रदेश की सेब बागवानी खतरे में है अगर समय रहते उचित कदम न उठाये गये तो प्रदेश के बागवानों को इसका खामियाजा भुगतना पडेगा। प्रदेश की चार हजार करोड़ की आर्थिकी सेब पर आधारित है इसके बावजूद प्रदेश के बागवानों को इस बार सेब की दस साल पुरानी किम्मतें ही मिल पा रही हैं। जबकि बागवानी विभाग ने इस वर्ष सेब की चार करोड़ पेटीयां होने का अनुमान
लगाया गया था जिसमें से अभी तक ढाई करोड़ पेटीयां भी बाजार में नही उतर पायी है। इससे यह साफ हो जाता है कि इस बार सेब की बम्मपर फसल नही हो पायी है। राठौर ने बताया सेब बागवानों की समस्या को जानने के लिये हमने एक छः सदस्यीय कमेटी का गठन किया था जिसने गावों में जाकर सेब बागवानों, आढ़तीयों और लदानीयों से मिलकर उनकी समस्याओं को जाना और उसके आधार पर सरकार के समक्ष अपनी मांगे रखी। जिसमें 5-5 ग्राम पंचायतों के लिये एक कोल्ड स्टोर बनाया जाये और कोल्ड स्टोर की देखभाल कारपोरेट सोसायटी के हाथों में दी जाए। प्रदेश सरकार सेब बागवानों को उनकी फसल के उचित मूल्य दिलवाने के लिये ठोस कदम उठाये। सरकार घटीया स्प्रे विक्रेताओं पर निगरानी रखें और प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा फूड प्रोसैसिन्ग यूनिट लगाये जिसका सीधा फायदा बागवान को मिल सके। सरकार आधुनिक सुविधाओं वाली आढ़त एक छत के नीचे प्रदान करे जिसका लाभ व्यापारी और बागवान उठा सकें। अगर सरकार ने जून तक इन सभी मांगो की सुनवाई नही की तो प्रदेश के सेब बागवानों द्वारा जन आन्दोलन छेड़ा जायेगा।
शिमला/शैल। देश में 442 विधानसभा सीटों के लिये चुनाव हो रहा है जिसमें 288 सीटें महाराष्ट्र और 90 सीटें हरियाणा विधानसभा की हैं। शेष 64 सीटों पर विभिन्न राज्यों में उपचुनाव हो रहे हैं। इन्ही में हिमाचल की भी दो सीटें पच्छाद और धर्मशाला में उपचुनाव हो रहा है। लोकसभा में 303 सीटों का आंकड़ा हासिल करने वाली भाजपा के लिये यह चुनाव शायद एक नयी चुनौती बन गये हैं क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमितशाह इन्हे तीन तलाक और धारा 370 को हटाये जाने की उपलब्धि के गिर्द केन्द्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की विपक्ष को यह चुनौती की यदि उसमें साहस है तो धारा 370 फिर से लगाने की घोषणा करें। विपक्ष मोदी-शाह की इस चुनौती का कैसे और क्या जवाब देता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन मोदी की यह चुनौती विपक्ष से ज्यादा आम आदमी की समझ और उसके धैर्य के लिये भी एक कसौटी होगा। क्योंकि आर्थिक मंदी में नौकरियों पर मण्डराता खतरा और प्याज-टमाटर के बढ़ते दामों का तीन तलाक और धारा 370 से परोक्ष/अपरोक्ष में कोई वास्ता नही है।
यह चुनाव विधानसभा के लिये हो रहे हैं इस नाते इन चुनावों में राज्य सरकारों की कारगुजारी की समीक्षा ही मुख्य मुद्दा रहना चाहिये। इस परिप्रेक्ष में यदि प्रदेश की दोनों सीटों का आकलन किया जाये तो सबसे पहले यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनांे ही सीटों पर भाजपा अपने विद्रोहीयों को चुनाव मैदान से हटाने में सफल नही हो पायी है। भाजपा के इन विद्रोहीयों के कारण दोनांे जगह मुकाबला तिकोना हो गया है। भाजपा को इस उपचुनाव में विधानसभा अध्यक्ष को प्रचार में उतारना पड़ा है। इसको लेकर चुनाव आयोग नोटिस तक जारी कर चुका है। मुख्यमन्त्री विधानसभा अध्यक्ष का बचाव करने को मजबूर हो गये हैं। इसी के साथ जो शान्ता कुमार सक्रिय राजनीति से सन्यास की घोषणा कर चुके हैं उन्हे भी अब चुनाव प्रचार में उतारा गया है। पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद धूमल जिस तरह से हाशिये पर धकेल दिये गये थे वह जंजैहली प्रकरण से लेकर अब अनुराग ठाकुर की प्रदेश यात्राओं के दौरान भाजपा के एक बड़े वर्ग का उनकी सभाओं से दूरी बनाये रखना बहुत कुछ ब्यान कर देता है। इसके बावजूद भी धूमल चुनाव प्रचार में उतर गये हैं।
