Saturday, 17 January 2026
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बस सेवा बहाल न होना और कर्फ्यू का जारी रहना सरकारी प्रबन्धों पर एक बड़ा सवाल

शिमला/शैल।  जयराम सरकार ने कर्फ्यू को जारी रखने का फैसला लिया है। इसी फैसले के चलते सरकार ने प्रदेश में बस सेवा भी बहाल नही की है। सामान्त यातायात के लिये राज्य की सारी सीमाएं सील चल रही हैं। केन्द्र ने अन्र्तराज्य बस सेवाएं शुरू करने का फैसला राज्यों के मुख्यमन्त्रीयों पर छोड़ रखा है। हिमाचल की ही तरह पंजाब में भी कर्फ्यू था लेकिन अब चौथे लाॅकडाऊन के साथ ही पंजाब ने प्रदेश के भीतर बस सेवा शुरू कर दी है। हरियाणा ने भी प्रदेश के भीतर बस सेवा बहाल कर दी है। दिल्ली में भी यह बस सेवा शीघ्र  ही शुरू होने की संभावना है। सभी राज्य अपनी-अपनी प्रशासनिक क्षमताओं और जन सामान्य की आवश्यकताओं के आधार पर फैसला ले रहे हैं। कोरोना की स्थिति के आकलन के परिदृश्य में हिमाचल इन पड़ोसी राज्यों की अपेक्षा बहुत बेहतर स्थिति में है। यह सही है कि प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से हर रोज़ कोरोना के मामले सामने आ रहे हैं और संभव है कि आने वाले दिनों में यह मामले बढ़े भी। क्योंकि देश के अलग-अगल राज्यों में बैठे हिमाचली अपने घर वापिस आने के लिये छटपटा रहे हैं। अब तक शायद एक लाख लोग वापसी कर भी चुके हैं और 60,000 के आने के आवेदन लंबित हैं। अपने घर वापिस आना उनका अधिकार है इस नाते उन्हे रोकना उनके साथ  ज्यादती होगी। मिाचल से भी एक लाख के करीब प्रवासी मजदूर वापिस जा चुके है।
प्रदेश में 24 मार्च से कर्फ्यू चल रहा है। सारा कामकाज बन्द पड़ा है। सारे शैक्षणिक और धार्मिक तथा अन्य सार्वजनिक स्थल बन्द हैं। प्रदेश के भीतर आने वालों की सीमा पर जांच की जा रही है। जिसमें भी कोरोना के लक्षण पाये जा रहे हैं उसे संगरोध में रखा जा रहा है। संगरोध की संख्यागत और संगरोधन दोनों व्यवस्थाएं की गयी हैं। गंभीर मरीज़ों को इसके लिये चिन्हित नामज़द अस्तपालों में भर्ती करवाया जा रहा है। मुख्यमन्त्री प्रतिदिन कोरोना को लेकर प्रदेश की जनता को संबोधित कर रहे हैं और व्यवस्था संबंधी यह सारे दावे स्वयं जनता के समाने रख चुके है। इसलिये यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि  व्यवस्था संबंधी यह दावे सही हैं तो फिर प्रदेश में कर्फ्यू को चालू रखने और बस सेवा बहाल न करने का कोई औचित्य नही रह जाता है।
इस समय राज्य सचिवालय से लेकर नीचे ज़िला और ब्लाॅक स्तर तक हर सरकारी कार्यालयों में नही के बराबर काम हो रहा है। सचिवालय में ही सारे अधिकारी और मन्त्री तक अपने कार्यालयों में नियमित नहीं आ पा रहे हैं। पूरी सरकार पांच-छः बड़े बाबू चला रहे हैं। ज़िलों में सारी व्यवस्था डीसी और एसपी के हवाले है मन्त्रीयों और विधायकों की भूमिका भी बहुत सीमित रह गयी है। सरकार चला रहे बाबूओं का जनसंपर्क बहुत सीमित होता है। इनकी जनता  के प्रति सीधी जवाब देही नही होती है। यह जवाब देही राजनीतिक कार्यकर्ता और राजनेता की होती है जिसने जनता से वोट मांगना और लेना होता है। इस समय कोरोना का आतंक एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुका है जहां कभी भी लावा फूट सकता है। आज के हालात 1975 के आपातकाल से भी बदत्तर हो चुके हैं। लेकिन इन बाबूओं को उनकी कोई व्यवहारिक जानकारी नही है क्योंकि प्रशासन के किसी भी स्तर पर आज बैठा हुआ कर्मचारी और अधिकारी 1975 में स्कूल का छात्रा था। आज भी इनका बहुत सारा ज्ञान कंप्यूटर पर आधारित ही है। ऐसे संकट के समय में जनता को आतंकित करने की बजाये उसे सरकारी प्रयासों के बारे में आश्वस्त करना होता है।
महामारी अधिनियम 1897 में बन गया था और तब से लेकर आज तक एक दर्जन के लगभग महामारीयां आ चुकी हैं। हर बार इसी स्तर के नुकससान हुए हैं। ताजा उदाहरण स्वाईनफ्लू का रहा है इसके केस तो इस साल फरवरी 2020 में शिमला, मण्डी और कांगड़ा में रहे हैं। इस फ्लू से आज से ज्यादा जान माला का नुकसान हुआ है। लेकिन तब कोई तालाबन्दी और कर्फ्यू नही लगाया गया था। बहुत सारों को तो शायद इस फ्लू की जानकारी भी नही रही है क्योंकि तब जनता को आतंकित नही किया गया था। यदि इन नीति निरधारक बाबूओं ने स्वाईन  फ्लू का ही ईमानदारी से अध्ययन कर लिया होता तो शायद ऐसे  कर्फ्यू और तालाबन्दी की कोई राय न देता प्रदेश पहले ही कर्ज के चक्रव्यहू में चल रहा है। अब  कोरोना के कारण कर्ज की सीमा 2% और बढ़ा दी गयी है इससे यह बाबू और कर्ज लेकर काम चला देंगे। लेकिन इसका भविष्य पर क्या असर पड़ेगा इससे इनका कोई लेना देना नही है। क्या यदि वर्ष भर हर रोज़ कोरोना के केस आते रहे तो वर्षभर कर्फ्यू जारी रहेगा। सारा काम काज़ बन्द रहेगा। इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

