शिमला/शैल। विधानसभा के बजट सत्र में 5 फरवरी को भाजपा विधायक रमेश धवाला का एक प्रश्न सदन में आया था। धवाला ने सरकार से यह जानकारी मांगी थी कि (क) प्रदेश लोक सेवा आयोग में वर्तमान में श्रेणीवार कौन-कौन सदस्य हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यता एंव प्रशासनिक क्षमता क्या है और (ख) सरकार क्या सदस्यों के चयन के लिये समाज के विभिन्न वर्गो के प्रतिनिधित्व का ध्यान रखती है और चयन हेतु क्या मापदण्ड निर्धारित किये गये हैं ‘‘ यह प्रश्न सदन में चर्चा में नही आ पाया था। लेकिन इसके सदन में रखे लिखित जवाब में बताया गया कि इस समय अध्यक्ष समेत पांच सदस्य कार्यरत है। इनकी शैक्षणिक योग्यताएं और अनुभव का भी पूरा विवरण दिया गया है। लेकिन यह नही बताया गया है कि इस समय सदस्य का एक पद खाली है। क्योंकि जब जयराम सरकार ने सत्ता संभाली थी तब सदस्यों के दो नये पद सृजित किये गये थे जिनमें से एक पर तो डा. रचना गुप्ता की नियुक्ति हो गयी थी और दूसरा अभी तक खाली चला आ रहा है।
इस समय प्रदेश की शीर्ष प्रशासनिक सेवा, न्यायिक सेवा आदि से लेकर क्लर्क की भर्ती तक के लिये दो संस्थान एक प्रदेश लोक सेवा आयोग और दूसरा अधिनस्थ सेवा चयन बोर्ड कार्यरत हैं। इन दोनों संस्थानों ने पिछले तीन वर्षों में 15 जनवरी 2019 तक लोक सेवा आयेाग ने 2198 और अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड ने 7849 उम्मीदवारों का चयन किया है। इस चयन से यह आकंलन किया जा सकता है कि प्रदेश में कितने लोगों को पिछले तीन वर्षों में नियमियत रोजगार मिल पाया होगा। इसी के साथ यह भी सवाल उठता है कि जब दोनों संस्थानों ने पिछले तीन वर्षों में केवल दस हजार लोगों का ही चयन किया है तो क्या ऐसे में इन दोनो संस्थानों को चलाये रखने का औचित्य क्या है। फिर इनमें सदस्यों के नये पद सृजित करना उचित है।
लोकसेवा आयोग प्रदेश की शीर्ष राजपत्रित सेवाओं के लिये उम्मीदवारों का चयन करता है। इस चयन के लिये आयोग के सदस्य भी अपने में उच्च शैक्षणिक और प्रशासनिक योग्यता एवम् अनुभव वाले लोग होने चाहिये। इन सदस्यों के चयन के लिये एक स्थापित और तय प्रक्रिया होनी चाहिये। इस संबंध में पंजाब लोक सेवा आयोग में फैसला देते हुए शीर्ष अदालत ने राज्यों को निर्देश दिये हैं कि वह इस चयन के लिये सुनिश्चित चयन प्रक्रिया और मानदण्डों की स्थापना करें। सर्वोच्च न्यायालय में यह भी उल्लेख आया है कि इन सदस्यों की योग्यता का मानदण्ड ऐसा रहना चाहिये जो प्रशासन में दस वर्ष तक वित्तायुक्त का अनुभव होना चाहिये और वित्तायुक्त होने की पात्रता रखता हो। लेकिन क्या सर्वोच्च न्यायालय के इन निर्देशों की अनुपालना हो पा रही है जबकि यह फैसला 2014 में आ चुका था। लेकिन अब जो विधानसभा में आये प्रश्न के उत्तर में सरकार ने कहा है उसके अनुसार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व का ध्यान रखा जाता है। इनकी नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद-316 के अनुसार की जाती है, जिसमे उद्धृत प्रावधान अग्रलिखित हैंः-
लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्त आयोग है तो राष्ट्रपति द्वारा और, यदि राज्य आयोग के लिए, के राज्यपाल द्वारा की जाएगी।
