Saturday, 17 January 2026
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क्या लाक डाउन और कर्फ्यू लगाकर ही सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार ने पूरे प्रदेश में 23 मार्च से लाक डाउन लागू कर दिया है। लाक डाउन के दौरान कौन सी सेवाएं उपलब्ध रहेगी और सामान्य नागरिकों से क्या अपेक्षाएं रहेंगी इसका पूरा जिक्र मुख्य सचिव के आदेश में दर्ज है। कोरोना की प्रदेश में वास्तविक स्थिति क्या है इसका खुलासा अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य आर डी धीमान ने एक पत्रकार वार्ता में सामने रखा है। उनके मुताबिक अब तक 1030 मामले निगरानी में रखे गये थे। जिनमें से 387 व्यक्ति निगरानी के 28 दिन पूरे कर चुके हैं और अब उनमें इस रोग के कोई लक्षण नही हैं तथा पूरी तरह स्वस्थ हैं। अब केवल 515 लोग निगरानी में चल रहे हैं। प्रदेश में आई.जी.एम.सी. शिमला, राजेन्द्र प्रसाद मैडिकल कालिज टाण्डा और राजकीय मैडिकल कालिज नेरचैक मण्डी में आईसोलेशन वार्ड बना दिये गये हैं। प्रदेश में मुख्यमन्त्री के मुताबिक कोरोना के केवल दो मामले पाजिटिव पाये गये हैं। मुख्यमन्त्री और अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य के ब्यानों के मुताबिक कोरोना से भयभीत होने की आवश्यकता नही है।
कोरोना विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा महामारी घोषित की गयी है। दुनिया के अधिकांश देशों में फैल चुकी और अभी तक इसका कोई अधिकारिक ईलाज भी सामने नही आया हैं। केवल इसके लक्षणों की जानकारी उपलब्ध है और यह बताया गया है कि यह संक्रमण से फैलती है और संक्रमण एक दूसरे के संपर्क में आने से होता है। इसलिये अभी तक केवल संक्रमण से ही बचने के उपाय किये जा सकते हैं और इसके हर उस आयोजन को बंद कर दिया गया है जहां भी दूसरे के संपर्क में आने की संभावनाएं रहती हैं। सरकार ऐसे आयोजनों पर जनता कर्फ्यू और लाक डाउन के आदेश जारी होने से पहले ही प्रतिबन्ध लगा चुकी है। अब जब लाक डाउन के आदेश आ गये हैं तो इसमें सबसे ज्यादा प्राईवेट सैक्टर के कारोबार पर असर पडे़गा। दिहाड़ीदार मज़दूर सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। इसलिये यह सवाल उठना स्वभाविक है कि सरकार इस वर्ग के लिये क्या सहायता उपलब्ध करवायेगी इस बारे में अभी तक सरकार की ओर से कोई घोषणा सामने नही आयी है। सरकार आवश्यक सामान की आपूर्ति तो सुनिश्चित करने के प्रयास तो कर रही है लेकिन यह कैसे सुनिश्चित होगा कि दिहाड़ीदार मज़दूर यह आवश्यक सामान खरीद सकने की क्षमता में भी है या नही।
इसी के साथ एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या लाक डाउन और कर्फ्यू ही सरकार के स्तर पर आवश्यक कदम हैं। जब कोई दवाई तक सामने नही आयी है और हर व्यक्ति को सैनेटाईज़र प्रयोग करने की सलाह दी  जा रही है तो क्या सार्वजनिक स्थालों पर इसका छिकड़काव किया जाना आवश्यक नही होना चाहिये। क्योंकि इस समय दवाई के अभाव में सैनेटाईज़र और अन्य कीटनाश्कों का छिड़काव ही एक मात्र विकल्प रह जाता है। लेकिन सरकार की ओर से इस दिशा में अभी तक कोई कदम नही उठाये जा रहे हैं। इस रोग के परीक्षण की सुविधा और आईसोलेशन वार्डों की उपलब्धता ही ज़िला मुख्यालय पर उपलब्ध नही है। प्रदेश के सारे मैडिकल कालिजों तक में यह सुविधा उपलब्ध नही है। क्या सरकार की प्रशासनिक स्तर पर सारे सामूहिक आयोजनों पर प्रतिबन्ध लगाकर ही जिम्मेदारी पूरी हो जाती है इसको लेकर अब सवाल उठने शूरू हो गये है। व्यापारिक संगठनों ने व्यापार प्रभावित होने के कारण आर्थिक सहायता की मांग तक कर दी है। लेकिन सरकार अभी तक प्रदेश की जनता को यह नही बता पायी है कि उसने इस बीमारी से निपटने के लिये कितना आर्थिक प्रावधान कर रखा है।
यह माहमारी एक प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आयी है और प्राकृतिक आपदायें पूर्व निश्चित होती है। यह आकस्मिक होती है और इसलिये संविधान की धारा 267 के तहत बजट में आकस्मिक निधि का प्रावधान रखा गया है ताकि आवश्यकता पड़ने पर उस निधि से पैसा निकाला जा सकें। लेकिन प्रदेश में कुछ अरसे से आकस्मिक निधि के तहत कोई धन का प्रावधान ही किया जा रहा है और कभी कोई माननीय इस ओर ध्यान ही नही दे रहा है। कैग रिपोर्ट में इसको लेकर सरकार के खिलाफ सख्त टिप्पणी की गयी है। बल्कि कैग ने तो इसी के साथ रिस्क फण्ड रखने की भी बात की है। लेकिन कैग की टिप्पणी के वाबजूद सरकार की ओर से कोई कदम न उठाया जान कई सवाल खड़े करता है।