 

जो सरकार तीन लाख का आफिस टेबल खरीद सकती है क्या उसे मंहगाई भत्ता रोकने का नैतिक अधिकार है

                              तकनीकी विश्वविद्यालय का कारनामा
शिमला/शैल।  हिमाचल प्रदेश का हमीरपुर स्थित तकनीकी विश्वविद्यालय अपने कार्यालय के लिये 1.14 करोड़ का फर्नीचर खरीदने जा रहा है। इस खरीद के लिये 5 मई को आनलाईन टैण्डर किये गये। यह विश्वविद्यालय हिमाचल सरकार का संस्थान है और प्रशासनिक स्तर पर तकनीकी शिक्षा विभाग के तहत आता है। इसलिये इसका हर कार्य राज्य सरकार के संज्ञान में रहता है क्योंकि ऐसे बड़े खर्चोें को लेकर प्रशासनिक और वित्तिय अनुमतियां सरकार के ही संवद्ध विभागों से जाती हैं। यह स्वभाविक सामान्य प्रक्रिया रहती है। लेकिन इस फर्नीचर खरीद का कार्य केन्द्र के सीपीडब्लूडी विभाग को सौंपा गया। इसके लिये सीपीडब्लू डी की ओर से टैण्डर जारी किया गया उसमें यह कह दिया गया कि खरीदा जाने वाला फर्नीचर गोदरेज स्ट्रीलकेस हैवर्य या इनके समकक्ष कंपनी का ही होना चाहिये। इसी के साथ वांच्छित फर्नीचर का विवरण जारी करने के साथ ही उसकी अनुमानित कीमत का ब्यौरा भी टैण्डर दस्तावेज में जारी कर दिया गया।
इस तरह जो विवरण सामने आया उसके मुताबिक वाईसचांसलर के कार्यालय के लिये एक 12ग4 फीट का आफिस टेबल लिया जाना है जिसकी अनुमानित कीमत 3.12 लाख होगी। इसी तरह कुछ कुर्सीयां ली जा रही हैं जिनकी कीमत 65000/- , 45000/- और 32000/- प्रति कुर्सी होगी। एक सोफा की कीमत 1,35097/- होगी। इस तरह फर्नीचर के नाम पर जो कुछ भी खरीदा जा रहा है उसकी कीमतें इतनी ज्यादा है कि शायद ही सरकार का कोई भी विभाग इतना मंहगा सामान कार्यालय के लिये खरीदने को समझदारी कहेगा फिर खरीद उस समय की जा रही है जब देश की ही अर्थव्यस्था एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। इसमें केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक ने अपने खर्चों में कटौती करने के फैसले लिये हैं। सूत्रों के मुताबिक इस टैण्डर में दिल्ली की तीन पार्टीयां योगेश सिक्का, आर.के.फर्नीचर और सीएमसी इन्टिरियर ने हिस्सा लिया था। सारी औपचारिकताएं पूरी की थी। लेकिन एक पार्टी सीएमसी का तो शायद टैण्डर खोला तक नही गया और इस तरह के संकेत सामने आये हैं कि केवल गोदरेज का ही सामान लेना है।
