Friday, 16 January 2026
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जब जिले की प्रति व्यक्ति आय 4 लाख तो 25000 परिवार बीपीएल में क्यों

शिमला/शैल। प्रदेश के अर्थ एवम् सांख्यिकी विभाग ने पहली बार जिला स्तर के आर्थिक आंकड़े जारी किये हैं। इन आंकड़ो के मुताबिक प्रति व्यक्ति आय के मानक पर सोलन पहले स्थान पर आता है। यहां प्रतिव्यक्ति आय 3,94,102 रूपये आयी है। प्रदेश का सबसे बड़ा जिला प्रतिव्यक्ति आय मे सबसे अन्तिम स्थान पर आता है। यहां प्रतिव्यक्ति आय 86637 रूपये है। प्रतिव्यक्ति आय में बिलासपुर- 1,25,958, चम्बा, 98006, हमीरपुर 102,217, कांगड़ा-86637, किन्नौर 2,17,993, कुल्लू 1,19,231, लाहौल स्पिति 1,92,292, मण्डी 96052, शिमला 1,52,230, सिरमौर 145597, सोलन, 3,94102 और ऊना की प्रतिव्यक्ति आय 1,00295 रूपये हैं। प्रदेश स्तर पर प्रतिव्यक्ति आय का आंकड़ा 1,35,621 रूपये है। इसी क्रम में प्रदेश के चार जिलों सोलन, कांगड़ा, शिमला और मण्डी का प्रदेश के कुल जीडीपी में 62% योगदान रहा है।
इस आर्थिक आकलन का आधार वर्ष 2011-12 रहा है। 2011 के जनसंख्या सर्वेक्षण के मुताबिक प्रदेश की कुल जनसंख्या 68.65 लाख रही है। प्रदेश में जनगणना के अनुसार 20690 गांव है जिनमें से 17,882 गांव ही आबाद हैं। इन गांवो में करीब 14 लाख परिवार हैं। आर्थिक आंकलन के इन आंकड़ो के अनुसार तो प्रदेशभर में कोई भी गरीब नही होना चाहिये क्यांकि हमारी प्रति व्यक्ति आय 1,35,621 रूपये है। लेकिन प्रदेश के ग्रामीण विकास एवम् पंचायत राज विभाग ने वर्ष 2011-12 में ही बीपीएल परिवारों को लेकर एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण के मुताबिक प्रदेश में बीपीएल परिवारों की संख्या सामान्य वर्ग से 2,82,370 और अनुसूचित जाति वर्ग से 95772 परिवार बीपीएल में शामिल हैं। सोलन जहां प्रतिव्यक्ति आय 3,94,102 रूपये हैं वहां पर सामान्य वर्ग से बीपीएल में 17478 और अनुसूचित जाति वर्ग से 83280 परिवार बीपीएल में हैं जबकि सोलन की जनसंख्या 5,80320 है। यह कुल 2,5,858 परिवार बनते है। यदि एक परिवार में औसत पांच व्यक्ति भी हों तो संख्या 1,25,290 हो जाती है जिसका मतलब है कि करीब हर पांचवां व्यक्ति सोलन में गरीब है। इसी तरह इन आंकड़ो के अनुसार प्रदेश की 23% जनसंख्या आज भी बीपीएल में आती है।
इसी के साथ यदि यह भी सामने रखा जाये कि इस विकास के लिये प्रदेश पर कर्ज का कितना बोझ पड़ा है। 2011-12 में प्रदेश का कर्जभार 26494.07 करोड़ था जो कि 31 मार्च 2017 को 46500 करोड़ हो गया है। बीपीएल के आंकड़े पंचायती राज विभाग के 2011- 12 के हैं। सांख्यिकी विभाग ने 2003 के आंकड़ों को ही गणना में लिया है। विकास के आंकड़ो से यह सवाल उठता है कि यदि सही में प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 1,35000 से ऊपर हो चुकी है तो फिर बीपीएल का आंकड़ा अब तक समाप्त क्यों नही हो पाया है? प्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग के भी करीब एक लाख परिवार बीपीएल में खड़े हैं जबकि इनके लिये अलग से कई विशेष योजनाएं लागू हैं। कई योजनाएं गरीबों के लिये अलग से चिन्हित हैं। यदि यह सारी योजनाएं ईमानदारी से लागू हो रही हैं तो फिर गरीबी की रेखा से नीचे का यह आंकड़ा कम क्यों नही हो रहा है।
प्रदेश का कर्जभार 2011- 12 से आज करीब दो गुणा बढ़ गया है। प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ रही है और जीडीपी भी बढ़ रहा है लेकिन इसके बावजूद न तो कर्ज कम हो रहा है और न ही बीपीएल का आंकड़ा। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या हमारा सारा योजना प्रबन्धन ही दोषपूर्ण है। क्या हमारी भविष्य का आकलन करने की क्षमता समाप्त हो गयी है या जानबूझ कर इस ओर से ऑंखे बन्द कर ली गयी है। यदि समय रहते इस दिशा में चिन्ता और चिन्तन न किया गया तो स्थिति भयानक हो जायेगी।

 

