शिमला/शैल। पेपर सेटिंग में धूर्तता बरतने का अंदेशा जताते हुए प्रदेश हाईकोर्ट ने पटवारी भर्ती परीक्षा की सीबीआई जांच के आदेश देेेते हुए तीन महीने में जांच रिपोर्ट अदालत को सौंपने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई आठ अप्रैल को निर्धारित की है।
हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति तिरलोक सिंह चैहान व न्यायमूर्ति चंदर भूषण बारोवालिया ने इन आदेशों की प्रती एसपी सीबीआई को फैक्स व रजिस्ट्री के जरिए भेजने के निर्देश दिए है।
जयराम सरकार में पिछले से 1194 पटवारियों की भर्ती के लिए प्रक्रिया शुरू की थी। इनके पदों के लिए हुई पटवारी की परीक्षा में आवेदकों ने तरह-तरह के इल्जा्म लगाए थे। सरकार ने इन पटवारियों की नियुक्ति कर भी दी है लेकिन नवंबर महीने में एक आवेदक ने हाईकोर्ट में इन भर्तियों के खिलाफ याचिका दायर कर दी।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में इल्जाम लगाया था कि पटवारी भर्ती के लिए आयोजित परीक्षा में सौ प्रश्नों में से 43 प्रश्न वही पूछे गए थे जो जेबीटी परीक्षा में भी पूछे गए थे। खंडपीठ ने इस इल्जाम पर जवाब मांगा था लेकिन सरकार ने इस बावत कोई जवाब नहीं दिया। इस पर खंडपीठ ने एक सप्ताह के भीतर पूरक हलफनामा दायर करने के आदेश दिए थे। इन आदेशों की पालना करते हुए लैंड रिकार्ड निदेशालय ने दायर अपने हलफनामें में स्वीरकार किया कि सौ में से 43 प्रश्न वही थे जो जेबीटी परीक्षा में पूछे गए थे। खंडपीठ ने कहा कि यह महज एक संयोग नहीं हो सकता कि प्रश्न बैंक में लाखों प्रश्न होने के बावजूद पहले वाली पारीक्षा में पूछे गए प्रश्न ही किसी दूसरी परीक्षा में पूछ लिए जाएं।
खंडपीठ ने कहा कि अदालत का मानना है कि पटवारी परीक्षा के लिए सेट किए पेपरों में कुछ चिन्हित अभ्यार्थियों को मदद करने की मंशा से कुछ धूर्तता की गई हो। हालांकि अदालत के पास अभी इस बावत कोई निष्कर्ष निकालने के लिए कोई सामग्री रिकार्ड पर उपलब्ध नहीं है। इसलिए ये जरूरी है कि तमाम तथ्यों की जांच सीबीआई करे।
ऐसे में सीबीआई इस आदेश में जो आब्जर्व किया गया है उससे बिना प्रभावित हुए मामले की निष्पक्ष जांच करे। अदालत ने जांच रिपोर्ट को अगली सुनवाई से पहले अदालत में सौंपने के आदेश भी दिए हैं।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने प्रदेश लोकसेवा आयोग की सदस्य समीति मीरा वालिया की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि मीरा वालिया की नियुक्ति पूरी तरह संविधान में तय प्रक्रिया अनुरूप हुई है और उसमें कुछ भी अवैध नही है। स्मरणीय है कि मीरा वालिया की नियुक्ति प्रदेश विधानसभा के लिये दिसम्बर 2017 में हुए चुनावों से बहुत पहले हुई थी लेकिन भाजपा ने 2017 के चुनावों में इसे एक बड़े मुद्दे के रूप में उठाया था और अपने आरोप पत्र में भी इसे प्रमुख स्थान दिया था। भाजपा का आरोप था कि यह नियुक्ति तय नियमों के अनुरूप नही हुई है। बल्कि जब ला स्टूडैण्ट हेम राज ने इसे चुनौती दी थी तब भी यह चर्चा उठी थी कि इस याचिका के पीछे अपरोक्ष में भाजपा नेतृत्व का ही हाथ है। इस परिप्रेक्ष में आज प्रदेश में भाजपा सरकार के कार्यकाल में नियुक्ति वैध ठहराना और इसे चुनौती देने वाले की नीयत पर गैर ईमानदारी की अदालत द्वारा टिप्पणी किया जाना अपने में बहुत कुछ कह जाता है।
