Friday, 24 April 2026
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सरकार के जश्न से पूर्व विक्रमादित्य की आक्रामकता से फिर उलझे सियासी समीकरण

संजय कुण्डु और प्रवीण गुप्ता पर बिना नाम लिये हमला
जश्न से पहले उपलब्धियों पर मांगा श्वेत पत्र
भारद्वाज और कपूर में तालमेल न होने से नहीं मिली बर्दियां
महेन्द्र सिंह पर 1134 करोड़ की बागवानी परियोजना तबाह
करने का आरोप
शिमला/शैल। जयराम सरकार का 27 दिसम्बर को सत्ता में एक साल पूरा होने जा रहा है। इस मौके पर सरकारी स्तर पर जश्न मनाया जा रहा है और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी भी इसमें शिरकत कर रहे हैं। इसी मौके पर कांग्रेस भी सरकार के खिलाफ आरोपपत्र लाने जा रही है। सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल पर यदि निष्पक्षता से नजर डाली जाये तो यह सामने आता है कि अब तक सरकार और विपक्ष के बीच संबंध मैत्रीपूर्ण ही चल रहे थे। इसी मैत्री का परिणाम रहा कि सरकार ने कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का पद दे ही दिया। भाजपा ने बतौर विपक्ष जो आरोपपत्र वीरभद्र सरकार के खिलाफ सौंपे थे उन पर कारवाई भी अब तक शून्य ही रही है। कांग्रेस शासन में भाजपा के जिन नेताओं के खिलाफ मामले बने थे उन्हे अब जयराम सरकार वापिस ले रही है। इस वापसी पर कांग्रेस लगभग खामोश चल रही है। बल्कि भाजपा ने अपने सचेतक और उपसचेतक को मन्त्री का दर्जा तथा उसी के समकक्ष अन्य सुविधायें दे दी हैं। विधानसभा में इस आश्य का विधेयक पारित करवाकर जयराम ने इस पर नियुक्ति भी कर दी है। लेकिन कांग्रेस इसमें ब्यानबाजी की रस्मी खिलाफत से आगे नही बढ़ी है जबकि यह विधयेक और इस पर की गयी नियुक्ति एकदम गलत है। यही नहीं इस विधानसभा सत्र से पूर्व वीरभद्र सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अभी जयराम का विरोध नही किया जाना चाहिये। उन्हे और मौका दिया जाना चाहिये। विधानसभा में उन्हें नही घेरेंगे और कांग्रेस ने सत्र में इस आश्वासन पर अमल भी किया।
लेकिन विधानसभा सत्र के बाद अब जिस तरह से वीरभद्र के बेटे शिमला ग्रामीण से विधायक विक्रमादित्य सिंह ने जयराम और उनकी सरकार पर हमला बोला है उससे यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि अचानक ऐसा क्या घट गया है कि जिसके कारण विक्रमादित्य के तेवर इतने तल्ख हो गये। इसमें सबसे पहले तो यही आता है कि इस दौरान पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम सामने आये हैं और इनमें भाजपा के अभेद्द गढ़ रहे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसढ़ में कांग्रेस ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इससे पूरे देश में हर कांग्रेसी उत्साहित है लेकिन इस उत्साह में सरकार पर रस्मी आक्रामकता तो समझ आती है लेकिन विक्रमादित्य का हमला तो रस्मअदायगी से कहीं आगे निकल गया है। जब उन्होंने यह कहा कि सरकार का एक प्रधान सचिव विजिलैन्स के कार्यालय में जाकर अधिकारियों पर कानून के दायरे से बाहर जाकर कांग्रेस नेताओं के खिलाफ मामले बनाने का दबाव डाल रहे हैं। विक्रमादित्य ने ऐसे अधिकारियों को सीधे -सीधे चेतावनी दी है कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर ऐसे अधिकारियों को ‘‘फटक-फटक’’ कर देख लेंगे। समझा जा रहा है कि विक्रमादित्य का यह इशारा प्रधान सचिव विजिलैन्स संजय कुण्डु की ओर है। क्योंकि उन्हें जयराम दिल्ली से अपने कार्यालय में तैनाती देने के नाम पर लाये हैं और मुख्यमन्त्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव के साथ प्रधान सचिव विजिलैन्स तथा मुख्यमन्त्री कार्यालय में गठित गुणवत्ता नियन्त्रण प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गयी है। वीरभद्र के कार्यकाल में गुणवत्ता का कितना ध्यान रखा गया है इसका प्रमाण टाऊनहॉल के उद्घाटन समारोह में मिल चुका है और शायद इस गुणवत्ता पर संजय कुण्डु ने संवद्ध अधिकारियों से पूछा भी है।