RURAL-URBAN POPULATION - 2011 CENSUS

District                Total

BIlaspur            381956
Chamba            519080
Hamirpur          454768
Kangra             1510075
Kinnaur             84121
Kullu                437903
L-Spiti              31564
Mandi              999777
Shimla             814010
Sirmour           529855
Solan              580320
Una                521173
H.P                6864602

नगर निगम शिमला में चल रहा विवाद नेताओं के आपसी हितों के टकराव या किसी बड़े विस्फोट का संकेत

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला में भाजपा पहली बार सत्ता में आयी है और उसके लिये भी निर्दलीय को उपमहापौर का पद देना पड़ा है। लेकिन शायद भाजपा को निगम की सत्ता रास नहीं आ रही है। क्योंकि भाजपा के अपने ही पार्षदों ने अपने ही महापौर और उपमहापौर के खिलाफ इस कदर मोर्चा खोल रखा है कि दोनों को ही पदों से हटाने की मांग की जाने लगी है। इस संबंध में स्थानीय विधायक और शिक्षामन्त्री सुरेश भारद्वाज और पार्टी अध्यक्ष सतपाल सत्ती के प्रयास भी इस विवाद को सुलझाने में सफल नही हो पाये हैं। निगम की बैठक से पिछली रात दोनों नेताओं ने विवाद को सुलझाने में जितने प्रयास किये उनके परिणामस्वरूप पार्षद बैठक में तो आ गये लेकिन जब कांग्रेस के पार्षदों ने सदन से वाकआऊट किया तो उसके बाद भाजपा के अपने पार्षदों का भी एक बड़ा वर्ग बैठक से बाहर आ गया। यह वर्ग यदि बैठक से बाहर न आता तो सदन की कार्यवाही चल सकती थी लेकिन ऐसा नही हुआ और सदन को स्थगित करना पड़ा। भाजपा के बारह आये पार्षद नाराज धड़े के माने जाते हैं यदि यह वर्ग इसी तरह नाराज चलता रहा तो निगम की सत्ता भाजपा से छिन भी सकती है।
पार्षदों की नाराज़गी का कारण पिछले दिनो शिमला में आया जल संकट तत्कालीन मुद्दा रहा है। जल संकट से पूर्व शहर ने लम्बे समय तक सफाई का संकट भी झेला जब निगम के सफाई कर्मी हड़ताल पर चले गये थे। पेयजल और सफाई के ही दो बड़े मुद्दे थे जिनकी सुचारू व्यवस्था सुनिश्चित करने के निगम चुनावों में वायदे और दावे किये गये थे। लेकिन इन सारे दावों वायदों पर निगम सफल नही रही है और इसी कारण से विकास को लेकर किये गये दावों वायदों तक तो निगम प्रशासन कोई कदम नही उठा ही नही पाया है। उपर से यह हो गया कि पेयजल संकट चल रहा था उस समय निगम की महापौर संयोगवश चीन की यात्रा पर चली गयी थी। पेयजल संकट को लेकर हर वार्ड मे परेशानी रही है लोग पूरे आक्रोश मे रहे हैं। कई जगह तो सड़कों पर निकलने को विवश हुए हैं। मुख्यमन्त्री और मुख्य सचिव को सारा संचालन अपने हाथ में लेना पड़ा। उच्च न्यायालय भी पन्द्रह दिन लगातार स्थिति का संज्ञान लेता रहा है। आयुक्त को लगभग हर दिन अदालत में पेश होना पडा है। उच्च न्यायालय की प्रताडना तक झेलनी पडी है। एक एसडीओ को निलंबित तक किया गया है। इस वस्तुस्थिति में उभरे जनाक्रोश का सीधा समाना हर पार्षद और उसी के साथ स्थानीय विधायक को भी झेलना पड़ा है। जबकि पार्षदों और विधायक को इसमें कोई सीधा दोष नही था। क्योंकि मूलतः यह निगम प्रशासन की जिम्मेदारी थी। लेकिन जब स्त्रोतों में ही पानी की कमी हो गयी थी तो प्रशासन भी काफी हद तक विवश हो गया था। निगम प्रशासन की इस स्थिति को समझते हुए ही प्रशासन में किसी पर तबादले आदि की गाज नही गिरी।