गौरतलब है कि संविधान की धारा 316 से लेकर 320 तक लोकसेवा आयोग के चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति, उनके दायित्वों और उनको हटाये जाने की प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसके मुताबिक नियुक्ति किया जाने वाला व्यक्ति सरकार और महामहिम राज्यपाल की नजर में इसके लिये पात्र होना चाहिये। इस पात्रता में केवल यही शर्त है कि आयोग के कुल सदस्यों की संख्या का आधा भाग ऐसे लोगों का होना चाहिये जो इस नियुक्ति से पूर्व कम से कम दस वर्ष तक राज्य सरकार की सेवा में रहे हों। आयोग के सदस्यों को राष्ट्रपति के आदेश से ही हटाया जा सकता है और इसके लिये भी पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सदस्य के खिलाफ लगे आरोपों की जांच किया जाना आवश्यक है। यहां यह उल्लेखनीय है कि आयोग के सदस्यों को हटाने के लिये जितना कड़ा प्रावधान किया गया है उतना उनकी नियुक्ति के लिये नहीं है आयोग में प्रदेश के मुख्य सचिव सेना के सेवानिवृत जनरल से लेकर सरकार के विभाग के उपनिदेशक तक को नियुक्तियां मिलती रही हैं। जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह नियुक्तियां अधिकांश में राजनीतिक नेतृत्व की ईच्छानुसार ही होती हैं। क्योंकि सरकार में दस वर्ष की सेवा का प्रावधान रखते हुए यह नही कहा गया है कि सेवा किस स्तर की होनी चाहिये।
आयोग के सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कोई बहुत कड़े नियम न होने के कारण इस संबंध में समय समय पर सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं आ चुकी हैं। वर्ष 1985 से लेकर 2013 तक छः याचिकाएं आयी हैं। जिनमें यह निर्देश दिये गये हैं कि इन नियुक्तियों को लेकर ठोस प्रक्रिया सुनिश्चित की जाये। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2013 में दिये गये निर्देशों के बाद ही हिमाचल लोकसेवा आयोग के वर्तमान चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्तियां हुई हैं। लेकिन हिमाचल सरकार ने इन निर्देशों के अनुसार प्रदेश में अलग से आज तक कोई प्रक्रिया तय नही की है। इसलिये यह माना जा रहा था कि मीरा वालिया की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका से पूरा लोकसेवा आयोग प्रभावित होगा। लेकिन जो याचिका दायर की गयी थी उसमें मीरा वालिया की नियुक्ति को उसके खिलाफ एक समय दायर हुए भ्रष्टाचार के मामले के आधार पर चुनौती दी गयी थी जबकि यह मामला नियुक्ति से बहुत पहले ही समाप्त हो चुका था और इसे किसी ने भी अगली अदालत में चुनौति नही दी थी। अब जिस हेमराज ने मीरा वालिया की नियुक्ति को चुनौती दी थी वह इससे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नही होता था। इस नाते उसका इसी नियुक्ति को चुनौती देना नही बनता था। यदि उसने सभी नियुक्तियों को एक बराबर चुनौती दी होती तो पूरा परिदृश्य ही अलग हो जाता। हेमराज ने इस नियुक्ति को चुनौती देने के साथ ही यह आग्रह किया था कि ऐसी नियुक्तियों के लिये सरकार को ठोस प्रक्रिया तय करने के निर्देश दिये जायें। उच्च न्यायालय ने इस आग्रह को मानते हुए सरकार को निर्देश दिये हैं कि इस बारे में अतिशीघ्र विस्तृत प्रक्रिया तय की जाये। उच्च न्यायालय के इन निर्देशों के बाद यह देखना रोचक होगा कि क्या जयराम सरकार आयोग में अगली नियुक्ति से पहले ऐसी प्रक्रिया अधिसूचित कर पाती है या नही।
यह है निर्देश
The High Court of Himachal Pradesh today dismissed the petition, challenging the order of appointment of Smt.Meera Walia as a Member of Himachal Pradesh Public Service Commission.