परन्तु प्रत्येक लोक सेवा आयोग के सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम आधे ऐसे व्यक्ति होंगे जो अपनी-अपनी नियुक्ति की तारीख पर भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन कम से कम कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हैं और उक्त दस वर्ष की अवधि की संगणना (Computing) करने मे संविधान के प्रारम्भ से पहले की ऐसी अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन पद धारण किया है।
इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद-316(3) के अनुसार कोई व्यक्ति जो लोक सेवा आयोग के सदस्य का पद धारण करता है, अपनी पदावधि की समाप्ति पर, उस पद पर पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होता और भारत के संविधान के अनुच्छेद 319 के परिच्छेद (घ) के अन्तर्गत राज्य लोक सेवा आयोग का कोई भी सदस्य आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति हेतु पात्र है।
सरकार के इस जवाब से यह सवाल उठता है कि क्या सरकार लोक सेवा आयोग को कोई राजनीतिक या सामाजिक संस्था बनना चाहती है जिसमें समाज के सारे वर्गों का प्रतिनिधित्व हो। सरकार के इस जवाब से आयोग की बुनियादी अवधारणा पर ही गंभीर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व से आयोग के सदस्यों की अपनी निष्पक्षता पर ही सवाल खड़ा हो जाता है। हिमाचल लोक सेवा आयोग को लेकर भी एक प्रकरण प्रदेश उच्च न्यायालय मे गया हुआ है लेकिन उच्च न्यायालय पिछले दो वर्षों में इस प्रकरण की सुनवाई के लिये समय नही निकाल पाया है। इससे यह संदेह उभरना स्वभाविक ही है कि कहीं उच्च न्यायालय की नजर में भी सरकार की तरह यह एक सामाजिक संस्था ही है।
शिमला/शैल। लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कभी भी हो सकता है और ऐलान के साथ आचार संहिता लागू हो जायेगी। इस परिदृश्य में अभी मुख्यमन्त्री के मीडिया सलाहकार द्वारा त्याग पत्र देकर चला जाना अपने में सवाल खड़े कर जाता है। क्योंकि चुनावों में मीडिया की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण और प्रभावी होती है यह सभी जानते हैं। अभी जयराम सरकार को सत्ता संभाले केवल एक वर्ष हुआ है। मुख्यमन्त्री के अपने सचिवालय में दो सलाहकार एक मीडिया और दूसरा राजनीतिक तैनात रहे हैं। इसी के साथ दो ही विशेष कार्याधिकारी तैनात हैं। यह चारों ही लोग
सीधे मुख्यमन्त्री को ही जवाबदेह रहे हैं और इसी कारण से इन्हें मुख्यमन्त्री का विश्वस्त माना जाता है। लेकिन इस एक वर्ष में मुख्यमन्त्री के सचिवालय में किस तरह की कार्यशैली रही है इसका एक नमूना दोनों विशेष कार्यधिकारियों को लेकर लिखे गये खुले पत्र रहे हैं। इसी एक वर्ष में लोक संपर्क विभाग के निदेशक को भी बदल दिया गया। इस तरह निदेशक से लेकर सलाहकार तक का विभाग से हटना विभाग की कार्यशैली से लेकर सरकार की मीडिया नीति तक पर सवाल उठाता है।
सरकार की मीडिया नीति की एक झलक विधानसभा में आये एक सवाल के जवाब में सामने आ चुकी है। इस एक वर्ष में सरकार ने किन अखबारों और दूसरे माध्यमों को कितना विज्ञापन दिया है यह सामने आ चुका है। इसी से सरकार की मीडिया पाॅलिसी का खुलासा भी हो जाता है। इस बार जो मीडिया सलाहकार लगाया गया था वह मूलतः एक सक्रिय पत्रकार था। पत्रकारिता छोड़ कर सलाहकार का पद संभाला था। जबकि इससे पहले धूमल और वीरभद्र सरकारों के दौरान जो मीडिया सलाहकार रहे हैं उनका सक्रिय पत्रकारिता से कभी कोई