Saturday, 17 January 2026
Blue Red Green

ShareThis for Joomla!

हाईड्रो सैक्टर में जो राहतें सरकारी कंपनीयों को दी गयी है क्या वह प्राईवेट निवेशकों को भी मिलेंगी

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने प्रदेश में निवेश जुटाने के लिये 27 विद्युत परियोजनाओं के लिये निजि क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के साथ अनुबन्ध साईन किये हैं। निजि क्षेत्र में जिन परियोजनाओं को हस्ताक्षरित करके उन्हें जमीन भी लीज पर दे दी गयी है उनमें चम्बा में पांच, शिमला में दो, कुल्लु एक, मण्डी एक, किन्नौर एक और कांगड़ा में छः परियोजनायें हैं। इन सभी परियोजनाओं को जमीन की लीज 40 वर्षों के लिये दी गई है। जबकि सरकारी उपक्रमों एनटीपीसी, एस जे वी एन एल और एन एच पी सी को जमीन कुछ को 70 वर्षों के लिये तो कुछ को आजीवन दे दी गयी है।
विद्युत परियोजनाओं से प्रदेश सरकार को अपफ्रन्ट प्रिमियम प्रति मैगावाट के हिसाब से मिलता था। इसकी दर दस लाख प्रति मैगावाट से लेकर 40 लाख तक रही है। इसी के साथ 12% फ्री पाॅवर भी बतौर रायल्टी मिलती थी जो कुछ समय बाद 18% और फिर 30% हो जाती थी। प्रदेश मे लगने वाली योजनाओं के लिये यह शर्त है कि योजना की प्रकिया का पहला कदम उत्पादित बिजली को खरीदेगा कौन यह सुनिश्चित करना होता है। प्रदेश में खरीद की यह जिम्मेदारी राज्य विद्युत बोर्ड के पास है। बिजली बोर्ड यह बिजली खरीद कर आगे बेचता है। लेकिन परियोजनाओं से तो खरीद का मूल्य उसकी स्थापना से पहले ही तय हो जाता है और अन्त तक वही चलता है। लेकिन बिजली बोर्ड को पिछले काफी अरसे से अपनी बिजली बेचने में कठिनाई आ रही है। क्योंकि अब लगभग हर राज्य बिजली उत्पादन में लग गया है। इससे स्टेज यहां तक आ पहुंची है कि प्रदेश में उत्पादन लागत 4.50 रूपये यूनिट  आ रही है वहीं पर उसकी बेचने की कीमत 2.40 रूपये मिल रही है। सी ए जी ने अपनी  रिपोर्ट में इसका गंभीर संज्ञान लिया है। इससे स्थिति यह पैदा हो गयी थी कि पिछले पांच वर्षों में हिमाचल में हाइड्रो सैक्टर में कोई निवेश नही आया।
निवेशक न आने का परिणाम ही रहा है कि जंगी थोपन पवारी परियोजना आज तक सिरे नही चढ़ पायी। ब्रेकल की असफलता के बाद कोई भी दूसरा निवेशक इसमें आगे नही आ पाया। बल्कि अदानी और अंबानी जैसे बड़े घराने भी इसमें साहस नही दिखा पाये। इसमें ब्रेकल के नाम पर एक समय अदानी ने जो 280 करोड़ निवेशित किये थे उसे वह अभी तक उच्च न्यायालय के दखल के बाद भी वापिस नही मिल पाये हैं। हाईड्रो क्षेत्र में आयी इस स्थिति से निपटने के लिये अब जयराम सरकार ने इस नीति मे ही कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किये हैं। सरकारी क्षेत्र की कंपनीयों के साथ इसी बदली नीति के तहत एमओयू साईन हुये हैं। लेकिन सरकारी कंपनीयों को जो राहतं दी गई है क्या वही सब कुछ नीजि क्षेत्र में भी उपलब्ध हो पायेगा या नही। इसको लेकर स्थिति सपष्ट नही है और इसका प्राईवेट सैक्टर पर क्या प्रभाव पड़ता है और वह निवेश में कितना आगे आ पाता है यह अब चर्चा का विषय बन गया है।