While disposing of the petition filed by one Shri Hem Raj, a law student, Division Bench comprising the Chief Justice L. Narayana Swamy and Justice Jyotsna Rewal Dua stated that the appointment of respondent has been made by adopting and following the due procedure as mandated by the Constitution of India and the respondent has also been discharged by the Special Judge in FIR on the allegations of corruption. The Court said that it is held that the petitioner has not come to the Court with clean hands, but the Court refrained itself from imposing cost on the petitioner for filing such petition, for being a law student and law abiding citizen.
The Court said that it hopes that the State of H.P. must step in and take urgent steps to frame memorandum of Procedure,administrative guidelines and parameters for the selection and appointment of the Chairperson and Members of the Commission, so that the possibility of arbitrary appointments is eliminated.
The petitioner had challenged the appointment of Meera Walia as a member of H.P. Public Service Commission alleging it to be in violation of the constitutional provisions as well as law laid down by the Hon'ble Apex Court. The petitioner had also alleged that an FIR was lodged against Meera in the State Vigilance and Anti Corruption Bureau Shimla under sections 13 (1) (e) and 13 (2) of the Prevention of Corruption Act in the year 2008 and a challan was also filed in the court of Special Judge(Forests), Shimla, but in the year 2013, the State presented the supplementary report in the court of Special Judge(Forests), Shimla, stating that no case of disproportionate assets was made out against the accused on the basis of which Meera Walia was discharged on 9 September 2014. He had alleged that the state government ignored all these facts and appointed Meera as a member in Himachal Pradesh Public Service Commission.
He had prayed that the order dated 5.5.2017, appointing Meera Walia as a Member of Himachal Pradesh Public Service Commission may be quashed and set aside and the respondent State may be directed to frame guidelines or parameters for the appointment of Chairman and Members of the H.P. Public Service Commission.
शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा के नये अध्यक्ष का चुनाव 18 जनवरी को हो जायेगा यह संकेत मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने दिया है। इसके मुताबिक 17 को नांमाकन भरा जायेगा और 18 को चुनाव हो जायेगा। अध्यक्ष के लिये कितने लोग नांमाकन करते है या फिर चयन के स्थान पर मनोनयन को ही चुनाव मान लिया जाता है यह तो 18 जनवरी को ही पता चलेगा। वैसे अब तक प्रथा रही है उसमें मनोनयन को ही चयन की संज्ञा दी जाती रही है। इसलिये यही माना जा रहा है कि इस बार भी इसी प्रथा का निर्वहन होगा यह तय है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषको के लिये यह एक महत्वपूर्ण सवाल बन गया है कि इस मनोनयन का आधार क्या रहता है।
