शिमला/शैल। न्यू शिमला आवासीय हाऊसिंग कॉलोनी का प्रारूप जब सार्वजनिक प्रचारित एवम् प्रसारित किया था तब यहां पर ग्रीन एरिया, पार्क और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिये अलग से विशेष भूस्थल चिन्हित किये गये थे। क्योंकि यह कालोनी विशुद्ध रूप से आवासीय कालोनी घोषित की गयी थी। यह प्रदेश की दूसरी आवासीय कालोनी थी जो पूरी तरह सैल्फ फाईनसिंग से वित्त पोषित थी। इसी आधार और आशय से इसका विकास प्रारूप तैयार किया था। इसी कारण से इस कॉलोनी के लिये अधिगृहित भूमि के एक-एक ईंच हिस्से की कीमत इसके आबंटितों से ली गयी है जिसमें सड़क, सीवरेज, पेयजल, ग्रीन एरिया, पार्क तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाएं शामिल हैं। इन सारी सुविधाओं की कीमत वसूलने के कारण ही 83.84 लाख में खरीदी गयी ज़मीन आबंटितों को 9.10 करोड़ में दी गयी है। कॉलोनी में पूरी सैल्फ फाईंनैंस होने के कारण यहां की हर सुविधा पर आबंटितों का मालिकाना हक हो जाता है। कॉलोनी विशुद्ध रूप से आवासीय होगी यही खरीददारों के लिये सबसे बड़ा आकर्षण था। क्योंकि इसमें व्यवसायिक दुनिया की हलचल और शोर शराबा नही होगा। एकदम शान्त वातावरण रहेगा इसलिये यह वरिष्ठ नागरिकों की पसन्द बना।
लेकिन जब यहां पर व्यवहारिक रूप से लोगों ने प्लॉट/ मकान खरीदने बनाने शुरू किये तब आगे चल कर यह सामने आने लगा कि जो भू-स्थल ग्रीन एरिया और पार्क आदि के लिये रखे गये थे वहां पर कई जगह भू उपयोग बदल कर उसे दूसरे उद्देश्यों के लिये प्रयुक्त कर लिया गया। इस तरह भू उपयोग बदले जाने से कॉलोनी का आवासीय चरित्र ही बदल गया। जब इसके लिये ज़मीन का अधिग्रहण 1986 में किया गया तब ऐजैन्सी साडा थी। साडा बाद में बदलकर नगर विकास प्राधिकरण बन गया। फिर नगर विकास प्राधिकरण का विलय हिमुडा में हो गया और अब हिमुडा से इसे शिमला नगर निगम को दे दिया गया है। यह सारी ऐजैन्सीयां कानून की नज़र से इस कॉलोनी की ट्रस्टी हैं मालिक नही। भू उपयोग बदले जाने के जितने भी मामले घटित हुए हैं वह सब इन्ही ऐजैन्सीयों ने किये। अब नगर निगम शिमला भी यहां पर ‘‘विकास के नाम से कई निर्माण कार्य करवा रही है इस तरह के कार्यो से जब यहां का आवासीय चरित्र बदलने लगा तब आबंटितां ने इस ओर ध्यान देना शुरू किया और भू-उपयोग बदले जाने के मामले सामने आने लगे। इसका संज्ञान लेते हुए आबंटितों ने वाकायदा एक अपनी रैजिडैन्ट वैलफेयर सोसायटी का सैक्टर वाईज़ गठन कर लिया और फिर सारी ईकाईयों न मिलकर एक शीर्ष संस्था का गठन कर लिया है।
इसी दौरान इन मुद्दों पर 2012 में प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर हो गयी है। इसी याचिका की सुनवाई के दौरान यहां पर चल रही विभिन्न व्यवसायिक गतिविधियों की ओर से उच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित हुआ। उच्च न्यायालय ने सबंद्ध प्रशासन से इस बारे में रिपोर्ट तलब की। प्रशासन ने जब इस संबंध में जांच शुरू की तो सैकड़ो ऐसे मामले सामने आये जहां पर प्रशासन से भू उपयोग बदलने की अनुमति लिये बिना ही व्यवसायिक गतिविधियां चल रही थी। इसका कड़ा संज्ञान लेकर ऐसे भवनों के बिजली, पानी के कनैक्शन तक काटे गये। भू उपयोग बदलकर ग्रीन एरिया को पार्कांं में बदलने और इसके लिये पेड़ों को काटे जाने के तथ्य जब उच्च न्यायालय के सामने आये थे तब उच्च न्यायालय ने यहां निर्माणों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। लेकिन इस प्रतिबन्ध के बाद भी यहां पर दो ब्लाक बनाकर बेच दिये गये। ग्रीन एरिया में रद्दोबदल कॉलोनी के सैक्टर 1,2,3 और 4 में सामने आये हैं। यह