शिमला/शैल। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डाॅ. बिन्दल के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद खाली हुये स्पीकर के पद को सत्र के शुरू में ही भरा जाना आवश्यक था और इसके लिये स्वास्थ्य मंत्री विपिन सिंह परमार का नाम आ गया है। स्पीकर के लिये जो नाम चर्चा में आये थे उनमें परमार का नाम ज्यादा नही था। लेकिन शैल का आकलन था कि स्पीकर के लिये अन्ततः किसी मंत्री का ही नाम आयेगा। इस कड़ी में शैल ने विक्रम ठाकुर, विपिन परमार और गोबिन्द ठाकुर के नामों की चर्चा की थी। इस चर्चा का आधार था कि जयराम के ये तीनों मंत्री किसी न किसी कारण से पत्र बम्बों की चर्चा का विषय बन गये थे। प्रशासन और राजनितिके विश्लेषक जानते हैं कि जब भी कोई मंत्री या दूसरा नेता ऐसी चर्चा का केन्द्र बन जाता है तो राज्य और केन्द्र की सारी ऐजैन्सीयां इसकी पड़ताल में लग जाती हैं। क्योंकि विपक्ष सरकार को इन्ही हथियारों के माध्यम से घेरता है।
विपिन परमार को लेकर जो विवाद उठा था उसमें जब सरकार ने उस पत्र बम्ब की जांच करवाने के लिये एक माध्यम से एफ आई आर करवा दी और उसमें पूर्व मंत्री रविन्द्र रवि का फोन जब्त कर लिया गया और डी एस पी चम्बा ने अखबारों से यह पूछना शुरू कर दिया कि उन्होने वायरल हुए पत्र को किसके कहने से छाप दिया तब यह अपने आप की स्पष्ट हो गया था कि पत्र में लगे आरोपों का कोई बड़ा आधार है। डी एस पी ने शैल से भी यह जानकारी मांगी थी क्योंकि शैल में यह वायरल पत्र छपा था। राजनीति के विश्लेषक जानते हैं कि जब प्रशासनिक स्तर पर इस तरह के फैसले ले लिये जाते हैं तो उनका परिणाम राजनीतिक फैसलों के माध्यम से ही सामने आता है। शायद इस बार विपक्ष और भाजपा के भी कुछ विधायकों ने इन विषयों पर सवाल उठाये हैं। माना जा रहा है कि जब यह सारी जानकारी केन्द्र सरकार और हाईकमान तक पहुंची तब यह राजनीतिक फैसला लिया गया।
स्पीकर के लिये मुख्यमंत्री कर्नल इन्द्र सिंह के पक्ष में थे और बिन्दल के नाम से राजीव सैजल का नाम चर्चा में आया था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि स्पीकर के लिये विपिन परमार के नाम का कोई भी आभास मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष बिन्दल तक को नही था। अब परमार के स्पीकर बन जाने पर मंत्री का एक और पद खाली हो जाता है। मंत्री के दो पद कांगड़ा से खाली हो गये हैं और एक मण्डी से। लेकिन पदों को कब भरा जायेगा और कौन होंगे मंत्री बनने वाले विधायक इस पर अभी फैसला नही हो पाया है। इस समय हमीरपुर, बिलासपुर और सिरमौर से कोई मंत्री नही है। कांगड़ा से भी अकेली सरवीण चौधरी ही मंत्री रह गयी है। क्योंकि विक्रम ठाकुर कांगड़ा के साथ ही हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में गिने जाते हैं। इस क्षेत्र से ही विरेन्द्र कंवर और महेन्द्र सिंह ठाकुर आते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि शायद हमीरपुर और बिलासपुर को प्रतिनिधित्व न मिल सके। इस समय कांगड़ा संसदीय क्षेत्र से एक, मण्डी से दो और शिमला से भी दो ही मंत्री हैं। ऐसे में कुल 12 मन्त्रियों में क्या हर के संसदीय क्षेत्र से तीन तीन ऐसे मंत्री हो पाते है या नही । सरकार और संगठन यह तालमेल कैसे बिठा पाते हैं यह देखना महत्वपूर्ण होगा। माना जा रहा है कि अभी राकेश पठानिया के अतिरिक्त और कोई भी नाम मंत्री पद के लिये फाईनल नही हो पाया है। रमेश धवाला, नरेन्द्र बरागटा और सुखराम चौधरी आदि के नाम अभी चर्चा से बाहर ही माने जा रहे हैं। संभव है कि अभी एक ही मंत्री पद भरकर काम चला लिया जाये।