सामान्तय किसी भी राजनीतिक संगठन में अध्यक्ष एक बहुत बड़ा पद होता है। यह उसी पर निर्भर करता है कि यदि उसी की पार्टी सत्ता में है तो वह किस तरह सरकार और संगठन में तालमेल बनाये रखता है। यह भाजपा और वामदलों की ही संस्कृति है कि इनमें संगठन का सरकार पर पूरा नियन्त्रण रहता है। यह शायद कांग्रेस में ही है कि संगठन सरकार के हाथों की कठपुतली होकर ही रह जाता है क्योंकि उसमें भाजपा और वामदलांे जैसा काडर आज तक नही बन पाया है। भाजपा इस गणित में वामदलों से भी आगे है क्योंकि उसके सारे काडर का संचालन संघ के पास रहता है। इसीलिये संघ को एक परिवार कहा जाता है जिसकी एक दर्जन से अधिक ईकाईयां है और भाजपा संघ परिवार की राजनीतिक ईकाई है। भाजपा की इस संगठनात्मक संरचना के जानकार जानते है कि भाजपा के हर बड़े फैसले के पीछे संघ की स्वीकृति रहती है। इसलिये आज प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में भी यह तय है कि इसमें संघ की स्वीकृति के बिना कुछ नही होगा। भाजपा सरकारों के महत्वपूर्ण ऐजैण्डे संघ परिवार ही तय करता है यह अब एक सार्वजनिक सत्य है। आज केन्द्र की मोदी सरकार पर जो देश को हिन्दु राष्ट्र बनाने के प्रयास करने के आरोप लग रहे हैं वह सब संघ ऐजैण्डे के ही परिणाम स्वरूप है।
इस परिदृश्य में आज केन्द्र से लेकर राज्यों तक के संगठनात्मक चुनावों में संघ के ही निर्देश सर्वोपरि रहेंगे यह तय है। इस समय पूरा देश नागरिकता संशोधन अधिनियम पर उभरे विरोध की चपेट में आ चुका है। इसी विरोध का परिणाम है कि सरकार को अपना पक्ष रखने के लिये 3.5 करोड़ लोगों के पास पहुंचना पड़ रहा है। पोलिंग बूथों पर जाकर कार्यकर्ताओं और जनता के सामने स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है हर मुख्यमन्त्री की जिम्मेदारी लगाया गयी है कि पत्रकारवार्ताओं के माध्यम से इस विषय पर जनता से संपर्क बनाये। नागरिकता संशोधन अधिनियम पर उभरे विरोध के आगे जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाना और तीन तलाक समाप्त करना सब कुछ गौण हो गया है। सरकार को 2024 में सत्ता में वापसी कर पाना अभी से कठिन लगने लग पड़ा है। क्योंकि लोकसभा चुनावों के बाद हुए सारे विधानसभा चुनावों और उपचुनावों में पार्टी को जन समर्थन में भारी कमी आयी है। हिमाचल में भी हुए दोनांे उपचुनावों में लोकसभा के मुकाबले समर्थन में भारी कमी आयी है।
इसलिये आज जब प्रदेश अध्यक्ष का चयन किया जायेगा तो यह तय है कि उसमें इन सारे बिन्दुओं को ध्यान में रखा जायेगा। यह देखा जायेगा कि कौन सा नेता यह क्षमता रखता है कि वह सरकार का उचित मार्ग दर्शन कर पायेगा। संगठनात्मक चुनावों के पूराने शैडूयल के मुताबिक 15 दिसम्बर तक अध्यक्ष बन जाना था। लेकिन तब तक जिलों के चुनाव ही पूरे नही हो पाये इसलिये यह तारीख 31 दिसम्बर तक बढ़ाई गयी। लेकिन फिर यह संभव नही हो पाया और पांच जनवरी तक टाल दिया गया और अब 18 जनवरी को यह चुनाव होना तय हुआ है। यह स्पष्ट है कि अध्यक्ष का चुनाव तीन बार आगे बढ़ाना पड़ा जिसका सीधा अर्थ है कि इस चयन के लिये राष्ट्रीय स्तर पर उभरा रणनीतिक परिदृश्य लगातार प्रभावी होता जा रहा है। जब प्रदेश के उपचुनावों में लोकसभा के अनुपात में अन्तराल को बनाये नही रखा जा सका तो इस नेतृत्व के