इस टैण्डर में किस कंपनी का  सामान लिया जाता है और किसका टैण्डर अप्रूव होता है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि जब प्रदेश वित्तिय संकट से गुजर रहा है और सरकार को वित्तिय वर्ष के पहले दिन से ही कर्ज लेने की बाध्यता खडी हो गयी हो तब भी यदि सरकार का कोई संस्थान इतना मंहगा फर्नीचर खरीदने का साहस करे तो उससे सरकार की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हो जाते हैं। क्योंकि शायद तीन लाख का आफिस टेबल तो मुख्यमन्त्राी, मुख्य सचिव, और सचिव तकनीकी शिक्षा के कार्यालयों में भी न हो। फिर यह भी सवाल उठता है कि जो सरकार इस संकट के दौरान भी तीन लाख का आफिस टेबल खरीद सकती है उसे कर्मचारियों और पैन्शनरों का मंहगाई भत्ता रोकने का कोई नैकित साहस नही रह जाता है। ऐसी सरकार को महामारी के नाम पर जनता से धन सहयोग मांगने का भी अधिकार नही रह जाता है। वैसे तो सरकार के तकनीकी शिक्षा विभाग में फजूल खर्ची और भष्ट्राचार का यह पहला मामला नही है। तकनीकी शिक्षा विभाग द्वारा बिलासपुर में बनवाये जा रहे हाईड्रो इन्जिनियरिंग कालिज में भी ऐसा ही कुछ घट चुका है। वहां पर इसके निर्माण का कार्य भारत सरकार के एक उपक्रम को दिया गया है। इसके लिये भारत सरकार की ओर से प्रदेश को सौ करोड़ रूपया दिया गया है। यह पैसा प्रदेश सरकार द्वारा खर्च किया जाना है इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है काम चाहे जो मर्जी एैजेन्सी करे। इस कालिज के निर्माण के लिये जब भारत सरकार के उपक्रम ने ठेकेदारों से निविदाएं आमन्त्रिात की तब उनमें एक कंपनी ने यह काम 92 करोड़ रूपये में करने की निविदा दी। लेकिन भारत सरकार के इस उपक्रम ने 92 करोड़ की आॅफर को छोड़कर यह काम 100 करोड़ के रेट देने वाले को दे दिया। प्रदेश विधानसभा मे विधायक रामलाल ठाकुर ने इस बारे में दो बार सवाल भी पूछा जिसका केवल लिखित में ही जवाब आया है उसमें भी यह नही बताया गया है कि इसमें आठ करोड़ का प्रदेश का नुकसान क्यों किया गया है। यह निर्माण एक वर्ष पहले ही पूरा हो जाना चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नही है और न ही आज तक विभाग की ओर से इसमें कोई जांच आदेशित की गयी है। वैसे मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव संजय कुंडु एक समय इस केन्द्रिय उपक्रम के प्रमुख रह चुके हैं और आज ऐसे कार्यो की जांच पड़ताल करना उन्ही की जिम्मेदारी है परन्तु वह भी शायद राजनीतिक कारणों से ऐसा नही कर पा रहे हैं। वैसे तो कोरोना संकट के चलते सरकार ने नयी भर्तियों पर रोक लगा दी है। सारे गैर जरूरी खर्चेे कम करने का सुझाव भी पार्टी ने सरकार को दिया है। बल्कि पिछले दिनों केन्द्र की ओर से जो करीब 140 करोड़ रूपया कोविड के लिये आया है उसके तहत कुछ सामान मास्क आदि की आपूर्ति के लिये टैण्डर किया गया था। टैण्डर की सारी प्रक्रियाएं पूरी करके कम दर वाले सपलाई आर्डर अभी तक नहीे दिया गया है। क्योंकि अब शायद सरकार कुछ लोगों को नकद सहायता देने पर विचार कर रही है।