संजय कुण्डु के बाद विक्रमादित्य ने प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के अधीक्षण अभियन्ता रहे प्रवीण गुप्ता की नियुक्ति पर भी गंभीर सवाल उठाया है। प्रवीण गुप्ता को जयराम सरकार ने पिछले दिनों पर्यावरण विभाग में अतिरिक्त निदेशक लगाने के साथ ही पर्यटन विभाग में एडीवी पोषित परियोजनाओं का प्रभारी भी बनाया है। विक्रमादित्य ने आरोप लगाया है कि प्रवीण गुप्ता एक कनिष्ठ अधिकारी हैं और ऐसी नियुक्तियों से वरिष्ठ अधिकारियों का मनोबल गिरता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियुक्ति मुख्यमन्त्री के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों के कारण दी गयी है।
स्मरणीय है कि प्रवीण गुप्ता की पत्नी प्रदेश लोकसेवा आयोग की सदस्य है और जब वह पत्रकारिता में थी तब हॉलीलॉज से भी उनके अच्छे संबंध थे तथा अब इस सरकार से भी उनकी नजदीकीयां हैं। सत्ता से नजदीकीयों का लाभ हर सरकार में उठाया जाता है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण वीरभद्र के शासनकाल में उनके प्रधान निजी सचिव सुभाष आहलूवालिया की पत्नी मीरा वालिया की पहले शिक्षा नियामक आयोग और फिर प्रदेश लोक सेवा आयोग में नियुक्ति रही है। बल्कि इस नियुक्ति को प्रदेश उच्च न्यायायल में उसी दौरान चुनौती भी दे दी गयी थी और यह मामला अभी तक उच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है।
इसी के साथ विक्रमादित्य ने जयराम सरकार द्वारा बाबा रामदेव को लीज़ पर भूमि देने के मामले में भी सवाल उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस ज़मीन की लीज़ राशी 28 करोड़ बनती थी उसे महज़ दो करोड़ बीस लाख दे दिया गया जबकि बाबा रामदेव की गिनती आज देश के पहले दस बड़े उद्योगपत्तियों में होती है। इसलिये उन्हें यह रियायत नही दी जानी चाहिये थी लेकिन कांग्रेस शासन में भी यही रियायत रामदेव को दी जा रही थी तब विक्रमादित्य इस पर खामोश थे। विक्रमादित्य ने जयराम सरकार पर एक लाख तबादले करने का आरोप लगाने के साथ ही यह भी कहा कि शिक्षा विभाग और खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारियों में आपसी तालमेल न होने के कारण अब तक छात्रों को स्कूलों में बर्दी नही दी जा सकी है। दोनो विभागों के मन्त्रीयों में भी कोई तालमेल नही है। शिक्षा विभाग में घटे छात्रवृति घोटाले से लेकर बागवानी विभाग की 1134 करोड़ की परियोजना को भी तबाह कर दिये जाने का आरोप से पहले अपनी उपलब्धियों पर श्वेतपत्र जारी करने की भी मांग की है। कानून और व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए विक्रमादित्य ने कसौली में नगर नियोजन विभाग की अधिकारी शैल बाला और शिलाई में जिन्दान की हत्या के मामले उठाते हुए सरकार द्वारा राजीव बिन्दल और किश्न कपूर के मामले वापिस लिये जाने पर भी एतराज जताया।
विक्रमादित्य के तेवर काफी तल्ख रहे हैं और संजय कुण्डु तथा प्रवीण गुप्ता पर उनका निशाना साधना सीधे मुख्यमन्त्री पर हमला माना जा रहा है। लेकिन इस हमले का जबाव सरकार या भाजपा की ओर से न आना और भी कई सवाल खड़े कर देता है। बल्कि स्वयं मुख्यमन्त्री ने भी जो जबाव दिया है वह भी काफी कमजो़र माना जा रहा है यह कहा जाता रहा है कि इस संद्धर्भ में मुख्यमन्त्री को उनके अधिकारियों द्वारा वांच्छित जानकारियां नही दी जा रही है। विक्रमादित्य की इस प्रैसवार्ता के बाद सियासी हल्कों में यह अटकलें तेज हो गयी हैं कि आने वाले लोकसभा चुनावों में मण्डी से कांग्रेस का उम्मीदवार वीरभद्र परिवार का ही कोई सदस्य होगा और यह सदस्य विक्रमादित्य सिंह भी हो सकते हैं। क्योंकि विक्रमादित्य के बाद वीरभद्र सिंह ने भी ठियोग में जयराम सरकार पर हमला बोला है। मण्डी में जब सत्तपाल सत्ती ने रामस्वरूप शर्मा की पुनः प्रत्याशी बनाये जाने की घोषणा की थी तब उस पर पंडित सुखराम ने जिस तरह से इस घोषणा पर सवाल उठाया था उससे स्पष्ट हो जाता है कि मण्डी भाजपा के लिये कठिन होने जा रही है। इस परिदृश्य में यदि जयराम सरकार समय रहते न संभली तो वीरभद्र परिवार के बदलते तेवर उसके लिये खतरे के संकेत हो सकते हैं।