क्या राठौर की कार्यकारिणी भाजपा को चुनौती दे पायेगी या अपने ही भार में दब जायेगी

 

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की 197 सदस्यों की कार्यकारिणी अन्ततः घोषित हो गयी है। यह कार्यकारिणी घोषित करने में जितना लम्बा समय लिया गया और फिर जिस बड़े आकार में यह सामने आयी है उससे पार्टी के भीतर चल रही खींचतान का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। क्योंकि इसमें जहां सभी विधायकों को स्थान देने का प्रयास किया गया है वहीं पर सभी बड़े नेताओं के परिजनों को भी पद दिये गये हैं। 197 सदस्यों की कार्यकारिणी में 153 पदाधिकारी हैं। स्मरणीय है कि 2019 के शुरू में ही सुखविन्दर सुक्खु को हटाकर कुलदीप राठौर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन इस बदलाव के बाद  भी पार्टी लोकसभा की चारों सीटें हार गयी। इस हार के कारणों पर हुए मंथन का निष्कर्ष क्या रहा इस पर कोई खुली बहस करने की बजाये थोड़े समय बाद कार्यकारिणी को ही भंगकर दिया गया। कार्यकारिणी भंग होने के बाद हुए दोनों विधानसभा उपचुनावों मंे फिर पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा क्योंकि धर्मशाला में पार्टी जमानत तक नही बचा पायी। इसी सबके कारण यहां तक अटकलें चल निकली थी कि अध्यक्ष को भी बदला जा रहा है। अब राठौर तो अपना पद बचाने में सफल हो गये हैं लेकिन यह सवाल उठ गया है कि क्या इतनी बड़ी कार्यकारिणी के साथ अगले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस आसानी से भाजपा से सत्ता छीन पायेगी।
अभी जयराम सरकार का तीसरा बजट आया है और इस कार्यकाल के दो और बजट आने शेष हैं। कार्यकाल का अन्तिमवर्ष तो चुनाव का वर्ष होता है। इस परिप्रेक्ष में अभी जो एक डेढ़ वर्ष का कार्यकाल होगा उसी में विपक्ष सरकार को घेरने और सरकार विपक्ष को कमजोर करने का प्रयास करेगा। सरकार को घेरने के लिये उसकी नीतियों और उनके सहारे किये जाने वाले उपलब्धियों के दावों की सत्यता जनता के सामने लानी होती है। इसी के साथ दूसरा बड़ा हथियार भ्रष्टाचार होता है। सरकार में कहां-कहां भष्टाचार हुआ है विपक्ष उसको हथियार बनाता है इसके लिये सरकार के खिलाफ आरोप पत्र लाये जाते हैं। लेकिन अभी तक के कार्याकाल में कांग्रेस ऐसा कोई प्रयास नही कर पायी है। आने वाले दिनों में इस दिशा में क्या होगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन पूर्व में दोनांे पार्टीयां बतौर विपक्ष एक दूसरे के खिलाफ कई आरोप पत्र लायी हुई हैं जिन पर आज तक कोई जांच नही हो पायी है। ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि कांग्रेस जयराम सरकार के खिलाफ ठोस आरोप लेकर आती है या जयराम सरकार वीरभद्र शासन के खिलाफ लाये अपने ही आरोप पत्रांे पर जांच और कारवाई का साहस जुटा पाती है। क्योंकि इस समय जिस तरह से नेता प्रतिपक्ष मुकेश अन्गिहोत्री , पूर्व अध्यक्ष सुक्खु, जगत सिंह नेगी , हर्षवर्धन चैहान और रामलाल सदन में सरकार पर आक्रमकता बनाये हुए हैं क्या उसको सदन के बाहर पार्टी और प्रभावी ढंग से बढ़ा पाती है या नही। यह राठौर के लिये भी परीक्षा का समय होगा।
इस समय कार्यकारिणी में बारह प्रवक्ता और 69 सचिव हैं। यदि यह लोग ईमानदारी से पूरे अध्ययन के साथ प्रदेश और राष्ट्रीय मुद्दों को जनता तक ले जाते हैं तो निश्चित रूप से एक बदलाव का वातावरण तैयार करना कठिन नही होगा। लेकिन इतने बडे़ आकार की कार्यकारिणी में जिस तरह से परिवारवाद भारी रहा है उससे यह आशंका अभी से खड़ी हो गयी है कि क्या पार्टी बड़े नेताओं के साये से बाहर आ पायेगी। क्योंकि 2014 से लगातार हर चुनाव हारती आ रही है। संगठन और सरकार में लगातार अन्ततः विरोध रहे हैं। एक व्यक्ति एक पद के सिन्द्धात को सीधे-सीधे अंगूठा दिखाया गया। पार्टी के समानान्तर एनजीओ के नाम से संगठन खड़ा करने के प्रयास किये गये। एनजीओ के अध्यक्ष ने पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ अदालत का दरवाजा तक खटखटाया। आज उस एनजीओ के लगभग सारे पदाधिकारी राठौर की कार्यकारिणी में शामिल हैैं। लेकिन इस कार्यकारिणी में धर्मशाला उपचुनाव के पार्टी उम्मीदवार या उसके समर्थकों को जगह नही मिल पायी है। दूसरी ओर धर्मशाला में सुधीर शर्मा के अन्तिम क्षणों में उपचुनाव से किनारा करने के कारणों को लेकर कुछ भी सामने नही आया है। पार्टी में नये लोगों को जोड़ने के कोई प्रयास नही किये गये हंै। बल्कि भाजपा से कांग्रेस में सुरेश चन्देल भी लगभग हाशिये पर ही चल रहे हैं।
इस परिदृश्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि राठौर की यह कार्यकारिणी सही अर्थों में कांग्रेस के लिये चुनौती पेश कर पायेगी या फिर अपने ही भार तले दम तोड़ देगी। क्योंकि जिस तरह से कर्नाटक, गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा कांग्रेस के अन्दर तोड़फोड के प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रयास करने में लगी है उसका असर सभी प्रदेशों पर होगा यह तय है।

 