सहारे अगले चुनावों में सत्ता में वापसी की उम्मीद रख पाना कितना सही होगा इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। इस गणित में संगठन के लिये यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि इस प्रदेश में ऐसे कौन से वरिष्ठ नेता हैं जो प्रदेश और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर योगदान दे सकें। आज की परिस्थितियों में नेता का बौद्धिक होना भी आवश्यक होगा। क्योंकि जब वैचारिक ऐजैण्डें पर अमल किया जाता है तो उसके लिये तर्क आवश्यक हो जाता है। इस समय प्रदेश में भाजपा के पास इस सतर के दो ही नेता शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल रह जाते हैं जिनके पास अपना वैचारिक धरातल मौजूद है। धूमल को विधानसभा चुनावों में भी इसी कारण से नेतृत्व सौंपा गया था। लेकिन प्रदेश में सरकार बनने के बाद भाजपा के भीतरी समीकरणों में बहुत बदलाव आया है आज प्रदेश के युवा नेता जगत प्रकाश नड्डा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने जा रहे हैं क्योंकि वह इस समय कार्यकारी अध्यक्ष हैं। उनके बाद प्रदेश के युवा नेता अनुराग ठाकुर केन्द्र में वित मंत्री हैं। इसलिये प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के लिये मुख्यमंत्री के साथ ही इन दोनों नेताओं की राय भी महत्वपूर्ण रहेगी यह तय है। लेकिन प्रदेश में अब तक जिस तरह से प्रशासनिक फेरबदल एक सामान्य बात हो गई है उससे यह संदेश गया है कि सरकार की अब तक प्रशासन पर पकड़ नही बन पायी है। प्रदेश की महिला ईकाई की अध्यक्ष इन्दू गोस्वामी ने अपना त्याग पत्र देते हुये जिस तरह का कड़ा पत्र लिखा था उससे सरकार और संगठन के रिश्तों पर उंगलियां उठी हैं। विधान सभा अध्यक्ष राजीव बिन्दल को लेकर भी यह जग जाहीर हो चुका है कि वह मन्त्री बनना चाहते हैं। मन्त्रीयों के खाली चले आ रहे दोनों पद शायद इसी कारण से अब तक भरे नही जा सके हैं। इस तरह प्रदेश अध्यक्ष के चयन में ये सारे समीकरण प्रभावी भूमिका निभायेंगे यह तय हैं।
अब तक प्रदेश अध्यक्ष की सूची में जितने नाम चर्चा में रहे हैं उनमें सबसे अधिक बिलासपुर के त्रिलोक जमवाल और धर्माणी रहे हैं। यह माना जा रहा था कि शायद जे.पी.नड्डा इनमें से किसी एक को लेकर अपनी राय सार्वजनिक करेंगे और उससे नयी राजनीति शुरू हो जायेगी लेकिन ऐसा नही हो पाया है। अब सैजल प्रकरण से प्रदेश का दलित वर्ग रोष में आ गया है। गोस्वामी प्रकरण मे महिलाओ में रोष है। ऐसे में नये अध्यक्ष के लिये इन सारे वर्गों में सन्तुलन बनाये रखना एक बड़ी चुनौती होगी जिसके लिये किसी वरिष्ठ नेता के हाथों में ही अध्यक्ष की कमान देना अनिवार्य हो जायेगा।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के मन्त्री डाॅ राजीव सैजल को मण्डी के नाचन के एक मन्दिर में प्रवेश नही करने दिया गया है। मन्त्री को मन्दिर में प्रवेश करने से प्रबन्धकों और कारदारों ने रोका है। राजीव सैजल स्वयं सामाजिक न्याय एवम् अधिकारिता मन्त्री तथा दलित समाज से आते हैं। मण्डी मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर का गृह जिला है और उन्ही के जिलें में उन्ही के मन्त्री को मन्दिर में प्रवेश नही करने दिया गया है। मण्डी में ही पिछले दिनों एक मन्दिर के प्रबन्धकों और कारदारों ने एक महिला के साथ दुव्र्यवहार किया था जिसका उच्च न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लेते हुए दोषीयों के खिलाफ कड़ी कारवाई के निर्देश दिये थे। इन्ही निर्देशों के परिणामस्वरूप पुलिस हरकत में आयी और दोषीयों को हिरासत में लिया गया। लेकिन यह सब होने के बावजूद भी जब सरकार के मन्त्री को दलित होने के नाते मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नही दी गया तो इससे पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं।