शिमला/शैल।क्या मुख्यमन्त्री जयराम अपने मन्त्रीमण्डल के दो खाली पदों को विधानसभा सत्र से पहले भर लेंगे? क्या सरकार धर्मशाला प्रवास पर जायेगी और अगला विधानसभा अध्यक्ष कौन होगा। यह सवाल इन दिनों सचिवालय के गलियारों से लेकर सड़क तक हर जगह चर्चा में सुने जा सकते हैं। यह चर्चा इसलिये उठ रही है क्योंकि पिछले वर्ष मई में हुए लोकसभा चुनावों के परिणाम स्वरूप मन्त्रीमण्डल में दो पद खाली हुए थे जो अभी तक भरे नही गये हैं। अब डाॅ. बिन्दल के विधानसभा अध्यक्ष पद छोड़कर पार्टी अध्यक्ष बनने के कारण स्पीकर का
पद भी खाली हो गया है। आगे बजट सत्र आना है इसलिये नये अध्यक्ष का चुनाव अनिवार्य हो गया है और इसके लिये चयन की तारीख भी तय हो गयी है। ऐसे में यह सवाल चर्चित होना स्वभाविक है कि अगला अध्यक्ष कौन होगा और जब अध्यक्ष का चयन होना ही है तो क्या उसी के साथ मन्त्री पदों को भी भर लिया जायेगा या नही। इन्ही सवालों के साथ मुख्यमन्त्री का धर्मशाला प्रवास होना या न होना एक मुद्दा बन गया है। क्योंकि धर्मशाला में विधानसभा भवन बनने और धर्मशाला को प्रदेश की दूसरी राजधानी घोषित करने के बाद जनता में इसके औचित्य पर सवाल उठे हैं। यहां तक कि कांग्रेस-भाजपा के कई बड़े नेताओं ने ईमानदारी से यह स्वीकारा है कि यह सब फिजूल खर्ची है और इसे बन्द कर दिया जाना चाहिये। क्योंकि वर्ष में एक सप्ताह के लिये वहां पर विधानसभा सत्र आयोजित करना और मुख्यमन्त्री द्वारा वहां से पन्द्रह दिन या एक महीना बैठकर सरकार चलाने का सही में कोई औचित्य नही बनता। फिर अब जब दिल्ली चुनावों के लिये प्रदेश की पूरी सरकार मुख्यमन्त्री और उनके मन्त्री तथा विधायक भी करीब एक माह के लिये प्रदेश से बाहर थे तब भी प्रशासन सुचारू रूप से चल रहा था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार ईच्छा शक्ति से चलती है इसके लिये ऐसे प्रवासों की आवश्यकता नही होती है। फिर दूसरा बड़ा सवाल प्रदेश के आर्थिक साधनों का आ जाता है और वहां स्थिति यह है कि जब जयराम सरकार ने पदभार संभाला था तब प्रदेश पर 46000 करोड़ से थोड़ा अधिक का कर्ज था जो अब बढ़कर 53000 करोड़ हो गया है। इस कर्ज की स्थिति को सामने रखते हुए सरकार को सारे अनुत्पादक खर्चो पर रोक लगाने की आवश्यकता हो जाती है और इसमें धर्मशाला में सरकार का प्रवास और वहां एक सप्ताह के लिये विधानसभा का सत्र आयोजित करना हर गणित से अनुत्पादक खर्चा ही बनता है। इस खर्चे पर रोक लगाना मुख्यमन्त्री का ही दायित्व है और उनकी सूझबूझ का भी यह परिचायक बन जाता है। इससे हट कर विधानसभा अध्यक्ष का चयन और मन्त्री पदों को भरना सीधे राजनीतिक प्रश्न बन जाते हैं। विधानसभा अध्यक्ष का चयन टाला नही जा सकता है यह तय है। विधानसभा अध्यक्ष के लिये वरीयता और अनुभव दोनों एक साथ आवश्यक हैं। वैसे तो कायदे से विधानसभा उपाध्यक्ष को ही अध्यक्ष बना दिया जाना चाहिये क्योंकि उसे अब तक दो वर्ष का अनुभव हो गया है। उपाध्यक्ष के बाद वरीयता के दायरे में वर्तमान और पूर्व मन्त्री आते हैं। इस समय सदन में दो पूर्व मन्त्री नरेन्द्र बरागटा और रमेश धवाला हैं जो जयराम की इस टीम में मन्त्री नही बन पाये हैं। इन