बाहरा विश्वविद्यालय भी आया सवालों में

शिमला/शैल। बाहरा विश्वविद्यालय के फिजियोथैरपी विभाग के छः छात्रों ने सोशल मीडिया मंच के माध्यम से अपनी एक शिकायत विधायक विक्रमादित्य सिंह को भेजी है। शिकायत के मुताबिक पिछले कुछ अरसे से अध्यापक उनकी क्लास नही ले रहे हैं। इस संबंध में यह छात्र विश्वविद्यालय के वाईस चान्सलर तक अपनी शिकायत दे चुके हैं। अध्यापक इसलिये क्लास नही ले रहे हैं क्योंकि उन्हे कुछ समय से वेतन नही मिल रहा है। छात्रों का कहना है कि वह नियमित रूप से वेतन फीस विश्वविद्यालय को दे रहे हैं। दूसरी ओर अध्यापक इसलिये नही पढ़ा रहे हैं क्योंकि उन्हें समय पर वेतन नही मिल रहा है। ऐसे में जब छात्रों की परीक्षा सिर पर हैं तब अध्यापक इसी तरीके से विश्वविद्यालय प्रशासन पर अपना दवाब बना सकते हैं।

बाहरा विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों की इस समस्या ने एक बार फिर निजि शिक्षण संस्थानों को लेकर बनाये गये नियामक आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिये हैं क्योंकि प्राईवेट शिक्षण संस्थानों पर निगरानी रखने के लिये यही सबसे बड़ा मंच है। बाहरा विश्वविद्यालय की जब स्थापना हुई थी तब इसको मिली जम़ीन को लेकर भी सवाल उठे थे। सूत्रों के मुताबिक आज भी विश्वविद्यालय के पास एक बड़ा भूभाग ऐसा है जिसे अभी तक उपयोग में नही लाया गया है। धारा 118 के प्रावधानों पर अमल करते हुए ऐसी ज़मीन को वापिस लिया जा सकता है लेकिन प्रशासन ने इस ओर अभी तक कोई कदम नही उठाया है। सूत्रों के मुताबिक विश्वविद्यालय के संचालक समानान्तर में होटल व्यवसाय में भी आ चुके हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि शायद छात्रों की फीस के पैसे को कहीं दूसरी जगह निवेश किया जा रहा है। अब जब प्रदेश के कुछ निजि विश्वविद्यालयों के खिलाफ फर्जी डिग्रीयां बेचने को लेकर जांच चल रही है तब बाहरा विश्वविद्यालय के छात्रों की शिकायत को हल्के से लेना गलत होगा।

 

