Saturday, 17 January 2026
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दो साल बाद भी सरकार की गवर्नैन्स सवालों में

शिमला/शैल। जयराम सरकार को दिसम्बर में दो वर्ष पूरे होने जा रहे  हैं इस अवसर पर एक आयोजन भी आयोजित किया जा रहा है। इस नाते अब तक के कार्यकाल का एक अवलोकन आवश्यक हो जाता है। राजनीतिक तौर पर सत्ता में आने के बाद इस सरकार का पहला टैस्ट लोकसभा चुनाव हुए और उनमें चारों सीटें जीत कर सफलता हासिल कर ली। लेकिन इन्हीं लोकसभा चुनावों के कारण पांच माह बाद ही हुए दोनो विधानसभा उपचुनावों में एक जगह 13000 तो दूसरी जगह 11000 मतदाता सरकार का साथ छोड़ गये। लोकसभा चुनावों के परिणामस्वरूप ही दो मन्त्री पद खाली हुए लेकिन छः माह में भी इन पदों को भरा नही जा सका। यही नहीं नगर निगम शिमला में पार्षदों के जो स्थान मनोनयन से भरे जाने थे वह अबतक भरे नही जा सके। बहुत सारे निगमो/बोर्डों में भी कई ताजपोशीयां अभी तक नही हो पायी है। राजनीतिक संद्धर्भों में लंबित होते जा रहे इन फैसलों से सीधे यही संकेत उभरता  है कि इसमें सरकार और संगठन के भीतर कई तरह के दबाव और प्रति दबाव चले हुए हैं। अभी संगठन के चुनाव चल रहे हैं और प्रदेश के लिये नया अध्यक्ष चुना जाना है। भाजपा में संगठन के चुनावों में वोट से चयन के स्थान पर मनोनयन ही होता है यह अब तक की स्थापित परंपरा है। इस बार भी  ऐसा ही होगा यह स्वभाविक है। इसलिये प्रदेश अध्यक्ष के लिये किसका मनोनयन होता है उससे स्पष्ट हो जायेगा कि आने वाली राजनीतिक तस्वीर का रूख क्या होने जा रहा है।
 इस समय जो अध्यक्ष बनेगा उसका 2022 के विधानसभा चुनावों में बड़ा दखल रहेगा यह स्वभाविक है। पार्टी में बहुत सारे फैसले आरएसएस के निर्देशों से होते हैं यह भी सर्वविदित ही है। यह संघ का ही निर्देश था कि अब पचास से कम आयु के कार्यकर्ताओं को ही आगे बढ़ाया जायेगा हमीरपुर की बैठक में यह स्पष्ट रूप से सामने आ गया था। विधानसभा उपचुनावों के उम्मीदवारों का चयन भी इसी पैमाने पर किया गया था।
 इस मानदण्ड के अनुसार अगला अध्यक्ष भी इसी आयु वर्ग के आसपास  का होगा लेकिन इस समय जिस तरह से वायरल पत्रों के माध्यम से कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उद्योग मन्त्री विक्रम सिंह और स्वास्थ्य मन्त्री विपिन परमार पर निशाना साधा जा रहा है उससे मुख्यमन्त्री की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं इनके अतिरिक्त परिवहन मन्त्री गोविन्द ठाकुर की पत्नी के चण्डीगढ़ में गाड़ी से अढ़ाई लाख चोरी होने का मामला घटा है उससे समस्या और गंभीर हो गयी है। इसी तरह सोलन में भी एक बड़े नेता की गाड़ी से पुलिस ने पिछले दिनों चिट्टा पकड़ा। इस पर केस बना जिसमें आगे चलकर रिकार्ड से गाड़ी तो बदल दी गयी परन्तु ड्राइवर के खिलाफ केस बना दिया गया। फिर उसी दौरान इसी नेता की खदान में मजदूरों के दबने का हादसा हो गया। इस हादसे पर कोई बड़ी कारवाई तो प्रशासन ने नहीं की लेकिन नेता के विरोधीयों ने यह सबकुछ हाईकमान तक पहुंचा दिया है। इस तरह जयराम सरकार कुछ अपने ही लोगों के खिलाफ उठ रही इस तरह की अंगुलियों से परेशान हो गयी है। संयोगवश विवादों में आने वाले यह सारे नेता मुख्यमन्त्री के विश्वस्त माने जाते हैं। प्रशासन ऐसे मामलों में कितनी समझदारी से काम ले रहा है यह पिछले वर्ष खली प्रकरण और इस बार एनजीओ साड़ा की  कारगुजारी से सामने आ चुका है। इस तरह राजनीतिक फलक पर घटे इस सबका एक ही संदेश जाता है कि गवर्नेन्स के नाम पर सरकार कमजोर ही चल रही है।
