Friday, 16 January 2026
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क्या प्रदेश कांग्रेस संगठन में बड़ी सर्जरी कर पायेगी

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस संगठन में बड़ी सर्जरी की जायेगी यह कहा है रजनी पाटिल ने। लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद संगठन के नेताओं से हार के कारणों की दो दिन समीक्षा करने के बाद पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए। पाटिल प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी हैं इस नाते हार के कारणों का जो भी आकलन वह हाईकमान के सामने रखेंगी उसकी एक अहमियत होगी। पाटिल के प्रभार संभालने के बाद फरवरी में प्रदेश अध्यक्ष बदला गया था। सुक्खु के स्थान पर राठौर को लाया गया। फरवरी में इस बदलाव के बाद मई में लोकसभा के चुनाव ही हो गये। सुक्खु विधायक थे लेकिन राठौर ने अभी तक चुनाव ही नही लड़ा है। ऐसे में पहला सवाल यही उठता है कि चुनाव घोषणा से एक माह पहले अध्यक्ष को बदलना कितना सही था और इसमें पाटिल की बतौर प्रभारी कितनी सहमति थी। क्योंकि वीरभद्र प्रदेश विधानसभा के चुनावों से भी बहुत पहले से सुक्खु को हटाने की मांग करते आ रहे थे। बल्कि एक समय तो सुक्खु -वीरभद्र टकराव यहां तक पहंुच गया था कि वीरभद्र के कुछ समर्थकों ने तो वीरभद्र बिग्रेड तक का गठन कर दिया था। इस बिग्रेड का पूरा ढांचा राजनीतिक दल की तर्ज पर ही तैयार किया गया था। बिग्रेड में जब संगठन के कई सक्रिय नेताओं की भागीदारी सामने आयी और उसका अधिकारिक संज्ञान लिया गया तब बिग्रेड को तो भंग कर दिया गया लेकिन उसी दौरान बिग्रेड के प्रमुख ने सुक्खु के खिलाफ मानहानि का मामला दायर कर दिया जो शायद अबतक लंबित है। इस पृष्ठभूमि से यह स्पष्ट हो जाता है कि सुक्खु -वीरभद्र टकराव की स्थिति कहां तक पहुंच चुकी थी। अब सुक्खु को हटाने के लिये वीरभद्र, मुकेश अग्निहोत्री, आशा कुमारी और आनन्द शर्मा ने जब लिखित में संयुक्त रूप से प्रस्ताव किया और राठौर की सिफारिश की तब सुक्खु को हटाया गया।
इस तरह से वीरभद्र के दवाब में चुनाव से पहले अध्यक्ष को बदल दिया गया। नये अध्यक्ष ने फिर से कार्यकारिणी का गठन किया और राज्य से लेकर ब्लाॅक स्तर तक इतनी लम्बी लाईने पदाधिकारियों की लगा दी कि यदि यह पदाधिकारी ही अपना-अपना बूथ संभाल लेते तो भी शायद इतनी फजीहत न होती। इसका सीधा सा अर्थ है कि जो नये पदाधिकारी बनाये गये थे उनमें से कुछ तो नये अध्यक्ष की अपनी पसन्द के रहे होंगे तो कुछ उन नेताओं की पसन्द के रहे होंगे जिन्होंने नये अध्यक्ष की सिफारिश की होगी। इस तरह आज जब संगठन में सर्जरी की बात की जा रही है तब क्या सबसे पहले इस पूरी कार्यकारिणी को भंग करके एक तदर्थ कमेटी का गठन करके ब्लाॅक से लेकर राज्य स्तर तक संगठन के चुनाव करवाना ज्यादा बेहतर होगा।
इसी के साथ एक अहम सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर कांग्रेस वर्तमान स्थिति तक पहुंची ही कैसे। इसके लिये यदि आपातकाल के बाद से लेकर अबतक प्रदेश में जो कुछ घटा है उस पर नजर दौड़ाई जाये तो स्थितियां बहुत साफ हो जाती हैं। 1980 में जब प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार टूटी थी तब यहां पर विधानसभा के चुनाव न होकर बड़े पैमाने पर दलबदल से कांग्रेस की सरकार बनी थी। उस समय वीरभद्र सिंह ने इस तरह से सरकार बनाये जाने का विरोध किया था। 1980 में शुरू किया गया वीरभद्र का यह विरोध 1983 में रंग लाया जब उन्होंने राष्ट्रपति चुनावों से पहले फाॅरैस्ट माफिया को लेकर एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र के कारण तब ठाकुर रामलाल को हटाकर वीरभद्र को मुख्यमन्त्री बनाया गया। तब से लेकर अब तक कांग्रेस में मुख्यमन्त्री के लिये किसी दूसरे नेता का नाम नही आ पाया है जबकि इसी अवधि में भाजपा में जयराम तीसरे मुख्यमन्त्री सामने आ गये हैं। 1993 में जब पंडित सुखराम सशक्त दावेदार के रूप में उभरे थे तब वीरभद्र के पक्ष -विपक्ष के समर्थकों ने विधानसभा का उग्र घेराव करके प्रदेश प्रभारी शिन्दे को वीरभद्र के नाम की संस्तुति करनी पड़ी थी। 1993 के इस घटनाक्रम को राजनीतिक विश्लेष्कों ने राजनीतिक ब्लैकमेल की संज्ञा दी थी। 1980 से लेकर अबतक का प्रदेश कांग्रेस का यह इतिहास रहा है कि जब भी कोई पायेदार नेता  कांग्रेस का अध्यक्ष बना है वीरभद्र का उसी से विरोध रहा है। संभवतः इसी कारण से प्रदेश में एक बार भी कांग्रेस सरकार रिपीट नही कर सकी है। बल्कि हर चुनाव के बाद कांग्रेस में भीतरघात के आरोप लगे और इनका ज्यादा रूख वीरभद्र की ओर ही रहा है।
स्वच्छ प्रशासन के नाम पर भी स्थिति यह रही है कि जिस फारैस्ट माफिया के खिलाफ आवाज़ उठाकर वीरभद्र मुख्यमन्त्री बने थे उनके शासनकाल में यह अपराध सबसे अधिक बढ़े और वनभूमि पर अवैध कब्जे भी सबसे अधिक उन्ही के चुनावक्षेत्र रोहडू में सबसे अधिक रहे हैं यह सब प्रदेश उच्च न्यायालय के माध्यम से सामने आया है। स्वच्छ प्रशासन पर ऐसी ही टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय के राजकुमार राजेन्द्र सिंह बनाम एसजेवीएनएल मामले में 24 सितम्बर 2018 को आये फैसले में भी सामने आयी है। यह सब शायद इसलिये हुआ है कि वीरभद्र के साये तले कोई दूसरा नेता कांग्रेस में उभर ही नही पाया। वैसे कुछ लोगों का मानना तो यह है कि वीरभद्र की नीति यह रही है कि मैं नही तो फिर मेरा परिवार अन्यथा कोई नहीं। बहुत संभव है कि यही स्थिति कई अन्य राज्यों में भी हो। इसलिये आज जहां कांग्रेस खड़ी वहां सबसे पहले उसे अपने घर में ऐसे लोगों को चिन्हित करके उन्हे बाहर का रास्ता दिखाना होगा। आज ऐसे लोगों की खोज़ करनी होगी जो सत्ता से टकराने का साहस रखते हों। क्योंकि अब कांग्रेस की सत्ता में वापसी संघर्ष से ही संभव हो पायेगी।

