Saturday, 17 January 2026
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सरकार के प्रयासों पर सिंघा के धरने से उठे सवाल कर्फ्यू के एक माह में सरकार को ही हो चुका है 400 करोड़ का नुकसान

शिमला/शैल।  कोरोना के कारण पूरे प्रदेश में सरकार ने कर्फ्यू लगा रखा है जो तीन मई तक चलेगा। कर्फ्यू के कारण प्रदेशभर में सारी आर्थिक गतिविधियों पर विराम लग गया है। सारे छोटे-बड़े उद्योगों और अन्य दुकानदारी तक बन्द है। इन सारी गतिविधियों के बन्द होने से जो सरकार को करों और गैर करों के रूप में राजस्व की प्राप्ति होती थी वह भी रूक गयी है। 24 मार्च से शुरू हुए इस कर्फ्यू के कारण सरकार को अब तक करीब चार सौ करोड़ का नुकसान हो चुका है। यह मुख्यमन्त्री ने कर्फ्यू लगने के बाद आयोजित हुए पत्रकार सम्मेलन में माना है। अभी कर्फ्यू को लगे लगभग एक माह ही हुआ है और इसी दौरान सरकार ने करीब पांच सौ करोड़ का ऋण भी ले लिया है। ऋण के अतिरिक्त भारत सरकार ने भी कोरोना के लिये सरकार को 223 करोड़ की सहायता उपलब्ध करवाई है। इसी सहायता के बाद सरकार ने विधायकों-मन्त्रीयों के वेत्तन भत्तों में कटौती तथा विधायकों को मिलने वाली क्षेत्र विकास निधि भी दो वर्ष के लिये बन्द कर दी है। प्रदेश के कर्मचारियों के वेत्तन में भी एक दिन की कटौती कर दी है।
कर्फ्यू के एक माह के भीतर ही सरकार को वित्तिय स्तर पर यह सारे कदम उठाने पड़ गये हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि यह कर्फ्यू की अवधि लम्बे समय तक चलानी पड़ी तो शायद सरकार का वित्तिय संकट और बढ़ सकता है। इससे यह भी अन्दाजा लगाया जा सकता है कि उन कामगारों और छोटे उद्योगपतियों तथा दुकानदारों की हालत क्या होगी जिनका कामकाज़ पूरी तरह बन्द पड़ा हुआ है। इस समय प्रदेश में कर्फ्यू के कारण लाखों मज़दूर और उनके परिवार प्रभावित हुए हैं। इन प्रभावितों को खाने तक का संकट खड़ा हो गया है। हालांकि सरकार यह प्रयास और दावा भी कर रही है कि हर आदमी को आवश्यक राशन उपलब्ध करवाया जा रहा है। राशन पहुंचाने के काम में एनजीओज से भी मद्द ली जा रही है। लेकिन राजधानी में ही ज़िलाधीश कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे विधायक राकेश सिंघा ने सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। सिंघा ने शिमला की जामा मस्जिद में रह रहे 129 मज़दूरों की स्थिति जब प्रशासन के सामने रखी तो प्रशासन ने यह जवाब दिया कि वह 1200 लोगों को एनजीओ के माध्यम से खाना उपलब्ध करवा रहे हैं। वैसे ज़िलाधीश ने गैर सरकारी संगठनों पर प्रशासन के आदमी के बिना यह राशन आदि बांटने को मना कर रखा है। क्योंकि बहुत सारी जगहों से यह शिकायतें आ रही थी कि दो किलो राशन चार-पांच आदमीयों को पकड़ा कर केवल फोटो खिंचवाने का ही सोशल वर्क हो रहा था। छोटा शिमला क्षेत्र से भी इस तरह की शिकायत रही है।
सिंघा ने प्रशासन को ऐसे मज़दूरों की सूचीयां उपलब्ध करवाई हैं जिनके पास राशन नही है। प्रशासन जब सिंघा के दावों को खारिज कर रहा था उसी समय मण्डी से 34 मज़दूरों का यह सन्देश आने से सरकार की और फजीहत हो गयी जब उन्होने यह शिकायत की न तो उनके पास खाने को है और न ही ठहरने की व्यवस्था। वह एक तंबू में समय काट रहे हैं जबकि उन्हे एक स्कूल में ठहराने का आश्वासन दिया गया था। कुल्लु में मज़दूरों को खाना न मिलने का तो एक लाईव विडियो तक जारी हो चुका है। हमीरपुर,पंडोह और बरोट में तो मज़दूरों से मार पीट तक हो चुकी है।

