शिमला/शैल। बाहरा विश्वविद्यालय के फिजियोथैरपी विभाग के छः छात्रों ने सोशल मीडिया मंच के माध्यम से अपनी एक शिकायत विधायक विक्रमादित्य सिंह को भेजी है। शिकायत के मुताबिक पिछले कुछ अरसे से अध्यापक उनकी क्लास नही ले रहे हैं। इस संबंध में यह छात्र विश्वविद्यालय के वाईस चान्सलर तक अपनी शिकायत दे चुके हैं। अध्यापक इसलिये क्लास नही ले रहे हैं क्योंकि उन्हे कुछ समय से वेतन नही मिल रहा है। छात्रों का कहना है कि वह नियमित रूप से वेतन फीस विश्वविद्यालय को दे रहे हैं। दूसरी ओर अध्यापक इसलिये नही पढ़ा रहे हैं क्योंकि उन्हें समय पर वेतन नही मिल रहा है। ऐसे में जब छात्रों की परीक्षा सिर पर हैं तब अध्यापक इसी तरीके से विश्वविद्यालय प्रशासन पर अपना दवाब बना सकते हैं।
बाहरा विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों की इस समस्या ने एक बार फिर निजि शिक्षण संस्थानों को लेकर बनाये गये नियामक आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिये हैं क्योंकि प्राईवेट शिक्षण संस्थानों पर निगरानी रखने के लिये यही सबसे बड़ा मंच है। बाहरा विश्वविद्यालय की जब स्थापना हुई थी तब इसको मिली जम़ीन को लेकर भी सवाल उठे थे। सूत्रों के मुताबिक आज भी विश्वविद्यालय के पास एक बड़ा भूभाग ऐसा है जिसे अभी तक उपयोग में नही लाया गया है। धारा 118 के प्रावधानों पर अमल करते हुए ऐसी ज़मीन को वापिस लिया जा सकता है लेकिन प्रशासन ने इस ओर अभी तक कोई कदम नही उठाया है। सूत्रों के मुताबिक विश्वविद्यालय के संचालक समानान्तर में होटल व्यवसाय में भी आ चुके हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि शायद छात्रों की फीस के पैसे को कहीं दूसरी जगह निवेश किया जा रहा है। अब जब प्रदेश के कुछ निजि विश्वविद्यालयों के खिलाफ फर्जी डिग्रीयां बेचने को लेकर जांच चल रही है तब बाहरा विश्वविद्यालय के छात्रों की शिकायत को हल्के से लेना गलत होगा।
शिमला/शैल। प्रदेश से राज्यसभा सांसद विप्लव ठाकुर की सेवानिवृति से खाली हुई सीट पर अभी चुनाव होने जा रहे हैं। विपल्व कांग्रेस पार्टी से सांसद बनी थी क्योंकि तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। अब भाजपा की सरकार है तो उसी का कोई नेता इसमें जायेगा यह स्वभाविक और सामान्य सी बात है। लेकिन इस समय देश और प्रदेश में जो राजनीतिक परिस्थितियां बनी हुई हैं उनके कारण यह चयन महत्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि पिछले दिनों प्रदेश में दो महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसले हुए हैं। पहला फैसला भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को लेकर था तो दूसरा विधानसभा अध्यक्ष को लेकर।
प्रदेश में जब विधानसभा चुनाव हुए थे तब पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल को नेता घोषित कर दिया हुआ था। लेकिन धूमल के अपना ही चुनाव हार जाने के बाद स्थितियां बदल गयी। उन बदली हुई स्थितियांे में राजीव बिन्दल और जगत प्रकाश नड्डा दो लोगो के नाम मुख्यमन्त्री के लिये चर्चा में आये थे। नड्डा का नाम तो इतना आगे तक चला गया था कि उनके समर्थकों ने तो मिठाईयां तक बांट दी थी और शिमला की ओर से कूच भी कर दिया था। उन्हे आधे रास्ते से वापिस किया गया था