आरोप नगर शिमला पर लगे हैं जो याचिका में प्रतिवादी नम्बर 5 हैं। इन आरोपों का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने यह रोक लगा दी थी कि अदालत की अनुमति के बिना यहां के खाली/ग्रीन और कामन एरिया में कोई भी निर्माण न किया जाये। लेकिन नगर निगम ने यहां पर अम्रूत योजना और मर्जड एरिया ग्रांट के नाम पर मिले धन से कई निर्माण कार्य शुरू करवा रखे हैं। इन सारे कार्यो को ठेकेदारों के माध्यम से करवाया जा रहा है। निगम ने इन कार्यों की बाकायदा सूचियां अदालत में दे रखी हैं। अब अदालत के आदेश से बन्द किये गये इन कार्यों को पुनः शुरू करवाने के लिये उच्च न्यायालय में गुहार लगा रखी है।
नगर निगम पर आरोप है कि उसने भू-उपयोग को बदला है निगम द्वारा कार्यों की सूची अदालत में रखना कानून की नज़र में इस आरोप को स्वतः ही स्वीकार करना बन जाता है यदि उच्च न्यायालय निगम को यह कार्य पूरे करने की अनुमति दे देता है तो इसका अर्थ यह होगा कि अदालत ने भी भू उपयोग बदलने की अपरोक्ष में अनुमति दे दी। दूसरी ओर याचिकाकर्ता का निगम पर आरोप है कि 1998 से लेकर आज तक निगम ने एक पेड़ तक यहां नही लगाया है। धन का दुरूपयोग किया जा रहा है। बल्कि अदालत के आदेशां की अनुपालना नही की जा रही है। जो निर्माण/विकास कार्य किये जा रहे हैं वह डवैल्पमैन्ट प्लान के अनुरूप नही बल्कि प्लान पारूप की धारा 26, 27 की अवेहलना के कारण दण्डनीय बन जाते हैं। उच्च न्यायालय में आज तक डवैल्पमैन्ट प्लान पेश नही किया गया है। ऐसे में यह और भी बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि जब प्लान ही नही है तो फिर निर्माण किस आधार पर हो रहा है। नगर निगम तो नियोजक की भूमिका में है न कि विकासिक की। फिर भू उपयोग को बदलना तो याचिकाकर्ता के अनुसार उच्च न्यायालय के भी अधिकार क्षेत्र में नही है फिर नगर निगम किसी अन्य ऐजैन्सी का तो सवाल ही पैदा नही होता। ऐसे में यदि नगर निगम भू उपयोग बदलने के लिये अधिकृत ही नही है तब तो उसके द्वारा किये गये कार्यो की सूची स्वतः ही अदालत के सामने रखना अन्ततः निगम प्रशासन के गले की फांस बन सकता है।
शिमला/शैल। न्यू शिमला आवासीय हाऊसिंग कॉलोनी का प्रारूप जब सार्वजनिक प्रचारित एवम् प्रसारित किया था तब यहां पर ग्रीन एरिया, पार्क और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिये अलग से विशेष भूस्थल चिन्हित किये गये थे। क्योंकि यह कालोनी विशुद्ध रूप से आवासीय कालोनी घोषित की गयी थी। यह प्रदेश की दूसरी आवासीय कालोनी थी जो पूरी तरह सैल्फ फाईनसिंग से वित्त पोषित थी। इसी आधार और आशय से इसका विकास प्रारूप तैयार किया था। इसी कारण से इस कॉलोनी के लिये अधिगृहित भूमि के एक-एक ईंच हिस्से की कीमत इसके आबंटितों से ली गयी है जिसमें सड़क, सीवरेज, पेयजल, ग्रीन एरिया, पार्क तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाएं शामिल हैं। इन सारी सुविधाओं की कीमत वसूलने के कारण ही 83.84 लाख में खरीदी गयी ज़मीन आबंटितों को 9.10 करोड़ में दी गयी है। कॉलोनी में पूरी सैल्फ फाईंनैंस होने के कारण यहां की हर सुविधा पर आबंटितों का मालिकाना हक हो जाता है। कॉलोनी विशुद्ध रूप से आवासीय होगी यही खरीददारों के लिये सबसे बड़ा आकर्षण था। क्योंकि इसमें व्यवसायिक दुनिया की हलचल और शोर शराबा नही होगा। एकदम शान्त वातावरण रहेगा इसलिये यह वरिष्ठ नागरिकों की पसन्द बना।