 

















 

रिपन को कोविड अस्पताल बनाने पर शिमला में उठा रोष

 शिमला/शैल। जयराम सरकार ने कर्फ्यू में दो घण्टे की और ढील देने के साथ ही एक और बड़ा फैसला लिया है। इस फैसले के अनुसार अब शिमला के आई जी एम सी अस्पताल की बजाये शहर के दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल को कोविड-19 अस्पताल जामजद किया है। इसके लिये यह तर्क दिया गया है कि आई जी एम सी के कोविड अस्पताल होने से वहां पर अन्य मरीजों के ईलाज में कठिनाई आ रही थी। क्योंकि आई जी एम सी में प्रदेश भर से मरीज रैफर होकर आते हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो गया था कि दूसरे मरीजों के ईलाज के लिये तुरन्त प्रभाव से प्रबन्ध किया जाता।

लेकिन सरकार के इस फैसले में व्यवहारिक समझदारी से काम नही लिया गया। क्योंकि रिपन शिमला का जिला अस्पताल होने के साथ ही शहर के केन्द्र में स्थित है। सबसे बड़ी आनाज़ मण्डी के साथ यह लगता है। इसके कोविड नामजद हो जाने से इसका असर शहर के पूरे बाजार पर पडेगा। इसके आसपास रिहाईशी आवास भी बहुत  है। यहां कोविड केंद्र होने से पूरे क्षेत्र पर बहुत ज्यादा असर पडेगा। इससे कर्फ्यू में मिली  ढील का भी कोई अर्थ नही रह जायेगा। इसको लेकर पूरे शहर में रोष व्यापत है और लोग यहां के स्थानीय विधायक शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज तक अपना रोष पहुंचा चुके हैं।
शिमला में कोविड के उपचार की व्यवस्था होना भी आवश्यक है। इसके लिये बेरियर स्थित अस्पताल भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इसी के साथ इन्डस अस्पताल दूसरा विकल्प है। यह प्राईवेट अस्पताल शहर के ऐसे स्थान पर स्थित है जहां पर स्थानीय आबादी नही के बराबर है। फिर महामारी अधिनियम 2005 में यह प्रावधान मौजूद है कि सरकार संकट के समय किसी भी प्राईवेट संसाधन को अपने अधीन ले सकती है। यदि इसके लिये इन्डस को मुआवजा भी देना पडे तो दिया जा सकता है क्योंकि भारत सरकार से प्रदेश को करीब 140 करोड़ रूपया कोविड के लिये ही मिला है।

कैग रिपेार्ट ने प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर उठाये गंभीर सवाल विभाग मेें गैर जिम्मेदारी और घपले दोनों का नंगा नाच