कोरोना के चलते स्वास्थ्य संस्थानों में खाली पदों को तुरन्त भरा जायेःराठौर

शिमला/शैल। कोरोना को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महामारी घोषित कर दिया है। आधा विश्व इसकी चपेट मे है। अमेरीका और इटली में तो इसके कारण आपातकाल घोषित कर दिया गया है। भारत में भी कई राज्यों में इसे महामारी घोषित करके सारे शिक्षण संस्थान सिनेमा स्थल, सार्वजनिक सभाओें, मेले, त्योहारों पर होने वाली भीड़ पर प्रतिबन्द लगाने के निर्देश प्रशासन को जारी हो चुके हैं। सर्वोच्च नयायालय सहित कई उच्च न्यायालयों ने केवल आवश्यक मामलें में ही सुनवाई करने का फैलसा लिया है। यह कदम इसलिये उठाये गये हैं क्योंकि अभी तक इसका कोई अधिकारिक ईलाज सामने नही आ पाया है। इस सयम सावधानी बरतने और जन मानस को इसके प्रति सचेत करना ही एकमात्र उपाय इस समय रह गया है। जनता इसके प्रति जागरूक हो और वह हर तरह के संभव प्रतिरोधक कदम उठाये तथा अपना आत्मविश्वास बनाये रखे। यह जिम्मेदारी आती है प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व पर।
हिमाचल में भी सरकार ने सारे शिक्षण संस्थान बन्द कर लिये हैं। मेेले त्योहारों पर और सार्वजनिक सभाओं पर भी अंकुश लगाया गया है। लेकिन क्या जनता में आत्मविश्वास बनाये रखने के लिये आवश्यक कदम उठाये गये हैं यह एक अहम सवाल बना हुआ है और इस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर ने सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होने सरकार से आग्रह किया है कि इस समय स्वास्थ्य संस्थानों में डाक्टरों और पैरामैडिकल स्टाफ के खाली चले आ रहे पदों को भरने के लिये विशेष अभियान चालाया जाना चाहिये क्योंकि प्रदेश के बहुत सारे संस्थानों में रिक्त पद चल रहे हैं। प्रदेश के सबसे बड़े संस्थान आईजीएमसी के कैंसर जैसे संस्थान में ही दो पद रिक्त चल रहे हैं। मुख्यमन्त्री के गृह ज़िला मण्डी में जहां प्रदेश का पहला मैडिकल विश्वविद्यालय बनाया गया है वहां से कोरोना के संदिग्ध को शिमला रैफर करना डाक्टरों और अन्य साधनों की कमी का सीधा प्रमाण बन जाता है। राठौर ने अपनी टीम के साथ शिमला के सभी स्वास्थ्य संस्थानों में स्वयं जाकर प्रबन्धों का जायज़ा लिया है। राठौर ने फील्ड में भी कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से स्वास्थ्य संस्थानों में जाकर प्रबन्धों का जायज़ा लेने तथा जनता में आत्मविश्वास बनाये रखने के पूरे प्रयास करने का आग्रह किया है। राठौर को यह कदम उठाने की आवश्यकता तब पड़ी जब उन्होने निदेशक स्वास्थ्य से इस बारे में जानकारी हासिल करने के लिये फोन किया और निदेशक उपलब्ध नही हुए लेकिन जब निदेशक ने सूचना होने के बाद भी सम्पर्क नहीं किया तब उन्हें स्वयं स्वास्थ्य संस्थानों का रूख करना पड़ा।
जहां कांग्रेस ने बतौर जिम्मेदार विपक्ष यह कदम उठाया है वहीं पर प्रदेश भाजपा ने पांवटा साहिब में राज्य कार्यकारिणी का दो दिन का अधिवेशन बुलाकर सरकार के प्रयासों की गंभीरता और ईमानदारी पर स्वयं ही एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जनता में यह आम चर्चा का विषय बन गया है कि एक ओर तो राष्ट्रपति तक वहां होने वाले आयोजनों को स्थगित कर चुके हैं तब प्रदेश भाजपा अपने आयोजन को स्थगित क्यों नहीं कर पायी? क्या वहां पर भाजपा के लिये कोई विशेष प्रबन्ध किये गये थे जिनके चलते कोरोना का खतरा नही था। जबकि पूरा प्रदेश खतरे की जद में है।