खरीद एवम् आपूर्ति नियमों में 31 मई तक हुआ बदलाव

शिमला/शैल। कोविड-19 का प्रभाव हिमाचल प्रदेश में देश के अन्य राज्यों की तुलना में बहुत कम है। यह कमी सरकार के प्रयासों का परिणाम है क्योंकि सरकार ने लाकडाऊन के साथ ही कफर्यू भी पूरे प्रदेश में लगा दिया था। कफ्रर्यू की अनुपालना में पूरी सख्ती अपनाई गयी। प्रदेश में जहां अन्य राज्यों के लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया गया वहीं प्रदेश के भीतर भी एक जिले से दूसरे जिले में जाने के लिये भी रोक लगा दी गयी। इन प्रशासनिक प्रबन्धों के साथ ही इस महामारी से लड़ने के लिये आवश्यक सामान और सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये बहुत सारी औपचारिकताओं को भी हटा दिया गया है।

किसी भी तरह के सेवा या सामग्री की आपूर्ति के लिये वित्तिय नियमों-2009 में एक ठोस प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। इन प्रावधानों की अवहेलना अपराध की श्रेणी मे आती है। इसमें किसी भी आपूर्ति के लिये टैण्डर प्रक्रिया अपनानी पड़ती है और कई बार इसमें आवश्यकता से अधिक समय लग जाता है। इस समय कोविड-19 का प्रकोप एक ऐसी शक्ल ले चुका है जिसमें इसके लिये वांच्छित सेवाओं और सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये वित्तिय नियमों में दी गयी औपचारिकताओं की अनुपालना करने में बहुत समय लगने की संभावना है। इन्हें पूरा करते हुए बहुत नुकसान हो सकता है। समस्या की इस गंभीरता को सामने रखते हुए वित्तिय नियमों में प्रक्रिया संबंधी जो औपचारिकताएं नियम 91-से 121 तक दी गयी हैं उनकी अनुपालना में 31 मई तक छूट प्रदान कर दी गयी है। माना जा रहा है के नियमों में विधिवत छूट का प्रावधान पिछले दिनों स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गयी खरीद पर उठे सवालों के परिदृश्य में किया गया है।


 


























कोरोना से निपटने के सरकारी प्रयासों पर उठने लगे सवाल क्या राकेश पठानिया की तर्ज पर दूसरे विधायक भी लायेंगे सैनेटाईजेशन मशीने

