शिमला/शैल। क्या अवैध पार्किंग के लिये गाड़ीयों के चालान काटने से शहरों की ट्रैफिक समस्या हल हो जायेगी? यह सवाल राजधानी के उपनगर खलीनी में पथ परिवहन निगम की स्कूल बस के दुर्घटनाग्रस्त होने तथा उसमें दो छात्राओं और ड्राईवर समेत तीन लोंगो की मौत पर उभरे जनाक्रोश तथा उसकी भेंट चढ़ी दर्जनों गाड़ियों की तोड़फोड़ के बाद उभरा है। गाड़ीयों की तोड़फोड़ इसलिये हुई क्योंकि यह गाड़ियां उसी सड़क पर पार्क थी जिस पर यह बस दुर्घटनाग्रस्त हुई है। इस दुर्घटना के बाद पुलिस ने हजारों गाड़ीयों के चालान काट डाले हैं। बसों की ओवर लोडिंग के चालान काटे जा रहे हैं क्योंकि बंजार में हुए हादसे का एक बड़ा कारण ओवर लोडिंग था और इसमें 46 लोगों की मौत हो गयी थी। इसी तरह 2018 में नूरपुर में एक स्कूल बस दुर्घटनाग्रस्त हुई थी जिसमें तीस बच्चों की मौत हो गयी थी। यह तीनो ऐक्सीडैंट गंभीर हादसे हैं और तीनो के कारण भी अलग-अलग रहे हैं। नूरपुर का मामला तो उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है और अब शिमला के मामले को भी इसी के साथ संलग्न कर दिया गया है। बंजार मामले पर अभी कोई फाईनल जांच रिपोर्ट नही आयी है और न ही यह मामला अभी तक उच्च न्यायालय में पहुंचा है। उच्च न्यायालय में पहुंचे मामलों पर अदालत का क्या फैसला और निर्देश आते हैं तथा उस पर अमल करने में कितना समय लग जायेगा। इसका पता तो आने वाले दिनों में ही लगेगा।
लेकिन इन्ही मामलो के साथ एक और मामला राजधानी शिमला के स्कूलों का 2017 से प्रदेश उच्च न्यायालय में पहुंचा हुआ है। उच्च न्यायालय में एक डा. नितिन व्यास ने जनहित याचिका के माध्यम से राजधानी के स्कूलों के बच्चों को लाने ले जाने के लिये प्रयोग हो रहे नीजि वाहनों और स्कूल बसों के कारण हो रही ट्रैफिक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 14-12-18 को आयुक्त नगर निगम शिमला को पार्टी बनाते हुए शहर की इस समस्या पर रिपोर्ट तलब की थी। आयुक्त नगर निगम को रिपोर्ट में बताना था कि पार्किंग कहां-कहां कैसे बनाई जा सकती है जिससे शहर में ट्रैफिक सुचारू हो सके। इस रिपोर्ट में स्कूलों पर विशेष फोकस किया जाना था। उच्च न्यायालय के निर्देशों पर आयुक्त की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ कमेटी गठित हुई। इस कमेटी ने 18-12-2018 को शहर के चार स्कूलों का निरीक्षण किया। यह स्कूल थे सेंट एडवर्ड, जीसस एण्ड मेरी नवबहार, लोरेटो काॅन्वैन्ट ताराहाॅल और आकलैण्ड हाऊस स्कूल। इन स्कूलों को लेकर दी गयी रिपोर्ट के कुछ मुख्य सुझाव यह है।
INTERIM REPORT TO DECONGEST THE PARKING PROBLEM NEAR SCHOOLS LOCATED ON THE CIRCULAR ROAD
In Pursuance of the directions passed by the Hon’ble High court HP in CWP No. 1516/2017 titled as Nitin Vyas Versus state of HP & others, a Committee of the following Engineers has been constituted under chairmanship of Mr. Dhramender Gill, MD-Cum-CEO, SJPNL:-
1. Mr Rajiv Sharma, Sr. Architect Planner, M.C. Shimla (Member Secretary)
2. Mr. Rajesh Kashyap, Executive Engineer, SJPNL (Member)
3. Mr. Sudhir Gupta Executive Engineer (R&B) M.C. shimla (Member)
4. Mr. Narender Verma, Project Director M.C. Shimla (Member)
5. Mr. Rajesh Thakur Asstt. Engineer (M.C. Shimla (Member )
St. Edward's School
1, The capacity of Present existing parking of the School can be increased by demolishing the existing old single storey building housing the reception and using the space thus created for parking.