दोनों को अब मन्त्रीमण्डल या स्पीकर के लिये रखा जाता है या नही यह राजनितिक दृष्टि से बड़ा सवाल होगा। डाॅ. बिन्दल के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद अब डाॅ. सैजल का नाम भी स्पीकर के लिये चर्चा में आ गया है और इसे बिन्दल की पसन्द माना जा रहा है। यदि ऐसा है तो अध्यक्ष नाते सैजल को स्पीकर बनवाना बिन्दल का पहला राजनीतिक फैसला होगा। इस फैसले को सिरे चढ़ाना पार्टी और हाईकमान में उनकी पकड़ की पहली परीक्षा होगा और इसमें असफल होने का जोखिम वह नही ले सकते। माना जा रहा है कि स्पीकर के चयन में जयराम बिन्दल की अनुशंसा का विरोध नही करेंगे।
यदि सैजल स्पीकर बन जाते हैं तो एक और मन्त्री पद खाली हो जाता है। ऐसे में जब तीन मन्त्री पद भरने के लिये उपलब्ध हो जाते हैं तो इन्हें तीनों सत्ता केन्द्र आपस में एक-एक बांट सकेंगे। मुख्यमन्त्री के साथ ही अब पार्टी अध्यक्ष बिन्दल भी स्वभाविक रूप से सत्ता केन्द्र हो गये हैं। अगले चुनाव उनकी भी परीक्षा होंगे। ऐसे में सरकार के हर नीतिगत फैसलें में उनका दखल बनता है और रहेगा भी। परन्तु जयराम और बिन्दल के साथ ही इस समय संयोगवश पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और केन्द्रिय वित्त राज्य मन्त्री अनुराग ठाकुर दोनों ही हिमाचल से हैं। इस नाते इन दोनों की नजर और दखल भी प्रदेश की सरकार तथा राजनीति पर बराबर बनी रहेगी। मन्त्री पद भरने और पार्टी के पदाधिकारियों के चयन में इनका दखल भी बराबर रहेगा यह तय है। फिर दिल्ली के चुनावों में अनुराग ठाकुर ने विवादित होने का जो जोखिम उठाया है वह उनका अपने स्तर का ही फैसला नही हो सकता। क्योंकि अनुराग का ब्यान उसी हिन्दु ऐजैन्डा का हिस्सा है जिसके गिर्द 2014 से लेकर अब तक पार्टी घूम रही है। हिन्दु ऐजैन्डा आज कितना अहम है भाजपा-संघ के लिये इसका अन्दाजा असम उच्च न्यायालय के उस न्यायाधीश के फैसले से लगाया जा सकता है जिसने स्वतः संज्ञान लेकर एक याचिका में कहा था कि भारत को भी पाकिस्तान की तर्ज पर धार्मिक राष्ट्र घोषित कर दिया जाना चाहिये और यह काम मोदी ही कर सकते हैं। स्वभाविक है कि जो भी पार्टी नेता हिन्दु ऐजैन्डे पर आक्रामक लाईन लेगा उसे सरकार और संगठन में हल्के से नही लिया जा सकता। इस परिप्रेक्ष में प्रदेश में मन्त्री पद भरते समय नड्डा के साथ ही अनुराग की राय भी महत्वपूर्ण रहेगी। इस समय हमीरपुर, बिलासपुर और सिरमौर ही ऐसे जिले हैं जिन्हे मन्त्रीपरिषद में स्थान हासिल नही है। यदि सैजल स्पीकर बन जाते हैं तब सोलन भी इस श्रेणी में आ जायेगा। सैजल के स्पीकर बनने के बाद मन्त्रीमण्डल में कोई दलित मन्त्री नही रह जाता है। जनजातिय क्षेत्रों से पहले ही कोई मन्त्री नही है। इसलिये अब मन्त्री पद भरने के लिये जिलों को प्रतिनिधित्व देना और दलित वर्ग को भी सरकार में स्थान देना ऐसे मुद्दे होंगे जिन्हे आसानी से नज़रअन्दाज कर पाना संभव नही होगा। फिर मुख्यमन्त्री को भी क्षेत्र और वर्ग के आधार पर सरकार में सन्तुलन बनाने के लिये यही मौका होगा। बहुत संभव है कि अब जो मन्त्री बनाये जायें उन्हे वरियता का गणित लगाकर राज्य मन्त्री ही रखा जाये और इससे पूर्व मन्त्रियों को भी इस दौड़ से बाहर किया जा सकता है।