लेकिन अभी इन्ही चुनावों में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर प्रदेश में जिस बड़े अन्दाज में लेकर आये उस अन्दाज की हवा बिलासपुर और मण्डी की सभाओं में पूरी तरह निकल कर बाहर आ गयी है। क्योंकि इन दोनों ही स्थानों पर जनता की हाजिरी आशाओं से कहीं बहुत कम थी। बिलासपुर नड्डा का अपना घर था तो मण्डी मुख्यमंत्री का अपना घर था। मण्डी की दसों सीटों पर भाजपा को जीत हासिल हुई है इसलिये यहां नड्डा की रैली के लिये पचास हजार की भीड़ का लक्ष्य रखा गया था। मण्डी के जिस सेरी मंच पर यह आयोजन रखा गया था वह मंच तो 3500 लोगों के साथ ही भर जाता हैै लेकिन जो तस्वीरें बाहर आयी हैं उनमें मंच पर भी खाली जगह रही है। मण्डी में हाजिरी का कम होना क्या किसी तय योजना का हिस्सा था या जनता के मोह भंग का संकेत है इसको लेकर कई चर्चाएं चल निकली हैं। लेकिन यह सभांए निश्चित रूप से राष्ट्रीय अध्यक्ष की गरिमा से कहीं कम थी। शायद इसी कारण नड्डा कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार अपने प्रदेश में आने पर न ही तो पत्रकार वार्ता करके गये और न ही उपचुनावों में कोई जनसभा करके गये।
ऐसे में इन उपचुनावों में सरकार के पास उपलब्धि के रूप में इन्वैस्टर मीट के माध्यम से 77000 करोड़ से अधिक के निवेश के आश्वासनों के समझौता ज्ञापनों से हटकर कुछ नही है। इन्वैस्टर मीट में हुए एम ओ यूज पर नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोाी ने सरकार से श्वेत पत्र जारी करने की मांग करके एक बहुत बड़ी चुनौतीे खड़ी कर दी है। क्योंकि सरकार ने यह निवेश जुटाने के लिये निवेशकों को जिस तरह की सुविधायें प्रदान करने और इसके लिये जिस हद तक नियमों का सरलीकरण करने की बात की है उससे भविष्य में प्रदेश के लिये ही कई समस्यांए खड़ी हो जाने की आशंका है। क्योंकि पर्यावरण को लेकर जिस स्तर की चिन्ताएं एन.जी.टी. से लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय जाहिर कर चुके हैं उनके परिदृश्य में यह शंकाएं बढ़ जाती हैं। स्की विलेज परियोजना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसी के साथ अभी जो एसजेवीएनएल के साथ 18165 करोड़ के एमओयू साईन किये गये हैं उसमें सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि एसजेवीएनएल तो राज्य सरकार का हीे एक पीएसयू है। हिमाचल सरकार इसमें भागीदार है। फिर लूहरी और सुन्नी की परियोजनाओं पर तो यह उपक्रम एक दश्क से काम कर रहा है और धौला सिद्ध भी इसे 2011 में आबंटित हो गया था। ऐसे में इन्हंे नये एमओयू के रूप में प्रचारित करने का कोई औचित्य नही रह जाता है। इसी कड़ी में मुकेश अग्निहोत्री ने सरकार से पूछा है कि उन 63 राष्ट्रीय उच्च राजमार्गों का क्या हुआ है जिसकी घोषणा बड़े पैमाने पर नितिन गडकरी ने की थी और इस संद्धर्भ में नड्डा को लिखा पत्र भी मीडिया को जारी किया गया था। माना जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष द्वारा श्वेत पत्र की मांग सरकार के समीकरणों को बिगाड़ सकती है।