बैंक प्रबन्धक के सहयोग से ऊना में चार लोग हुए एक शाहिद के षडयंत्र का शिकार पुलिस ने शिकायत मिलने के बावजूद नही किया मामला दर्ज

शिमला/शैल। कुछ शातिर लोग केन्द्र सरकार की योजनाओं का दुरूपयोग करके आम आदमीयों को अपनी जालसाजी का शिकार बना रहे हैं और इसमें बैंक प्रबन्धन भी सहयोगी बन रहा है तथा प्रशासन भी ऐसे षडयंत्र पर आखें बन्द करके बैठ गया है। इसका एक किस्सा ऊना की रक्कड़ कालोनी में सामने आया है जहां एक मोहम्मद शाहिद हुसैन और उसकी पत्नी ने केनरा बैंक प्रबन्धन के सहयोग से पांच लोगों को अपना शिकार बना लिया है। इस किस्से की हद तब हो गयी जब स्थानीय पुलिस ने इसकी शिकायत मिलने के बावजूद इस मामले में कोई केस दर्ज नही किया जबकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार पुलिस को उसे मिली हर शिकायत पर एक सप्ताह के भीतर मामला दर्ज करना होता है और यदि वह ऐसा न करे तो उसे शिकायतकर्ता को इसका कारण लिखित में सूचित करना होता है। यह किस्सा क्या है और कैसे घटा यह जानने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि केन्द्र सरकार की वह योजना कौन सी है जिसके तहत यह घटा है।
केन्द्र सरकार की स्मॉल, माईक्रो और मीडियम उद्य़ोगों को प्रोत्साहन एवम् संरक्षण देने की योजना है। यह योजना 2006 में अधिसूचित हुई थी। इसके तहत उद्योग लगाने वाले व्यक्ति को दो करोड़ ऋण लेने के लिये किसी भी तरह की धरोहर/संपत्ति को बैंक में गिरवी रखने की आवश्यकता नही थी क्योंकि इसके लिये सरकार ने एक CGTMSE(Credit Guarntee Fund trust for Micro and small Entetprises)  स्थापित कर रखा था। इस योजना के तहत स्थापित यदि कोई इकाई डिफाल्टर हो जाती है तो यह ट्रस्ट ऋण देने वाले बैंक को उसकी 50/75/80/85 प्रतिशत तक भरपाई करता है। इस योजना में 7-1-2009 को संशोधन करके ट्रस्ट की जिम्मेदारी 62.50% से 65% तक कर दी गयी थी। इसके बाद 16-12-2013 को इसमें फिर संशोधन हुआ और ट्रस्ट की जिम्मेदारी 50% तक कर दी गयी। इस योजना के तहत स्थापित हो रही इकाई और उसको स्थापित करने वाले का आकलन करना और उससे पूरी तरह आश्वस्त होना यह जिम्मेदारी ऋण देने वाले बैंक प्रबन्धन की थी। अभी पिछले दिनों मोदी सरकार ने भी इसी योजना के तहत 59 मिनट में एक करोड़ का ऋण देने की घोषणा की है। यह इसी आधार पर संभव है कि ऋण लेने वाले को कुछ भी धरोहर के रूप में बैंक के पास गिरवी नही रखना है केवल बैंक प्रबन्धन को ऋण लेने वाले और उसकी योजना से आश्वस्त होना है। केन्द्र सरकार की यह एक बहुत बड़ी योजना है और इसके लिये एक पूरा मन्त्रालय स्थापित है। वीरभद्र सिंह भी इसके केन्द्र में मन्त्री रह चुके हैं। इस योजना की पूरी जानकारी आम आदमी से ज्यादा बैंको के पास है और एक तरह से उन्हें ही लोगों को इसके लिये प्रोत्साहित करना है।
जब सरकार उद्योग स्थापित करने के लिये इस तरह की सहायता का आश्वासन देगी तो यह स्वभाविक है कि कोई भी आदमी इसका लाभ उठाना चाहेगा। इसी का फायदा उठाकर मोहम्मद शाहिद हुसैन ने पांच अलग नामों से उद्योग इकाईयां स्थापित की। शाहिद हुसैन हिमाचल का निवासी नही था और यहां पर उसके पास कोई संपत्ति नही थी। इसलिये उसे यहां पर उद्योग लगाने के लिये स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी चाहिये थी। इस हिस्सेदारी को हासिल करने के लिये उसने स्थानीय लोगों से मित्रता बनानी आरम्भ कर दी और सबको अपना परिचय एक मुस्लिम बुद्धिजीवि शायर के रूप में दिया। उसकी शायरी से प्रभावित होकर कुछ लोग उसके प्रभाव में आ गये। प्रभाव में आने के बाद उसने इन लोगों को केन्द्र की इस उद्योग योजना की जानकारी देना शुरू किया। इसका विश्वास दिलाने के लिये केनरा बैंक के प्रबन्धक एस के भान से मिलाना शुरू किया। बैंक मैनेजर ने भी लोगों को इस योजना की जानकरी दी और बताया कि इसमें उन्हे ऋण