मन्त्री ने अपने साथ हुए इस व्यवहार की जानकारी प्रदेश विधानसभा के एक दिन के लिये बलाये गये विशेष सत्र के दौरान स्वयं सदन में रखी है। मन्त्री द्वारा इस घटना की जानकारी सदन में रखने के बाबजूद सरकार द्वारा इस संबंध में कोई कारवाई करने के प्रयास सामने नही आये हंै। प्रदेश के दलित समाज में इस व्यवहार को लेकर रोष देखने को मिला है। दलित समाज के सक्रिय कार्यकर्ता कर्म चन्द भाटिया ने इस संबंध में प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष को पत्र लिख कर उचित कारवाई की मांग की है। भाटिया ने आरोप लगाया है सरकार के दबाव के चलते पुलिस ऐसे मामलों में प्रकरण तक दर्ज नही कर पाती है। पूर्व में दलित उत्पीड़न के कई मामलों में पुलिस की कारवाई सवालों के घेरे में रही है। ऐसे में अब सरकार के मन्त्री के साथ ही हुए इस व्यवहार के बाद पूरे प्रदेश की निगाहें सरकार के रूख और पुलिस की कारवाई पर लग गयी हैं।
दलित कार्यकर्ता भाटिया ने उच्च न्यायालय को लिखा पत्र
सेवा में,
सम्मानीय मुख्य न्यायाधीश ,
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय,
शिमला हिमाचल प्रदेश,
बिषय:- हिमाचल प्रदेश के समाजिक एवं न्याय अधिकारिता मंत्री श्री राजीव सैहजल को अपने ही प्रदेश के मंडी जिला के तहत नाचन विधानसभा क्षेत्र के एक प्रसिद्ध मंदिर में मंदिर प्रबंधन व कारदारों द्वारा प्रवेश नहीं देने को लेकर,प्रदेश के बुलाए गए दिनांक 07/01/2020 मंगलवार को विशेष विधानसभा सत्र में मंत्री द्वारा दिए गए बयान मामले को उजागर करने को लेकर न्यायाधीश गण पीठ से समाज जन हित जातीय हित व समानता समतामूलक समाज हित में हस्तक्षेप एवं असंवैधानिक कृत्य को लेकर उचित कानूनी न्याय संगत कारवाई का आग्रह।
मान्यवर जी,
सामाजिक कार्यकर्ता माननीय उच्च न्यायालय एवं एवं न्यायाधीश गण पीठ का ध्यान इस गंभीर संवेदनशील विषय की ओर दिलवाना चाहता है। इस पत्र से पहले भी प्राथी समाज हित के मामलों को लेकर कई मर्तबा समय-समय पर लिख पत्र लिख न्यायलय को भेजता रहा है,जिन पर न्यायलय ने न्याय प्रदान किया है जिसके लिए मैं न्यायालय का तहे दिल से आभारी हूं।
यह की हिमाचल प्रदेश के समाजिक एवं न्याय अधिकारिता मंत्री राजीव सैहजल जी ने प्रदेश सरकार के द्वारा दिनांक 07/01/2020 को बुलाऐ गए विशेष विधानसभा सत्र मे अपनी आप बीती बात रखी,विधानसभा का ध्यान दिलवाया की मैं मंत्री हिमाचल के मंडी जिला के नाचन विधानसभा क्षेत्र के विधायक विनोद कुमार के साथ नाचन विधानसभा क्षेत्र के एक प्रसिद्ध मंदिर में गया लेकिन मुझे मंत्री को मंदिर प्रबंधन व मंदिर का कारदारों द्वारा प्रवेश ही नहीं दिया गया क्योंकि मंत्री राजीव सैजल अनुसूचित जाति वर्ग से सबंध रखते हैं। मंत्री जी का यह बयान विधानसभा के रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है और प्रदेश के दिनांक08/01/2020 के सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है।