Jesus and Mary School at Navbahar
2. The School has three gates on the aforesaid link road but since this road is narrow and also because of the idle parking on both sides of the road, the feasibility of plying School buses is not there. Hence widening of this road at some places and strict prohibition of idle parking is required so that the school buses can approach the school and students board and deboard in the campus itself. For this two of the gates of the school and exit gates. Similarly private vehicles can also approach the school and board and deboard in the campus itself . The widening will cost about Rs. 2.00 crore approximately. Since the custodian of this road is HPPWD, the HPWD department may be directed take up the work immediately.
3. The School should have its own mini electric/ travelers buses to avoid dependency on the private taxi operators. This will reduce the number of vehicles ferrying the students.
Loreto Convent Tarahall
1. The circular road adjoining the school boundary needs to be widened hence the boundary wall needs to be shifted inside by about 2 mtr for widening of the road.
Auckland House Girls School Longwod and Chapslee School Longwood
1. A bus lay-bye needs to be created to avoid parking of the buses on the main road. This can be done by shifting the gates of both Auckland House school and Chapslee School so that buses can park in the space between both gates and not on main road. For this the reatining wall of the Chapslee School will need to be shifted.
लेकिन इस रिपोर्ट के साथ ही एक सवाल यह खड़ा हो गया है कि इन्ही सड़को के किनारे स्थित अन्य स्कूलों को लेकर कुछ नही कहा गया है। क्योंकि एडवर्ड के साथ ही इसी रोड़ पर पोर्टमोर स्कूल के बच्चे भी उतरते हैं। फिर बस स्टैण्ड के पास लालपानी और दयानंद स्कूल के बच्चों को भी परेशानी झेलनी पड़ती है। लक्कड़ बाजार के गल्र्ज स्कूल और आगे आकलैण्ड के साथ ही आर के एम वी काॅलिज के बच्चों की भी समस्या है। लेकिन स्कूलों की समस्या सुलझाने से ही पूरे शहर की समस्या नही सुलझ जाती है। क्योंकि शहर की बड़ी समस्या तो प्राईवेट गाड़ियों की पार्किंग की है। इसके लिये हर सड़क के किनारे पार्किंग स्थलों को चिन्हित करने और बनाने के साथ ही सड़क के साथ लगते हर सरकारी और प्राईवेट भवन को उसमें पार्किंग स्थल बनाने की बाध्यता जब तक नही लगायी जायेगी तब तक इस समस्या का हल निकलना संभव नही होगा। यह व्यवस्था पूरे प्रदेश में लागू करनी पड़ेगी क्योंकि हर शहर में यह समस्या खड़ी होती जा रही है।
शिमला/शैल। जयराम सरकार ने अन्ततः प्रशासनिक ट्रिब्यूनल बन्द करने का फैसला ले लिया है। लेकिन यह फैसला लेने में सरकार को डेढ़ वर्ष का समय लग गया है। प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को भाजपा सत्ता में आने पर बन्द कर देगी ऐसा कोई वायदा स्पष्ट रूप से विधानसभा चुनावों के लिये जारी किये गये घोषणा पत्र में भी नही किया गया था। फिर इस डेढ़ वर्ष के समय में ट्रिब्यूनल के खाली चले आ रहे दोनों प्रशासनिक सदस्यों के पदों को भरने के लिये प्रक्रिया भी जारी रही। इसके लिये तीन बार आवेदन आमन्त्रित किये गये। अन्त में चयन पैनल ने इसके लिये नामों का चयन करके नामों की सूची प्रदेश सरकार को अगली कारवाई के लिये भी भेज दी। नामों की संस्तुति की यह फाईल कई दिनों तक मुख्यमन्त्री