उच्च न्यायालय के फैसले पर तन्त्र की कुण्डली

शिमला/शैल। क्या लोकसेवा आयोग के सदस्यों को पैन्शन का अधिकार नही मिलेगा? यह सवाल प्रदेश सरकार के उस फैसले से चर्चा में आया है जब सरकार ने आयोग के सदस्यों सर्वश्री डा. मान सिंह, प्रदीप सिंह चौहान और मोहन चौहान के इस आश्य के आवेदनों को अस्वीकार कर दिया। सरकार के अस्वीकार के बाद इन लोगों ने प्रदेश उच्च न्यायालय में इस संबंध में एक याचिका दायर कर दी जिसका फैसला 16 अक्तूबर 2019 को इनके पक्ष में आ गया। लेकिन सरकार ने इस फैसले पर अमल करने की बजाये इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का मन बनाया है।
स्मरणीय है कि लोक सेवा आयोग के संद्धर्भ में 1974 में राज्यपाल ने फैसला लिया था "11-A: The Chairman or a Member, who at the date of his appointment as such was not in the service of the Central Government or a State Government, a Local Authority, A University, a Privately Managed Recognized School or Affiliated College or any other body wholly or substantially owned or controlled by the state Government of Himachal Pradesh shall on his ceasing to hold office as Chairman or Member be paid a pension for his life @ Rs. 300/- (Rupees three hundred per month) in the case of Chairman and Rs. 250/- (Rupees two hundred and fifty per month) in the case of Member for each completed year of service as Chairman or Member, as the case may be subject to maximum of Rs. 1800/- (Rupees one thousand one eight hundred) and Rs. 1500/- (rupees one thousand five hundred) per month in the case of Member”. इस फैसले के तहत प्रदेश लोकसेवा आयोग के चेयरमैन रहे ब्रिगेडियर एल एस ठाकुर को आयोग में दी गयी सेवा के लिये पैन्शन लाभ दिया गया था। आयोग का यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय में भी एक संद्धर्भ में पहुंच चुका है और वहां भी इसे बहाल रखा गया था। इसी आधार पर इन सदस्यों ने भी इसके लिये सरकार में आवेदन किया जिसे 19-4-17 को अस्वीकार कर दिया गया और उसके बाद इन्होंने उच्च न्यायानय का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय ने इनकी याचिका एल एस ठाकुर की तर्ज पर स्वीकार कर ली। लेकिन सरकार ने अभी तक इस पर अमल नही किया है और इसकी अपील में जाने का मन बनाया है।
स्वभाविक है कि जब सेवानिवृति के बाद अध्यक्ष नियुक्त हुए ब्रिगेडियर एल एस ठाकुर को यह पैन्शन लाभ मिल सकता तो स्वैच्छिक सेवानिवृति के बाद आयोग के सदस्यों को भी यह लाभ उसी तर्ज पर मिल जाना चाहिये। लेकिन सरकार इन अधिकारियों के मामले को एल एस ठाकुर के मामले से भिन्न मानती है और तीन बार अस्वीकार कर चुकी है। कार्मिक विभाग यह अस्वीकार रैगुलेशन छः के आधार पर कर रहा है लेकिन उच्च न्यायालय के 16 अक्तूबर के फैसले में रेगुलेशन छः का कोई उल्लेख ही नही है। इसलिये सरकार के इस अस्वीकार को अलग ही नजर से देखा जा रहा है। लोक सेवा आयोग में आज तक नियुक्त हुए अध्यक्ष और सदस्य अधिकांश में केन्द्र /राज्य सरकार/ सेना आदि से सेवानिवृत हुए अधिकारी ही नियुक्त हुए हैं और संयोगवश इनकी स्थिति यह रही है कि सेवानिवृति के समय यह पूरी पैन्शन के पात्र रहे हैं। इसलिये इन्हें रैगुलेशन 11। से कोई ज्यादा अन्तर नही पड़ता रहा है। वैसे भी पैन्शन की अवधारणा सामाजिक सुरक्षा की रही है और इसी अवधारणा का सरकार ने ओल्ड एज, अपंग और विधवा आदि सामाजिक पैन्शन की कई योजनाएं लागू की हैं।
1974 में लोक सेवा आयोग के सदस्यों के लिये रैगुलेशन 11। का प्रावधन भी संभवतः ऐसे सदस्यों के लिये किया गया था जो ऐसी नियुक्ति से पूर्व किसी भी तरह की ऐसी सेवा में रहे हों जिन्हें किसी भी रूप में कोई नियमित पैन्शन लाभ मिलता हो। संयोगवश आज तक प्रदेश लोक सेवा आयोग में शायद ऐसे चार-पांच लोग ही सदस्य नियुक्त हो पाये हैं जो ऐसी किसी सेवा में नही थे। इस समय भी लोकसेवा आयोग में एक ही ऐसी सदस्या हैं डा़ रचना गुप्ता। इनसे पूर्व के एस तोमर आयोग के अध्यक्ष रहे हैं वह भी किसी ऐसी सेवा से ताल्लुक नही रखते थे। चर्चा है कि इन लोगों ने पिछले दिनों सरकार को इस आश्य का कोई ज्ञापन दिया था और इनके ज्ञापन के बाद ही यह मुद्दा चर्चा और विवाद में आया है इसमें दिलचस्प तो यह है कि 1974 में जो 300 और 250 रूपये प्रतिमाह का प्रावधान किया गया था उसे आज तक रिव्यू ही नही किया गया है जबकि कर्मचारियों की पैन्शन मे मंहगाई भत्तों के अनुसार बढ़ौत्तरी होती है। पड़ोसी राज्य हरियाणा में ऐसे सदस्यों को इसी तर्ज पर पैन्शन मिलती है। इस परिदृश्य में पैन्शन के इस मुद्दे पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।

