नाम पर लिया जा रहा पैसा सीधा भ्रष्टाचार है। सीटू नेताओं विजेन्द्र मेहरा और रमाकांत मिश्रा के मुताबिक तीन करोड़ के ठेके में एक करोड़ रुपए से ज्यादा घपला कर दिया गया है। इस मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट के मुख्यन्यायाधीश को जांच की मांग को लेकर सीटू की ओर से चिट्ठी भी लिखी जा रही है। मेहरा ने सवाल उठाए कि 187 सुरक्षा कर्मियों की निर्धारित संख्या में से 50 कम सुरक्षा कर्मियों का एक का 48 लाख रुपए, ईएसआई के मेडिकल फंड का 12 लाख रुपये, ईपीएफ का साढ़े 21 लाख रुपये, सुरक्षा कर्मियों की छुट्ट्टियों के 15 लाख रुपये किसके खाते में चले गए। इसके अलावा सबसे कम अनुभव, योग्यता व गुणवत्ता के बावजूद रेनबो कम्पनी को ठेका कैसे मिला। व इतनी सारी अनियमितताओं के बावजूद रेनबो कम्पनी को एक साल के बाद ठेके की अवधि खत्म होने के बावजूद अवधि विस्तार कैसे और क्यों दी गयी।
दूसरी ओर आईजीएमसी में ही तैनात कुछ सुरक्षा कर्मीयों ने भी एक पत्रकार वार्ता में विजेन्द्र मेहरा के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सीटू नेतृत्व पर ही गंभीर आरोप लगाये हैं। इन सुरक्षा कर्मीयों का आरोप है कि जब से इन्होंने सीटू का साथ छोड़ा है तभी से इन पर राजनीतिक दबाव डाला जा रहा है। इन कर्मीयों ने सीटू के ही लोगों पर इनके साथ मारपीट करने का भी आरोप लगाया है और इसमें विजेन्द्र मेहरा और एक लड़की सन्दीपा तक का नाम लिया है। सीटू द्वारा इनसे 1,35,000 रूपये लेने का भी आरोप लगाया है। लेकिन यह पैसा क्यों और किसके लिये लिया गया इसका कोई सन्तोषजनक जबाव नही दे पाये। सीटू का आरोप है कि 187 सुरक्षा कर्मचारियों की जगह केवल 137 ही काम कर रहे हैं इस पर इन लोगों का जबाव था कि आईजीएमसी में 137 लोगों की हाजिरी तो मशीन द्वारा लगायी जा रही है। लेकिन बाकि के 50 लोग मैडिकल कालिज और के एन एच में अपनी सेवाएं दे रहे है। लेकिन वहां पर इनकी हाजिरी मशीन द्वारा नहीं लग रही है और इसीलिये इनके तैनात ही न होने का आरोप लगाया जा रहा है।
वीरभद्र बने दोनों के गले की फांस
शिमला/शैल। वायरल हुए अनाम पत्र पर सरकार ने एफआईआर दर्ज करवाकर इसके लेखक तक पहुंचने की कवायद शुरू कर दी है। अभी इस जांच का परिणाम आना शेष है। लेकिन इसी बीच भाजपा अध्यक्ष सत्ती ने इस पत्र संस्कृति पर वीरभद्र और धूमल सरकारों का जिक्र करके मामले को एक नया मोड़ दे दिया है। सत्ती ने कहा है कि धूमल सरकार के समय भी तत्कालीन मंत्री प्रवीण शर्मा के खिलाफ ऐसा ही पत्र आया था। यह पत्र आने के बाद प्रवीण ने अपने पद से त्यागपत्र देने की पेशकश कर दी थी जिसे स्वीकार नही गया था। परन्तु इस बार जिन मन्त्रीयों
के खिलाफ आरोप लगे हैं उनमें से एक ने भी
अभी तक त्यागपत्र की पेशकश नही की है। पत्रों में लगे आरोपों को सरकार ने अपने ही स्तर पर बिना जांच किये नकार दिया है। आरोप लगाने वालों से अपने आरोपों को प्रमाणित करने के लिये सबूत मांगे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या सत्ती, प्रवीण शर्मा का उदाहरण देकर अपरोक्ष में अपने मन्त्रीयों को भी त्यागपत्र देने की पेशकश करने का सुझाव तो नही दे रहे हैं।
दूसरी ओर कांगे्रस ने इन पत्रों में लगे आरोपों की जांच प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायधीश से करवाने की मांग की है। कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर ने कहा कि पार्टी जांच को लेकर राजभवन तक पद यात्रा करेगी और राज्यपाल को इस संबंध में एक ज्ञापन सौंपेगी। राठौर का कहना है कि भाजपा मन्त्रीयों पर लगे आरोप कांग्रेस ने नहीं बल्कि स्वयं भाजपा कार्यकर्ताओं की ओर से आये हैं। क्योंकि अभी तक ऐसे जितने भी पत्र आये हैं उनके लेखकों ने अपने को पार्टी/संघ का कार्यकर्ता ही कहा है।