परन्तु अब जब स्थिति सामान्य हो गयी थी तब पार्षदों का महापौर और उपमहापौर के खिलाफ मोर्चा खोलना और उसकी गाज आयुक्त पर तबादले के रूप में गिराया जाना बहुत कुछ अन्यथा सोचने पर विवश करता है। यदि आयुक्त को पेयजल संकट के परिदृश्य में ही बदल दिया जाता तो उसे सरकार का सामान्य और प्रभावी कदम माना जाता। लेकिन आज इस कदम का पूरा अर्थ ही बदल जाता है क्योंकि इस स्थिति को सुलझाने के सुरेश भारद्वाज और सत्ती के सारे प्रयासों के बावजूद भाजपा पार्षदों ने निगम की बैठक से वाकआऊट किया है। शिमला जहां प्रदेश की राजधानी है वहीं पर जिले का मुख्यालय भी है। शिमला नगर निगम पर सबसे अधिक प्रभाव जिला शिमला का माना जाता है। इस नाते निगम के सारे घटनाक्रम को जिले की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। जिले को इस बार मन्त्रीण्डल में एक ही स्थान मिल पाया है जबकि आठ विधानसभा सीटों के साथ यह प्रदेश का तीसरा बड़ा जिला है। मन्त्रीमण्डल में सीट पाने के लिये भारद्वाज और बरागटा बराबर के दावेदार थे लेकिन जब यह प्रतिनिधित्व भारद्वाज को मिल गया तब बरागटा और उनके समर्थको में निराशा होना स्वभाविक थी और यह हुई भी और सामने भी आयी। इस निराशा का समाधान निकालने के लिये ही सचेतकों को मन्त्रा का दर्जा दिये जाने का विधेयक पारित करवाया गया था। चर्चा उठी थी कि सचेतकों के पदों पर बरागटा और रमेश धवाला की ताजपोशी होगी। लेकिन राज्यपाल की विधेयक पर स्वीकृति मिल जाने के बाद भी यह ताजपोशीयां हो नही पायी है। चर्चाओं के मुताबिक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने इस तरह की व्यवस्थाओ का कड़ा विरोध किया है। सरकार पर विद्यार्थी परिष्द का प्रभाव और दबाव कितना है इसका आभास योग दिवस के दिन हो चुका है। जब एक मन्त्री विद्यार्थी परिष्द के नेता के साथ बैठक तय होने के कारण मुख्यमन्त्रा के चाय आमन्त्रण को स्वीकार नही कर पाये।
इसके बाद जब मुख्यमन्त्री ऊपरी शिमला के दौरे पर गये तब जिले के मन्त्री ही उसमें शामिल नही रहे। मुख्यमन्त्री के इस दौरे के आयोजक नरेन्द्र बरागटा रहें है। इस दौरे में एक जगह पुनः से नीवपत्थर रखने का आयेजन हो जाने को लेकर भी चर्चा उठी जिस पर सफाई देने की नौबत आयी। मुख्यमन्त्री का यह दौरा कार्यर्ताओं में अलग तरह की चर्चा का विषय बन गया है। बरागटा और भारद्वाज के संबधों को लेकर चर्चाएं उठने लगी हैं। इन चर्चाओं का आधार नगर निगम का घटनाक्रम माना जा रहा है। क्योंकि नाराज निगम पार्षदों में शैलेन्द्र चौहान की भूमिका सबसे सक्रिय मानी जा रही है। शैलेन्द्र चौहान को बरागटा का नज़दीकी माना जाता है। इस चर्चा को इससे भी बल मिलता है कि नाराज पार्षदों ने मन्त्री और प्रदेश अध्यक्ष के प्रयासों के बावजूद अपनी नाराजगी को वाकआऊट करके सार्वजनिक कर दिया। नाराज पार्षदों ने पहली बार निगम आयुक्त पर फाईलें लटकाने का आरोप लगाया और सरकार ने तुरन्त प्रभाव से आयुक्त को बदल दिया। निगम में पार्षद बनाम महापौर उपमहापौर विवाद में मुख्यमन्त्री अभी तक तटस्थता की भूमिका में ही चल रहे हैं जबकि इस विवाद का असर अप्रत्यक्षतः सरकार और संगठन पर पड़ता साफ दिख रहा है। क्योंकि मुख्यमन्त्री अभी तक कार्यकर्ताओं को निगमो/बार्डों में ताजपोशीयां देने का फैसला नही ले पा रहे हैं क्योंकि सहमतियां नही बन रही है। जबकि अकेले एपीएमसी कमेटीयों में ही डेढ सौ से अधिक कार्यकर्ताओं को समायोजित किया जा सकता है। जबकि लोकसभा चुनावों के परिदृश्य में यह फैसले तुरन्त प्रभाव से ले लिये जाने चाहिये थे।

बाबा हरदीप की सुक्खु को चुनौति माफी मांगे या मानहानि झेलें

