कांग्रेस और भाजपा दोनों से सवाल
प्रदेश का वित्त निगम क्यो बंद हुआ
सहकारी बैंको के 980 करोड़ के एनपीए का क्या हुआ
शिमला/शैल। जयराम सरकार प्रदेश में निवेश लाने और लोगों को रोज़गार के साधन उपलब्ध करवाने के लिये न केवल अपने देश में ही बल्कि विदेशों में भी इन्वेस्टर मीट करके निवेश जुटाने के प्रयास कर रही है। इन प्रयासों की कड़ी में इस वर्ष के शुरू में पीटरहाॅफ में एक मीट करके 159 एम ओ यू साईन करके 17,365 करोड़ का निवेश आने और 40,000 लोगों को रोज़गार मिलने का दावा किया गया था। इसके बाद जून-जुलाई में 228 उद्योगों के साथ एमओयू साईन करके 27515 करोड़ का निवेश आने का दावा किया गया है। स्वभाविक है कि जब इतने उद्योगों के
साथ एमओयू साईन किये गये हैं तो यह उद्योग लगाने के लिये ज़मीन भी चाहिये। जब सरकार यह मीट करके उद्योगों को आमन्त्रित कर रही है तो इनके लिये जमीन भी सरकार ही उपलब्ध करायेगी। लेकिन सरकार के इन जमीन उपलब्ध करवाने के प्रयासों को विपक्ष हिमाचल आॅन सेल के रूप में देख रहा है।
अभी नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने कांग्रेस के नौ विधायकों के सरकार पर हल्ला बोलते हुए यह आरोप लगाया है कि इस निवेश की आड़ में प्रदेश को देश-विदेश के बड़े उद्योगपतियों के हाथों बेचा जा रहा है। कांग्रेस ने ऐलान किया है कि वह सरकार के इन प्रयासों को सफल नही होने देंगे। इसके लिये कांग्रेस ने परमार जयंती के अवसर पर हिमाचल बचाओ अभियान छेड़ने का ऐलान किया है।
कांग्रेस के इन आरोपों का जवाब देते हुए जयराम के तीन मन्त्रीयों सुरेश भारद्वाज, विक्रम ठाकुर और गोविन्द ठाकुर ने एक पत्रकार वार्ता में यह दावा किया कि सरकार ने 263 उद्योगों के साथ 29500 करोड़ के एमओयू साईन किये हैं। मन्त्रीयों ने यह दावा किया है कि 6103 करोड़ के निवेश के साथ 103 प्रौजैक्टों पर काम भी शुरू हो चुका है। इसी के साथ यह भी दावा किया गया कि उद्योगों के लिये दस हजार बीघे का भूमि बैंक भी तैयार कर लिया गया है। वैसे जिस तरह के एमओयू साईन किय गये हैं उसे देखने से स्पष्ट हो जाता है कि इन उद्योगों और इस निवेश को जमीन पर उतरने के लिये अभी समय लगेगा। यह है एमओयू का प्रस्ताव जिसमें दोनो पक्षों की ओर से सिद्धान्त रूप में ही हामी भरी गयी है।
"You are, therefore, requested to take up with and invite the investors of projects which are in pipeline and/or in which EC or permission under section-118 of H.P. Tenancy and Land Reform Act stand signed/issued and request them to participate in the aforesaid 'MOU signing ceremony'. A copy of the suggested MoU is enclosed for your reference.
You are also requested to inform the number and details of MoUs proposed to be signed in the by your department/organization, to this Office within a week.
This Memorandum of Understanding is made to facilitate M/s. for establishment of the aforesaid project in Himachal Pradesh in a time bound manner.
This MOU indicates the intention of the investor in brief about the proposed industry and the possible facilitation to be extended by the state Government and shall remain valid for a maximum period of 12 (twelve) months from the date of entering into MOU unless otherwise extended by second party. No separate notice will be required to be issued for this."