वायरल पत्रों में लगे आरोपों पर कांग्रेस और भाजपा का वाक्युद्ध शुरू हो गया है। कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मौका मिल गया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ न तो भाजपा और न ही कांग्रेस कभी ईमानदार और गंभीर रहे हैं क्योंकि आजतक भाजपा और कांग्रेस दोनों ने विपक्ष में रहते हुए सरकारों के खिलाफ राज्यपाल ही नहीं महामहिम राष्ट्रपति तक को आरोप पत्र सौंपे हैं। आरोपों की सीबीआई से जांच करवाने तक की मांग की गयी। लेकिन स्वयं सत्ता में आने पर कांग्रेस ने और न ही भाजपा ने कोई जांच करवाने का नैतिक साहस दिखाया है।
भ्रष्टाचार के ध्याय में दोनों दलों का आचरण एक जैसा ही रहा है। यहां तक की अदालत के आदेशों पर भी कारवाई नही की गयी है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण वीरभद्र सिंह का मामला है। स्मरणीय है कि जब दिल्ली उच्च न्यायालय में वीरभद्र सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला चल रहा था तब जस्टिस आर के गावा की अदालत ने उनके चुनाव शपथपत्र को लेकर यह कहा था कि यह शपथपत्र गलत है। अदालत ने इस पर स्पष्ट निर्देश देते हुए चुनाव आयोग को भेजने और उस पर कारवाई करने को कहा था लेकिन चुनाव आयोग से जब पूछा गया तो उनसे जवाब मिला कि उन्हें इसकी कोई जानकारी ही नही है। अदालत का आदेश यह था। It has come to light that the first ITR for the AY 2011-12 was filed by Shri. Vir Bhadra Singh on 11-07-2011 showing his agricultural income as Rs. 25 Lakhs. The revised ITR for this year showing an income of Rs.1.55 Crores was filed by him on 02-03-2012. Thereafter while contesting HP Assembly elections. He filed an affidavit on 17-10-2012 showing his income as Rs. 18.66 Lakhs only. Thus Shri. Vir Bhadra Singh appears to have grossly suppressed his income in the said affidavit. This matter is proposed to be brought to the notice of the Election Commission of India for taking necessary action as deemed fit.
इसी तरह राजकुमार, राजेन्द्र सिंह बनाम एसजेवीएनएल मामले मे सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है। इसमें शीर्ष अदालत ने स्व. राजेन्द्र सिंह और उनके वारिसों के आचरण को फ्राड कहा है। अदालत ने इस फ्राड पर फैसला देते हुए दो माह में 12% ब्याज सहित रिकवरी करने के आदेश दिये हैं। सितम्बर 2018 को आये इस फैंसले पर जयराम सरकार भी अब तक कोई कारवाई नही कर पायी है। फ्राड को लेकर किसी के खिलाफ मामला तक दर्ज नही किया गया है। शीर्ष अदालत का आदेश यह Learned counsel on behalf of the respondent has referred to the decision rendered in Madan Kishore v. Major Sudhir Sewal, (2008) 8 SCC 744, wherein question arose with respect to entitlement of subtenant to apply under Section 27(4). It was held that the expression in Section 27(4), such tenant who cultivates such land, does not entitle a subtenant either to claim proprietary rights or apply for the same under Section 27(4). It was held that he was not a subtenant. The decision is of no help to the cause espoused on behalf of LRs. of Rajinder Singh.
In the peculiar facts projected in the case the principle fraud vitiates is clearly applicable it cannot be ignored and overlooked under the guise of the scope of proceedings under Section 18/30 of the LA Act.