 प्रशासनिक स्तर पर भी स्थिति यह है कि अब तक के कार्यकाल में जितना प्रशासनिक फेरबदल हुआ है उससे अधिकारियों में यह भावना बन ही नही पायी कि वह इस पदभार पर लम्बे समय तक बने रहेंगे और इस नाते उन्हें परिणाम देने की नीयत और नीति से काम करना होगा। शीर्ष प्रशासन में कुछ लोगों के पास बहुत ही ज्यादा काम है तो कुछ लोग लगभग खाली बैठने जैसी स्थिति में चल रहे हैं। अब फिर प्रशासनिक फेरबदल चर्चाओं में है और इस बार मुख्यमन्त्री कार्यालय में भी पूरा ढांचा बदलने के कयास लगाये जा रहे हैं। मुख्यमन्त्री कार्यालय से जब से प्रैस सलाहकार को हटाया गया है तब से उस स्थान पर अब तक नयी नियुक्ति नही हो पायी है और न ही प्रदेश से निकलने वाले अखबारों के लिये कोई नीति बन पायी है। आज भी अधिकारी इसी बात पर लगे हुए हैं कि कुछ चैनलों पर मुख्यमन्त्री का साक्षात्कार प्रसारित करवा दो और कुछ मीडिया घरानों से सरकार को श्रेष्ठता के आवार्ड दिला दो। जैसा पिछली सरकारों में होता था उसी तर्ज पर अब हो रहा है। वह सरकारें भी श्रेष्ठता के सैंकड़ों अवार्ड लेकर सत्ता से बाहर हो गयी थी। इस तथ्य को यह प्रशासन भी मुख्यमन्त्री को समझने नही दे रहा है। जबकि आज जनता में उसी मीडिया की विश्वसनीयता है जो दस्तावेजी प्रमाणों के साथ तथ्यों को जनता के सामने रख रहा है। आज प्रशासन का एक वर्ग जिस तरह से मुख्यमन्त्री को गुमराह करके चल रहा है उसी का परिणाम है कि अब तक नये मुख्य सचिव को लेकर स्थिति  स्पष्ट नही है।
 इसी तरह वित्तिय मुहाने पर हालात हर रोज गंभीर होते जा रहे है। जहां केन्द्र सरकार किसान की आय दोगुणी करने के दावे कर रही है वहीं पर इस सरकार को रसोई गैस, पैट्रोल, डीजल और दूध के दाम बढ़ाने पड़े हैं। यह दाम उस समय बढ़ाये गये हैं जब ग्लोबल इन्वैस्टर मीट में आये निवेशकों के खाने- पीने, ठहरने और आने-जाने का सारा खर्च सरकार ने उठाया है। आज जब जीडीपी का आकलन 4.5ः पर आ गया है तो स्वभाविक है कि इस परिदृश्य में कोई निवेशक क्यों निवेश करने आयेगा। हाईड्रो परियोजनाओं पर लाहौल-स्पिति में जनाक्रोश उभर आया है वहां की जनता इसका विरोध कर रही है। सिरमौर में सीमेन्ट प्लांट के विरोध मे लोेग खड़े हो गये हैं।
ऐसे में यदि दो साल के कार्यकाल के बाद भी सरकार इस तरह की अनिश्चितताओं में घिरी रहेगी तो स्वभाविक रूप से पूरे प्रशासन पर ही सवाल खड़े होंगे। माना जा रहा है कि जिस तरह से प्रशासनिक और मन्त्री परिषद स्तर पर बड़े फेरबदल की चर्चाएं चल रही है उनमें बहुत संभव है कि जो मंत्री वायरल पत्रों के हमलों में राडार पर आ गये हैं उनमें से ही किसी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रयास मुख्यमन्त्री करेंगे क्योंकि यदि अब यह पत्र आने के बाद किसी मन्त्री को हटाया जाता है या उसके विभाग बदले जाते हैं तो यह अपरोक्ष में आरोपों को स्वीकारने जैसा ही होगा। इसलिये विक्रम सिंह, विपिन परमार और गोविन्द ठाकुर में से ही किसी एक का अध्यक्ष बनना तय है। इनमें जो अनुराग और नड्डा को भी स्वीकार्य होगा उसके बनने की संभावना ज्यादा होगी।

कौन होगा प्रदेश का अगला मुख्य सचिव