एम्टा प्रकरण में बाल्दी और परमार आये सीबीआई के गवाहों की सूची में

 क्या केन्द्र की तर्ज पर हिमाचल सरकार भी इस प्रकरण की जांच करेगी उठा सवाल

शिमला/शैल। बहुचर्चित कोल ब्लाॅक्स आंवटन प्रकरण में एक समय सर्वोच्च न्यायालय की प्रताड़ना का शिकार बनी सीबीआई ने इस मामले में संभवतः अपनी जांच पूरी कर ली है। इस आंवटन में नियमों की किस हद तक अनेदखी करके सरकारी राजस्व को कितना घाटा पहुंचाया गया और इसमें कितना भाई-भतीजावाद चला यह सब सीबीआई जांच की विषय वस्तु था। इस प्रकरण में हिमाचल का नाम भी इसलिये जुड़ गया था क्योंकि 2006 में हिमाचल सरकार ने भी बंगाल में 2400 करोड़ की लागत से एक थर्मल प्लांट लगाने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके लिये एक एम्टा कंपनी के साथ एमओयू साईन किया गया था। एम्टा ने आगे कोल ब्लाॅक हासिल करने के लिये जेएसडब्लयू स्टील के साथ इकरार किया। जेएस डब्लयू स्टील को कोल ब्लाक हालिस करने के लिये विभिन्न संवद्ध मन्त्रालयों को वीरभद्र सिंह ने शायद एक ही दिन छः सिफारशी पत्र लिखे थे। यह थर्मल प्लांट लगाने की प्रक्रिया प्रदेश के अधोसंरचना बोर्ड ने शुरू की थी लेकिन एमओयू साईन होने की स्टेज पर यह काम पावर कारपोरेशन को दे दिया गया था। उस समय पावर कारपोरेशन के एमडी डा. श्रीकान्त बाल्दी थे और अध्यक्ष एसएस परमार थे। सीबीआई जांच में इन दोनों अधिकारियों से भी पूछताछ हुई है और इन्हे सीबीआई ने अपने गवाहों की सूची में शामिल कर लिया है।
जेएस डब्लयू स्टील को यह आवंटन कितना सही हुआ या नही यह सीबीआई जांच में सामने आ जायेगा। लेकिन इस पूरे प्रकरण में जिस तरह का आचरण प्रदेश सरकार के अधिकारियांे का रहा है और उससे प्रदेश को करोड़ो का नुकसान हुआ है क्या उसकी अलग से प्रदेश सरकार द्वारा जांच नही करवायी जानी चाहिये यह एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
गौरतलब है कि वर्ष 2006 में हिमाचल सरकार ने भी संयुक्त क्षेत्र में सितम्बर 2006 में एक थर्मल पावर प्लांट लगाने का फैसला लिया था। इसके लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर बोर्ड के माध्यम से निविदायें मांगी गयी। इसमें छः पार्टीयों ने आवेदन किया लेकिन प्रस्तुति पांच ने ही दी। इसमें से केवल दो को शार्ट लिस्ट किया गया और अन्त में एम्टा के साथ ज्वाइंट बैंचर हस्ताक्षरित हुआ। क्योंकि एम्टा ने पंजाब और बंगाल में थर्मल प्लांट लगाने के अनुभव का दावा किया था। इस दावे के आधार पर जनवरी -फरवरी 2007 में एम्टा के साथ एमओयू साईन हो गया और 48 महीने  में इसके पूरे होने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिये निविदायें अधेासंरचना बोर्ड के माध्यम से मांगी गयी थी लेकिन एमओयू साईन होने के समय इसमें बोर्ड की जगह पावर कारपोरेशन आ गयी थी। अब प्लांट के लिये कोल ब्लाॅक चाहिये था जो कि एम्टा के पास था नहीं। इसके लिये एम्टा ने जेएस डब्लयू स्टील को अपना पार्टनर बनाया। एम्टा और पावर कारपोरेशन में 50-50% की हिस्सेदारी तय हुई थी। ऐसे में एम्टा और जे एस डब्ल्यू स्टील के मध्य कितनी हिस्सेदारी तय हुई और उसका पावर कारपोरेशन पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसको लेकर रिकार्ड में बहुत कुछ स्पष्ट नही है। एम्टा और जेएस डब्ल्यू स्टील ने मिलकर भारत सरकार से गौरांगढ़ी में कोल ब्लाक हासिल कर लिया। इसके लिये एम्टा और जेएस डब्लयू स्टील में मई 2009 में एक और सांझेदारी साईन हुई। एम्टा और जेएस डब्ल्यू स्टील को कोल ब्लाक आंवटित करवाने के लिये वीरभद्र ने एक ही दिन में विभिन्न मन्त्रालयों को पांच सिफारिशी पत्र लिखे हैं लेकिल यह सब कुछ होने के बाद नवम्बर 2012 में कोल ब्लाक्स का आंवटन ही भारत सरकार ने रद्द कर दिया।