Resultantly, we allow the appeals and direct that the compensation that has been withdrawn by Late Rajinder Singh or his LRs. in the case of land acquisition, in original proceedings or under section 28A shall be refunded along with interest at the rate of 12 percent per annum within 3 months from today to the appellants/State, as the case may be, and compliance be reported to this Court. The appeals are accordingly allowed. We leave the parties to bear their own costs.
शीर्ष अदालत के सामने यह सवाल था कि The question involved is whether after the abolition of Jagirs by virtue of the Himachal Pradesh Abolition of Big Landed Estates and Land Reforms Act, 1953 (hereinafter referred to as ‘the Abolition Act’), the late Jagirdar or his legal representatives could have claimed the compensation on the land acquisition being made particularly when land has vested in the State of Himachal Pradesh, the land was not under the personal cultivation, and particularly when they have received the compensation under the Abolition Act, apart from that had also received the compensation under the provisions of H.P. Ceiling on Land Holdings Act, 1972 (hereinafter referred to as “the Ceiling Act”).
The facts project how a litigant has filed a slew of litigations one after the other and faced with a situation that it was likely to be dismissed, he would withdraw it; again, file it on new grounds, or having lost it, would withdraw it again at appellate stage, and in the meantime, in different proceedings by playing fraud, getting unjust enrichment by receiving compensation at the expense of public exchequer.
क्या इन प्रसंगो से दोनों पार्टीयों और उनकी सरकारों की भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीरता और ईमानदारी का खुलासा नहीं हो जाता है।
रवि का आक्रामक होना हुआ बाध्यता
शिमला/शैल। जयराम सरकार को सत्ता में आये अभी दो वर्ष भी नही हुए हैं लेकिन इसी अवधि में भ्रष्टाचार को लेकर अनाम पत्रों के माध्यम से जिस तरह से मुद्दे उछलने शुरू हुए हैं उससे सरकार और संगठन दोनों की कार्यशैली पर गंभीर सवालिया निशान लगने शुरू हो गये हैं इसमें कोई दो राय नही है। स्मरणीय है कि सबसे पहला पत्र मन्त्री के ओ एस डी और उन्हीं के एक सलाहकार को लेकर सामने आया था। इस पत्र के बाद उद्योगमन्त्री
की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता दूसरा
पत्र सामने आया और इसमें सीमेन्ट के दाम बढ़ाये जाने को लेकर आरोप लगाये गये थे। यह सही है कि इस सरकार के सत्ता में आने के बाद सीमेन्ट के दामों में बढ़ौत्तरी हुई है और इस बढ़ौत्तरी की कोई जायज वजह प्रदेश की जनता को नही बताई गयी है। उद्योग मन्त्री के बाद महिला मोर्चा की अध्यक्ष इन्दु गोस्वामी का पत्र चर्चा में आया। इस पत्र में इन्दु गोस्वामी ने सरकार और संगठन दोनों की नीयत और नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगाये हैं। इसके बाद पर्यटन विभाग के वरिष्ठम अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता पत्र सामने आता है और जब इन तमाम पत्रों पर सरकार की ओर से न तो कोई कारवाई सामने आयी तथा न ही कोई जवाब जनता में आया। तब अनाम लेखक ने पूर्व मुख्यमन्त्री शान्ता कुमार के नाम पत्र दाग दिया क्योंकि शान्ता कुमार भ्रष्टाचार का ‘कड़वा सच’ के एक प्रतिष्ठित लेखक हैं फिर शान्ता कुमार आज सरकार और मुख्यमन्त्री दोनों के मार्गदर्शक माने जाते हैं।