इस प्रकरण का प्रभाव समस्त अनुसूचित जाति समाज के लोगों पर गहरे रूप से पड़ा है।
उच्च न्यायालय उच्च न्यायालय एवं न्यायधीश गण पीठ के समक्ष लाना चाहता हूं कि अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित मंत्री श्री राजीव सैजल श्री विनोद कुमार विधायक के साथ ही जब जाति आधार पर मंदिर प्रबंधन व मंदिर कार द्वारा द्वारा इस तरह का बर्ताव किया गया तो अन्य अनुसूचित जाति समाज के लोगों के साथ किस तरह का अमानवीय अपमानजनक जातीय व्यवहार किया जाता होगा। इस घटनाक्रम से अनुमान लगाया जा सकता है कि संवैधानिक व्यवस्था के आधुनिकता युग में मंदिर प्रबंधन व मंदिर के कारदारों देव समाज के लोगों द्वारा किस तरह देवी देवताओं के नाम इनकी आड़ में अनुसूचित जाति वर्गों इस समाज के लोगों के लिए कैसी व्यवस्थाएं मनगढ़ंत प्रथाएं जातिय आधार थौंपी गई परंपराएं कायम की गईं हैं। ऐसी परंपराऐं हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी दूरदराज के सभी क्षेत्रों में आज भी कायम है जो कि समानता समतामूलक सभ्य समाज की स्थापना के लिए गंभीर चिंता का विषय है,जातीय आधार पर इस तरह की भेदभाव छुआछूत पर आधारित कार्यवाही मामला है जो कि समाज के लोगों उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचा अपमानित करता मनोबल को बुरी तरह प्रभावित करता है समाजिक प्रशासनिक धार्मिक आपसी भाईचारा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है ऐसी ऐसी असंवैधानिक कार्रवाई को लेकर बिशेष अनुसूचित जाति बर्गों को निशाने पर रख अपमानित करने को लेकर भी बढ़ावा नहीं दिया जा सकता ऐसी घटनाओं के सामने आना बहुत ही पीड़ादायक हैं।यह कि जब मंत्री महोदय से ये घटनाक्रम घटित हुआ तो उनके साथ जो सरकारी प्रशासनिक प्रदेश व जिला स्तर के आलाधिकारी रहे,उन्होंने क्यों नहीं उस वक्त तुरंत कारवाई की और मंत्री राजीव सैहजल ने एफआईआर आरोपियों के खिलाफ दर्ज करवाई।
यह कि माननीय उच्च न्यायालय एवं न्यायाधीशगण पीठ से से आग्रह है कि हिमाचल प्रदेश के धार्मिक स्थलों में मंदिरों मे मनमाने कायदे कानून नियम मंदिर कारदारों द्वारा देव समाज के लोगों मंदिर प्रबंधन मंदिर कारदारों द्वारा थौंप मंदिर प्रवेश पर लगाई गई रोक की अनुसूचित जाति के लोगों के प्रवेश से देवी देवता नाराज हो कर आक्रोश मे आ जाता और खोट दोष लगता है।इस बारे भी कार्रवाई करने को लेकर आशा करते हैं राज्य सरकार के हस्तक्षेप के चलते मामले दबाव के चलते दर्ज ही नहीं किए जाते हैं।
अत:- माननीय माननीय उच्च न्यायालय एवं मंत्री एवं विधायक विनोद कुमार सहित अन्य स्तरों के सभी मामलों में उचित न्याय संगत कार्रवाई का विनम्र आग्रह करते हैं।
इस आश्य से सबंधित समाचार पत्र के मूल पत्र की फोटो स्टेट प्रति सलंग्न पत्र है।।
दिनांक /01/2020
सेवक
करम चंद भाटिया,
सामाजिक कार्यकर्ता,नजदीक जिलाधीश कार्यालय लोअर बाजार शिमला,पिन171001,हिमाचल प्रदेश।
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार को प्रदेश में सुशासन के लिये सर्वश्रेष्ठ आंका गया है। जयराम सरकार को लेकर हुआ यह आकलन तथ्य के आईने में कितना सही उतरता है इसको लेकर नेता प्रतिपक्ष अग्निहोत्री ने अग्निपथ में अपनी प्रतिक्रिया जारी की है। यह प्रतिक्रिया विधानसभा के धर्मशाला में हुए शीतकालीन सत्र के दौरान आये आंकड़ों पर आधारित है। स्मरणीय है कि इसी सत्र के समापन पर मुख्यमन्त्री द्वारा आयोजित रात्रि भोज में पक्ष