शिमला/शैल। प्रदेश के वर्तमान मुख्य सचिव डा. बाल्दी दिसम्बर में सेवानिवृत होने जा रहे हैं। सेवानिवृति के बाद डा. बाल्दी रेरा के अध्यक्ष हो सकते हैं ऐसा माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने अभी हाऊसिंग विभाग का प्रभार छोड़ दिया है और सरकार ने रेरा के लिये आवेदन भी आमन्त्रित कर लिये हैं। डा. बाल्दी लम्बे समय तक प्रदेश के वित्त सचिव रहे हैं। केन्द्र के वित्त विभाग ने मार्च 2016 में प्रदेश की वित्तिय स्थिति पर जो पत्र भेजा था वह उन्ही के कार्यकाल में आया था लेकिन इस पत्र के बावजूद डा. बाल्दी ने बतौर वित्त सचिव वीरभद्र को चुनावी वर्ष में कोई कठिनाई नही आने दी। हांलाकि मुख्यमन्त्री जयराम ने अपने पहले ही बजट भाषण में वीरभद्र सरकार पर अतिरिक्त कर्ज लेने का आरोप लगाया था परन्तु जयराम प्रदेश की वित्तिय स्थिति पर कोई श्वेतपत्र जारी नहीं कर पाये। इसे डा. बाल्दी की ही सूझबूझ का परिणाम माना गया था। डा. बाल्दी से मिली वित्तिय विरासत को बतौर अतिरिक्त मुख्य सचिव अनिल खाची ने संभाला और अब केन्द्र से वापिस आने के बाद फिर से उन्हें वित्त विभाग की जिम्मेदारी दी गयी है। भारत सरकार के 2016 के पत्र के मुताबिक राज्य सरकार अपनी तय सीमा से कहीं अधिक ऋण ले चुकी है क्योंकि एक समय सरकार स्वयं कह चुकी है कि वह जीडीपी का 33.96% ऋण ले चुकी है।
जयराम सरकार की पिछले कुछ समय से ऋणों पर निर्भरता ज्यादा बढ़ गयी है। सरकार औद्यौगिक निवेश जुटाने के पूरे प्रयास कर रही है ताकि उसका जीडीपी बढ़ सके। ऐसे में सरकार को एक ऐसे मुख्य सचिव और वित्त सचिव की आवश्यकता होगी जो सरकार को इस संकट से सफलता पूर्वक निकाल सके। इस परिदृश्य में जब  मुख्य सचिव तलाशने की स्थिति आती है तब प्रदेश के वरिष्ठ नौकरशाहों पर नजर जाना स्वभाविक हो जाता है। इस समय सचिवालय में छः अतिरिक्त मुख्य सचिव कार्यरत हैं इनसे हटकर केन्द्र में इसी स्तर के प्रदेश के सात अधिकारी तैनात हैं जिनमें से दो इसी दिसम्बर में  रिटायर हो जायेंगे इनके बाद अरविंद मैहता नवम्बर 2020 में तथा बृज अग्रवाल, संजीव गुप्ता और तरूण कुमार 2021 में रिटायर हो जायेंगे। यदि इनमें से किसी को बतौर मुख्य सचिव की तलाश में जाना होगा। वैसे तो अभी ही तीसरा मुख्यसचिव आयेगा ऐसे में जो अधिकारी सरकार के दिसम्बर 2022 तक के कार्यकाल तक चल सके उसी की ही तलाश करनी ज्यादा लाभप्रद रहेगी। इस गणित में अनिल खाची और राम सुभाग सिंह दो ही अधिकारी रह जाते हैं जिनकी सेवानिवृति जून और जुलाई 2023 में होगी। इन दोनों ही अधिकारियों का भारत सरकार में काम करने का अनुभव बराबर का रहा है। खाची केन्द्र में सचिव होकर कुछ ही समय पहले यहां से गये थे लेकिन कुछ कारणों से उन्हे वापिस आने की मजबूरी हो गयी और आ गये। राम सुभागसिंह प्रदेश में अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभा रहे थे लेकिन कुछ लोगों को यह पसन्द नही आया और उन्हें पयर्टन में जानबूझ कर विवादित बना दिया। मुख्यमन्त्री को उनसे पर्यटन वापिस लेना पड़ा और जांच की बात करनी पड़ी। परन्तु इस जांच में ऐसा कुछ भी सामने नही आया है जिसे गलत कहा जा सके। राम सुभाग हिमाचल के रहने वाले नही है और खाची हिमाचली होने के साथ ही वरिष्ठ भी हैं। शिमला  से ताल्लुक रखते हैं और राजनीतिक खेमेबाजी से दूर नियमों/कानूनो के पाबन्द माने जाते हैं। राम सुभाग ने केन्द्र में शान्ता कुमार के साथ काम किया है और एक तरह से इसका दण्ड भी भुगता है। ऐसे में खाची और रामसुभाग सिंह में से किसकी बारी आती है या अग्रवाल को ही जयराम फिर बुला लेते हैं इस पर सबकी निगाहें लगी हैं।

क्या प्रदेश कांग्रेस की नयी ईकाई खेमेबाजी से मुक्त होगी?