के कार्यालय में रही और भारत सरकार को नही भेजी गयी। यह प्रक्रिया इतने लम्बे समय तक चलाये रखने से यही संदेश जाता रहा कि सरकार ट्रिब्यूनल को बन्द करने की कोई मंशा नही रखती है। इसमें पड़े खाली पदों को प्रशासनिक अधिकारियों में से ही भरा जाना था और ऐसे ही अधिकारियों ने इसके लिये आवेदन कर रखा था। आवेदकों में कुछ सेवानिवृत और कुछ सेवारत अधिकारी थे। जिन दो अधिकारियों का अन्त में चयन हुआ था उनमें एक मुख्यमंत्री के वर्तमान प्रधानसचिव अतिरिक्त मुख्यसचिव डाॅ. बाल्दी और दूसरे पूर्व प्रधान सचिव अतिरिक्त मुख्यसचिव मनीशा नन्दा थी। यह दोनों अधिकारी मुख्यमन्त्री के विश्वस्तों में गिने जाते हैं। इन अधिकारियों को भी यह पता नही चल सका कि सरकार ट्रिब्यूनल बन्द करने जा रही है। क्योंकि यदि यह पता होता तो शायद यह लोग आवदेक ही न बनते । इससे स्पष्ट हो जाता है कि ट्रिब्यूनल बन्द करने का कारण प्रशासनिक नही बल्कि राजनीतिक रहा है।
जब जयराम सरकार ने सत्ता संभाली थी तभी प्रशासनिक सदस्यों के पद खाली थे। इन खाली पदों के कारण ट्रिब्यूनल का कार्य प्रभावित होता रहा क्योंकि नियमानुसार बेंचों का गठन संभव नही हो सका। सेवारत दोनांे सदस्य न्यायिक क्षेत्र से हैं इसलिये यह दोनों जो सिंगल बैठ कर काम निपटा सकते थे इन्होने उतना ही काम किया। ऐसे में यह कहना ज्यादा तर्कसंगत नही बनता कि ट्रिब्यूनल सरकार के खिलाफ ही फैसले दे रहा था और इससे मन्त्री और दूसरे नेता खुश नही थे। बल्कि इस तरह का पक्ष लेकर अपरोक्ष में सरकार पर ही यह आक्षेप आ जाता है कि सरकार फेयर न्याय प्रक्रिया पर विश्वास न रखकर राजनीति से प्रभावित होकर चलने वाली न्याय प्रणाली चाहती थी। क्योंकि ट्रिब्यूनल बन्द करने के फैसले का सरकार का जो तर्क सामने आया है उससे यह संदेश जनता में गया है और ऐसा संदेश जाना कालान्तर में सरकार की छवि के लिये घातक ही होगा।
ट्रिब्यूनल की कार्य प्रणाली पिछले डेढ़ वर्ष से प्रभावित होती चली आ रही है क्योंकि बैंचों का गठन न होने से फैसले हो नही पाये। अब ट्रिब्यूनल से फाईलें फिर उच्च न्यायालय को जायेगी। उच्च न्यायालय में पहले ही दशकों से मामले लंबित पड़े हैं। अब ट्रिब्यूनल का काम भी उच्च न्यायालय में आने से केसों के फैसलों के लिये और समय लगेगा। अब लोगों को अपने केसों के फैसलों के लिये और लम्बा इन्तजार करना पड़ेगा। राजस्व के मामलों में भी सरकार ने एफसी अपील का काम एक समय छः अधिकारियों में बांट दिया था। सबको दो-दो जिलों का काम सौंपा गया था। लेकिन व्यवहारिक रूप से जितने दिन यह व्यवस्था लागू रही उतना समय शायद ही लोगों को फैसले मिल पाये हांे। व्यवहारिक रूप से यह फैसला गलत था और अन्त में सरकार को यह फैसला वापिस लेना पड़ा है। इसी तरह अब ट्रिब्यूनल बन्द करने के फैसले से आगे चलकर आम आदमी को व्यवहारिक रूप से कोई लाभ नही होगा। ट्रिब्यूनल की स्थापना को बहुत समय लगा है और आज जो इसकी कार्यक्षमता प्रभावित हुई है उसके लिये केवल सरकार जिम्मेदार रही है क्योंकि खाली पदों को समय पर भरा नही गया। यह स्वभाविक है कि जब पद ही नही भरे जायेंगे तो विधिवत बैंचों का गठन नही हो पायेगा और बैंच गठित न हो पाने का अर्थ है कि फैसले नही हो पाये। ऐसे में ट्रिब्यूनल को बन्द करने से आम आदमी को फैसलों के लिये लम्बे इन्तजार में डाल दिया गया है और देरी से मिला न्याय तो अन्याय के ही बराबर होता है।