शान्ता कुमार के नाम लिखे इस पत्र में स्वास्थ्य, पर्यटन और सरकार द्वारा हर माह कर्ज लिये जाने की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। इस पत्र के सामने आने के बाद मुख्यमन्त्री और शान्ता कुमार में पालमपुर में बैठक हुई। इस बैठक के बाद शान्ता कुमार की अपनी एक अलग प्रतिक्रिया आयी। इसमें इस पत्र का कोई जिक्र नही आया। केवल धर्मशाला के उपचुनाव को लेकर ही शान्ता ने अपनी भूमिका स्पष्ट की है। शान्ता इस पत्र को लेकर शायद इसलिये खामोश रहे हैं क्योंकि तब तक कांगड़ा केन्द्रीय सहकारी बैंक द्वारा मनाली के एक युद्ध चन्द बैंस को 65 करोड़ का ऋण दिये जाने का विवाद सामने आ चुका था। वैंस मनाली में एक पर्यटन ईकाई स्थापित कर रहे हैं जिसके लिये उन्होंने कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक से ऋण स्वीकृत करवाया और इस ऋण का भुगतान उन्हें बैंक की राजकीय महाविद्यालय ऊना में स्थित ब्रांच से करवाया गया। वैंस ने इस ऋण में से ग्यारह लाख का दान शान्ता कुमार के विवेकानन्द ट्रस्ट को चैक के माध्यम से कर दिया। संयोवश कांगड़ा बैंक के चेयरमैन राजीव भारद्वाज भी शायद इस ट्रस्ट के एक ट्रस्टी हैं। यह ऋण जब इस तरह से चर्चा में आ गया तब शान्ता ने दान का चैक वापिस कर दिया। ऋण लेकर एक व्यक्ति इस तरह से दान देने का शुभ कार्य करे ऐसा अकसर कम देखा गया है। वैसे नियमों के मुताबिक सहकारी बैंक इतना बड़ा ऋण नाबार्ड की पूर्व अनुमति के बिना नही दे सकता है और इसमें नाबार्ड की कोई सहमति नही ली गयी है। ऐसा ही एक ऋण कांगड़ा सहकारी बैंक द्वारा 3-10-2017 को भुवनेश्वरी हाईड्रो प्रा. लि. को भी दिया गया है। 12.45 करोड़ के इस ऋण पर भी नाबार्ड की अनुमति को लेकर सवाल उठे हैं। वैसे तो कांगड़ा बैंक ने 1-4-2017 से 31-3-2018 तक एक दर्जन से अधिक एक कराड़े से अधिक के ऋण गैर सहकारी सभाओं को दे रखे हैं। इनमे से कितने मामलों में नाबार्ड की अनुमति है इसको लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है और अनुमति न होना अपने में एक आपराधिक मामला बन जाता है। वैसे कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक के 560.60 करोड़ के एनपीए में से कितने की रिकवरी बैंक का नया प्रबन्धन कर पाया है इसको लेकर भी अभी तक अधिकारिक रूप से कुछ भी सामने नही आ पाया है। लेकिन प्रदेश के सारे सहकारी बैंको के 938 करोड़ के एनपीए के प्रति सरकार की ओर से भी कोई गंभीर कारवाई अब तक सामने नही आ पायी है।
कांगड़ा केन्द्रिय बैंक के चेयरमैन राजीव भारद्वाज, शान्ता कुमार के एक विश्वस्त हैं। बैंक की इस तरह की कार्यप्रणाली सामने आने के बाद स्वभाविक है कि शान्ता कुमार जैसे व्यक्ति को ऐसे पत्रों पर प्रतिक्रिया देना सहज नहीं रह जाता है। ऐसे में इस पत्र पर मुख्यमन्त्री और स्वास्थ्य मन्त्री की ही प्रतिक्रियाएं आना स्वभाविक हैं। स्वास्थ्य मन्त्री ने पत्र में लगाये गये आरोपों को नकारते हुए इस छवि को खराब करने का प्रयास करार दिया है। मुख्यमन्त्री ने भी आरोपों को खारिज करते हुए आरोप लगाने वालों को भ्रष्टाचार के सबूत देने की चुनौती दी है।