शिमला/शैल। प्रदेश में कांग्रेस की पूरी राज्य ईकाई भंग कर दी गयी है। यह ईकाई भंग किये जाने की सूचना में कहा गया है कि ऐसा प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर की अनुशंसा पर किया गया है। लेकिन संगठन के भीतर ही कुछ लोगों का यह मानना है कि आने वाले दिनो में अध्यक्ष को भी बदल दिया जायेगा। कुलदीप राठौर बदल दिये जाते हैं या नही यह तो आने वाले दिनो में ही पता चलेगा। लेकिन यह सवाल तो चर्चा में आ ही गया है कि आखिर ईकाई भंग करने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी। कुलदीप से पहले सुक्खु अध्यक्ष थे और उनका कार्यकाल काफी लम्बा भी हो गया था इसलिये उनका हटना तो तय ही था। यह माना जा रहा था कि संगठन के जो चुनाव लंबित कर दिये गये थे अब लोकसभा चुनावों के बाद वह पूरे होने थे और उसमें नया अध्यक्ष आना था। लेकिन इस प्रक्रिया के पूरा होने से पहले ही सुक्खु को हटा दिया गया जबकि लोकसभा चुनाव सिर पर थे। राजनीतिक पंडितो का मानना है कि उस समय सुक्खु को हटाना कोई सही राजनीतिक फैसला नही था।
 सुक्खु के समय वीरभद्र सिंह मुख्यमन्त्री थे दिसम्बर 2012 में वीरभद्र ने सत्ता संभाली थी। उस समय मुख्यमंत्री के चयन पर कांग्रेस विधायक दल आधा आधा दो हिस्सों में बंट गया था और इसका असर यह हुआ था कि मन्त्रीमण्डल के गठन के साथ ही दूसरे नेताओं की ताजपोषीयों का दौर भी शुरू हो गया। इन ताजपोशीयों में पार्टी के ‘‘एक व्यक्ति एक पद’’ के सिद्धान्त पर वीरभद्र का संगठन के साथ टकराव हो गया था। इस टकराव के कारण हाईकमान ने और ताजपोषीयां करने पर रोक लगा दी थी। वीरभद्र के संगठन के साथ टकराव का एक परिणाम यह हुआ कि वीरभद्र ने संगठन में विभिन्न स्तरों पर की गयी नियुक्तियों को आधारहीन लोगों का जमावड़ा करार दे दिया। इसी टकराव का परिणाम था कि वीरभद्र ने पैंतालीस विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे लोगों को ताजपोषीयां दे दी जिनका विधायक या विधायक का अधिकारिक रूप से चुनाव लड़ा था। इस तरह पैंतालीस चुनाव क्षेत्रों में समानान्तर सत्ता केन्द्र स्थापित हो गये। यही सत्ता केन्द्र चुनावों में पार्टी पर भारी पड़े। इन्ही सत्ता केन्द्रों ने वीरभद्र ब्रिगेड खड़ा किया और जब ब्रिगेड के अध्यक्ष ने पार्टी अध्यक्ष सुक्खु के खिलाफ कुल्लु की अदालत में मानहानि का मामला तक दायर कर दिया। ब्रिगेड में शामिल कुछ प्रमुख लोगों को नोटिस जारी हुए तब यह ब्रिगेड भंग कर दिया गया तब अन्त में इस सबका परिणाम यह हुआ कि वीरभद्र सिंह ने सुक्खु को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटवाने को एक तरह से अपना ऐजैण्डा ही बना लिया। जब विधानसभा के चुनाव हुए और पार्टीे सत्ता से बाहर हो गयी तब फिर अध्यक्ष पर इसकी जिम्मेदारी डालने का प्रयास किया गया। इस पर जब सुक्खु ने यह जवाब दिया कि चुनाव टिकटों  का अधिकांश आवंटन वीरभद्र की सिफारिश पर हुआ है तब वीरभद्र- सुक्खु विवाद थोड़े समय के लिये शांत हुआ। लेकिन अन्दर खाते सुक्खु को हटवाने की यह मुहिम जारी रही। जब सुक्खु को हटवाने के लिये आनन्द शर्मा, वीरभद्र, आशा कुमारी और मुकेश अग्निहोत्री में  सहमति बन गयी तब इन सबकी लिखित सहमति पर सुक्खु को हटाया गया और कुलदीप राठौर को लाया गया। कुलदीप राठौर के जिम्मेदारी संभालने के बाद पार्टी के पुराने पदाधिकारियों को हटाने और उनके स्थान पर नयी नियुक्तियां करने की बजाये राठौर नै कार्यकारिणी का आकार ही दोगुने से भी अधिक कर दिया। उपाध्यक्षों, महासचिवों और सचिवों की संख्या ही इतनी बढ़ा दी कि एक तरह से इन पदों की गरिमा ही बनी नहीं रह सकी। राठौर ने यह बढ़ौत्तरी अपने तौर पर ही कर दी या जिन नेताओं ने राठौर को अध्यक्ष बनवाया था उनके कहने पर यह सब किया गया इसको लेकर आज तक सार्वजनिक रूप से कुछ भी स्पष्ट नही हो पाया है। पार्टी के पदाधिकारियों की यह बढ़ौत्तरी उस समय की गयी जब लोकसभा के चुनाव सिर पर आ गये थे। राठौर जब इस जम्बो कार्यकारिणी को संभालने में