शिमला/शैल। कोरोना को लेकर की गयी तालाबन्दी का पहला चरण समाप्त हो रहा है। दूसरे चरण का आदेश प्रतिक्षित हैं। तालाबन्दी 30 अप्रैल तक दूसरे चरण में बढ़ाई जा रही है। कुछ राज्य सरकारों ने तो केन्द्र के आदेश से पहले ही अपने राज्यों में बढ़ौत्तरी की घोषणा कर दी है। इस बार प्रधानमन्त्री ने राज्य सरकारों से मन्त्रणा भी की है। कोरोना की स्थिति हर राज्य में अलग-अलग है। हर राज्य ने अपने -अपने यहां इसके हाट स्पाट चिन्हित कर लिये हैं जिनके चलते कोई भी राज्य इस स्थिति में नही है कि वह तालाबन्दी समाप्त करने का जोखिम उठा सके। क्योंकि यह आकलन सामने आ चुका है कि यदि तालाबन्दी न की जाती तो संक्रमितों की संख्या शायद आठ लाख से भी ऊपर जा चुकी होती। इसी के साथ यह भी आकलन है कि एक पाजिटिव 406 लोगों को संक्रमित कर सकता है। स्वभाविक है कि इस तरह के आंकड़े सामने होने की स्थिति में कोई भी सरकार यह नही चाहेगी कि जब तक एक भी संक्रमित केस मौजूद रहेगा तो तालाबन्दी खत्म करने का जोखिम नही लिया जा सकता है।
इस वस्तुस्थिति में यह सवाल जवाब मांगता है कि फिर किया क्या जाये। किसी भी महामारी में जो कुछ भी किया जाता है वह केवल डाक्टरों की सलाह पर ही किया जाता है। इस कोविड-19 के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्व स्वास्थय संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित करके हर देश के लिये अलग-अलग एडवाईज़री जारी की हुई है। भारत में इससे कम्यूनिटी संक्रमण का खतरा भी बताया गया था और इसी सलाह पर शैक्षणिक और धार्मिक स्थलों को बन्द कर दिया गया था। लेकिन अब इस आकलन को गलती मानकर यह कहा गया है कि कम्यूनिटी संक्रमण नही हैं। परन्तु एक आकलन यह भी आया है कि देश में 38.46%संक्रमित ऐसे केस है जिनकी कोई ट्रैवल हिस्ट्री नही है। यह लोग किसी भी संक्रमित के सम्पर्क में नही आये हैं। कोई भी संक्रमित इनके पास नही आया है। यह एक सबसे गंभीर बिन्दु है क्योंकि इससे यह सामने आता है कि कोरोना का शिकार कोई भी हो सकता है। इससे अब तक जितने भी लोगों की मौत हुई है उनमें अधिंकांश ऐसे रहे हैं जो कोरोना के साथ ही अन्य बिमारीयों से भी पीड़ित चल रहे थे। इसके ईलाज में लगे कई डाक्टर और अन्य स्वाास्थ्य कर्मी भी इसके संक्रमण का शिकार हो चुके हैं। इस पर खोज कर रहे वैज्ञानिक इसके कारणों पर अभी तक एकमत नही हो पाये हैं।
ऐसी वस्तुस्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि स्वास्थ्य को लेकर आवश्यक सावधनियां और अनिवार्यताएं अमल में लायी जाएं। जब तालाबन्दी में अस्पतालों में अन्य मरीजों के ईलाज पर एक तरह से रोक लगी हुई है तो क्या उससे यह संभावना स्वतः ही नही बढ़ जाती है कि ऐसे मरीज़ इसके शिकार आसानी से हो सकते हैं। इसलिये यह आवश्यक हो जाता है कि अन्य बिमारियों पर पूरी गंभीरता अपनाई जाये। क्योंकि कोरोना के लिये अलग से अस्पताल चिन्हित करके नामज़द कर दिये गये हैं। इसी के साथ यह आवश्यक हो जाता है कि सैनटाईजेशन का कार्यक्रम हर घर तक पहुंचाया जाये क्योंकि इसके परेहज़ में आपसी दूरी बनाये रखने से पहले यह कदम जरूरी है। इसके ईलाज में लगे डाक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मीयों के पास आज भी आवश्यक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पूरी मात्रा में उपलब्ध नही हैं इस सन्दर्भ में हमीरपुर के डाक्टरों का यह पत्र इसकी तैयारीयों का पूरा खुलासा सामने रख देता है।
माननीयों के वेत्तन भत्तों में कटौती कर दी गयी है। इस कटौती से हटकर विधायक राकेश सिंघा ने पूरे वर्ष का वेत्तन मुख्यमन्त्राी राहत कोष में दे दिया है। न्यायूर्मित विवेक ठाकुर ने राज्यपाल को अपने सहयोग का 2.51 लाख का चैक दिया है। लेकिन नुरपूर के विधायक राकेश पठानिया ने अपने चुनाव क्षेत्रा में एक स्टीम सैनेटाईजेशन मशीन नूरपूर अस्पताल को भेंट की है। इस मशीन के संचालन की विधि भी स्वयं स्वास्थ्य कर्मीयों को सिखाई है। आज प्रदेश के हर अस्पताल में इस बुनियादी मशीन की आवश्यकता है। लेकिन राकेश पठानिया की पहल के वाबजूद न तो किसी अन्य विधायक या सरकार की ओर से ही ऐसी मशीने बड़े पैमाने पर उपलब्ध करवाने के प्रयास सामने आये हैं। कोरोना की बढ़ती विकरालता को सामने रखते हुए सरकार को इस तरह के कदमों को प्राथमिकता देनी होगी।