शिमला/शैल। इस समय पूरा देश कोरोना से लड़ रहा है इस लड़ाई में डाक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मी ही सबसे बड़ा हथियार हैं। डाक्टरों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि देश ने इस तालाबन्दी के दौरान तीसरी बार डाक्टरों और स्वास्थ्य कर्मी के प्रति अपनी कृतज्ञत्ता थाली बजाकर, मोमबत्ती जलाकर और अब सेना द्वारा फूल बरसाकर प्रकट की है। आज जिस तरह की गंभरी परिस्थितियां हैं उनमें स्वभाविक रूप से हर आदमी का ध्यान उसके आस पास के स्वास्थ्य संस्थानों और सेवाओं पर जायेगा ही और सरकार के किसी भी विभाग या सेवा की सही स्थिति का आकलन कैग रिपोर्ट से अनयत्र कहीं नही मिल सकता। इस परिप्रेक्ष में प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की सही स्थिति कैग रिपोर्ट से ही सामने आ सकती है क्योंकि यह रिपोर्ट वाकायदा विधानसभा के पटल पर रखी जाती है। यह अलग बात है कि हमारे माननीयों और मीडिया भी इनकों पढ़ने और समझने का प्रयास नही करते हैं। शीर्ष अफरसशाही इन्हें अच्छी तरह जानती और समझती है क्योंकि इन रिपोर्टों के माध्यम से उन्ही की कार्यप्रणाली का खुलासा सामने आता है। यह रिपोर्ट हर वर्ष तैयार की जाती है।
हिमाचल प्रदेश की वर्ष 2017-18 की 31 मार्च तक के कामकाज की रिपोर्ट विधानसभा में पेश हो चुकी है। 2019-20 की रिपोर्ट अभी तक सदन में नही आयी है। वर्ष 2017-18 की रिपोर्ट में जो कुछ अच्छा बुरा सरकार का इस दौरान रहा है उसका जिक्र इसमें दर्ज है। इस रिपोर्ट में हुए खुलासों पर गंभीर कारवाई हो जानी चाहिये थी। जो लोग इसके लिये जिम्मेदार रहे हैं उनकी जवाबदेही बनती है लेकिन अभी तक ऐसा कुछ सामने नही आया है। इससे सरकार की गैर जिम्मेदारी माना जाये या भ्रष्टाचार को संरक्षण देना माना जाये इसका फैसला पाठक स्वयं कर सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग में डाक्टरों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मीयों के बाद दवाईयां और उपकरणों का आता है। दवाईयों और उपकरणों की खरीद के लिये वाकायदा पाॅलिसी बनी हुई है। अब तो रोगी कल्याण समितियों के माध्यम से भी बहुत सारे काम लिये जा रहे है। स्वास्थ्य विभाग में दवाईयों और उपकरणों की खरीद मार्च 2017 तक प्रदेश सिविल स्पलाईज़ कारपोरेशन के माध्यम से की जाती रही है। इसमें कुछ चीजें इलैक्ट्रानिक कारपोरेशन के माध्यम से भी खरीदी जाती रही हैं।
लेकिन मार्च 2017 में नयी खरीद पाॅलिसी बनाई गयी। इसमें यह कहा गया कि नवम्बर 2016 में जो एसपीसी गठित की गयी थी वह अब खरीद आर्डर सरकार द्वारा स्वीकृत सप्लायरों ने जो रेट कान्ट्रैक्ट पर हैं को ही दें। क्योंकि एसपीसी कार्यशील हो ही नही पायी थी। फिर अक्तूबर 2017 में निर्देश जारी करते हुए सीएमओज़ को ही खरीद के लिये अधिकृत कर दिया गया और यह कहा गया कि वह सीधे केन्द्र के सरकारी उपक्रमों और जनऔषधी केन्द्रों से खरीद कर लें। यदि उनमें उपलब्धता न हो तो स्थानीय स्तर पर भी खरीद कर सकते हैं। सरकार की जनवरी 2016 की अधिसूचना के तहत 66 आवश्यक ड्रग्स की सूची भी तैयार की गयी जो सरकार के हर अस्पताल में लोगों को मुफ्रत दी जानी है। सितम्बर 2017 में इसमें संशोधन करके 43 से 330 ड्रग्स को मुफ्रत देने का प्रावधान कर दिया। वर्ष 2015-16 से 2017 -18 के बीच 146.75 करोड़ के ड्रग्स और 67.87 करोड़ की मशीनरी और उपकरण खरीद किये गये।
इस खरीद और फिर अस्पतालों तक सप्लाई का जो खुलासा रिपोर्ट में सामने आया है वह चैंकाने वाला है। बहुत सारे अस्पतालों में बिना मांग के कहीं मांग से अधिक तो कहीं कम सप्लाई करने का खुलासा है। बहुत सारी मशीनरी और उपकरण बिना उपयोग पड़े हैं। रोगी कल्याण सीमित को वर्ष में 50,000 रूपये तक की खरीद की ही अनुमति है लेकिन इस सीमा का उल्लघंन किया गया है। सीएमओ मण्डी पर कमीशन के लिये लोकल स्तर पर खरीद का आरोप है। बहुत सारी प्रयोगशालाएं तकनिश्यिनों के बिना बन्द पड़ी हुई हैं क्योंकि 884 तकनिश्यिनों के पदों में से केवल 263 ही पद भरे हुए हैं।