वैसे यह प्रदेश में प्रथा रही है कि हर सरकार औद्यौगिक निवेश जुटाने के लिये इस तरह के प्रयास करती रही है। हर सरकार के इन प्रयासों पर हर विपक्ष सत्ता पक्ष पर हिमाचल बेचने के आरोप लगाता आया है। भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर यही आरोप लगाये हैं तो कांग्रेस आज भाजपा पर वही रस्म अदायगी पूरी कर रही है। लेकिन इस परिदृश्य में एक सवाल कांग्रेस और भाजपा दोनों से पूछा जाना आवश्यक हो गया है कि प्रदेश में उद्योगों को प्रोत्साहन देने और उन्हें आसान वित्त उपलब्ध करवाने के लिये प्रदेश में वित्त निगम स्थापित किया गया था। इस निगम का प्रबन्धन पूरी तरह वरिष्ठ अफसरशाहों के हाथों में ही रहा है। वित्त निगम के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी मुख्य सचिवों के पास पदेन रही है। लेकिन आज यह निगम बुरी तरह फेल होने के बाद इसे बन्द कर दिया गया है। इसमें सरकार का करोड़ो रूपया डूब गया है। निगम के प्रबन्धन का आलम यह रहा है कि उसे अपने ऋण लेने वालों तक की जानकारी नही रही है। यह जानकारी उपलब्ध करवाने वालों को कमीशन तक देने की पेशकश की गयी है। क्या सरकार इस निगम के असफल होने के कारणों का खुलासा जनता मे रखेगी? वित्त निगम का करोड़ों रूपया डूब गया है लेकिन इसके लिये किसी को भी जिम्मेदार नही ठहराया गया है। वित्त निगम का फेल होना सरकार की औद्यौगिक नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आज जब सरकार प्रदेश में एक लाख करोड़ का निवेश लाने का स्वप्न देख रही है तो स्वभाविक है कि यह निवेश भी हमारे ही बैंको से ऋण लेकर किया जायेगा। इसलिये सरकार को आज प्रदेश के आम आदमी को यह भरोसा दिलाना होगा कि इस ऋण को एनपीए नही होने दिया जायेगा। वैसे सरकार प्रदेश के सहकारी बैंकों के 980 करोड़ के एनपीए की रिकवरी के लिये अभी तक कोई कारगर कदम नही उठा पायी है।
शिमला/शैल। लोकसेवा आयोग की सदस्य डा. रचना गुप्ता ने एक नोयडा निवासी देवाशीष भट्टाचार्य के खिलाफ एक करोड़ की मानहानि का मामला दायर किया है। अभी 14 जून को प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर हुए मामले में 22 अगस्त को पेशी लगी है। इस हाई प्रोफाईल मामले ने सबका ध्यान आकर्षित किया हुआ है। स्मरणीय है कि यह मामला दायर करने से पहले डा. रचना गुप्ता ने देवाशीष को 12-12-2018 को एक लीगल नोटिस भेजा था। इस नोटिस में देवाशीष द्वारा सोशल मीडिया में पोस्ट की गयी छः पोस्टों का जिक्र उठाते हुए इनसे मानहानि होने का आरोप लगाते हुए एक करोड़ के हर्जाने की मांग की गयी थी। यह पोस्टें किन-किन तारीखों को पोस्ट की गयी इसका कोई जिक्र नोटिस में नही था।
यह नोटिस मिलने के बाद देवाशीष ने रचना गुप्ता के वकील को 16-1-2019 को एक पत्र भेजकर उनसे यह जानकारी मांगी की संद्धर्भित पोस्टें किन तारीखों की हैं ताकि वह नोटिस का समुचित जवाब दे सके। वकील के इस पत्र से पहले देवाशीष ने स्वयं एक ऐसा ही पत्र रचना गुप्ता के वकील को भेजा था। लेकिन इन पत्रों का कोई जवाब नही आया। इसमें उल्लेखनीय यह है कि देवाशीष की इन सारी कथित पोस्टों में प्रश्नवाचक चिन्ह का प्रयोग किया गया है। प्रश्नवाचक चिन्ह से यह पोस्टें अपने में एक सीधा ब्यान न होकर एक सवाल बन जाती हैं। इस