शिमला/शैल। राजधानी शिमला के माल रोड़ से सटे मुख्य बाजार लोअर बाज़ार में जूतों की मुरम्मत एवम् सेल की छोटी सी दुकान में छोटा सा कारोबार करके अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने वाला व्यक्ति सामाजिक उत्पीड़न का शिकार बन जाये तथा उसे अपने जानमाल की सुरक्षा की गुहार एक पत्र लिखकर प्रदेश के मुख्य न्यायधीश से करने की नौबत आ जाये तो यह पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर जाता है। मुख्य न्यायधीश के नाम लिखे पत्र में भाटिया ने जिक्र किया है कि उसके एक पड़ोसी विक्रम सिंह ने 20-07-2018 को उस पर और उसकी पत्नी पर जानलेवा हमला किया तथा सार्वजनिक रूप से जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करके उसे प्रताड़ित किया। इस घटना की पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई गयी पुलिस ने मामला दर्ज करके छानबीन के बाद अदालत में चालान दायर कर दिया और अब यह मामला सैशन जज की अदालत में लंबित चल रहा है।
इस मामले के लंबित होने के बावजूद इसी विक्रम सिंह ने अब फिर 17-5-2019 को रात 7ः30 बजे फिर से हमला किया और जाति सूचक शब्द चमार चमार सार्वजनिक रूप से बाजार में पुकार पुकार कर सामाजिक प्रताड़ना का शिकार बनाया। इस घटना की भी पुलिस में शिकायत की गयी पुलिस ने फिर से मामला दर्ज किया लेकिन आरोपी अग्रिम जमानत लेने में सफल हो गया। भाटिया ने वाकायदा इस घटना की विडियो रिकार्डिंग तक कर रखी है और मुख्य न्यायधीश को भेजे पत्र में इसकी जानाकरी दी है। अग्रिम जमानत मिल जाने से विक्रम के हौंसले और बुलन्द हो गये हैं। पत्र के मुताबिक वह बराबर जान से मारने की धमकीयां दे रहा है और इसके लिये सज़ा तक भुगतने को तैयार है।
मुख्य न्यायधीश को लिखे पत्र से भाटिया का डर स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है क्योंकि आरोपी अग्रिम जमानत पाने में सफल हो गया है। जबकि कानून की जानकारी रखने वालों के मुताबिक ऐसे अपराधों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नही है। इस मामले से यह सवाल उठता है कि क्या ऐसी घटनाओं से एक सुनियोजित तरीके से जातिय सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास किया जा रहा है। क्योंकि भाटिया के इस मामले से पहले भी दलित उत्पीड़न के कई मामले सामने आ चुके हैं। जिन्दान मामला बड़ी चर्चा का विषय रह चुका है। शिमला के ही ढली उपनगर में भी एक परिवार को ऐसे ही उत्पीड़न का शिकार बनाये जाने का मामला सुर्खियों में रह चुका है। इन सारे मामलों में प्रशासन की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह स्वभाविक है कि जब समाज के एक वर्ग को इस तरह से प्रताड़ना और उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता रहेगा तो यह वर्ग अन्त में अपनी आत्म रक्षा के लिये क्या करेगा? क्या हम उसे प्रतिहिंसा की ओर धकलेने का एक सुनियोजित प्रयास नही कर रहे हैं? आज उच्च न्यायालय से लेकर नीचे प्रशासन तक सबको ऐसे मामलों पर कारगर अंकुश लगाने के उपाय करने होंगे। अन्यथा स्थिति गंभीर होती जायेगी।



शिमला/शैल। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जर्मनी, नीदरलैण्ड के बाद दुबई गये हैं। मुख्यमन्त्री इन यात्राओं के माध्यम से विदेशों से प्रदेश में पूंजी निवेश लाने का प्रयास कर रहे हैं। इन विदेश यात्राओं के साथ ही देश के विभिन्न भागों में भी निवेशकों को आमन्त्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमन्त्री के यह प्रयास कितने सफल होते हैं प्रदेश में कितना निवेश आता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। निवेश लाने के ऐसे ही प्रयास पूर्व मुख्यमन्त्रीयों के कार्यकाल में भी हुए हैं। लेकिन इन प्रयासों से प्रदेश की आर्थिक स्थिति में सुधार आने की बजाये कर्ज का चक्रव्यूह ही ज्यादा बढ़ता गया है। आज प्रदेश 52000 