इस परिदृश्य में मन्त्री पद भरना और धर्मशाला प्रवास पर जाना ऐसे राजनीतिक फैसले होंगे जिनका असर सरकार के शेष बचे पूरे कार्यकाल पर पड़ेगा।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस 2017 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद अब तक संभल नही पा रही है। यह धारणा बनती जा रही है प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वालों की। क्योंकि 2014 से आयी मोदी सरकार के बाद से प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व अपने को संभाल नही पाया है। 2014 में प्रदेश में वीरभद्र के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। वीरभद्र उस समय आयकर का मामला झेल रहे थे जो बाद में सीबीआई और ईडी तक पहुंच गया और आज तक लटका हुआ है। भाजपा ने वीरभद्र की इस स्थिति का पूरा-पूरा राजनीतिक लाभ उठाया है। वीरभद्र की इस स्थिति के कारण ही कांग्रेस प्रदेश में कमजोर हुई क्योंकि सत्ता में बैठकर भी वह भाजपा के प्रति आक्रामक नही हो पाये। वीरभद्र के शासनकाल में प्रेम कुमार धूमल और अनुराग ठाकुर की एचपीसीए के खिलाफ मामले तो बनाये गये परन्तु एक भी मामले में सफलता नही मिली। केन्द्र की मोदी सरकार की ऐजैन्सीयों ने वीरभद्र के लिये यह हालात पैदा कर दिये थे कि सत्ता में बने रहना उनकी राजनीतिक आवश्यकता बन गयी थी। लेकिन इसमें वह पार्टी को आगे बढ़ाने और कांग्रेस को अपना राजनीतिक वारिस नही दे पाये। बल्कि संगठन के साथ टकराव में ही चलते रहे। टकराव की यह स्थिति यहां तक पहुंच गयी कि पार्टी अध्यक्ष सुक्खु को ही हटवाने में उनका पूरा ध्यान केन्द्रित होकर रह गया। जबकि कांग्रेस का 2017 के चुनावों में सबसे अच्छा प्रदर्शन सुक्खु के हमीरपुर जिले में ही रहा जहां पांच में से तीन सीटें कांग्रेस ने जीत ली।
वीरभद्र सुक्खु का यह टकराव चुनावों के बाद भी बरकरार रहा और लोकसभा चुनावों से पहले सुक्खु को हटाकर पार्टी की कमान कुलदीप राठौर को थमा दी गयी। लेकिन लोकसभा चुनावों में भी जिस तरह की ब्यानबाजी वीरभद्र की रही है उससे स्पष्ट था कि कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी और हुआ भी वही। लोकसभा चुनावों के बाद राठौर पार्टी को संभाल पाते उसमें कुछ नये लोगों को ला पाते तो इससे पहले ही प्रदेश ईकाई को भंग कर दिया गया। प्रदेश ईकाई को भंग करते हुए अध्यक्ष को तो बनाये रखा लेकिन शेष कार्यकारिणी को ब्लाकस्तर तक भंग कर दिया गया। राजनीतिक विश्लेषक जानते हैं कि पार्टीयों में इस तरह के फैसले एक विशेष फीडबैक की पृष्ठभूमि में लिये जाते हैं। राठौर को नियुक्त करते समय जिन नेताओं की अनुशंसा पर अमल किया गया था अब प्रदेश ईकाई को भंग करते हुए भी उन्ही लोगों की सहमति के बाद ऐसा किया गया है। क्योंकि राठौर के पदभार संभालने के बाद पार्टी में पदाधिकारी नियुक्त किये गये थे जो निश्चित रूप से अधिकांश में उन्ही की पसन्द थे। लोकसभा चुनाव हारने के बाद जिस तरह से कुछ पदाधिकारियों की कार्य प्रणाली और हैलीकाप्टर के दुरूपयोग पर सवाल उठे हैं उसी सब के परिणामस्वरूप प्रदेश ईकाई को भंग किया गया है।