प्रश्नवाचक चिन्ह से यह देखना रोचक होगा कि क्या यह पोस्टें ब्यान के दायरे में आकर मानहानि का कारक हो सकती हैं या नहीं। लीगल नोटिस 12-12-2018 को भेजने के बाद अब जून में मानहानि का दावा दायर किया गया है। दावे के साथ दायर हुए शपथ पत्र के अनुसार यह याचिका संलग्नों सहित 35 पन्नों की है लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा देवाशीष को भेजे गये नोटिस के साथ याचिका के केवल 12 ही पन्ने उन्हें मिले है। यह 12 पन्ने मिलने पर देवाशीष ने उच्च न्यायालय के रजिस्टार ज्यूडिश्यिल को 26-7-2019 को एक पत्र लिखकर याचिका के अन्य पन्ने उन्हें उपलब्ध करवाने का आग्रह किया ताकि वह सारे दस्तावेजों का अवलोकन करके इसका समुचित जवाब तैयार कर सके।
प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में यह मानहानि मामला विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। क्योंकि प्रदेश में शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि लोक सेवा आयोग के सदस्य को इस तरह का मामला दायर करने की नौबत आयी हो। वैसे तो लोकसेवा आयोग के एक अन्य सदस्य की नियुक्ति को भी प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती मिली हुई है और यह मामला अभी तक लंबित चल रहा है। इसमें यह रोचक हो गया है कि जब पंजाब लोक सेवा आयोग का एक मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा था तब शीर्ष अदालत ने लोक सेवा आयोगों के सदस्यों की नियुक्तियों को लेकर एक सुनिश्चित मानदण्ड निर्धारित करने और अपनाने के निर्देश केन्द्र सरकार से लेकर सभी राज्य सरकारों को कर रखे हैं। लेकिन शीर्ष अदालत के इन निर्देशों की अनुपालना आज तक नही हो पायी है और संयोगवश प्रदेश लोक सेवा आयोग के सभी सदस्यों की नियुक्तियां इन निर्देशों के बाद ही हुई है। ऐसे में यह मामला भी रोचक हो गया है और सबकी निगाहें इस पर लगी हुई हैं।


शिमला/शैल। प्रदेश सरकार ने पिछले महीनों में करीब 228 उद्योगों के साथ 27515 करोड़ के एमओयू साईन किये हैं। इन उद्योगों और इस निवेश की प्रगति मानीटर करने के लिये हिम प्रगति पोर्टल भी तैयार किया गया है। इस संद्धर्भ मेें अभी मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हिम प्रगति पोर्टल की समीक्षा की गयी है। समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने राजस्व और टीसीपी विभागों को
निर्देश दिये हैं कि वह निवेशकों को पेश आ रही समस्याओं का तुरन्त और प्राथमिकता के आधार पर निपटारा करना सुनिश्चित करे। जिन 228 उद्योगों के साथ एमओयू साईन हुए हैं उनमें से अधिकांश उद्योग पुराने ही है जो पहले ही कुछ निवेश कर चुके हैं लेकिन इन्हें सरकार से वांच्छित सारी अनुमतियां अभी तक नहीं मिल पायी हैं। लेकिन सरकारी तन्त्र ने अपनी पीठ थपथपाने के लिये इन्हीं उद्योगों के साथ नये सिरे से एमओयू साईन कर लिये हैं। अब तन्त्र को इन उद्योगों की समस्याएं सुलझाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गयी है क्योंकि यदि इन्हीं की समस्याएं तुरन्त हल न हो पायी तो नये निवेशकों का आना असंभव हो जायेगा।