करोड़ के बड़े कर्जभार के नीचे है। इस कर्ज का निवेश कब कहां और कैसे किया गया इससे प्रदेश की आय में कितनी बढ़ौत्तरी सुनिश्चित हुई है इसका कभी भी किसी भी मुख्यमन्त्री ने विधानसभा के अन्दर या बाहर कभी कोई खुलासा नही रखा है। जयराम ठाकुर ने भी अपने पहले बजट भाषण में यह आंकड़ा तो रखा कि वीरभद्र सिंह ने पांच वर्षों में 18,787 करोड़ का कर्ज लिया लेकिन यह नही बताया कि यह कर्ज कहां खर्च हुआ। इस इतने भारी भरकम कर्ज से राजस्व के लिये स्थायी अदारे क्या खड़े किये गये यह कोई जानकारी प्रदेश की जनता के पास नही है। शायद प्रदेश की अफसरशाही नही चाहती है कि यह सच्च कभी सामने आये। मुख्यमन्त्री जयराम ने अपने पहले बजट भाषण में प्रदेश की वित्तिय स्थिति को लेकर जो गंभीर टिप्पणी की हुई है यदि उसी की गहराई से जांच की होती तो शायद स्थिति में कुछ बदलाव आ जाता। प्रदेश में उद्योगों की सहायता के लिये जो निगम/बोर्ड स्थापित किये गये हैं निवेश लाने के प्रयास करने से पहले उन अदारों की हकीकत का आकलन करके कुछ सख्त कदम उठाये जाने चाहिये थे लेकिन ऐसा नही हुआ है।
किसी भी उद्योग की सफलता के लिये यह आवश्यक है कि उसके लिये वहीं पर कच्चा माल उपलब्ध है तैयार माल की खपत के लिये कितना उपभोक्ता उपलब्ध है और उसकी क्रय शक्ति कितनी है। इन बुनियादी संसाधनों के बाद श्रम, पूंजी और ऊर्जा की उपलब्धता उद्योग के लिये दूसरा बड़ा फैक्टर होता है। लेकिन शायद प्रदेश में इन महत्वपूर्ण पक्षों का आज तक कोई विस्तृत अध्ययन ही नही किया गया हैं केवल भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये भू-राजस्व अधिनियम की धारा 118 के नियमों में संशोधन करने तथा उद्योगों को विभिन्न करो में रियायतें/छूट देने के अतिरिक्त और कुछ सोचा ही नही गया है। इसलिये प्रदेश के कर और गैर कर राजस्व में कोई बड़ी बढ़ौत्तरी नही हो पायी है। हिमाचल में 21000 मैगावाट की जल वि़द्युत उत्पादन की क्षमता चिन्हित करने के बाद प्रदेश को विद्युत राज्य के रूप में प्रचारित और प्रसारित करके उद्योगों को यहां आने के लिये आकर्षित एवं आमन्त्रित किया गया। विद्युत के क्षेत्र में ही 500 से अधिक छोटी बड़ी परियोजनाएं चिन्हित की गयी है। अकेले ऊर्जा क्षेत्र में कैग के मुताबिक सारे सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश का 85% हिस्सा इसमें निवेशित किया गया है। बहुत सारी परियोजनाएं प्रदेश में उत्पादन दे रही है। लेकिन बजट दस्तावेजों के मुताबिक विद्युत उत्पादन से मिलने वाला राजस्व लगातार कम होता जा रहा है। यह राजस्व कम होने का अर्थ है कि ऊर्चा क्षेत्र को लेकर सरकार की नीति और आकलन दोनों में भारी कमी है।
नीति और आकलन की इस कमी के सबसे बड़े उदाहरण प्रदेश उच्च न्यायालय की कुछ टिप्पणीयां है। उच्च न्यायालय ने जे पी ऐसोसियेटस द्वारा बघेरी में थर्मल प्लांट स्थापित करने को लेकर दो जनहित याचिकायें CWP of 2009 तथा CWP 586 of 2010 आयी थी। जेपी के खिलाफ उच्च न्यायालय की ग्रीन पीठ ने 100 करोड़ का जुर्माना लगाया था। इसमें संबद्ध अधिकारियों की भूमिका को जांचने और उनके खिलाफ कारवाई करने के लिये एडीजीपी पुलिस के सी सडयाल की अध्यक्षता में एक एसआईटी का गठन किया था। इस एसआईटी की रिपोर्ट अदालत में आ चुकी है लेकिन यह रिपोर्ट क्या है और इस पर क्या कारवाई हुई यह कभी सामने नही आया है। जबकि उसी दौरान जब यह प्रकरण मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के सामने आया तब उन्होंने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए फाईल पर यह दर्ज किया कि "1. It is a serious matter. Particularly NOC for thermal Power which is on negative list and against power policy of the State.