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस में पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और पार्टी अध्यक्ष ठाकुर सुखविन्दर सिंह सुक्खु के बीच चल रहे विवाद का निपटारा अभी हो नही पाया है और इंटक के प्रदेश अध्यक्ष बाबा हरदीप सिंह ने अब इसमें एक नया अध्याय जोड़ दिया है। बाबा हरदीप ने सुक्खु को चुनौती दी है कि वह एक सप्ताह के भीतर यह प्रमाणित करें कि डा. जी संजीवा रेड्डी इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष नही हैं। उन्हे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अस्वीकार कर दिया है या किसी अदालत ने उन्हे उनके पद से हटा दिया है। यदि सुक्खु ऐसा कोई प्रमाण नही दे पाते हैं तो वह अपने ब्यान पर इंटक के प्रत्येक कार्यकर्ता से क्षमा याचना करें। नही तो एक सप्ताह के बाद सुक्खु के खिलाफ मानहानि का मामला दायर कर दिया जायेगा। स्मरणीय है कि इसी तर्ज का एक मानहानि का मामला कुल्लू की अदालतत में सेवा दल के पूर्व अध्यक्ष बलदेव ठाकुर की ओर से किया हुआ सुक्खु झेल रहे हैं।
हरदीप बाबा अगस्त 2017 में बिलासपुर में हुए इंटक के चुनावों में तीन वर्ष के लिये अध्यक्ष चुने गय थे। इस चुनाव में इंटक की ओर से राष्ट्रीय संगठन मन्त्री संजय गाबा प्रेक्षक के रूप में हाज़िर थे लेकिन बाबा को जब 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने टिकट नही दिया था तब उन्होंने नालागढ़ से निर्दलीय चुनाव लड़ लिया था। यह चुनाव लड़ने के कारण बाबा को अनुशासनहीनता के तहत कांग्रेस पार्टी से छः वर्ष के लिये निकाल दिया था। लेकिन इस निष्कासन का इंटक की अध्यक्षता से कोई लेना देना नही था। परन्तु अब कुछ दिन पूर्व पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुक्खु के एक ब्यान के माध्यम से यह जानकारी दी गयी कि बाबा की जगह मनोहर लाल उर्फ बबलू पंडित को इंटक का अध्यक्ष बना दिया गया है। यह भी कहा गया कि पंडित को इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुन्दरयाल ने प्रदेश का अध्यक्ष मनोनीत किया है।
सुक्खु के इस दावे को बाबा ने अपनी पूरी टीम के साथ एक पत्रकार वार्ता में चुनौती दी है। बाबा ने स्पष्ट किया कि इंटक एक स्वतन्त्र मजदूर संगठन है और विचार के आधार पर कांग्रेस का समर्थन करता है तथा अपने को इसकी मजदूर ईकाई मानता है लेकिन इंटक का अपना एक अलग संविधान है और उसी से इंटक की हर गतिविधि संचालित होती है। इस संविधान के मुताबिक कांग्रेस के प्रदेश को इंटक में दखल देने को कोई अधिकार नही है। प्रदेश अध्यक्ष को इंटक में अध्यक्ष मनोनीत करने का अधिकार नही है क्योंकि इसके संविधान के मुताबिक इसका हर स्तर का अध्यक्ष चयनित होता है इसमें मनोनयन को कोई प्रावधान नही है। बाबा ने इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. रेड्डी का जुलाई 2018 का वह पत्र भी मीडिया को जारी किया जिसमें बाबा को अगस्त 2017 से तीन वर्ष के लिये इंटक का अध्यक्ष घोषित किया गया है। जुलाई 2018 में जारी हुए इस पत्र से यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि बाबा ही इंटक के अध्यक्ष हैं बाबा के इस दावे को तभी खारिज किया जा सकता है यदि इस पत्र को ही अप्रमाणिक करार दे दिया जाये। दूसरा यदि यह प्रमाणित हो जाये कि डा. रेड्डी इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष नही हैं। तीसरा यदि यह सामने आ जाये कि रेड्डी को किसी अदालत द्वारा अध्यक्ष पद से हटा दिया गया हो और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इसका अनुमोदन किया हो। बाबा ने मीडिया के सामने पूरे साक्ष्य रखते हुए यह प्रमाणित कर दिया कि डा. संजीवा रेड्डी ही इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और राहूल गांधी ने रेड्डी को ही मान्य करार दिया है। बाबा ने सुक्खु को सात दिन के भीतर यह प्रमाणित करने को कहा है कि सुन्दरयाल को किसने राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया है और वह किस मजदूर संगठन का प्रतिनिधित्व करते हैं। बबलू पंडित को लेकर भी बाबा ने सुक्खु से पूछा है कि वह किस मज़दूर संगठन से  ताल्लुक रखते हैं।