सरकार ने इस अनाम पत्र के वायरल होने के बाद इसके लेखक तक पहंुचने के लिये इस मामले में एक एफ आई आर दर्ज करवाई है। यह एफ आई आर दर्ज होने के बाद शुरू हुई जांच में पुलिस ने कांगड़ा के ही वरिष्ठ भाजपा नेता पांच बार विधायक रहे पूर्व मन्त्री रविन्द्र रवि से पूछताछ की है और उनका मोबाईल फोन जब्त किया है। रवि ने इस पूछताछ को साजिश करार दिया है। रवि धूमल खेमे से जोड़कर देखे जाते हैं और धूमल का नाम धर्मशाला उपचुनाव के लिये ज्वालामुखी और नगरोटा मण्डलों की ओर से चर्चा में आ चुका है हालांकि धूमल ने इस चर्चा पर कोई प्रतिक्रिया नही दी है लेकिन राजनीतिक हल्कों में इस पत्र विवाद और इसमें रवि से पूछताछ किये जाने को धूमल से जोड़कर देखा जा रहा है। स्मरणीय है कि जंजैहली प्रकरण में भी ऐसे ही धूमल का नाम चर्चा में आ गया था जिस पर धूमल को यह कहने की नौबत आ गयी थी कि सरकार चाहे तो सीआईडी से जांच करवा ले। लेकिन अब धूमल के निकटस्थ रवि से पूछताछ करके प्रदेश में यह संदेश देने का तो प्रयास किया ही गया है कि धूमल खेमा सरकार को अस्थिर करना चाहता है। फिर यह सब उपचुनावों की पूर्व संध्या पर सामने आया है। इस पत्र विवाद से हटकर भी कांगड़ा की भाजपा राजनीति में धवाला और पवन राणा का विवाद तथा इन्दु गोस्वामी का पत्र और महिला मोर्चा की अध्यक्षता से त्यागपत्र देना ऐसे प्रसंग है जो निश्चित रूप से पार्टीे की छवि पर गंभीर सवाल उठाते हैं। ऐसे ही राजनीतिक वातावरण में कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक के ऋण प्रकरण का सामने आना पार्टी के लिये और भी कठिनाई पैदा करता है।
ऐसे परिदृश्य में रवि और धूमल को अपनी स्थिति साफ करने के लिये खुलकर सामने आने के अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता है। क्योंकि पिछले दिनों जब पर्यटन के कुछ होटलों को लीज पर देने का प्रकरण सामने आया था तब मुख्यमन्त्री ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए न केवल विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को ही बदला बल्कि इसमें जांच के भी आदेश दिये थे। लेकिन जांच करने वाले मुख्य सचिव भी दिल्ली जा चुके हैं परन्तु अभी तक रिपोर्ट सामने नही आयी है। ऐसी ही कांगड़ा बैंक की हो रही है। ऋण लेने वाला उसी ट्रस्ट को दान दे रहा है जिसमें बैंक का चेयरमैन ट्रस्टी है। यह एक तरह से वक्कामुल्ला चन्द्र शेखर और वीरभद्र जैसा मामला बन जाता है। ऐसे मामले पर भी सरकार का खामोश रहना सवाल खड़े करता है। उपचुनावों में ऐसी चीजों का नकारात्मक असर होना स्वभाविक है इससे जीत के अन्तर पर तो निश्चित रूप से असर पड़ेगा। पत्र विवाद से इसकी जिम्मेदारी धूमल खेमे पर आ जाती है। यदि धूमल खेमा बैंक प्रकरण पर सवाल खड़े कर देता है तो स्थिति एकदम उल्ट जाती है। राजनीतिक पंडितो के अनुसार जिस ढंग से पत्र विवाद पर जांच शुरू की गयी है उससे किसी एक खेमे को तो नुकसान उठाना ही पड़ेगा।
शिमला/शैल। प्रदेश सरकार की टीसीपी के तहत प्लानिंग और साडा क्षेत्रों में शामिल किये गये ग्रामीण क्षेत्रों को टीसीपी से बाहर करने पर विचार कर रही है। इसके लिये आईपीएच मंत्री महेन्द्र सिंह की अध्यक्षता में मन्त्रीयों की एक उप समीति बनाई गयी है। कहा गया है कि इस उप समिति के पास ग्रामीण क्षेत्रों से इस आशय के 120 प्रस्ताव आये हैं। पिछले दिनों प्रदेश सचिवालय में हुई इस उप समिति की बैठक में फैसला लिया गया कि ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की समस्याओं के लिये जन सुनवाई की जायेगी। यह जन सुनवायी शिमला मे सुरेश भारद्वाज, कुल्लु -मनाली में गोविन्द ठाकुर और मण्डी में स्वयं महेन्द्र सिंह ठाकुर करेंगे। शिमला में हुई उप समिति की बैठक में इन मन्त्रीयों के अतिरिक्त विधायक सुखविन्दर सिंह सुक्खु, विधायक अनिरूद्ध सिंह और सचिव टीसीपीसी पालरासू और कुछ अन्य अधिकारी भी शामिल रहे हैं। इस बैठक में शिमला को लेकर यह सुझाव आया है कि यहां भवनों की ऊंचाई 21 मीटर तय कर दी जानी चाहिये। शिमला, मण्डी और कुल्लु, मनाली के अतिरिक्त प्रदेश में और कहां पर इस उप समिति की बैठकें होंगी तथा और कहां-कहां से प्रस्ताव आये हैं यह अभी सामने नही आया है।