इस कड़ी में सबसे बड़ी समस्या प्रदेश की जलविद्युत परियोजनाओं में आ रही है। प्रदेश में पांच मैगावाट तक परियोजनाएं हिम ऊर्जा के माध्यम से लगायी जाती है। जलविद्युत परियोजना लगाने से पहले प्रस्तावित परियोजना द्वारा उत्पादित बिजली कौन खरीदेगा यह उत्पादक को यह सरकार को सूचित करना होता है। प्रदेश में यह खरीद बिजली बोर्ड करता है। इस तरह उत्पादक को यह चिन्ता नहीं होती है कि बिजली बेचेगा किसको। लेकिन इस समय इन विद्युत उत्पादकों को यह बिजली बेचना एक परेशानी हो गयी है। अभी हिम प्रगति पोर्टल की समीक्षा के दौरान एक बैठक इन विद्युत उत्पादकों से भी हुई है। इस बैठक में 25 मैगावाट तक के 26 उत्पादकों ने अपनी समस्या यह रखी की बोर्ड उनकी सारी उत्पादित बिजली को खरीद नही रहा है। यदि पांच मैगावाट का उत्पादन हो रहा है तो उसमें से दो या तीन मैगावाट ही खरीदी जा रही है और बाकी बिना बिके रह रही है। लेकिन कम खरीद का आदेश बिना लिखे जबानी दिया जा रहा है। यह समस्या छोटे और मझोले उत्पादकों को पेश आ रही है। बड़े उत्पादकों को यह समस्या नही है। इससे छोटे निवेशकों की स्थिति बहुत खराब हो गयी है। उत्पादकों द्वारा रखी गयी इस समस्या पर जब मुख्यसचिव ने बोर्ड से इस बारे में जवाब मांगा तो कोई उत्तर नहीं था। समस्या को सब ने स्वीकार किया और इसका हल क्या हो सकता है यह उत्पादकों से ही पूछ लिया। अन्त में इस समस्या को हल खोजने के लिये एक और बैठक करने का फैसला लिया गया। जानकारों के मुताबिक जिन दरों पर उत्पादकों के साथ पीपीए साईन किये हुए हैं आज उसी रेट पर बोर्ड की बिजली बिक नहीं रही है। बोर्ड की वार्षिक रिपोर्टों के मुताबिक हर वर्ष बहुत सारी बिजली बिकने से रह रही है। कैग रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड उत्पादकों से 4.50 रूपये यूनिट खरीद कर आगे 2.40 रूपये यूनिट बेच रहा है। यही नहीं बोर्ड की अपनी परियोजनाओं में हर वर्ष हजारों घन्टों का शट डाऊन दिखाकर बिजली का उत्पादन बन्द रखा जा रहा है। यदि बोर्ड की अपनी परियोजनाओं में पूरा उत्पादन होता रहे तब तो बिजली बेचने की समस्या और भी विकट हो जायेगी। लेकिन बोर्ड के अन्दर की इस स्थिति की ऊर्जा मन्त्री और मुख्यमंत्री को कोई जानकारी दी ही नही जाती है। अपने तौर पर यह लोग बोर्ड की वार्षिक रिपोर्टों और कैग रिपोर्टों का अध्ययन ही नही कर पाते हैं जबकि यह रिपोर्ट वाकायदा विधानसभा सदन में रखी जाती है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान न किया गया तो इसका प्रभाव सारे प्रस्तावित निवेश पर पडे़गा यह तय है।
टाऊन हाॅल की दीवारों पर उग आया घास
चर्चो की रिपेयर के 24 करोड़ कहां गये
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार ने 2014 में एशियन विकास बैंक से 256.99 करोड़ का कर्ज लेकर प्रदेश में हैरिटेज पर्यटन के लिये आधारभूत ढांचा खड़ा करने का फैसला लिया था। इस पैसे से बिलासपुर के मार्कण्डेय और श्री नयनादेवी, ऊना में चिन्तपुरनी तथा हरोली कांगड़ा में पौंग डैम, रनसेर कारू टापू, नगरोटा सूरियां, घमेटा ब्रजेश्वरी, चामुण्डा, ज्वाला जी, धर्मशाला- मकलोड़गंज, मसरूर और नगरोटा बंगवां, कुल्लु में मनाली के आर्ट एण्ड क्राफ्ट केन्द्र बड़ाग्रां, चम्बा में हैरिटेज सर्किट मण्डी के ऐतिहासिक भवन और शिमला में नालदेहरा का ईको पार्क, रामपुर बुशैहर तथा आसपास के मन्दिर तथा शिमला शहर में विभिन्न कार्य होने थे। यह कार्य अप्रैल 2014 में शुरू हुए थे और 2017 में पूरे होने थे। यह काम हैरिटेज के नाम पर होने थे इसलिये इनकी जिम्मेदारी पर्यटन विभाग को सौंपी गयी थी और इसके लिये वाकायदा अलग से प्रौजेक्ट डायरैक्टर लगाया गया था। इसके लिये आठ कन्सलटैन्ट भी लगाये गये थे जिन्हें एक वर्ष में ही 4,29,21,353 रूपये फीस दी गयी है।