लेकिन जब यहां पर व्यवहारिक रूप से लोगों ने प्लॉट/ मकान खरीदने बनाने शुरू किये तब आगे चल कर यह सामने आने लगा कि जो भू-स्थल ग्रीन एरिया और पार्क आदि के लिये रखे गये थे वहां पर कई जगह भू उपयोग बदल कर उसे दूसरे उद्देश्यों के लिये प्रयुक्त कर लिया गया। इस तरह भू उपयोग बदले जाने से कॉलोनी का आवासीय चरित्र ही बदल गया। जब इसके लिये ज़मीन का अधिग्रहण 1986 में किया गया तब ऐजैन्सी साडा थी। साडा बाद में बदलकर नगर विकास प्राधिकरण बन गया। फिर नगर विकास प्राधिकरण का विलय हिमुडा में हो गया और अब हिमुडा से इसे शिमला नगर निगम को दे दिया गया है। यह सारी ऐजैन्सीयां कानून की नज़र से इस कॉलोनी की ट्रस्टी हैं मालिक नही। भू उपयोग बदले जाने के जितने भी मामले घटित हुए हैं वह सब इन्ही ऐजैन्सीयों ने किये। अब नगर निगम शिमला भी यहां पर ‘‘विकास के नाम से कई निर्माण कार्य करवा रही है इस तरह के कार्यो से जब यहां का आवासीय चरित्र बदलने लगा तब आबंटितां ने इस ओर ध्यान देना शुरू किया और भू-उपयोग बदले जाने के मामले सामने आने लगे। इसका संज्ञान लेते हुए आबंटितों ने वाकायदा एक अपनी रैजिडैन्ट वैलफेयर सोसायटी का सैक्टर वाईज़ गठन कर लिया और फिर सारी ईकाईयों न मिलकर एक शीर्ष संस्था का गठन कर लिया है।
इसी दौरान इन मुद्दों पर 2012 में प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर हो गयी है। इसी याचिका की सुनवाई के दौरान यहां पर चल रही विभिन्न व्यवसायिक गतिविधियों की ओर से उच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित हुआ। उच्च न्यायालय ने सबंद्ध प्रशासन से इस बारे में रिपोर्ट तलब की। प्रशासन ने जब इस संबंध में जांच शुरू की तो सैकड़ो ऐसे मामले सामने आये जहां पर प्रशासन से भू उपयोग बदलने की अनुमति लिये बिना ही व्यवसायिक गतिविधियां चल रही थी। इसका कड़ा संज्ञान लेकर ऐसे भवनों के बिजली, पानी के कनैक्शन तक काटे गये। भू उपयोग बदलकर ग्रीन एरिया को पार्कांं में बदलने और इसके लिये पेड़ों को काटे जाने के तथ्य जब उच्च न्यायालय के सामने आये थे तब उच्च न्यायालय ने यहां निर्माणों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। लेकिन इस प्रतिबन्ध के बाद भी यहां पर दो ब्लाक बनाकर बेच दिये गये। ग्रीन एरिया में रद्दोबदल कॉलोनी के सैक्टर 1,2,3 और 4 में सामने आये हैं। यह आरोप नगर शिमला पर लगे हैं जो याचिका में प्रतिवादी नम्बर 5 हैं। इन आरोपों का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने यह रोक लगा दी थी कि अदालत की अनुमति के बिना यहां के खाली/ग्रीन और कामन एरिया में कोई भी निर्माण न किया जाये। लेकिन नगर निगम ने यहां पर अम्रूत योजना और मर्जड एरिया ग्रांट के नाम पर मिले धन से कई निर्माण कार्य शुरू करवा रखे हैं। इन सारे कार्यो को ठेकेदारों के माध्यम से करवाया जा रहा है। निगम ने इन कार्यों की बाकायदा सूचियां अदालत में दे रखी हैं। अब अदालत के आदेश से बन्द किये गये इन कार्यों को पुनः शुरू करवाने के लिये उच्च न्यायालय में गुहार लगा रखी है।
नगर निगम पर आरोप है कि उसने भू-उपयोग को बदला है निगम द्वारा कार्यों की सूची अदालत में रखना कानून की नज़र में इस आरोप को स्वतः ही स्वीकार करना बन जाता है यदि उच्च न्यायालय निगम को यह कार्य पूरे करने की अनुमति दे देता है तो इसका अर्थ यह होगा कि अदालत ने भी भू उपयोग बदलने की अपरोक्ष में अनुमति दे दी। दूसरी ओर याचिकाकर्ता का निगम पर आरोप है कि 1998 से लेकर आज तक निगम ने एक पेड़ तक यहां नही लगाया है। धन का दुरूपयोग किया जा रहा है। बल्कि अदालत के आदेशां की अनुपालना नही की जा रही है। जो निर्माण/विकास कार्य किये जा रहे हैं वह डवैल्पमैन्ट प्लान के अनुरूप नही बल्कि प्लान पारूप की धारा 26, 27 की अवेहलना के कारण दण्डनीय बन जाते हैं। उच्च