जब भारत सरकार ने यह आवंटन नवम्बर 2012 में रद्द कर दिया तब उसके बाद दिसम्बर 2012 में ही एम्टा के निदेशक मण्डल की बैठक हुई और इस बैठक में फैसला लिया गया कि इसमें और निवेश न किया जाये। एम्टा के साथ जो एमओयू 2007 में साईन हुआ था उसके मुताबिक एम्टा को दो करोड़ की धरोहर राशी पावर कारपोरेशन में जमा करवानी थी जो कि समय पर नही हुई। जब 2012 में कोल ब्लाक का आवंटन रद्द हो गया और एम्टा के निदेशक मण्डल ने भी इसमें और निवेश न करने का फैसला ले लिया तो फिर 26 दिसम्बर 2012 को पावर कारपोरेशन ने इसमें 40 लाख का निवेश क्यो किया? यही नहीं इसके बाद 9-5-2013 को 20 लाख  का और निवेश इसमें कर दिया गया। पावर कारपोरेशन के इस निवेश के बाद 26 नवम्बर 2014 को एम्टा ने फिर फैसला लिया कि जब तक विद्युत बोर्ड पावर परचेज़ का एग्रीमेंट नही करेगा तब तक इसमें निवेश नही करेंगे। अन्त में मार्च 2015 में बोर्ड ने यह एग्रीमेंट करने से मना कर दिया और इसी के साथ थर्मल प्लांट लगाने की योजना भी खत्म हो गयी।
इस पूरे प्रकरण में यह सवाल उभरते हैं कि जब निविदायें अधोसरंचना बोर्ड के नाम पर मंगवाई गयी तो फिर एमओयू के समय पावर कारपोरेशन कैसे आ गयी? जब एम्टा का चयन किया गया तब उसके अनुभव के दावों की पड़ताल क्यों नही की गयी? इसमें जेएस डब्लयू स्टील की एन्ट्री कैसे हो गयी। एम्टा से दो करोड़ क्यो नहीं लिये गये? जब एम्टा ने नवम्बर 2012 में ही इसमें कोई निवेश न करने का फैसला ले लिया था फिर दिसम्बर 2012 और मई 2013 में किसके कहने पर 60 लाख का निवेश कर दिया। एम्टा के साथ हुए एमओयू के मुताबिक यह प्लांट 2010 के अन्त तक तैयार हो जाना था। लेकिन इसके लिये जेएस डब्लयू स्टील के साथ एम्टा की हिस्सेदारी कोल ब्लाक के लिये मई 2009 मे साईन हुई? ऐसे में सवाल उठता है कि पावर कारपोरेशन का प्रबन्धन 48 माह में इस प्लांट के लग जाने के लिये समय समय पर क्या पग उठा रहा था जबकि उसके साथ एमओयू जनवरी 2007 में हो गया था। उसी दौरान पावर कारपोरेशन में एमडी डा. बाल्दी आ गय थे। यह उस समय देखा जाना चाहिये था कि एम्टा जो अनुभव  के दावे कर रहा है उसकी प्रमाणिकता क्या है। एम्टा के अपने पास जब  कोल ब्लाक था ही नही तोे उसे किस आधार पर चुना गया? क्योंकि जो रिकाॅर्ड अब तक सामने आया है उसके मुताबिक एम्टा के दावे भी ब्रेकल जैसे ही रहे हैं। यह करीब 2400 करोड़ का प्लांट लगना था और 2010-11 में पूरा हो जाना था। कोल ब्लाक आवंटन का विवाद 2012 में शुरू हुआ और नवम्बर 2012 में आवंटन रद्द हुए। इसलिये एम्टा जेएस डब्लयू स्टील और पावर कारपोरेशन इस विवाद का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। प्रदेश का करोड़ो का नुकसान इसमें हो चुका है और प्रदेश सरकार को अपना काम चलाने के लिये आये दिन कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में क्या जयराम सरकार इस प्रकरण  में अपने स्तर पर मामला दर्ज करके जांच शुरू करवाएगी? क्योंकि यह एक संयोग है कि जयराम के प्रधान सचिव एसीएस बाल्दी को इस मामले की पूरी जानकारी है और उनसे इसकी जांच में पूरा सहयोग विजिलैन्स को मिलेगा।