लगे थे तभी लोस चुनावों के संभावित उम्मीदवारों को लेकर वीरभद्र जैसे वरिष्ठ नेता ही हर तरह के हल्के ब्यान दागने लग गये थे। इस सबके बावजूद भी जब भाजपा के पूर्व सांसद सुरेश चन्देल कांग्रेस में शामिल हुए और पंडित सुखराम ने भी घर वापसी कर ली तब प्रदेश कांग्रेस का सारा नेतृत्व एक ध्वनि से इसका लाभ नही उठा सका। बल्कि आज तक इन नेताओं को उस स्तर का मान सम्मान नही मिल पाया है जिसके यह हकदार थे। जबकि वीरभद्र के खिलाफ चल रही ईडी और सीबीआई के मामलों पर भाजपा ने चुटकीयां लेना लगातार जारी रखा। कांग्रेस एक बार भी भाजपा पर आक्रामक नही हो पायी है। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस लोकसभा की चारों सीटें भारी अन्तराल से फिर हार गयी। यही नही लोकसभा चुनावो के बाद हुए दोनो विधानसभा उपचुनाव भी कांग्रेस हार गयी। जबकि पच्छाद के लिये तो राठौर ने हाईकमान को लिखित में आश्वस्त किया था कि यह सीट तो हर हालत में कांग्रेस जीत रही है। शायद राठौर के इसी लिखित आश्वासन को सुक्खु जैसे नेताओं ने अनुभवहीनता  करार दिया है स्वभाविक है कि जब प्रदेश अध्यक्ष का एक उपचुनाव का आकलन ही फेल हो जाये तो राजनीति में यह एक बड़ी बात होती है क्योंकि लिखित में ऐसे आश्वासन कम ही दिये जाते हैं। अभी जयराम सरकार को दो वर्ष होने जा रहे हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस को भाजपा से सत्ता छीननी है तो उसे अभी से आक्रामकता में आना होगा लेकिन इसके लिये आज नयी टीम चुनते हुए यह ध्यान रखना होगा कि ऐसे लोग पदाधिकारी न बन जायें जिनके अपने ही खिलाफ मामले निकल आयें। आज राठौर के पक्ष में सबसे बड़ा यही है कि उनका अपना दामन पूरी तरह साफ है। ऐसे में प्रदेश की ईकाई का नये सिरे से गठन कब तक हो जाता है और उसमें वीरभद्र - सुक्खु खेमों से ऊपर उठने का कितना प्रयास किया जाता है और कितने नये लोगों को संगठन में जोड़ा जाता है इस  पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।

केन्द्र के मार्च 2016 के पत्र से सरकार के कर्जों पर उठे सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार का कर्जभार पिछले कुछ वर्षों से तय सीमा से बढ़ता जा रहा है और केन्द्र सरकार के वित्त विभाग ने भी इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए 29 मार्च 2016 को प्रदेश के प्रधान सचिव वित्त को पत्र लिखा था। वित्त विभाग के निदेशक द्वारा जारी इस पत्र में वित्तिय वर्ष 2016-17 के लिये राज्य की कर्ज की सीमा 3540 करोड़ आंकी गयी थी। इसमें स्पष्ट कहा गया था कि The  State may Please ensure adherence with this ceiling while assessing resources for its annual Plan for 2016-17 and also ensure that the States incremental borrowings remain with in this ceiling during 2016-17. The ceiling covers all sources of borrowings including open Market Borrowings, negotiated loans from financial institutions, National Small Saving Fund loans, central Government loans including EAP's, other liabilities arising out of public account transfers under small savings, Provident funds, Reserve Funds, Deposits , etc., as reflected in statement 6 of the State's Finance Accounts. Further, in case the outstanding balances in Cash Credit Limits (CCL) Accounts for Food procurement operations, if any, by the State at the end of the financial year exceeds the opening balances at the beginning of the year, the net increase shall be considered against the borrowing space of the State for the year 2016-17, However, the additional borrowing limits proposed under UDAY to take over DISCOMs liabilities by participating States would be beyond the prescribed by the FFC and not to be counted against the Fiscal deficit limits of respective States as per decision taken. 