शिमला में जो काम इसके तहत होने थे उनमें से एक काम शहर के दोनों चर्चों की रिपेयर का था और इसके लिये 17.50 करोड़ खर्च किये जाने थे। रिज स्थित चर्च की रिपेयर के लिये 10-9-2014 को अनुबन्ध भी साईन हो गया था और इसके मुताबिक यह काम दो वर्षों में पूरा होना था। इसके लिये चर्च कमेटी के साथ भी वाकायदा अनुबन्ध हुआ था। यह काम सितम्बर 2016 में पूरा होना था। लेकिन आजतक दोनों चर्चों की रिपेयर के नाम पर एक पैसे का भी काम नहीं हुआ है। ऐसे में यह सवाल उठने स्वभाविक हैं कि इस रिपेयर के लिये रखा गया 17.50 करोड़ रूपया कहां गया? क्या इस पैसे को किसी और काम पर लगा दिया गया है? क्या इस पैसे को किसी दूसरे काम पर खर्च करने के लिये एशियन विकास बैंक से अनुमति ली गयी है? विभाग में इन सवालों पर कोई भी जवाब देने के लिये तैयार नहीं है।
इसी के साथ दूसरा काम था टाऊन हाल की रिपेयर का। और इसके लिये 8.02 करोड़ रखे गये थे। इसके लिये एक अभी राम इन्फ्रा प्रा.लि के साथ अनुबन्ध किया गया था। इस कंपनी ने टाऊनहाल की रिपेयर के लिये वर्मा ट्रेडिंग से 13,74,929 रूपये की लकड़ी खरीदी थी। टाऊन हाल में ज्यादा काम लकडी का ही था। इसलिये यह सवाल उठा था कि जब लकड़ी ही चैदह लाख से कम की लगी है तो रिपेयर पर आठ करोड़ कैसे। वैसे सूत्रों के मुताबिक शायद यह रकम दस करोड़ हो गयी है। शिमला में हुए कार्यों का मूल प्रारूप नगर निगम ने तैयार किया था और इसे निगम के हाऊस से ही अनुमोदित करवाया गया था। इसलिये जब कार्य नगर निगम की बजाये पर्यटन विभाग को सौंपे गये थे तब इनकी गुणवत्ता को लेकर निगम के तत्कालीन मेयर संजय चैहान ने एशियन विकास बैंक के मिशन डायरैक्टर से भी शिकायत की थी।
आज करीब दस करोड़ के कर्ज से रिपेयर हुआ टाऊन हाॅल किसकी संपत्ति है इसमें सरकार का कौन सा कार्यालय काम करेगा यह फैसला अभी तक नहीं हो पाया है। क्योंकि मामला प्रदेश उच्च न्यायालय तक जा पहुंचा है और अभी तक सरकार और उच्च न्यायालय इस पर कोई फैसला नही ले पाये हैं। पिछले दो वर्षों से यह भवन बन्द चला आ रहा है। बन्द रहने के कारण इसकी दीवारों पर घास तक उग आया है रिपेयर की गुणवत्ता पर उठे सवालों की जांच प्रधान सचिव सतर्कता कर रहे हैं। लेकिन आम आदमी यह सोचने को विवश है कि जब एक भवन के उपयोग का फैसला भी उच्च न्यायालय करेगा तो सरकार स्वयं क्या काम करेगी। जबकि प्रदेश उच्च न्यायालय धरोहर गांव गरली- प्रागपुर को लेकर आये एक ऐसे ही मामले में स्पष्ट कह चुुका है कि किसी भवन का क्या उपयोग किया जाना चाहिये यह फैसला लेना अदालत का नहीं सरकार का काम है।
