शिमला/शैल। नगर निगम शिमला में प्लानिग एरिया के अन्दर घरेलू उपयोग, व्यवसायिक उपयोग और निर्माणों के लिये पानी का कनैक्शन प्राप्त करने के लिये कोई भी स्वीकृत नियम नही हैं। यह जानकारी नगर निगम ने डा. बंटा को आरटीआई के तहत उपलब्ध करवाई हैं। नगर निगम शिमला में पिछले दिनां हुआ पेयजल संकट अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा में रहा हैं। क्योंकि इस संकट पर एक पखवाडे़ तक प्रदेश उच्च न्यायालय ने लगातार मामले की सुनवाई की और कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश संजय करोल ने स्वयं सड़क पर निकलकर इस समस्या की गंभीरता की व्यक्तिगत स्तर पर जानकारी हासिल की। यही नही शिमला में लोगों को किन दरां पर पानी की सप्लाई की जा रही है इसको लेकर भी विवाद चल रहा है। विधानसभा तक को निगम की ओर से यह जानकरी दी गयी है कि पानी का बिल मीटर रिडिंग पर दिया जा रहा है जबकि यह बिल फलैट रेट पर दिये जा रहे हैं।
आम आदमी की यह धारणा है कि निगम घरेलू, व्यवसायिक और भवन निर्माण कार्यो के लिये अलग- अलग दरां पर बिल देता है एक से अधिक कनैक्शन नही दिये जाते है। लेकिन यह सारी धारणा आरटीआई में आयी जानकारी के बाद एकदम धराशायी हो जाती हैं। होटल लैण्डमार्क के संद्धर्भ में मांगी गयी जानकारी में यह सूचना आयी है कि पानी का कनैक्शन देने के लिये प्लानिग एरिया मे नगर निगम शिमला के पास कोई स्वीकृत निमय नही हैं। सबकुछ संबधित अधिकारी की ईच्छा पर ही निर्भर करता है। होटल लैण्डमार्क को पांच कनैक्शन दिये गये है जिसमें कुछ कनैक्शन होटल लैण्डमार्क के नाम पर तथा कुछ टी.आर. शर्मा और विनोद अग्र्रवाल के नाम पर है। एक ही होटल में अगल-अगल नामों पर पाये गये कनैक्शनों से यह प्रमाणित हो जाता है कि वास्तव में ही कोई नियम नही है।

शिमला/शैल। एच.पी.सी.ए. सोसायटी है या कंपनी यह विवाद पिछले छः वर्ष से भी अधिक सयम से आर.सी.एस. की अदालत में लंबित चला आ रहा है। जबकि एच.पी.सी.ए. को लेकर विजिलैन्स ने कई मामले दर्ज किये और उनके चालान भी अदालत तक पंहुचा दिये है। लेकिन इस प्रकरण में जो पहली एफआईआर दर्ज हुई थी जिसमें सानन आदि कई अधिकारी भी बतौर दोषी नामज़द हैं। उसका चालान जब धर्मशाला के ट्रायल कोर्ट में पंहुचा था और उसका संज्ञान लेकर अदालत ने अगली कारवाई शुरू की थी तब इस मामले को उच्च न्यायालय में चुनौती देकर इस संद्धर्भ में दर्ज एफआईआर को रद्द किये जाने की गुहार एच.पी.सी.ए. के ओर से लगायी थी उच्च न्यायालय ने इस गुहार को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद इसकी अपील सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गयी थी । इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट की कारवाई स्टे कर दी थी। यह मामला अभी तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है।