फेक न्यूज से लेकर आवारा पशु और व्यापारी वर्ग के पत्र ने बढ़ाई सरकार की मुश्किल

शिमला/शैल।  हिमाचल सरकार ने फेक न्यूज रोकने और उसके खिलाफ कारवाई करने के लिये निदेशक लोक संपर्क की अध्यक्षता में एक आठ सदस्यों की कमेटी का  गठन किया है। इस कमेटी के अतिरिक्त एक बैव पोर्टल भी जारी किया गया है। सरकार के इन कदमों के बाद अभी मुख्यमन्त्री के अपने ज़िले मण्डी में ही सेाशल मीडिया में भ्रामक और भड़काऊ पोस्ट डालने के लिये सात केस दर्ज किये गये हैं। एसपी मण्डी गुरदेव चन्द के अनुसार इन पोस्टों में एक समुदाय विशेष के लोगों को निशाना बनाया गया है। स्मरणीय है कि जब से निजा़मुद्दीन मरकज दिल्ली में तब्लीगी समाज का समागम हुआ है उसके बाद से पूरे देश में एक प्रचार कर दिया गया कि यही समाज कोरोना के लिये जिम्मेदार है। कुछ मीडिया कर्मीयों ने तो इन्हें तालीबान और मानव बमों की संज्ञा तक दे दी। इस तरह के प्रचार के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर हुई और मीडिया के लिये दिशा निर्देश जारी करने का आग्रह किया गया। इस आग्रह पर सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र और केन्द्र ने राज्य सरकारों को निर्देश जारी किये जिन पर कमेटीयों के गठन के कदम उठाये गये हैं। अभी सर्वोच्च न्यायालय में एक और याचिका दायर हुई हैं जिसमें केजरीवाल सरकार के खिलाफ मरकज मामले में सीबीआई जांच की मांग की गयी है।
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग बहुत ही सुनियोजित ढंग से देश के मुस्लिम समुदाय को निशाना बना रहा है। आज यह पूरी स्थिति इस तरह विस्फोटक हो चुकी है कि इस महामारी में भी इस प्रचार को विराम नही दिया जा रहा है। महामारी के प्रकोप से जब भी समाज निजात पायेगा तब यह मुद्दा एक बहुत बड़ी सार्वजनिक बसह का विषय बनेगा यह तय है। यह भी तय है कि इस प्रचार से जिस तरह का ध्रु्रवीकरण आगे शक्ल लेगा उससे सबसे ज्यादा नुकसान सत्ता पक्ष को ही होगा। शायद सत्ता पक्ष को भी इसका आभास होने लगा पड़ा है। इसलिये आज फेक न्यूज को लेकर कमेटी गठन से पुलिस में आपराधिक मामले दर्ज करने की नौबत आ गयी है। क्योंकि इस समय तालाबन्दी से जिस तरह का आर्थिक संकट देश के समाने खड़ा हो गया है उससे बहुत सारे लोगों के लिये रोटी का संकट पैदा हो गया है रोटी के इस संकट से शायद कोई भी प्रदेश अछूता नही बचा है। हिमाचल में ही सरकार के सारे प्रत्यनों के वाबजूद प्रदेश के कई भागों से ऐसी शिकायतें आनी शुरू हो गयी है। कुल्लु के सरबरी में प्रवासी मज़दूरों को खाना नही मिल पाया है। बरोट और पन्डोह में कश्मीरी मज़दूरों को पीटने का विडियो वायरल हो चुका है। हमीरपुर में प्रवासी मज़दूरों की पिटाई को लेकर पुलिस में मामला दर्ज हो चुका है। आज प्रदेश के बहुत सारे क्षेत्रों में लोगों की निर्भीरता प्रवासी मज़दूरों पर हो चुकी है। लेकिन जिस तरह से इन मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है उससे आने वाले दिनों में खेत से लेकर बागीचों तक लेबर का संकट खड़ा हो जायेगा।
इस समय समुदाय विशेष को निशाना बनाने वाले समाज का गोरक्षा को लेकर भी दोहरा चरित्र सामने आने लग पड़ा है। सरकार ने जिस बड़े पैमाने पर हर पंचायत में गोशालाएं खोलने का अभियान छेड़ा था और उसके लिये ज़मीन तथा धन दोनों उपलब्ध करवाये गये हैं। लेकिन आज यह गौधन फिर आवारा पुशओं की शक्ल में लोगों के खेतों में नुकसान कर रहा है या फिर खुले आसमान के नीचे विचरण कर रहा है क्योंकि गौशाला वालों ने चारे के अभाव में इसे खुला छोड़ दिया है। इससे सरकार की पूरी योजना और गाय की रक्षा के सारे दावों की हवा निकल गयी है।
तालाबन्दी में आर्थिक गतिविधियां किस कदर प्रभावित हुई है और उससे व्यापारी वर्ग किस तरह आहत हुआ है उसका अन्दाजा इससे लगाया जा सकता है कि व्यापारीयों कि ओर से भी एक पत्र सोशल मिडिया के मचों पर वायरल हुआ है जिसमें सरकार से कई राहते मांगी गई है। इन्होने तर्क दिया है कि जिस तरह से सूखा प्रभावित किसानों को आर्थिक सहायता दी गई है उसी तर्ज पर इन्हें भी सहायता दी जाये। इस कथित पत्र से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या सरकार इस वर्ग की इन मांगो को पूरा कर पायेगी।