क्या आऊट सोर्स दलालों के दबाव में केन्द्र के फैसले पर अमल नही हो रहा

क्लास थ्री, फोर के लिये परीक्षा और साक्षात्कार समाप्त कर चुकी है केन्द्र सरकार

दलालों को 23 करोड़ कमीशन दे चुकी है सरकार

शिमला/शैल। क्या रोज़गार के मामले में सरकार जनता को गुमराह कर रही है या अफसरशाही इसमें राजनीतिक नेतृत्व को गुमराह कर रही है। यह सवाल इन दिनो चल रहे विधानसभा सत्र में इस सम्बन्ध में पूछे गये सवालों के जवाब में आये आंकड़ों बजट में किये गये दावों और सदन में रखे गये आर्थिक सर्वेक्षण में दर्ज आंकड़ों में आयी भिन्नता के कारण चर्चा में आया है। रोज़गार को लेकर विधानसभा के हर सत्र में दोनों पक्षों के विधायक सवाल पूछते हैं। सरकार जवाबदेती है और साथ में आंकड़े रखती है। यह सवाल और जवाब समाचार पत्रों की सुर्खियां बनते हैं। जनता इन पर विश्वास कर लेती है क्योंकि उसके पास इसकी सत्यता को परखने का कोई साधन नही होता है। कोई भी सरकार के इन आंकड़ों को एक साथ रखकर विश्लेष्ण करके निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयास नही करता है।
सरकार को कुछ दस्तावेज़ सदन में रखने ही पड़ते हैं और उन दस्तावेज़ों में प्रशासन आंकड़ों के साथ कोई ज्यादा खिलवाड नही कर पाता है क्योंकि इसी सबका परीक्षण सीएजी अपनी रिपोर्टों में करता है। यह एक अलग सवाल है कि सीएजी की रिपोर्टों और सरकार द्वारा सदन में रखे गये दस्तावेज़ों का अध्ययन बहुत कम लोग करते हैं। लेकिन यह सही है कि इसी सबके सहारे वास्तविक स्थिति की जानकारी हासिल की जा सकती है। सरकार हर साल विकास करती है और यह विकास करते-करते प्रदेश आज पचपन हज़ार करोड़ से भी ज्यादा के कर्ज तले आ चुका है। इस कर्ज का जो ब्यान प्रतिवर्ष दिया जा रहा है शायद उतना कर राजस्व प्रदेश को कर्ज के सहारे खड़े किये गये संसाधनों से नही मिल रहा है। यह बजट दस्तावेजों और सीएजी की रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाता है। इस विकास का दूसरा प्रतिफल होता है कि इससे प्रति व्यक्ति की आय और कर्ज कितना बैठ रहा है। वर्ष 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 1,95,255 रूपये प्रति व्यक्ति आय रहने का अनुमान है और कर्ज 71000रूपये है।
आय व्यय के बाद विकास का पता रोज़गार की स्थिति से चलता है। रोज़गार में सरकार और निजि क्षेत्र दोनों की भागीदारी और जिम्मेदारी एक बराबर रहती है। क्योंकि निजि क्षेत्र भी सरकार द्वारा ही खड़े किये गये आधारभूत ढांचे के सहारे अपने उद्योग खड़े कर पाता है। इसीलिये विकास में उसकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये ‘‘सामाजिक जिम्मेदारी’’ का वैधानिक प्रावधान किया गया है। इस परिप्रेक्ष में रोज़गार के आंकड़ों की पड़ताल में जो तथ्य सामने हैं उनके मुताबिक इस समय सरकार के विभिन्न अदारों में 63126 पद रिक्त चल रहे हैं। विधायक रमेश धवाला के प्रश्न में आये जवाब के मुताबिक प्रथम श्रेणी में 4208, क्लास टू में 749, क्लास थ्री में 43412 और क्लास फोर में 14757 पद रिक्त है। विधायक होशियार सिंह के प्रश्न में आये उत्तर के मुताबिक सरकार ने 15 जनवरी 2019 तक 1304 लोगों को नियमित और 7604 को कान्टैªक्ट के आधार पर रोज़गार उपलब्ध करवाया है। विधायक राजेन्द्र राणा के प्रश्न में दिये गये जवाब के मुताबिक 31.7.2019 तक 30574 लोगों को सरकारी क्षेत्र में रोज़गार दिया गया है। इसमें 1-8-2016 से 31-7-2017 तक 11619, 1-8-2017 से 31-7-2018 तक 9030 और 1-8-18 से 31-7-2019 तक 9925 लोगों को रोज़गार दिया गया है।