यह सब जानते हैं क्योंकि जयराम ठाकुर का नाम मुख्यमन्त्री के लिये आ गया था। जयराम के मुख्यमन्त्री बनने के बाद काफी समय तक पार्टी में राजनीतिक सन्तुलन नही बन पाया था। जयराम को एक पत्रकार वार्ता में यहां तक कहना पड़ गया था कि ‘‘अब तो मैं मुख्यमन्त्री बन ही गया हूं इसलिये इसे मान भी लो’’ मुख्यमंत्री का यह कथन राजनीतिक संद्धर्भों में बहुत महत्वपूर्ण था। परन्तु क्या आज यह स्थितियां बदल पायी हैं? यह सवाल विश्लेष्कों के सामने आज भी यथा स्थिति खड़ा है। क्योंकि चर्चाओं के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष और फिर स्पीकर विधानसभा दोनो चयनों में मुख्यमन्त्री का दखल लगभग नहीं के बराबर रहा है। ऐसे में अब राज्य सभा के लिये किसके नाम पर मोहर लगती है और उसमें मुख्यमन्त्री का दखल कितना रह पाता है इस पर सबकी निगाहें लगी है।
विश्लेष्कोें के मुताबिक राज्यसभा उम्मीदवार का फैसला राष्ट्रीय राजनीति के हर दम बदलते परिदृश्य को ध्यान में रखकर लिया जायेगा। दिल्ली में भड़की हिंसा के बाद भाजपा को रक्षात्मक होना पड़ रहा है। क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान जिन भाजपा नेताओं के ब्यानों पर ऐतराज उठाये गये थे उनका संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने उनके प्रचार पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। इसमें अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा दोनों आ गये थे। जब चुनाव आयोग ने संज्ञान लेकर कारवाई कर दी थी तो उसी परिदृश्य में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एस मुरलीधर को इन नेताओं के खिलाफ एफआईआर की बात करनी पड़ी थी। यदि जस्टिस मुरलीधर का तत्काल प्रभाव से तबादला न कर दिया जाता तो यह एफआईआर इनके खिलाफ हो ही जाती और भाजपा के लिये एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाता। लेकिन जज के तबादले से एफआईआर तो रूक गयी लेकिन बाकि स्थितियां तो वैसी ही बनी हुई हैं। इसके बाद ही कांग्रेस नेताओं के ब्यानों का संद्धर्भ उठाकर उनके खिलाफ कारवाई की मांग की जाने लगी है। लेकिन इस पूरी स्थिति पर भाजपा का कोई बड़ा नेता ख्ुालकर सरकार के पक्ष में नही आया है बल्कि अनुराग ठाकुर भी अब पब्लिक में अपने ब्यान से पलटने का प्रयास कर रहे हैं। केवल शान्ता कुमार ही एक ऐसे बड़े नेता हैं जिन्होनें शाहीन बाग में अदालत पर्यवेक्षक भेजने के फैसले पर सवाल उठाये हैं।
शाहीन बाग का धरना हिन्दु सेना की धमकी के बाद भी जारी है। अमित शाह फिर दोहरा चुके हैं कि सरकार अपने ऐजैण्डे से पीछे नही हटेगी। शाह की सभाओं में अनुराग ठाकुर की तर्ज के नारे लग रहे हैं। इससे यह स्पष्ट लग रहा है कि अभी काफी समय तक स्थिति उलझी रहेगी। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नही आयी है। इस पीढ़ी में से केवल शान्ता कुमार ने ही कुछ कहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि यदि इन बड़े नेताओं में से किसी ने कोई अप्रिय ब्यान दे दिया तो उससे पार्टी की मुश्किलें एकदम बढ़ सकती हैं। इस समय भाजपा को ऐसे बड़े नेताओं की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है और यह राज्यसभा के माध्यम से ही पूरी की जा सकती है। फिर शान्ता कुमार ने चुनावी राजनीति से ही बाहर रहने का फैसला किया है। यदि पार्टी उनकी आवश्यकता को मानते हुए उन्हे राज्यसभा के लिये मनोनीत कर देती है तो शायद वह इस जिम्मेदारी से इन्कार नही कर पायेंगे। ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा प्रदेशों के माध्मय से बहुत वरिष्ठ लोगों को ही राज्यसभा में लाने का प्रयास करेगी जो उसे वैचारिक मार्गदर्शन दे सकें।