अब जब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और जयराम सरकार ने घोषणा की कि राजनीतिक द्वेष से बनाये गये सारे मामले वापिस लिये जायेंगे तब सर्वोच्च न्यायालय में भी सरकार और एच.पी.सी.ए. दोनों की ओर से सरकार यह कथित फैसला सामने लाया गया। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सरकार मामला वापिस लेती है तो उसे कोई एतराज नही होगा। अन्यथा मामला मैरिट पर सुना जायेगा और उसका परिणाम कुछ भी हो सकता है। यहां यह भी स्मरणीय है कि इस मामले में एच.पी.सी.ए. ने वीरभद्र को भी उच्च न्यायालय में प्रतिवादी बनाया था और अब सर्वोच्च न्यायालय में भी वह पार्टी हैं । इस मामले मे जब भी सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुइ है तब तब वीरभद्र के वकील उसमें मौजूद रहे है। वीरभद्र इस मामले में दर्ज एफआईआर वापिस लिये जाने का विरोध करते आ रहे है। संभवता इसी कारण से मामला वापिस लेने की दिशा में सरकार की ओर से कोई व्यवहारिक कदम नही उठाया गया है। एच.पी.सी.ए. को अदालत ने अपने तौर पर मामला वापिस लेने का अवसर दिया था क्योंकि अपील में एच.पी.सी.ए.ही अदालत पंहुची है। इस वस्तुस्थिति में एचपीसीए ने अदालत से ही यह आग्रह किया है कि वही इस पर फैसला करे अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला कब और क्या आता है इस पर सबकी निगांहे लगी हुई है।
लेकिन इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय ने जो प्रदेश सरकारों और उच्च न्यायालयों को विधायकों /सांसदों के आपराधिक मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर सुनिश्चित करने के लिये विशेष अदालतें गठित करने के निर्देश दिये थे। उस पर क्या अनुपालना हुई है इस पर रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने इस पर केन्द्र सरकार से नाराज़गी भी जाहिर की है। यह विशेष अदालतें मार्च 2018 तक गठित की जानी थी। हिमाचल प्रदेश सरकार और उच्च न्यायालय की ओर से इस संद्धर्भ में कोई कदम नही उठाया गया है। इस संद्धर्भ में सर्वोच्च न्यायालय को एक रिपोर्ट जनवरी में भेजी गयी थी। जिसमें कहा गया था कि प्र्रदेश में विधायकों /सांसदों के खिलाफ 84 मामले हैं इनमें 20 मामले 2014 से पहले के हैं और 64 मामले उसके बाद के है। सर्वोच्च न्यायालय को भेजी गयी रिपोर्ट में सूत्रों के मुताबिक मामलों की संख्या तो दिखायी गयी है लेकिन इसके लिये विशेष अदालत बनाने की आवश्यकता है या नही इस बारे में कुछ स्पष्ट नही किया गया है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस संद्धर्भ में फिर कड़ा रूख अपनया है। माना जा रहा है कि अदालत के रूख को भांपते हुए सरकार ने एच.पी.सी.ए. का जो मामला आर.सी.एस.के पास लंबित चल रहा था उसे वहां से हटाकर मण्डलायुक्त शिमला को सौंप दिया है।
स्मरणीय है कि पिछले दिनों हुए प्रशासनिक फेरबदल में सरकार ने ऐसे अधिकारी को आर.सी.एस. लगा दिया जो स्वयं एच.पी.सी.ए. में दोषी नामजद है। ऐसे में उस अधिकारी के लिये यह मामला सुन पाना संभव नही था। इसमें दो बार इस मामले की पेशीयां लगी और दोनों बार उसे छुट्टी पर जाना पड़ा। अब उसने सरकार के सामने लिखित में जब यह वस्तुस्थिति रखी तब सरकार ने यह मामला मण्डलायुक्त को सौंप दिया हैं अब मण्डलायुक्त इसमें कितनी जल्दी फैसला देते हैं इस पर सबकी निगांहे लगी है।