बाबा ने बड़े जोरदार तरीके से मीडिया के सामने अपना पक्ष रखा है और दावा किया कि प्रदेश में इंटक के साथ 118 मज़दूर संगठन जुड़े हुऐ हैं और 26 और संगठनों की संवद्धता की प्रक्रिया चल रही है। इंटक प्रदेश में मज़दूरों /कामगारों/श्रमिकों का एक अग्रणी संगठन है। पिछले विधानसभा चुनावों में इंटक को एक भी चुनाव टिकट न मिलने के कारण इसको कार्यकर्ताओं ने पूरे मनोयोग के साथ चुनावों में सक्रिय सहयोग नही दिया है। कांग्रेस की हार का यह भी एक ब़डा कारण रहा है। लेकिन अब जब लोकसभा के चुनाव आने वाले हैं और पार्टी में पुराने सभी नाराज़ लोगों को वापिस लाने के प्रयास किये जा रहे है। कांग्रेस को हर कार्यकर्ता की सक्रिय एकजुटता की आवश्यकता है। ऐसे में एक अग्रणी ईकाई के साथ इस तरह के विवाद का उठाया जाना पार्टी की सेहत के लिये नुकसानदेह हो सकता है। यह सही है कि बाबा को पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह का एक कट्टर समर्थक माना जाता है और सुक्खु तथा वीरभद्र में द्वन्द चल रहा है लेकिन क्या इस द्वन्द में पार्टी की ईकाईयों के कार्यकर्ताओं को भी इसका शिकार बना दिया जाना चाहिये। इस संद्धर्भ में सुक्खु के नक्ष को कमजोर माना जा रहा है अब देखना यह है कि एक सप्ताह के भीतर सुक्खु क्या जवाब देते हैं और बाबा वास्तव में ही उनके खिलाफ मानहानि का दावा दायर करते हैं या नहीं।

सुक्खु विरोध को जायज ठहराने के लिये वीरभद्र को चुनावे लड़ने की कसौटी पर उतरना होगा

शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिह आने वाला लोकसभा चुनाव नही लडेंगे। उनकी पत्नी पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह चुनाव लडे़गी या नही इस पर अभी चर्चा नही हुई है। अपने 85वें जन्म दिन पर मीडिया से बात करते हुए वीरभद्र सिंह ने यह स्पष्ट किया है। लेकिन इसी अवसर पर उन्होने प्रदेश पार्टी अध्यक्ष से लेकर केन्द्रिय नेतृत्व पर भी यह कहकर निशाना साधा कि इस समय शिखर से लेकर नीचे तक सभी जगह मनोनयन ही चल रहा है और वह इसका विरोध करते हैं। इस समय संगठन में पदाधिकारी चयन से नही मनोनयन से है। यह फैसला और नीति हाईकान की होती है प्रदेश ईकाई की नही। प्रदेश ईकाई द्वारा मनोनीत पदाधिकारी की योग्यता और उपयोगिता उस पद के लिये कितनी है जिसके लिये उसका मनोनचन किया गया है इसको लेकर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन यही बात सरकार पर भी लाग होती है। मुख्यमन्त्री जब अपने मन्त्रीयों का चयन करते हैं तब उनकी योग्यता और उपयोगिता का कोई मानदण्ड नही रहता है। जब विभिन्न निगमों/बोर्डो या अन्य संवैधानिक पदों पर मुख्यमन्त्री नियुक्तियां करते हैं तब भी कोई ठोस मानदण्ड नही रहता है। यही कारण होता है कि पांच वर्ष का पूरा कार्यकाल मन्त्री रहने के बाद भी हार जाते हैं। यह स्थिति सभी राजनीतिक दलों की एक बराबर रहती है। इसमें कोई दो राय नही है।