 

 

1134 करोड़ की विश्व बैंक पोषित बागवानी परियोजना पर उठते सवाल

 

शिमला/शैल। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश की 89.96% जनसंख्या गांवों में रहती है और कृषि तथा बागवानी पर निर्भर करती है। राज्य के कुल कामगारों में से 62% इसी कृषि क्षेत्र में से आते हैं। प्रदेश में सीमान्त, लघु, मध्यम और बड़े कुल 9.61 लाख किसान 9.55 लाख हैक्टेयर भूमि पर कृषि-बागवानी कर रहे हैं। इन किसानों/बागवानों की स्थिति को सुधारने के लिये विश्व बैंक द्वारा पोषित 1134 करोड़ की बागवानी योजना 21 जून 2016 को शुरू की गयी और 30-6-2023 को इसके पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना का उद्देश्य to enhance availability and adoption of Elite  Planting Material and horticulture Technology and support the moderanization of  Horticulture Society through the application of new technology and approaches  that  will contribute to climate resiliency strengthen the productive capacity of produce and their organization and faciliate access to market value addition.
The imported plant material Root stock and feathered plants were to be use for establishment of   nursery mother plants for subsequent multiplication for early planting of the best root stocks and varieties for subsequent multiplication.

इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये इसमें प्रशासनिक तन्त्र की रूप रेखा इस तरह से रखी गयी थी। इसमें शीर्ष पर संचालन परिषद, कार्यकारी परिषद, परियोजना समन्वय ईकाई, चार परियोजना अनुपालना यूनिट, जिला समन्वय कमेटी और ब्लाॅक अनुपालना ईकाई। इस सारे तन्त्र की जिम्मेदारी इसे अन्तिम लाभार्थी  किसान /बागवान तक पहुंचाना था। इसमें बागवानी विभाग, वन  और बागवानी विश्वविद्यालय सोलन हिमाचल प्रदेश नर्सरीज़ प्रबन्धन सोसायटी, एचपीएमसी, कृषि विपणन बोर्ड की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गयी थी और बागवानी विभाग इसमें नोडल ऐजैन्सी की भूमिका निभा रहा था। परियोजना संचालन निर्देशों के अनुसार इसमें एक पूर्णकालिक निदेशक की व्यवस्था रखी गयी है।
 इस तरह परियोजना का पूरा स्वरूप  देखने से स्पष्ट हो जाता है कि यह परियोजना प्रदेश के किसानो/ बागवानों के लिये कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन जिस ढंग से इसमें पहले तीन वर्षों में काम किया गया है उससे यह गंभीर आशंकाएं उठ रही हैं कि क्या यह समय पर पूरी हो पायेंगी? क्या इसमें धन का दुरूपयोग हो रहा है? इन आशंकाओं का आधार यह है कि इसमें वर्ष 2014-15 में 50 लाख दिये जिनमें से केवल 2.53 लाख खर्च हुए, 2015-16 में 20 करोड़ मिले और खर्च 6.19 हुए, 2016-17 में इसमें 42.46 करोड़ आये और खर्च 3.33 करोड़ हुए, 2017-18 में 13.73 करोड़ खर्च हुए जबकि एक्शन प्लान 150 करोड़ का था। इस तरह इन तीन वर्षों में 62.96 करोड़ मिले और खर्च हुए 23.27 करोड़ जबकि एक्शन प्लान 224 करोड़ का था। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या जून 2023 तक 1134 करोड़ सही तरीके से खर्च हो पायेंगे या नहीं?