शिमला/शैल। पिछले दिनों सोलन के कुमारहट्टी में एक तीन मंजिला इमारत गिर गयी और इसके मलबे के नीचे 42 लोग दब गये। इनमें से केवल 28 लोगों को ही बचाया जा सका और 14 लोगों की इसमें मौत हो गयी। मरने वाले में होटल मालिक बलवीर सिंह की पत्नी अर्चना और सेना के तेरह जवान शामिल है। हादसे का जायजा लेने के लिये मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर स्वयं मौके पर गये और इसकी जांच एसडीएम सोलन को सौंपी गयी है। इस हादसे पर थाना धर्मपुर में होटल मालिक और इस भवन को बनाने वाले ठेकेदार के खिलाफ आई पी सी की धारा 336 (दूसरों के जीवन को खतरे में डालने) और 304 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। एसडीएम सोलन घटना के कारणो की जांच करेंगे। इस जांच में यह आयेगा कि क्या इस भवन का नक्शा पास था या नही? क्या यहां पर इतना बड़ा निर्माण किया जा सकता था? यह तीन मंजिला भवन 2009 में बना था और अभी इसमें चौथी मंजिल का
निर्माण किया गया था। जांच में सामने आयेगा कि चौथी मंजिल का निर्माण संवद्ध प्रशासनिक तन्त्र से स्वीकृति लेकर किया गया था या नहीं? चर्चाओं के मुताबिक भवन की नींव बहुत कमजोर थी और शायद नक्शा भी पास नही था।
एसडीएम की जांच में क्या सामने आता है यह तो रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल पायेगा। लेकिन थाना धर्मपुर में जो मामला दूसरों के जीवन को खतरे में डालने को लेकर दर्ज किया गया है उसमें अभी तक होटल मालिक और ठेकेदार को ही नामजद किया गया है। यहां पर यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या इस हादसे के लिये केवल ठेकेदार और मलिक पर ही जिम्मेदारी डालकर ही पुलिस का काम पूरा हो जायेगा। क्या इसके लिये उस तन्त्र को जिम्मेदार नही ठहराया जाना चाहिये जिसने इसका नक्शा पास करना था। यदि नक्शा नही था तब यह निर्माण सीधे अवैध हो जाता है और तब प्रशासन की भूमिका और भी गंभीर हो जाती है। इस हादसे में चौदह लोगों की जान गयी है और इसी कारण से अवैध निर्माणों पर एक बार फिर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि जब से एनजीटी ने नये निर्माणों पर प्रतिबन्ध लगाया है और अनुमति के बाद भी केवल अढाई मंजिल तक ही निर्माण कर सकने की सुविधा दी है तथा इसी के साथ यह भी शर्त लगायी है कि किसी भी सूरत में 45 डिग्री से अधिक की कटिंग नही होनी चाहिये। लेकिन क्या इस फैसले पर ईमानदारी से अमल हो पा रहा है शायद नही। अभी शिमला के रिपन अस्पताल के पास चल रहे एक भवन निर्माण के कारण हुए लैण्ड स्लाईड से आस पास के भवनों को खतरा हो गया है। इस निर्माण में यह आरोप है कि यहां पर शायद 90 डिग्री तक पहाड़ की कटिंग कर दी गयी है। इतनी कटिंग की अनुमति नही है और अब तो अदालत का आदेश भी साथ है यही नही शिमला के कई हिस्सों में निर्माण कार्य चल रहे हैं और संवद्ध प्रशासन उस ओर से आंखे मूंदे बैठा है।
प्रशासन की स्थिति यह है कि अदालत के आदेशों तक की परवाह नहीं कर रहा है। न्यू शिमला में मुख्य सड़क पर बना मन्दिर एक दम सरकारी भूमि पर स्थित है। इसके लिये वाकायदा नगर निगम ने तहसीलदार को लेकर निशान देही करवाई। निशानदेही के दस माह बाद निगम के ही ज्वाईंट कमीशनर की अदालत में इस पर मुकद्दमा दर्ज हुआ। इस अदालत ने करीब आठ साल बाद मन्दिर को गिराने /हटाने का फैसला दे दिया। फैसले में निगम के ही तीन कर्मचारियों/अधिकारियों के फैसले पर अमल सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी लगा दी। लेकिन इस सबके बावजूद अभी दो साल तक फैसले पर