इस समय देश की राजनीति जिस मोड़ पर पहुंची हुई है उसमें आने वाले समय में उग्र आक्रामकता आने के साफ संकेत उभर रहे हैं। यह आक्रामकता 2014 की तरह भ्रष्टाचार और आर्थिक मुद्दों पर रहेगी यह स्पष्ट है। इस परिदृश्य में प्रदेशों से लेकर केन्द्र तक कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी क्योंकि भाजपा के मुकाबले में वही एक राष्ट्रीय पार्टी रह जाती है जो देश के हर गांव में सुनने, देखने को मिल जायेगी। इसी परिप्रेक्ष में हर प्रदेश में कांग्रेस को आक्रामकता की भूमिका में आना होगा। इस संद्धर्भ में जब प्रदेश कांग्रेस के पुनर्गठन की बात आती है तो निश्चित रूप से गठन के समय यह ध्यान रखना होगा कि जिन लोगों को जिम्मेदारीयां दी जायें उनके अपने खिलाफ ऐसा कुछ न हो जिस पर उन्हे ही घेर लिया जाये। इस गणित में राठौर स्वयं उसी श्रेणी में आते हैं जिनकी अपनी स्लेट साफ है। लेकिन जो लोग भाजपा के आरोप पत्रों में दर्ज हैं यदि ऐसे लोगों के हाथों में कमान दे दी जाती है तो पार्टी को अगले चुनावों में सफल बनवा पाना आसान नही होगा। इस समय नये गठन का फैसला जिस तरह से लंबित होता जा रहा है उससे यह संकेत उभर रहे हैं कि पार्टी के वरिष्ठ लोगों ने अभी तक पिछली हार से कोई सबक नही लिया है।
शिमला/शैल। राजीव बिन्दल प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बन गये हैं और पद संभालने के बाद बतौर अध्यक्ष उन्होने सबसे पहले पूर्व अध्यक्षों से मिलने का कार्यक्रम बनाया। इस समय शान्ता कुमार, प्रेम कुमार धूमल, सुरेश भारद्वाज तथा सतपाल सत्ती पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं। सत्ती से तो बिन्दल ने कार्यभार संभाला है और सुरेश भारद्वाज शिक्षा मन्त्री हैं इसलिये इनसे अलग से मिलने का कोई बड़ा अर्थ नही रह जाता है। शान्ता, धूमल दोनों पूर्व मुख्यमन्त्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। दोनों का अपना-अपना जनाधार आज भी अपनी जगह बना हुआ है। इसी जनाधार के
चलते धूमल को 2017 के चुनावों में नेता घोषित किया गया था। यदि धमूल ने अपने चुनाव क्षेत्र में कुछ ज्यादा समय दिया होता तो वह चुनाव जीत भी जाते और उस सूरत में आज प्रदेश की राजनीति का परदिृश्य कुछ दूसरा ही होता। बिन्दल की ताजपोशी के अवसर पर यही दोनों मौजूद नही थे। इसलिये बिन्दल के लिये यह एक राजनीतिक आवश्यकता थी कि वह इन दोनों वरिष्ठ नेताओं से उनके घर जाकर मिलते और संवाद स्थापित करते। बिन्दल ने किया भी ऐसा ही। अब बिन्दल की टीम जब घोषित होगी तब स्पष्ट हो जायेगा कि उसमें स्थान पाने वाले नेताओं/कार्यकर्ताओं की निष्ठाएं किसके साथ कितनी हैं।
बिन्दल की ताजपोशी के बाद राजनीतिक स्तर पर दो महत्वपूर्ण फैसले आने हैं। पहला है विधानसभा ना नया अध्यक्ष चुनना। इस चयन को टाला नही जा सकेगा क्योंकि आगे बजट सत्र आना है। जब विधानसभा अध्यक्ष चुना जायेगा तो इसी के साथ मन्त्री परिषद के दोनों खाली स्थानों को भरने का दवाब भी बढ़ जायेगा और उसे आगे टालना कठिन हो जायेगा। इस समय रमेश धवाला और नरेन्द्र बरागटा दो ऐसे विधायक हैं जो धूमल मन्त्रीमण्डल में मन्त्री रह चुके हैं। जयराम मन्त्रीमण्डल में इन्हें स्थान न मिलने पर दोनों की नाराजगी बाहर आ गयी थी और इस नाराजगी को दूर करने के लिये दोनों को मन्त्री रैंक में सचेतक और मुख्य सचेतक के पद आफर किये गये थे। बरागटा ने यह आफर स्वीकार कर ली थी परन्तु धवाला ने नही। उसके बाद ही धवाला की ताजपोशी की गयी थी। परन्तु यह दोनों अपनी वरियता के नाते अब भी मन्त्री पद की दौड़ में हैं। इन्ही के साथ राकेश पठानिया और सुखराम चौधरी जिस तरह से सदन में अपने तेवर जाहिर करते रहे हैं उससे स्पष्ट है कि यह लोग भी मन्त्री पद की दौड़ में हैं। फिर बिन्दल के पार्टी अध्यक्ष बनने से सिरमौर का सरकार में प्रतिनिधित्व का दावा भी खड़ा हो जायेगा।