लेने के लिये कुछ भी गिरवी रखने की आवश्यकता नही है। स्वभाविक है कि जब ऋण देने वाला बैंक भी ऐसी योजना की पुष्टि करेगा तब आदमी उद्योग लगाने के लिये तैयार हो ही जायेगा। उद्योग इकाईयां स्थापित कर ली यह इकाईयां आर आर वी क्रियेशनज़, रामगढ़िया इन्टरप्राईज़िज, बाला जी इन्टर प्राईज़िज, आर के इन्डस्ट्रीज और पारस होम एप्लांईसेज़ शाहिद के षडयन्त्र का असली चेहरा पासर होम एप्लॉंईसैज मे सामने आया। यहां पर उसने पीयूष शर्मा को अपना हिस्सेदार बनाया। पीयूष के पिता कुलदीप शर्मा का यहां एक होटल और अपना बड़ा मकान है। शाहिद की नज़र इस संपत्ति पर आ गयी। उसने पीयूष को पार्टनर बनाकर जून 2013 में केनरा बैंक से ऋण स्वीकृत करवा लिया। फिर नवम्बर 2013 में पीयूष के पिता कुलदीन शर्मा को यह कहानी गढ़ी कि उसे 1.10 लाख यू एस डॅालर का आर्डर मिला है और इस आर्डर को पूरा करने के लिये उसे एक करोड़ के अतिरिक्त ऋण की आवश्यकता है यदि कुलदीप शर्मा इस ऋण के लिये अपना मकान कुछ समय के लिये बैंक में गिरवी रखने को तैयार हो जायें तो यह आसान हो जायेगा। बेटे के भविष्य को ध्यान में रखते हुए वह इसके लिये तैयार हो गये। शाहिद उन्हें केनरा बैंक ले गया वहां बैंक प्रबन्धक ने भी इसकी पुष्टि कर दी और कुलदीप को मकान मारटगेज करने के लिये राजी कर लिया। 9.12.2013 को यह मारटगेज डीड साईन हो गयी। यह डीड साईन होने के बाद अन्य इकाईयांं की जानकारी सामने आयी और कुलदीप के बेटे ने शाहिद के साथ अपनी पार्टनरशिप भंग कर दी। कुलदीप शर्मा ने बैंक को यह मारटगेज डीड रद्द करने के लिये लिखित में दे दिया क्योंकि इस डीड के एवज में बैंक ने कोई अतिरिक्त ऋण जारी नहीं किया था। बैंक के साथ ही कुलदीप ने संबन्धित तहसीलदार को भी सूचित कर दिया कि यह इस डीड पर अमल न करे। लेकिन तहसीलदार ने कुलदीप के आग्रह को नजरअन्दाज करके मकान बैंक के नाम लगा दिया। इस सारे किस्से की पुलिस को भी लिखित में शिकायत दे दी गयी लेकिन पुलिस ने आज तक शाहिद और बैंक प्रबन्धन के खिलाफ कोई मामला दर्ज नही किया है।
कुलदीप जैसा ही व्यवहार अन्य तीन लोगों के साथ भी हुआ है वह भी पुलिस को शिकायत कर चुके हैं लेकिन कोई कारवाई सामने नही आयी है। अब यह भी सामने आया है कि आर के इन्डस्ट्रीज़ शाहिद की पत्नी के नाम है लेकिन यह इकाई केवल कागजों में ही कही जा रही है और इसी केनरा बैंक प्रबन्धन ने इस ईकाई के नाम पर भी कोई 50 लाख का ऋण दे रखा है। इन सारे उद्योगों को इसी बैंक से करीब दो करोड़ का ऋण दिया जा चुका है और इन उद्योगों में हिस्सेदार बनाये गये सारे स्थानीय लोग इस षडयन्त्र का शिकार हो चुके हैं। यह सारे ऋण एक ही बैंक प्रबन्धक द्वारा दिये जाना यह प्रमाणित करता है कि यह एक सुनियोजित षडयन्त्र है जिसमें बैंक प्रबन्धक की सक्रिय भूमिका रही है। अब जब पुलिस शिकायत मिलने के बाद भी मामला दर्ज नही कर रही है तब पुलिस की भूमिका भी सन्देह के घेरे में आ गयी है। इस षडयन्त्र का शिकार हुए लोगों की हताशा कब क्या गुल खिला दे इसका अनुमान लगाना कठिन है।

CGTMSE -Credit Guarantee Fund trust for Miicro and Small Enterprises
A special protection is given to the micro, small and Medium enterprises via the MSME Act, 2006. These are small scale industries which require immunity and special protection to flourish. These industries from the very backbone of our Indian Economy.One of the government- sponsored schemes for MSMEs is the CGTMSE (Credit Guarantee Fund Trust for Micro and small Enterprises).
What is the CGTMSE?
The whole idea behind this trust is to provide financila assistance to these industies without any third party guarantee/ or collateral. These schemes privide the assurance to the lenders that in case of default by them a guarantee cover will be provided by trust in the ration of 50/75/80/85 percent of the amount so given.