2. This officer may be suspended with immediate effect and chargesheeted.
3. File also shows that the Electricity Board was also involved in issuing NOC for Thermal Power stations, the Board very well knew that Thermal Power is against the Power Policy and also it had no powers to decide allocation of thermal Power stations J.P. Associates (25 MW) for plant at Bagheri; Mahabir Spinning Ltd. (8.5 MW), M/s. Deepak Spinners Baddi (5 MW), and Tanu Alloys Una 6 MW. All officers for this may be identified within one week and case put up.
4. All the permissions and NOC's granted for setting up of Thermal Power Stations for above Companies and any other may be withdrawn forthwith. लेकिन इस पर आगे चलकर व्यवहारिक रूप से क्या कारवाई हुई कोई नही जानता।
इसी तर्ज पर इन जलविद्युत परियोनाओं को लेकर डीजीपी आई वी नेगी ने एक पत्रा राज्यपाल को लिखा था। उन्होंने इन परियोजनाओं के निर्माताओं द्वारा पर्यावरण नियमों के साथ खिलवाड़ करने को लेकर गंभीर चिन्ता व्यक्त की थी। यह प्रसंग भी प्रदेश उच्च न्यायालय में पहुंचा था और अदालत ने इसके लिये अतिरिक्त मुख्य सचिव वन अभय शुक्ला की अध्यक्षता में कमेटी गठित की थी। क्योंकि उस समय उच्च न्यायालय के सामने यह तथ्य आ गया था कि चम्बा से भरमौर तक रावी नदी पर बन रही चार परियोजनाओं में यह नदी अपने मूल बहाव से 65 किलो मीटर तक लोप हो जायेगी। चम्बा से भरमौर की कुल दूरी ही 70 किलोमीटर है और इसमें यह नदी केवल पांच किलोमीटर ही मूल बहाव में रहेगी। इस संबंध में शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि This Committee is strongly of the view that the govt's present practice of indiscriminately allotting hydel projects all over the state without any consideration to their impact on the larger environment-which mere EIAs and EMPs can not address- is short-sighted, unplanned and could result in serious depletion of the state's natural resources in the long run. This is not, however, an issue of altitude alone as vulnerable areas in dire need of protection exist at even lower altitudes. Protection has to be provided, for example, to dense forests (which, according to successive reports of the Forest Survey of India itself, have been declining in HP year after year), protected wild-life areas, critical catchments of river systems, critical wild-life habitats outside Protected Areas, permanent glaciers, alpine pastures and so on by declaring them as eco-sensitive zones under the Environment Protection Act. Only this would ensure that these vulnerable but vital natural buffers remain inviolate. Currently no area in the state- not even National Parks and Sanctuaries- are exempt from hydel exploitation, but this has to change, and change fast given the speed at which the hydel tentacles are crawling up the valleys and side valleys of the state. This requires the setting up of an interdisciplinary body of experts which the MOEF- which accords the final clearances-should also be associated. However, pending that, there are some recommendations which this Committee would like to make which need to be adopted.