इस पृष्ठभूमि में यदि आज वीरभद्र के शासनकाल का आकलन किया जाये तो सबसे पहले यही सामने आता है कि जब 2012 में वीरभद्र मुख्यमन्त्री बने थे तब उन्हे पार्टी के सभी 36 विधायकों का समर्थन हासिल नही था। पार्टी आधे-आधे में बंटी हुई थी। उसके बाद पार्टी में एक व्यक्ति एक पद को लेकर घमासान हुआ था वीरभद्र ने इस सिद्धान्त को नही माना था। फिर विभिन्न निगमां/बोर्डां में हुई ताजपोशीयों को लेकर भी जो कुछ हुआ था वह भी सभी को याद है। राजेश धर्माणी जैसे मुख्य संसदीय सचिव सरकार से किस कदर असहमत चलते रहे कि उन्होने सचिवालय में अपने कार्यालय आना छोड़ दिया था। तब के परिवहन मंत्री जीएस बाली ने कितनी बार सरकार से असहमति के कारण अपना पद छोड़ने की घोषनाएं की थी। बेरोजगारों को भत्ता देने के नाम पर स्थिति कहां तक पहुंच गयी थी यह भी सब जानते हैं। कुल मिलाकर सरकार के पूरे कार्यकाल में ऐसा बहुत कुछ घटा है जिसे किसी भी गणित में लोकतान्त्रिक नही कहा जा सकता है। बल्कि इसी सबके कारण सरकार पुनः सत्ता में वापसी नही कर पायी। आज भी यदि प्रदेश के अच्छे राजनेता का नाम वीरभद्र को लेना हो ता उनकी जुबान पर सबसे पहला नाम भाजपा के शान्ता कुमार का आता है। उन्हे अपनी पार्टी में कोई अच्छा आदमी/नेता ही नजर नही आता है। यही स्थिति शान्ता कुमार की भी रहती है। दोनां नेता एक दूसरे की तारीफ करने का कोई अवसर नही जाने देते हैं। ऐसा क्यों किया जाता है इसके कारणों का भी बहुत लोगों को पता है।
इस परिदृश्य में यदि आज वीरभद्र बनाम सुक्खु द्वन्द का निष्पक्षता से आकलन किया जाये तो यह स्पष्ट है कि संगठन में हुए मनोनयनों की आड़ लेकर कुछ और हित साधे जा रहे हैं। क्योंकि अब तक जो कुछ सरकार और संगठन में घटा है वह सब एक दूसरे का ही प्रतिफल है इसे भले ही ऊपर बैठे नेता न समझे लेकिन हर कार्यकर्ता इसे जानता और मानता है। विधानसभा चुनावों में 80% टिकट अपनी पसन्द से बांटकर भी वीरभद्र सत्ता में वापसी नही कर पाये हैं यह हकीकत है। चुनावों से पहले खोले गये संस्थानों में कितनी व्यवहारिकता रही है इसका प्रमाण इसी से मिल जाता है कि एक स्वास्थ्य संस्थान पंजाब में ही अधिसूचित कर दिया गया। इसको लेकर भाजपा हर मौके पर तंज कस रही है। ऐसी वस्तुस्थिति के बाद भी वीरभद्र सुक्खु को हटाने का अभियान छेड़े हुए हैं और प्रदेश का भ्रमण कर रहे हैं। जबकि सुक्खु का हटना तो इस अभियान के बिना भी तय है क्योंकि उनका कार्यकाल तो बहुत अरसा पहले ही पूरा हो चुका है। बल्कि यह वीरभद्र का सुक्खु विरोध ही है जिसके कारण सुक्खु का राजनीतिक कद बढ़ गया है। हाईकमान सुक्खु की सेवाएं राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी देकर लेने जा रहा है। सुक्खु हट रहे हैं यह वीरभद्र भी जानते हैं लेकिन अन्दर खाते सवाल तो यह है कि वीरभद्र अगला अध्यक्ष अपनी पसन्द का चाहते हैं जो उनके बेटे के हितांं की रक्षा कर सके। जो नाम इस समय चर्चा में चल रहे हैं उनमें शिमला संसदीय क्षेत्र से हर्षवर्धन चौहान और रोहित ठाकुर है दोनों की ही समृद्ध राजनीतिक पृष्ठभमि है। लेकिन यह दोनो ही शायद वीरभद्र को पसन्द नही है। मण्डी में कौल सिंह का विरोध तो वह बहुत पहले से करते आ रहे हैं। 2012 के चुनावों के नाम पर कैसे कौल सिंह से अध्यक्षता छिनी थी यह सब जानते हैं। हमीरपुर में कोई राजपूज नेता वीरभद्र की नजर में इस योग्य नही है। कांगड़ा से सुधीर शर्मा, जीएस बाली और आशा कुमारी हैं। आशा कुमारी राजपूत गणित में फिट बैठती हैं। यदि उनके खिलाफ उच्च न्यायालय में लंबित चल रहा आपराधिक मामला आड़े न आया तो वह अगली अध्यक्ष हो सकती हैं ऐसा माना जा रहा है।
लेकिन इस सबके के साथ सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो यह बन रहा है कि कांग्रेस के अगले लोकसभा उम्मीदवार कौन होंगे। कांगडा लम्बे असरे से ब्राहमण बहुलक्षेत्र माना जाता है भापजा यहां से पंडित को ही टिकट देती आ रही है और इस गणित में कांग्रेस के पास दो ही नाम हैं पूर्व मन्त्री जीएस बाली या सुधीर शर्मा। लेकिन सूत्रों की माने तो वीरभद्र इनमें से किसी के लिये भी हामी नही भर रहे हैं। हमीरपुर और मण्डी दोनां राजपूत बहुल क्षेत्र माने जाते हैं।