वैसे इस समय प्रदेश से जल शक्ति मन्त्री महेन्द्र सिंह, पूर्व अध्यक्ष सतपाल सत्ती, चन्द्र मोहन ठाकुर और महेन्द्र पाण्डे के नाम भी चर्चा में चल रहे हैं। महिला मोर्चा की पूर्व प्रदेश अध्यक्षा इन्दु गोस्वामी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक वह कुछ दिनों मे कोई बड़ा धमाका करने वाली हैं। मन्त्रीमण्डल में खाली चल रहे मन्त्री पदों को भी बजट सत्र के दौरान ही भरने की चर्चा चल पड़ी है। अभी जब नड्डा प्रदेश में थे तो मुख्यमन्त्री विधानसभा छोड़कर पूरा समय उन्ही के साथ रहे। अब मुख्यमन्त्री दिल्ली में अमितशाह को मिलकर लौटे हैं। इस मुलाकात में संभावित नये मन्त्रियों के नाम फाईनल होने से लेकर शाह द्वारा कुछ मामलों में नाराज़गी व्यक्त करने तक की चर्चाएं सामने आ गयी हैं। ऐसे में पूरा परिदृश्य रोचक हो गया है।
शिमला/शैल। क्या मरड़ी के खिलाफ भण्डारी की एफआईआर का निपटारा मरड़ी की सेवानिवृति से पूर्व हो पायेगा यह सवाल पुलिस के गलियारों में इन दिनों विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। क्योंकि नियमानुसार यदि किसी कर्मचारी/अधिकारी के खिलाफ सेवानिवृति के समय कोई आपराधिक मामला लंबित चल रहा हो तो ऐसे व्यक्ति को न तो सेवानिवृति लाभ ही मिल पाते हैं और न ही कोई नयी नियुक्ति सरकार में मिल पाती है। स्मरणीय है कि धूमल शासन में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने यह आरोप लगाये थे कि प्रदेश सीबीआई अवैध रूप से उनके फोन टेप कर रही है। इन्ही आरोपों के बीच विधानसभा के चुनाव हुए और सरकार बदल गयी। वीरभद्र मुख्यमन्त्री बन गये और प्रशासन ने अवैध फोन टैपिंग के आरोपों पर कार्यवाही करते हुए रात को ही सीआईडी मुख्यालय पर छापामारी करके फोन टैपिंग का रिकार्ड कब्जे में ले लिया। इस प्रकरण में डीजीपी रहे आईडी भण्डारी पर गाज गिरी। उनके खिलाफ मुकद्दमा बना और सेवानिवृति लाभ तक रोक दिये गये।
भण्डारी को इस मामले में बरी होने में लम्बा समय लगा लेकिन अन्त में वह बाईज्जत इस प्रकरण से बाहर आ गये। अदालत ने यह पाया कि भण्डारी के खिलाफ जानबूझ कर मामला बनाया गया था। मामले से छूटने के बाद भण्डारी ने उन लोगों के खिलाफ कारवाई की मांग की जिन्होंने उनके खिलाफ जानबूझ कर मामला बनाया था। भण्डारी को इस कारवाई के लिये सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत में जाना पड़ा। अदालत ने इसमें मामला दर्ज किये जाने के निर्देश दिये। इस पर थाना छोटा शिमला में भण्डारी ने अगस्त 2018 में एफआईआर दर्ज करवाई जिसमें डीजीपी एस आर मरड़ी अभियुक्त नामज़द है। यह एफआईआर होने के बाद पुलिस अपने ही डीजीपी के खिलाफ जांच करने का साहस नही कर पायी। भण्डारी ने इस मामले को विजिलैन्स को सौंपने की मांग की लेकिन मुख्य सचिव के स्तर पर इस मांग को ठुकरा दिया गया और मामला थाना छोटा शिमला में ही लंबित रहा।