पिछले सत्र में रमेश धवाला के एक प्रश्न के उत्तर में जवाब आया था कि पिछले तीन वर्षों में निजि क्षेत्र में 31-7-2019 तक 1,41,494 लोगों को रोज़गार मिला है। लेकिन यही सवाल विधायक होशियार सिंह, राजेन्द्र राणा और विक्रमादित्य ने पूछा था तो उसमें कहा गया था कि सूचना एकत्रित की जा रही है। फिर विधायक मोहन लाल ब्राक्टा, मुकेश अग्निहोत्री और विक्रमादित्य ने पूछा था कि सरकारी विभागों और उपक्रमों में आऊट सोर्स पर कितने लोगों को रखा गया है और सरकार इनको नियमित करेगी या नही। इसके जवाब में बताया गया था कि 12165 लोगों को आऊट सोर्स पर रखा गया है। इस पर 153,19,80030 रूपये खर्च हुए हैं जिनमें से 130,10,21,806 कर्मचारियों पर और 23,09,58,224 रूपये इन्हे काम दिलाने वाली कंपनीयों को कमीशन दिया गया है। 12165 लोगों को 94 कंपनियों के माध्यम से रखा गया है जिसका अर्थ है कि 94 लोगों को 23 करोड़ रूपये दिये गये हैं। यहां यह सवाल उठता है कि क्लास थ्री और क्लास फोर के कर्मचारियों की भर्ती के लिये भारत सरकार ने किसी भी परीक्षा और साक्षात्कार की शर्त को समाप्त कर दिया है। अब इन पदों पर केवल शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्रों के आकलन के आधार पर ही रख लिये जाने का प्रावधान किया है। केवल रिक्त पदों को विज्ञाप्ति करने की ही आवश्यकता है। लेकिन प्रदेश की भाजपा सरकार केन्द्र के इस फैसले पर अमल नही कर पा रही है चर्चा है कि उन आऊट सोर्स दलालों के दबाव में सरकार इस फैसले पर अमल नही कर पा रही है। सरकार के सभी विभागों/ उपक्रमों में आऊटसोर्स पद भर्तियां की जा रही हैं। इस आऊटसोर्स को लेकर ही तो विश्वविद्यालय के समीप पाटर हिल में आर एस एस की शाखा लगाने पर बड़ा बखेड़ा खड़ा हो गया था। पुलिस में एक दूसरे के खिलाफ एक एफआई आर तक दर्ज हो गये थे। तब नौ जवान सभा के संयोजक चन्द्र कांत वर्मा ने आरोप लगाया था कि विश्वविद्यालय ने आऊटसोर्स पर भर्तियां करने के लिये टैण्डर मंगवाया था और एक काॅरपोरेट नामक कंपनी को ठेका दे दिया गया था। लेकिन बाद में मन्त्री के दबाव में इस ठेके को रद्द करके फिर से टैण्डर मंगवाये गये और सिंगल टैण्डर पर ही एक उतम हिमाचल नामक कंपनी को यह ठेका दे दिया गया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आऊट सोर्स दलालों का सरकार पर भारी दबाव चल रहा है।
इससे हटकर भी यदि सरकार के आंकड़ों को आर्थिक सर्वेक्षण और सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों के आईने में परखा जाये तो पता चलता है कि सरकार कर्मचारियों के सभी वर्गों में पिछले कुछ वर्षों से लगातार कमी आ रही है। सरकार के दस्तावेजों के मुताबिक 2005-06 से 2017-18 तक सरकारी और प्राईवेट सैक्टर में एक लाख से भी कम लोगों को रोजगार मिला है। लेकिन सरकार दावा कर रही है 31-7-2019 तक पिछले तीन वर्षों में अकेले प्राईवेट सैक्टर में ही 141494 लोगों को रोजगार मिला है।जबकि उद्योग विभाग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के प्राईवेट सैक्टर में कुल 1,58000 लोगों को ही रोजगार मिला हुआ है। इस तरह विधानसभा में आये प्रश्नों के जबावों में दिये गये आंकड़ों और सांख्यिकी विभाग तथा आर्थिक सर्वेक्षण में रखे गये आंकड़ों के विरोधाभास को सामने रखते हुए यह स्वभाविक सवाल उठता है कि कौन से आंकड़ों पर विश्वास किया जाये या फिर शासन और प्रशासन दोनों मिलकर जनता को गुमराह कर रहे हैं।      

 

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