ताल्लुक नही रहा है। ऐसे में फिर यह चर्चा चल पड़ी है कि क्या जयराम किसी भी ऐसे व्यक्ति को सलाहकार ला रहे हैं जिसका पत्रकारिता से कोई संबंध न रहा हो। वैसे चर्चा यह भी है कि वीरभद्र शासन की तर्ज पर किसी आईएएस अधिकारी को सेवानिवृति के बाद मीडिया सलाहकार के पदनाम से कोई बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी की जा रही है। यह आम चर्चा है कि जयराम सरकार का ज्यादा काम कुछ आईएएस अधिकारियों के माध्यम से हो रहा है। इन अधिकारियों के आगे राजनीतिक नियुक्तियां कोई ज्यादा प्रभावी नही हो पा रही है।
इस परिदृश्य में यह संभावना बढ़ती जा रही है कि शायद कभी निकट भविष्य में सलाहकार का पद नही भरा जायेगा। इस लोकसभा चुनावों में यह भी स्पश्ट हो जायेगा कि जयराम की अफसरशाही कैसे मीडिया को मैनेज करती है। वैसे मीडिया सलाहकार के त्यागपत्रा से जयराम सरकार पर लग रहे ‘मण्डी प्रेम’ के आरोपों पर भी कुछ हद तक जवाब गया है।
शिमला/शैल।जयराम सरकार ने अभी विभिन्न उद्योगपत्तियों के साथ 159 एमओयू साईन करके प्रदेश में 17356 करोड़ का निवेश आने और 40,000 लोगों को रोजगार मिलने का एक बड़ा सपना प्रदेश की जनता करो परोसा है। यह सपना ज़मीन पर आकार ले पायेगा या जुमला होकर ही रह जायेगा। यह सवाल अभी से उठने लग पड़ा है। यह सवाल उद्योग विभाग के उस पत्र से उठा है जो विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव द्वारा सारे प्रशासकीय सचिवों को सात फरवरी को लिखा गया है। इस पत्र में सचिवों से कहा गया है
"You are, therefore, requested to take up with and invite the investors of projects which are in pipeline and/or in which EC or permission under section-118 of H.P. Tenancy and Land Reform Act stand signed/issued and request them to participate in the aforesaid 'MOU signing ceremony'. A copy of the suggested MoU is enclosed for your reference.
You are also requested to inform the number and details of MoUs proposed to be signed in the by your department/organization, to this Office within a week.
This Memorandum of Understanding is made to facilitate M/s. for establishment of the aforesaid project in Himachal Pradesh in a time bound manner.
This MOU indicates the intention of the investor in brief about the proposed industry and the possible facilitation to be extended by the state Government and shall remain valid for a maximum period of 12 (twelve) months from the date of entering into MOU unless otherwise extended by second party. No separate notice will be required to be issued for this."
इस पत्र में सरकार द्वारा संभावित निवेशकों को उद्योग स्थापित करने के लिये यथा संभव सहायता का आश्वासन दिया गया है। लेकिन इस निवेशक मीट को जिस तरह से प्रचारित किया गया है उससे यह संदेश दिया गया है कि इतना निवेश प्रदेश को मिल गया है और 40000 लोगों को रोजगार मिलने ही वाला है। इस निवेशक मीट पर सरकार का खर्च हुआ है। आगे जो ऐसी ही मीट प्रस्तावित है उस पर भी खर्च होगा। प्रदेश में 1977 से औद्यौगिक क्षेत्र चिन्हित होते आये हैं। इन क्षेत्रों में उद्योग भी स्थापित हुए हैं। इन उद्योगों को हर तरह का सहयोग दिया गया है। प्रदेश का वित्त निगम, एसआईडीसी, जी आईसी और खादी एवम् ग्रामीण उद्योग बोर्ड, यह सारे अदारे इन उद्योगों को सहायता देते रहे हैं। लेकिन आज इन सारे अदारों की अपनी सेहत भी नाजुक होने के कगार पर पंहुच गयी है। बल्कि कुछ तो कभी भी बन्द होने की हालत तक पंहुच चुके हैं। लेकिन इस सबके बावजूद आज यदि यह आंकलन किया जाये कि कब कितने उद्योग स्थापित हुए और उनमें से अब कितने यहां चल रहे हैं तो शायद यह आंकड़े चैंकाने वाले होंगे।