अभय शुक्ला और के सी सडयाल कमेटीयों की रिपोर्टें उच्च न्यायालय और सरकार दोनो के पास मौजूद हैं। लेकिन इन रिपोर्टों पर आज तक कहीं से कोई कारवाई सामने नही आयी है। आज आलम यह है कि बोर्ड के स्वामित्व में चलने वाली परियोजनाओं में हजारों घन्टो का शट डाऊन प्रतिवर्ष हो रहा है और इससे सरकार को प्रतिदिन करोड़ों का नुकसान हो रहा है। विजिलैन्स भी इस संद्धर्भ में आयी शिकायतों पर चुप्पी साधे बैठा है क्योंकि जांच से शीर्ष प्रशासन की करनी/कथनी सामने आयेगी। इस परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि जब तक प्रशासन में फैली इस अराजकता पर कारवाई नही की जाती है तब तक मुख्यमन्त्री के प्रयासों से कोई लाभ नही मिलेगा।
मुख्यमन्त्री के प्रयासों पर यह प्रश्नचिन्ह इसलिये लग रहे हैं क्योंकि हर उद्योग के लिये बिजली एक मूल आवश्यकता है। लेकिन हिमाचल जहां विद्युत राज्य है वहीं पर इसकी विद्युत परियोजनाओं का अपना अस्तित्व सवालों में आ खड़ा हुआ है। क्योंकि 67 परियोजनाएं गंभीर भूस्खलन के खतरे में हैं जबकि दस मैगा पावर परियोजनाएं मध्यम और उच्च भूस्खलन जोन में हैं। पिछले पांच वर्षों में इन परियोजनाओं में इस संद्धर्भ में कहां क्या घटा है वह पाठकों के सामने रखा जा रहा है ताकि आम आदमी इन खतरों के प्रति अपने तौर पर सजग हो जाये। क्योंकि प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की नजर में यह कोई गंभीरता नही है।


शिमला/शैल। हिमाचल सरकार के वरिष्ठ अधिकारी प्रधान सचिव प्रबोध सक्सेना पूर्व केन्द्रिय वित्त मन्त्री पी चिदम्बरम प्रकरण में इन दिनों सीबीसी के राडार पर चल रहे हैं। सीबीसी ने इनके खिलाफ मुकद्दमा चलाने के लिये वित्त मन्त्रालय के आर्थिक मामलों के प्रभाग को इस संद्धर्भ में अनुमति देने का आग्रह बीते 13 मई को भेजा है। स्मरणीय है कि सक्सेना 2-4-2008 से 31-7-2010 तक आर्थिक मंत्रालय में निदेशक थे। इसी अवधि में आई एन एक्स मीडिया प्रकरण घटा जिसमें इस मीडिया को 305 करोड़ का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जुटाने में दी गयी अनुमतियों में अनियमितताएं बरती जाने का आरोप है। इस प्रकरण में 15-5-2017 को सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की थी। इसमें आई एन एक्स मीडिया, आईएन एक्स न्यूज, पीटर मुखर्जी, इन्द्राणी मुखर्जी और कार्ति चिदम्बरम के साथ वित्तमन्त्रालय के अधिकारियों को भी नामजद किया गया था। जब इस प्रकरण में जांच आगे बढ़ी तब इसमें मंत्रालय के चार अधिकारी सिन्धुश्री खुल्लर, अनुप के पुजारी, प्रबोध सक्सेना और रविन्द्र प्रसाद को दोषी पाया गया है। सीबीसी ने आर्थिक मन्त्रालय को इनके खिलाफ मुकद्दमा चलाने की अनुमति देने को कहा है।