परियोजना का उद्देश्य किसानों बागवानों को उन्नत किस्म के रोग मुक्त विदेशी पौधे उपलब्ध करवाना था। इसके लिये वित्त वर्ष 2016-17 में आर्डर दिया गया और सप्लाई वित्त वर्ष 2017-18 में आयी। 4.80 करोड़ की इस खरीद के लिये Floating Limited Internal Bid प्रक्रिया अपनाई गयी। 4-12-2017 को निविदायें मांगी गयी जिनका सामूहिक आकलन 17-1-18 को किया गया और जिसकी विश्व बैंक से सहमति 4-2-2018 को मिली और एलओसी 16-2-2018 को जारी कर दिया गया। इन निविदाओं में तीन कंपनीयां M/s Pepinieres Coulie of France,   M/s Griba International of Italy, M/s Vita Fruit of Italy ने भाग लिया। इसमें जब निविदाओं के लिये विज्ञापन किया गया और निविदाकर्ताओं की जानकारी हासिल की गयी तब उसमें Vitafruit का यह सामने आया कि उसने M/S Indio Dutch Horticulture Private Ltd. के नाम से एक कंपनी उत्तराखण्ड में 2004 में दो लाख की कुल पूंजी से पंजीकृत करवा रखी थी और यही कंपनी अब विदेशी पौधे सप्लाई करने मे वीटा की सहयोगी कंपनी थी। लेकिन रजिस्ट्रार कंपनी के कार्यालय के मुताबिक यह कंपनी 2012 में ही बन्द हो चुकी थी। इस कंपनी के साथ एक सुशान्त चड्डा के घनिष्ठ संबंध थे क्योंकि इन्ही के परिवार के सुधीर चड्डा कंपनी के मुख्य निदेशक थे। जबकि दूसरे निदेशक अमित पराशर ने 2-9-2013 को कंपनी से त्यागपत्र दे दिया था। इसी के साथ यह जानकारी भी सामने आयी कि सुशान्त चड्डा ही वीटा फ्रूट का इण्डिया में अधिकृत प्रतिनिधि है। लेकिन निविदा दस्तावेजों में कंपनी ने किसी और को ही प्रतिनिधि दिखा रखा है। निविदा नियमों के मुताबिक कंपनी को तीन वर्ष की वित्तिय स्थिति दिखानी है जबकि वीटा ने केवल एक वर्ष की ही दिखाई है। वीटा फ्रूट ने रेट भी स्याही पैन से भरे हैं जबकि यह टाईप होने चाहिये थे। इसी तरह ग्रीवा कंपनी से 30,32,732 रूपये के विदेशी पौधे खरीदे। लेकिन इस खरीद पर यह प्रश्नचिन्ह है कि इसमें मूल invoice की प्रति ही रिकार्ड में नही है केवल ईमेल से प्राप्त कापी लगाई गयी है। इसमें एक रोचक तथ्य यह भी सामने आया है कि जिन तीनों विदेशी कंपनीयों से पौधों की खरीद हुई है वह तीनों यूरोप के इटली, फ्रांस और नीदरलैण्ड से हैं तथा जो कन्सलटैन्ट नियुक्त किये गये वह भी इन्ही देशों से हैं। इस सबमें बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि विदेशों से आये इन पौधों की गुणवता कैसे सुनिश्चित की गयी? क्योंकि इनकी जीवितता का जो खुलासा सामने आया है उसके मुताबिक केवल 51% पौधे ही औसतन जीवित रह पाये हैं। जबकि अबतक जो अध्ययन हुए हैं उनके मुताबिक हिमाचल के लिये यूरोप की  बजाये अमेरीका के पौधे ज्यादा उपयोगी माने गये हैं। लेकिन पूरी परियोजना अवधि के लिये ही यूरोप की इन तीनों कंपनीयों से अनुबन्ध कर लिया गया है और तीनों कंपनीयों में सुशान्त चड्डा का एक बराबर दखल सामने आया है। शायद इसी दखल को सामने रखते हुए आडिट रिपोर्ट में यह कहा गया है However whenever the response from the bidders are limited the buyer should opt for open interational Bidding process of contacting / spreading the requirement among eligible parties /suppliers spread all over world) it is worth mentioning over here that we did not find much about these suppliers selected by project, when searched on google. the authorized representative of these companies/suppliers Mr.  Sushant Chadda, is stated already supplying imported plant material in Himachal and neighboring states. The project should have made inquires about the credentials of Mr. Sushant Chadda from these states before accepting him as representative. Also the project may heve put a ridder for not supplying the material to grower /orchardist /sellers in the state. इस परिदृश्य में पूरी योजना की अन्तिम सफलता पर प्रश्नचिन्ह लगने स्वभाविक हैं क्योंकि आडिट रिपोर्ट के बाद भी सरकार इसमें कोई जांच करवाने का साहस नही कर पा रही है।


यह है विदेशी पौधों की जीवितता का रिकार्ड

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आठ माह में भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर अमल नही कर पायी जयराम सरकार

 

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार का एक मामला एसजेवीएनएल बनाम राजकुमार, राजेन्द्र सिंह सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया था। सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस अब्दुल एस नजीर पर आधारित पीठ ने इस मामले में 24 सितम्बर 2018 को फैसला सुना दिया है। इस फैसले के महत्वपूर्ण अंश यह है Resultantly,   we   allow   the   appeals   and   direct   that   the compensation that has been withdrawn by Late Rajinder Singh or his LRs. in the case of land acquisition, in original proceedings or under section 28­A shall be refunded along with interest at the rate of 12 percent   per  annum   within   3   months   from   today   to   the appellants/State, as the case may be, and compliance be reported to this Court. The appeals are accordingly allowed. We leave the parties to bear their own costs.
 शीर्ष अदालत के सामने यह सवाल था कि  The question involved is whether after the abolition of Jagirs by virtue of the Himachal Pradesh Abolition of Big Landed Estates and Land Reforms Act, 1953 (hereinafter referred to as ‘the Abolition Act’), the late Jagirdar or his legal representatives could have claimed the compensation on the land acquisition being made particularly when land has vested in the State of Himachal Pradesh, the land was not under   the   personal   cultivation,   and   particularly   when   they   have received the compensation under the Abolition Act, apart from that had   also   received   the   compensation   under   the   provisions   of   H.P. Ceiling on Land Holdings Act, 1972 (hereinafter referred to as “the Ceiling Act”).
The facts project how a litigant has filed a slew of litigations one after the other and faced with a situation that it was likely to be dismissed, he would withdraw it; again, file it on new grounds, or having lost it, would withdraw it again at appellate stage, and in the meantime, in different proceedings by playing fraud, getting unjust enrichment   by   receiving   compensation   at   the   expense of public exchequer.
In the peculiar facts projected in the case the principle fraud vitiates is clearly applicable it cannot be ignored and overlooked under the guise of the scope of proceedings under Section 18/30 of the LA Act.