केन्द्र का यह पत्र 29 मार्च को आया था लेकिन 10 मार्च 2016 को सदन में वित्तिय वर्ष 2016-17 के जो बजट दस्तावेज रखे गये थे उनमें 2016-17 के संशोधित अनुमानों में इसी वर्ष का कुल कर्जभार जीडीपी का 33.96% बताया गया है। बल्कि 31 मार्च को वित्तिय वर्ष के बन्द होने से पहले भी 2400 करोड़ का कर्ज लिया गया था। वर्ष 2017 चुनावी वर्ष था और दिसम्बर में ही सरकार बदल गयी थी। जयराम ठाकुर मुख्यमन्त्री बन गये थे। जयराम ने जब सदन में अपना पहला बजट भाषण रखा था तब उसमें पूर्व की वीरभद्र सरकार पर यह आरोप लगाया था कि वीरभद्र के इस शासनकाल में 18787 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज लिया गया है। कर्ज के आंकड़े रखते हुए जयराम ने सदन को बताया था कि जब 2007 में धूमल सरकार ने सत्ता संभाली थी तब प्रदेश का कर्जभार 19977 करोड़ था जो कि 2012 में सत्ता छोड़ते समय 27598 करोड़ था लेकिन वीरभद्र के शासनकाल में 18 दिसम्बर 2017 को यह कर्ज बढ़कर 46385 करोड़ हो गया था। बजट दस्तावेजों में 31 मार्च 2018 को यह कुल कर्ज 47906.21 करोड़ दिखाया गया है इसके बाद 2018 - 19 मेें  मुख्यमंत्री के ही बजट भाषण के अनुसार 4546 करोड़ का ऋण लिया गया है जिसका अर्थ है कि 31 मार्च 2019 को यह कर्जभार 52 हजार करोड़ से ऊपर चला जायेगा। 2017-18 की कैग रिपोर्ट अभी तक सदन में नही आयी है। इस रिपोर्ट में ही प्रदेश की वित्तिय स्थिति का सही खुलासा सामने आयेगा। इसके बाद चालू वित्तिय वर्ष में ऋणों की स्थिति पर विधानसभा के मानसून सत्र में आये जगत सिंह नेगी, राजेन्द्र राणा, मुकेश अग्निहोत्री और रामलाल ठाकुर के सवालों के जवाब में आयी जानकारी के मुताबिक  जयराम सरकार अबतक 11329.85 करोड़ का ऋण ले चुकी है। जिसमें से 6600 से अधिक का ऋण अभी वापिस नही किया गया है।
ऋणों की इस तफसील से हटकर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हर बजट में दिखायी जाने वाली पूंजीगत प्राप्तियां भी ऋण ही होती हैं और बजट दस्तावेज में इसे सकल ऋण ही दिखाया जाता है यह पूंजीगत प्राप्तियां वर्ष 2017-18 में 6592.12 करोड़ और 2018-19 में 7730.20 तथा 2019-20 में 8330.75 करोड़ दिखायी गयी है। यह सारा ऋण किन साधनों से लिया गया है और इसमें कितना वापिस हो पाया है इसके बारे में स्थिति बहुत साफ नही है। भारत सरकार ने जो पत्र मार्च 2016में प्रदेश सरकार को भेजा है उसके मुताबिक प्रदेश सरकार तय सीमा से कहीं अधिक ऋण ले चुकी है और आगे ऋण लेने पर और कड़ी पाबंदी लग सकती है। भारत सरकार ने इस संबंध में राज्य सरकार से पूरी विस्तृत जानकारी तलब की है। प्रदेश का वित्त विभाग इस बारे में कुछ भी कहने से बच रहा है। वित्त विभाग के सूत्रों के अनुसार वित्तिय स्थिति बड़े ही नाजुक मोड़ पर पहुंच चुकी है शायद भारत सरकार से केन्द्र पोषित योजनाओं में भी वांच्छित आर्थिक सहायता नही मिल पा रही है। दूसरी ओर आलम यह है कि मुख्यमन्त्री के पहले बजट भाषण में उनके नाम से तीस योजनाएं घोषित की गयीं और दूसरे बजट में सोलह योजनाएं घोषित हैं लेकिन इनमें से कितनी योजनाओं पर अमल हो पाया है और भारत सरकार के पत्र के अनुसार क्या कदम उठाये गये हैं इस पर कोई भी कुछ कहने की स्थिति में नही हैं।