न्यायालय में आज तक डवैल्पमैन्ट प्लान पेश नही किया गया है। ऐसे में यह और भी बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि जब प्लान ही नही है तो फिर निर्माण किस आधार पर हो रहा है। नगर निगम तो नियोजक की भूमिका में है न कि विकासिक की। फिर भू उपयोग को बदलना तो याचिकाकर्ता के अनुसार उच्च न्यायालय के भी अधिकार क्षेत्र में नही है फिर नगर निगम किसी अन्य ऐजैन्सी का तो सवाल ही पैदा नही होता। ऐसे में यदि नगर निगम भू उपयोग बदलने के लिये अधिकृत ही नही है तब तो उसके द्वारा किये गये कार्यो की सूची स्वतः ही अदालत के सामने रखना अन्ततः निगम प्रशासन के गले की फांस बन सकता है।
शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमन्त्री और प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता वीरभद्र सिंह ने कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष सुक्खु को पद से हटाने के लिये विधानसभा चुनावों से बहुत पहले से अभियान छेड़ रखा है। इसी अभियान के कारण विधानसभा चुनावों के लिये वीरभद्र सिंह को नेता घोषित किया गया था लेकिन फिर भी कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी जबकि पचपन टिकट वीरभद्र की सिफारिश पर दिये गये थे। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को अधिकारिक तौर पर विपक्ष का दर्जा हासिल करने लायक भी बहुमत नहीं मिल पाया है। शायद इसीलिये कांग्रेस विधायक दल का नेता वीरभद्र की बजाये मुकेश अग्निहोत्री को बनाया गया है। इन विधानसभा चुनावों में वीरभद्र की व्यक्तिगत बडी उपलब्धि यही रही है कि वह अपनी पुरानी सीट शिमला ग्रामीण से अपने बेटे विक्रमादित्य को विधायक बनवा पाये हैं। स्वयं भी नये क्षेत्रा अर्की से जीत हासिल कर पाये हैं। वैसे इस जीत को लेकर यह भी चर्चा रही है कि यहां पर भाजपा
ने अपने दो बार लगातार जीत हासिल करने वाले विधायक गोविन्द शर्मा का टिकट काटकर वीरभद्र की जीत की राह आसान कर दी थी। इन चुनावों जहां कांग्रेस के अन्दर वीरभद्र के विरोधी हारे हैं वहीं पर कुछ उनके निकटस्थ भी हार गये हैं। विधानसभा चुनाव परिणामों के इस गणित से यह स्पष्ट संकेत उभरता है कि जिस ऐज और स्टेज पर वीरभद्र पहुंच चुके हैं वहां से जनता पर उनकी पकड़ अब पहले जैसी नहीं रह गयी है। यह सही है कि वह छः बार प्रदेश के मुख्यमन्त्री रह चुके हैं और इस नाते प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र में कुछ न कुछ लोग उनको व्यक्तिगत तौर पर जानने वाले आज भी हैं। लेकिन प्रदेश की जो समस्याएं आज है जिसका सबसे बड़ा कारण कर्ज का चक्रव्यूह है। यही नहीं आज स्कूलों में चौदह हज़ार से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं, सैंकड़ों स्कूलों को बन्द करना पड़ रहा है। यह सब कुछ बहुत हद तक उन्हीं के शासन काल की योजनाओं का परिणाम है। इस सब को लेकर अधिकांश जनता का आकलन क्या है शायद इसकी जानकारी वीरभद्र और कांग्रेस को व्यवहारिक तौर पर नहीं है।
आज कांग्रेस के अन्दर अगले नेता को लेकर एक बड़ा शून्य चल रहा है क्योंकि वीरभद्र ने अभी तक किसी एक का नाम अधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किया है। क्योंकि जब उन्होंने यहां तक कह दिया है कि वह कांग्रेस के अन्दर भाजपा के आडवाणी और जोशी जैसे मार्गदर्शक नहीं बनना चाहते। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वह अभी भी अपने को सत्ता के हकदारों में पहले स्थान पर मानकर चल रहे हैं लेकिन अपने इस मन्तव्य को वह सीधा घोषित नहीं कर रहे हैं परन्तु जिस तर्ज पर उन्होंने सुक्खु को हटवाने का अभियान छेड़ रखा है उससे तो पहला अर्थ यही निकलता है। अन्यथा वह पार्टी हित में वरिष्ठतम नेता होने के नाते कांग्रेस में सरकार और संगठन के नेतृत्व के लिये किसी को तो नामजद करते। लेकिन जब वह ऐसा नहीं कर रहें है और साथ ही यह भी कह चुके हैं कि न तो वह स्वयं और न ही उनके परिवार से कोई दूसरा लोकसभा चुनाव लड़ेगा तब इस सब के राजनीतिक मायने बदल जाते हैं। वीरभद्र और उनकी पत्नी प्रतिभा मण्डी लोकसभा क्षेत्र का कई बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इस बार भी यदि यह लोग चुनाव लड़े तो स्वभाविक रूप से मण्डी से ही लड़ना होगा। लेकिन उन्होंने न केवल स्वयं लड़ने से मना किया है बल्कि कांग्र्रेस से जो भी लड़ेगा उसे अभी से ही मकर झण्डू कहकर उसकी हार की बुनियाद रख दी है। कांग्रेस हाईकमान उनके इस कथन को कैसे लेता है यह तो आगे पता चलेगा लेकिन निश्चित तौर पर मण्डी से होने वाले उम्मीदवार को मकरझण्डू कहकर भाजपा का रास्ता बहुत आसान कर दिया है। वीरभद्र जहां सुक्खु को हटाने की मांग कर रहे हैं वहीं पर उनके समर्थकों ने लोकसभा चुनाव वीरभद्र के नेतृत्व में लड़ने की मांग कर दी है। बल्कि शिमला से तो उनके समर्थकों ने सुरेन्द्र गर्ग को टिकट देने की मांग कर दी है। अभी ठियोग और सोलन की बैठकों में भाग लेने से पहले वीरभद्र ने हमीरपूर और कांगडा लोकसभा क्षेत्रों का व्यापक दौरा किया है। कांगड़ा में सुधीर शर्मा और जी एस बाली उम्मीदवार के तौर पर सामने आये हैं लेकिन यहां वीरभद्र ने किसी एक का भी नाम सीधे नहीं लिया है। क्योंकि शायद बाली का सीधा विरोध करने से वह बच रहे हैं। लेकिन हमीरपुर में वह राजेन्द्र राणा के साथ खुलकर खड़े हैं और राणा स्वयं की जगह अपने बेटे को आगे बढ़ा रहे हैं। वीरभद्र इस पर खामोश हैं। कांग्रेस के अन्दर वीरभद्र बनाम सुक्खु विवाद पर तो अब भाजपा ने चुटकीयां लेना शुरू कर दिया है क्योंकि इस विवाद से जहां कांग्र्रेस पक्ष जनता में कमजोर होता जा रहा है वहीं पर इससे भाजपा को अनचाहे ही लाभ मिल रहा है। क्योंकि इस समय मण्डी लोकसभा सीट मुख्यमन्त्री जयराम के लिये प्रतिष्ठा का मामला होगा। विधानसभा चुनावों में मण्डी से कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पायी है। क्योंकि चुनाव के दौरान ही अमित शाह ने यह घोषणा कर दी थी कि जयराम को कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जायेगी। परन्तु अब सरकार बनने के बाद जयराम को सबसे पहली समस्या अपने ही चुनाव क्षेत्र से सामने आयी जब एस डी एम कार्यालय को लेकर जंजैहली में लोग आन्दोलन पर उतर आये। आज ही मण्डी की स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि यदि फिर से चुनाव हो जायें तो यह भाजपा पर भारी पडेंगे। यदि मण्डी से वीरभद्र या उनकी पत्नी में से कोई चुनाव लड़ता है तो भाजपा के लिये सीट जीतना कठिन हो जायेगा। ऐसे में वीरभद्र का मण्डी से चुनाव लड़ने से इन्कार करना और होने वाले उम्मीदवार को मकरझण्डू करार देना निश्चित रूप से जयराम और भाजपा की मदद करना बन जाता है।
इस वस्तुस्थिति को सामने रखते हुए यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि वीरभद्र ऐसा कर क्यों रहे हैं। क्योंकि कांग्रेस के अन्दर संगठन के चुनाव क्यों रूके थे यह सब जानते हैं। अगले चुनाव कब करवाये जायेंगे यह हाईकमान के आदेशों से तय होगा। तो क्या वीरभद्र का सुक्खु पर हमला बोलना हाईकमान पर ही हमला नहीं बन जाता है। वीरभद्र एक लम्बे समय से आयकर और सी बी आई तथा ई डी के मामले झेल रहे हैं, यह मामले अभी तक खत्म नहीं हुए हैं। ऐसे में कुछ क्षेत्रों में वीरभद्र की सारी कारगुज़ारी को इन मामलों के साथ जोड़कर भी देखा जा रहा है। क्योंकि ई डी के अटेचमैन्ट आदेश में जिस तरह के दस्तावेज सामने आ चुके हैं उनसे मामलों की गंभीरता का स्वतः ही अनुमान लग जाता है।