अब मरड़ी सेवानिवृति के कगार पर आ पहुंचे हैं। ऐसे में यदि सेवानिवृति से पूर्व यह मामला नही निपटता है तो उन्हे सेवानिवृति लाभ मिलने कठिन हो जायेंगे। फिर मरड़ी ने शायद मानवाधिकार आयोग में सदस्य के पद के लिये भी आवेदन कर रखा है लेकिन यहां भी यह लंबित मामला समस्या बन जायेगा। चर्चा है कि मरड़ी सेवानिवृति से पूर्व इस मामले से निपटारा चाहते हैं। यदि पुलिस इसमें अदालत में चालान डालती है तो उसमें ट्रायल लम्बा चलेगा और अपील तक की नौबत आयेगी। ऐसे में मरड़ी इस प्रयास में कहे जा रहे हैं कि इस अदालत में क्लोज़र रिपोर्ट ही डाली जाये। चर्चा है कि इसके लिये एक आईजी स्तर के अधिकारी ने थाना छोटा शिमला पर पूरा दवाब डाला हुआ है। लेकिन मामला दस्तावेजों पर आधारित होने के कारण क्लोज़र रिपोर्ट डालना संभव नही हो रहा है परन्तु जांच अधिकारी पर शायद आईजी साहब का दवाब ज्यादा हो गया है। सूत्रों की माने तो जांच अधिकारी इस दबाव से इतने परेशान हो गये हैं कि वह दबाव को रिकार्ड पर ले आये हैं। माना जा रहा है। कि यदि सही में यह दवाब रिकार्ड पर आ गया है तो यह कई लोगों के लिये परेशानी का कारण बनेगा।
शिमला/शैल। प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक राजेन्द्र राणा के एक प्रश्न के जवाब में आयी जानकारी के मुताबिक सरकार के विभिन्न विभागों में संदिग्ध आचरण वाले 64 अधिकारी कार्यरत हैं। इस सूची में पुलिस, स्वास्थ्य, आयुर्वेद और पशुपालन आदि विभागों के कई अधिकारी शामिल हैं। लेकिन इस सूची में किसी भी आई ए एस अधिकारी का नाम शामिल नहीं है। जबकि सरकार के प्रधान सचिव वित्त प्रबोध सक्सेना चिंदम्बरम प्रकरण में जमानत पर हैं और उनके खिलाफ सीबीआई अदालत मे दिल्ली में चालान दायर हो चुका है। मामले में ट्रायल चल रहा है। इस संद्धर्भ में राज्य सरकार ने शायद यह तर्क ले रखा है कि उन्हें सीबीआई के मामले की जानकारी नही है। सक्सेना चिदम्बरम के साथ सहअभियुक्त हैं और इस प्रकरण की जानकारी देश के हर आदमी को है। क्योंकि चिदम्बरम प्रकरण मोदी-शाह की प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है। देश की राजनीति का बहुत कुछ इस मामले पर निर्भर करता है। ऐसे में राज्य सरकार को अपने ही अधिकारी के बारे में यह जानकारी न हो यह कैसे संभव हो सकता है। आज जिन अधिकारियों के नाम संदिग्ध आचरण की सूची में आये हैं उनमें यह मामला विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकार की नीयत और नीति पर गंभीर सवाल उठने लग पड़े हैं।
संदिग्ध आचरण के अधिकारियों को चिन्हित करने और उन पर नजर रखने की चिन्ता संसद में 1961 में व्यक्त की गयी थी। 10 अगस्त 1961 को लोकसभा और 24 अगस्त को राज्यसभा में इस आश्य के प्रस्ताव लाये गये थे। यह प्रस्ताव पारित होने के संबंध में यह स्कीम तैयार की गयी थी The list will be termed as the list of public servants of gazetted status of doubtful integrity, It will include names of those officers only who, after enquiry or during the course of enquiry, have been found to be lacking in integrity. It will thus include the names of the officers, with certain exceptions mentioned below, falling under one of the following categories.