2541.43 करोड़ के मुद्रा ऋण का सच क्या है

शिमला/शैल। मोदी सरकार ने 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले फरवरी 2018 में एक मुद्रा ऋ.ण योजना शुरू की थी। केन्द्र के अनुसार यह योजना उन सभी सुक्ष्म उद्यमों को विकसित करने और पुर्निवित्त करने के लिये जिम्मेदार है जो वित्त संस्थानों का समर्थन करते हैं और मुख्य रूप से विनिर्माण व्यापार, सेवा और गैर कृषि क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले सभी अग्रिम जो 8-4-2015 को या इसके बाद इस योजना के अधीन आये हों को मुद्रा ऋण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस योजना के तहत देशभर में करीब 11 लाख करोड़ के ऋण दिये गये हैं।
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2019-20 में इस  योजना के तहत 17562 नये लघु उद्यमियों को 425.19 करोड़ के ऋण प्रदेश के बैंको द्वारा उपलब्ध करवाये गये हैं। सितम्बर 2019 तक प्रधानमन्त्री मुद्रा योजना के तहत 1,45,838 उद्यमियों को 2541.43 करोड़ के ऋण वितरीत किये गये हैं। वर्ष 2019-20 के विधानसभा में रखें गये आर्थिक सर्वेक्षण में इसे सरकार की बड़ी उपलब्धि के रूप में दिखाया गया है।
हिमाचल प्रदेश में पंजीकृत छोटी-बड़ी औद्योगिक ईकाईयों की संख्या अभी 60 हज़ार से कम है। इनमें कार्यरत कामगारों की संख्या भी 1.50 लाख के करीब है। वैसे कामगार बोर्ड के पास तो पंजीकृत कामगारों की संख्या 56000 के करीब है। लेकिन प्रधानमन्त्री मुद्रा ऋण योजना के तहत 1,45,838 उद्यमियों को 2541.43 करोड़ के ऋण दे दिये गये हैं। इसके मुताबिक प्रदेश में इतने उद्योग स्थापित हो गये हैं। लेकिन सरकार के उद्योग विभाग, श्रम एवम् रोज़गार विभाग तथा कामगार बोर्ड के आंकड़ों में भिन्नता होने के कारण इस पर सन्देह बन जाता है। विभिन्न बैंकों से जब ऐसे ऋण लाभार्थियों की सूची लेने का प्रयास किया गया तो उनके पास ऐसी सूची उपलब्ध ही नही थी। किसी भी बैंक ने ऐसे लाभार्थियों के उद्यमों का अपने स्तर पर कोई निरीक्षण किया हो इसका भी कोई रिकार्ड उपलब्ध नही था। इस ऋण से कितने लाभार्थी इस ऋण की वासपी की किश्तें नियमित रूप से अदा कर रहे हैं इसका भी कोई उचित रिकार्ड बैंकों के पास उपलब्ध नहीं था। बैंकों के विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक ऐसे लाभार्थीयों का कोई ठोस रिकार्ड ऋण देते हुए लिया ही नही गया है।
आज जब देश और प्रदेश कोरोना संकट से जुझते हुए मन्त्रीयों, विधायकों के वेत्तनभत्तों में कटौती करने के कगार पर पहुंच गया है तक यह आवश्यक हो जाता है कि इस तरह के खर्चों की पूरी जांच करके तथ्य जनता के सामने लाये जायें क्योंकि यह पैसा प्रदेश के आम आदमी का पैसा हैं।

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