सीबीसी जब किसी अधिकारी की सीबीआई जांच के आधार पर उस अधिकारी के खिलाफ मुकद्दमा चलाये जाने के पर्याप्त कारण मान लेता है तब संबद्ध मन्त्रालय को उस प्रकरण में मुकद्दमा चलाने की अनुमति देने का आग्रह भेजता है। इस आग्रह पर संबद्ध मन्त्रालय अपने तौर पर इसकी संतुष्टि करता है और यदि किसी कारण से मन्त्रालय और सीबीसी की राय में अन्तर आ जाये तब उस स्थिति में मामला कार्मिक विभाग को राय के लिये भेजा जाता है। आई एन एक्स प्रकरण आर्थिक मन्त्रालय से जुड़ा है। विदेशी निवेश की अनुमति देने वाला एफआई पी बी भी इसी मन्त्रालय का हिस्सा है। जिन अधिकारियों को इसमें दोषी माना गया है वह उस दौरान वहीं तैनात थे। ऐसे में इस प्रकरण में मुकद्दमा चलाने की अनुमति देना या न देना भारत सरकार के आर्थिक मन्त्रालय और कार्मिक मन्त्रालय के बीच का ही मामला है। अनुमति देने न देने का निर्णय भी सीबीसी से ऐसा आग्रह आने के तीन माह के भीतर करना होता है।
चिदम्बरम प्रकरण इस समय मोदी सरकार के लिये एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है क्योंकि यदि यह मामला सफल हो जाता है तो यह तब की कांग्रेस सरकार के खिलाफ प्रमाणिक तौर पर भ्रष्टता का प्रमाण पत्र बांट पायेगी। इस 305 करोड़ के विदेशी निवेश जुटाने के मामले में कार्ति चिदम्बरम को दस लाख दिये जाने का आरोप है लेकिन इस आरोप को प्रमाणित करने में इससे जुड़े अधिकारियों को दोषी प्रमाणित करना अनिवार्य हो जाता है। इसी कारण से इसमें इन अधिकारियों को नामजद करके इन्हें दोषी माना गया है। ऐसे में यदि एक भी अधिकारी के खिलाफ मुकद्दमा चलाने की अनुमति नहीं आती है तो पूरा प्रकरण असफल हो जाता है।
इस परिदृश्य में जब प्रबोध सक्सेना का मामला हिमाचल सरकार के पास अनुमति के लिये आ गया तब इसमें सवाल उठने शुरू हो गये हैं। सक्सेना इस समय प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारी हैं और अतिरिक्त मुख्य सचिव वित्त अनिल खाची के छुट्टी पर जाने के बाद वित्त विभाग का कार्यभार भी उन्ही को दिया गया है। कायदे से यह मामला प्रदेश सरकार को केन्द्र को लौटा देना चाहिये था क्योंकि इसका प्रदेश सरकार के साथ कोई संबंध ही नही रहा है। लेकिन प्रदेश सरकार ने मामला लौटाने की बजाये इसमें अपनी टिप्पणीयां की हैं। सक्सेना के खिलाफ प्रदेश में कुछ नही है। वीरभद्र सरकार में भी वह महत्वपूर्ण अधिकारी रहे हैं। चिदम्बरम, वीरभद्र के वकील भी रहे हैं और सक्सेना के ससुर भी मोती लाल बोहरा का पर्सनल डाक्टर रहे हैं। इस पृष्ठभूमि को सामने रखते हुए सक्सेना का कांग्रेस नेतृत्व के प्रति झुकाव होना स्वभाविक है और बदले में कांग्रेस का भी परोक्ष/अपरोक्ष में उनकी सहायता करना बनता है। इसी कारण से यह माना जा रहा है कि केन्द्र से अनुमति का पत्र प्रदेश को भिजवाना और प्रदेश का उस पर टिप्पणी करना एक सुनिश्चित योजना के तहत हुआ है। हो सकता है कि इसी प्रक्रिया में तीन माह का समय निकल जाये और स्वतः ही यह सब कुछ खत्म हो जाये संभवतः इसी आश्य से उन्हें वित्त का कार्यभार सौंपा गया है।