उच्च न्यायालय ने मैहरा पर प्रतिबन्ध और स्टेट ब्रांच की विस्तृत जांच के दिये आदेश

शिमला/शैल। प्रदेश उच्च न्यायालय ने सीटू नेता विजेन्द्र मैहरा द्वारा नगर निगम शिमला के खिलाफ किसी भी धरना प्रदर्शन में भाग लेने पर रोक लगी दी है यह रोक लगाते हुए उच्च न्यायालय ने यह कहा है कि नगर निगम के किसी भी कार्य निष्पादन में मैहरा कोई बाधा खड़ी नही करेंगे। इस प्रतिबन्ध का आधार नगर निगम के उस शपथपत्र को बनाया गया है जिसमें निगम ने यह आरोप लगाया था कि मैहरा ने 7 दिसम्बर को निगम आयुक्त के कार्यालय में आकर कामकाज में बाधा पहुंचायी और अभद्रता की। इसके लिये उच्च न्यायालय ने मैहरा को शोकाॅज नोटिस भी जारी किया है कि क्यों न उनके खिलाफ अवमानना की कारवाई की जाये। अदालत का प्रतिबन्ध विजेन्द्र मैहरा पर है सीटू पर नहीं, इसलिये उच्च न्यायालय के आदेशों के बाद यह भी धरना प्रदर्शन जारी रहेगा यह स्पष्ट है क्योंकि पूरे सीपीएम ने नगर निगम कि खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भाजपा से पहले नगर निगम पर सीपीएम का कब्जा था इस नाते सीपीएम नेतृत्व को निगम की पूरी जानकारी है।
सीटू का आन्दोलन शहर की तहबाज़ारी समस्या को लेकर है। तहबाजारी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने 2007 में कुछ दिशा निर्देश जारी किये थे। इन निर्देशों के बाद 2014 में स्ट्रीक वैन्डरज एक्ट बना। इस समय पूरे देश में स्थानीय निकाय इस एक्ट की अनुपालना सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं शिमला में भी इसी एक्ट की अनुपालना किये जाने को लेकर तहबाजारी धरना प्रदर्शन करने को बाध्य हुए है और इनका नेतृत्व सीपीएम का सीटू कर रहा है। उच्च न्यायालय में दायर अपने शपथपत्र में  नगर निगम ने स्वीकारा है कि अभी तक  केवल 168 तहबाजारीयों की सूची को ही अन्तिम रूप दिया जा सका है और 1065 अभी शेष हैं। सीटू का आरोप है कि तह बाजारीयों की संख्या 599 थी जिसे बढ़ाकर 1065 कर दिया गया और इसी में घपला हुआ है। इसी संबंध में सीटू का प्रतिनिधि मण्डल 7 दिसम्बर को आयुक्त से मिलने गया था। इसी मुलाकात में अभद्रता घटी जिसको लेकर सीटू नेताओं विजेन्द्र मैहरा, बाबू राम और किशोर ढटवालिया ने 8 दिसम्बर को पुलिस अधीक्षक शिमला को आयुक्त के खिलाफ एफआईआर दर्ज किये जाने के आग्रह की लिखित शिकायत कर दी। निगम आयुक्त ने उच्च न्यायालय में लंबित चल रहे एक मामले में इस अभद्रता को लेकर शपथपत्र दायर कर दिया जिस पर मैहरा के खिलाफ यह आदेश आया है। नगर निगम ने इसी शपथपत्र में यह भी स्वीकारा है कि निगम की खलीनी स्थित पार्किंग पिछले तीन वर्षों से अवैध रूप से आपरेट हो रही है। उच्च न्यायालय ने इस अवैधता का कड़ा संज्ञान लेने हुए पूरी स्पष्टता से कहा है कि ऐसी अवैधता नगर निगम प्रशासन की मिलीभगत के बिना संभव नही हो सकता। अदालत ने इस संबध में निगम की ऐस्टेट ब्रांच के खिलाफ विस्तृत जांच करके ब्रांच के हर कर्मचारी और विशेषकर अधीक्षक की भूमिका की जांच करने के निर्देश दिये हैं। In the reply filed by the Municipal Corporation, it is not in dispute that the parking at Khalini belonging to the Municipal Corporation was being carried out unauthorisedly for the last about 3 years. Obviously, the same could not have been done without the active connivance of the officials of the Municipal Corporation, more especially, the Estate Branch. Therefore, let the Municipal Corporation conduct a thorough inquiry qua the role of each of the official/officer posted in the said Branch, more particularly, the Superintendent of Estate and submit report by 31.03.2020.  स्वभाविक है कि तीन वर्षों तक ऐसी अवैधता निगम प्रशासन की मिलीभगत के बिना संभव नही हो सकती। सबसे बड़ी हैरानी तो इस बात की है कि तीन वर्षों तक यह अवैधता न तो महापौर और न ही निगम के शीर्ष प्रशासन के संज्ञान में आयी। क्या इस  अवैधता को इन बड़ों का भी संरक्षण प्राप्त था यह अपने में एक अलग जांच का विषय हो जाता है। इसी के साथ यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि जब उच्च न्यायालय ने एस्टेट ब्रांच की जांच करने के आदेश दिये हैं तो क्या प्रशासन अपने स्तर पर भी संबधित दोषियों के खिलाफ कारवाई करेगा।
सीपीएम नेता और निगम के पूर्व महापौर ने इसी पार्किंग को लेकर प्रशासन पर बड़े भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। एक आरोप में निगम में चौदह करोड़ का घपला होने की बात की गयी हैै। सीटू ने अपनी शिकायत में 6 दिसम्बर 2019 को हुई एफआईआर 187/19 का भी संद्धर्भ उठाया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि जब सीपीएम द्वारा लगाये गये आरोपों का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने भी जांच के आदेश दिये हैं तो फिर सीटू के धरना प्रदर्शन को काम में बाधा पहुंचाने की संज्ञा कैसे दी जा सकती है।