एक वर्ष पूरा होने पर मनाया जा रहा जश्न सरकार के कामकाज का आडिट साबित होगा

शिमला/शैल। जयराम सरकार का सत्ता में एक वर्ष पूरा होने जा रहा है। इस अवसर पर सरकार धर्मशाला में एक बड़ा जश्न आयोजित करने जा रही है। इस मौके पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। अगले वर्ष मई में लोकसभा के चुनाव होने हैं और इस बार भाजपा ने 300 सीटें जीतने का लक्ष्य बहुत पहले से ही घोषित कर रखा है। लेकिन अब पांच राज्यों मे मिली हार के बाद प्रधानमन्त्री और अमितशाह इस लक्ष्य को कैसे प्रस्तुत करते हैं इस पर सबकी निगाहें रहेंगी। पिछले चुनावों में भाजपा को प्रदेश की चारों सीटों पर जीत हासिल हुई थी और तब प्रदेश में वीरभद्र के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी जबकि अब तो प्रदेश में भाजपा की ही सरकार है। ऐसे में सरकार को फिर से यह जीत हासिल करने में कोई कठिनाई नही होनी चाहिये। लेकिन जिस ढंग से प्रदेश में सरकार और पार्टी चल रही है उसको लेकर पार्टी के भीतर ही एक बड़ा वर्ग यह मान रहा है कि इस बार यह जीत आसान नही होगी।
सरकार ने इस जश्न के मौके पर सारे विभागों को निर्देश दिये हैं कि वह एक वर्ष की अपनी उपलब्धियों की प्रदर्शनी लगाकर जनता को इसकी जानकारी दें। सभी विभागों से कहा गया है कि इन उपलब्धियों को लेकर अपने विभाग की एक लघुपुस्तिका भी छापें। इस पुस्तिका की संख्या 25 से 30 हजार के बीच रखने का लक्ष्य रखा गया है। यह भी निर्देश दिये गये हैं कि विभाग अपनी योजनाओं के लाभार्थियों को भी इस जश्न में लायें। सरकार का प्रयास कितना सफल होता है इसका आंकलन तो जश्न के बाद ही हो पायेगा। लेकिन इस जश्न के मौके पर जो पुस्तिकायें प्रसारित की जायेंगी उनमें दर्ज तथ्यों की प्रमाणिकता को परखने का आगे मौका मिल जायेगा। केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं से सही में कितनों को लाभ पहुंचा है उसकी शिनाख्त भी आसानी से हो जायेगी। इस नाते यह जश्न सरकार के कामकाज का आडिट भी बन जायेगा। क्योंकि जो भी उपलब्धियां इसमें जनता के सामने रखी जायेंगी उनकी सत्यता की पड़ताल करना आसान हो जायेगा।
जंहा सरकार इस मौके पर अपनी उपलब्धियों का पिटारा जनता के सामने रखने जा रही है वहीं पर कांग्रेस इसी दिन सरकार के खिलाफ आरोपपत्र लेकर आ रही है। इसमें यह देखना दिलचस्प होगा कि उपलब्धियों का पलड़ा भारी रहता है या आरोपपत्र का। अभी शीत सत्र में पहले ही दिन सरकार द्वारा रामदेव के पंतजलि योग पीठ को लीज पर करीब 96 बीघा ज़मीन देना विशेष रूप से उठा। इसमें जब पंतजलि योगपीठ ने 2017 में प्रदेश उच्च न्यायालय से अपनी याचिका बिना शर्त वापिस ली थी तब सरकार ने इस लीज़ पर पुनः विचार करते हुए उपायुक्त सोलन को निर्देश दिये थे कि वह नये सिरे से लीज़ दस्तावेज तैयार करे। इन निर्देशों की अनुपालना करते हुए पट्टा नियम 2013 के नियम 8(1) और (II) के प्रावधानों के अनुसार इसकी गणना करतें हुए वार्षिक पट्टा राशी 1,19,52,360/-रूपये तय की थी और इस राशी पर हर पांच वर्ष बाद 5% की बढौत्तरी करने का प्रारूप सरकार और योगपीठ को भेजा था लेकिन इस प्रारूप के हस्ताक्षरित होने से पहले ही सत्ता परिवर्तन हो गया। सत्ता परिवर्तन के बाद अक्तूबर 2018 मे योगपीठ से सरकार को पत्र लिखकर यह आग्रह किया कि 1,19,52,360 /- रूपये की राशी बहुत अधिक है अतः इसे कम करने पर विचार किया जाये। योगपीठ के इस आग्र्रह पर जयराम सरकार ने इस पर पुनः विचार किया। यह विचार 2016 में संशोधित किये गये पट्टा नियमों के अनुसार किया गया। इन नियमों में स्वास्थ्य अवसंरचना के विकास हेतु लायी गयी योजनाओं को विशेष छूट देने का प्रावधान है। इस प्रावधान का प्रयोग करते हुए लीज़ पर दी जाने वाली 96 बीघे ज़मीन की कुल कीमत 11,95,23,600 /- रूपये आंकी गयी और इस इस कीमत का कुल 20% ही योगापीठ से एकमुश्त लेने का निर्णय लिया गया। इस तरह 2017 में जो लीज़ राशी प्रति वर्ष 1,19,52,360/- ली जानी उपायुक्त सोलन ने आकलित की थी वह अब केवल एक मुश्त 2,39,04,720 रूपये ली जायेगी। यहां पर यह सवाल उठता है कि क्या योगपीठ जैसा व्यापारिक संस्थान इस तरह की छूट का पात्र हो सकता है। यही नहीं अभी सरकार नगर निगम शिमला क्षेत्र में ही संघ परिवार की दो ईकाईयों को करीब 24000 वर्ग मीटर भूमि देने जा रही है। जिलाधीश शिमला ने इसके लिये नगर निगम से अन्नापत्ति प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया है क्या इन इकाईयों को इतनी ज़मीन दी जा सकती है यह एक और सवाल खड़ा हो गया है। माना जा रहा है कि यह सारे आरोप कांग्रेस के आरोपपत्र में दर्ज रहेंगे। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर यह दावा करते आ रहे हैं कि उन्हे विभिन्न योजनाओं के लिये केन्द्र से 9000 करोड़ की धनराशी मिलने का आश्वासन मिल चुका है। लेकिन यह योजनाएं कौन सी है इनका विवरण सरकार की ओर से नही दिया गया है। इसी तरह जिन राष्ट्रीय उच्च मार्गों के मिलने का दावा सरकार अब तक करती आ रही है उनकी डिटेल भी अब तक जारी नही हो पायी है। अभी तक सरकार स्कूली बच्चों को बर्दीयां उपलब्ध नही करवा पायी है। क्योंकि सरकार एकमुश्त तीन वर्ष की खरीद इकट्ठी ही कर लेना चाहती है। दूसरी ओर से अभी तक स्कूलों में अध्यापकों और अस्पतालों में डाक्टरों की कमी को पूरा नही किया जा सका है। मुख्यमन्त्री ने तीन महीने पहले यह दावा किया था कि दस दिनों के भीतर प्रदेश की सड़कों के गड्डे भर दिये जायेंगे लेकिन मुख्यमन्त्री का यह दावा हकीकत में कितना पूरा हो पाया है इसका प्रमाण शिमला, धर्मशाला उच्च मार्ग का शालाघाट से नम्होल तक का हिस्सा ब्यान कर देता है। इस परिदृश्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार के एक वर्ष पूरा होने पर उपलब्धियां या आरोप किसका पलड़ा भारी रहता है क्योंकि दोनो एक साथ जनता के सामने आयेंगे।

दूसरी एफआईआर रद्द होने के बाद धूमल फिर होंगे प्रदेश भाजपा की केन्द्रिय धूरी

शिमला/शैल। एचपीसीए और अनुराग ठाकुर के खिलाफ धर्मशाला राजकीय महाविद्यालय के आवासीय परिसर को गिराने तथा उसकी 720 वर्ग मीटर भूमि पर नाजायज़ कब्जा करने को लेकर दर्ज हुई एफआईआर को भी सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया है। यह फैसला 6-12-2018 को आया है। स्मरणीय है कि जब एचपीसीए के खिलाफ दर्ज हुई पहली एफआईआर को सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द किया था तब फैसले में इस दूसरी एफआईआर को भी साथ रद्द कर दिये जाने का उल्लेख फैसले में आ गया था और आम आदमी में चला गया था कि दोनों ही एफआईआर एक साथ ही रद्द हो गयी है। इस पर वीरभद्र सिंह के वकील ने एतराज जताया और सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अपनी भूल मानते हुए स्पष्ट किया था कि दूसरी एफआईआर रद्द नहीं हुई है। यह दूसरी एफआईआर अब छः दिसम्बर को रद्द हुई है। स्मरणीय है कि वीरभद्र के शासनकाल में विजिलैन्स का सारा समय और ध्यान एचपीसीए और अनुराग ठाकुर तथा प्रेम कुमार धूमल के खिलाफ ही मामले खड़े करने में ही गुजरा है। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय में भी इन मामलों को जायज ठहराने के लिये वीरभद्र सिंह के वकील ने बहुत प्रयास किया जो कि सफल नही हो सका। इस पृष्ठभूमि में यह मामले और इन पर आया सर्वोच्च न्यायालय का फैसला प्रदेश की राजनीति पर गहरा प्रभाव डालेगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। क्योंकि इन मामलों को वापिस लेने की बात तो जयराम सरकार करती रही है लेकिन व्यवहारिक तौर पर सीआरपीसी की धारा 321 के तहत औपचारिक आवेदन नही कर पायी थी।

विधानसभा चुनावों के दौरान जब भाजपा हाईकमान को यह लगा था कि प्रदेश का नेता घोषित किये बिना चुनावों में जीत की सुनिश्चितता तय नही हो सकती तब प्रेम कुमार धूमल को भावी मुख्यमन्त्री घोषित किया गया था। नेता घोषित होने के बाद धूमल ने किस कदर पूरे प्रदेश में प्रचार अभियान को नया अंजाम दिया और इस घोषणा पर प्रदेश भाजपा के किन नेताओं की प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष क्या प्रतिक्रिया रही है इसे राजनीतिक विश्लेषक अच्छी तरह जानते हैं। कांग्रेस और विशेषकर वीरभद्र सिंह, धूमल को किस तरह देखते हैं इसका अन्दाजा भी इसी से लगाया जा सकता है कि जब दूसरी एफआईआर के रद्द होने के उल्लेख को सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी भूल माना था तब इस पर वीरभद्र सिंह की प्रतिक्रिया कितनी व्यंग्यात्मक आई थी। धूमल और अनुराग के खिलाफ इन एफआईआर को बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में