शिमला/शैल। देश में बढ़ती गारवेज समस्या का सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लेते हुए 28 मार्च को सभी राज्यों के तीन माह के भीतर इस संद्धर्भ में बनाई गयी योजना से शीर्ष अदालत को अवगत करवाने के निर्देश दिये थे। इन निर्देशों के बाद 12 जुलाई को यह मामला जस्टिस मदन वी लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता की खण्डपीठ में लगा था। लेकिन इस अवसर पर राज्य सरकार की ओर से गारवेज प्रबन्धन को लेकर न तो कोई योजना अदालत के समक्ष रखी गयी और न ही सरकार की ओर से अदालत में कोई पेश हुआ। अदालत ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए टिप्पणी की यह अजीब स्थिति है जहां न तो राज्य सरकारें अदालत के निर्देशों की अनुपालना कर रही है और न ही भारत सरकार के वन एवम् पर्यावरण विभाग द्वारा जारी निर्देशों को मान रही हैं। इस टिप्पणी के साथ ही राज्य सरकार पर एक लाख का जुर्माना लगाया गया है। हिमाचल सहित दस राज्यों पर भी यह जुर्माना लगा है। इस तरह का जुर्माना लगाना सीधे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है क्योंकि 28 मार्च को अदालत ने योजना बनाकर उसे पेश करने के आदेश दिये थे।
प्रदेश उच्च न्यायालय में भी इस दौरान जितने गंभीर मामले आये हैं अदालत ने उन पर सरकार से जवाब तलब किया है उन अधिकांश मामलों में उच्च न्यायालय ने सरकार के शपथ पत्रों पर अप्रसन्नता ही व्यक्त की है। इनमें महत्वपूर्ण मामले वनभूमि अतिक्रमण, अवैध निर्माण, शिमला के सफाई कर्मचारियों की समस्या, शिमला की पेयजल संकट, स्नोडन की पार्किंग समस्या, कसौली में अदालत के आदेशों की अनुपालना और अब शिक्षण संस्थानों में अध्यापकों की कमी का मामला रहे हैं। यह सारे मामले में अदालत में पहुंचे हैं और लगभग सभी मामलों में सरकार पर तथ्यों को छुपाने के आरोप लगे हैं। बहुत सारे मामलों में शैल यह शपथ पत्र जनता के सामने रख भी चुका है। लेकिन अब जब सर्वोच्च न्यायालय सरकार के आचरण का कड़ा संज्ञान लेते हुए जुर्माना लगाने पर विवश हो जाये तो निश्चित रूप से प्रशासन की नीयत और नीति पर सवाल उठेंगे ही।
अभी सरकार को सत्ता में आये केवल छः माह का ही समय हुआ है। इस अवधि में सरकार पर किसी भी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप नही लग पाया है। मंत्री और मुख्यमन्त्री बराबर जनता से संपर्क में जुटे हुए है। लेकिन इस सबके बावजूद सरकार होने का कोई पुख्ता संदेश जनता में नही जा पाया है क्योंकि इस दौरान जो भी बड़े फैंसले सरकार ने लिये हैं उनमें कहीं न कहीं ऐसा कुछ घट गया है जिससे सरकार की छवि पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ा है। विकास के नाम पर सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि एशिया विकास बैंक से 4378 करोड़ के ऋण का वायदा लेना ही रहा है जबकि इस वायदे को पूरा होने के लिये एक लम्बा सफर तय करना है और दूसरी ओर पिछले कुछ दिनों में बहुत सारी अन्तर्राष्ट्रीय वित्तिय संस्थाओं ने विकासशील देशों को ऋण के रूप में भी वित्तिय सहायता देने से हाथ पीछे खींच लिये हैं। जब से डॉलर के मुकाबले में रूपये की कीमत मे कमी बढ़ी है उसी के साथ यह हुआ है इसका प्रभाव देश के हर राज्य पर पडे़गा यह तय है। इसलिये कर्ज को उपलब्धि बनाकर प्रचारित करना कोई बहुत समझदारी नही है क्योंकि कल को यदि यह पूरे ऋण नही मिल पाते हैं तब इसका कोई भी जवाब जनता को स्वीकार्य नही हो पायेगा। फिर जनता के सामने यह भी नही रखा गया है कि पर्यटन और बागवानी जिन दो क्षेत्रों में इस ऋण से निवेश किया जाना है उन क्षेत्रों में ऋण पर ही आधारित पहले से ही कितनी योजनाएं चल रही हैं और इससे प्रदेश के राजस्व में कितनी बढ़ौत्तरी हुई है और आगे कितने समय में कितनी हो पायेगी तथा पिछले ऋण की इससे आये राजस्व से कितनी भरपायी हो पायी है।