जमानत के बाद क्या सक्सेना से ऊर्जा विभाग ले लिया जायेगा

 

शिमला/शैल। आईएनएक्स मीडिया प्रकरण में चिदम्बरम के साथ सह अभियुक्त बने वित्त मन्त्रालय के सभी छः अधिकारियों को अन्ततः इस मामले में जमानत लेनी पड़ी है। इन लोगों को अभी अदालत से अन्तरिम जमानत ही मिली है। अभी यह रैगुलर होना शेष है। इस मामले में हिमाचल सरकार के प्रधान सचिव प्रबोध सक्सेना भी एक सह अभियुक्त हैं क्योंकि वह उस समय वित्त मन्त्रालय में विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड के निदेशक थे। इस प्रकरण में सीबीआई और ईडी दोनों ने मामले दर्ज किये हुए हैं। सीबीआई प्रकरण में चिदम्बरम को जमानत मिल चुकी है और इसका चालान भी ट्रायल कोर्ट में दायर हो चुका है। सीबीआई प्रकरण में इन अधिकारियों को जमानत लेने की आवश्यकता नही पड़ी है।
लेकिन चिदम्बरम सीबीआई के बाद ईडी की हिरासत में चल रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में उनकी जमानत याचिका पर फैसला रिजर्व चल रहा है। चिदम्बरम की जमानत का विरोध सीबीआई और ईडी सबसे अधिक इस पर कर रहे हैं कि वह बाहर निकलकर गवाहों और साक्ष्यों को प्रभावित कर सकते हैं। चिदम्बरम प्रकरण में सहअभियुक्त बने इन अधिकारियों की भूमिका सरकार और सीबीआई तथा ईडी दोनो के लिये महत्वपूर्ण है। अभी तक इन अधिकारियों की ओर से यह नही आया है कि इनके ऊपर कभी चिदम्बरम का दवाब रहा है। अब ईडी प्रकरण में भी यह माना जा रहा है कि चिदम्बरम को जमानत मिल सकती है। इस परिदृश्य मे अब इन अधिकारियों को इस स्टेज पर जमानत की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या इनकी जमानत का ईडी और सीबीआई विरोध करेगी? यदि इन्हें रैगुलर जमानत नही मिलती है तो क्या इनकी गिरफ्तारी होगी? यह सारे सवाल एकदम खडे़ हो गये हैं।
ऐसे में प्रदेश सरकार के लिये एक बड़ा सवाल यह हो जायेगा कि अब अन्तरिम जमानत मिलने के बाद सक्सेना सीधे ओडीआई के दायरे मे आ जाते है। ऐसे अधिकारियों को महत्वपूर्ण संवेदनशील विभागों की जिम्मेदारी नही दी जानी चाहिये ऐसे निर्देश प्रदेश उच्च न्यायालय दे चुका है। इस परिदृश्य में यह चर्चाएं चलना शुरू हो गयी हैं कि क्या सरकार सक्सेना से ऊर्जा विभाग ले लेगी? क्योंकि इसमें अब कई निवेशक आयेंगे और उससे यह संवदेनशील विभाग हो जाता है।