हिमाचल में निवेशकों के आकर्षण का सबसे बड़ा कारण था यहां पर सस्ती और निर्बाध बिजली। क्योंकि आद्यौगिक क्षेत्र में हिमाचल की पहचान बिजली उत्पादक राज्य के रूप में देशभर में प्रचारित और प्रसारित थी। लेकिन इस निवेशक मीट के बाद प्रदेश में जिस तरह से बिजली के रेट बढ़ाये गये हैं। उनको लेकर बिजली बोर्ड के कर्मचारी संगठनों से लेकर आम आदमी तक इस पर रोष प्रकट कर रहा है और हो सकता है कि इसके लिये आन्दोलन की नौबत आ जाये। ऐसे में यह सीधा सवाल उठता है कि क्या इन बढ़ी हुई बिजली दरों का सामने रखकर निवेशक हिमाचल आने का रूख करेंगे। क्योंकि किसी भी उद्योग के लिये यह आवश्यक होता है कि जहां वह स्थापित हो रहा है वहां क्या उसके उत्पाद का पर्याप्त उपभोक्ता है। यदि उपभोक्ता नही है तो क्या उत्पादन के लिये सस्ते संसाधन हैं। क्या उद्योग विभाग ने इन बुनियादी आवश्यकताओं का कोई आंकलन करवाया है? शायद नहीं।
जो एम ओ यू साईन हुए हैं उनमें सिरमौर में प्रस्तावित सीमेन्ट उद्योग को लेकर भी एक है। जबकि प्रदेश सरकार ने जुलाई 2006 में चैपाल के गुम्मा - रोहाना में एक प्राईवेट कंपनी के साथ दो मिलियन टन क्लींकर और एक मिलियन टन सीमेन्ट के लिये एम ओ यू साईन किया था। इस एमओयू के मुताबिक कंपनी को माईनिंग लीज, फोरेस्ट क्लीयरैन्स, पर्यावरण क्लीयरैन्स आदि सबकुछ अपने खर्चे से हासिल करना था। उद्योग विभाग के जियोलोजिक विंग को संभावित लाईम स्टोन के रिर्जव आदि का आंकलन कंपनी के आग्रह और खर्च पर करना था। इसी तरह का एक एमओयू सितम्बर 2009 में सुन्दर नगर के लिये साईन हुआ था। दोनो जगह विभाग ने लाईम स्टोन के भण्डार का आंकलन करने के लिये अपनी मशीनरी और कर्मचारी लगा दिये थे। इस काम पर विभाग का करीब 2.77 करोड़ रूपया खर्च हुआ है। जबकि दोनो कंपनियों से विभाग को केवल 89 लाख ही मिल पाये हैं। इन कंपनीयों को फोरेस्ट आदि की क्लीयरैन्स नही मिल पायी है और इस कारण से अगस्त 2017 से इन्होंने काम बन्द कर दिया है। जिस समय इन कंपनीयों के साथ एमओयू साईन हुए थे तब भी इसी तरह के बड़े निवेश और रोजगार का सपना देखा गया था लेकिन इस सपने का परिणाम आज यह है कि आज उद्योग विभाग का अपना करीब दो करोड़ रूपया इसमें डूब गया है। क्या 2006 और 2009 में साईन हुए इन एमओयू की जानकारी मुख्यमन्त्री और उद्योग मन्त्री को दी गयी है? यदि यह जानकारी मुख्यमन्त्री को है तो फिर यह जो निवेश सरकार का अपना डूब गया है उसकी भरपायी कैसे की जायेगी? भविष्य में निवेशकों के साथ इसी तरह का अनुभव न घटे इसको कैसे सुनिश्चित किया जायेगा। जिस तन्त्र के कारण इन कंपनीयों को वाच्छित क्लीयरैन्स नही मिल पाये हैं उसके खिलाफ क्या कारवाई की गयी है। औद्यौगिक निवेश से पहले सरकार को इन पक्षों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
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