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार ने 1986 में शिमला के उपनगर न्यू शिमला में एक पूरी तरह स्व वित्त पोषित हाऊसिंग कालोनी बनाने बसाने की योजना बनायी थी। इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिये साडा का गठन किया। साडा के माध्यम से इस कालोनी के लिये भूमि का अधिग्रहण किया गया और 83.84 लाख में जमीन खरीदी गयी जिसमें से 50315 वर्ग मीटर भूमि प्लाटों के लिये चिन्हित की गयी और शेष भूमि अन्य आधारभूत सुविधाओं के निर्माण के लिये रखी गयी। इन अन्य आधारभूत सुविधाओं में सड़कें, पार्क, ग्रीन एरिया तथा पेयजल और सीवरेज आदि लाईनों का प्रावधान आदि शामिल था। इन्हीं सारी सुविधाओं के प्रावधानों के साथ इस योजना को विज्ञापित किया था और ईच्छुक लोगों से आवेदन आमंत्रित किये थे। इस आवासीय कालोनी के निर्माण के लिये एक विस्तृत सैक्टरवाईज विकास योजना का प्रारूप विज्ञापित किया गया था।
सरकार/साडा द्वारा विज्ञापित इन सारी सुविधाओं के लिये किये गये अलग- अलग प्रावधानों से प्रभावित होकर ही लोगों ने यहां प्लाट/फ्लैट आदि खरीदने के लिये आवदेन किये। साडा ने जब प्लॉट एरिया की प्रतिवर्ग मीटर कीमत तय की तब उसमें पूरी जमीन की कीमत के साथ इन आधारभूत सुविधाओं सड़क, पार्क, ग्रीन एरिया और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर होने वाले खर्च को भी जमीन की कुल कीमत में जोड़ा। इस तरह जो जमीन मूलतः 83.84 लाख में खरीदी गयी थी उसमें 234.03 लाख आधारभूत सरंचनाओं के लिये 60 लाख सार्वजनिक बिजली लाईटों के लिये तथा 75.35 लाख इसकी निगरानी और लाभ आदि के चार्ज कर 83.84 लाख की जमीन की कीमत 457.22 लाख तक पंहुचा दी। फिर इसे जब 50315 वर्ग मीटर के प्लॉट एरिया पर विभाजित किया गया तो 457.22 लाख बढ़कर 910 लाख बन गया। इस तरह प्लॉट एरिया की कीमत 910 रूपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर खरीददारों से वसूली गयी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस कालोनी की एक-एक इंर्च जमीन की सारी कीमत सारे खर्चों और लाभ सहित यहां के प्लॉट मालिकों से वसूली गयी है। इस नाते यहां की सड़के, पार्क, ग्रीन एरिया और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के मालिक यहां के निवासी है न की सरकार या उसके संबधित विभाग। इनकी भूमिका कानून के मुताबिक एक ट्रस्टी संचालक की ही रह जाती है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि सरकारी तन्त्र ने जब 83.84 लाख खर्च करके 9 करोड़ 10 लाख वसूले हैं तो वह तो प्राईवेट बिल्डर से भी कई गुणा ज्यादा शोषक जैसा हो जाता है। कीमत वूसली की यह सारी जानकरी स्वयं हिमुडा ने उच्च न्यायालय में रखी है।