देखा जा रहा था। यह चर्चा आम थी कि इस एफआईआर के माध्यम से अनुराग को आगे हमीरपुर से प्रत्याशी बनने से रोका जायेगा और इस तरह से धूमल परिवार को आसानी से प्रदेश की सक्रिय राजनीति से बाहर कर दिया जायेगा। जयराम सरकार बनने के बाद जिस तरह से जंजैहली में एसडीएम कार्यालय को लेकर लोगों में विवाद खड़ा हुआ और धरना प्रदर्शनों से लेकर उच्च न्यायालय तक मामला पहुंच गया था तब कुछ हल्कों में इस प्रकरण में धूमल की अपरोक्ष भूमिका को लेकर कई चर्चाएं उठ खड़ी हुई थी। इन चर्चाओं ने किस तरह का राजनीतिक आकार ले लिया था इसका खुलासा इसी से हो जाता है कि धूमल को उस समय यहां तक कहना पड़ गया था कि सरकार चाहे तो उनकी भूमिका की सीआईडी से जांच करवा ली जाये। जयराम और धूमल के राजनीतिक रिश्तों का इससे पूरा खुलासा हो जाता है। यह सही है कि अगर धूमल जीत गये होते तो वही मुख्यमन्त्री होते। इसी के साथ यह भी उतना ही सच है कि आज जयराम मुख्यमन्त्री हैं और वह भी अब आसानी से इस पद को छोड़ना नही चाहेंगे। लेकिन इस सबके साथ यह भी उतना ही बड़ा सच है कि पार्टी में जो लोग इस समय जयराम के ही केन्द्र या राज्य विधानसभा में पहुंचे हुए हैं। वह भी स्वभाविक रूप से यह पद पाने की ईच्छा पाले हुए हैं ऐसे में जयराम कुर्सी को कांग्रेस की बजाये भाजपा के अपनों से ही सबसे पहले खतरा है। अब लोकसभा चुनाव होने हैं और यह चुनाव जयराम सरकार की पहली राजनीतिक परीक्षा सिद्ध होंगे। एफआईआर रद्द होने के बाद अब अनुराग के पुनः उम्मीदवार होने को लेकर कोई संशय नहीं रह गया है बल्कि इस एफआईआर का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द किया जाना धूमल, अनुराग और भाजपा के हाथ कांग्रेस विशेषकर वीरभद्र के खिलाफ एक बहुत बड़ा हथियार लग जाता है। इससे कांग्रेस के खिलाफ शीर्ष अदालत का फतवा बन जाता है कि किस तरह राजनीतिक विरोधीयों के खिलाफ आपराधिक मामले बनाये जा रहे थे। इस मामले को जयराम और भाजपा कितनी राजनीतिक हवा दे पाते हैं इसका पता आने वाले दिनों मे लग जायेगा। वैसे इस पर अभी तक भाजपा की चुप्पी रहस्य बनी हुई है।
यही नहीं पिछले दिनों राज कुमार राजेन्द्र सिंह को लेकर जो सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है वह वीरभद्र की पूरी राजनीतिक कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर जाता है क्योंकि राजेन्द्र सिंह के पूरे अदालती आचरण को शीर्ष अदालत ने फाड़ की संज्ञा दी है लेकिन इस अहम मुद्दे पर भी जयराम और उनकी भाजपा अभी तक चुप है। इस चुप्पी को लेकर जयराम और वीरभद्र के राजनीतिक रिश्तों को विश्लेषक अलग ही अर्थ दे रहे हैं। इस परिदृश्य में जयराम सरकार लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को कैसे और किन मुद्दों पर घेरेगी यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है। क्योंकि अभी तक भाजपा अपने ही आरोप पत्र पर कोई परिणाम सामने नहीं ला पायी है बल्कि कई मुद्दों पर तो बड़े बाबूओं ने जयराम से ऐसे भी फैसले करवा दिये हैं जो उनकी पूरी चार्जशीट की ही हवा निकाल देते हैं। भाजपा का यह आरोप पत्र उसके अपने ही गले की फांस सिद्ध हो सकता है। उपर से वीरभद्र की ‘‘ना’’ के बावजूद कांग्रेस जयराम सरकार के खिलाफ एक सशक्त आरोपपत्र ला रही है। ऐसे में जयराम या उनकी टीम का कोई भी सदस्य ऐसा नही लग रहा है कि जो वीरभद्र को पूरी ताकत से घेर सकेगा। हिमाचल के वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस एक बार फिर वीरभद्र के आगे बौनी पड़ गयी है। ऐसे में भाजपा में एक बार फिर यह हालात पैदा हो गये हैं कि यदि लोस चुनावों की बागडोर धूमल नही संभालते हैं तो भाजपा की स्थिति बहुत नाजुक हो जायेगी।

आईजीएमसी में टर्शरी कैंसर सैंटर का निर्माण हुआ लाल फीताशाही का शिकार