अब यह एक सुखद संयोग है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं। यहीं से विधायक, मन्त्री और सांसद रहे हैं यहीं से छात्र राजनीति में आये थे। अब जब त्रिलोक जम्वाल, धर्माणी, रणधीर शर्मा के नाम प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में आये थे तब इन सबको नड्डा के साथ ही जोड़कर देखा जा रहा था। यह दूसरी बात है कि अब बिन्दल भी महेन्द्र पांडे के माध्यम से नड्डा के नजदीकी बन चुके थे और राजनीतिक समीकरणों तथा वरियता के नाते इन सब पर भारी पड़ते थे इसलिये नड्डा का आर्शीवाद उन्हे हासिल हो गया। इस परिदृश्य में यह स्वभाविक होगा कि प्रदेश से जुड़े हर राजनीतिक फैसले में नड्डा की भूमिका प्रभावी रहेगी। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि नड्डा बिन्दल के माध्यम से प्रदेश की राजनीति पर पूरा कन्ट्रोल रखेंगे। लेकिन इस समय राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य जिस मोड़ पर पहुंच चुका है उसमें भाजपा की कठिनाईयां बढ़ती जा रही हैं। अभी दिल्ली विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं और माना जा रहा है कि यहां भाजपा की सरकार नही बन पायेगी जबकि पूरी केन्द्र सरकार इस चुनाव में उतर चुकी है। सभी राज्यों के मुख्यमन्त्रीयों तक को भाजपा ने चुनाव में उतार दिया है। भाजपा का इस बार भी दिल्ली हारना पार्टी के लिये पहले से भी ज्यादा नुकसान देह होगा। इस हार का असर हर प्रदेश पर पड़ेगा और उसके बाद कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दल सरकार के खिलाफ ज्यादा आक्रामक हो जायेंगे।
इस समय हिमाचल से मुख्यमन्त्री सहित भाजपा की एक बड़ी टीम दिल्ली में चुनाव प्रचार पर गयी हुई हैं इसी के कारण जनमंच जैसा कार्यक्रम आगे खिसकाना पड़ा है। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि दिल्ली का यह चुनाव प्रदेश सरकार और भाजपा के लिये क्या अर्थ रखता है। अभी दिल्ली में जिस तरह से नितिन गडकरी ने प्रदेश लोक निर्माण विभाग के सचिव और मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव से कुछ बिन्दुओं पर जवाब तलबी करने के साथ ही मुख्यमन्त्री से भी नाराजगी जताई है उसको लेकर कई तरह की चर्चाएं चल निकली हैं। कुछ हल्कों में इसे परवाणु, शिमला फोरलेन के निर्माण के साथ जोड़कर देख रहे हैं क्योंकि कंपनी ने आगे काम करना बन्द कर दिया था और इसके कर्मचारी भी कंपनी के खिलाफ धरने प्रदर्शन पर बैठ गये थे जबकि फोरलेन के लिये तो पैसा केन्द्र दे रहा है। यह राज्य सरकार की कार्यप्रणली पर अपने में ही एक गंभीर सवाल हो जाता है। सरकार के बड़े बाबू किस तरह से काम कर रहे हैं इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब जयराम ने सत्ता संभाली थी तब चण्डीगढ़ में एक पत्रकार वार्ता में बड़ा दावा किया गया था कि चण्डीगढ़ से मिलने वाले हिस्से के लिये पूरे प्रयास करेंगे, यह संदेश दिया गया था कि सब कुछ तुरन्त मिल जायेगा लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ भी ठोस नजर नही आया है। इस तरह के कई प्रकरण हैं जहां सरकार की कारगुजारी औसत से भी बहुत कम है और आने वाले दिनों में यह सब कुछ सामने आता जायेगा।