हमीरपुर से अनुराग ठाकुर इस बार चौथी बार लडेंगे। इससे पहले धूमल, सुरेश चन्देल और स्व. मेजर जनरल विक्रम सिंह सभी राजपूत सांसद रहे चुके हैं। हमीरपुर में कांग्रेस के पास सुक्खु, रामलाल और अनिता वर्मा तीन बराबर के राजपूत नाम हैं। लेकिन यहां से वीरभद्र की पसन्द राजेन्द्र राणा और राजेन्द्र की पसन्द उनका बेटा बन रहे हैं। इसी तरह मण्डी में तो वीरभद्र और प्रतिभा की पारम्पारिक सीट मानी जाती है। सुखराम और अनिल शर्मा तो कांग्रेस से बाहर हो चुके हैं। कौल सिंह तो विधानसभा में भी अपनी हार के लिये वीरभद्र के भीतरघात को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। ऐसे में मण्डी की सीट भाजपा से छीनने के लिये कांग्रेस के पास वीरभद्र और प्रतिभा सिह के अतिरिक्त कोई विकल्प नही है। इन दोनों में से जो भी उम्मीदवार होगा उसका संदेश पूरे प्रदेश में जायेगा। यदि वीरभद्र प्रतिभा सिंह दोनों ही चुनाव लड़ने के लिये तैयार नही होते हैं जिसके संकेत यह अब तक दे चुके हैं तो इसका सीधा संदेश जायेगा कि वीरभद्र, जयराम ठाकुर को कमजोर नही करना चाहते हैं। क्योंकि वीरभद्र या प्रतिभा सिंह उम्मीदवार होते है तो जयराम को मण्डी से बाहर प्रचार पर निकलना आसान नही होगा। इस परिदृश्य में यदि वीरभद्र अन्ततः चुनाव लड़ने के लिये तैयार नही होते हैं तो फिर उनकी नीयत को लेकर जो सन्देहात्मक सवाल उठेंगे उनका कोई स्पष्टीकरण उनके पास नही होगा। सूत्रों की माने तो हाईकान से इस आश्य के संकेत भी वीरभद्र तक पहुंच चुके हैं। उमर और राजनीति के इस पड़ाव पर आकर यदि वीरभद्र की नीयत पर ऐसे सवाल खड़े होते हैं तो यह भविष्य के लिये घातक होते हैं। राजनीतिक विश्लेष्कों के मुताबिक सुक्खु के सैंद्धान्तिक विरोध को वीरभद्र तभी जायज ठहरा सकेंगे यदि वह स्वयं या उनकी पत्नी चुनाव लड़ने के लिये तैयार होते हैं। यदि ऐसा नही करते हें तो उनके सुक्खु विरोध को अपरोक्ष में जयराम और भाजपा की मदद का ही प्रयास माना जायेगा।

विनित चौधरी के माध्यम से कांग्रेस का जयराम सरकार पर हमला

शिमला/शैल। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने प्रदेश के मुख्य सचिव विनित चौधरी के माध्यम से जयराम सरकार पर हमला बोला है। स्मरणीय है कि विनित चौधरी के खिलाफ संजीव चतुर्वेदी ने एक मामला उछाल रखा है और यह मामला पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशान्त भूषण के एनजीओ के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय में भी पहुंच चुका है और जुलाई में ही सुनवाई के लिये लगा है। इस मामले में चौधरी के साथ केन्द्रिय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा भी सहअभियुक्त बने हुए हैं। इसी सबके चलते चौधरी केन्द्र सरकार में सचिव के पैनल में नही आ पाये हैं। इसी प्रकरण में चौधरी ने शिमला की ए सी जे एम की अदालत में संजीव चतुर्वेदी के खिलाफ मानहानि का मामला भी दायर कर रखा है। मानहानि के इस मामले में अदालत ने एक बार संजीव चतुर्वेदी के वांरट भी जारी कर दिये थे। वारंट और मानहानि के मामले को रद्द करवाने के लिये चतुर्वेदी ने प्रदेश उच्च न्यायालय में गुहार लगायी थी जिस पर उच्च न्यायालय ने वांरट तो रद्द कर दिया लेकिन शेष मामले पर कोई कारवाई किये बिना ही मामला अदालत को वापिस भेज दिया। उच्च न्यायालय की इस कारवाई को चतुर्वेदी ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। सर्वोच्च न्यायालय ने यह मामला उच्च न्यायालय को लौटाते हुए यह निर्देश दिये हैं कि उच्च न्यायालय को वह कारण स्पष्ट करने होंगे जिनके आधार पर उसने मामला अधिनस्थ अदालत को लौटा दिया। उधर ए सी जे एम ने किन्ही कारणों से अपने को इस मामले से अलग कर लिया है। संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक जिस दस्तावेज के आधार पर मानहानि का मामला बनाया गया है उस पर यह बनता ही नही है। यह मामला अभी अदालतों में इसी मोड़ पर लंबित है और सबकी नज़रें इस पर लगी हुई हैं।