शिमला/शैल। राजधानी स्थित इन्दिरा गांधी मैडिकल कॉलिज में तीन साल पहले 45 करोड़ के निवेश से कन्द्रे ने टर्शरी कैंसर सैन्टर खोले जाने को स्वीकृति दी थी। इसके लिये 15 करोड़ की पहली किश्त भी जारी कर दी गयी थी जो आज तक बिना खर्च किये पड़ी हुई है। यह सैन्टर तीन साल में बनकर तैयार होना था। यदि ऐसा नही हो पाता है तो यह स्वीकृति 31 मार्च 2019 को समाप्त हो जायेगी और यह 45 करोड़ लैप्स हो जायेगा। अभी 2018 का दिसम्बर चल रहा है और इस सैन्टर के नाम पर अब तक एक ईंट भी नहीं लग पायी है जब यह सैंटर स्वीकार हुआ था तब शिमला में एनजीटी की ओर से निर्माणों पर कोई प्रतिबन्ध नही था। लेकिन एनजीटी के फैसले के अनुसार ऐसे सरकारी निर्माणों को इस प्रतिबन्ध से बाहर रखा गया है जो आवश्यक और आपात सेवाओं के दायरे में आते हैं। इस तरह इस सैन्टर के निर्माण में एनजीटी के फैसले में कोई बाधा नही हैं केवल इस फैसले के तहत निर्माणों की स्वीकृति देने के लिये बनाई कमेटीयों के पास इसका प्रारूप जाना है। दुर्भाग्य है कि प्रदेश की अफसरशाही अभी तक इसके प्रारूप को इन कमेटीयों तक नही ले जा पायी है। दुर्भाग्य तो यह है कि प्रदेश की जयराम सरकार के स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार को 45 करोड़ से इंदिरा गांधी मेडिकल कालेज में बनने वाले टर्शरी कैंसर सेंटर का स्टेटस ही नहीं पता है। जयराम सरकार को सत्ता में आए हुए एक साल हो गया लेकिन न तो मुख्यमंत्री व न ही मंत्री की अपने विभागों पर पकड़ बनी है।
राजधानी में प्रेस क्लब शिमला की ओर से आयोजित मीट द मीडिया कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्री परमार से पूछा गया कि आइजीएमसी टर्शरी कैंसर सेंटर का निर्माण जयराम सरकार एक साल के कार्यकाल में क्यों शुरू नहीं कर पाई। परमार ने कहा कि इस मामले को मंजूरी के लिए एनजीटी को भेज दिया है। उन्होंने कहा कि यह सेंटर कोर एरिया में बन रहा है ऐसे में एनजीटी की इजाज़त लेनी जरूरी है। यह पूछने पर कि एनजीटी में सरकार की ओर से दायर अर्जी सुनवाई के लिए कब लगी है उन्होंने कहा कि सुपरवाइजरी कमेटी ने छः नवंबर को इस सेंटर को हरी झंडी दे दी है।
मंत्री परमार को इस टर्शरी कैंसर सेंटर के बारे में कुछ भी पता नहीं है। यहां तक जब मंत्रा ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक की थी तो भी यह सेंटर एजेंडे में नहीं था।
जबकि सही तस्वीर यह है कि बड़ी जददोजहद के बाद इस मसले पर एनजीटी के फैसले के बाद मार्च में गठित इंप्लीमेंटेशन कमेटी की 2 नवंबर को हुई बैठक में इस मसले पर मौखिक चर्चा हुई थी। चूंकि मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और मंत्री से लेकर अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य के एजेंडे में यह महत्वपूर्ण सेंटर पिछले एक साल से है ही नहीं। ऐसे में दो नवंबर की बैठक में इस मसले को ले जाने के लिए औपचारिकताएं ही पूरी नहीं की जा सकी थी। इसके बाद तीन महीने में एक बार होने वाली सुपरवाइजरी कमेटी की बैठक 13 नवंबर को रखी गई थी। इस बैठक से पहले इस मसले को सर्कुलेशन से इंप्लीमेंटेशन कमेटी के सदस्यों को भेजा गया 13 नवंबर को सुपरवाइजरी कमेटी ने इस पांच मंजिलें सेंटर को बनाने के लिए हरी झंडी दे दी। लेकिन सिफारिश की कि स्वास्थ्य विभाग इस मसले को आखिरी मंजूरी के लिए एनजीटी के समक्ष ले जाए। लेकिन 13 नवंबर से लेकर अब तक कहीं कुछ नहीं हुआ है।
सुपरवाइजरी कमेटी की प्रोसीडिंग्ज अब निकलनी हैं। हालांकि सुपरवाइजरी कमेटी के सदस्य सचिव की ओर से मामला नगर निगम को भेजा गया है। अब यह मामला नगर निगम में लटका है। मामला आइजीएमसी तक नहीं पहुंचा है। यह मामला नगर निगम से आइजीएमसी के पास जाएगा व आइजीएमसी इसे सचिवालय अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य के पास एनजीटी के समक्ष उठाने को ले जाएगा। लेकिन अभी कुछ नहीं हुआ। आइजीएमसी के अधिकारियों ने माना कि मामला उनके पास नहीं आया है।
ऐसे में जयराम सरकार के स्वास्थ्य मंत्री गलत जानकारी सार्वजनिक कर रहे हैं। असल में उन्हें इस मामले को लेकर कुछ पता ही नहीं है। हालांकि मीट द मीडिया में उन्होंने यह भरोसा जरूर दिया कि इस पैसे को लैप्स नहीं होने दिया जाएगा। अगर इस सेंटर का काम शुरू नहीं हुआ तो यह पैसा 31 मार्च 2019 को लैप्स हो जाएगा। इस सेंटर को 15 करोड़ की किश्त तीन साल पहले आ चुकी है। पहले पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने इस सेंटर को लटकाया व जयराम सरकार इसे तरजीह नहीं दे रही है। मार्च से लेकर अब तक सरकार बुहत कुछ कर सकती थी। इंप्लीमेंटेशन कमेटी व सुपरवाइजरी कमेटी से भी यह मसला मीडिया के दखल के बाद आगे बढ़ा है।

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