शिमला/शैल। जयराम ने मुख्यमन्त्री गृहणी सुविधा योजना प्रदेश में शुरू कर रखी है। इस योजना के तहत महिलाओं को चूल्हे के धूंए से मुक्त करने के लिये मुफ्रत गैस कनैक्शन दिये जाने है। महिला सशक्तिकरण के नाम पर लायी गयी इस योजना का एक बड़ा लाभ पर्यावरण संरक्षण का भी होगा। क्योंकि इस समय खाना पकाने के लिये चूल्हा जलाने हेतु जो लकड़ी जलायी जाती है गैस कनैक्शन से उस लकड़ी की भी बचत होगी। यह योजना चालू करने के लिये यह भी एक बड़ा तर्क था। राजनीतिक दृष्टि से महिलाओं का विश्वास हासिल करने की दिशा में भी यह एक बड़ा कदम है।
इस समय प्रदेश में 14.77 लाख परिवार हैं इनमें से 1,17,239 परिवारों से गैस कनैक्शन के लिये सरकार के पास आवदेन आये हैं लेकिन इन आवदेनों में से केवल 32977 आवेदनों को ही स्वीकृत किया गया है। बाकि आवेदन अस्वीकार कर दिये गये हैं इनमें से भी केवल 930 को ही अभी तक यह कनैक्शन मिल पाये हैं शेष लोगों को कब कनैक्शन मिलेंगे और जो आवेदन अस्वीकार किये गये हैं उनका क्या आधार रहा है। इसका कोई खुलासा नही किया गया है। लेकिन 14.77 परिवारों में से जब किसी सुविधा के 1,17,239 परिवार आवेदन करते हैं तो यह एक बड़ी संख्या हो जाती है। लेकिन इस समय प्रदेश के 21 विधानसभा क्षेत्रों से कोई आवेदन ही नही आया है। इन विधानसभा क्षेत्रों में सरकार की इस योजना की अभी तक जानकारी ही नही हो पायी है या इन क्षेत्रों के लोग सरकार की इस सुविधा को लेना ही नही चाहते हैं यह अभी तक स्पष्ट नही हो पाया है। केवल 47 विधानसभा क्षेत्रों से ही इसके लिये आवदेन आये आंकड़ो के मुताबिक केवल 17 विधानसभा क्षेत्रों में ही इस योजना का आंशिक लाभ मिल पाया है।
ऐसे में यह एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आने वाले लोकसभा चूनावों में क्या सरकार इस योजना को भुना पायेगी? क्योंकि जिन लोगों को यह लाभ मिल गया है उनकी प्राथमिकता का आधार क्या रहा है और जिनके आवदेन ही अस्वीकार कर दिये गये हैं उनका क्या आधार। लोगों में तो योजना के लाभ आये हैं जो कुछ ही लोगों को मिल पाये है। यह आंकड़ेः
कुल आये जिनको गैस
आवेदन कनैक्शन
मिले
1.बिलासपुर
1. सदर 184 - 0
2. घुमारवी 205 -73
3. गेहड़वी 904 - 0
4. नैनादेवी 52 - 0
कुल 845 -73
2.चम्बा
1. चम्बा 120 -0
2. भरमौर 197 -55
3. भरियात 320 -0
4. डलहौजी 0 -0
5. चुराह 0 -0
कुल 637 -55
3. हमीरपुर
1. हमीरपुर 822 -0
2. भोरंज 1632 -103
3. बड़सर 385 -0
4. सुजानपुर 1341 -0
5. नादौन 236 -0
कुल 4416 103
4. लाहौल स्पिति
1. लाहौल स्पिति 0 -0
5 कांगड़ा
1. धर्मशाला शहरी 246 -1
2. शाहपुर 110 -12
3. नूरपुर 180- 0
4. इन्दौरा 130 -0
5. फतेहपुर 184 -0
6. ज्वाली 100- 0
7. देहरा 57 -0
8. जसवां परागपुर 120 -0
9. ज्वालामुखी 90 -0
10. जयसिंहपुर 5 -0
11. सुलह 196 -0
12. नगरोटा बगवां 350 -0
13. कांगड़ा 112 -0
14. पालमपुर 294- 0
15. बैजनाथ 170- 0
कुल 2392-13
6. किन्नौर
1. किन्नौर 499 -13
7. कुल्लु
1. कुल्लु 0- 0
2. मनाली 0- 0
3. बन्जार 119 -119
4. आनी 0 -0
कुल ---------------119- 119
8.मण्डी
1. सदर 0 -0
2. बल्ह 104 -104
3. सुन्दर नगर 0- 0
4. करसोग 0 -0
5. नाचन 0- 0
6. सिराज 1- 1
7. गोपालपुर 0- 0
8. धर्मपुर 0 -0
9. जोगिन्दर नगर 0- 0
10. द्रंग 0- 0
कुल 105 -105
9. सोलन
1. सोलन 519 -5
2. अर्की 1357 -39
3. कसौली 466 -0
5. दून 323 -106
5. नालागढ़ 380 -0
कुल 3045 -150
10. शिमला