Irregular purchase without tenders/ quotations
State Government guidelines for procurement by Rogi Kalyan Samitis (RKS) stipulate that goods valuing above ` 2,000/- cannot be procured without inviting quotations, and such total purchases shall not exceed ` 50,000/- in a year. Scrutiny  of  records  of  RKSs  of  RH  Chamba,  RH  Kullu,  and  ZH  Dharamsala  showed that these hospitals had purchased non-generic drugs & consumables worth ` 5.27 crore from  local  HPSCSC  outlets  during  2015-18  without  inviting  quotations  or  observing codal  formalities.  In  this  context,  it  was  observed  that  the  discount  allowed  by  the HPSCSC outlets on the maximum retail price (MRP) was only up to 10 per cent, while discounts between 40 and 83 per cent on MRP had been obtained by CMO, Mandi after inviting quotations from local suppliers during the same period.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कर्फ्यू पर स्पष्ट फैसला नही ले पाये जयराम

शिमला/शैल। प्रदेश में 24 मार्च से कर्फ्यू चल रहा है। इसके पहले चरण में आवश्यक सेवाओं के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियां बन्द थी। इसका दूसरा चरण 15 अप्रैल से शुरू हुआ और इसमें भी यह गतिविधियां पहले की तरह बन्द रही। दोनों चरणों में यह लागू रहा कि ‘‘ जो जहां है वह वहीं रहेगा।’’ दूसरे चरण में 20 अप्रैल को पूरी स्थिति का नये सिरे से आकलन करके इसमें कुछ गतिविधियों को शुरू करने अनुमति का प्रावधान कर दिया गया। इसके लिये केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक ने दिशा निर्देश जारी किये हैं। भारत सरकार द्वारा जारी निर्देशों में यह साफ कहा गया है कि राज्य केन्द्र के निर्देशों में कोई बदलाव नही कर सकते। बल्कि इन निर्देशों को अपनी आवश्यकता के अनुसार और कड़ा अवश्य कर सकते हैं। केरल सरकार ने जब अपने स्तर पर कुछ और गतिविधियों को शुरू करने की अनुमति दे दी थी तब केन्द्र सरकार ने इसका कड़ा संज्ञान लिया था और इस पर आपति जताई थी।

केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के जो भी दिशा निर्देश इस बारे में अब तक जारी हुए हैं उनमें एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर प्रतिबन्ध जारी है। प्रदेश में तो एक ज़िले से दूसरे ज़िले में जाने पर भी प्रतिबन्ध जारी है। इन निर्देशों की अवहेलना को अपराध का दर्जा दिया गया है। इसको लेकर हज़ारों आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन इन निर्देशों की अवहेलना के ऐसे भी मामले सामने आये हैं जिन पर कोई सख्त कारवाई नही हुई है। प्रदेश में मण्डी और कांगड़ा के सांसद धर्मशाला और जोगिन्द्र नगर पहुंच गये। इस पर सवाल भी उठे। बल्कि शान्ता कुमार तक ने यह कहा कि नियम-कानून सबके लिये एक बराबर होता है। परन्तु भाजपा ने इन सांसदों का खुलकर बचाव किया। यह तर्क दिया गया कि इनके पास आने का अनुमति पास था। इसी तरह किन्नौर के पुलिस अधीक्षक के बच्चे दिल्ली से किन्नौर पहुंच गये। एस पी साहब के पास बच्चों को लाने की अनुमति थी। पंचकूला में जब्बुल के एक कुलदीप सूद फंस गये थे उन्हे मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने जुब्बल पहुंचाने का प्रबन्ध करवाया। हिमाचल के कुछ छात्र राजस्थान के कोटा में फंस गये थे। नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने इस पर सवाल उठाया था। सरकार ने बच्चों को वापिस लाने के लिये अपनी एचआरटीसी की बसें भेजकर प्रबन्ध किया है। शिमला की मस्जिद में कुछ कश्मीरी मजदूर फंसे हुए हैं वह वापिस जाना चाहते हैं। सीपीएम विधायक राकेश सिंघा ने इसके लिये डीसी आफिस के बाहर धरना दिया। इस धरने के बाद इन मजदूरों को भी कश्मीर भेजने का प्रबन्ध कर दिया गया है।
अब जब मजदूरों को प्रदेश के विभिन्न ज़िलों से कश्मीर भेजने का प्रबन्ध कर दिया गया है। तब प्रदेश से बाहर फंसे हुए हज़ारो लोगों ने भी घर वापसी के लिये ऐसे प्रबन्ध किये जाने की गुहार लगा दी है। ऊना के मैहतपुर में हज़ारों की संख्या में ऐसे लोग पहुंच गये हैं। प्रशासन के लिये इसका प्रबन्ध करना समस्या हो गयी है। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि अब जो बाहर फंसे हुए लोगों को घर वापिस लाने के प्रबन्ध किये जा रहे हैं तब यही प्रबन्ध उस समय क्यों नही किये जा सकते थे जब पूरे देश में लाकडाऊन लागू करने का फैसला लिया गया था। अब सभी राज्यों से यह मांग उठ गयी है कि बाहर फंसे हुए लोगों को अपने -अपने राज्यों में वापिस लाने के प्रबन्ध् किये जायें। कोई भी राज्य यह नही कह पा रहा है कि वह अपने लोगों को वापिस लाने के लिये तैयार नही है। सभी इसको प्राथमिकता देने लग पड़े हैं। रेलवे भी इसके लिये विशेष ट्रेने चलाने के प्रबन्ध कर रहा है। अब प्रधानमन्त्राी राज्यों के मुख्यमन्त्राीयों से इस बारे में वीडियो कान्फ्रैंस के माध्यम से सलाह कर रहे हैं लेकिन जब पहली बार लाकडाऊन किया गया था तब राज्यों से कोई बात नही की गयी थी। अब जो बाहर फंसे हुए लोगों को घर वापसी लाने का काम शुरू हो गया है उस पर केन्द्र सरकार की ओर से कोई एतराज भी नही उठाया गया है। जबकि दिशा-निर्देशों में ऐसा कोई प्रावधान अब भी नही किया गया है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इन दिशा निर्देशों की अनुपालना राज्यों को अपने उसी विवके से करनी थी जिससे अब कर रहे हैं।
अभी प्रधानमन्त्री ने .‘‘मन की बात’’ के माध्यम से देश की जनता से बातचीत की है इसमें प्रधानमन्त्री ने ऐसा कोई संकेत नही दिया है कि लाकडाऊन को आगे बढ़ाया जायेगा या समाप्त कर दिया जायेगा। केवल इतना ही इंगित किया है कि ‘दूरी है जरूरी ’’ इसी के साथ यह भी कहा है कि ऐसा नही सोचना होगा कि अब यह वायरस उसके क्षेत्र में नही आ सकता। प्रधानमन्त्री के इन संकेतो से यह सामने आता है कि अभी लाकडाऊन को समाप्त करना आसान नही होगा। फिर कई विशेषज्ञों ने तो यहां तक कहा है कि यह वायरस मई, जून में और बढ़ सकता है। वैसे भी अभी कई राज्यों में इसके केसों में हर रोज़ बढ़ौत्तरी हो रही है भले ही इस बढ़ौत्तरी की गति पहले जितनी न रही हो। लेकिन यह तो केन्द्र सरकार का अपना आकलन रहा है कि एक संक्रमित व्यक्ति 406 लोगों को संक्रमित कर सकता है। इस आकलन से यही निकलता है कि जब तक एक पखवाड़े में कहीं से भी कोई नया केस नही आने की पुख्ता सूचना नही आ जाती है तब तक लाकडाऊन हटाने का फैसला लेना कठिन होगा।