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि राजकुमार राजेन्द्र सिंह पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के सगे भाई हैं। इसमें संयोग यह रहा है कि जब राजेन्द्र सिंह इन जमीनों का मुआवजा़ ले रहे थे तब अधिकांश में सत्ता स्वयं वीरभद्र सिंह के ही हाथ में रही है। ऐसे में जब सर्वोच्च न्यायालय राजेन्द्र सिंह और उनके कानूनी वारिसों के आचरण को फ्राॅड कह रहा है तब अपरोक्ष में इसके छींटे वीरभद्र प्रशासन पर भी आ जाते हैं। क्योंकि जब वीरभद्र सरकार ने 31 अक्तूबर 1997 को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक रिवार्ड स्कीम अधिसूचित की थी तब इस स्कीम के तहत 21 नवम्बर 1997 को ही एक शिकायत मुख्यमन्त्री के कार्यालय में दायर हो गयी थी। इस शिकायत में इस परिवार द्वारा विभिन्न भूसुधार अधिनियमों की अवहेलना करते हुए अपने पास तय सीमा से अधिक ज़मीन रखने का आरोप था। इन अधिनियमों के लागू हो जाने के बाद भी सरकार के कई विभागों द्वारा विकास कार्यों के नाम पर इनकी ज़मीनों का अधिग्रहण करके इन्हेें करोड़ो का मुआवज़ा देने का आरोप भी इस शिकायत में था। इस शिकायत से यह सारा कुछ प्रशासन के संज्ञान में आ गया था। लेकिन प्रशासन अपनी ही स्कीम के तहत आयी शिकायत पर कारवाई नही कर पाया। क्योंकि जिस पर आरोप था वह मुख्यमन्त्री का भाई था। यहां तक कि प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद भी जांच नही हो पायी। केवल एफसी अपील के यहां एक मामले में इनकी 98 बीघे ज़मीन सरकार में विहित हो गयी थी।
अब जब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ गया है और शीर्ष अदालत ने इनके आचरण को फ्राड कहा है तो स्वभाविक है कि इस फ्राड में शासन -प्रशासन का भी परोक्ष/अपरोक्ष सहयोग रहा है। इसलिये अब शीर्ष अदालत के फैसले के बाद इस फ्राड की जांच करना सरकार के लिये अनिवार्य हो जाता है। बल्कि इस फैसले के बाद सरकार की रिवार्ड योजना के तहत 21 नवम्बर 1997 को इस सबकी शिकायत करने वाले शिकायतकर्ता ने जयराम सरकार के प्रधान सचिव विजिलैंस डीजीपी संजय कुण्डु को इस बारे में नये सिरे से प्रतिवेदन सौंप दिया है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने शिकायतकर्ता के आरोपों पर प्रमाणिकता की मोहर लगा दी है। कानूनी समझ रखने वाले मानते हैं कि इस मामले को नज़रअन्दाज करना सरकार के लिये भारी पड़ सकता है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि इतने संवदेनशील मामले पर जयराम प्रशासन का रूख ऐसा क्यों है कि जब सर्वाेच्च न्यायालय ने इसमें तीन माह में अनुपालना रिपोर्ट मांगी है तो 8 माह मे भी कोई कारवाई सामने क्यों नही आ रही है। क्या प्रशासन पर कोई राजनीतिक दवाब है या फिर मुख्यमन्त्री को इसकी सही जानकारी ही नही दी जा रही है।

 