स्मरणीय है कि प्रदेश के कई हिस्सों में हुए अवैध निर्माणों का मामला प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सुर्खीयों में रहे हैं। अदालत के आदेश पर ऐसे निर्माणों के बिजली पानी तक काटे गये हैं। सर्वोच्च न्यायालय से ही एक मामला शुरू में एनजीटी में गया था और उसके बाद ही एनजीटी ऐसे मामलो पर गंभीर हुआ। कसौली का मामला एनजीटी के आदेशों का ही परिणाम है। कुल्लु में मन्त्री महेन्द्र सिंह ने एनजीटी के आदेशों पर अपने होटल का अवैध निर्माण स्वयं गिराया है। योगेन्द्र सेन की याचिका पर दिये गये फैसले में एनजीटी ने अढ़ाई मंजिल तक ही निर्माण सीमा इसलिये तय की है क्योंकि शिमला ही नही हिमाचल प्रदेश का 80% भाग संवदेनशील भूकंप जोन में आता है। आपदा प्रबन्धन के तहत सरकार द्वारा किये गये अपने अध्ययन की रिपोर्ट में यह दर्ज है कि यहां पर हल्का सा भी भूकंप का झटका आने पर 30,000 लोगों की जान जायेगी। इसी अध्ययन के बाद सचिवालय में सचिव स्तर की एक कमेटी गठित की गयी थी और पहली बार वर्ष 2000 में शिमला में सरकारी और गैर सरकारी निर्माणों पर प्रतिबन्ध लगाया गया था। एनजीटी के 16-11-2017 के फैसले का आधार पर इसी सचिव कमेटी की सिफारिशें बनी हैं और फैसले में यह विशेष रूप से दर्ज भी है। इसी फैसले में निर्माणों को नियमित करने के लिये 5000 से 10,000 रूपये प्रति वर्ग फुट जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय और एनजीटी तक में प्रदेश में अवैध निर्माणो का आंकड़ा 35000 तक आया है। लेकिन सरकार आज भी सदन में यही जानकारी दे रही है कि अवैध निर्माणों के केवल 8782 मामले ही उसके सामने आये हैं। इनमें भी नगर क्षेत्रों के 5444 तथा नगरों से बाहर के 3338 मामले ही हैं। नगर निगम शिमला में एनजीटी के फैसले के बाद केवल 14 नये और 264 संशोधित मामले स्वीकृति के लिये आये हैं। लेकिन अवैध निर्माणों को लेकर निगम मौन रहा है जबकि पिछले दिनों उच्च न्यायालय में आये एक मामले में यह संख्या 8300 कही गयी है।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश में अवैध निर्माण एक बहुत बड़ी समस्या है। किसी भी आपदा की घड़ी में इनके कारण हजारों की संख्या में जान माल का नुकसान हो जायेगा। इसी नुकसान की आशंका निर्माणों पर रोक और उन्हे अढ़ाई मंजिल तक सीमित किया गया है। लेकिन जिस ढंग से टीसीपी में संशोधन की भूमिका ग्रामीण क्षेत्रों को प्लानिंग और साडा से बाहर करने की तैयार की जा रही है। उससे यह सवाल उठता है कि क्या संशोधन के बाद यहां पर बहुमंजिलों के निर्माण की तैयारी की जा रही है। आखिर किसके लिये इस माध्यम से यह सुविधा देने की तैयारी हो रही है। अभी शिमला के 30 किलोमीटर के दायरे में ज़मीन मांगने के 26 आवदेन आये हैं जिनमें से आठ तो सीधे आरएसएस से ही ताल्लुक रखते हैं। इसी किलो मीटर के दायरे में कुछ मंत्रीयों और अधिकारियों की भी ज़मीने हैं। मन्त्रीयों की जो उप समिति बनी है शायद उसके भी सदस्य की जमीन इस दायरे में आती है। एनजीटी के फैसले के खिलाफ सरकार सर्वोच्च न्यायालय में गयी थी लेकिन शायद वहां से इसमें कोई राहत नही मिली है। फिर भवन निर्माण क्षेत्र में आने वाले संभावित निवेशकों