1. शहर 21 -0
2. ग्रामीण 153 -101
3. कुसुम्पटी 107 -3
4. कुमारसेन 297 -1
5. चौपाल 60 -0
6.जुब्बल कोटखाई 78 -0
7. रोहडू 557-3
8. रामपुर 469 -0
कुल 1742-108
11. सिरमौर
1. नाहन 2905-0
2. पावंटा 1341 -102
3. शिलाई 2905- 0
4. रेणुका 5267 -0
5. पच्छाद 7076 -2
कुल 19576 -104
12. ऊना
1. गगरेट 100-100
2. चिन्तपुरणी 0 -0
3. हरोली 0- 0
4. ऊना 0- 0
5. कुटलैड़ 0- 0
कुल 100 -100
इन आंकड़ों के मुताबिक मण्डी, कुल्लु और ऊना में जितने आवदेन स्वीकृत हुए उन सबको कनैक्शन मिल गये हैं। जिन विधानसभा क्षेत्रों का आकड़ा शून्य है वहां पर आवेदन ही अस्वीकार कर दिये गये हैं लेकिन अस्वीकारता का कारण नही बताया गया है।
शिमला/शैल। कसौली गोली कांड प्रकरण के बाद जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस घटना को अदालत की अवमानना करार देते हुए इस पर अगली कारवाई शुरू की तब सरकार से चार बिन्दुओं पर रिपोर्ट तलब की थी। लेकिन जब सरकार की ओर से रिपोर्ट सौंपने की बजाये अदालत की खण्डपीठ से ही आग्रह कर डाला कि वह इस मामले की सुनवाई ही न करे तब सरकार के वकील को अदालत की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा था। इस प्रताड़ना के बाद पुनः अदालत ने सरकार को वांच्छित बिन्दुओं पर स्टे्टस रिपोर्ट का समय दिया है। सरकार के लिये यह स्थिति तब पैदा हुई जब एनजीटी के आदेशों की अनुपालना नही की गयी। स्मरणीय है कि कसौली के अवैध निर्माणों पर सबसे पहले एनजीटी का फैसला आया था। इस फैसले की सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गयी थी। जिसमें एनजीटी के फैसले को ही बहाल रखा गया था। इस तरह एनजीटी के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय की भी मोहर लग जाने के बाद जब इसकी अनुपालना के लिये कदम उठाये गये तब कसौली में गोली कांड घट गया। कसौली के बाद शिमला को लेकर भी पिछले साल दिसम्बर में एनजीटी का फैसला आ गया है। इस फैसले का रिव्यू एनजीटी में दायर किया गया था जो अस्वीकार हो चुका है। सरकार इस फैसले की अपील सर्वोच्च न्यायालय में दायर करने की बात कह चुकी है परन्तु अभी तक ऐसा हो नही पाया है।
इसी के साथ मुख्यमन्त्री कुल्लु में अवैध निर्माणों के दोषीयों को यह आश्वासन दे चुके हैं कि सरकार इस संबंध में एक कानून बनाकर इन निर्माणों को कानून के दायरे में लाकर राहत प्रदान करेगी। यहां यह गौरतलब है कि सरकार कानून लाकर इन अवैधताओं को राहत देने का प्रयास पहले भी कर चुकी है। लेकिन प्रदेश उच्च न्यायालय सरकार के इस प्रयास को निरस्त कर चुका है। फिर अब तो मामला सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में है और कसौली गोली कांड दो लोगों की जान ले चुका है इस परिदृश्य में सरकार को सर्वोच्च न्यायालय से कोई राहत मिल पायेगी या नही यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यहां पर यह समझना भी आवश्यक है कि सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से रिपोर्ट क्या मांगी है। सरकार से यह पूछा गया है कि अवैध निर्माणों को रोकने के लिये प्रदेशभर में क्या कदम उठाये गये हैं। इसके साथ यह भी पूछा है कि जिन अधिकारियों के कार्यकाल में अवैध निर्माण हुए हैं उनके नाम और पद अदालत को बताये जाएं। ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कारवाई की गई है यह भी बताया जाये। सरकार को इन बिन्दुओं पर अदालत में स्टेट्स रिपोर्ट दाखिल करनी है। अवैध निर्माण आपदाओं को न्योता देते हैं। जिससे जान और माल दोनां का नुकसान होता है। यह चिन्ता एनजीटी ने अपने 165 पृष्ठों के आदेश में व्यक्त की है क्यांकि हिमाचल का अधिकांश हिस्सा तीव्र भूंकप जोन में आता है। शिमला को लेकर यह अध्ययन रिकार्ड पर आ चुके हैं कि भूकंप की स्थिति में शहर में 30,000 लोगों की जानें जा सकती हैं और एक चौथाई से अधिक मकान गिर सकते हैं।
लेकिन इस सबके बावजूद सरकारों की और से इस पर कोई गंभीरता नही दिखाई गयी। उल्टे सरकार बार-बार रिटैन्शन पॉलिसी लाती रही जिस पर अदालत यहां तक कह चुकी है कि "It seems that ‘Retention Policy’ had been a tool deployed to regularize such illegal or unauthorized constructions." अदालत की ओर से गठित की गयी एक्सपर्ट कमेटी ने अपनी ओर से स्पष्ट कहा है कि There should be no new retention policy to allow deviation from building bye-laws. Over the last twenty years, retention policies, guidelines, compounding rules have been introduced at least seven times for significant deviation from building bye-laws. This has not only allowed but also encouraged unsafe construction in Shimla. There should be a complete and permanent moratorium on allowing such deviations in the future. There should be no discretionary provisions with regards to application of building bye-laws. New buildings that do not follow that building bye-laws must be demolished at owner’s expense and neither the Government nor the legal institution should have any discretion for ratification for any such building. इस परिदृश्य में एक ओर से एनजीटी का आदेश और उस पर सर्वोच्च न्यायालय में रिपोर्ट सौंपने की बाध्यता तथा दूसरी ओर अवैधकर्ताओं को मुख्यमन्त्री द्वारा दिये गये राहत के आश्वासन के बीच सरकार उलझ गयी है। इसका कोई हल निकालने के लिये पिछले दिनों मुख्यमन्त्री की अध्यक्षता में शिमला योजना क्षेत्र की रिटैन्शन पॉलिसी पर एक बैठक आयोजित की गयी थी। इस बैठक में टीसीपी सचिव प्रबोध सक्सेना ने रिटैन्शन पालिसी पर विस्तृत जानकारी रखी। बैठक में शिमला के विधायक, शिक्षा मन्त्री सुरेश भारद्वाज, शहरी विकास मन्त्री सरवीण चौधरी, परिवहन एवम् वनमन्त्री गोविन्द ठाकुर, प्रधान सचिव विधि यशवन्त सिंह, प्रधान सचिव आेंकार शर्मा और महाधिवक्ता अशोक शर्मा, मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव अतिरिक्त मुख्य सचिव श्रीकान्त बाल्दी, अतिरिक्त मुख्य सचिव पर्यटन राम सुभग तथा कुछ अन्य लोग शामिल हुए थे। सूत्रों के मुताबिक यह कमेटी कोई ठोस हल नही निकाल पायी है। बल्कि इस बार भारी वर्षा के कारण प्रदेश में जान माल का जो नुकसान हुआ है उससे स्थिति और जटिल हो गयी है। क्योंकि शिमला के जिन हिस्सों में नुकसान हुआ है उन हिस्सों में हुए अवैध निर्माणों का जिक्र एनजीटी के फैसले में प्रमुखता से आ चुका है। इसलिये माना जा रहा है कि जब सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह सारे तथ्य आयेंगे तब सरकार का पक्ष काफी कमजा़ेर हो जायेगा। एनजीटी के फैसले में साफ कहा गया है कि यह फैसला आने के बाद जो निर्माण चल रहे हैं और पूर्ण नही हुए हैं उन पर भी यह फैसला लागू होगा। इस फैसले के बाद तो कोई भी निर्माण अढ़ाई मंजिल से ज्यादा नही हो पायेगा यह स्पष्ट कहा गया है। एनजीटी का फैसला दिसम्बर 2017 में आ गया था। परन्तु इस फैसले के बाद मालरोड़, टूटीकण्डी और अन्य कई क्षेत्रों में पांच -पांच मंजिला निर्माण अब तक चल रहे हैं। इससे यह और स्पष्ट हो जाता है कि सरकार और उसका तन्त्र अदालत के फैसलों के प्रति कितना गंभीर है।
शिमला/शैल। वीरभद्र सरकार ने वर्ष 2016-17 में मुख्यमन्त्री खेत संरक्षण योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत किसानों को अवारा पशुओं, जंगली जानवरों और बन्दरों से अपनी फलसों को बचाने के लिये सौरबाड़ लगाने के लिये प्रोत्साहित किया गया था। इसके लिये सरकार ने 60 प्रतिशत सहायता देने की घोषणा की थी। इस योजना को जयराम सरकार ने भी जारी रखा है और यह घोषणा की है कि तीन या इससे अधिक किसान सामूहिक तौर पर सोलरबाड़ लगाने का प्रस्ताव देते हैं तो सरकार 85 प्रतिशत अनुदान प्रदान करेगी। वीरभद्र ने यह योजना 25 करोड़ से शुरू की थी जिसे जयराम ने बढ़ाकर 35 करोड़ कर दिया है। इस योजना में यह नही कहा गया है कि किन किसानों को इसका लाभ मिलेगा। इसमें यह शर्त भी नही रखी गयी है कि जो किसान अपने में साधन संपन्न हैं उन्हे इस योजना के तहत लाभ नही मिलेगा।
क्योंकि किसान का आकलन किसानी के लिये उसकी साधन संपन्नता के आधार पर नही किया जाता है बल्कि इसके लिये व्यवहारिक तौर पर खेत में फसल की मौजूदगी देखी जाती है। यदि एक किसान के पास चार जगह खेत हैं और चारों जगह फसल लगाई गयी है तो स्वभाविक है कि चारों स्थानों पर उसे फसल को बचाने की एक बराबर आवश्यकता रहेगी। ऐसे में वह चारों स्थानां पर यह बाड़ लगाकर फसल का बचाव करेगा। सरकार ने अपनी योजना मे यह नही कहा है कि उसे एक ही स्थान पर बाड़ लगाने का लाभ दिया जायेगा। क्योंकि जिस भी व्यक्ति के नाम पर कृषि/बागवानी योग्य ज़मीन है वह किसान बागवान की परिभाषा में आता ही है। जहां तक इसमें प्राथमिकता का प्रश्न है उसमें पहले वह लोग आयेंगे जिनकी आजीविका पूरी तरह किसानी पर ही निर्भर है। इस योजना के तहत पूर्व मंत्रा धनीराम शांडिल और पूर्व मुख्य सचिव पी मित्रा ने भी लाभ लिया है। इन लोगों को यह लाभ कैसे मिला है कृषि मंत्री डा. राम लाल मारकण्डेय ने सदन में इसकी जांच करवाये जाने की घोषणा की है। मन्त्री की इस घोषणा के बाद योजना के जानकारों के मुताबिक जब तक योजना में पात्राता की कोई सीमा तय नही की जाती है तब तक किसी भी किसान की यह जांच तो की जा सकती है कि उसने वास्तव में ही बाड़ लगायी है या नहीं। लेकिन बाड़ लगायी होने पर उसकी मौजूदा योजना के तहत जांच करवा पाना संभव नही होगा।