लेकिन इसी सबके साथ ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि आर्थिक गतिविधियों को कब तक बन्द रखा जाये और इसका असर आर्थिक सेहत पर क्या पड़ेगा। इस समय करीब 25% औद्यौगिक उत्पादन को अपना काम शुरू करने की अनुमति दी गयी है। खुदरा बाज़ार में भी आवश्यक वस्तुओं की दुकानों के साथ कुछ सेवाओं को भी बहाल करने का फैसला लिया गया है। लेकिन इस फैसले के साथ पब्लिक परिवहन की कोई सुविधा नही रखी गयी है। जिन सेवाओं को शुरू करवाया गया है उनमें भी यह ध्यान नही रखा गया है कि जब प्लंम्बर या कारपेन्टर को सामान की जरूरत पड़ेगी तो वह सामान कहां से लेगा। क्योंकि हार्डवेयर वाले को तो दुकान खोलने की अनुमति नही दी गयी है। सरकार के निर्माण को तो अनुमति है परन्तु निजि निर्माण को नही। जबकि शायद निजि क्षेत्र में निर्माण कार्य ज्यादा हो रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह फैसले व्यवहारिक नही हैं। केवल फाईलों के आंकड़ो के आधार पर अफसरशाही द्वारा लिये गये फैसले हैं। इन फैसलों पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। इसमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस वस्तु या सेवा को लेकर फैसला लिया जाये उसमें उसके उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया पर एक साथ फैसला लिया जाये। इसमें या तो पूरे बाज़ार को एक साथ खोलकर उसमें प्रशासन व्यवस्था बनाने तक ही अपने को सीमित रखे। क्योंकि ऐसा नही कहा जा सकता कि अमुक वस्तु या सेवा की आवश्यकता नही है। आवश्यकता का पक्ष उपभोक्ता पर छोड़ दिया जाना चाहिये। प्रशासन को इस महामारी की गंभीरता के प्रति आम आदमी को सजग रखने तक ही अपने को सीमित रखना होगा आज हर आदमी अपनी जान बचाने को प्राथमिकता देता है और जब उसे पता है कि यह बिमारी संक्रमण से फैलती है तब वह स्वयं ही इससे बचने का हर उपाय और परहेज करेगा।
इस समय सारा आर्थिक उत्पादन बन्द पड़ा है और यदि लम्बे समय तक यह कर्फ्यू जारी रहा है तो जो उद्योग इस समय प्रदेश में स्थापित है उनके भी पलायन करने की नौबत आ जायेगी। जिन नये उद्योगों की स्थापना के अनुबन्ध हुए पड़े हैं उन्हे अब व्यवहारिक शक्ल लेने में बहुत समय लगेगा। इस समय की आवश्यकता है कि जो पहले से ही स्थापित है उन्हें पलायन से रोका जाये। विपक्ष पूरी तरह सरकार के साथ सहयोग कर रहा है। प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमन्त्री को पत्र लिखकर इस बारे में आग्रह भी किया है। फिर अभी मुख्यमन्त्री ने वीडियो कान्फ्रैंस में प्रधानमन्त्री से कहा है कि प्रदेश में एक सप्ताह से कोरोना का कोई नया मामला नही आया है और छः जिले इससे मुक्त हैं। प्रदेश सरकार इस परिदृश्य में आर्थिक गतिविधियां शुरू करने के लिये पूरी तरह तैयार है। लेकिन इसी के साथ जब मुख्यमन्त्री ने पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा के मामले सामने रखते हुए प्रधानमन्त्री से यह आग्रह भी कर दिया कि अभी लाकडाऊन को समाप्त न किया जाये तो इससे स्थिति कमजोर हो जाती है। जबकि इस समय जब कोरोना पर नियन्त्रण बना हुआ है तब औद्यौगिक गतिविधियां शुरू करने में भी प्रदेश सरकार को पहल करने की आवश्यकता है।

मुकेश अग्निहोत्री का पत्र


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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