पार्टी अध्यक्ष राजीव बिन्दल के खिलाफ कांग्रेस ने एक बार चार दिन तक सदन सुचारू रूप से चलने नही दिया था। आज बिन्दल को उसी कांग्रेस का बतौर अध्यक्ष सामना करना होगा। अभी तक वह सारे पुराने मसले अपनी जगह खड़े हैं। सरकार की भी ऐसी कोई बड़ी उपलब्धि नही है जिसके आधार पर राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित मान लिया जाये। बल्कि पिछले दिनों जाखू में एक मकान खरीद के प्रकरण में जिस तरह से कुछ नाम चर्चा में आ गये थे यदि ऐसे प्रकरण आने वाले दिनों में जन चर्चा का विषय बन जाते हैं तो कई लोगों के लिये परेशानीयां खड़ी हो जायेगी। इस परिदृश्य में बिन्दल वरिष्ठ नेताओं, सरकार और पार्टी में कैसे सन्तुलन बनाये रखते हैं इस पर सबकी निगाहें लगी रहेगी।
शिमला/शैल। हिमाचल पथ परिवहन निगम घाटे और कर्जोें के सहारे चल रही है यह एक सार्वजनिक सच है। लेकिन इस सच के बाद भी परिवहन निगम ने जब पिछले दिनों मुख्यमन्त्री को इलैक्ट्रिक कार भेंट करने का दम दिखाया तब लगा था कि निगम अपने कर्मचारियों और विशेषकर सेवानिवृत कर्मचारियों को भी उनके सेवानिवृति लाभ देने में भी उतनी ही तत्परता और संजीदगी दिखायेगी। क्योंकि उसी दौरान इन कर्मचारियों ने प्रैस क्लब में एक पत्रकार वार्ता आयोजित करके अपनी परेशानी प्रबन्धन और सरकार के सामने रखी थी। लेकिन कर्मचारियों के इस प्रयास का किसी पर कोई असर नही हुआ और अन्ततः एक सेवानिवृत कर्मचारी रणजीत सिंह का CWP/423 के माध्यम से प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा है। इस याचिका का कड़ा संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अनूप चिटकारा पर आधारित एकल पीठ ने पथ परिवहन निगम को सेवानिवृत कर्मचारियों के सवोनिवृति लाभ तीन माह के भीतर अदा करने के निर्देश दिये हैं। यही नहीं ऐसा न करने पर चैथे माह से 6% की दर पर उन्हें अदायगी तक ब्याज देने और इसके लिये जिम्मेदार अधिकारी/कर्मचारी से 100 रूपये प्रतिदिन जुर्माना वसूलने के भी निर्देश दिये हैं। अदालत के इन निर्देशों का आने वाले समय में प्रदेश सरकार और उसके विभिन्न अदारों के सेवानिवृत कर्मचारियों को भी लाभ मिलेगा ऐसा माना जा रहा है। क्योंकि अधिकांश सेवानिवृत कर्मचारी अपने लाभों के लिये लम्बे समय तक इन्तजार करते देखे गये हैं।
हिमाचल ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन प्रदेश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सबसे बड़ा माध्यम से है। इस समय निगम के पास 11 क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय, 29 परिवहन डिपो और 9 सब डिपो हैं। इनमें 3161 बसों का फ्लीट है। जोगिन्द्र नगर, नेरवा और धर्मपूर डिपुओं के पास अपना कोई कार्यालय और कार्यशाला न होने के कारण इन्हे कोई बस उपलब्ध नही करवाई गयी है। इसके अतिरिक्त प्रदेश में 14 निजि और 8 हिमाचल पर्यटन विकास निगम की वाल्वो बसें भी आप्रेट कर रही हैं। परिवहन निगम की वाल्वो बसों से 5000 रूपये प्रति बस प्रतिदिन का टैक्स लिया जाता है। निजिक्षेत्र में चल रही वाल्वों बसों का मालिक कौन है और कहां से है इसका कोई विवरण निगम के पास नही है क्योंकि इनका टैक्स इनके बस नम्बर के आधार पर उगाहया जाता है। जिन वाल्वों बसों का पंजीकरण प्रदेश से बाहर का है उन्हें पांच वर्ष का परमिट दिया जाता है। जयराम सरकार आने के बाद 342 नये बस रूट घोषित किये गये थे जिनके लिये 919 लोगों ने आवेदन किये थे। इनमें से केवल 23 रूट ही आवंटित हो पाये हैं। सरकार द्वारा घोषित 166 रूट ऐसे रहे हैं जिनके लिये एक भी आवदेन नही आया है। जो रूट आंवटित नही हो पाये हैं उनके के लिये धर्मशाला, चम्बा, बिलासपुर, मण्डी और ऊना के कार्यालयों में बैठकें आयोजित की जा रही हैं। जयराम सरकार आने के बाद बसों की नियमित चैकिंग के 3325 चालान काटे गये और इनसे 1,34,01,400 रूपये का जुर्माना वसूला गया है।