जयराम सरकार ने वरियता और वरिष्ठता के तर्क पर चौधरी को मुख्य सचिव बनाया है जबकि पूर्व की वीरभद्र सरकार ने उनके जूनियर फारखा को मुख्य सचिव बना दिया था। चौधरी इस पर कैट में चले गये थे और कैट ने उन्हे फारखा के समक्ष ही सारे सेवा लाभ देने के निर्देश दिये थे जो उन्हे दे दिये गये थे। लेकिन कैट ने उन्हे मुख्य सचिव बनाने की संस्तुति नही की थी। फारखा समकक्ष ही सारे लाभ देने के निर्देशों के साथ ही कैट ने चौधरी को अन्य मामलों के लिये केन्द्र को प्रतिवेदन भेजने के भी निर्देश दिये थे। लेकिन चौधरी ने कोई प्रतिवेदन केन्द्र को भेजा नही है। यह प्रतिवेदन भेजने के कारण चौधरी ने अपनी वरिष्ठता को नज़रअदांज किये जाने के साथ ही जो अन्य मुद्दे उठाये थे वह वैसे के वैसे ही खड़े रहे हैं। लेकिन उन्हीं मुद्दों का अपरोक्ष तर्क लेकर और लोगों को उनका अधिकार नही दिया जा रहा है जबकि बाकि प्रदेशों में दिया जा रहा है। इसी के साथ एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह खड़ा हो गया है कि जब चौधरी कैट में गये थे तब दीपक सानन भी उनके साथ सह याचिकाकर्ता बने थे। उस समय चौधरी और दीपक सानन छुट्टी पर चले गये थे। लेकिन जब कैट ने चौधरी को फारखा के समकक्ष लाने के निर्देश दिये तब उन्होने अपनी छुट्टी रद्द करके डयूटी ज्वाईन कर ली। परन्तु सानन छुट्टी पर चलते रहे। सानन की सेवानिवृति 31 जनवरी 2017 को थी इसलिये उन्होने 24 जनवरी को डयूटी ज्वाईन कर ली। सानन 24 अक्तूबर 2016 से 24 जनवरी 2017 तक छुट्टी पर थे। अब जयराम सरकार ने सानन की 24 अक्तूबर 2016 से 24 जनवरी 2017 की छुट्टी को स्टडीलीव मानकर उन्हे सारे वित्तिय लाभ दे दिये हैं। जोकि नही दिये जा सकते थे क्योंकि जब सेवानिवृति के दो वर्ष रह जायें तो स्टडी लीव दिये जाने का कोई प्रावधान नही है। परन्तु प्रदेश सरकार ने आईएएस स्टडी लीव नियमों में ढील देकर लाभ दिया है। आईएएस एक अखिल भारतीय सेवा है और इसके सेवा नियमों में कोई भी ढील देने का अधिकार केवल केन्द्र सरकार को है राज्य सरकार को नही। मुख्य सचिव और मुख्यमन्त्री ने अपने ही स्तर पर यह लाभ दे दिया है। कानून की नज़र में यह आपराधिक षडयंत्र का मामला बनता है।
अब जब कांग्रेस राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरजेवाला ने इस पर मुद्दा बना लिया है तो यह माना जाने लगा है कि दीपक सानन को नियमों के विरूद्ध यह लाभ दिये जाने का मामला आगे बढ़ेगा ही। क्योंकि यह एक प्रमाणिक और पुख्ता मामला है। इसके माध्यम से जयराम और भाजपा को घेरने का एक गंभीर मामला कांग्रेस के हाथ लग गया है। जो मामले उच्च न्यायालय में लंबित हैं उनका फैसला चौधरी की सेवानिवृति के बाद ही आयेगा। उससे चौधरी को कोई ज्यादा फर्क नही पड़ेगा। लेकिन इसी मामले में नड्डा पर चौधरी को नियमों के विरूद्ध जाकर बचाने का आरोप है और इसमें नड्डा के लिये कठनाई पैदा हो सकती है। उधर कांग्रेस इस मुद्दे पर जयराम और नड्डा पर भ्रष्टाचारियों को बचाने का आरोप लगायेगी क्योंकि सानन एचपीसीए में अभियुक्त हैं और इसमें राज्य सरकार का अधिकार बहुत सीमित है सब कुछ अदालत के पाले में है।

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