इस कालोनी का निर्माण विज्ञापित विकास प्रारूप के अनुसार होना चाहिये था। क्योंकि कालोनी को शुद्ध रूप से आवासीय कालोनी के नाम पर विज्ञापित और प्रचारित किया गया था इसके प्रारूप में व्यवसायिक गतिविधियों के लिये कोई स्थान चिन्हित नही किये गये थे। शुद्ध आवासीय चरित्रा रखने के लिये ही यहां पर मूलतः अढ़ाई मंजिल के निर्माण की ही सीमा तय की गयी थी। लेकिन जब इसका वास्तविक निर्माण शुरू हुआ और लोगों को प्लाटों का आवंटन किया गया तब पूर्व विज्ञापित प्रचारित वकास प्रारूप को पूरी तरह नज़रअन्दाज कर दिया गया। विकास प्रारूप में जो स्थल पार्क, ग्रीन एरिया आदि के लिये मूलतः चिन्हित और निर्धारित थे वह इस समय व्यवहार में वैसे नहीं रह गये हैं। आवासीय कालोनी व्यवसायिक कालोनी की शक्ल ले चुकी है। लैण्डयूज़ पूरी तरह से बदल गया हैं बिना अनुमतियों के बदले गये लैण्डयूज़ का जब उच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया तब संवद्ध प्रशासन ने जांच शुरू की और ऐसे सैंड़कों लोगो को उनके बिजली, पानी कनैक्शन काटने की नौबत आयी।
न्यू शिमला में विज्ञापित विकास प्रारूप को नज़रअन्दाज किये जाने की जानकारी जब बाहर आयी तब प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका CWP No. 10772 of 20122 दायर हुई थी। इस याचिका की सुनवायी के दौरान यह मूल प्रश्न उठा है कि मूल रूप से विज्ञापित विकास प्रारूप की अवहेलना कहां -2 और कैसी हुई है इसके लिये संवद्ध विभागों से उच्च न्यायालय ने विकास प्रारूप तलब किया था लेकिन यह प्रारूप अभी तक अदालत के सामने नही रखा जा सका है। न्यू शिमला के निवासियों की एक कल्याण सोसायटी भी बनी हुई है। पिछले दिनों उच्च न्यायालय ने सरकार के महाधिवक्ता के माध्यम से संवद्ध विभागों को निर्देश दिया था कि वह इन निवासियों की कल्याण सोसायटी के साथ बैठक करके इसके सारे पक्षों पर विस्तार से चर्चा करें। उच्च न्यायालय के निर्देशां पर हुई इस बैठक के बाद निवासियों की इस सोसायटी की शीर्ष कार्यकारणी ने 26.6.2018 को बैठक करके एक प्रस्ताव पारित करके महाधिवक्ता को देकर उनसे यह अनुरोध किया कि प्रस्ताव में चिन्हित किये गये बिन्दुओं को अदालत के माध्यम से हल करवाने का प्रयास करे। इस प्रस्ताव में प्रारूप के विरूद्ध हुई गतविधियों की एक विस्तृत सूची दी गयी है और मांग की गयी है कि प्रशासन के जिन लोगों के सामने यह अवहेलनाएं हुई हैं उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करके कारवाई की जाये। सोसायटी ने एक पत्रकार वार्ता में इस प्रस्ताव को रखते हुए अवहेलनाओं के सनसनीखेज़ खुलासे किये है। आवासीय कालोनी में व्यवसायिक गतिविधियों की सीमा कहां तक जा पंहुची है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक रसूखदार पूर्वे नौकरशाह भवन मालिक को बिजली के एक ही भवन में सोलह कनैक्शन दिये गये हैं। उच्च न्यायालय ने यहां निर्माणों पर रोक लगा रखी है और इस रोक के बाद भी हिमुण्डा द्वारा सैक्टर चार के ग्रीन एरिया ब्लॉक 50 और 50 ए का निर्माण और बिक्री की गयी है। यही नही डीएवी स्कूल सैक्टर चार में भारी भरकम प्लाट दिया गया है जिसमें उनसे करीब 13 करोड़ रूपये प्लाट विकास के नही लिये गये हैं। जबकि बाकी सभी से यह चार्जिज लिये गये हैं। इसमें भारी घपला किये जाने की आशंका व्यक्त की गयी है। इसी तरह की स्थिति लॉईनज़ क्लब की भी कही जा रही है। सांसद निधि, विधायक निधि और अमृत योजना के नाम पर किये जा रहे खर्चो की वास्तविकता पर भी गंभीर प्रश्न लग रहे हैं। कुल मिलाकर न्यू शिमला में जिस तरह से विज्ञापित विकास प्रारूप को नज़रअन्दाज करके आवंटन और निर्माण हुए हैं उससे उच्च न्यायालय के सामने कई गंभीर कानूनी सवाल खड़े हो गये हैं। माना जा रहा कि कानून का शासन व्यवहारिक रूप से स्थापित करने के लिये उच्च न्यायालय कोई बड़ा आदेश पारित कर सकता है जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कसौली प्रकरण में किया है। क्योंकि सरकार के संज्ञान में यह सबकुछ लम्बे अरसे से चल रहा है लेकिन कोई कारवाई नही की गयी है।