 

साडा के पक्ष में प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड का पत्र सवालों में

शिमला/शैल। पिछले वर्ष ग्रेट खली के रेसलिंग शो के लिये सरकारी तन्त्र द्वारा पैसा जुटाने के प्रयासों के लिये फजीहत झेल चुकी जयराम सरकार की अफसरशाही ने इस बार स्पोर्ट एवम् एण्टी ड्रग ऐसोसियेशन (साडा) द्वारा आयोजित किये गये क्रिकेट मैच के लिये पैसा जुटाने का जिस तरह से प्रयास किया है उससे सरकार की परिपक्वता पर फिर से सवाल उठने शुरू हो गये हैं। खली प्रकरण में यह सरकार के संज्ञान में ला दिया गया था कि रेसलिंग शो सरकार की खेलों की अधिकारिक सूची में नही आता है इसलिये सरकार के नियमों के मुताबिक इस शो के लिये सरकारी धन उपलब्ध नही करवाया जा सकता है। लेकिन इस संज्ञान के बावजूद यह मामला मन्त्रीमण्डल में लाया गया। मन्त्रीमण्डल में इस पर कोई फैसला नही हो पाया और तब यह पैसा जुटाने की जिम्मेदारी मुख्य सचिव और मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव ने ली थी और अन्त में इसमें काफी किरकरी हुई थी।
इस बार कुछ लोगों ने स्पोर्ट एवम् एण्टीड्रग ऐसोसियेशन साडा के नाम से एक एनजीओ का गठन कर लिया। मुख्यमन्त्री को इसका मुख्य संरक्षक बना दिया। एनजीओ बनाने के बाद एक क्रिकेट मैच का आयोजन कर दिया। इस आयोजन में खिलाड़ियों को स्पोर्ट ड्रैस और प्ले किट देनी थी और इसके लिये पैसा चाहिये था। यह पैसा इकट्ठा करने के लिये प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की सेवाएं ली गयी। बोर्ड के सदस्य सचिव ने इसके लिये एक पत्र जारी कर दिया। नियमों के अनुसार किसी भी एनजीओ को इस तरह का आर्थिक सहयोग लेने का पात्र होने के लिये कम से कम तीन वर्ष का समय लग जाता है। समय की पात्रता के बाद भी कोई भी विभाग या उपक्रम अपने स्तर पर तो सहयोग दे सकता है लेकिन अन्य को इसके लिये निर्देश नही दे सकता। इस तरह का निर्देश देना गंभीर अपराध माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ऐसे ही एक मामले में सज़ा दे चुका है उसमें तो रैडक्रास के लिये योगदान लिया गया था।
इस प्रकरण से यह सवाल उभरता है कि क्या मुख्यमन्त्री को अपना नाम इस तरह प्रयोग किये जाने की अनुमति दी जानी चाहिये? जिन लोगों ने एनजीओ का गठन किया क्या उन्हें इससे जुड़े नियमों/कानूनों की जानकारी नही होनी चाहिये थी? क्या मुख्यमन्त्री के कार्यालय को इस तरह की गतिविधियों पर नजर नही रखनी चाहिये? क्योंकि यह स्वभाविक है कि इस तरह के निर्देश जारी करते हुए पत्र लिखना किन्हीं बड़े आदेशों से ही संभव हुआ होगा। इन दिनों वैसे ही भ्रष्टाचार के आरोपों वाले वायरल पत्र एक बड़ा मुद्दा बने हुए हैं। ऐसे में किसी सरकारी उपक्रम द्वारा किसी एनजीओ के पक्ष में इस तरह का पत्र लिखना जिसमें राजनेता और पत्रकार पदाधिकारियों में शामिल हों एक बड़ा विवाद बन जाता है।

Facebook



  Search