                                                            यह है केन्द्र का पत्र


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


कर्ज के कुछ आंकडे


संगठन चुनावों के बाद भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई तल्ख होने की संभावना बढ़ी

शिमला/शैल। प्रदेश मन्त्रीमंडल में मन्त्रीयों के दो खाली चले आ रहे पदों को भरना मुख्यमन्त्री के लिये कठिन होता जा रहा है बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि इन पदों को भरने के साथ ही राजनीतिक बिस्फोट की संभावनाएं एकदम बढ़ जायेंगी। राजनीतिक विश्लेष्कों का मानना है कि एक समय जब धूमल सरकार के खिलाफ कुछ लोगों ने शान्ता कुमार के अपरोक्ष नेतृत्व में मोर्चा खोला था और आरोपों का एक लम्बा-चौड़ा ज्ञापन तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को सौंपा था ठीक आज उसी तर्ज पर जयराम सरकार के खिलाफ तैयारियां चल पड़ी हैं। इन तैयारियों को हवा वायरल हुए उस पत्र की पुलिस जांच से मिली है जो किसी ने कथित रूप से शान्ता कुमार को लिखा था और उसमें कुछ मन्त्रीयों के खिलाफ आरोप लगाये गये थे। यह पत्र जब वायरल हो गया और अखबारों की खबर भी बन गया तब इस पत्र को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज हुई। इस शिकायत की जांच पूर्व मन्त्री रविन्द्र रवि तक पहुंच गयी तथा पुलिस ने उनका मोबाईल फोन कब्जे में ले लिया। इस फोन की जांच के बाद अब यह कहा जा रहा है कि यह रविन्द्र रवि के कहने पर वायरल किया गया था। पुलिस ने दावा किया है कि इस जांच के बाद वह शीघ्र ही इस मामले में चालान दायर करने जा रही है। पुलिस की ओर से यह जानकारी बाहर आने के बाद रविन्द्र रवि ने अपनी प्रतिक्रिया में यह मामला सीबीआई को सौंपे जाने की मांग करते हुए यह पड़ताल किये जाने की भी मांग की है कि यह पत्र लिखा किसने है इसका भी पता लगाया जाना चाहिये। इसके बाद रविन्द्र रवि की पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार से भी मुलाकात हुई है। रवि और धूमल के मिलने को भी इसी संद्धर्भ में देखा जा रहा है। इससे पहले कांगड़ा में अनुराग के साथ किश्न कपूर और इन्दु गोस्वामी का मिलना भी राजनीतिक संद्धर्भो में ही देखा जा रहा है। यह मिलना धर्मशाला में हुई इन्वैस्टर मीट के बाद हुआ है और इस मीट में अनुराग ठाकुर, किश्न कपूर और प्रेम कुमार धूमल की भूमिकाएं नहीं के बराबर रही हैं। बल्कि इस मीट में अपने सत्र को संबोधित करते हुए अपरोक्ष इसके आयोजको को अपनी नाराज़गी भी बड़े शब्दों में सामने रख दी थी। उस  सत्र में मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव संजय कुण्डु मौजूद थे और अनुराग का इंगित भी शायद उन्हीं की ओर था क्योंकि मीट के प्रबन्धन में प्रधान सचिव की भूमिका अग्रणी कही जा रही है। इस मीट से पहले ही जयराम के खेलमन्त्री गोविन्द ठाकुर और अनुराग ठाकुर में क्रिकेट स्टेडियमों को लेकर जिस तरह की ब्यानबाजी रही है उसके परिणाम भी राजनीतिक समीकरणों की ओर ही ईशारा करते हैं गोविन्द ठाकुर और मुख्यमन्त्री