लोकायुक्त, मन्त्री और ट्रिब्यूनल के पद भरना सरकार की प्राथमिकता में नहीं

शिमला/शैल। जयराम मन्त्रीमण्डल में अनिल शर्मा के त्यागपत्र और किशन कपूर के सांसद बन जाने के बाद मन्त्री के दो पद खाली हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान मुख्यमन्त्री ने यह कहा था कि इन पदों को विधायकों की चुनावों में परफारमैन्स के आधार पर भरा जायेगा। अब लोकसभा चुनावों में भाजपा को प्रदेश के सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली है। कांग्रेस एक भी विधानसभा क्षेत्र में जीत नही पायी है। लोकसभा चुनावों में मिली इस जीत के बाद मुख्यमन्त्री को यह फैसला लेना कठिन हो गया है कि वह किसे मन्त्री बनायें। इसीलिये उन्होंने यह कहा है कि इन पदों को भरने की जल्दी नहीं है। भाजपा को प्रदेश में लोकसभा चुनावों में पड़े कुल मतों का करीब 70ः मत हासिल हुआ है। इसमें कांग्रेस के समर्थकों ने भी भाजपा को वोट डाला है इसमें कोई शक नही है और यही दावा मुख्यमन्त्री ने किया भी है। मुख्यमन्त्री के दावे के परिदृश्य में यह देखना रोचक हो गया है कि मन्त्रीयों के पद कब तक खाली रखे जाते हैं।
इसी के साथ प्रदेश के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के भविष्य पर भी अस्थिरता की तलवार लटक गयी है। ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक सदस्यों के दो पद जब से जयराम सरकार सत्ता में आयी है तभी से खाली चल आ रहे हैं। इन पदों को भरने के लिये तीन बार इन्हें विज्ञापित भी किया गया। दर्जनों अधिकारियों ने इसके लिये आवेदन किये। कई नाम कयासों में चलते रहे। अन्ततः मुख्य न्यायधीश की अध्यक्षता में चयन प्रक्रिया का अन्तिम चरण भी पूरा हो गया।  इस प्रक्रिया में दो नामों मनीषा नन्दा और श्रीकान्त बाल्दी के चयन की संस्तुति भी सरकार को मिल गयी है। इस संस्तुति के बाद यह फाईल केन्द्र को जानी है लेकिन यह फाईल अभी तक केन्द्र को न जाकर मुख्यमन्त्री के अपने ही कार्यालय में अटकी हुई है। इसी बीच यह चर्चा भी बाहर आ गयी है कि संघ ट्रिब्यूनल को चलाये रखने के पक्ष में नही है। तर्क यह दिया जा रहा है कि जब भी किसी कर्मचारी के स्थानान्तरण के लिये कोई सिफारिश की जाती है तभी वह मामला ट्रिब्यूनल में पहुंच जाता है और वहां पर सिफारिश अर्थहीन हो जाती है। इसलिये जब ट्रिब्यूनल से वांच्छित लाभ ही नही मिल रहा है तब इसे चलाये रखने में क्या लाभ है। ट्रिब्यूनल के पदों को भरने के लिये जिस तरह से किसी न किसी कारण से समय आगे खींचा जाता रहा है और अब नामों की संस्तुति आने के बाद भी फाईल अब तक दिल्ली नही भेजी गयी है उससे स्पष्ट हो जाता है कि इसमें कर्मचारी हितों से हटकर कुछ है जिसके कारण सरकार कोई दो टूक फैसला नही ले पा रही है।
इसी तरह से प्रदेश के लोकायुक्त और चेरयमैन मानवाधिकार आयोग के पद भी एक लम्बे अरसे से खाली चले आ रहे हैं। मानवाधिकार आयोग में सदस्य का पद भरने के लिये वीरभद्र शासन के अन्तिम दिनों में कवायद चली थी। लेकिन यह कवायद पूरी नही हो सकी और परिणामस्वरूप आज यह दोनों शीर्ष संस्थान पूरी तरह खाली हैं। लोकायुक्त पद का सृजन शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने के लिये किया गया था। इस पद पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या प्रदेश उच्च न्यायालय के कार्यरत या सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है। प्रदेश में आज तक जितने भी लोकायुक्त रहे हैं और उनके पास किस स्तर के राजनेताओं के खिलाफ शिकायतें आयी है तथा उन पर किस तरह की कारवाई हुई है इसका पता लोकायुक्त की वार्षिक रिपोर्टों से लग जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रदेश के लोकायुक्त के पास दो मुख्यमन्त्रीयों के खिलाफ शिकायतें आयी थी और इन पर हुई कारवाई लोकायुक्त कार्यालय का आकलन करने के लिये पर्याप्त है। लेकिन आज जयराम सरकार के अबतक के कार्यकाल में इन पदों को भरने की कोई कवायद ही सामने नही आयी है। वैसे तो सभी सरकारों का अबतक रिकार्ड यही रहा है कि बतौर विपक्ष सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ सौंपे अपने ही आरोपपत्रों पर स्वयं सत्ता में आने पर कभी कोई कारगर कारवाई सामने नही है। शायद जयराम सरकार भी इसमें कोई अपवाद नही बनना चाहती है इसलिये लोकायुक्त का पद भरने के लिये कोई कवायद ही शुरू नही की गयी है।

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