की ओर से भी शायद यह दबाव है कि निर्माण पर लगी अढ़ाई मंजिल की शर्त को हटाया जाये। क्योंकि कोई भी भवन निर्माता अढ़ाई मंजिल का निर्माण करके इसमें लाभ नही कमा सकता। चर्चा है कि अभी पंजीकृत हुए एक गुप्ता भवन निर्माता ग्रुप ने शिमला के 30 किलो मीटर के दायरे में सौ बीघा से अधिक ज़मीन की खरीद की है लेकिन एनजीटी के मौजूदा फैसले के तहत यह निर्माण लाभकारी न हों इसी आशंका के चलते ऐसे लोगों के दबाव में आकर टीसीपी में संशोधन का रास्ता अपनाया गया है और उसमें शिमला, मण्डी तथा कुल्लु मनाली पर ही फोकस रखा गया है। इस प्रस्तावित संशोधन पर पर्यावरण प्रेमियों की क्या प्रतिक्रिया रहती है यह आने वाले दिनों में सामने आयेगा।
यह हैं 26 आवेदक


शिमला/शैल। स्वास्थ्य विभाग ने बद्दी में तैनात सहायक दवा नियंत्रक निशांत सरीन के आवास -कार्यालय और अन्य ठिकानों पर 23 अगस्त को विजिलैन्स ने छापेमारी की थी। इस छापेमारी के दौरान कई संपत्तियों बैंक खातों और फार्मा कंपनीयों के पैसों से मंहगे होटलों में ठहरने तथा हवाई यात्राएं करने के सबूत मिलने का दावा किया गया था। सरीन की एक सहयोगी डा. कोमल की पंचकूला स्थित फार्मा कंपनी पर भी इसी संबंध में छापेमारी की गयी थी। इस छापेमारी के दौरान सरीन और उनकी सहयोगी डा. कोमल विजिलैन्स टीम के साथ नही थे जिसका अर्थ है कि शायद उन्हें इस संभावित छापेमारी की भनक पहले ही लग गयी थी इसी कारण से वह इन ठिकानों पर हाथ नही लगे। इस छापेमारी के बाद विजिलैन्स ने दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज करके इन्हें सोलन कार्यालय में जांच में शामिल होने का नोटिस जारी कर दिया था।
लेकिन विजिलैन्स के नोटिस के बावजूद यह लोग जांच में शामिल नही हुए। बल्कि सोलन की अदालत मे अग्रिम जमानत के लिये याचिका दायर कर दी। इस याचिका के दौरान भी सरीन अदालत मे नही आये। यह याचिका भी खारिज हो गयी है। सरीन को जमानत नही मिली है। जमानत न मिलने के बावजूद भी विजिलैन्स ने उन्हें अभी तक गिरफ्रतार नही किया है न ही सरीन अब तक जांच में शामिल हुए हैं। वह बद्दी में अपने कार्यालय में भी नही आ रहे हैं। माना जा रहा है कि वह भूमिगत हो गये हैं और जमानत के लिये प्रदेश उच्च न्यायालय में प्रयास करेंगे। अग्रिम जमानत के लिये प्रयास करना उनका कानूनी अधिकार है लेकिन इस अधिकार से विजिलैन्स की कारवाई नही रूक जाती है। जब सरीन को सोलन की अदालत से जमानत नही मिली है तब कायदे से विजिलैन्स को उनकी गिरफ्रतारी के प्रयास तेज कर देने चाहिये थे। लेकिन ऐसा कुछ सामने नही आया है।
सरीन एक सरकारी कर्मचारी हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज है और विजिलैन्स छापेमारी कर चुकी है और वह उन्हें नही मिले हैं। वह अपने कार्यालय में भी नही आ रहे हैं क्या उन्होंने विभाग से कोई छुट्टी ले रखी है। यदि ऐसी कोई छुट्टी है तो क्या वह यह मामला दर्ज होने के बाद रद्द नहीं हो जानी चाहिये थी? यदि वह बिना किसी छुट्टी के अपने कार्यालय से गायब है तो क्या उसके खिलाफ एक और आपराधिक मामला नही बन जाता है? क्योंकि कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना सूचना के गायब नही रह सकता। लेकिन विभाग की ओर से इस तरह की कोई कारवाई अबतक अमल में नहीं लायी गयी है। स्मरणीय है कि बहुत पहले बिलासपुर में भी सरीन के खिलाफ ऐसा ही एक मामला बना था उस समय भी राजनीतिक दबाव होने की चर्चाएं उठी थी। अब भी माना जा रहा है कि शायद राजनीतिक दबाव फिर हावि हो गया है जिसने सरकार और विजिलैन्स दोनों के हाथ बांध रखे हैं।