अमल नही हो सका है। जो अधिकारी न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए फैसला दे रहा है क्या प्रशासनिक जिम्मेदारी के तहत उस फैसले पर अमल करना उसकी डयूटी नही हो जाती है। लेकिन ऐसा हुआ नही है। ऐसे सरकार में सैंकड़ों मामले सामने आ जायेंगे जहां प्रशासन की नीयत और नीति पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। एनजीटी के फैसले के खिलाफ सरकार सर्वोच्च न्यायालय में अपील में गयी हुई है। वहां पर अभी तक मामला लंबित है। इस मुद्दे पर शिमला के नागरिक दो बार बैठकें करके अपनी चिन्ताएं व्यक्त कर चुके हैं। नागरिक चाहते हैं कि निर्माण पर लगा प्रतिबन्ध तुरन्त हटा लिया जाये। जबकि सरकार इस बारे में कोई भी फैसला लेने से घबरा रही है क्योंकि आज तक अवैधताओं के हर मामले में सरकार की भूमिका ही सर्वोपरि रही है। सरकार के कारण हर बार अवैधताओं को संरक्षण मिला है और इसमें कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों का आचरण एक बराबर प्रश्नित रहा है। प्रदेश में टीपीसी एक्ट 1977 में लागू हुआ था इस एक्ट के तहत पूरे प्रदेश के लिये एक विकास प्लान तैयार किया जाना था। 1979 में एक अन्तरिम प्लान जारी हुआ था जो आज स्थायी नही हो पाया है। क्योंकि इस अन्तरिम प्लान मे ही अबतक एक दर्जन से अधिक संशोधन हो चुके हैं। यही नहीं इसके अतिरिक्त नौ बार रिटैन्शन पाॅलिसियां लायी गयी है। हर बार अवैधताओं को नियमित किया गया लेकिन इसके बावजूद अवैधताएं आज तक जारी हैं।
अब सरकार प्रदेश में निवेश लाने के लिये देश से लेकर विदेश तक प्रयास कर रही है। कई निवेशक प्रदेश में निवेश करने की ईच्छा भी जता चुके हैं लेकिन यह सारा निवेश तो ज़मीन पर ही होना है। इसके लिये हर निवेशक को जमीन तो चाहिये ही है फिर उस जमीन पर कोई न कोई निर्माण किया जाना है और इस निर्माण के लिये एनजीटी की अढ़ाई मंजिल की सीमा आड़े आयेगी। सरकार टीसीपी के नियमों में संशोधन कर सकती है और एक बार फिर करने जा रही है। प्रदेश के भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के नियमों में फिर संशोधन कर सकती है। लेकिन क्या इन संशोधनों से यह सच्चाई बदल जायेगी कि प्रदेश भूकम्प जोन पांच और चार के दायरे में आता है। सरकार के अपने आपदा प्रबन्धन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक यदि शिमला में हल्के स्तर का भी भूकंप आता है तो उसमें कम से कम बीस हजार लोग मारे जायेंगे। प्रदेश उच्च न्यायलय भी इस पर चिन्ता व्यक्त कर चुका है। नेपाल में आये भूकंप के बाद उच्च न्यायालय ने अवैध निर्माण का स्वतः संज्ञान लेते हुए बड़े सख्त लहजे में यह कहा है Further the respondents do not seem to have learnt any lesson from the recent earthquakes which have devastated the Himalayan region, particularly, Nepal. As per the latest studies, majority of Himachal Pradesh falls in seismic Zone-V and the remaining in region-IV and yet this fact has failed to shake the authorities in Shimla out of their slumber. The quake-prone erstwhile summer capital of Raj cannot avert a Himalayan tragedy of the kind that has killed thousands and caused massive destruction in Nepal.