Convicted in a court of law on a charge of lack of integrity or for an offence involving moral turpitude but on whom, in view of exceptional circumstances, a penalty other than dismissal, removal or compulsory retirement is imposed.
Awarded departmentally in major penalty (a) on charges of lack of integrity (b) on charges of gross dereliction of duty in protecting the interests of Govt. although the corrupt motive may not be capable of proof.
(iii) Against whom proceedings for a major penalty or a court trial are in process for alleged acts of involving lack of integrity or moral turpitude.
(iv) Who were prosecuted but acquitted on technical grounds, and on whose case on the basis of evidence during the trial there remained a reasonable suspicion against their integrity.
संदिग्ध आचरण के अधिकारियों को लेकर प्रदेश सरकार कई बार विभागीय सचिवों को इस बारे में निर्देश जारी का चुकी है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने CWP 4916/2010 शेर सिंह बनाम स्टे्ट आॅफ हिमाचल प्रदेश में सरकार पर अपनी नाराज़गी भी प्रकट की थी। इसके बाद 23 अप्रैल 2011 को गृह विभाग द्वारा सारे प्रशासनिक सचिवों को पत्र भी जारी किया गया था। लेकिन व्यवहार में ऐसे मामलों में कैसा आचरण किया जाता है वह सक्सेना प्रकरण से स्पष्ट हो जाता है। सरकार के इस तरह के पक्षपात-पूर्ण आचरण से सरकार की नीयत पर आरोप आने शुरू हो जाते हैं। इसका प्रभाव नीचे तक पड़ता है।
शिमला/शैल। जयराम सरकार को सत्ता में आये दो वर्ष हो गये हैं सरकार ने सत्ता में आते ही प्रदेश लोक सेवा आयोग और अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड में कुछ बदलाव किये थे। लोकसेवा आयोग में तो दो नये पद सृजित किये गये थे परन्तु भरा उनमें से एक ही गया था। लोक सेवा आयोग की कार्य प्रणाली पर मुख्यमंत्री ने लम्बे आंकड़े सदन में रखते हुए गंभीर सवाल खड़े किये थे। इन सवालों से यह संदेश उभरा था कि इस सरकार में भर्तीयों के मामले में पारदर्शिता और सतर्कता दोनों पर ध्यान केन्द्रित रहेगा। पूर्व में घट चुके चिट्टों पर भर्ती जैसे मामले पुनः दोहराये नही जायेंगे। लेकिन इन जनापेक्षाओं पर यह सरकार खरी नही उतरी है।
इस सरकार में सबसे पहले पुलिस में भर्तीयां हुई। इन भर्तीयों में युवाओं को परीक्षा पास करने के बाद भर्ती किया गया। नियुक्ति पत्र मिलने के बाद ज्वाईनिंग हो गयी। भर्ती की प्रक्रिया काफी लंबी चली थी लेकिन प्रक्रिया के दौरान एक ही आरोप लगा कि बहुत सारे युवाओं के नाम भर्ती के लिये जारी हुए आनलाईन पोर्टल में आयी गड़बड़ी के कारण परीक्षा केन्द्रों में मिले ही नही थे। हजारों की संख्या में छात्र परीक्षा में बैठ नही पाये थे। यह प्रकरण भी जांच का विषय बना जिसका कोई परिणाम सामने नही आया है। इसी परिदृश्य में परीक्षा हो गयी और परीक्षा के दौरान कहीं किसी को शक नही हुआ कि ए के स्थान पर बी ही ए बनकर परीक्षा दे रहा है। जबकि हर परीक्षा में यह सामान्य नियम रहता है कि हाल के अन्दर उसी परीक्षार्थी को प्रवेश दिया जाता है जिसके पास पहचान के पूरे प्रमाण होते हैं। लेकिन अब आयी शिकायतों में यह सामने आया है कि मूल छात्रों के स्थान पर कोई और ही परीक्षा देकर चला गया। ऐसे घोटाले के कुछ लाभार्थीयों की गिरफ्तारीयां तक हो चुकी हैं। क्या इसमें उन लोगों की जिम्मेदरारी नही आती है जो परीक्षा के संचालन में लगे हुए थे? ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि संचालन में लगे लोगों को इसकी जानकारी ही न रही हो।
पुलिस भर्तीयों के बाद पटवारीयों की भर्ती हुई। यह मामला उच्च न्यायालय ने जांच के लिये सीबीआई को सौंप दिया है। इसमें आरोप लगा है कि इसकी परीक्षा में वही प्रश्न डाल दिय गये जो पहले जेबीटी के लिये डाले गये थे। जेबीटी और पटवारी दोनों के लिये न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता एक बराबर है। ऐसे में यह बहुत संभव है कि जो बच्चे पहले जेबीटी की परीक्षा में बैठे हों उन्ही में से कुछ जो उसमें सफल नही हो सके हों वह पटवारी परीक्षा में बैठे हों और उन्हें परीक्षा में इसका स्वभाविक रूप से लाभ मिल गया हो। लेकिन इसमें मूल प्रश्न यह उठता है कि पटवारी और जेबीटी दो अलग-अलग क्षेत्र हैं। इनमें एक जैसा ही प्रश्नपत्र डाल दिया जाना क्या स्वभाविक हो सकता है शायद नहीं। यह अपने में एक गंभीर विषय बन जाता है क्योंकि यह तभी संभव हो सकता है यदि जिसने पटवारी की परीक्षा का प्रश्न पत्र डाला हो उसी का कोई अपना पहले जेबीटी की परीक्षा में बैठा हो और उसके माध्यम से उसे जेबीटी का प्रश्नपत्र मिल गया हो और उसने उसी प्रश्नपत्र के सवाल पटवारी परीक्षा के लिये डाल दिये हों। अभी इस जांच की कोई रिपोर्ट सामने आयी नही है।
इसके बाद फरवरी में काॅलिज के हिन्दी प्रवक्ताओं के लिये परीक्षा हुई। अब इस परीक्षा के परिणाम भी रद्द कर दिये गये हैं। इसमें यह आरोप लगा है कि इस परीक्षा के प्रश्नपत्र में भी वही प्रश्न डाल दिये गये जो इससे पहले हो चुकी जिला भाषा अधिकारियों की परीक्षा में डाले गये थे। इस संद्धर्भ में भी वही तरीका अपनाया गया जो पटवारीयों की परीक्षा में अपनाया गया था। इस संद्धर्भ में जब सचिव प्रदेश सेवा आयोग के पास शिकायत पहुंची तब उन्होंने प्रवक्ताओं की परीक्षा को रद्द कर दिया है। लेकिन परीक्षा रद्द करने के साथ ही इस बारे में कोई जांच भी करवाये जाने की जानकारी अभी तक सामने नही आयी है।
प्रदेश में हुई इन तीन परीक्षाओं में से दो में एक जैसा फार्मूला अपनाया गया है। जो सवाल पहले किसी परीक्षा में पूछे गये हैं वही सवाल दूसरी परीक्षा में भी पूछ लिये गये। नियमानुसार इसमें कोई गलती नही है कि जो प्रश्न एक परीक्षा में पूछेे गये हैं वही प्रश्न दूसरी परीक्षा में नहीं पूछे जा सकते। क्योंकि जब दोनों परीक्षाओं के लिये मूल शैक्षणिक योग्यता एक जैसी ही है तो ऐसा हो सकता है। इसमें घपला तब नहीं हो सकता जब दोनों परीक्षाएं एक ही दिन हो रही हों। लेकिन जब परीक्षायें दो अलग-अलग दिन हो रही हों तो इसका लाभ बाद की परीक्षा में मिलना स्वभाविक है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इसकी जांच में यह सब एक संयोग निकलता है या इसके पीछे कोई सुनियोजित योजना रही है।