और विपक्ष का नाच गाना भी बहुत चर्चित रहा है। इसी सबको लेकर मुकेश अग्निहोत्री ने यह प्रतिक्रिया व्यक्त की है। हिमाचल प्रदेश के समाचार पत्रों में एक साथ दो मामले पढ़ने को मिले। खबर थी कि हिमाचल प्रदेश में महिलाओं से दुष्कर्म व उत्पीड़न के मामले बढ़े। बताया गया कि जब से जयराम सरकार बनी देवभूमि में 703 बलात्कार (रेप) हुए। यह खबर विपक्ष के सोजन्य से नही अलबत्ता पुलिस प्रमुख की सालाना प्रेसवार्ता से आई। यह आँकड़ा हिमाचल को झकझोरने बाला है क्योंकि आँकड़ा बता रहा है की इस शांत और सुरम्य प्रदेश में रोजाना एक बहन- बेटी की आबरू से खिलवाड़ हो रहा है। आलम यह है कि सन 2018 में 345 रेप हुए और तुलनात्मक 2019 में 358 रेप हुए। इसी तरह महिला क्रूरता के दो सालों में 412 मामले पेश आए और छेड़छाड़ के 1013 मामलों की पुष्टि पुलिस ने की है। ‘‘बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ’’ के अभियानों के बीच यह देव भूमि की तस्वीर है।
उधर मुख्यमंत्री के हवाले से दूसरी खबर में एलान हुआ कि ‘‘यह जयराम की नाटी है डलती रहेगी’’। दलील दी गई कि मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर हमला बोला कि ‘‘किसी को तकलीफ है तो होती रहे’’। यानी ‘‘में तो नाचूँगी’’।। खैर हमारा सरोकार तो उन तीन हजार से ज्यादा महिलाओं से है जिन्हें इस देवभूमि में तकलीफ हुई। हमें और कोई तकलीफ नही। काबिले जिक्र है कि हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकार माफिया राज समाप्त करने के दावों पर आई थी। जिस में सबसे प्रमुख गुड़िया प्रकरण था जिस गुड़िया को अभी तक न्याय नही मिला और उसके माँ-बाप न्याय के लिए भटक रहे हैं। कभी गुड़िया हेल्प लाइन आई तो कभी गुड़िया बोर्ड बना कर राजनीतिक ताजपोशियाँ हुई। उसी देव भूमि में सरकाघाट में अस्सी वर्षीया महिला के साथ क्रूरता का प्रकरण भी सामने है, ऊना में हाल ही में एक महिला को नग्न अवस्था में मार कर पेड़ पर लटका दिया गया। ऐसे अनेकों मामले हैं जिनका उल्लेख फिर करेंगे।
लेकिन मसला तो माफिया पर कहर बरपाने का था आज एक साल में साढ़े आठ किलो से अधिक चिट्टा प्रदेश में पकड़ा है इस पकड़ की तुलना में प्रदेश में कितनी खपत हुई उसका अध्ययन भी हो जाना चाहिए अब तो दो सालों से सत्ता पर आप का कब्जा है। खनन माफिया पर विधानसभा में हंगामे के बाद कोई करवाई ना होना जाहिर करता है कि या तो सरकार व प्रशासन हद दर्जे का सवेंदनहीन है या फिर मामला गड़बड़ है। बहरहाल आप का कहना है कि पाँच साल नाटियाँ पड़ेगी और उससे आगे भी। पाँच साल नाटियां आप डाल सकते हैं आगे का फैसला तो जनता करेगी। यूँ जश्नो-नाटियों पर करोड़ों फूंकने जैसी कोई बात नही है। धर्मशाला विधान सभा सत्र के दौरान रात्रि भोज के मेजबान आप थे। नाटियाँ आपने और आपके विधायकों ने डाली, बदनाम विपक्ष भी साथ लगते कर दिया जबकि विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस का कोई विधायक नही नाचा। उसी की सफाई आप लगातार दे रहे हैं। किसी को ‘‘नाटी किंग’’ कहलाना है या ‘‘विकास पुरुष’’ यह समय बताएगा। मगर प्रदेश में बीते दो साल में 703 रेप और 168 कत्ल हमारी नजर में बेहद चिंताजनक है।