It has been reported that Shimla ‘s North slope of Ridge and open space just above the Mall that extends to the Grand Hotel in the West and Lower Bazar in the East is slowly sinking. We can only fasten the blame on the haphazard and illegal construction being carried out and all out efforts being made for converting the once scenic seven Himalayas of this Town into a concrete Jungle. उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि 1983 से लेकर 2015 तक उसके पास शिमला में हुए अवैध निर्माणों को लेकर तीन जनहित याचिकायें आ चुकी हैं जिन पर अदालत की ओर से नियमों की अनुपालना को लेकर कड़े निर्देश जारी किये गये हैं। लेकिन इसे वाबजूद शिमला में 186 छः से लेकर दस मंजिलो तक के भवनों का निर्माण हो चुका है जिनके नक्शे पास हैं या नही इसकी जानकारी ही नगर निगम को नही है।
लेकिन इस तरह आयी उच्च न्यायालय की टिप्पणी के बावजूद सरकार ने 2016 के मानसून सत्र में फिर टीसीपी एक्ट में संशोधन करके इन अवैधताओं को और बढ़ावा देने की बात कर दी। उस समय भी अदालत ने इन अवैधताओं पर कड़ा संज्ञान लेते हुए यह कहा था कि Thousands of unauthorized constructions have not been raised overnight. The Government machinery was mute spectator by letting the people to raise unauthorized constructions and also encroach upon the government land. Permitting the unauthorized construction under the very nose of the authorities and later on regularizing them amounts to failure of constitutional mechanism/machinery. The State functionary/machinery has adopted ostrich like attitude. The honest persons are at the receiving end and the persons who have raised unauthorized construction are being encouraged to break the law. This attitude also violates the human rights of the honest citizens, who have raised their construction in accordance with law. There are thousands of buildings being regularized, which are not even structurally safe.
The regularization of unauthorized constructions/encroachments on public land will render a number of enactments, like Indian Forest Act 1927, Himachal Pradesh Land Revenue Act, 1953 and Town and Country Planning Act, 1977 nugatory and otiose. The letter and spirit of these enactments cannot be obliterated all together by showing undue indulgence and favouritism to dishonest persons. The over- indulgence by the State to dishonest persons may ultimately lead to anarchy and would also destroy the democratic polity. उच्च न्यायालय द्वारा संज्ञान ली गयी यह हकीकत आज भी अपनी जगह यथास्थिति बनी हुई है। सोलन हादसे के साथ ही प्रदेश के कई भागों में मकान गिरने के समाचार सामने आ चुके हैं। भू सख्लन से प्रदेश के अधिकांश मार्गो पर लम्बे समय तक यातायात बाधित रहा है। आज नैना देवी मन्दिर तक को खतरा पैदा हो गया है। प्रदेश भूकम्प जोन में है इस सच्चाई को नही बदला जा सकता है इस खतरे के नुकसान के दायरे को इस तरह के निर्माण और बढ़ा देते हैं। ऐसे में प्रदेश के विकास की रूप रेखा कैसी होनी चाहिये इसके लिये प्रदेश की जनता के साथ एक खुली बहस की आवश्यकता है क्योंकि ऐसे खतरों से नुकसान भी उसी का होता है। ऐसे मामलों में सरकारी आकलनों की विश्वसनीयता आसानी से स्वीकार्य नही हो सकती है। नगर निगम शिमला के रिकार्ड के मुताबिक वर्ष 2018-19 में उसके पास भवन निर्माणों संबंधित 31-1-2019 केवल 381 मामलें आये थे जिनमें से केवल 106 को ही स्वीकृति प्रदान की गयी है। जबकि इसी दौरान प्रदेश उच्च न्यायालय में पहुंचे एक मामले में निगम ने अपने शपथ पत्र में स्वीकारा है कि इसी अवधि में अवैध निर्माणों के हजारों मामले उसके सामने आये जिन पर कारवाई की जा रही है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जब तक सरकार वोट और दलगत की राजनीति से ऊपर उठकर अवैधताओं के खिलाफ ईमानदारी से कदम उठाने का फैसला नही लेती है तब तक विकास के नाम पर इन्हें रोकना संभव नही होगा।