पूर्व मुख्य सचिव पी मित्रा को कृषि विभाग ने ठियोग के गांव कौंती में 530 मीटर परिधि की सौरबाड़ लगाने की एवज में 2 लाख 19 हजार 565 रुपए की सब्सिडी दी है। जबकि पूर्व मंत्रा धनीराम शांडिल को जिला सोलन के गांव बशील में चार मीटर परिधि की सौर बाड़ लगाने के लिए 1 लाख 90 हजार 664 रुपए की सब्सिडी दी है। यह सब्सिडी इन दोनों ने तब ली जब एक मंत्रा था दूसरा सरकारी सेवा में था।
हमीरपुर के गांव कदरयाणा की बिमला देवी को चार जगहों पर सौर बाड़ लगाने के लिए 10 लाख 32 हजार 820 रुपए की सब्सिडी दे दी हैं। इस महिला ने 0.80 हैक्टेयर, 0.95 हैक्टैयर और 1 हैक्टेयर में तीन जगह 410 मीटर परिधि की सौर बाड़ लगाई व हरेक बाड़ के लिए 2 लाख 76 हजार 724 रुपए की सब्सिडी हासिल कर ली। जबकि एक जगह 0.50 हैक्टेयर पर 270 मीटर परिधि की बाड़ लगाई व 2 लाख 2 हजार 648 रुपए की सब्सिडी हासिल कर ली।
इसी तरह एक परिवार में पिता-पुत्र व बहू ने भी बाड़बंदी की सब्सिडी हासिल कर ली है। हमीरपुर के ही नरेली गांव के मस्तराम को भी दो-दो जगह बाड़बंदी लगाने के लिए सब्सिडी दे दी गई है। हमीरपुर के नादौन के गांव सेरा के ही अनिल कुमार को दो जगह सौर बाड़ लगाने की एवज में साढे पांच लाख रुपए की सब्सिडी दे दी गई है।
सरकार की ओर से दिए जवाब में ऐसे दर्जनों परिवार हैं। सरकार के जवाब से हो रहे इन खुलासों ने इस योजना पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश में 32 से 38 लाख के करीब की आबादी सीमांत व छोटे किसानों की है जिनके पास बहुत कम जमीन है और अधिकांशतः उनकी आजीविका खेती, बागवानी व मजदूरी से ही चलती है। कायदे से यह योजना उनके लिए होनी चाहिए थी। लेकिन लाभ प्रभावशाली व अमीर तबका उठा रहा है
इस योजना के तहत 2016-17 में 25 करोड़, 2017-18 में 30 करोड़ और इस साल के लिए 35 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। अब तक 687 किसानों को इस योजना के तहत लाभान्वित किया जा चुका है। विधानसभा में यह प्रश्न भाजपा विधायक रमेश ध्वाला ने लिखित में पूछा था। ध्वाला ने कहा कि जहां बंदर व लंगूरों की समस्या नही हैं, वहां क्रैट (जाली दार बाड़ जो डंगों को रोकने के लिए लगाई जाती है) लगाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सस्ती भी पड़ेगी व प्रभावी होगी। सौर बाड़ पर अगर घास या लकड़ी गिर जाए तो कंरट आगे नही बढ़ता है। इसके अलावा इसकी बैटरियां व अन्य उपकरण चोरी होने की शिकायतें भी आ रही हैं।
पूर्व मुख्य सचिव व अब प्रदेश के चुनाव आयुक्त व पूर्व मुख्यमंत्रा के बेहद करीब रहे आईएएस अधिकारी पी मित्रा को सौर बाड़ लगाने के लिए सब्सिडी कैसे मिली इस बावत प्रदेश सरकार जांच कराएगी। कृषि मंत्री रामलाल मारकंडेय ने कहा कि उक्त अधिकारी तो इस योजना के तहत आता ही नही है। क्या हुआ होगा इसकी जांच कराई जाएगी। पूर्व मंत्री शांडिल की ओर से हासिल की गई सब्सिडी को लेकर उन्होंने कहा कि चलो वह तो फिर भी किसानी व बागवानी करते हैं। लेकिन योजना में बदलाव किया जाएगा। मारकंडय जांच करा पाते हैं या नहीं लेकिन किसानों व बागावानों के नाम पर चल रही योजनाओं का लाभ आईएएस व मंत्री व विधायक उठाए तो सवाल तो खड़े होते ही हैं। बड़ा सवाल यह है कि अभी तक विभिन्न योजनाओं के तहत मंत्रियों विधायकों आईएएस,आइपीएस,एचएएस,एचपीएस भारतीय वन सेवा व हिमाचल वन सेवा के कितने अधिकारियों ने सब्सिडी का लाभ लिया है।