के रिश्ते तो इसी से सामने आ जाते हैं जब मानसून सत्र में घाटे में चल रही एचआरटीसी द्वारा मुख्यमन्त्री को गाड़ी भेंट किये जाने की चर्चाएं चली थी। मुख्यमन्त्री अधिकारियों के दवाब में चल रहे हैं यह आरोप वरिष्ठ नेता महेश्वर सिंह भी एक ब्यान में लगा चुके हैं। यही नहीं पिछले कुछ अरसे से मण्डी में एक वर्ग आरटीआई के माध्यम से आईपीएच मन्त्री मेहन्द्र सिंह ठाकुर को लेकर भी कई आरोप उछाल चुका है जिनमें यह कहा गया है कि महेन्द्र सिंह मुख्यमन्त्री के चुनाव क्षेत्र सिराज और अपने चुनावक्षेत्र धर्मपुर में ही भेदभाव की राजनीति कर रहे हैं। इन्ही आरोपों में एक आरोप 45 लाख रूपया अब तक खाने आदि पर ही खर्च कर देने का लगाया गया है।
 अब जिस तरह से इस वायरल पत्र को लेकर चल रही जांच में रवि केन्द्रित होते जा रहे हैं निश्चित रूप से उसका परिणाम राजनीतिक विस्फोटक ही होगा। इस पत्र में जो आरोप लगाये गये हैं वह कितने प्रमाणिक हैं यह तो किसी जांच से ही पता चलेगा जो अब तक हुई नहीं है। लेकिन इन आरोपों से हटकर जहां पैसे के दुरूपयोग के दस्तावेजी आरोप सामने हैं लेकिन फिर भी उन आरोपों की जांच न हो तो स्वभाविक है कि इससे कुछ लोगों की ओर अंगुलियां उठेंगी ही। इनमें बिलासपुर में बन रहे हाइड्रो कालिज के निर्माण के लिये आमन्त्रित टैण्डर में 92 करोड़ के रेट को छोड़कर 100 करोड़ का रेट देने वाले को काम आबंटित कर दिया गया और  इस तरह टैण्डर आबंटन में ही आठ करोड़ का घपला कर दिया गया। यह आठ करोड़ किसकी जेब में जायेगा इसको लेकर कई चर्चाएं चल रही हैं लेकिन इसमें जांच करवाने की बात नहीं की जा रही है। इसी तरह राजकुमार राजेन्द्र सिंह बनाम एसजेवीएनएल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर अमल नही हो रहा है जबकि यह फैसला सितम्बर 2018 में आ चुका था और इसमें दो माह के भीतर अमल होना था। राज्य में बन रहे तीन मेडिकल कालेजों का निर्माण लोक निर्माण विभाग को छोड़कर केन्द्रिय सरकार की ऐजैन्सीयों को बिना टैण्डर आमन्त्रित किये ही दे दिया गया है। केन्द्रिय ऐजैन्सीयों में किस तरह का भ्रष्टाचार व्याप्त है इसका पता एनपीसीसी से चल जाता है भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते यह ऐजैन्सी सीबाआई के शिकंजे में है और इसे भंग करके इसका विलय एनवीसीसी में कर दिया गया है। हाईड्रो कालिज का निर्माण इसी एनपीसीसी को दिया गया था। ऐसे दर्जनों मामले है जहां राज्य सरकार के पैसे का खुला दुरूपयोग हो रहा है लेकिन जांच करने का साहस नही किया जा रहा है। एशियन विकास बैंक द्वारा सौंदर्यकरण के नाम पर शिमला के दोनों चर्चों को दिया गया करीब 21 करोड़ रूपया कहां गया है इसकी आज तक कोई जानकारी सामने नही है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनो में भ्रष्टाचार के यह मामले राजनीतिक विस्फोट में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे। सूत्रों की माने तो संगठन चुनावों के बाद पार्टी के अन्दर चल रही खेमेबाजी खुलकर सामने आ जायेगी और भ्रष्टाचार इस लड़ाई में केन्द्रिय बिन्दु होगा।

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