पथ परिवहन निगम की घाटे की स्थिति का आलम यह है कि इसके चलते कर्मचारियों को उनके सेवानिवृति लाभ नही दिये जा रहे हैं। 2014 में भी एक कर्मचारी को एजी आफिस द्वारा स्पष्ट निर्देश दिये जाने के बाबजूद घाटे का कवर लेकर यह लाभ नही दिये गये थे और उसे उच्च न्यायालय जाना पड़ा था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब निगम मुख्यमन्त्री को इलैक्ट्रिक कार गिफ्ट करने की बात कर सकता है तो अपने कर्मचारियों को यह लाभ क्यों नही दे सकता। निगम की कार्य प्रणाली पर इसलिये भी सवाल उठने स्वभाविक हैं कि 1989-90 में निगम का प्रति किलो मीटर खर्च 6.30 रूपये था और 2000-01 में यह बढ़कर 17.22 रूपये हो गया जबकि इस दौरान सड़को की हालत में सुधार हुआ है और टैक्नौलोेजी में भी। दूसरी ओर 1989-90 में किराया 19.37 पैसे प्रति किलो मीटर था जो कि 2000-01 में बढ़कर 59.07 पैसे हो गया है। सामान्यतः किसी भी परिवहन निगम के आकलन के आधारभूत मानक यही होते हैं। इन मानकों के अतिरिक्त अन्य सारे कारक जो बैलैन्सशीट में उठाये गये हैं वह सब प्रबन्धन की अपनी कुशलता पर निर्भर करते हैं।
The Himachal Pradesh High Court, while disposing of an execution petition and a petition filed by Sh. Ranjit Singh, a retired employee of HRTC, has reprimanded HRTC for not giving the retirement benefits to the retired employees well in time. Disposing of the petition, Vacation Judge Mr. Anoop Chitkara said that the attitude of HRTC towards low-level retired employees is pathetic, insulting and insensitive as despite being working sincerely throughout their working life, the retired employees have to approach Courts for release of their post retirement benefits. The Court said that litigation is neither a free lunch for the employee nor for the employer. The Court expressed surprise that instead of expressing gratitude to its employees by making timely payments, HRTC is willing to spend money on litigation.
The court directed HRTC to expeditiously settle all such pending cases of retired employees and pay the dues to all within three months of retirement. However, the Court clarified that HRTC, while disbursing the retiral benefits, should ensure that no disciplinary inquiry or other issue is pending against the retired employee.
The Court also directed that in case of default, the officer/ employee sitting on the files and found responsible for the delay without any proper explanation, will have to pay compensation at the rate of Rs 100 per day. The Court further directed that apart from this compensation, HRTC will have to pay interest at the rate of 6% per annum, compoundable monthly, from the first day of the fourth month of retirement until the entire amount is credited to the retired employee's account.